गुरुवार, 21 अक्तूबर 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ७७)

भक्तवत्सल भगवान के प्रिय भीष्म

देवर्षि ने उन्हें सत्कारपूर्वक अपने पास बिठाया और इसी के साथ भक्तिसूत्र के अगले सत्य का उच्चारण किया-

‘तत्तु विषयत्यागात् सङ्गत्यागाच्च’॥३५॥
वह (भक्ति-साधन) विषय त्याग और सङ्गत्याग से सम्पन्न होता है।

इस सूत्र को सुनकर न जाने क्यों महर्षि धौम्य की आँखें भींग आयीं। महर्षि की आँखों में अचानक छलक आए इन आँसुओं को सभी ने देखा। सप्तऋषियों सहित सभी देवगण-सिद्धगण महर्षि के इन भावबिन्दुओं को निहारने लगे परन्तु किसी ने कहा कुछ नहीं। थोड़ी देर तक सब ओर मौन पसरा रहा। इसे बेधते हुए ब्रह्मर्षि विश्वामित्र और पुलह लगभग एक साथ कह उठे- ‘‘लगता है इन क्षणों में किन्हीं स्मृतियों ने आपको विकल किया है।’’ ‘हाँ’ कहते हुए ऋषि धौम्य ने अपना सिर उठाया और बोले, ‘‘देवर्षि के सूत्र से मुझे विषय और सङ्ग का सम्पूर्ण रूप से त्याग करने वाले भक्त भीष्म की याद आ गयी।’’ भीष्म का नाम सुनकर ब्रह्मर्षि वशिष्ठ से भी न रहा गया। आखिर उन्होंने ही तो अष्टवसुओं को श्राप दिया था। इन अष्टवसुओं में से सात को तो जगन्माता श्रीगंगा जी मुक्त कर पायीं परन्तु आठवें वसु ‘धौ’ को शान्तनु के आग्रहवश वह अपने जल प्रवाह में न प्रवाहित कर सकीं।
यही गंगापुत्र देवव्रत थे। ब्रह्मर्षि वशिष्ठ को भीष्म के अतीत का यह प्रसंग भूला न था। वह भी उन्हें याद कर भावविह्वल हो उठे और कहने लगे, ‘‘निश्चय ही गंगापुत्र महान भक्त थे। सारे जीवन उन्होंने पीड़ाएँ सहीं, घात-प्रतिघात सहे, किन्तु सत्य से कभी न विचलित हुए। इन पीड़ाओं ने ही उनके अन्तःकरण को भक्ति-सरोवर बना दिया था। महर्षि धौम्य आपने तो उनका सान्निध्य-संग पाया है। उन परमभागवत भीष्म की भक्तिगाथा हम सबको अवश्य सुनाएँ।’’ ब्रह्मर्षि वशिष्ठ के वचनों का सभी ने अनुमोदन किया। गायत्री के महाभर्ग को धारण करने वाले विश्वामित्र और पुलह भी कह उठे, ‘‘अवश्य ऋषि धौम्य! उन महान भक्त की गाथा सुनाकर हम सब को तृप्ति दें।’’ ऋषि धौम्य ने यह सब सुनकर उन सभी की ओर देखा, फिर देवर्षि की तरफ निहारा। उनकी इस दृष्टि को देवर्षि ने अपना अहोभाग्य समझा और कहने लगे, ‘‘गंगापुत्र भीष्म तो सदा ही माता गंगा की भाँति पवित्र हैं। उनके जीवन की भक्तिलहरों से हम सभी अभिसिंचित होना चाहेंगे ऋषिवर!’’

सभी के आग्रह से महर्षि की भावनाएँ शब्द बन कर झरने लगीं। वे कहने लगे, ‘‘गंगापुत्र देवव्रत को उनकी सत्यनिष्ठा ने, उनकी अटल प्रतिज्ञा ने भीष्म बनाया। यूँ तो उनके सुदीर्घ जीवन के अनेको अविस्मरणीय प्रसंग हैं, जिन्हें महर्षि वेदव्यास ने ‘जय’ काव्य में कहा है परन्तु एक प्रसंग सबसे अनूठा है, जिसमें स्वयं भगवान श्रीकृष्ण अपने इस भक्त के वश में हो गए थे। उन दिनों महाभारत का महासमर चल रहा था।’’ ऋषि धौम्य की वाणी अपने स्मृति रस में भीगने लगी। ‘‘दुर्योधन प्रायः ही पितामह को पाण्डवों के वध के लिए उकसाता रहता था। एक दिन उसने कहा-पितामह! आपने तो अपने गुरू भार्गव परशुराम को भी युद्घ में पराजित किया है। आपके सामने मनुष्य तो क्या स्वयं देवगण भी नहीं टिक सकते। तब फिर पाण्डवों की क्या मजाल? कहीं हस्तिनापुर के प्रति आपकी निष्ठा तो नहीं डिग रही। कुटिल शकुनि की चालों में आकर दुर्योधन ने भीष्म के मर्म पर चोट की।

भीष्म व्यथित हो उठे। उन्होंने पाँच बाण अपने तूणीर से अलग करते हुए प्रतिज्ञा की-कल के युद्घ में इन पाँच बाणों से पाण्डवों का वध होगा। यदि ऐसा न हो सका तो?- दुर्योधन की जिह्वा को काल ने कीलित करते हुए नया प्रश्न किया। दुर्योधन के प्रश्न का भीष्म ने उत्तर दिया- तो फिर स्वयं श्रीकृष्ण को शस्त्र उठाना पड़ेगा। दुर्योधन को वचन देने के उपरान्त भीष्म और भी व्यथित हो उठे। वह अपने शिविर में बैठे हुए श्रीकृष्ण को पुकारने लगे- हे जनार्दन! हे माधव!! अपने भक्त की लाज रखो गोविन्द, भक्त की पुकार भगवान ने सुनी। उन लीलापुरुषोत्तम ने अपनी लीला रची। इस प्रतिज्ञा की चर्चा सुनकर महारानी द्रोपदी व्यथित हो उठी। वह उन्हें लेकर भीष्म के शिविर में पहुँची। भीष्म आँख मूँदे श्रीकृष्ण का ध्यान कर रहे थे। द्रोपदी के प्रणाम करने पर उन्होंने आँख मूँदे ही उसे सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद दे डाला। इस आशीर्वाद को सुनकर द्रोपदी बिलख उठी और बोली, यह कैसा आशीर्वाद? द्रोपदी की वाणी को सुनकर भीष्म चौंके, उन्होंने आँखें खोलीं और बोले, पुत्री! तुम्हें जो यहाँ तक लाए हैं, वे स्वयं कहाँ हैं? भक्त की विकल पुकार सुनकर योगेश्वर श्रीकृष्ण उनके सम्मुख आए और बोले-पितामह! आप सम्पूर्ण जीवन सांसारिक भोग विषयों से, उनके कुत्सित संग से दूर रहे हैं। दुर्योधन और शकुनि जैसे दुराचारी और कुटिल जनों के बीच भी आपने भक्ति की सच्ची साधना की है। विश्वास रखिए, मेरा मान भले ही भंग हो, मेरे भक्त का मान कभी भंग नहीं हो सकता।

अगले दिन प्रातः जब रणभेरियाँ बजीं, युद्घ का प्रारम्भ हुआ तब महाभक्त और परमशूरवीर भीष्म ने महासंग्राम किया। पाण्डव सेना के पाँव उखड़ने लगे। अर्जुन का रथ भी स्थिर न रह सका। भीष्म के सम्मुख अर्जुन की सारी धनुर्विद्या विफल होने लगी। ऐसे में स्वयं श्रीकृष्ण ने हुंकार भरी और अपनी प्रतिज्ञा भंग करते हुए वह हाथ में चक्र लेकर दौड़ पड़े। सेना में हाहाकार मच गया। भक्त भीष्म अपने भक्तवत्सल भगवान को भक्तिपूर्वक निहारने लगे-
वा धीतपट की कहरान।

कर धरि चक्र चरन की धावनि,नहि विसरति वह बान॥
रथ ते उतरि अवनि आतुर ह्वै, कच रज की लपटान।
मानों सिंह सैल तें निकस्यों, महामत्त गज जान॥
हे प्रभु तुम मेरो पन राख्यो, मेटि वेद की वान।

भीष्म के मन मन्दिर में भगवान की मूर्ति सदा के लिए बस गयी। अर्जुन के आग्रह पर भगवान तो अपने रथ पर वापस लौट गए, परन्तु भीष्म का मन पुनः वापस नहीं लौटा। अन्त क्षण में वे प्रभु का यही रूप निहारते रहे। शरशय्या पर पड़े हुए भीष्म भगवान के इसी रूप का ध्यान करते रहे। जीवन में उन्हें अनगिनत और असहनीय पीड़ाएँ मिलीं पर इन पीड़ाओं से उनकी भक्ति निखरती गयी। भगवान की कृपा वर्षा उन पर और भी सघन होती गयी। अन्तिम क्षणों में भी पितामह भीष्म चक्रधारी के उसी स्वरूप का चिन्तन करते हुए उन्हीं के दिव्य स्वरूप में विलीन हो गए।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १४४

मंगलवार, 19 अक्तूबर 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ७६)

भक्तवत्सल भगवान के प्रिय भीष्म

भक्तिरस में भीगी देवर्षि नारद की वाणी सभी को भगवद्रस में भिगोती गयी। शरद पूर्णिमा के चन्द्रमा की किरणों से भक्ति चन्द्रिका की उजास सभी के अन्तःकरण में उतरती रही। भगवान का ‘रसो वै सः’ स्वरूप उस भक्ति समागम में उपस्थित जनों की अन्तर्चेतना में प्रकट होता गया। चन्द्रदेव अपने अमृतरस के पूर्ण कलश हिमालय के हिमशिखरों पर बिखेरते हुए तारकगणों के साथ विहार करते रहे। हिमवान के आंगन में बैठे भक्तिरस में भीगे हुए ऋषि-महर्षि, सिद्घ देवगण अपनी आध्यात्मिक रात्रिचर्या में लग गए। सदा ही इनके दिवस भगवान का गुणगान करने में, भगवद्भक्तों की कथावार्ता में व्यतीत होते थे। इनकी रात्रियाँ सदा ही भक्ति की भावसमाधि की निमग्नता में डूबी होती थीं। यह लोकोत्तरजनों का समागम था। इसकी विशिष्टताएँ, अलौकिकताएँ तो केवल समाधि में ही जानी जा सकती थीं।

रात्रि के साथ ही भक्ति-समाधि के क्षण भी बीते। गगन में भगवान सूर्यदेव का सात रश्मि अश्वों का रथ हांकते हुए सूर्य सारथी अरुण ने पदार्पण किया। गगन में उनके पहला पग धरते ही निशा का सम्पूर्ण साम्राज्य तिरोहित होने लगा। अरुण आभा से श्वेत हिमशिखर रक्तिम-स्वर्णिम होने लगे। इसी के साथ सभी प्रातकृत्य, सन्ध्यावन्दन, सूर्यार्घ्यदान से निवृत्त हुए। समूचे वातावरण की सूक्ष्मता में गायत्री महामंत्र के चौबीस मन्त्राक्षरों की अनुगूँज फैल गयी। साथ ही महाभर्ग सूर्य का तेजस और भी सघन होता गया। सप्तऋषियों की भक्तिसभा देवर्षि नारद के भक्तिसूत्र में गुँथती गयी, जुड़ती गयी। जुड़ने के इस क्रम में इस भक्ति समागम में एक अन्य महिमामय और पधारे। अरुण देव के पदार्पण के साथ ही हिमवान के आंगन में इनका भी आगमन हो गया था। प्रायः सभी इनकी तपसाधना और भक्तिभावना से परिचित थे।

ये महर्षि धौम्य थे, जो इस धराधाम पर महाभारत काल में विचरण किया करते थे, जिन्होंने पाण्डुपुत्रों को वनवास काल में अनेकों आध्यात्मिक शिक्षाएँ और सहायताएँ दी थीं। महारानी द्रोपदी को अक्षयपात्र इनकी ही सहायता-कृपा से प्राप्त हुआ था। देवर्षि इन्हें परम प्रिय थे। इनके सुखद, भावपूर्ण भक्तिरस में भीगे सान्निध्य का आकर्षण ही सम्भवतः इन्हें यहाँ ले आया था। अन्यथा इनका स्वाभाविक निवास तो इन दिनों तपोलोक में था। यह तपस्वी महर्षियों का दिव्यलोक है। इस उच्चतर प्रकाशलोक में भी हिमवान के आँगन में बह रही भक्तिगंगा की लहरें पहुँचने लगी थीं। तभी तो वहाँ के महर्षि आज यहाँ इस भक्तिसभा में पधारे थे। देवर्षि ने उन्हें सत्कारपूर्वक अपने पास बिठाया और इसी के साथ भक्तिसूत्र के अगले सत्य का उच्चारण किया-

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १४

शनिवार, 16 अक्तूबर 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ७५)

