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सोमवार, 11 मई 2026

👉 परमार्थ की उपेक्षा न करें ( भाग 1)

जिस प्रकार प्रकाश के अभाव को अन्धकार स्थानापन्न करता है, दया भाव का अभाव क्रूरता से स्थानापन्न होता है, उसी प्रकार पुण्य-परमार्थ के अभाव को पाप प्रवृत्तियाँ स्थानापन्न करती है।

जो मनुष्य पुण्य प्रवृत्तियों में निरत नहीं होता उससे पाप कर्मों की सम्भावना बनी रह सकती है। मनुष्य इन दो स्थितियों में से एक को ही प्राप्त कर सकता है। मध्य स्थिति या तो बड़ों के लिये सम्भव है अथवा जीवन मुक्त योगी के लिये। सामान्य मनुष्य न जड़ होता है और न जीवन मुक्त योगी। अस्तु आवश्यक है कि पाप से बचे रहने के लिये वह किसी न किसी परमार्थ कार्य में लगा रहे।

जो सत्पुरुष अपने अन्तःकरण में परमार्थ बुद्धि का विकास कर लेते हैं, जो परिष्कृत और उदार दृष्टिकोण से जीवन की सार्थकता पर विचार करते हैं, और जो अपनी आत्मा में आध्यात्मिक स्फूर्ति की स्थापना कर लेते हैं, उन्हें अपनी प्रवृत्तियों से भय नहीं रहता कि वे उसे पाप मार्ग पर ढकेल सकती है। मानव की सहज प्रवृत्तियाँ परमार्थ बुद्धि की अनुगामिनी बन जाती हैं।

शारीरिक स्वास्थ्य और आरोग्य के लिये जिस प्रकार खाना-पीना, सोना-जागना, हँसना, खेलना और व्यायाम करना आवश्यक है, उसी प्रकार आत्मिक मंगल के लिये, आध्यात्मिक स्वास्थ्य के लिये परमार्थ कार्य करते रहना बहुत जरूरी है। दिनचर्या में परमार्थ को स्थान दिये बिना आत्मा का निर्मल और निष्कलंक रहना सम्भव नहीं। यदि आत्मा कलुषित एवं कलंकित है, तो शरीर कितना ही स्वस्थ, सुन्दर और शक्ति सम्पन्न क्यों न हो, मनुष्य अपूर्णता के दोष से बचा नहीं रह सकता। मनुष्य का स्वरूप पूर्ण तभी होता है जब शरीर के साथ आत्मा और बाह्य के साथ अन्तर भी स्वस्थ तथा सुन्दर हो। यह वाँछित स्थिति तभी सम्भव है, जब मनुष्य नित्यकर्मों की भाँति परमार्थ को भी जीवन क्रम का एक अभिन्न अंग बनाए।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1970 दिसम्बर

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रविवार, 10 मई 2026

👉 आत्मनिरीक्षण का स्वभाव बनाइए (अंतिम भाग)

अपने विकारों को दूर कर देने पर नव जीवन, दीर्घ आयु, महान प्रतिभा, विवेक, सामर्थ्य की प्राप्ति होती है जैसा कि वेद मंत्र में आया है। “आत्म निरीक्षण रूपी छलनी में शुद्ध बनकर अपनी अशुद्धि और मल को दूर करते हैं और नया दीर्घ जीवन धारण करते हैं।” यह निभ्रांति सत्य है कि निर्विकार शुद्ध बुद्ध, दोषरहित बन जाने पर मनुष्य को दीर्घ आयु, व नवजीवन की प्राप्ति होती है। वह शक्ति और सामर्थ्य का केन्द्र बन जाता है, उत्साह और साहस उसमें फूट-फूट कर निकलता है। सिद्धि सफलता उसके समक्ष हाथ जोड़े खड़ी रहती है।

वेद मन्त्र में आगे आया है कि “तत्पश्चात् हम धन और प्रजा के साथ अभ्युदय को प्राप्त होते हुए अपने घर में सुगन्धि रूप बनकर रहें।” आत्मनिरीक्षण द्वारा अपने दोषों को दूर कर देने से आत्मा का शुद्ध परिष्कृत सत् चित् आनन्द स्वरूप विकसित हो उठता है, उसमें जब सात्विकता, सौंदर्य, शक्ति, साहस, स्फूर्ति, सौजन्य की कलिकायें विकसित होती हैं तो एक मधुर गन्ध यत्र-तत्र फैल उठती है जिसके प्रभाव से धन सत्सन्तति, ऐश्वर्य, वैभव आदि एकत्रित हो जीवन में स्वर्गीय वातावरण का निर्माण करते हैं। अभ्युदय, प्रगति, उत्थान, विकास का सहज क्रम तीव्र हो उठता है। आत्म पवित्रता की मधुर गंध से लोक मानस आकर्षित हो उठता है और अपना अगुवा मान कर पीछे-पीछे चलने में अपना सौभाग्य मानता है।

वेदमन्त्र से प्रेरणा लेते हुए सूक्ष्म आत्म निरीक्षण करके अपने विकारों, दोषों, बुराइयों को ढूंढ़ना चाहिए और उन्हें दूर करना चाहिए। जब इससे जीवन परिष्कृत शुद्ध-बुद्ध स्वरूप बन जाता है तो परमात्मा का दिव्य प्रकाश स्वतः सहज रूप से प्रस्फुटित हो उठता है और लोक एवं परलोक में कल्याण की प्राप्ति होती है। ऋषियों के बताते हुये उक्त मार्ग पर चलकर ही मनुष्य जीवन के वास्तविक लक्ष्य की प्राप्ति कर सकता है।

.....समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति 1960 अप्रैल

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शनिवार, 9 मई 2026

👉 आत्मनिरीक्षण का स्वभाव बनाइए (भाग 3)

आत्मनिरीक्षण एवं दोष दर्शन में दूसरे लोगों से भी काफी लाभ उठाया जा सकता है। उदाहरणार्थ अन्य लोगों से घृणा करने, फटकारने, विश्वास न करने, व्यक्तित्व का कुछ भी मूल्य न समझने, तरह-तरह के दोष लाँछन लगने पर नाराज एवं उत्तेजित न होकर यदि यह देखने की कोशिश की जाय कि आखिर लोग ऐसा क्यों करते हैं । कहीं वास्तव में तो इनकी जड़ें स्वयं में नहीं जमी हुई हैं। इस प्रकार दूसरे लोगों की निगाह के अनुसार अपने अन्तर को टटोलना चाहिए। इससे अपने कई दोषों का पता लग जायगा। मनुष्य के फूहड़पन से ही लोग उससे घृणा करने लगते हैं, स्वान वृत्ति होने के कारण ही फटकार मिलती है। अपनी बेईमानी एवं स्वार्थ परायणता के कारण ही दूसरे अविश्वास करते हैं । अपनी अयोग्यता एवं व्यक्तित्व के प्रति सजग नहीं रहने पर ही दूसरों द्वारा तिरस्कार मिलता है। इस प्रकार दूसरों के अपने प्रति विचार, दृष्टिकोण आदि से लाभ उठाकर भी आत्मनिरीक्षण में सफलता मिल सकती है और अपने दोष बुराइयां आदि समझ में आ जाती है। निन्दा करने वाले से स्वदोष दर्शन में आत्म निरीक्षण में काफी सहयोग मिलता है। निन्दक की उपयोगिता एवं उसे हितकारी बताते हुये रहीम जी ने ठीक ही कहा है।

“निन्दक नियरे राखिये आँगन कुटी छवाय।
बिन पानी साबुन बिना निर्मल करे सुभाय।
इस प्रकार नित्य आत्मनिरीक्षण का अभ्यास डाल लेने पर अपनी बुराइयां दोष अशुद्धियाँ, विकार समझ में आने लगते हैं। मनुष्य एक सुयोग्य सर्जन की भाँति आत्मनिरीक्षण रूपी सूक्ष्म दर्शक यंत्र द्वारा अपने अन्तर में छिपे हुये उन दूषित तत्वों को सरलता से देख सकता है जिनकी शिकायत अक्सर बाह्य वातावरण के सम्बन्ध में की जाती है। सूक्ष्म निरीक्षण करने पर अन्तर में आत्म प्रवंचना, आत्म क्षुद्रता, व्यग्रता, अव्यवहारिकता, काम, क्रोध, लोभ, मोह, अन्धविश्वास, आलस्य, उदासीनता, फूहड़पन, कटुभाषण, मिथ्या आश्वासन देना, चाटुकारिता, हठ, दुराग्रहता, खीजना, व्यवहार का खोखलापन, अनुचित साहस, असावधानी, फैशन आदि अनेकों दोष विकार, अशुद्धियाँ नजर आयेंगी। आत्मनिरीक्षण रूपी छलनी से ये दूषित तत्व अलग-2 दिखाई दें जिनसे मनुष्य का जीवन असफल हो जाता है और उसका कारण दूसरों को बताया जाता है।

जब आत्मनिरीक्षण द्वारा अपनी बुराइयां, दोष विकार समझ में आ जायँ तो उन्हें विवेक बुद्धि, आत्मबल से दूर करने के लिए ठीक उसी प्रकार प्रयत्न करना चाहिए जिस प्रकार एक शल्य चिकित्सक तटस्थ भाव से रोगी के शरीर के दूषित तत्वों को बाहर निकाल फेंकता है उनसे उसका निजी कोई सम्बन्ध नहीं होता । अक्सर कई व्यक्ति अपनी बुराइयों को जानकर भी दूर करने का प्रयत्न नहीं करते क्योंकि उनसे वे अपना मोह द्वारा सम्बन्ध बनाये रखते हैं। इसलिए तटस्थ और निष्पक्ष भाव से अपनी बुराइयों, दोषों को दूर करना चाहिए, आखिर बुराइयां तो बुराइयां ही हैं उनसे लगाव रखना सभी तरह अहितकर होता है। 