महारास की रसमयता से प्रकट हुआ है भक्तिशास्त्र

देवर्षि का यह सूत्र सभी को भक्तिकाव्य की मधुर-सम्मोहक पंक्ति की तरह लगा। यह सच सभी अनुभव कर रहे थे कि अन्य शास्त्रों की तो चर्चा होती है, विचार किया जाता है, विमर्श होता है, उनके उपदेश होते हैं, पर भक्ति की तो बात ही अनूठी है। इसमें भला चर्चा और विमर्श क्या? तर्कों के गणितीय समीकरणों का भला भक्ति में क्या काम? बात भक्ति की चले तो स्वयं ही गीत गूंजने लगते हैं। बात भक्ति की हो तो साधना की पथरीली राहों पर स्वयं ही सुमन सज जाते हैं। कदम भक्ति की डगर पर बढ़े तो ग्रीष्म का आतप, शिशिर की ठिठुरन, वर्षा का प्रचण्ड वेग, सबके सब ऋतुराज वसन्त में रूपान्तरित हो जाते हैं। सत्य यही है कि भक्ति बोलती नहीं, गाती है। भक्ति बोलती नहीं, नाचती है।

भक्ति की यह अनुभूति समष्टि में तरंगित होती रही। जल-थल और नभ में यह भक्तिधुन तैरती रही। हिमवान के शैलशिखरों में भी आज भक्ति का अन्तःस्रोत प्रकाशित हो उठा। अपनी किरणों से अमृतवृष्टि कर रहे चन्द्रदेव का अस्तित्त्व भी भावों में भीग गया। और ऐसा स्वाभाविक भी था- ‘चन्द्रमा मनसो जातः’ इस वेदवाणी के अनुसार चन्द्रमा प्रभु के मन का बिम्ब ही तो है। भक्ति की इस भावचर्चा में जब भक्तों के मन भीगे हुए हैं तो भला भगवान का मन क्यों न भीगे। देवर्षि नारद ने भक्तिरस में सिक्त चन्द्रमा की ओर देखा, फिर मुस्करा कर मौन हो गए।

उनकी यह मुस्कराहट और फिर उनका मौन होना, इसे सभी ने देखा। जहाँ अन्यों ने कुछ नहीं कहा, वहीं ब्रह्मर्षि वसिष्ठ तनिक मुखर होकर किन्तु मृदु स्वर में बोले- ‘‘कुछ कहें देवर्षि! आखिर आप भी तो भक्ति के आचार्य हैं। आपकी अनुभूतियों में तो भक्ति के साधन के गीत सदा ही गूंजते होंगे।’’ वसिष्ठ के इस कथन को शिरोधार्य करते हुए देवर्षि ने विनम्र भाव से कहा, ‘‘आप सदृश ब्रह्मर्षियों का आशीष अवश्य भगवत्कृपा बनकर मेरे अन्तर्भावों में गूँजता है। परन्तु जहाँ तक भक्ति के साधन गीतों के गायन की बात है, तो आज तो वह समस्त सृष्टि में गूँज रहे हैं।’’ ऐसा कहते हुए देवर्षि ने आकाश में तारागणों के साथ मुक्त विहार करते हुए चन्द्रमा की ओर निहारा।

देवर्षि की इस दृष्टि और उनके मन के अन्तर्भावों को ब्रह्मर्षि वसिष्ठ सहित सभी महर्षि एवं देवगण समझ गए, उन्हें भान हुआ कि आज शरद पूर्णिमा है। उसी की ओर इंगित कर रहे हैं। शरद पूर्णिमा तो सदा ही भक्ति का महारास बनकर सृष्टि में अवतरित होती है। इन पावन क्षणों में प्रकृति अनगिन रूप धर कर विराट पुरुष को अपनी भक्ति अर्पित करती है। इस महारास में प्रकृति स्वयं भक्त बनकर भक्ति के अनन्त-अनन्त रूपों को प्रस्तुत करती है और उसके सभी रूपों को स्वयं भगवान स्वीकारते हैं। भक्ति और भक्त उन भगवान में समाते हैं, उनसे एकात्म होते हैं। जिनके पास आध्यात्मिक दृष्टि है, सृष्टि की सूक्ष्मता का ज्ञान है, जो प्रकृति और पुरुष के अन्तर्मिलन को निहारने में समर्थ हैं, केवल वे ही उनके बाह्य मिलन को अनुभव कर सकते हैं। भक्ति के सभी आचार्यों ने इन सूक्ष्मताओं को देख परख कर ही तो भक्ति के साधनों का गान किया है।

शरद पूर्णिमा की इस अनुपम छटा ने देवर्षि को अपने आत्मभावों में निमज्जित कर दिया है। वे जैसे स्वयं से ही कह रहे थे- ‘‘द्वापर युग में ब्रजमण्डल में एक परमदिव्य शरद पूर्णिमा की निशावेला में विराट पुरुष एवं प्रकृति का यह सम्मिलन साकार हुआ था। इस विरल मुहूर्त में भक्ति के अनोखे गीत गूँजे थे और भक्ति के सभी साधनों ने नृत्य किया था। कालिन्दी की लहरों के सान्निध्य में, कदम्ब के वृक्षों की छांव में, यह महारास हुआ था। विराट पुरुष स्वयं योगेश्वर कृष्ण का रूप लेकर आए थे। प्रकृति ने ब्रजबालाओं का बाना पहना था। चन्द्रदेव उस घड़ी में सर्वथा मुक्त भाव से अमृतवृष्टि कर रहे थे।

उन पलों में भक्ति-भक्त एवं भगवान तीनों ही सम्पूर्ण रूप से एकाकार हो रहे थे। जीवन चेतना का हर पहलू जुड़ रहा था, मिल रहा था, समा रहा था। वहाँ हास्य था, उल्लास था, उछाह था, मुक्त मिलन था। महारास था, परन्तु आसक्ति का लेश भी न था, विषय वासना तनिक भी न थी। चन्द्रदेव की धवल चन्द्रिका की भाँति अन्तः-बाह्य सभी आयामों में सम्पूर्ण निर्मलता थी। गोपिकाएँ अपने गोपेश्वर के प्रति अर्पित हो रही थीं। जैसे समस्त सरिताएँ एक साथ ही सागर में समा जाती हैं, ठीक वैसे ही गोपबालाएँ योगेश्वर कृष्ण में समा रही थीं। प्रकृति का कण-कण, रसमय-प्रभुमय हो रहा था। यह रसमयता, यह प्रभुमयता ही तो भक्ति है। जहाँ यह है, वहाँ भक्ति के समस्त साधन स्वयं ही प्रकट हो जाते हैं। वहाँ सहज ही भक्ति के गीत गूँजते हैं।’’ धाराप्रवाह बोलते-बोलते देवर्षि अचानक रुके, फिर मुस्कराए और अपने प्रिय नारायण का स्मरण करते हुए बोले- ‘‘मेरा सम्पूर्ण भक्तिशास्त्र उस महारास की रसमयता से ही तो प्रकट हुआ है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १४०

मंगलवार, 12 अक्तूबर 2021

👉 इस तप-साधना में संलग्न होना ही चाहिये

आज तो विचार-क्रान्ति का प्रथम चरण उठाया जाना आवश्यक है! अभी तो गहरी खुमारी में अवांछनीय रूप से देखने वालों को जगाया जाना ही प्रथम कार्य है जिसके बाद और कुछ सोचा और किया जाना सम्भव है। इसलिए लोक- शिक्षण को अनिवार्य आवश्यकता की पूर्ति के लिए अभी अपना प्रथम अभियान चल रहा है। इसके अन्तर्गत हमें अशुद्ध विचारों के दुष्परिणाम और सद्विचारों की उपयोगिता तथा स्वतन्त्र चिन्तन को पद्धति मात्र सिखानी बतानी है। इसी का क्षेत्र व्यापक बनाना है। जो सचमुच हमें प्यार करते हों- जो सचमुच हमारे निकट हों- जिन्हें सचमुच हमसे दिलचस्पी हो- उन्हें इसके लिए योजना को कार्यान्वित करने के लिए इस तप-साधना में संलग्न होना ही चाहिये।

विचार-क्रान्ति के प्रथम चरण की प्रस्तुत योजना के दो आधार हैं। प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा अथवा छुट्टी के दिन पूरा समय देना। दूसरी अपनी आजीविका का एक अंश इस पुण्य प्रयोजन में नियमित रूप से लगाना। महीने में एक दिन उपवास ही क्यों न करना पड़े-चाहे किसी आवश्यकता में कटौती ही क्यों न करनी पड़े पर इतना त्याग बलिदान तो किया ही जाना चाहिये। नियमितता से स्वभाव एवं अभ्यास का निर्माण होता है इसलिए एक बार थोड़ा समय या थोड़ा पैसा दे देने से काम न चलेगा इसमें नियमितता जुड़ी रहनी चाहिये। लगातार की नियमितता को ही साधना कहते हैं। जो कम ज्यादा समय या धन खर्च करना चाहें वे वैसा कर सकते हैं। पर होना सब कुछ नियमित हो चाहिये। लगातार चलने से मंजिल पार होती है। एक क्षण की उछाल चमत्कृत तो करती है पर उससे लम्बी मंजिल का पार होना सम्भव नहीं। इसलिए किसी से बड़ी धन राशि की याचना नहीं की है भले ही थोड़ा-थोड़ा हो पर नियमित रूप से कुछ करते रहने के लिए कहा गया है।

अपने क्षेत्र के ऐसे शिक्षित जिनमें थोड़ी विचारशीलता की सम्भावना हो अपने सम्पर्क क्षेत्र में ढूंढे जा सकते हैं और उनकी लिस्ट बनाई जा सकती है। आरम्भ में यह लिस्ट छोटी भी बनाई जा सकती है पर पीछे एक दूसरे से पूछने परामर्श करने पर उस लिस्ट का विस्तार होता रह सकता है। प्रतिदिन यथा अवसर कुछ लोगों से मिलना और उन्हें एक विज्ञप्ति पढ़ने का अनुरोध करना बिना झिझक-संकोच एवं समय खर्च किये बड़ी आसानी से हो सकता है। किसी बड़े दफ्तर या कारखाने में काम करने वाले, बड़ी कक्षाओं के अध्यापक लोग, चिकित्सक, व्यापारी, घूमने वाले ऐजेन्ट, दलाल, पोस्टमैन जैसे व्यक्ति तो बड़ो आसानी से यह काम कर सकते हैं। हर स्थिति का व्यक्ति कहीं न कहीं लोगों से मिलता- जुलता ही है। उसको परिवार, सम्पर्क, रिश्तेदार, मित्र, परिजन कुछ तो होते ही हैं। यहाँ से आरम्भ करके उसकी श्रृंखला परिचितों से परिचय प्राप्त करने से बढ़ाई जा सकती है। इस प्रकार अपना प्रचार क्षेत्र हर किसी के लिए १०० तक हो सकता है। गाँवों में समीपवर्ती दो- चार गांवों का मिलकर भी यह क्षेत्र हो सकता है। यह सौ व्यक्ति चलते- फिरते नहीं वरन् ऐसे होना चाहिये जिसके पास बार-बार पहुंचा जा सके और जो लगातार उस साहित्य सीरीज को पढ़ाकर अपना मन मस्तिष्क परिपक्व करने के उपयुक्त कुछ ठोस सामग्री लगातार प्राप्त करते रह सकें।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1969

👉 भक्तिगाथा (भाग ७५)

महारास की रसमयता से प्रकट हुआ है भक्तिशास्त्र

महर्षि दुर्वासा के मुख से भक्ति की अनुभवकथा को सुनकर सभी के हृदयसरोवर में भगवत्प्रेम की अनेकों उॄमया उठीं। प्रायः सभी के नेत्र ऋषि दुर्वासा के मुख को निहारने लगे। इस समय उनके मुख पर बड़ी सहज और सात्त्विक कोमलता थी। इस अनूठी कोमलता को देखकर कईयों को अचरज भी हुआ क्योंकि ऋषि दुर्वासा तो सदा ही अपने रौद्रभाव के लिए विख्यात थे। उनके मुखमण्डल पर तो सदा ही दुर्धर्ष रौद्रभाव की छाया रहती थी। कठिन तप की कठोरता का तेजस उनके मुख को आवृत्त किए रहता था। परन्तु आज तो स्थिति परिवर्तित थी। इन क्षणों में कोमलता ने कठोरता का स्थान ले लिया था। महर्षि की आँखें भीगी हुई थीं। हृदय विगलित था और कण्ठ रुद्ध हो रहा था। बस भक्तिपूर्ण मन से आकाश को निहारे जा रहे थे। मुख से निकलते अस्फुट स्वरों- हे भक्तवत्सल नारायण! हे करूणासिन्धु नारायण!! हे कृपासागर नारायण!!! के रूप में भक्ति की निर्झरणी बह रही थी।

प्रखर तपस्वी महर्षि दुर्वासा का यह रूप सभी के अन्तस को छू गया। इन क्षणों में हिमवान के शिखरों की शुभ्रता शत-सहस्र-लक्षगुणित होती जा रही थी। ऐसा हो भी क्यों न? आखिर निशिपति चन्द्रदेव तारकों का पुष्पहार पहनकर गगन-विहार करने जो आ चुके थे। वह अपने सहस्र-सहस्र रश्मिकरों से रूपहली चाँदनी सब ओर बिखेर रहे थे। इस उज्ज्वल-धवल चाँदनी के संस्पर्श से शुभ्र हिमशिखरों की शुभ्रता और भी सम्मोहक हो रही थी। जितनी तीव्रता से हिमालय के शिखरों पर चन्द्रमा की चाँदनी व्याप्त हो रही थी, उतनी ही तीव्रता से उपस्थित जनों के मनों में महर्षि दुर्वासा के प्रति अपनापन व्याप्त हो रहा था। ऋषियों-महर्षियों, देवों, सिद्धों की सुकोमल भावनाएँ महर्षि के भक्तिपूर्ण मन से एकात्म हो रही थीं।