महापुरुषों की जीवन गाथाओं से पता चलता है कि उनमें जो भी कमजोरियाँ थीं उन्हें स्वयं ही नहीं देखा वरन् जन साधारण के समक्ष भी अपनी वास्तविक स्थिति को रखा, फलतः एक दिन वे पूर्ण निर्विकार एवं शुद्ध हृदय बन गये। अपनी बुराइयों को छुटाने का सरल मार्ग यह भी है कि अपने वास्तविक स्वरूप को जन साधारण के समक्ष रखना चाहिए ऊपर से कलई चमक-दमक, विज्ञापन बाजी से अपने असली रूप को छिपाना नहीं चाहिए। इससे अपनी बुराइयों को छिपाने की आदत पड़ जाती है और वे बुराइयाँ चिपकी ही रहती हैं। यदि सच्चे हृदय से अपनी बुराइयों को दूर करने का प्रयत्न किया जाय तो एक दिन उनसे छुटकारा पाया जा सकता है। सूर, तुलसी, महात्मा गाँधी आदि महापुरुषों का जीवन हमारे समक्ष है। अपनी बुराइयों को समझते हुए उन्हें दूर करने का विनम्र प्रयत्न करते रहने से उन्होंने एक दिन पूर्ण रूपेण इनसे छुटकारा पाया और शुद्ध परिष्कृत स्वरूप प्राप्त किया।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति 1960 अप्रैल

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शुक्रवार, 8 मई 2026

👉 आत्मनिरीक्षण का स्वभाव बनाइए (भाग 2)

आत्म निरीक्षण के पथ पर चलते हुए मनुष्य को अपने जीवन एवं तत्सम्बन्धित विषयों को सूक्ष्म दृष्टि से देखते रहना चाहिए और उनका सुधार करना चाहिए। जिस प्रकार मुनीम अपनी रोकड़ को बड़े ध्यान से मिलाता है और एक पैसे की भूल हो जाने पर उसको निकाल कर ही पीछा छोड़ता है, उसी प्रकार हमें भी अपने दोषों का पूरा-पूरा निरीक्षण करके उन्हें दुरुस्त करना चाहिए। यही आत्म निरीक्षण रूपी छननी है जिसमें चरित्र व्यवहार, स्वभाव आदि की सारी अशुद्धियाँ बुराइयां दूर हों जाती हैं।

इसके लिए मनुष्य को दोषज्ञ बनना चाहिए। इसका तात्पर्य यह नहीं पर दोष दर्शन की वृत्ति अपनाई जाय वरन् स्व छिद्रान्वेषण की आदत डाली जाय। दोषज्ञ का अर्थ है अपने दोषों का जानकार होना। लेकिन स्वदोष दर्शन और उन्हें दूर करने के पथ पर बहुत ही कम व्यक्ति बढ़ पाते हैं। कई तो अपने आप के स्तर एवं दोषों को जानते भी नहीं।

स्वदोष दर्शन परक बुद्धि आत्म निरीक्षण की क्षमता प्राप्त करने में सर्वप्रथम अपने दोषों को लोक शास्त्र के आधार पर देखना चाहिए अधिकतर लोग मनुष्य के सम्मुख, उसकी बुराइयों तथा दोषों का बखान नहीं करते इसलिए लोक व्यापी आधार पर उन्हें पहचानना चाहिए जब लोक में किसी भी बात पर दोष मिलता हो, अपनी असफलता, हानि के कारण दूसरे लोग जान पड़े, दुख कठिनाई अपने पर विधाता को दोष दिया जाए, ऐसे समय अपने अंतर को ढूँढ़ना चाहिए। 

अपनी आन्तरिक स्थिति को टटोल कर देखने पर पता चलता है कि इन सबका कारण हमारे स्वयं के अन्तर में ही मौजूद है। ऐसी परिस्थितियों में सूक्ष्म अन्तः निरीक्षण करने पर पता चलता है कि मनुष्य की मानसिक कमजोरी के कारण ही वह अपनी हानि दोष का कारण दूसरों को बताता है। अपनी परिश्रम हीनता एवं आलस्यवश ही असफलतायें मिलती हैं। लोक व्यवहार की कुशलता मिलनसारी के अभाव में ही सामाजिक अवहेलना, तिरस्कार सहना पड़ता है। सहनशीलता के अभाव में संसार कठोर जान पड़ता है। इस प्रकार बहुत कुछ बाहर दीखने वाली बुराइयां कमजोरियाँ अपने अन्तर में ही छिपी रहती हैं। ढूंढ़ने पर उन्हें पहचाना जा सकता है। अपने अन्तर को टटोलते हुए ठीक ही कहा है-
बुरा जो ढूँढन मैं चला मुझसा बुरा न कोय-
इस प्रकार अपने अंतर को खोजने पर अपनी कमजोरियाँ स्पष्ट दिखाई देंगी।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति 1960 अप्रैल

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गुरुवार, 7 मई 2026

👉 आत्मनिरीक्षण का स्वभाव बनाइए (भाग 1)

कस्यं मृजाना अतियन्तिरिप्रमायुर्दधानाः प्रतरंनवीय॥
आप्यायमानाः प्रजया धनेनाध स्याम सुरभयो गृहेषु॥
अ. 18। 31।17॥

“आत्मनिरीक्षण रूपी छलनी में शुद्ध बन कर अपनी अशुद्धि, मल अथवा अपमृत्यु को साफ कर दूर करते हैं। और नव दीर्घ आयुष्य धारण करते हैं। तत्पश्चात् हम धन और प्रजा के साथ अभ्युदय को प्राप्त होते हुए अपने घर में सुगन्धि रूप बन कर रहें।”

उक्त वेदमंत्र में आत्मसुधार के लिए बहुत ही सरल और स्पष्ट राजमार्ग बताते हुए आत्मनिरीक्षण की प्रेरणा दी गई है। मंत्र के प्रारम्भ में आया है आत्मनिरीक्षण रूपी छलनी में शुद्ध बनकर अपनी अशुद्धि व भल अथवा अपमृत्यु को साफ करते हैं। इसके अनुसार आत्मनिरीक्षण करते रहने से सारे दोष, बुराइयाँ, दुर्व्यसन आदि ठीक उसी प्रकार अलग-अलग हो जाते हैं जैसे छलनी में किसी पदार्थ को छानने पर उसका खराब अंश अलग रह जाता है और वस्तु शुद्ध और मल रहित बन जाती है। आत्मनिरीक्षण का अवलम्बन लेने पर मनुष्य के दोष अशुद्धि, बुराइयाँ आदि भी ठीक इसी प्रकार दूर हो जाती हैं।

मानव स्वभाव की कमजोरी के कारण उसमें कुछ न कुछ दोष, बुराइयाँ आदि अपना घर बनाये रहती हैं। किन्तु इन्हें स्वच्छन्दतापूर्वक पनपने देना मनुष्य के लिए बहुत घातक सिद्ध होता है। उस समय मनुष्य की वही हालत होती है जैसे उस खेत की, जो मालिक की देखभाल आदि से वंचित झाड़ झंखाड़, अनावश्यक कूड़ा, घास-पत्ता आदि से अनुपयोगी बन जाता है। ऐसे मालिक की देखभाल के अभाव में घर की दुर्दशा होती है। ठीक उसी प्रकार मानव जीवन बंजर जमीन, सफाई और निरीक्षण के अभाव में घर की तरह बेढंगा, दोषपूर्ण, अशुद्ध और विकृत बन जाता है। एक छोटे से अवगुण दोष के कारण जीवन में बट्टा लग जाता है। यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि थोड़ी सी खराबी होने पर चाँदी का सिक्का बेकार हो जाता है, अच्छे से अच्छे भोजन को एक मक्खी अथवा कीड़ा घृणा युक्त बना देता है। घड़े में छोटा सा छेद होने पर उसको खाली कर देता है, एक छोटा सा फोड़ा जानलेवा बन जाता है। ठीक उसी प्रकार किसी भी सुपात्र की उपयोगिता एवं महत्ता उसके एक अवगुण एवं दोष से नष्ट हो जाती है। एक दोष से मनुष्य का सम्पूर्ण व्यक्तित्व समाप्त हो जाता है पचास वर्षों की बहुत बड़ी नेकनामी को कुछ क्षण की बदनामी नष्ट कर देती है।

मनुष्य के चरित्र व्यवहार, स्वभाव, विचार, जीवन यापन दृष्टिकोण आदि में कुछ न कुछ कमी रह जाना स्वाभाविक है किन्तु जैसा कि ऊपर व्यक्त किया जा चुका है, एक छोटी सी बुराई भी जीवन की समस्त अच्छाइयों पर पानी फेर देती है। जिस प्रकार एक हल्के से धब्बे से किसी भी चित्र की सुन्दरता नष्ट हो जाती है उसी प्रकार किसी भी दोष से दूषित मनुष्य का जीवन कलंकित हो जाता है। चन्द्रमा के छोटे दो धब्बे उसके सौंदर्य में कितने बड़े बाधक हैं जो हर देखने वाले की आँखों में खटक जाते हैं। किसी मशीन का एक भी पुरजा बिगड़ जाने पर सारी मशीन का संतुलन और तत्परता नष्ट हो जाती है। इसी प्रकार मनुष्य जीवन व्याप्त दोष, बुराइयों, अशुद्धियों आदि को दूर करके पूर्णता व अभ्युदय की ओर अग्रसर होने के लिए आत्म निरीक्षण रूपी छलनी की आवश्यकता है।

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रविवार, 3 मई 2026

👉 नैतिकता की खरी कसौटी (अन्तिम भाग)

जो अच्छा काम अच्छी भावना से किया गया हो, उसका परिणाम हमेशा शुभ ही हो, यह आवश्यक नहीं है। कार्य के परिणाम को उसकी नैतिकता की माप मानना ठीक नहीं। उदाहरणार्थ मुझे एक घड़ी प्राप्त करनी है अब मैं इस लक्ष्य को कई तरीकों से सिद्ध कर सकता हूँ-यथा खरीदकर माँगकर, चोरी करके। साधन के अनुसार मेरी लक्ष्य-प्राप्ति का स्वरूप भी नैतिक से अनैतिक बनते जाता है। यही कारण है कि महात्मा गाँधी लक्ष्य का ही शुद्ध होना आवश्यक नहीं बल्कि साधन का भी शुद्ध होना आवश्यक है, कहते थे। उनके अनुसार शुद्ध साधन से ही शुद्ध लक्ष्य की प्राप्ति हो सकती है। साम्यवादी नैतिक भूमिका और गाँधीवादी नैतिक भूमिका में यह बुनियादी फर्क है।

अच्छे काम का, अच्छी भावना से शुद्ध साधनों के द्वारा किया जाना, उसके नैतिक होने के लिये अपरिहार्य शर्तें हैं। साथ ही वह काम आत्म स्फूर्त भी हो। जो कार्य दबाव या भय से किया जावेगा, वह दबाव या भय के कारण दूर होते ही लुप्त हो जावेगा। यदि कोई विनोबा जी के साथ पद यात्रा में सुबह शाम होने वाली प्रार्थना में उनके नैतिक भय या नियम के दबाव से शामिल होकर प्रार्थना करता है तो उसका वह कार्य नैतिक नहीं कहा जा सकता। ऊपर से लादा हुआ कार्य नैतिक नहीं हो सकता है। यहाँ तक नैतिकता की मान्यता पर विषय गत दृष्टि से विचार किया गया। लेकिन यह प्रश्न तो रह ही जाता है कि हम कैसे जाने कि कौन काम शुभ है? कौन अशुभ है? कौन सत है और कौन असत कार्य है? इसके लिये सर्वमान्य एक मापदण्ड न हो सकने पर भी वैसे मापदण्ड का सर्वथा अभाव नहीं है। संसार से जितने नीतिशास्त्र के आचारवान विचारक संत महात्मा हो गए हैं एक स्वर से घोषित करते हैं कि आत्मनः प्रतिकूलानि परेषाँ न समाचरेत्। सारे संसार के नीतिशास्त्र का सार संक्षेप है। रूसी ऋषि टॉलस्टाय कहते थे जो व्यक्ति जितना कम लेता है और जितना ज्यादा वापस देता है उसी अनुपात में वह उतना ही नैतिक है। महात्मा गाँधी की अहिंसा क्या है-सर्वभूतों से आत्मवत् प्रेम ही तो है।

आपको जीवन में आगे बढ़ने के लिए खुद को कैसे बदलना चाहिए ? अमृतवाणी https://youtu.be/RGc8RJNy0ZY?si=M4Sne1jaIPk6q6F0

आत्मनः प्रतिकूलानि परेषाँ न समाचरेत् इस पाँच शब्दों के लघु वाक्य में समस्त नीतिशास्त्र का निचोड़ सम्मिलित है-यह सहसा विश्वास नहीं होता है। सत्य की सरलता ही उसे पहिचानने में कठिनाई उपस्थित करती है समस्त नैतिक सिद्धान्त क्या बताते हैं? यही न कि हमारे सारे व्यवहार दूसरों के प्रति इस प्रकार हों जिससे हम अपना सर्वतोमुखी विकास करते हुए दूसरों के उसी प्रकार के विकास में सर्व भावेन सहयोग कर सकें। इस प्रकार का व्यवहार नहीं हो सकता है जो ऊपर के पाँच शब्दों में प्रकट किया गया है। इसी वाक्य का अविकल अनुवाद सा करते हुए संत कन्फ्यूशियस ने कहा “जो व्यवहार तुम अपने प्रति नहीं पसन्द करते, वह दूसरों के प्रति न करो।” साक्षात् धर्म के लक्षण बताते हुए मनु ने कहा-स्वस्थ न प्रियमात्मनः धर्म का एक प्रबल लक्षण अपनी आत्मा को जो प्रिय लगे, वह करना है। अब कोई कह सकता है कि हमारी आत्मा को तो चोरी करना प्रिय है। जो उसका धर्म वही है परन्तु आपको चोरी करना प्रिय नहीं है क्योंकि जिसे जो काम प्रिय है, उसे यदि और लोग करें तो उसे खुश होना चाहिये। कोई चोर नहीं चाहेगा कि सब चोर हों क्योंकि वैसी हालत में उसका काम नहीं बनेगा। अतः हम जिस कार्य को अपने प्रति नहीं चाहते कि कोई करे उसका आचरण हम दूसरों के प्रति करें-एक सच्ची कसौटी है। हम नहीं चाहते कि कोई हमारे साथ झूठा व्यवहार करे अतः हमें चाहिए कि हम सबके साथ सत्य व्यवहार करें। हम नहीं चाहते कि कोई हमारा जी दुखाए, अतः हमें चाहिए कि हम अपने आचरणों से किसी को कष्ट न दे। हम अपनी जान की रक्षा करते हैं, हमें अपनी जान प्यारी है। इसी से यह अपरिहार्य व्यवहार निश्चित हो जाता है कि हम दूसरे की जान की रक्षा करें। सत्य, अहिंसा के सिद्धान्त का मूल यही विचार है। इसी प्रकार अस्तेय, अपरिग्रह आदि अन्य सार्वभौम नैतिक सिद्धान्तों के विषय में आप अपने अन्तःकरण से स्वयं जान सकते हैं।

उपर्युक्त नीति वाक्य के अनुसार अपने आचरण की जाँच करने के लिये जितनी सद्विवेक बुद्धि की जरूरत है उतनी प्रत्येक सामान्य व्यक्ति को प्रकृति से प्राप्त है। *हमारी समस्या नीति की अज्ञानता उतनी नहीं है जितना नीति का आचरण है। अर्जुन के समान हम सबकी स्थिति है- “जा नाभि धर्न्य न धमे प्रवृतिः जानन्यः धर्न्य न चम निवृत्तिः।” धर्माधर्म का ज्ञान इन सबको रहता है तदनुकूल आचरण के अभाव से सारी समस्या खड़ी होती है। यदि हम वसुधैव कुटुम्बकम, का आदर्श अपनाकर अपने व्यवहारिक जीवन में आत्मनः प्रतिकूलानिपरेषाँ न समाचरेत् का आचरण करें तो हम धर्म और नीति की रक्षा करते हुए सच्चे अर्थों में स्व, पर कल्याण कर सकते हैं।

.....समाप्त
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👉 नैतिकता की खरी कसौटी (भाग 1)

पाप क्या है? पुण्य क्या है? सत् क्या है? असत् क्या है? उचित क्या है? अनुचित क्या है? शुभ क्या है? अशुभ क्या है? अच्छा क्या है? बुरा क्या है? मानव जाति ने जबसे विचार करना आरम्भ किया तब से ये प्रश्न उसके सामने हैं। ऐसा नहीं है कि इनके सार्वभौम उत्तर प्राप्त करने की कोशिश नहीं की गई। परन्तु प्रयत्न के बावजूद भी कोई ऐसा समाधान कारक उत्तर नहीं मिला है जिसे सब देश और सब काल में सबके लिए उपयुक्त कह सकें। यही कारण है कि परम पुरातन होते हुए भी ये प्रश्न नित्य नवीन बने हुए हैं।

नैतिकता की मान्यताओं को अधिकाँश विचारक देशकाल और पात्र सापेक्ष मानते हैं। इस कारण से एक ही कार्य एक समय, एक स्थान में एक व्यक्ति के लिये अच्छा सिद्ध होता है और वही कार्य दूसरे समय, दूसरे स्थान में दूसरे व्यक्ति के लिये अनैतिक बन जाता है जैसे-युद्ध के समय सामूहिक हत्या उचित मानी गई किन्तु अन्य परिस्थिति में हत्या पाप है, अपराध है। इस अनिश्चयात्मक स्वरूप के कारण ही लगता है नैतिक मान्यताएँ जनसाधारण को अनावश्यक, अनाकर्षक जँचती हैं। उन्हें लगता है कि अच्छा-बुरा का विचार करना समय की बरबादी और निरी मूर्खता है। आज भी संसार में ऐसे लोगों का अभाव नहीं है जो सुकरात को मूर्खराज की उपाधि से निःसंकोच विभूषित करते हैं।

ध्यान:- मन को शांत कैसे करें | Man Ko Shant Kaise Karen | Meditation, 

सामान्यजन प्रत्येक प्रश्न पर व्यापारी दृष्टि से विचार करते हैं। वे प्रत्येक कार्य को लाभ-हानि की तुला पर तोलते हैं। नैतिक मान्यताएँ इस तुला से हानिकारक जँचती है और इस स्वार्थी निष्कर्ष को नैतिक मान्यताओं के स्वरूप की अनिश्चयात्मकता का बल मिल जाता है। फिर क्या गिलोय और नीम चढ़ी। जनसामान्य में नैतिकता की ऐसी शोचनीय अवस्था होते हुए भी ऐसा कह सकना सम्भव नहीं है कि वे नैतिक मान्यताओं की पूर्ण उपेक्षा कर सकते हैं। वे जाने-अनजाने कहते ही रहते हैं कि अमुक ने अच्छा नहीं किया, अमुक अन्यायी है, पापी है, दुराचारी है इत्यादि। उनके ये कथन सिद्ध करते हैं कि कोई व्यक्ति भले ही अपने लिये नैतिक आचरण को अनावश्यक कहे पर जहाँ दूसरे के आचरण का प्रश्न आता है, उसको आवश्यक मानता है। जिस व्यक्ति से हमारा कोई सरोकार नहीं, हानि-लाभ की आशा नहीं उसके आचरण की भी हम आलोचना करते ही हैं, अच्छा-बुरा का निर्णय करते हैं। इससे स्पष्ट है कि नैतिकता की कसौटी हमारी हानि लाभ वाली तुला नहीं हो सकती। वह उससे सर्वथा पृथक है।