इस गहन आध्यात्मिक अनुभूति से देवर्षि नारद भी पुलकित थे। वह मौन हो आनन्दित हो रहे थे। आनन्द की यह छटा उनकी मुखछवि पर भी छिटक रही थी। वह इस समय बस भक्ति की भाव तरंगों में भीग रहे थे। महर्षि वसिष्ठ अपने सप्तर्षिमण्डल के साथ इस दृश्य की मनोरमता निहार रहे थे। महाराज अम्बरीश की स्मृतियों ने उन्हें भी बहुत कुछ अतीत की झलकियाँ दिखा दी थीं। वह अनुभव कर रहे थे कि भक्ति की चर्चा और भक्त के सहचर्य-सत्संग से श्रेष्ठ अन्य कुछ भी नहीं। पर कहीं उनके मन में यह भी था कि देवर्षि अपने सूत्र का उच्चारण करें और इस भक्ति के भावप्रवाह की मनोरमता में एक नवीन आयाम जुड़े।

ब्रह्मर्षि वसिष्ठ के इन अन्तर्भावों ने देवर्षि की अन्तश्चेतना को हौले से छुआ और उसमें एक नवीन सूत्र का अंकुरण हुआ। वे वीणा की झंकृति के साथ मधुर स्वर में बोले-
‘तस्याः साधनानि गायन्त्याचार्याः’॥ ३४॥
आचार्यगण उस (भक्ति) के साधन (के गीत गाते हैं) बतलाते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १३८

सोमवार, 11 अक्तूबर 2021

👉 सच्ची सरकार

कन्धे पर कपड़े का थान लादे और हाट-बाजार जाने की तैयारी करते हुए नामदेव जी से पत्नि ने कहा- भगत जी! आज घर में खाने को कुछ भी नहीं है। आटा, नमक, दाल, चावल, गुड़ और शक्कर सब खत्म हो गए हैं। शाम को बाजार से आते हुए घर के लिए राशन का सामान लेते आइएगा।

भक्त नामदेव जी ने उत्तर दिया- देखता हूँ जैसी विठ्ठल जीकी कृपा। अगर कोई अच्छा मूल्य मिला, तो निश्चय ही घर में आज धन-धान्य आ जायेगा।

पत्नि बोली संत जी! अगर अच्छी कीमत ना भी मिले, तब भी इस बुने हुए थान को बेचकर कुछ राशन तो ले आना। घर के बड़े-बूढ़े तो भूख बर्दाश्त कर लेंगे। पर बच्चे अभी छोटे हैं, उनके लिए तो कुछ ले ही आना।

जैसी मेरे विठ्ठल की इच्छा।
ऐसा कहकर भक्त नामदेव जी हाट-बाजार को चले गए।

बाजार में उन्हें किसी ने पुकारा- वाह सांई! कपड़ा तो बड़ा अच्छा बुना है और ठोक भी अच्छी लगाई है। तेरा परिवार बसता रहे। ये फकीर ठंड में कांप-कांप कर मर जाएगा।
दया के घर में आ और रब के नाम पर दो चादरे का कपड़ा इस फकीर की झोली में डाल दे।

भक्त नामदेव जी- दो चादरे में कितना कपड़ा लगेगा फकीर जी?

फकीर ने जितना कपड़ा मांगा,
इतेफाक से भक्त नामदेव जी के थान में कुल कपड़ा उतना ही था।
और भक्त नामदेव जी ने पूरा थान उस फकीर को दान कर दिया।

दान करने के बाद जब भक्त नामदेव जी घर लौटने लगे तो उनके सामने परिजनो के भूखे चेहरे नजर आने लगे। फिर पत्नि की कही बात, कि घर में खाने की सब सामग्री खत्म है। दाम कम भी मिले तो भी बच्चो के लिए तो कुछ ले ही आना।

अब दाम तो क्या, थान भी दान जा चुका था। भक्त नामदेव जी एकांत मे पीपल की छाँव मे बैठ गए।

जैसी मेरे विठ्ठल की इच्छा।
जब सारी सृष्टि की सार पूर्ती वो खुद करता है, तो अब मेरे परिवार की सार भी वो ही करेगा। और फिर भक्त नामदेव जी अपने हरिविठ्ठल के भजन में लीन गए।

अब भगवान कहां रुकने वाले थे।
भक्त नामदेव जी ने सारे परिवार की जिम्मेवारी अब उनके सुपुर्द जो कर दी थी।

अब भगवान जी ने भक्त जी की झोंपड़ी का दरवाजा खटखटाया।
नामदेव जी की पत्नी ने पूछा- कौन है?
नामदेव का घर यही है ना?
भगवान जी ने पूछा।

अंदर से आवाज हां जी यही आपको कुछ चाहिये
भगवान सोचने लगे कि धन्य है नामदेव जी का परिवार घर मे कुछ भी नही है फिर ह्र्दय मे देने की सहायता की जिज्ञयासा हैl

भगवान बोले दरवाजा खोलिये
लेकिन आप कौन?

भगवान जी ने कहा- सेवक की क्या पहचान होती है भगतानी? जैसे नामदेव जी विठ्ठल के सेवक, वैसे ही मैं नामदेव जी का सेवक हूl

ये राशन का सामान रखवा लो। पत्नि ने दरवाजा पूरा खोल दिया। फिर इतना राशन घर में उतरना शुरू हुआ, कि घर के जीवों की घर में रहने की जगह ही कम पड़ गई।
इतना सामान! नामदेव जी ने भेजा है? मुझे नहीं लगता। पत्नी ने पूछा।

भगवान जी ने कहा- हाँ भगतानी! आज नामदेव का थान सच्ची सरकार ने खरीदा है।
जो नामदेव का सामर्थ्य था उसने भुगता दिया।
और अब जो मेरी सरकार का सामर्थ्य है वो चुकता कर रही है।
जगह और बताओ।
सब कुछ आने वाला है भगत जी के घर में।

शाम ढलने लगी थी और रात का अंधेरा अपने पांव पसारने लगा था।

समान रखवाते-रखवाते पत्नि थक चुकी थीं। बच्चे घर में अमीरी आते देख खुश थे। वो कभी बोरे से शक्कर निकाल कर खाते और कभी गुड़। कभी मेवे देख कर मन ललचाते और झोली भर-भर कर मेवे लेकर बैठ जाते। उनके बालमन अभी तक तृप्त नहीं हुए थे।

भक्त नामदेव जी अभी तक घर नहीं आये थे, पर सामान आना लगातार जारी था।

आखिर पत्नी ने हाथ जोड़ कर कहा- सेवक जी! अब बाकी का सामान संत जी के आने के बाद ही आप ले आना।
हमें उन्हें ढूंढ़ने जाना है क्योंकी वो अभी तक घर नहीं आए हैं।

भगवान जी बोले- वो तो गाँव के बाहर पीपल के नीचे बैठकर विठ्ठल सरकार का भजन-सिमरन कर रहे हैं।
अब परिजन नामदेव जी को देखने गये

सब परिवार वालों को सामने देखकर नामदेव जी सोचने लगे, जरूर ये भूख से बेहाल होकर मुझे ढूंढ़ रहे हैं।

इससे पहले की संत नामदेव जी कुछ कहते उनकी पत्नी बोल पड़ीं- कुछ पैसे बचा लेने थे। अगर थान अच्छे भाव बिक गया था, तो सारा सामान संत जी आज ही खरीद कर घर भेजना था क्या?

भक्त नामदेव जी कुछ पल के लिए विस्मित हुए। फिर बच्चों के खिलते चेहरे देखकर उन्हें एहसास हो गया, कि जरूर मेरे प्रभु ने कोई खेल कर दिया है।

पत्नि ने कहा सच्ची सरकार को आपने थान बेचा और वो तो समान घर मे भैजने से रुकता ही नहीं था। पता नही कितने वर्षों तक का राशन दे गया। उससे मिन्नत कर के रुकवाया- बस कर! बाकी संत जी के आने के बाद उनसे पूछ कर कहीं रखवाएँगे।

भक्त नामदेव जी हँसने लगे और बोले-! वो सरकार है ही ऐसी। जब देना शुरू करती है तो सब लेने वाले थक जाते हैं। उसकी देना कभी भी खत्म नहीं होता।

👉 अपनी श्रद्धा को उर्वर एवं सार्थक बनने दें

कभी हमने पूर्व जन्मों के सत् संस्कार वालों और अपने साथी सहचरों को बड़े प्रयत्नपूर्वक ढूंढा है और 'अखण्ड- ज्योति परिवार की शृद्खला में गूंथकर एक सुन्दर गुलदस्ता तैयार किया था। मंशा थी इन्हें देवता के चरणों में चढ़ा येंगे। पर अब जब जब कि बारीकी से नजर डालते हैं कि कभी के अति सुरम्य पुष्प अब परिस्थितियों ने बुरी तरह विकृत कर दिये है। वे अपनो कोमलता, शोभा और सुगंध तोनों ही खोकर बुरी तरह इतनी मुरझा गये कि हिलाते- दुलाते हैं तो भी सजीवता नहीं आती उलटी पंखड़ियाँ भर जाती हैं। ऐसे पुष्पों को फेंकना तो नहीं है क्योंकि मूल संस्कार जब तक विद्यमान हैं तब तक यह आशा भी है कि कभी समय आने पर इनका भी कुछ सदुपयोग सम्भव होगा, किसी औषधि में यह मुरझाये फूल भी कभी काम आयेंगे। पर आज तो देव देवो पर चढ़ाये जाने योग्य सुरभित पुष्पों की आवश्यकता है सो उन्हीं की छांट करनी पड़ रही है। अभी आज तो सजीवता ही अभीष्ट है और वस्तुस्थिति की परख तो कहने- सुनने- देखने- मानने से नहीं वरन् कसौटी पर कसने से ही होता है। सो परिवार को सजोवता- निर्जीवता- आत्मीयता, विडम्बना के अंश परखने के लिए यह वर्तमान प्रक्रिया प्रस्तुत की है। बेकार की घचापच छट जाने से अपने अन्तरिम परिवार को एक छोटी सीमा अपने लिए भी हलकी पड़ेगी बौर अधिक ध्यान से सींचे- पोसे जाने के कारण वे पौधे भी अधिक लाभान्वित होंगे

नव- निर्माण के लिए अभी बहुत काम करना बाकी है। विचार- प्रसार तो उसका बीजारोपण है। इसके बिना कोई गति नहीं। अक्षर ज्ञान की शिक्षा पाये बिना ऊंची पढ़ाई की न तो आशा है न सम्भावना है। इसलिए प्रारम्भ में हर किसी को अक्षर ज्ञान कराना अनिवार्य है। पीछे जिसकी जैमी अभिरुचि हो शिक्षा के विषय चुनना रह सकता है पर अनिवार्य में छूट किसी को नहीं मिल सकती। प्रारम्भिक अक्षर सबको समान रूप में  पढ़ने पड़ेगे। विचारों की उप-योगिता, महत्ता, शक्ति और प्रमुखता का रहस्य हर किसी के मस्तिष्क में कूट- कूट कर भरा जाना है और बताया जाना है कि व्यक्ति की महानता और समाज की प्रखरता उसमें सक्षिप्त विचार पद्धति पर ही सन्निहित है। परिस्थितियों के बिगड़ने- बनने का एकमात्र आधार विचारणा ही है। विवेक के प्रकाश में यह परखा जाना चाहिये कि हमने अपने ऊपर कितने अवांछनीय और अनुपयुक्त  विचार अंट रखे है और उनने हमारी कितनी लोमहर्षक दुर्गति की है। हमें तत्त्वदर्शी की तरह वस्तुस्थिति का विश्लेषण करना होगा और निर्णय करना होगा कि किन आदर्शों और उत्कृष्टताओं को अपनाने के लिए कठिबद्ध हों ताकि वर्तमान के नरक को हटाकर उज्ज्वल भविष्य की स्वर्गीय सम्भावनाओं को मूर्तिमान् बना सकना सम्भव हो सके। विचार- क्रान्ति का मूल यही रत्रतन्त्र चिन्तन है। जन- मानस को उसी की प्राथमिक शिक्षा दी जानी है। अभी हमारी योजना का प्रथम चरण यही है। अगले चरणों में तो अनेक रचनात्मक और अनेक संघर्षात्मक काम करने को पड़े हैं। युग परिवर्तन और घरती पर स्वर्ग का अवतरण अगणित प्रयासों की अपेक्षा रखता है। वह बहुत व्यापक और बहुमुखी योजना हमारे मस्तिष्क में है। उसकी एक हलकी- सी झाकी गत दिनों योजना में करा भी चुके हैं। वह हमारा रचनात्मक प्रयास होगा। संघर्षात्मक पथ एक और ही जिसके अनुसार अवांछनीयता, अनैतिकता एवं अरामाजिकता के विरुद्ध प्रचलित 'घिराव' जैसे भाध्यमों से लेकर समग्र बहिष्कार तक और उतनी अधिक दबाव देने की प्रक्रियाएं सम्मिलित हैं जिससे दुष्टुता भी बोल जाय और उच्छ्खनता का कचू-मर निकल जाय। सजग, समर्थ लोगों की एक सक्रिय  स्वय- सेवक सेना प्राण हथेली पर रखकर खड़ी हो जाय तो आज जिन अनैतिकताओं का चारों और बोलबाला है और जो न हटने वालो न टलने वाली दीखती हैं। आंधी में उड़ते तिनकों की तरह तिरोहित हो जाँयगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1969