हम दूसरे व्यक्ति को उसके बाह्य आचरण से अच्छा या बुरा ठहराते हैं। हमारे पास इसके अतिरिक्त दूसरा साधन भी नहीं हैं। पर बाह्य आचार के आधार पर किया गया नैतिक निर्णय हमेशा ठीक ही होगा, ऐसा नहीं कह सकते। दो व्यक्तियों का बाहरी व्यवहार एकसार होते हुए भी एक नीति युक्त और दूसरा अनैतिक हो सकता है। उदाहरण के लिए एक व्यक्ति ने दया से द्रवित होकर एक भिखारी को एक रुपया दिया और दूसरे ने उसे अपनी आँखों के सामने से हटाने के लिए एक रुपया दिया। कहने का मतलब यह है कि एक ने पसीज कर और दूसरे खीझकर रुपया दिया। जहाँ तक देने का संबंध है इस उदाहरण में दोनों ने दिये हैं, समान दिये हैं पर दान के पीछे जो भावना है उनमें जमीन-आसमान का अन्तर है। भावना के कारण एक का वही कार्य नैतिक है तो दूसरे का वही कार्य अनैतिक है। काम अच्छा हो इतना ही बस नहीं है बल्कि अच्छी भावना से भी किया गया होना चाहिए।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति 1960 मई

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शनिवार, 2 मई 2026

👉 कुँठित भावनाओं को निकाल दीजिए। (अंतिम भाग)

आत्म-निरीक्षण कर देखिए कि किस प्रकार की भावात्मक शक्ति आप में जमी पड़ी है? और उसके विकास का सबसे स्वस्थ रूप क्या हो सकता है? किससे आपकी आन्तरिक तृप्ति होती है? क्रोध का ज्वालामुखी, घृणा का तूफान, आवेश की सुलगती अग्नि मनोनुकूल प्रिय कार्यों से लगने से शान्त होती है। जिस भावना से सम्बन्धित रुकी हुई शक्ति हो, उसके अनुकूल ही रुचिकर उत्पादक प्रिय कार्य का चुनाव कीजिए। इन माध्यमों पर सही सफलता निर्भर है।

हमें अपने एक उत्पातकारी विद्यार्थी की स्मृति आज भी हरी है। वह कालेज आते हुए बाग के पेड़ और फल तोड़ता, मालियों को परेशान करता, छोटे विद्यार्थियों को पीटता था। सभी उससे तंग थे। पढ़ने में उसका किंचित भी मन न था। उसे फौज में जाने की सलाह दी गई। वही पेशा उसके कठोर भावों के अनुकूल पड़ता था। विद्यार्थी ने राय मान ली। आज वही उत्पातकारी विद्यार्थी अच्छा जनरल है। फौजी जीवन की कठोरताओं में भी सफलता प्राप्त करता जा रहा है। जब तक उसे अपनी रुचि, प्रकृति, स्वभाव, संस्कारों के अनुकूल क्षेत्र नहीं मिला, तभी तक वह शरारती रहा। अपना क्षेत्र मिलते ही, वह द्रुतगति से आगे बढ़ने लगा। अभी सफलता तो तभी मिली हुई समझिये जब मनुष्य अपने मनोनुकूल क्षेत्र पा ले।

जीविका उपार्जन के बाद किसी दूसरे प्रिय आनन्ददायक, प्रेरणाप्रद, मनोरंजक कार्य में तन्मय हो जाने से अवरुद्ध मनोग्रन्थियों को खुलने और बचपन तक की भावात्मक शक्ति को बाहर निकलने का स्वस्थ अवसर मिलता है।

अपने से पूछिए क्या मैं अपने भावों को ठीक तरह पहचानता हूँ? जब मैं क्रोधित हो उठता हूँ तो क्या उसमें दूसरे का कसूर होता है या यह स्वयं मेरी भावात्मक कमजोरी है? मेरे व्यक्तित्व में वह छिपा हुआ भाव कौन सा है, जो प्रायः मुझे परेशान किया करता है? क्या मैं उसे किसी उत्पादक शुभ कार्य की ओर मोड़ सकता हूँ?

निश्चय जानिये, आपको अपनी भावना के उदात्तीकरण का कोई न कोई स्वस्थ मार्ग अवश्य मिल जायगा। यह मनुष्य के स्वयं अपने आपको अध्ययन करने, स्व परीक्षा द्वारा अपनी गुप्त रुचि का ज्ञान प्राप्त करने तथा मन की नाना क्रियाओं को देखने से सम्बन्ध रखता है। आप खुद ही अपनी मनोवृत्तियों की दिशा तथा प्रवाह को पहचान सकते हैं। भावनाओं के प्रवाह में केवल यह ध्यान रखिए कि वह दिशा स्वस्थ, सुन्दर और समाज के लिए कल्याणकारी हो, जन हितकारी हो। आपका भी लाभ हो तथा अधिक जनता का हित साधन हो। विषय वासना की कलुषितता तथा दुर्गन्धि से उसका सम्बन्ध तनिक भी न हो। आपका चुना हुआ मार्ग नैतिक हो और आपके अन्दर के देवता को जगाने वाला हो। उसके प्रति आपका उत्साह सदा ही बना रहे और उससे आपकी मानसिक और आध्यात्मिक शक्तियाँ सतत जागृत और विकसित होती रहें।

.....समाप्त
📖 अखण्ड ज्योति 1960 मार्च

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शुक्रवार, 1 मई 2026

👉 कुँठित भावनाओं को निकाल दीजिए। (भाग 2)

सेक्तमाहना की अतृप्ति से नैराश्य और उदासीनता उत्पन्न हो जाती है। कुछ स्त्री पुरुष तो अर्द्धविक्षिप्त से हो जाते हैं, कुछ का विकास रुक जाता है। औरतों में हिस्टीरिया, मिर्गी, पागलपन, त्वचा रोग हो जाते हैं। पुरुष गन्दी गालियाँ देते हैं। इस भावना का उदात्तीकरण ही उचित है। उच्च साहित्य के अध्ययन, भजन कीर्तन, पूजन, काव्य-निर्माण, चित्रकारी, समाज सेवा के नाना कार्यों द्वारा वृत्ति को तृप्त किया जा सकता है।

वह लड़का, जो छोटे जानवरों को पीटने या सताने में आनन्द लेता है, वास्तव में अपने छिपे पौरुष और शासन करने के भाव को गलत तरीके से प्रकट कर रहा है। इस मार्ग पर चलते-2 संभव है वह एक मारने पीटने वाले दुष्ट व्यक्ति के रूप में पनप जाये। इसके विपरीत यदि वह अपनी इन्हीं भावनाओं को सुनियंत्रण करे, तो एक नेता, सैनिक, सर्जन बन सकता है। जो बच्चे छोटे-2 खिलौने या खेलने के नए-2 आविष्कार करते रहते हैं, वे उन्हीं भावनाओं का विकास कर अच्छे इंजीनियर या वैज्ञानिक बन सकते हैं।

मान लीजिए एक युवक का विवाह उसकी प्रेमिका से तय हो चुका है। उसे उसमें नई प्रेरणा मिली है और वह नए जोश से अपना काम करने में लगा हुआ है। अक्समात वह सम्बन्ध टूट जाता है। उसे भारी निराशा का धक्का लगता है। संभव है आवेश में आकर वह आत्म हत्या कर डाले या किसी विध्वंसात्मक प्रवृत्ति में लग कर प्रतिशोध लेने पर उतारू हो जाय। यह भाव का गलत विकास है। इससे स्वयं उसके भी मस्तिष्क और शरीर को क्षति होगी। उसे किसी प्रिय कार्य में पूरी तरह प्रवृत्त होकर, तन्मय होकर आत्म-विस्मृति करनी चाहिए। भावात्मक शक्ति को उत्पादक मार्ग देना चाहिए जिससे स्वयं उनका और समाज का कुछ हित हो सके। महाकवि तुलसीदास, भक्त प्रवर सूरदास, प्रेम दिवानी मीराबाई, भावविह्वल भक्त कबीर, गुरु नानक आदि की भावनाएँ शाश्वत कवि के रूप में प्रवाहित हुई जिनसे युग दिव्य प्रेरणाएँ आज भी ले रहा है। तुलसी का प्रेम ईश्वरीय शक्ति के यशोगान में लगा, सूर के भजनों में आज भी उनकी आत्मा के दर्शन मिलते हैं। ये महामानव स्वयं अपने कार्य से ही प्रेम करने लगे थे। इन्होंने रुके हुए गुप्त भावों को प्रकट होने का स्वस्थ रूप दिया। हम स्वयं भी अपनी भावनाओं को प्रकट करने के लिए मनोनुकूल इच्छानुरूप, माध्यम ढूँढ़ सकते हैं।

.....क्रमशः जारी
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👉 निराशा से बचने का उपाय-कम कामनाएं (अंतिम भाग)

इच्छाओं के त्याग का अर्थ यह कदापि नहीं कि मनुष्य प्रगति, विकास, उत्थान और उन्नति की सारी कामनाएँ छोड़कर निष्क्रिय होकर बैठ जाये। इच्छाओं के त्याग का अर्थ उन इच्छाओं को छोड़ देना है जो मनुष्य के वास्तविक विकास में काम नहीं आतीं, बल्कि उलटे उसे पतन की ओर ही ले जाती हैं। जो वस्तुऐं आत्मोन्नति में उपयोगी नहीं, जो परिस्थितियाँ मनुष्य को भुलाकर अपने तक सीमित कर लेती हैं मनुष्य को उनकी कामना नहीं करनी चाहिये। साथ ही वाँछनीय कामनाओं को इतना महत्व न दिया जाये कि उनकी अपूर्णता शोक बनकर सारे जीवन को ही आक्रान्त कर ले।

मनुष्य का लगाव इच्छाओं से नहीं बल्कि उनकी पूर्ति के लिये किये जाने वाले कर्म से ही होना चाहिए। इससे कर्म की गति में तीव्रता आयेगी और मनुष्य की क्षमताओं में वृद्धि होगी जिससे मनोवाँछित फल पाने में कोई सन्देह नहीं रह जायेगा। इसके साथ ही केवल कर्म से लगाव होने पर यदि कोई प्रयत्न में लग जायेगा। असफलता उसे प्रभावित नहीं कर पायेगी। इच्छा के प्रति लगाव रहने से प्रयत्न की असफलता पर मनोवाँछा पूरी न होने से उसका जी रो उठेगा। वह अपनी कामना के लिए तड़पने और कलपने लगेगा। अपेक्षित फल न पाने से उसे कर्म के प्रति विरक्ति होने लगेगी, प्रयत्नों से घृणा हो जायेगी और तब कर्म का अभाव उसको निष्क्रिय बनाकर घोर निराशा की स्थिति में भेज देगा। अस्तु, मनुष्य को मनोवांछाएं प्राप्त करने और निराशा के भयानक अभिशाप से बचने के लिये अपना लगाव इच्छाओं के प्रति नहीं बल्कि उनके लिये आवश्यक प्रयत्नों के प्रति ही रखना चाहिये।