👉 भक्तिगाथा (भाग ७४)

जहाँ भक्ति है, वहाँ भगवान हैं

ये क्षण बड़े शीतल व सुखद थे। ये अनुभूतियाँ कई क्षणों तक सभी को घेरे रहीं, तभी उस सघन आध्यात्मिक वातावरण में एक प्रखर तेजस्विता ने आकार ग्रहण किया। यह आकृति परम तेजस्वी व प्रखर तपस्वी ऋषि दुर्वासा की थी। ऋषि दुर्वासा अपने प्रचण्ड तप व असाध्य साधन के लिए विख्यात थे। उन्होंने योग एवं तंत्र की अनगिनत दुष्कर साधनाएँ सम्पन्न की थीं। विविध विद्याएँ अपने सभी सुफल के साथ उनके सामने करबद्ध खड़ी रहती थीं। इन महान ऋषि ने केवल दुर्व खाकर हजारों वर्ष तप किया था। दीर्घ अवधि तक इस दुर्व (दूब)+असन (भोजन) के कारण ही उनका नाम दुर्वासा हो गया था। उनकी चमत्कारिक शक्तियों व विकट तप की ही भाँति उनका क्रोध भी लोकविख्यात था परन्तु उनका क्रोध सदा ही किसी न किसी भाँति लोककल्याणकारी था।

ऐसे ऋषि दुर्वासा का आगमन, सुखद किन्तु आश्चर्यजनक था। वे महारूद्र के रौद्रतेज की साकार रौद्र मूर्ति थे। उनके आगमन से कुछ को प्रसन्नता हुई तो कुछ को आश्चर्य। परन्तु सुखी सभी थे क्योंकि सभी को यह लग रहा था कि महर्षि के आगमन से भक्तिगाथा में एक नयी कथा पिरोयी जाएगी। ऋषियों ने महर्षि का स्वागत किया। देवों, गन्धर्वों, सिद्धों व चारणों ने उन्हें भूमिष्ठ होकर प्रणाम किया। महर्षि दुर्वासा ने विहंसते हुए सभी का अभिवादन स्वीकार किया। उन्हें इस तरह हंसते हुए देखकर सभी को आश्वस्ति मिली। सभी को आश्वस्ति पाते देखकर महर्षि भी पुलकित हुए। उन्होंने सभी से कहा कि ‘‘मैंने अपने जीवन में अनगिनत साधनाएँ की हैं। इनकी संख्या इतनी अधिक है कि अब तो मैंने साधनाओं एवं सिद्धियों की गणना करना ही छोड़ दिया है। विद्याओं के विविध प्रकार और उनके सुफल मेरे लिए अर्थहीन हो गए हैं। इन सबसे मुझे किंचित मात्र भी शान्ति नहीं मिली।

यह परम शान्ति तो भक्ति में है। जिसकी वजह से वत्स अम्बरीश का इतने युगों बाद नामश्रवण भी भावों को भिगो देता है। जहाँ भक्ति है, वहाँ स्वयं भगवान हैं, और जहाँ भगवान हैं, वहाँ पराजय और अशुभ टिक ही नहीं सकते। इसलिए भक्ति ही श्रेष्ठतम साधन मार्ग है।’’ महर्षि दुर्वासा के ये अनुभूतिवाक्य सभी को प्रीतिपूर्ण लगे। उन सबने देवर्षि की ओर देखा। देवर्षि ने पुलकित मन से महर्षि दुर्वासा की ओर देखते हुए अपने नए सूत्र का उच्चारण किया-

‘तस्मात्सैव ग्राह्या मुमुक्षुभिः’॥ ३३॥
इसलिए संसार बन्धन से मुक्त होने की इच्छा रखने वालों को भक्ति ही ग्रहण करनी चाहिए।

देवर्षि के इन वचनों को सुनकर ऋषिश्रेष्ठ दुर्वासा कह उठे- ‘‘नारद के ये वचन त्रिकालसत्य हैं, त्रिवारसत्य हैं, और सच यही है कि यही सर्वकालिक सत्य है। मेरी स्वयं की अनुभूति भी यही कहती है।’’ फिर थोड़ा रुककर वह बोले- ‘‘सम्भव है कि आपने यह कथा सुन रखी हो परन्तु फिर भी मैं इसे कहना चाहता हूँ।’’ ‘‘अवश्य कहें-महर्षि!’’ सभी ने लगभग एक स्वर से कहा। केवल ऋषि अत्रि मुस्करा दिए। ऋषि दुर्वासा ने पिता की इस मुस्कान पर दोनो हाथ जोड़ लिए और कहना प्रारम्भ किया- ‘‘अभी आपने ब्रह्मर्षि वसिष्ठ के मुख से भक्त अम्बरीश का भक्तिप्रसंग सुना है। मैं भी आज उनकी भक्ति की सराहना करना चाहता हूँ। इस कथा को घटित हुए युगों बीत गए परन्तु मेरे अन्तःकरण में वे सभी दृश्य अभी भी जीवन्त हैं।

उस दिन भी एकादशी व्रत के परायण का उत्सव था। ठीक वैसा ही आयोजन, वैसा ही समारोह-सम्भार, जिसकी कथा आप सभी ने थोड़ी ही देर पहले सुनी है। बस अन्तर था तो इतना, कि वत्स अम्बरीश ने एक दिन पूर्व मुझे आमंत्रित किया था परन्तु मैं परायण उत्सव पर निश्चित मुहूर्त्त से काफी विलम्ब से पहुँचा। अम्बरीश जब तक प्रतीक्षा कर सकते थे, उन्होंने की। परन्तु बाद में ऋषियों के निर्देश से उन्होंने परायण कर लिया। हालांकि, इसके लिए उन्होंने मुझसे क्षमायाचना भी की। परन्तु मैं उस दिन अहंता से ग्रसित था। सो मैंने क्रोधवश क्रूर करालकृत्या का प्रयोग अम्बरीश पर कर दिया। वहाँ उपस्थित ऋषियों के पास इसकी कोई काट न थी। सभी असहाय से खड़े इसे देखते रहे। और क्रूर करालकृत्या अम्बरीश को जलाने लगी।

उन्होंने ब्रह्मर्षि वसिष्ठ की ओर देखा और इन महान ऋषि के संकेत को समझकर आर्त स्वर से पुकारा- रक्षा करो नारायण! करूणा करो हे भक्तवत्सल!! अम्बरीश की इस आर्त पुकार ने जैसे सप्तलोक और चौदह भुवनों को बेध दिया और फिर पलक झपकते ही जैसे सहस्रों-सहस्र सूर्य आकाश में उदित हो गए। यह नारायण के सुदर्शन चक्र का प्राकट्य था, जिसने क्षणार्ध में उस कृत्या को भस्मीभूत कर दिया। फिर वह सुदर्शन वेगपूर्ण हो मुझे दण्डित करने के लिए दौड़ा। मैं भी भयभीत होकर भागा- पहले पिताश्री अत्रि एवं माताश्री अनुसूइया के पास गया। इन्होंने मुझे परामर्श दिया कि पुत्र तुम अम्बरीश की शरण में जाओ। अन्यत्र तुम्हें कहीं भी शरण न मिलेगी। पर मुझ अभिमानी को यह बात समझ में न आयी। सो ऋषियों के पास से त्रिदेवों के पास गया। ब्रह्मा, शिव और अन्त में नारायण के पास। परन्तु वहाँ भी वही कहा गया- कि तुम अम्बरीश के अपराधी हो उन्हीं की शरण में जाओ। आखिर थक हार कर मैं अम्बरीश के पास आया। परन्तु यह क्या, उन्होंने तो मेरे पाँव पकड़ लिए, और कहा आप पर नारायण की अवश्य कृपा होगी। उनके इस स्वरों के साथ ही सुदर्शन तिरोहित हो गया। परन्तु उस दिन मुझे यह बोध अवश्य हो गया कि भक्ति से श्रेष्ठ अन्य कोई साधन नहीं है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १३६

शुक्रवार, 8 अक्तूबर 2021

👉 सुविधा सम्पन्न होने पर भी थकान-ग्रस्त क्यों? (अन्तिम भाग)

खुली, धूप, ताजी हवा और अंग संचालन के आवश्यक शारीरिक परिश्रम का अभाव साधन सम्पन्न लोगों की थकान का मुख्य कारण है। इसके लिये बाहर से बहुत आकर्षक लगने वाले दफ्तर वास्तव में बहुत ही खतरनाक हैं। वातानुकूलित करने जरा-सी गर्मी में पंखों की तेज चाल- कूलर- खश के पर्दे, बर्फ मिला पानी- जाड़े में हीटर- गरम चाय- ऊनी कपड़ों का कसाव देखने में बड़े आदमी होने का चिह्न लगाते हैं और तात्कालिक सुविधा भी देते हैं पर इनका परिणाम अन्ततः बहुत बुरा होता है। त्वचा अपनी सहन शक्ति खो बैठती है। अवयवों में प्रतिकूलता से लड़ने की क्षमता घट जाती है। फलस्वरूप ऋतु प्रभाव को सहन न कर पाने से आये दिन जुकाम, खाँसी, लू लगना, ताप, सिर दर्द, अनिद्रा, अपच जैसी शिकायतें समाने खड़ी रहती हैं। सूर्य की किरणें और स्वच्छ हवा में जो प्रचुर परिमाण में जीवन तत्व भरे पड़े हैं उनसे वञ्चित रहा जाय तो उसकी पूर्ति ‘विटामिन, मिनिरल और प्रोटीन’ भरे खाद्य पदार्थों की प्रचुर मात्रा भी नहीं कर सकती। साधन सम्पन्न लोग ही तात्कालिक सुविधा देखते हैं और दूरगामी क्षति को भूल जाते हैं। फलतः वह आरामतलबी का रवैया बहुत भारी पड़ता है और थकान तथा उससे उत्पन्न अनेक विग्रहों का सामना करना पड़ता है।

म्यूनिख (जर्मनी) की वावेरियन एकेडमी आफ लेवर एण्ड सोशल येडीशन संस्था की शोधों का निष्कर्ष यह है कि कठोर शारीरिक श्रम करने वाले मजदूरों की अपेक्षा दफ्तरों की बाबूगीरी स्वास्थ्य की दृष्टि से अधिक खतरनाक है।

स्वास्थ्य परीक्षण- तुलनात्मक अध्ययन आँकड़ों के निष्कर्ष और शरीर रचना तथ्यों को सामने रखकर शोध कार्य करने वाली इस संस्था के प्रमुख अधिकारी श्री एरिफ हाफमैन का कथन है कि कुर्सियों पर बैठे रहकर दिन गुजारना अन्य दृष्टियों से उपयोगी हो सकता है पर स्वास्थ्य की दृष्टि से सर्वथा हानिकारक है। इससे माँस पेशियों के ऊतकों एवं रक्त वाहिनियों को मिली हुई स्थिति में रहना पड़ता है, वे समुचित श्रम के अभाव में शिथिल होती चली जाती है फलतः उनमें थकान और दर्द की शिकायत उत्पन्न होती है। रक्त के नये उभार में, उठती उम्र में यह हानि उतनी अधिक प्रतीत नहीं होती पर जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है वैसे वैसे आन्तरिक थकान के लक्षण बाहर प्रकट होने लगते हैं और उन्हें कई बुरी बिमारियों के रूप में देखा जा सकता है। कमर का दर्द (लेवैगो), कूल्हे का दर्द (साइटिका) गर्दन मुड़ने में कंधा उचकाने में दर्द, शिरा स्फीति (वेरी कजोवेन्स), बवासीर, स्थायी कब्ज, आँतों के जख्म, दमा जैसी बीमारियों के मूल में माँस पेशियों और रक्त वाहिनियों की निर्बलता ही होती है, जो अंग सञ्चालन, खुली धूप और स्वच्छ हवा के अभाव में पैदा होती है। इन उभारों को पूर्व रूप की थकान समझा जा सकता है।

बिजली की तेज रोशनी में लगातार रहना, आँखों पर ही नहीं आन्तरिक अवयवों पर भी परोक्ष रूप से बुरा प्रभाव डालता है। आँखें एक सीमा तक ही प्रकाश की मात्रा को ग्रहण करने के हिसाब से बनी हैं। प्रकृति ने रात्रि के अन्धकार को आँखों की सुविधा के हिसाब से ही बनाया है। प्रातः सायं भी मन्द प्रकाश रहता है। उसमें तेजी सिर्फ मध्याह्न काल को ही आती है। सो भी लोग उससे टोप, छाया, छाता, मकान आदि के सहारे बचाव कर लेते हैं। आंखें सिर्फ देखने के ही काम नहीं आतीं वे प्रकाश की अति प्रबल शक्ति को भी उचित मात्रा में शरीर में भेजने की अनुचित मात्रा को रोकने का काम करती हैं। यह तभी सम्भव है जब उन पर प्रकाश का उचित दबाव रहे पर यदि दिन रात उन्हें तेज रोशनी में काम करना पड़े तो देखने की शक्ति में विकार उत्पन्न होना तो छोटी बात है। बड़ी हानि यह है कि प्रकाश की अनुचित मात्रा देह में भीतर जाकर ऐसी दुर्बलता पैदा करती है जिससे थकान ही नहीं कई अन्य प्रकार की तत्सम्बन्धित बीमारियाँ भी पैदा होती हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1972