मनुष्य की वे ही वासनायें उपयुक्त कही जा सकती हैं जो उसके विकास में सहायक हों। सम्पत्ति की कामना तभी उपयुक्त है जब वह कोई महान कार्य सम्पादित करने में काम आये। सम्पत्ति की कामना इसलिये करना ठीक नहीं-कि लोग हमें धनवान समझें समाज में प्रभाव बढ़े, संसार की हर चीज प्राप्त की जाये, भोगों के अधिक साधन संग्रह किये जायें। लोग सन्तान की वासना करते हैं, ठीक है सन्तान की कामना स्वाभाविक है, किन्तु सन्तान को केवल इसलिए चाहना कि मैं पुत्रवान समझा जाऊँ सम्पत्ति का कोई उत्तराधिकारी हो जाये, बहुत उपयुक्त नहीं। देश को अपने प्रतिनिधि के रूप में एक अच्छा नागरिक देने के लिये सन्तान की कामना महान एवं उपयुक्त है। लोग जीवन में कीर्ति चाहते हैं, अपनी ख्याति चाहते हैं और उसके लिये न जाने कौन-कौन से उपाय प्रयोग किया करते हैं। ख्याति इसीलिए चाहना ठीक नहीं-कि समाज में प्रभाव बढ़ेगा उससे हजार प्रकार के काम निकलेंगे, लोग आदर करेंगे, चाटुकारी करेंगे, प्रतिष्ठा बढ़ेगी। मनुष्य को कीर्ति कामी होना चाहिए, किन्तु यह तभी ठीक होगा कि वह कीर्ति का उपार्जन अपने सत्कर्मों से करे, अन्याय और धूर्तता से नहीं।

इस प्रकार की उपयुक्त कामनाएं रखने वाला व्यक्ति कभी भी उनकी असफलताओं से दुःखी नहीं होता और न कभी निराशा की स्थिति में पहुँचता है। अपने व्यक्तिगत सुखभोग के लिए विषयों की कामना परिणाम में ही नहीं प्रारम्भ में भी दुःखदायी होती है। आत्म विकास और समाज कल्याण के लिये की हुई कामनायें आदि एवं अंत दोनों में ही सुखदायी एवं कल्याणकारी रहती है। जीवन में निराशा से बचने के लिये मनुष्य को कम से कम कामनाएँ रखना ही ठीक है। कामनाओं की अधिकता ही निराशा और पतन का कारण होती है।

.....समाप्त
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति 1966 मार्च

गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

👉 कुँठित भावनाओं को निकाल दीजिए। (भाग 1)

मन का भाव दब कर मन की एक ग्रन्थि बन जाता है। जो व्यक्ति अनेक मानसिक व्याधियों से ग्रस्त हैं उसका कारण यह दबे हुए नाना प्रकार के कुँठित भाव ही हैं। बचपन की किस कटु अनुभूति के कारण ये दलित भाव दुःख और व्याधि के कारण बनते हैं और मनुष्य को परेशान किए रहते हैं।

क्रोधी, चिड़चिड़ी, बात बात में झगड़ने वाली कर्कशा नारी के बिगड़े हुए स्वभाव का कारण बचपन में उस पर नाना प्रकार के दमन हैं। कठोर व्यवहार भी विकसित होकर गुप्त भावना ग्रन्थि का रूप धारण कर लेता है। जो नारी या पुरुष बच्चों को घृणा करता है, उसका कारण यह है कि उसमें मातृत्व या पितृत्व के सहज स्वाभाविक भाव पनपने नहीं पाये हैं। अनेक पाश्चात्य अविवाहित नारियाँ पालतू कुत्तों तथा बिल्लियों को अपने पास रखती हैं, उनका प्रेम से चुम्बन करती हैं और अपने मातृत्व के सहज वात्सल्य का माधुर्य लूटती हैं। जो कोमल स्नेह नारी की प्राकृतिक सम्पदा है जिससे मानव शिशु पलता - पनपता है, वह कुत्ते बिल्लियों पर न्यौछावर कर के तृप्त किया जाता है। वात्सल्य और प्रेम की इन भावनाओं को निकालने से पाश्चात्य नारियाँ कृत्रिम मातृत्व के सुख का अनुभव करती हैं तथा मन में आह्लादित रहती हैं।

जिन पुरुषों तथा नारियों में इस प्रकार की अन्य अनेक इच्छाएँ कुँठित पड़ी हैं, वे समाज के भय से दलित होकर मन में कुण्ठा उत्पन्न कर सकती हैं। महत्वाकाँक्षा, प्रसिद्धि, महत्ता आदि न मिलने से मनुष्य चोर, डाकू या शैतान बन सकता है। नारियों की सेक्स भावना अतृप्त रहने से उनमें हिस्टीरिया, प्रमाद, चिड़चिड़ापन उत्पन्न हो सकते हैं। अतः मानसिक स्वास्थ्य के लिए प्रत्येक स्वस्थ स्त्री पुरुष का अवरुद्ध भावनाओं को निकालने के मार्ग ढूँढ़िये। ऐसी नारियाँ समाज सेवा में तन मन लगा कर अपने हृदय का भार हलका कर सकती हैं अथवा यतीम खाने के अनाथ बच्चों की देख रेख, प्यार, सेवा, पालन, पोषण, सेवा, सुश्रूषा कर मातृत्व की सहज वृत्ति की तृप्ति कर सकती हैं। उन्हें चाहिए कि वे गरीबों की बस्तियों की ओर निकल जाया करें। वहाँ के अर्द्धनग्न और भूखे बच्चों की देख रेख किया करें। उन्हें स्नान करायें और स्वच्छ वस्त्र धारण करायें, उनके साथ खेलें, गायें, बातचीत करें। इस प्रेम से गुप्त भावनाओं को निकालने का स्वस्थ मार्ग मिलता है जो मानसिक स्वास्थ्य और सुख के लिए अमृत तुल्य है। आपके मन की कोई भी भावना, यदि अतृप्त है तो मानसिक संस्थान में भावना ग्रन्थि (काम्लेक्त) उत्पन्न करेंगी और नाना मनोविकारों में प्रस्फुटित होंगी। वह हमारे गुप्त प्रदेश में बाहर निकलने और तृप्ति प्राप्त करने के अवसर देखा करती हैं। जो उसे निर्दयता से कुचल डालते हैं, वे मानसिक रोगों के शिकार बनते हैं।

.....क्रमशः जारी
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👉 निराशा से बचने का उपाय-कम कामनाएं (भाग 2)

साहस रहित मनुष्य का वैराग्य, असफलता जन्य विरक्ति और निराशा से उपजी हुई आत्म-ग्लानि बड़ी भयंकर होती है। इससे मनुष्य की अन्तरात्मा कुचल जाती है।

ऐसे असात्विक वैराग्य का मुख्य करण मनुष्य की मनोवाँछाओं की असफलता ही है जिसके कारण अपने से तथा संसार से घृणा हो जाती है। प्रतिक्रिया स्वरूप संसार भी उससे नफरत करने लगता है। ऐसी स्थिति में मनुष्य की मनोदशा उस भयानक बिन्दु के पास तक पहुँच जाती है जहाँ पर वह त्रास से त्राण पाने के लिए आत्म-हत्या जैसे जघन्य पाप की ओर तक प्रवृत्त होने लगता है।

जो भी अधिक इच्छाएं रखेगा बहुत प्रकार की कामनाएँ करेगा उसका ऐसी स्थिति में पहुँच जाना स्वाभाविक ही है। किसी मनुष्य की सभी मनोकामनाएं सदा पूरी नहीं होती। वह हो भी नहीं सकतीं। मनुष्य की वांछाएं इतनी अधिक होती हैं कि यदि संसार के समस्त साधन लगा दिये जायें, तब भी वे पूरी न होंगी।

ऐसा नहीं है कि मनुष्यों की इच्छायें पूर्ण नहीं होती हों, किन्तु इच्छायें उसी मनुष्य की पूर्ण होती हैं जो उनको सीमित एवं नियंत्रित रखता है। जिसकी आकाँक्षायें अनियंत्रित हैं जिनका कोई ओर-छोर ही नहीं है उसकी कोई भी महत्वाकाँक्षा पूर्ण होने में सन्देह रहता है। बहुधा अनन्त आकाँक्षाओं वाले व्यक्ति को घोरतम निराशा का ही सामना करना पड़ता है।

इच्छाओं के ऐसे दुष्परिणाम देखकर ही भारतीय मनीषियों ने इच्छाओं को त्याज्य बतलाया है। उन्होंने अच्छी प्रकार इस सत्य को अनुभव कर लिया था कि जो इच्छाओं के प्रति त्याग भावना नहीं रखता उसकी इच्छायें धीरे-धीरे एक से दो और दो से चार होती हुई शीघ्र ही बढ़ती चली जाती हैं और फिर वे न तो नियंत्रण में आ पाती हैं न पूरी हो पाती हैं। फलस्वरूप मनुष्य को घोर निराशा की स्थिति में पहुँचा देती हैं। अतएव ऋषि मुनियों ने हृदय को पूर्ण रूप से निष्काम रखने का ही आदेश दिया है।

इस इच्छा त्याग का गलत अर्थ लगाकर लोग यह कह उठते हैं कि जिसमें कोई इच्छा नहीं होगी, वह कोई काम ही न करेगा और यदि एक दिन संसार का हर मनुष्य इच्छा रहित निष्काम हो जाये तो सृष्टि की सारी गति-विधि ही नष्ट हो जाये और यह चौपट हो जाये।