👉 भक्तिगाथा (भाग ७३)

जहाँ भक्ति है, वहाँ भगवान हैं

देवर्षि के सूत्र सत्य में अपने शब्दप्रसूनों को पिरोते हुए ब्रह्मर्षि वसिष्ठ बोले- ‘‘सचमुच ही राजपरितोष तो राजा के सानिध्य में रहकर ही जाना जा सकता है। यह तब और भी सुखकर एवं प्रीतिकर होता है, जब राजा हमारे वत्स अम्बरीश की भाँति, तपस्वी, ब्राह्मणों एवं साधुओं को साक्षात साकार नारायण के रूप में पूज्य मानता हो। और रही बात भोजन की तो इसका स्वाद एवं सुख, चर्चा-चिन्तन में नहीं, इसे ग्रहण करने में है।’’ ब्रह्मर्षि वसिष्ठ का यह कथन कुछ इतना मधुर व लयपूर्ण था कि उनकी शब्दावली, एक नवीन दृश्यावली को साकार कर रही थी। एकबारगी सभी के अन्तर्भावों में भुवनमोहिनी अयोध्या, सरयू का तट, उस पावन नदी का नीर, उसमें मचलती लहरें और उन लहरों में अठखेलियाँ करती सूर्य रश्मियाँ और अवधवासियों पर, समस्त भक्तों और सन्तों पर अपनी स्वर्णिम कृपा बरसाते सूर्यदेव प्रकट हो उठे थे।

ये बड़े ही गहन समाधि के क्षण-पल थे। इन क्षणों में, इन पलों में हिमवान के आंगन में बैठे हुए सभी ने अयोध्या का सुखद अतीत निहारा। उन्होंने देखा कि राजर्षि अम्बरीश किस तरह तपोधन महर्षि विद्रुम एवं उनके शिष्य शील व सुभूति का सत्कार-सम्मान कर रहे हैं। किस तरह वह उन्हें बार-बार आग्रहपूर्वक भोजन ग्रहण करा रहे हैं। सबने यह भी देखा कि राजपरितोष एवं क्षुधाशान्ति के ये सुखद पल सरयू के तीर पर ही समाप्त न हुए बल्कि महाराज उन्हें आग्रहपूर्वक राजभवन में ले गए। भव्य राजप्रासाद में महारानी सहित सभी राजसेवकों व राजसेविकाओं ने इनका सम्मोहक सम्मान किया। आरती के थाल सजे, वन्दनवार टंगे, मंगलगीतों का गायन हुआ। इतने पर भी महाराज ने विराम न लिया, वह इन्हें आग्रहपूर्वक राजसभा में ले गए। जहाँ स्वागत-सम्मान के इस समारोह ने अपना चरम देखा।

राजर्षि अम्बरीश की भावनाओं में भीगे ऋषि विद्रुम इसे तितीक्षा के रूप में सहन करते रहे। परन्तु एक पल ऐसा भी आया जब उन्होंने ब्रह्मर्षि वसिष्ठ की ओर सांकेतिक दृष्टि से देखा। अन्तर्ज्ञानी ब्रह्मर्षि परम तपस्वी का संकेत समझ गए। उन्होंने अम्बरीश को सम्बोधित करते हुए कहा- ‘‘पुत्र! अब ऋषिश्रेष्ठ को तपोवन जाने की अनुमति दो क्योंकि ऋषिवर इस समय तुम्हारे भावों के वश में हैं। इसी वजह से वह तुम्हारे प्रत्येक आग्रह एवं अनुरोध को स्वीकार करते जा रहे हैं। परन्तु यह उनकी और उनके शिष्यों की प्रकृति के विपरीत है। उनकी प्रकृति के लिए तो तपोवन की कठोरता व दुष्कर-दुधर्ष साधनाएँ ही सहज हैं। इसलिए उन्हें अब तपोवन जाने दो वत्स!’’ ब्रह्मर्षि वसिष्ठ महाराज अम्बरीश के  लिए ही नहीं बल्कि उनके समस्त कुल के आराध्य थे। उनका प्रत्येक वचन उन्हें सर्वथा शिरोधार्य था। इसलिए उन्होंने भीगे नयनों से, विगलित मन से ऋषि विद्रुम व शील एवं सुभूति को विदा दी। अतीत के इस अनूठे दृश्य को सभी ने अपने अन्तर्भावों में निहारा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १३५

बुधवार, 6 अक्तूबर 2021

👉 ऐसा यज्ञ करो

महाभारत की समाप्ति के उपरान्त पांडवों ने एक महान यज्ञ किया। कहते हैं कि वैसा यज्ञ उस जमाने में और किसी ने नहीं किया था। गरीब लोगों को उदारतापूर्वक इतना दान उस यज्ञ में दिया गया था कि उनके घर सोने से भर गये। वैसी दानवीरता को देख कर सबने दांतों तले उंगली दबाई।

इस यज्ञ की चर्चा देश-देशान्तरों में फैली हुई थी। यहां तक कि पशु-पक्षी भी उसे सुने बिना न रहे। एक नेवले ने जब इस प्रकार के यज्ञ का समाचार सुना तो वह बहुत प्रसन्न हुआ। क्योंकि एक छोटे से यज्ञ के उच्छिष्ट अन्न से छू जाने के कारण उसका आधा शरीर सोने का हो गया था। इस छोटे यज्ञ में जूठन के जरा से कण ही मिले थे जिनसे वह आधा ही शरीर स्पर्श कर सका था। तब से उसकी बड़ी अभिलाषा थी कि किसी प्रकार उसका शेष आधा शरीर भी सोने का हो जावे। वह जहां यज्ञ की खबर सुनता वहीं दौड़ा जाता और यज्ञ की जो वस्तुएं इधर-उधर पड़ी मिलतीं उनमें लोटता, किन्तु उसका कुछ भी प्रभाव न होता। इस बार इतने बड़े यज्ञ की चर्चा सुनकर नेवले को बड़ी प्रसन्नता हुई और वह अविलम्ब उसकी जूठन में लोटने के लिये उत्साहपूर्वक चल दिया।

कई दिन की कठिन यात्रा तय करके नेवला यज्ञस्थल पर पहुंचा और वहां की कीच, जूठन, यज्ञस्थली आदि में बड़ी व्याकुलता के साथ लोटता फिरा। एक बार नहीं कई-कई बार वह उन स्थानों पर लोटा और बार-बार आंखें फाड़ कर शरीर की परीक्षा की कि देखें मैं सोने का हुआ या नहीं। परन्तु बहुत करने पर भी कुछ फल न हुआ। तब वह एक स्थान पर बैठ कर सिर धुनधुन कर पछताने लगा।

नेवले के इस आचरण को देखकर लोग उसके पास इकट्ठे हो गये और इसका कारण पूछने लगे। उसने बड़े दुःख के साथ उत्तर दिया कि इस यज्ञ की प्रशंसा सुनकर मैं दूर देश से बड़ा कष्ट उठा कर यहां तक आया था, पर मालूम होता है कि यहां यज्ञ हुआ ही नहीं। यदि यज्ञ हुआ होता तो मेरा आधा अंग भी सोने का क्यों न हो जाता? लोगों की उत्सुकता बढ़ी, उन्होंने नेवले से कहा आपका शरीर सोने का होने और यज्ञ से उसका संबंध होने का क्या रहस्य है कृपया विस्तारपूर्वक बताइये।

नेवले ने कहा—सुनिए! एक छोटे से ग्राम में एक गरीब ब्राह्मण अपने परिवार सहित रहता था। परिवार में कुल चार व्यक्ति थे। (1) ब्राह्मण (2) उसकी स्त्री (3) बेटा (4) बेटे की स्त्री। ब्राह्मण अध्यापन कार्य करता था। बालकों को पढ़ाने से उसे जो कुछ थोड़ी-बहुत आमदनी हो जाती थी, उसी से परिवार का पेट पालन करता था। एक बार लगातार तीन वर्ष तक मेह न बरसा जिससे बड़ा भारी अकाल पड़ गया। लोग भूख के मारे प्राण त्यागने लगे। ऐसी दशा में वह ब्राह्मण परिवार भी बड़ा कष्ट सहन करने लगा। कई दिन बाद आधे पेट भोजन की व्यवस्था बड़ी कठिनाई से हो पाती। वे बेचारे सब के सब सूखकर कांटा होने लगे। एक बार कई दिन उपवास करने के बाद कहीं से थोड़ा-सा जौ का आटा मिला। उसकी चार रोटी बनीं। चारों प्राणी एक-एक रोटी बांट कर अपनी थालियों में रख कर खाने को बैठने ही जाते थे कि इतने में दरवाजे पर एक अतिथि आकर खड़ा हो गया।

गृहस्थ का धर्म हैं कि अतिथि का उचित सत्कार करे। ब्राह्मण ने अतिथि से कहा—पधारिए भगवन्! भोजन कीजिये। ऐसा कहते हुए उसने अपनी थाली अतिथि के आगे रख दी। अतिथि ने उसे दो-चार ग्रास में खा लिया और कहा—भले आदमी, मैं दस दिन का भूखा हूं, इस एक रोटी से तो कुछ नहीं हुआ उलटी भूख और अधिक बढ़ गई। अतिथि के वचन सुनकर ब्राह्मण पत्नी ने अपनी थाली उसके आगे रखदी और भोजन करने का निवेदन किया। अतिथि ने वह भोजन भी खा लिया, पर उसकी भूख न बुझी। तब ब्राह्मण पुत्र ने अपना भाग उसे दिया। इस पर भी उसे संतोष न हुआ तो पुत्र वधू ने अपनी रोटी उसे दे दी। चारों की रोटी खाकर अतिथि की भूख बुझी और वह प्रसन्न होता हुआ चलता बना।
उसी रात को भूख की पीड़ा से व्यथित होकर वह परिवार मर गया। मैं उसी परिवार की झोंपड़ी के निकट रहता था। नित्य की भांति बिल से बाहर निकला तो उस अतिथि सत्कार से बची हुई कुछ जूठन के कण उधर पड़े हुए थे। वे मेरे जितने शरीर से छुए उतना ही सोने का हो गया। मेरी माता ने बताया कि किसी महान् यज्ञ के कण लग जाने से शरीर सोने का हो जाता है। इसी आशा से मैं यहां आया था कि पाण्डवों का यह यज्ञ उस ब्राह्मण के यज्ञ के समान तो हुआ होगा, पर यहां के यज्ञ का वैसा प्रभाव देखा तो अपने परिश्रम के व्यर्थ जाने का मुझे दुख हो रहा है।

कथा बतलाती है कि दान, धर्म या यज्ञ का महत्व उसके बड़े परिमाण पर नहीं, वरन् करने वाले की भावना पर निर्भर है। एक धनी का अहंकारपूर्वक लाखों रुपया दान करना एक गरीब के त्यागपूर्वक एक मुट्ठी भर अन्न देने की समता नहीं कर सकता। प्रभु के दरबार में चांदी सोने के टुकड़ों का नहीं, वरन् पवित्र भावनाओं का मूल्य है।

✍🏻 पं श्री राम शर्मा आचार्य
📖 धर्मपुराणों की सत्कथाएं

👉 सुविधा सम्पन्न होने पर भी थकान-ग्रस्त क्यों? (भाग १)

लोग समझते हैं कि थकान अधिक काम करने से आती है अथवा कम पौष्टिक भोजन मिलने से। यह दो बातें भी ठीक हो सकती हैं पर यह नहीं समझना चाहिए कि शक्ति की कमी- शिथिलता- थकान और उदासी के यही दो कारण हैं।

अनेक साधन सम्पन्न व्यक्ति-अमीर अफसर- या ऐसी स्थिति में होते हैं जिनके पास काम भी उतना नहीं होता और अच्छी खुराक प्राप्त करने में भी कोई असुविधा नहीं होती। फिर भी वे बुरी तरह थके रहते हैं। अपने अन्दर जीवनी शक्ति अथवा क्रिया शक्ति की कमी अनुभव करते हैं और जो करना चाहते हैं- कर सकते हैं- उसमें अपने को असमर्थ अनुभव करते हैं।

दूसरी ओर सामान्य स्तर के अथवा गरीब लोग-गई गुजरी स्थिति में रहने के कारण सुविधा सम्पन्न जीवन नहीं जी पाते। गुजारे के लिये कठोर काम करने पड़ते हैं। अधिक समय तब भी और अधिक दबाव डालने वाले भी । साथ ही गरीबी के कारण उन्हें बहुमूल्य पौष्टिक खाद्य पदार्थ भी नहीं मिल पाते। इतने पर भी वे बिना थके हँसी-खुशी का जीवन जीते हैं- तरोताजा रहते हैं और अपनी स्फूर्ति में कमी पड़ती नहीं देखते।