.....क्रमशः जारी
✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
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‼️ आत्मबोध चिन्तन—तत्वबोध मनन ‼️

“हर दिन नया जन्म, हर रात नयी मौत” की मान्यता लेकर जीवनक्रम बनाकर चला जाए तो वर्तमान स्तर से क्रमशः ऊँचे उठते चलना सरल पड़ेगा। मस्तिष्क और शरीर की हलचलें अन्तःकरण में जड़ जमाकर बैठने वाली आस्थाओं की प्रेरणा पर अवलंबित रहती हैं। आध्यात्मिक साधनाओं का उद्देश्य इस संस्थान को प्रभावित एवं परिष्कृत करना ही होता है। इस उद्देश्य की पूर्ति में वह साधना बहुत ही उपयोगी सिद्ध होती है, जिसमें उठते ही नये जन्म की और सोते ही नई मृत्यु की मान्यता को जीवन्त बनाया जाता है।

प्रातः बिस्तर पर जब आँख खुलती है तो कुछ समय आलस को दूर करके शैया से नीचे उतरने में लग जाता है। प्रस्तुत उपासना के लिए यही सर्वोत्तम समय है। मुख से कुछ भी कहने की आवश्यकता नहीं पर यह मान्यता−चित्र मस्तिष्क में अधिकाधिक स्पष्टता के साथ जमाना चाहिए कि “आज का एक दिन एक पूरे जीवन की तरह है; इसका श्रेष्ठतम, सदुपयोग किया जाना चाहिए। समय का एक भी क्षण न तो व्यर्थ गँवाया जाना चाहिए और न अनर्थ कार्यों में लगाना चाहिए।” सोचा जाना चाहिए कि “ईश्वर ने अन्य किसी जीवधारी को वे सुविधाएँ नहीं दीं जो मनुष्य को प्राप्त हैं। यह पक्षपात या उपहार नहीं; वरन् विशुद्ध अमानत है। जिसे उत्कृष्ट आदर्शवादी रीति−नीति अपनाकर पूर्णता प्राप्त करने—स्वर्ग और मुक्ति का आनन्द इसी जन्म में लेने के लिए दिया गया है। यह प्रयोजन तभी पूरा होता है जब ईश्वर की इस सृष्टि को अधिक सुन्दर, समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाने के लिए उपलब्ध जीवन सम्पदा का उपयोग किया जाय। उपयोग के लिए यह सुर−दुर्लभ अवसर मिला है। यह योजनाबद्ध सदुपयोग करने में ईश्वर की प्रसन्नता और जीवन की सार्थकता है।”

मंत्र जाप की तरह इन शब्दों को दुहराने की जरूरत नहीं है वरन् अत्यंत गम्भीरतापूर्वक इस तथ्य को हृदयंगम किया जाना चाहिए। कल्पना चित्र सिनेमा फिल्म की तरह स्पष्ट उभरने चाहिएँ और उनके साथ इतनी गहरी आस्था का पुट देना चाहिए कि यह चिन्तन, वस्तु स्थिति बनकर मस्तिष्क को पूरी तरह आच्छादित कर ले।

अमृत सन्देश:- हर सुबह नया जन्म हर रात नई मौत : संध्या वंदन, https://youtu.be/sdkyVwe0pnk?si=GN0GZYPcYQlkHxv1

*शौच जाने की आवश्यकता अनुभव हो तो विलम्ब नहीं करना चाहिए और शय्या त्याग कर नित्य कर्म में लग जाना चाहिए। थोड़ी गुंजाइश हो तो उठने से लेकर सोने के समय तक की दिन−चर्या इसी समय बना लेनी चाहिए। यों नित्य कर्म करते हुए भी दिन भर का समय विभाजन कर लेना कुछ कठिन नहीं है। फुर्ती और चुस्ती से काम निपटाये जायं तो कम समय में अधिक काम हो सकता है। सुस्ती और उदासी में ही समय का तो भारी अपव्यय होता है, योजनाबद्ध दिन−चर्या बनाई जाय और उसका मुस्तैदी से पालन किया जाय तो ढेरों समय बच सकता है। एक काम के साथ दो काम हो सकते हैं। जैसे आजीविका उपार्जन के बीच खाली समय में स्वाध्याय तथा मित्रों में परामर्श हो सकता है। 
परिवार, व्यवस्था में मनोरंजन का पुट रह सकता है। निद्रा, नित्य कर्म, आजीविका उपार्जन, स्वाध्याय, उपासना, परिवार व्यवस्था, लोक−मंगल आदि कार्यों में, कौन, कब, किस प्रकार कितना समय देगा यह हर व्यक्ति की अपनी परिस्थिति पर निर्भर है, पर समन्वय इन सब बातों का रहना चाहिए। दृष्टिकोण यह रहना चाहिए कि आलस्य प्रमाद में एक क्षण भी नष्ट न हो और सारी गतिविधियाँ इस प्रकार चलती रहें जिनमें आत्मकल्याण परिवार निर्माण एवं लोक−मंगल के तीनों तथ्यों का समुचित समावेश बना रहे। इन सारे क्रिया−कलापों में आदर्शवादी दृष्टिकोण अपनाया जाय। दुष्प्रवृत्तियों को दुर्भावनाओं को स्थान न मिलने दिया जाय। जहाँ भी जब भी गड़बड़ दिखाई पड़े तब वहीं उसकी रोकथाम की जाय और गिरते कदमों को संभाल लिया जाय। समय, श्रम, चिन्तन एवं धन का तनिक−सा अंश भी अवाँछनीय प्रयोजन में नष्ट न होने दिया जाये इन चारों ही सम्पदाओं का एक−एक कण सदुपयोग में लगता रहे, इस तथ्य पर तीखी दृष्टि रखी जाय, भूलों को तत्काल सुधारते रहा जाय तो उस दिन के —उस जीवन को संतोषजनक रीति से जिया जा सकता है।*

जल्दी सोने और जल्दी उठने का नियम जीवन साधना में रुचि रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को बनाना ही चाहिए। ब्रह्ममुहूर्त का समय अमृतोपम है, उस समय किया गया हर कार्य बहुत ही सफलतापूर्वक संपन्न होता है। अस्तु जो भी अधिक महत्वपूर्ण कार्य प्रतीत होता हो उसे उसी समय में करना चाहिए। सवेरे जल्दी उठना उन्हीं के लिए सम्भव है जो रात्रि को जल्दी सोते हैं। इस मार्ग में जो अड़चने हों उन्हें बुद्धिमतापूर्वक हल करना चाहिए; किन्तु जल्दी सोने और जल्दी उठने की परम्परा तो अपने लिए ही नहीं पूरे परिवार के लिए बना ही लेनी चाहिए।

रात्रि को सोते समय वैराग्य एवं संन्यास जैसी स्थिति बनानी चाहिए। बिस्तर पर जाते ही यह सोचना चाहिए कि निद्रा काल एक प्रकार की मृत्यु विश्राम है। आज का नाटक समाप्त कल दूसरा खेल खेलना है। परिवार ईश्वर का उद्यान है उसमें अपने को कर्तव्य−निष्ठ माली की भूमिका निभानी थी। शरीर, मन, ईश्वरीय प्रयोजनों को पूरा करने के लिए मिले जीवन रथ के दो पहिये हैं, इन्हें सही राह पर चलाना था। धन, प्रभाव, पद यह विशुद्ध धरोहर है उन्हें सत्प्रयोजनों में ही लगाना था। देखना चाहिए कि वैसा ही हुआ या नहीं? जहाँ गड़बड़ी हुई दिखाई दे वहाँ पश्चाताप करना चाहिए और अगले दिन वैसी भूल न होने देने में कड़ी सतर्कता बरतने की अपने आपको चेतावनी देनी चाहिए।

संन्यासी अपना सब कुछ ईश्वर अर्पण करके परमार्थ प्रयोजन में लगता है। सोते समय साधक की वैसी ही मनःस्थिति होनी चाहिए। मिली हुई अमानतें और सौंपी हुई जिम्मेदारियाँ आज ईमानदारी के साथ संभाली गईं। यदि कल वे फिर मिलीं तो फिर उन्हें ईश्वरीय आदेश मान कर संभाला जायगा। अपना स्वामित्व किसी भी व्यक्ति या पदार्थ पर नहीं। यहाँ जो कुछ है सो सब ईश्वर का है। अपना तो केवल कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व भर है। उसे पूरी ईमानदारी और पूरी तत्परता से निवाहते भर रहना अपने लिये पर्याप्त है। परिणाम क्या होते हैं, क्या नहीं—यह परिस्थितियों पर निर्भर है अस्तु सफलता असफलता की चिन्ता न करते हुए हमें आदर्शवादी कर्तव्य परायणता अपनाये रहने मात्र में पूरा−पूरा संतोष अनुभव करना चाहिए।

सोते समय ईश्वर की अमानतें ईश्वर को सौंपने और स्वयं खाली हाथ प्रसन्न चित्त विदा होने की—निद्रा देवी की गोद में जाने की बात सोचनी चाहिए। हलके मन से शाँति पूर्वक गहरी नींद में सो जाना चाहिए। चिन्ता, आशंका, खीज, क्रोध जैसी किसी भी उद्विग्नता को मन पर लाद कर नहीं सोना चाहिए। यह प्रयास शाँत निद्रा लाने की दृष्टि से भी उपयोगी है। साथ ही आत्म-परिष्कार की दृष्टि से भी अति−महत्वपूर्ण है।

मृत्यु को भूलने से ही जीवन संपदा को निरर्थक कामों में गँवाते रहने की चूक होती है, दुष्कर्म बन पड़ते हैं और वासना तृष्णा अहंता की क्षुद्रताओं में समय गुजरता है। यदि यह ध्यान बना रहेगा कि मृत्यु का निमंत्रण कभी भी सामने आ सकता है तो यह ध्यान बना रहेगा कि इस महान अवसर का सही उपयोग किया जाय और पूरा लाभ उठाया जाय। निद्रा की तुलना मृत्यु से करते रहने पर मौत का भय मन से निकल जाता है और अलभ्य अवसर के सदुपयोग की बात चित्त पर छाई रहती है।