इससे स्पष्ट है कि काम की अधिकता या खुराक के स्तर की कमी ही थकान का मात्र कारण नहीं है वरन् कुछ दूसरी बातें भी हैं जो आराम और पुष्टि की प्रचुरता रहते हुए भी थकान उत्पन्न करती हैं और दुर्बलता बनाये रहती हैं।

अमेरिका इन दिनों संसार का सबसे अधिक साधन सम्पन्न देश है। वहाँ के लोग कंजूस भी नहीं होते। जो कमाते हैं उसे खर्च करने और हंसी खुशी का जीवन जीने के आदी हैं। ऐश आराम के साधन वहाँ बहुत हैं। सवारी के लिये कार, वातानुकूलित कमरे, शरीर का श्रम घटाने के लिए कारखाने में तथा घर में हर प्रयोजन के लिए बिजली से चलने वाले यन्त्रों की वहाँ भरमार है। श्रम और समय को बचाने के लिए आर्थिक उन्नति और वैज्ञानिक प्रगति का पूरा-पूरा उपयोग किया जाता है। आहार की भी वहाँ क्या कमी है।

विटामिन, मिनिरल, प्रोटीन और दूसरे पौष्टिक तत्वों को भोजन में मिलाने का वहाँ आम रिवाज है। फलों के रस की बोतलें लोग पानी की तरह पीते रहते हैं। थकान से बचने और स्फूर्ति बनाये रहने पर ही विलासी जीवन जिया जा सकता है सो इसके लिये प्रख्यात दोनों कारणों पर वहाँ बहुत ध्यान दिया जाता है। श्रम सुविधा और खाद्य पौष्टिकता में कोई कुछ कमी नहीं रहने देता।

फिर भी वहाँ बुरा हाल है डाक्टरों के पास आधे मरीज ‘थकान’ रोग का इलाज कराने वाले होते हैं। इसके लिए प्रख्यात दवा “एम्फेटैमीन स्टीमुलैन्टस्” प्रयोग की जाती है। यह औषधि स्वल्प मात्रा में ली जाती है तो भी डाक्टरों के परिषद ने चिकित्सा प्रयोजन में हर साल काम ली जाने वाली इस दवा की मात्रा साड़े तीन हजार टन घोषित की है। एक टन-सत्ताईस मन के बराबर होता है। हिन्दुस्तानी हिसाब से यह 3500&27=94500 मन अर्थात् लगभग 1260000 किलो हुई। उस औषधि के निर्माताओं का रिपोर्ट अलग है। उत्पादकों और विक्रेताओं को हिसाब देखने से प्रतीत होता है कि डाक्टरों के परामर्श से इसका जितना सेवन होता है उसकी अपेक्षा तीन गुनी मात्रा लोग खुद ही बिना किसी की सलाह से अपने अनुभव के आधार पर स्वयं ही खरीदते खाते रहते हैं। इस प्रकार इसकी असली खपत चार गुनी मानी जानी चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति नवम्बर 1972

👉 भक्तिगाथा (भाग ७२)

महातृप्ति के समान है भक्ति का अनुभव

ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने अपने प्रिय शिष्य को यूँ पुलकित होकर आते हुए देखा तो उन्होंने समझ लिया, कि आज उनके प्रिय अम्बरीश को उनका मनचाहा मिल गया है। उन्होंने सभी ऋषिगणों के साथ भगवान नारायण की अर्चना की। एकादशी के पारायण का यह महोत्सव सरयू नदी के किनारे हो रहा था। भगवान सूर्यदेव का बिम्ब नदी के जल में कुछ इस तरह से पड़ रहा था, जैसे कि सूर्यनारायण अयोध्यावासियों पर कृपालु होकर स्वयं सरयू में उतर आए हों। भगवान नारायण के नाम के मधुर संकीर्तन के साथ यह पारायण उत्सव सचमुच ही मोहक था। दूर-दूर से आए तपस्वी भक्त, साधक, सिद्ध जनों का सम्मिलन अयोध्या के नगर जनों के लिए परम सौभाग्य की बात थी। उन्हें गर्व था अपने प्रजापालक, न्यायप्रिय नरेश पर, जिन्होंने उनको संरक्षण एवं संसाधन के साथ सुसंस्कार भी दिए थे। उन्होंने अपने इन प्रियजनों को साधनों के अर्जन के साथ साधना के अर्जन की भी शिक्षा दी थी।

भावों की इसी पुलकन-सिहरन के साथ सभी भक्ति की लहरों में भीग रहे थे। इन्हीं भीगी भावनाओं के साथ महाराज अम्बरीश सबको लेकर वहाँ पहुँचे- जहाँ भोजन की व्यवस्था की गयी थी। उन्होंने ऋषि विद्रुम एवं ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ ब्रह्मपुत्र वशिष्ठ को एक विशिष्ट आसन पर बिठाया। पास में ही उन्होंने अन्य ऋषियों-महर्षियों के साथ ऋषि विद्रुम के शिष्य शील एवं सुभूति को आसन दिया। राजकर्मचारी सभी अभ्यागतों के स्वागत में लगे थे। परन्तु इन ऋषि-तपस्वियों की सेवा महाराज स्वयं ही कर रहे थे। ऐसा करते हुए उनके हर्ष-उत्साह के अतिरेक का पारावार न था। वह सब कुछ बड़े मनोयोग से कर रहे थे। यह एक ऐसा महत्त्वपूर्ण पल था, जिसे हर कोई अपने नयनों में कैद कर लेना चाहता था।

सुखद एवं सुखप्रद राजपरितोष एवं क्षुधा की शान्ति, दोनों का अनुभव सभी को एक साथ हो रहा था। सुस्वादु भोजन का प्रथम ग्रास मुख में लेते समय ऋषि विद्रुम के शिष्यों शील एवं सुभूति को अचानक कुछ याद आ गया। वे दोनों एक दूसरे को देखते हुए मुस्कराए। उनकी इस मुस्कराहट को ऋषि विद्रुम के साथ महर्षि वशिष्ठ ने भी देखा। अपने इन शिष्यों को यूँ मुस्कराते हुए देख महातपस्वी विद्रुम के होठों पर हल्का सा स्मित उभरा। ऋषिश्रेष्ठ वशिष्ठ को भी इस कौतुक का रहस्य जानने की जिज्ञासा हो आयी। पर वह बोले कुछ नहीं, बस मौन ही भोजन करते रहे। भोजन के पश्चात् आचमन आदि करके उन्होंने विद्रुम से उनके स्मित का कारण जानना चाहा। उत्तर में वह प्रसन्न होकर बोले- ‘‘इस हँसी और स्मित में ही तो मेरे आगमन का कारण छुपा है।’’ ऐसा कहते हुए उन्होंने ऋषि वशिष्ठ को काफी दिन पुरानी एक घटना सुनायी।

उन्होंने कहा कि काफी समय पूर्व जब वे अपने शिष्यों को भक्ति-भक्त एवं भगवान का स्वरूप-सत्य समझा रहे थे, तो उन्होंने प्रसंगवश कहा था कि भक्ति का स्वाद ऐसा है जिसे कहकर नहीं, बल्कि अनुभव करके ही जाना जा सकता है। यदि लौकिक सत्यों से इसकी तुलना की जाय तो यह राजपरितोष एवं क्षुधा शान्ति की भांति है। जिसे चर्चा करके नहीं बल्कि स्वयं अनुभव करके जाना जा सकता है। यहाँ पर अपने शिष्यों को मैं इसी सत्य का अनुभव कराने आया था। उनकी उस हँसी में उनकी प्रगाढ़ अनुभूति की प्रसन्नता छलक रही थी। उन्होंने यहाँ आकर भक्ति का स्वाद जाना, अनुभव किया भक्तश्रेष्ठ अम्बरीश की भक्ति को। साथ ही इस भक्ति एवं भक्त में उन्होंने भगवान् की अनुभूति पायी। इस अनुभूति के साथ उन्होंने राजपरितोष एवं क्षुधा शान्ति को भी एक साथ अनुभव किया। अपने शिष्यों को यही अनुभव देने के लिए ही मैं यहाँ आया था। ब्रह्मर्षि वशिष्ठ के इस संस्मरण ने न केवल महर्षि विद्रुम के अयोध्या आगमन के रहस्य की कथा कही, बल्कि उन्हें देवर्षि को नए सूत्र के लिए प्रेरित किया और देवर्षि कह उठे-
‘न तेन राजपरितोषः क्षुधा शान्तिर्वा’॥ ३२॥

सचमुच ही मात्र जान लेने से न तो राजा की प्रसन्नता होगी, न क्षुधा मिटेगी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १३३

मंगलवार, 5 अक्तूबर 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ७१)

महातृप्ति के समान है भक्ति का अनुभव

महातपस्वी विद्रुम के अयोध्या आगमन का रहस्य कोई यदि सही ढंग से जानता था तो वह थे स्वयं महातापस विद्रुम, जबकि वे तो अन्तर्लीन-आत्ममग्न दिख रहे थे। ऐसा लग रहा था, जैसे कि वे स्वयं में खोए हों। इस सम्पूर्ण समारम्भ-सम्भार में कोई आकर्षण न था, फिर भी वहाँ पर आए थे, क्यों? यह एक प्रश्नचिह्न था। महाराज अम्बरीश के स्वागत-शिष्टाचार में भी वह सर्वथा स्थितप्रज्ञ दिखे। हाँ! ब्रह्मर्षि वशिष्ठ से अवश्य वह पूरी आत्मीयता से मिले। इस अवसर पर उनके होठों पर मुस्कराहट और आँखों में एक विशेष चमक दिखी। हालांकि, यह कुछ ही क्षणों के लिए था, फिर वे स्वयं में अन्तर्लीन-भावलीन होने लगे। महर्षि विद्रुम के साथ दो नवयुवक भी थे, जिनके मुख पर साधना का तेज था, तप की प्रभा थी। उनकी आँखों में एक पवित्र दैवी भाव की लहरें उमड़ रही थीं। सम्भवतः वे महर्षि विद्रुम के शिष्य-सेवक थे। उनके मुखमण्डल पर उमड़ते भावों की प्रभा कुछ यही कह रही थी।

शील एवं सुभूति, महर्षि विद्रुम ने उन दोनों का यही परिचय ब्रह्मर्षि वशिष्ठ को दिया था। विद्रुम के संकेत से इन दोनों ने वशिष्ठ को प्रणाम किया। प्रणाम करते समय इन दोनों का शील-विनय एवं भावमयता सराहनीय थी। प्रणाम के अनन्तर जब इन्होंने शीश ऊपर उठाया, तो इनके नेत्र भीगे हुए थे। पूछने पर उन्होंने केवल इतना कहा कि ‘‘महाभागवत महाराज अम्बरीश के कुलगुरु से हम दोनों भी भक्ति का सूत्र-सत्य सीखने के लिए आए हैं।’’ इनकी ऐसी भावनाएँ निहार कर ब्रह्मर्षि वशिष्ठ बस केवल इतना ही कह सके- ‘‘अवश्य वत्स! क्यों नहीं, तुम सुयोग्य हो, सत्पात्र हो, तुम्हारी इस विनयशीलता के कारण ही तुम्हें महर्षि विद्रुम का संग प्राप्त हुआ है। यह संग-सान्निध्य देवों के लिए भी दुर्लभ है वत्स! इसके प्रभाव से तुम सब कुछ जान सकोगे, सीख सकोगे।’’

वशिष्ठ से अपने मनोरथ पूर्ण होने का आशीष लेकर वे पुनः अपने गुरु महर्षि विद्रुम के पास आ गए। अभी भी वह सबसे अलग सर्वथा वीतराग भाव से बैठे हुए थे। ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने उन्हें देखते हुए पुनः महाराज अम्बरीश को कुछ संकेत किया। इस संकेत को समझकर महाराज अम्बरीश ऋषि विद्रुम के पास पहुँचकर बोले- ‘‘हे देव! एकादशी के परायण का मुहूर्त हो आया है। आइए हम सब भगवान् नारायण की अर्चना करते हुए व्रत का पारायण करें।’’ नारायण का नाम सुनते ही महर्षि विद्रुम के हृदय में भावों का ज्वार उमड़ आया। उनके उठने में बालकों जैसी चपलता एवं त्वरा दिखी। भावों से भीगे मन से उठते हुए वह बस केवल इतना ही कह सके, ‘‘अवश्य पुत्र। इसीलिए तो हम यहाँ आए हैं, ताकि तुम्हारे जैसे परम भक्त के साथ भगवान नारायण की अर्चना कर सकें, भगवद्भक्ति के सूत्रों का सत्य जान सकें।’’

महर्षि विद्रुम के ये वाक्य, उनके द्वारा किया गया पुत्र सम्बोधन सुनकर अयोध्या नरेश अम्बरीश को ऐसा लगा, जैसे कि उन्हें आज जीवन भर की सम्पूर्ण एकादशियों का सुफल, आज एक पल में मिल गया हो। वह पुलकित, गद्गद एवं भाव विह्वल हो गए। उन्होंने भीगे मन एवं गीले नयनों के साथ ऋषि विद्रुम के पाँव पकड़ लिये। महर्षि ने उन्हें उठाकर हृदय से लगा लिया और बोले- ‘‘पुत्र! तुम सब भाँति योग्य हो। अभी तक मैं तुमसे न मिल सका, इसके पीछे भी सम्भवतः भगवान् नारायण का कोई विधान है।’’ महर्षि का यह सुकोमल व्यवहार अम्बरीश को अपने जन्म भर के पुण्यों का सुफल लगा। वह अपने अन्तर्भावों में कुछ इतना डूब गए कि कुछ कह न सके। बस महर्षि विद्रुम और उनके शिष्यों को साथ लेकर उस ओर चल पड़े, जिधर ब्रह्मर्षि वशिष्ठ खड़े थे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १३१