प्रातः उठते समय नये दिन की मान्यता—जीवनोद्देश्य की स्पष्टता तथा सुव्यवस्थित दिनचर्या बनाने का कार्य संपन्न करना चाहिए। रात्रि को सोते समय मृत्यु का चिन्तन, आत्म, निरीक्षण, पश्चाताप और कल के लिए सतर्कता—वैरागी एवं संन्यासी जैसी मालिकी त्यागने की हलकी फुलकी मनः स्थिति लेकर शयन किया जाय। दिन भर हर घड़ी चुस्ती फुर्ती मुस्तैदी और दिलचस्पी के साथ प्रस्तुत कार्यों को निपटाया जाय। भीतर दुर्भावनाओं और बाहरी दुष्प्रवृत्तियों के उभरने का अवसर आते ही उनसे जूझ पड़ा जाय और निरस्त करके ही दम लिया जाय। यह है वह जीवन साधना जिसमें चौबीसों घन्टे निमग्न रह कर और इसी जीवन में स्वर्ग जैसे उल्लास आनन्द और मुक्ति जैसे आनन्द का हर घड़ी अनुभव करते रहा जा सकता है।

✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 
📖 अखण्ड ज्योति 1976 जनवरी

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बुधवार, 29 अप्रैल 2026

👉 निराशा से बचने का उपाय-कम कामनाएं (भाग 1)

“मनुष्य कुछ भी नहीं है, वह एक चलता फिरता धूल-पिण्ड है, उसकी शक्तियाँ सीमित हैं। वह नियति के हाथ की कठपुतली है, भाग्य का खिलौना और हर समय काल का कवल है।”

इस प्रकार के निषेधात्मक एवं निराशापूर्ण विचार रखने वाले निःसन्देह धूल-पिंड भाग्य की कठपुतली और जीवित अवस्था में भी मृतक ही होते हैं। जो कायर और निराशावादी है वह अभागा ही है। जहाँ संसार में लोग कंधे से कंधा भिड़ाकर उन्नति और विकास के लिये निरंतर संघर्ष कर रहे हैं, वहाँ निराशावादी विषाद का रोग पाले हुए दुनिया के एक कोने में पड़े हुए मक्खियाँ मारा करते हैं। समाज की निरपेक्षता तथा संसार की नश्वरता को कोसा करते हैं। मनुष्य की इस दशा को दुर्भाग्य नहीं तो और क्या कहा जायेगा।

मनुष्य-योनि में आकर जिसने जीवन में कोई विशेष कार्य नहीं किया, किसी के कुछ काम नहीं आया, उसने मनुष्य शरीर देने वाले उस परमात्मा को लज्जित कर दिया। अपने में अनन्त शक्ति होने पर भी दीनतापूर्ण जीवन बिताना, दयनीयता को अंगीकार करना अपने साथ घोर अन्याय करना है। मनुष्य जीवन रोने कलपने के लिए नहीं, हँसते मुस्कराते हुए अपना तथा दूसरों का उत्कर्ष करने के लिए है।

मनुष्य जीवन के लिए निराशा अस्वाभाविक है। यह एक प्रकार का मानसिक रोग है जो मनुष्य को हीन विचारों, जीवन में आई कठिनाइयों और असफलता के कारण लग जाता है। इच्छाओं की पूर्ति न होने, मनचाही परिस्थितियाँ न पाने से मनुष्य में संसार के प्रति, अपने प्रति तथा समाज के प्रति घृणा हो जाती है। बार-बार असफलता पाने से मनुष्य का साहस टूट जाता है और वह निराश होकर बैठ जाता है। जीवन के प्रति उसका कोई अनुराग नहीं रह जाता।

निराशाग्रस्त मनुष्य दिन-रात अपनी इच्छाओं कामनाओं और वाँछाओं की आपूर्ति पर आँसू बहाता हुआ उनका काल्पनिक चिन्तन करता हुआ तड़पा करता है। एक कुढ़न, एक त्रस्तता एक वेदना हर समय उसके मनों-मन्दिर को जलाया करती है। बार-बार असफलता पाने से मनुष्य का अपने प्रति एक क्षुद्र भाव बन जाता है । उसे यह विश्वास हो जाता है कि वह किसी काम के योग्य नहीं है। उसमें कोई ऐसी क्षमता नहीं है, जिसके बल पर वह अपने स्वप्नों को पूरा कर सके, सुख और शान्ति पा सके।

*.....क्रमशः जारी*
✍️ *परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य* 
📖 *अखण्ड ज्योति 1966 मार्च

शनिवार, 25 अप्रैल 2026

👉 वाणी का दुरुपयोग मत कीजिए (भाग १)

विश्व का संचालन करने वाली सार्वभौम शक्तियों का स्वर कभी सुनाई नहीं पड़ता और वे चुपचाप अपना कार्य करती रहती हैं, संसार में ऋतुयें आती हैं, मौसम बदलते हैं, ग्रह नक्षत्र अपनी-अपनी परिधि में चक्कर लगाते रहते हैं। सृजन पोषण नाश की लीला होती रहती है। संसार में अनेकों उथल-पुथल हलचलें होती हैं, किन्तु जिस शक्ति की प्रेरणा से यह सब होता रहता है उसका स्वर कभी सुनाई नहीं देता।

इंजन को गति देने वाली भाप चुपचाप बड़ी मुस्तैदी के साथ अपना काम करती है। लम्बी चौड़ी भारी भरकम रेलगाड़ी को मंजिल तक पहुँचाती है किन्तु उसकी आवाज कभी नहीं सुनाई पड़ती। व्यर्थ में बाहर निकलने वाली भाप अधिक शोर मचाती है।

मौन में अजेय शक्ति है। मौन से समस्त शक्तियों का केन्द्रीय करण होता है। जीवन के बाह्य पटल पर यत्र-तत्र बिखेरी हुई जीवनी-शक्ति मौन के बाँध में जब एकत्रित करली जाती है तो वह उसी तरह शक्ति शाली, घनीभूत हो जाती है जैसे बाँध में रोकी गई नदी। शक्ति और क्षमतायें सदैव मौन की गोद में ही पलती हैं। संसार के महापुरुषों ने जो भी महत्वपूर्ण काम किए हैं वे सब ठण्डे दिल और ठण्डे दिमाग से ही सम्पन्न हुए हैं। किसी भी महान् कार्य के सम्पादन के लिए समस्त अन्तर एवं बाह्य प्रवृत्तियों को एकत्रित करके उन्हें लक्ष्य पर लगाना पड़ता है। महत्वपूर्ण कार्य मौन से ही सम्भव होता है।

भौतिक विज्ञान का नियम है, जो वस्तु या जिस मशीन के पुर्जों में संघर्ष जितना कम होगा, वे जितनी समस्वरता से कार्य करेंगे उतनी ही वह मशीन टिकाऊ एवं शक्ति शाली होगी। मौन भी मनुष्य के जीवन में समस्वरता प्रदान कर उसे अधिक टिकाऊ प्रभावशाली महत्वपूर्ण बना देता है। जिस मनुष्य के अन्तर बाह्य जीवन में और आदर्शों में पर्याप्त सामञ्जस्य होगा, किसी तरह का संघर्ष, गतिरोध न होगा, वह व्यक्ति महत्वपूर्ण, शक्ति शाली सिद्ध होगा और सन्तुलित होगा। यह सब मौन की ही देन है।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1964

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शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

👉 आत्मा-विश्वास की महती शक्ति सामर्थ्य (भाग 3)

आत्मनिषेधी से सारी शक्तियाँ सारे देव-तत्व और सारी सम्भावनायें एक साथ रुक जाती हैं। वह अकेला एकाकी आत्म-बहिष्कृत स्थिति में डूबते व्यक्ति की भाँति व्यर्थ ही हाथ-पैर मारता, थकता और अन्त में अविज्ञात अतल के गहन अन्धकार में डूब जाता है।

आत्मनिषेधी का दुर्भाग्य उसके अन्दर अशुभ एवं नकारात्मक संकेत बनकर किसी प्रेत-पुकार की तरह गूँजता रहता है। उसके मलिन मानस से ध्वनि उठती रहती है कि- ‘मैं यह काम नहीं कर सकता मुझमें उसे करने की शक्ति नहीं है। मेरे पास साधनों का अभाव है। समय मेरे अनुकूल नहीं है। मेरी योग्यता कम है। मेरे भाग्य में सफलता का श्रेय नहीं लिखा गया है। इस प्रकार के नकारात्मक संकेत सुन-सुनकर निर्जीव निर्बलतायें जीवित हो उठती हैं। निराशा, निरुत्साह और भय की भावनायें मानस में खेलने-कूदने और द्वन्द्व मचाने लगेंगी। तन-मन और मस्तिष्क की सारी शक्ति शिथिल पड़ जाती है। अन्तःकरण अवसन्न होकर निष्क्रिय हो जाता है। शरीर ढीला और मन मुरदार हो जाता है। इस प्रकार से भार आनत मनुष्य संसार में कुछ भी तो नहीं कर सकता, सिवाय इसके कि वह हारा, पिछड़ा और हताश-सा आगे बढ़ते हुए लोगों को ईर्ष्या से देखे और मन ही मन दहता-सहता हुआ जिन्दगी के दिन पूरे करे।