सोमवार, 4 अक्तूबर 2021

👉 भक्तिगाथा (भाग ७०)

भक्तश्रेष्ठ अम्बरीश की गाथा

भक्त और भगवान् के सान्निध्य की बात महर्षि वसिष्ठ को बहुत भायी और वे प्रसन्न मन से अयोध्या के राजकुल के पुरोहित हो गए। इसी कुल में भक्त श्रेष्ठ अम्बरीश का जन्म हुआ और वे अयोध्या के अधिपति हुए। विशाल साम्राज्य के चक्रवर्ती सम्राट होने के बाद भी उनकी भक्ति में तनिक सी भी न्यूनता नहीं आयी। सम्राट अम्बरीश नियमित एकादशी का व्रत करते थे, भगवन्नाम जप में उनकी अटूट निष्ठा थी। वह हमेशा ही विराट् यज्ञों का आयोजन कर यज्ञपति भगवान् विष्णु का यजन-पूजन करते थे। महर्षि वसिष्ठ ने बहुत ही पुलकित मन से आज अपने यजमान एवं प्रिय शिष्य महाराज अम्बरीश का स्मरण किया और कहने लगे- अयोध्या के साम्राज्य में एकादशी सदा ही अद्भुत रही है। परन्तु जब अम्बरीश अयोध्या के अधिपति थे, तब एकादशी की विशिष्टता कुछ अधिक ही विशिष्ट थी। महाराज बड़े ही दिव्य एंव भव्य ढंग से एकादशी का परायण करते थे।

उनके इस परायण में वह और उनका राजपरिवार ही नहीं, बल्कि अयोध्या का प्रत्येक परिवार भागीदार होता था। जहाँ तक कि एकादशी व्रत की बात है तो यह व्रत तो उन दिनों महाराज के विशाल साम्राज्य का प्रत्येक नागरिक करता था, भले ही उसके ईष्ट आराध्य देव कोई भी क्यों न हो। यह एकादशी का व्रत तो अयोध्या के साम्राज्यवासियों का अपने महाराज की भक्ति के प्रति सजल श्रद्धा थी। और इस श्रद्धा से अयोध्या के जन-जन का मन अभिभूत था। उस दिन भी महाराज एकादशी के व्रत का पारायण कर रहे थे। सदा ही की भांति अयोध्यावासी इसमें भागीदार थे। आमंत्रित ऋषिगण भी विपुल संख्या में थे। राजकर्मचारी आगन्तुक साधु-तपस्वियों का भावपूर्ण सत्कार कर रहे थे।

इन आगन्तुक तपस्वियों में ऋषि विदू्रम भी थे। इनके तप की चर्चा उन दिनों सम्पूर्ण अयोध्या राज्य में होती रहती थी। विद्रूम का कठोर तप आश्चर्यजनक था। उनके इस अलौकिक तप की कथा धरती के मानव ही नहीं देवलोक के देवी-देवता भी करते थे। सामान्यतया तपस्वी श्रेष्ठ कहीं भी न आने-जाने के लिए विख्यात् थे। आज उनका यहाँ आना सर्वथा विस्मयकारी था। जो अपने सम्पूर्ण जीवन राजगृह एवं भोजन आदि से दूर रहा हो, उसका इस तरह राजगृह में आना एवं भोजन की पंक्ति में बैठना सर्वथा विस्मयकारी था। चकित तो स्वयं सम्राट अम्बरीश थी थे। उन्हें भी विद्रूम का आना कुछ समझ में नहीं आ रहा था। इसके पहले कितने ही अवसरों पर सम्राट विद्रूम की कुटिया में गए थे। परन्तु उन्होंने तो उनसे मिलने से ही इन्कार कर दिया था। उन्हें आमंत्रित करके राजभवन बुलाने की बात सोची भी नहीं जा सकती थी।

कई बार सम्राट अम्बरीश ने इस की चर्चा ब्रह्मर्षि वसिष्ठ से की थी। कई बार तो इस चर्चा को करते हुए सम्राट व्यथित हो जाते थे। वह कहते- गुरुदेव! मुझे इस धरती के सभी महर्षियों, साधु-तपस्वियों का आशीर्वाद मिल चुका है। परन्तु न जाने क्यों मैं महातपस्वी विद्रूम की कृपा से अभी तक वंचित हूँ। अवश्य ही मेरी भगवद्भक्ति में कहीं कोई खोट है, तभी अपने तप से सर्वलोकों को प्रकाशित करने वाले महर्षि विद्रूम मुझसे मिलना तक नहीं पसन्द करते। जब-जब महाराज अम्बरीश ने विद्रूम की चर्चा की, उनसे न मिल पाने की अपनी व्यथा कही, वसिष्ठ ने उन्हें सान्त्वना प्रदान की, उनको समझाया और कहा- पुत्र! विद्रूम तपस्वी हैं पर निष्करूण नहीं। एक न एक दिन किसी न किसी अवसर पर वह तुम्हारे पास अवश्य आएँगे। तुम इस सत्य को सुनिश्चित रूप से जान लो कि वे कहीं भी हों, अपने तप की किन्हीं भी प्रक्रियाओं में क्यों न लीन हों, पर तुम्हारे हृदय से वह देर तक अपरिचित नहीं रह सकते। तुम्हें उनकी कृपा अवश्य मिलेगी। पर कब और किस अवसर पर? इसका उत्तर तो या तो वह स्वयं दे सकते हैं, अथवा उनकी रचना करने वाला विधाता। वही तपस्वी विद्रूम आज महाराज के राजभवन में एकादशी परायण के भोजन के अवसर पर पधारे थे। हालांकि उनके इस आगमन का प्रयोजन अभी तक रहस्यमय था।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १२९

शनिवार, 2 अक्तूबर 2021

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (अन्तिम भाग)

बन्धन क्या? मुक्ति कैसे?

इस दुर्गति में पड़े रहने से आज का समय किसी प्रकार कट भी सकता है, पर भविष्य तो अन्धकार से ही भरा रहेगा। विवेक की एक किरण भी कभी चमक सके तो उसकी प्रतिक्रिया परिवर्तन के लिये तड़पन उठने के रूप में ही होगी। प्रस्तुत दुर्दशा की विडम्बना और उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना का तुलनात्मक विवेचन करने पर निश्चित रूप से यही उमंग उभरेगी कि परिवर्तन के लिये साहस जुटाया जाय। इसी उभार के द्वारा अध्यात्म जीवन में प्रवेश और साधना प्रयोजनों का अवलम्बन आरम्भ होता है।

परिवर्तन का प्रथम चरण है, बन्धनों का शिथिल करना। आकर्षणों के अवरोधों से विमुख होना। आसक्ति को वैराग्य की मनःस्थिति में बदलना। इसके लिये कई तरह के संयम परक उपायों का अवलम्बन करना पड़ता है। साधना रुचि परिवर्तन की प्रवृत्ति को उकसाने से आरम्भ होती है। इस संदर्भ में महर्षि पातंजलि का कथन है।
बन्धकारण शैथिल्यात्प्राचार सम्वेदनस्य ।

चित्तस्य पर शरीरावेशः ।।
—योग दर्शन 3-38
बन्धनों के कारण डीले हो जाने पर चित्त की सीमा, परिधि और सम्वेदना व्यापक हो जाती है।
मोक्षस्य नहि वासोऽस्ति न ग्रामान्तरमेव वा ।
अज्ञानहृदयग्रन्थिनाशो मोक्ष इति स्मृतः ।।
—शिव गीता 13।32
अर्थात्—मोक्ष किसी स्थान विशेष में निवास करने की स्थिति नहीं है। न उसके लिये किसी अन्य नगर या लोक में जाना पड़ता है। हृदय के अज्ञानांधकार का समाप्त हो जाना ही मोक्ष है।

मोक्ष में परमात्मा की प्राप्ति होती है। अथवा परमात्मा की प्राप्ति ही मोक्ष है। यह मोक्ष क्या है? भव बन्धनों से मुक्ति। भव-बन्धन क्या हैं? वासना, तृष्णा और अहंता के—काम, लोभ और क्रोध के नागपाश। इनसे बंध हुआ प्राणी ही माया ग्रसित कहलाता है। यही नारकीय दुर्दशा का दल-दल है। इससे उबरते ही आत्मज्ञान का आलोक और आत्म-दर्शन का आनन्द मिलता है। इस स्थिति में पहुंचा हुआ व्यक्ति परमात्मा का सच्चा सान्निध्य प्राप्त करता है और ज्ञान तथा सामर्थ्य में उसी के समतुल्य बन जाता है।
अथर्ववेद में कहा गया है—

ये पुरुषे ब्रह्मविदुः तेविदुः परमेष्ठितम् ।
अर्थात्—जो आत्मा को जान लेता है, उसी के लिये परमात्मा का जान लेना भी सम्भव है। ऋग्वेद में आत्मज्ञान को ही वास्तविक ज्ञान कहा गया है। ग्रन्थों के पढ़ने से जानकारियां बढ़ती हैं, आत्मानुभूति से अपने आपे को और परमतत्व को जाना जाता है। श्रद्धा-विहीन शब्दचर्चा का ऊहापोह करते रहने से तो आत्मा की उपलब्धि नहीं होती। एक ऋचा है—यः तद् न वेदकिम् ऋचा करिष्यति।’’

जो उस आत्मा तत्व को नहीं जान पाया वह मन्त्र, बात या विवेचन करते रहने भर से क्या पा सकेगा? उपनिषद् का कथन है—‘‘ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति’’ अर्थात् ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म ही बन जाता है।

यह स्थिति जीवन और जगत के पीछे छिपी हुई कारण सत्ता को देखने तथा उसे समझने, बोध प्राप्त करने के लिये साधना स्तर के प्रयासों से ही सम्भव है। भारतीय मनीषियों ने इसीलिये तत्व दर्शन को ही बन्धन मुक्ति का उपाय बताया है यह दृष्टि अपने मन, बुद्धि चित्त और अहंकार के परिष्कार पूर्वक ही विकसित की जा सकती है। योग तप, ब्रह्मविद्या, साधना, उपासना, अभ्यास, मनन, चिन्तन और ध्यान निदिध्यासन द्वारा चित्त वृत्ति को इतना निर्मल परिष्कृत बनाया जाता है कि यह तत्व दृष्टि विकसित की जा सके।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ११०
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग ६९)

भक्तश्रेष्ठ अम्बरीश की गाथा

ब्रह्मर्षि क्रतु के मुख से भीलकुमार कणप्प की भक्तिगाथा सुनकर सभी के अन्तःकरण भावों से भीग गए। भक्ति स्वयं ही साधना और सिद्धि को अपने में समाविष्ट कर लेती है। यहाँ तक कि इसमें भक्ति की साधना करने वाले साधक का अस्तित्त्व भी समा जाता है। अन्य साधना विधियों को अपनाकर इनकी साधना करते हुए साधक यदा-कदा थकान, बेचैनी की अनुभूति करने लगता है। यदि इनके प्रयोग सुदीर्घकाल तक करने पडें़ तो साधना के फल की आकांक्षा भी साधक को विचलित करती है। परन्तु भक्ति की साधना में ऐसा कुछ भी नहीं है। यहाँ तो अपने ईष्ट-आराध्य की भक्ति करते हुए भक्त का मन पल-पल पुलकित और हर्षित होता रहता है। उसे तो बस हर क्षण यही लगता रहता है और क्या, और कितना, और कैसे, अपने प्रभु को दे डालूँ? कुछ पाना है, ऐसी चाहत तो कभी भी भक्त के मन-अन्तःकरण में अंकुरित ही नहीं होती। इन विचार कणों में सभी के मन देर तक सिक्त होते रहे।

समय का तो किसी को होश ही न रहा। चेत तो तब आया जब देवर्षि नारद ने अपनी वीणा की मधुर झंकृति की ही भांति एक सूत्र सत्य का उच्चारण करते हुए कहा-
‘राजगृैहभोजनादिषु तथैव दृष्टत्वात्’॥ ३१॥

राजगृह और भोजनादि में ऐसा ही देखा जाता है। भक्ति को स्वयं ही फलरूपा कहने के बाद देवर्षि के मुख से भक्ति की तुलना राजगृह एवं भोजन आदि से करने पर महर्षि वसिष्ठ के अधरों पर हलका सा स्मित झलक आया। ऐसा लगा वह कुछ पलों के लिए अपनी ही किन्हीं स्मृतियों में खो गए। ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ वसिष्ठ की यह भावभंगिमा वहाँ किसी से छिपी न रही। इसे औरों के साथ स्वयं देवर्षि ने भी देखा और उन्होंने ब्रह्मर्षि वसिष्ठ से भावपूर्ण निवेदन करते हुए कहा- ‘‘इस सूत्र की तत्त्वकथा आप ही कहें भगवन्!’’ उत्तर में एक मधुर हास्य के साथ वसिष्ठ बोले- ‘‘देवर्षि! आपके मुख से राजगृह एवं भोजन की बात सुनकर मेरे मन मे कुछ पुरानी स्मृतियाँ उभर आयीं।’’

ऋषिश्रेष्ठ वसिष्ठ के इस कथन ने सभी की जिज्ञासा व उत्सुकता को शतगुणित कर दिया। अब तो देवर्षि के साथ अन्य सबने भी अनुरोध किया, ‘‘अपनी पावन स्मृतियों से हम सबको भी पवित्र करें महर्षि!’’ उत्तर में महर्षि कुछ और कहते तभी हिमप्रपात एवं हिम पक्षियों की ध्वनियों ने वातावरण में एक अद्भुत संगीत घोल दिया। ऐसा लगा कि इस नयी भक्तिगाथा के श्रवण के पूर्व स्वयं प्रकृति ने मंगलाचरण पढ़ा हो। इस शुभ मंगल ध्वनि के साथ मौन हो रहे महर्षि मुखरित हुए और बोले- ‘‘मेरी यह स्मृतियाँ उन दिनों की हैं, जब भक्त प्रवर अम्बरीश अयोध्या के अधिपति थे। महाराज अम्बरीश की भक्ति एवं उनके व्यक्तित्व के विविध शीलगुणों की अनेकों अनोखी कथाएँ पुराणकारों ने कही हैं, इन सभी कथा प्रसंगों में महाराज अम्बरीश की भावपूर्ण भक्ति झलकती है। परन्तु जिस स्मृति कथा को मैं सुना रहा हूँ, उसे किसी भी पुराण ने नहीं कहा। यह सर्वथा अछूता कथा प्रसंग है।

हिमवान के आंगन में बैठे सभी महर्षिगण, देवता, सिद्ध, चारण एवं गन्धर्वों को यह तथ्य सुविदित था कि ब्रह्मर्षि वसिष्ठ सुदीर्घ काल तक अयोध्या के राजपुरोहित रहे हैं। उन्होंने युगों तक अयोध्या के राजघराने का पौरोहित्य कार्य किया है। ऋषियों के मध्य इसकी भी सदा चर्चा रही है- यह कार्य उन्हें स्वयं ब्रह्मा जी ने सौंपा था। इस चर्चा में यह तथ्य भी सुविदित रहा है कि परम वीतरागी महर्षि वसिष्ठ जब अयोध्या के राजपुरोहित नहीं बनना चाहते थे, तब ब्रह्माजी ने उनसे कहा था- पुत्र! यह सामान्य राजकुल नहीं है। इस कुल में अनेकों श्रेष्ठ महामानव जन्म लेंगे। अनेक भगवद्भक्तों को इस कुल में जन्म मिलेगा। उनकी भक्ति की शक्ति से अन्ततः स्वयं भगवान मर्यादापुरुषोत्तम के रूप में इस कुल में अवतरित होंगे। तुम्हें इन सभी के पुरोहित होने का, इन्हें मार्गदर्शन देने का सुअवसर मिलेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १२७

शुक्रवार, 1 अक्तूबर 2021

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ७०)

बन्धन क्या? मुक्ति कैसे?

लालची मक्खी और चींटी की आसक्ति, आतुरता उसे विपत्ति के बन्धनों में जकड़ देती है और प्राण संकट उपस्थित करती है। चासनी को आतुरतापूर्वक निगल जाने के लोभ में यह अबोध प्राणी उस पर बेतरह टूट पड़ते हैं और अपने पंख, पैर उसी में फंसा कर जान गंवाते हैं। मछली के आटे की गोली निगलने और पक्षी के जाल में जा फंसने के पीछे भी वह आतुर अशक्ति ही कारण होती है, जिसके कारण आगा-पीछा सोचने की विवेक बुद्धि को काम कर सकने का अवसर ही नहीं मिलता।

शरीर के साथ जीव का अत्यधिक तादात्म्य बन जाना ही आसक्ति एवं माया है। होना यह चाहिए कि आत्मा और शरीर के साथ स्वामी सेवक का—शिल्पी उपकरण का भाव बना रहे। जीव समझता रहे कि मेरी स्वतन्त्र सत्ता है। शरीर के वाहन, साधन, प्रकृति यात्रा की सुविधा भर के लिए मिले हैं। साधन की सुरक्षा उचित है। किन्तु शिल्पी अपने को—अपने सृजन प्रयोजन को भूल कर—उपकरणों में खिलवाड़ करते रहने में सारी सुधि-बुद्धि खोकर तल्लीन बन जाया तो यह स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण हो होगी। तीनों शरीर तीन बन्धनों में बंधते हैं। स्थूल शरीर इन्द्रिय लिप्सा में, वासना में। सूक्ष्म शरीर (मस्तिष्क) सम्बन्धियों तथा सम्पदा के व्यामोह में। कारण शरीर-अहंता के आतंक फैलाने वाले उद्धत प्रदर्शनों में। इस प्रकार तीनों शरीर—तीन बन्धनों में बंधते हैं और आत्मा उन्हीं में तन्मय रहने की स्थिति में स्वयं ही भव बंधनों में बंध जाता है। यह लिप्सा लालसायें इतनी मादक होती है कि जीव उन्हें छोड़कर अपने स्वरूप एवं लक्ष्य को ही विस्मृति के गर्त में फेंक देता है। वेणुनाद पर मोहित होने वाले मृग वधिक के हाथों पड़ते हैं। पराग लोलुप भ्रमर-कमल में कैद होकर दम घुटने का कष्ट सहता है। दीपक की चमक से आकर्षित पतंगे की जो दुर्गति होती है व सर्वविदित है। लगभग ऐसी ही स्थिति व्यामोह ग्रसित जीव की भी होती है। उसे इस बात की न तो इच्छा उठती है और न फुरसत होती है कि अपने स्वरूप और लक्ष्य को पहचाने। उत्कर्ष के लिए आवश्यक संकल्प शक्ति जगाई जा सकती तो इस महान प्रयोजन के लिये मिली हुई विशिष्ट क्षमताओं को भी खोजा जगाया जा सकता था। किन्तु उसके लिये प्रयत्न कौन करे? क्यों करे? जब विषयानन्द की ललक ही मदिरा की तरह नस-नस पर छाई हुई है तो ब्रह्मानन्द की बात कौन सोचे? क्यों सोचे?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ १०८
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग ६८)

भगवान को भावनाएँ अर्पित करने वाला कहलाता है भक्त
    
इस अनुभूति के साथ उन्होंने ब्रह्मर्षि क्रतु से बड़े विनम्र स्वर में कहा- ‘‘हे ब्रह्मर्षि! इस सूत्र का अनुभव कथन आप स्वयं अपने मुख से कहें।’’ नारद के इस आग्रह को क्रतु अस्वीकार न कर सके और बोले- ‘‘भक्ति एक ऐसा तत्त्व है, जो कहने वाले को और सुनने वाले को, दोनों ही को कृतार्थ करता है। जो इसे कहता है अथवा जो इसे सुनता है, दोनों ही इसके रस से स्वयं को धन्य अनुभव करते हैं। जहाँ तक मेरी बात है, मेरी इस प्रकरण में विशेषज्ञता नहीं है। परन्तु हाँ, मुझे ऐसे ही एक भक्त का सान्निध्य मिला है। यदि आप सभी की अनुमति हो तो मैं उस अनपढ़ भील की कथा अवश्य सुना सकता हूँ।’’ क्रतु के इन वचनों ने सभी के भावों को विभोर करके उनके अन्तर्मन को हर्षित किया। सभी ने एक स्वर में अनुरोध किया कि महर्षि उस भील भक्त की कथा कहें।
    
अनुरोध के इन स्वरों के साथ महर्षि के अन्तःसरोवर में भावउर्मियाँ थिरक उठीं। उनमे मन में स्मृति की कई रेखाएँ उभर आयीं और उन्होंने कहना शुरू किया- ‘‘उसका नाम कणप्प था। जाति का भील था वह, उसका कबीला विन्ध्यांचल के जंगल में रहता था। अपने कबीले के सरदार का इकलौता पुत्र था वह। कृष्ण वर्ण की बलिष्ठ काया, मुख पर एक ऊर्जा बसा सात्त्विक आकर्षण। उसके उज्ज्वल नेत्रों से सदा ही एक सात्त्विक प्रकाश झरता रहता था। भीलकुमार होते हुए भी उसका रहन-सहन, खान-पान सतोगुणी था। अन्य भीलकुमारों की तरह वह मांसाहारी न था। हालांकि, उसकी कर्मठता एवं बलिष्ठता की कोई भी तुलना न थी। बलवान होने पर भी वह अहंकारी न था। सेवा परायणता उसमें कूट-कूट कर भरी थी। कबीले के कामों एवं पिता की सहायता से उसे जो भी समय मिलता वह उस समय का उपयोग, वनवासी साधु-तपस्वियों की सेवा में करता।
    
इस सेवापरायणता का ही सुफल उसे भक्ति के रूप में मिला था। विन्ध्यांचल के वन में रहने वाले एक तपस्वी साधु ने प्रसन्न होकर उसे पञ्चाक्षर मंत्र प्रदान किया था। ‘ॐ नमः शिवाय’ के उपदेश के साथ उन्होंने उसे भगवान सदाशिव की लीलाकथाएँ सुनाते हुए कहा- पुत्र! भावों की गहराई में डूबकर अपने आराध्य का स्मरण और उन्हीं को अपना सर्वस्व समर्पण ही भक्ति है। जो अपने स्मरण व समर्पण की साधना में जितनी प्रगाढ़ता, प्रखरता एवं परिपक्वता लाता है उसमें भक्ति उतनी ही तीव्रता से प्रकट होती है। इस भक्ति के साधन से कुछ भी असम्भव नहीं है। हाँ! इतना अवश्य ध्यान रखना कि अनन्यता भक्त का अनिवार्य गुण है। जो अपने ईष्ट में अनन्य भाव से डूबा रहता है, वह जीवन के तत्त्व और सत्य को पा जाता है। उसके लिए लोक में कुछ भी असम्भव नहीं है। हालांकि भक्ति अपना फल स्वयं ही है।
    
इन वनवासी साधु वेदव्रत की बात कणप्प को भा गयी। उसने भगवान् शिव के नाम-रूप-गुण एवं उनकी लीलाओं में अपने मन-अन्तःकरण को भिगोना प्रारम्भ कर दिया। वह प्रातः से उठकर सायं तक जो भी करता, केवल अपने प्रभु के लिए करता। कर्त्तव्य संसार के लिए, भावनाएँ भगवान् के लिए। यह उसके जीवन का महामंत्र बन गया। प्रातः सायं वन में जाकर सरिता के किनारे वट वृक्ष की छाया में वह पार्थिव पूजन करता। स्मरण व समर्पण की साधना उसके रोम-रोम में बसने लगी। उसे साधु वेदव्रत का यह कथन हमेशा याद रहता, जो उन्होंने उसे शिव नाम देते हुए कहा था- पुत्र! भक्त वह है जो अपनी भावनाएँ केवल भगवान को देता है। अपनी साधन सम्पत्ति तुम भले ही किसी को दे दो, परन्तु भावनाओं में अन्य किसी की हिस्सेदारी नहीं होनी चाहिए। जिसकी भावनाओं में किसी की भी हिस्सेदारी है, वह कभी भी भक्त नहीं हो सकता। उससे भक्ति की साधना सम्भव नहीं।
    
सरल हृदय भीलकुमार कणप्प को यह बात दिल में लग गयी। उसकी मेधा भले ही प्रखर न थी, परन्तु भाव पवित्र थे। सो शीघ्र ही वह भावों के समर्पण की कला सीख गया। इस भाव अर्पण की निपुणता ने उसके लिए अपने आप ही भावसमाधि के द्वार खोल दिए। भावसमाधि में वह अपने आराध्य के साथ एकाकार होने लगा। भगवान् सदाशिव उसके मन मन्दिर में प्रकट होने लगे। उसकी भक्ति प्रबल होती गयी और भगवान अपने इस अनूठे भक्त के लिए विकल होते गए। एक दिन जब वह निशाकाल में अपने भगवान् के ध्यान में डूबा था- तो भोलेनाथ अपने प्रिय भक्त के सम्मुख प्रकट हो गए। शूलपाणि प्रभु का रूप अनोखा था। परन्तु भक्त कणप्प तो अपनी भक्ति में खोया था। भगवान ने स्वयं उसके शीष पर हाथ रखकर चेताया और कहा- पुत्र! मांगो तुम क्या चाहते हो। अपने भगवान को सम्मुख पाकर कणप्प के आँखों से आँसू बह निकले- बड़ी मुश्किल से वह बोल सका- भक्ति का वरदान दे भगवान! जीवन और परिस्थितियों का स्वरूप जो भी हो, पर मैं भक्ति में डूबा रहूँ। भोलेनाथ ने एवम्वस्तु कहकर उसे आशीष दिया। भक्त और भगवान दोनों ही अनुभव कर रहे थे कि भक्ति स्वयं ही फलरूपा है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ १२४

👉 भक्तिगाथा (भाग ७७)

भक्तवत्सल भगवान के प्रिय भीष्म देवर्षि ने उन्हें सत्कारपूर्वक अपने पास बिठाया और इसी के साथ भक्तिसूत्र के अगले सत्य का उच्चारण किया- ‘तत्तु ...