एकाग्रता की शक्ति और उसका सुनियोजन | Ekagrata Ki Shakti Aur Uska Niyojan | 

तीसरे प्रकार के जो संशयी व्यक्ति होते हैं, उनकी दशा तो और भी खराब होती है। आत्म-विश्वासी जहाँ सराहनीय, आत्मनिषेधी दयनीय होता है, वहाँ आत्म संशयी उपहासास्पद होता है। वह किसी भी पुरुषार्थ के सम्बन्ध में ‘हाँ-न’ के झूले में झूलता रहता है। अभी उसे यह उत्साह होता है कि वह अमुक कार्य कर सकता है, लेकिन कुछ ही देर बाद उसका संशय बोल उठता है- हो सकता है यह काम मुझसे पूरा न हो। शायद मेरी क्षमतायें और योग्यतायें इस काम के अनुरूप नहीं हैं। लेकिन वह अपने इस विचार पर भी देर तक टिका नहीं रह पाता। सोचता है काम करके तो देखा जाए शायद कर लूँ। काम हाथ में लेता है तो हाथ-पैर फूल जाते हैं, अपने अन्दर एक रिक्तता और अयोग्यता अनुभव करने लगता है। भयभीत होकर काम छोड़ देता है। फिर बलात् उसमें लगता, थोड़ा-बहुत करता और इस भाव से उसे अधूरा छोड़ देता है कि हो नहीं पा रहा है बेकार समय नष्ट करने से क्या लाभ।

इस प्रकार संशयी व्यक्ति जीवन भर यही करता रहता है। कामों का साहस नहीं करता और यदि उनमें हाथ डालता है तो कभी पूरा नहीं कर पाता। इसी प्रकार के तर्क-वितर्क और ऊहापोह में उसका सारा जीवन व्यर्थ चला जाता है। शेखचिल्लियों की तरह अस्थिर मन, मस्तिष्क और विश्वास वाले संसार में न तो आज तक कुछ कर पाए हैं और न आगे कुछ कर सकते हैं। उपहासास्पद स्थिति में ही संसार से विदा हो जाते है।

*.....क्रमशः जारी*
📖 अखण्ड ज्योति मई 1970

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गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

👉 आत्मा-विश्वास की महती शक्ति सामर्थ्य (भाग 2)

आत्मा अनन्त शक्तियों का भण्डार होती है। संसार की ऐसी कोई भी शक्ति और सामर्थ्य नहीं, जो इस भंडार में न होती हो। हो भी क्यों न? आत्मा परमात्मा का अंश जो होती है। सारी शक्तियाँ, सारी सामर्थ्य और सारे गुण उस एक परमात्मा में ही आते हैं। अस्तु अंश आत्मा में अपने अंशी की विशेषतायें होनी स्वाभाविक हैं। आत्मा में अपने अंशी की विशेषतायें होनी स्वाभाविक हैं। आत्मा में विश्वास करना, परमात्मा में विश्वास करना है। जिसने आत्मा के माध्यम से परमात्मा में विश्वास कर लिया, उसका सहारा ले लिया, उसे फिर किस बात की कमी रह सकती है। ऐसे आस्तिक के सम्मुख शक्तियाँ अनुचरों के समान उपस्थित रहकर अपने उपयोग की प्रतिक्षा किया करती हैं।

किन्तु आत्मा का शक्ति-कोश अपने आप स्वयं नहीं खुलता। उसे खोलना पड़ता है। इस उद्घाटन की कुँजी है शुभ संकेत। अर्थात् ऐसे विचार जिनका स्वर हो कि- “मैं अमुक कार्य कर सकता हूँ।” मुझमें उसे पूरा कर सकने का साहस है, उत्साह है और शक्ति भी है। मेरा पुरुषार्थ से अनुराग है, उत्साह है और उद्योग करना मेरा प्रियतम वासना है। विघ्न-बाधाओं से मुझे कोई भय नहीं, क्योंकि संघर्ष को मैं जीवन की एक अनिवार्य प्रतिक्रिया मानता हूँ। मैं मनुष्य हूं। मेरे जीवन का एक निश्चित उद्देश्य है। उसे पूरा करने में अपना तन, मन और जीवन लगा दूँगा। सफलता की प्राप्ति आसक्ति और असफलता के प्रति भय मेरी वृत्ति के अवयव नहीं हैं। मैं भगवान कृष्ण के अनासक्त कर्मयोग का अनुयायी हूँ। सफलता मुझे मदमत्त और असफलता मुझे निरस्त नहीं कर सकती। मुझे ज्ञान है कि लक्ष्य की प्राप्ति और उद्देश्य की पूर्ति सफलता, असफलता के सोपानों पर चलकर ही हो सकती है। मैं अखण्ड आत्म-विश्वासी हूँ। मैं यह कार्य अवश्य कर सकता हूँ और निश्चय ही करके रहूँगा।”

आत्मविश्वास का क्या अर्थ है? | Aatmvishwas Ka Kya Arth Hai? | https://youtu.be/Jt2fHj3r1Ug?si=2-cX4kMksMPdv_so

इस प्रकार के शुभ और सृजनात्मक संकेत देते रहने से आत्मा का कमल-कोश खुल जाता है और उसमें सन्निहित शक्तियाँ एकत्र होकर व्यक्ति की क्रिया में समाहित हो जाती हैं। वह अपने अक्षय, उत्साह साहस और आशा का अनुभव करने लगती हैं। और कदम-कदम पर लक्ष्य स्पष्ट से स्पष्टतर और दूर से सन्निकट होता दिखलाई देने लगता है। शुभ संकेतों से उद्बुद्ध आत्म-विश्वास केवल आत्मा तक ही सीमित नहीं रहता, वह क्रियाओं, प्रक्रियाओं और सिद्धि तक फैल जाता है।

इसके विपरीत आत्मनिषेधी व्यक्ति अपनी सारी शक्तियों को नकारात्मक बनाकर नष्ट कर लेता है। आत्मनिषेधी आसुरी वृत्ति है और आत्म विश्वास, देव वृत्ति आत्मा की शिव शक्ति आसुरी वृत्ति वाले का सहयोग कर भी किस प्रकार सकती है। जो नास्तिक बनकर परमात्मा को छोड़ देता है, परमात्मा उसे उससे पहले ही छोड़ देता है। जिसे परमात्मा ने छोड़ दिया, प्रभु जिससे विमुख हो गया, उसके लिए लोक-परलोक, आकाश-पाताल कहीं भी कल्याण की सम्भावना किस प्रकार हो सकती है। ऐसे नास्तिकवादी और आत्मनिषेधी की नाव भवसागर के बीच डूब जाना निश्चित है।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति मई 1970


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👉 आत्मा-विश्वास की महती शक्ति सामर्थ्य (भाग 1)

संसार में प्रायः तीन प्रकार के व्यक्ति पाये जाते हैं। एक आत्म विश्वासी, दूसरे आत्मनिषेधी और तीसरे मशयी। अपने इन्हीं प्रकारों के कारण एक वर्ग अपने उद्योग और पुरुषार्थ के बल पर समाज पर छाये रहते हैं, अपना स्पष्ट स्थान बनाकर जीवन को सार्थक बनाते और समय के पृष्ठों पर अपनी छाप छोड़ जाते हैं।

दूसरा वर्ग अपने प्रकार के कारण निराशा, निरुत्साह और निःसाहस के कारण रोते-झींकते, भाग्य और विधाता को कोसते हुए जीते और अन्त में एक निस्सार और निरर्थक मौत मरकर चले जाते हैं।

तीसरा वर्ग अपने प्रकार के कारण तर्कों, वितर्कों, में हाँ-ना, क्रिया-निष्क्रियता में अपना बहुमूल्य समय और शक्ति नष्ट करते हुए कर रहा हूँ-के भ्रम में कुछ भी न करके एक असन्तोष लेकर संसार से चले जाते हैं। उनकी अपूर्णता उन्हें निष्क्रियता का दोष दिलाने के सिवाय कोई उपहार नहीं दिला पाती।

संसार के समस्त अग्रणी लोग आत्म-विश्वासी वर्ग के होते हैं। वे अपनी आत्मा में, अपनी शक्तियों में आस्थावान रहकर कोई भी कार्य कर सकने का साहस रखते हैं और जब भी जो काम अपने लिए चुनते हैं, पूरे संकल्प और पूरी लगन से उसे पूरा करके छोड़ते हैं। वे मार्ग में आने वाली किसी भी बाधा अथवा अवरोध से विचलित नहीं होते हैं। आशा, साहस और उद्योग उनके स्थायी साथी होते हैं। किसी भी परिस्थिति में वे इनको अपने पास से जाने नहीं देते।

अमृतवाणी:- श्रद्धा और विश्वास : भाग 1 | Pt Shriram Sharma Acharya, 

आत्म-विश्वासी सराहनीय कर्मवीर होता है। वह अपने लिए ऊँचा उद्देश्य और ऊँचा आदर्श ही चुनता है। हेयता, हीनता अथवा निकृष्टता उसके पास फटकने नहीं पाती। फटक भी कैसे सकती है? जब आत्मविश्वास के बल पर वह ऊँचे से ऊँचा कार्य कर सकने का साहस रखता है और कर भी सकता है तो फिर अपने लिए निकृष्ट आदर्श और पतित मार्ग क्यों चुनेगा? आत्मविश्वासी जहाँ अपने लिए उच्च आदर्श चुनता है, वहाँ उच्च कोटि का पुरुषार्थ भी करता है। वह अपनी शक्तियों और क्षमताओं का विकास करता, शुभ संकेतों द्वारा उनमें प्रखरता भरता और यथायोग्य उनका पूरा उपयोग करता है। नित्य नये उत्साह से अपने कर्तव्य पथ पर अग्रसर होता, नए-नए प्रयत्न और प्रयोग करता, प्रतिकूलताओं और प्रतिरोधों से बहादुरी के साथ टक्कर लेता और अन्त में विजयी होकर श्रेय प्राप्त कर ही लेता है। पराजय, पलायन और प्रशमन से आत्म-विश्वासी का कोई सम्बन्ध नहीं होता, संघर्ष उसका नारा और कर्त्तव्य उसका शस्त्र होता है। निसर्ग ऐसे अविबन्ध शूरमाओं को ही विजय-मुकुट पहनाया करती है।

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👉 उत्तरदायित्वों को निभायें, महान बनें

उत्तरदायित्वों को जो बोझ मानकर उपेक्षा करता है। उस अच्छे परिणामों से वंचित रह जाना पड़ता है। प्रत्येक मानव की आजीविका कमाने में शर्म, संकोच ...