मंगलवार, 5 मई 2026

👉 उपासना में इन्द्रिय-निग्रह की आवश्यकता (भाग 1)

मानव जीवन में उपासना का बड़ा महत्व है। उपासना से सद्गुणों का विकास होता है और यावत् परमात्मा-दशा प्राप्त होती है। सद्गुणों के विकास का सबसे प्रधान साधन है-गुणी व्यक्तियों की आदर, भक्ति, पूजा, सेवा और गुणों की आराधना। आराधना और उपासना एक ही है।

उपासना का अर्थ है समीप बैठना, रहना और वह दो तरह से होता है (1) परमात्मा या सद्गुरु के पास बैठना और (2) आत्मा या आत्मीय गुणों के पास बैठना। वास्तव में हम इन दोनों तत्वों से बहुत दूर बैठे हुए हैं। परमात्मा को तो हम भूल से गये हैं, कभी दुःख-दर्द के समय ही उसका स्मरण आता है। यदि उसके नाम की माला भी फेरते हैं तो हमारा मन इधर उधर भटकता रहता है इसलिए हम परमात्मा के समीप नहीं पहुँच पाते। इसी प्रकार सद्गुरुओं के पास पहले तो हम अधिक समय बैठते ही नहीं हैं, और बैठते हैं तो भी मन घर और बाहर के कामों में लगा रहता है। उनकी वाणी को हम जीवन में स्थान नहीं देते, उनकी साधना से हम प्रेरणा ग्रहण नहीं करते। उनकी उपासना करते हैं, यह कह ही कैसे सकते हैं? आत्मा से भी हम बहुत दूर हैं। उसके दर्शन एवं अनुभव का प्रयत्न नहीं करते। शरीर में ही आत्म बुद्धि की हुई है। इसलिए आत्मा की उपासना हम नहीं कर रहे हैं यह निश्चित है।

उपासना और वासना में विरोध है अतः जहाँ तक तुम्हारा मन वासनाओं में भटकता है वहाँ तक सच्ची उपासना हो नहीं पाती बाहरी दिखावा तो ढोंग है उपासना नहीं।
‘उपासना’ में उपास्य के साथ तल्लीन हो जाने की परमावश्यकता है। जब तक वह स्थिति प्राप्त नहीं होती, साधक का चरम विकास नहीं हो सकता और उस स्थिति को प्राप्त करने के लिए इन्द्रिय निग्रह की अत्यंत आवश्यकता है। जब तक इन्द्रिय के विषय भोगों में हमारा मन लगा रहता है तन जुड़ा रहता है-तब तक उपासना में तल्लीनता नहीं आ सकती। इसीलिये सभी धर्मों में इन्द्रिय दमन को महत्व दिया गया है। इन्द्रियों के बहिर्मुखी होने से हमारा मन चंचल रहता है। कभी सुन्दर पदार्थों या रूप के दर्शन में मन ललचाता है, कभी मधुर गायन को सुनने के लिए हम बड़े उत्सुक हो जाते हैं, कभी विविध रसों का आस्वादन करने को जिह्वा की लोलुपता नजर आती हैं। कभी सुगन्धित पदार्थों के प्रति आशक्ति देखी जाती है और कभी कोमल वस्तुओं के स्पर्श के लिए मन ललचा उठता है। इस तरह पाँचों इन्द्रियों के तेईस विषयों में मन भटकता रहता है। तब उपासना में तल्लीनता आयेगी कैसे?

जैन धर्म में संयम और तप को बहुत अधिक महत्व दिया गया है और इसका प्रधान कारण इन्द्रियों का निरोध करना ही है। संयम के सत्रह प्रकारों में पाँच इन्द्रियों का दमन सम्मिलित है ही, और तप का अर्थ भी है-इच्छाओं का निरोध। इसमें भी इन्द्रिय दमन की प्रधानता है। पाँचों इन्द्रियों में एक एक इन्द्रिय पर भी अंकुश न रहने से कितना दारुण दुख उठाना पड़ता है, इसके विषय में हाथी, हरिण, मच्छ आदि के दृष्टाँत दिये गये हैं और यह कहा गया है कि जब एक एक इन्द्रिय की विषयासक्ति का परिणाम दारुण है, तो जिनकी पाँचों इन्द्रियाँ छूट के साथ विषय-भोगों में लगी हुई हैं, उनका क्या हाल होगा ? यह तो प्रत्येक व्यक्ति स्वयं सोचले। ‘इन्द्रिय-पराजय-शतक’ नामक प्राचीन प्राकृत ग्रन्थ में इसका बड़े सुन्दर रूप में विवेचन एवं ज्ञान उपदेश प्राप्त होता है। उसकी कुछ गाथाओं का हिन्दी पद्यानुवाद बुद्धू लाल श्रावक का बनाया हुआ नीचे दिया जा रहा है। इसके प्रारम्भ में ही कहा गया है कि वही शूरवीर और पंडित प्रशंसनीय है, जिसके चरित्र-धर्म को इन्द्रिय रूपी चोरों ने नहीं लूटा।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति 1960 फरवरी

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👉 अपने दृष्टिकोण को परिमार्जित कीजिए। (भाग 1)

अधिकाँश व्यक्ति इस संसार में ऐसे हैं जो अपने आपको बहुत, हैरान, परेशान, अभागा और संकट ग्रस्त मानते हैं। इनकी मनोव्यथा सुनी जाय और ये जी खोल कर अपनी अन्तर्वेदना सुनावें तो ऐसा लगता है मानो भगवान् ने संसार का सारा दुख इन्हीं के मत्थे पटक दिया है, बेचारे रात दिन दुखी दशा पर खिन्न रहते हैं, रात-रात भर रोते रहते हैं, नींद नहीं आती। चिन्ता और वेदना में घुलते रहते हैं। कई बार तो ऐसा होता देखा गया है कि दुखी होकर वे आत्महत्या तक कर लेते हैं। कई घर छोड़ कर चले जाते हैं, साधु बाबा जी बन जाते हैं। उन्हें लगता है कि शायद ऐसा करने से उनकी अन्तर्व्यथा दूर हो जायगी।

संसार में कोई व्यक्ति ऐसा नहीं जिसे सब सुख हों, किसी बात का अभाव न हो, सारी परिस्थितियाँ मनोनुकूल ही हों, कोई कष्ट न हो, कभी असफलता न मिले, कोई जिसका विरोधी न हो, ऐसा मनुष्य इस पृथ्वी पर ढूंढ़े न मिलेगा। जहाँ अनेक सुख साधन मनुष्य को भगवान ने दिये हैं वहाँ कुछ थोड़े अभाव रखे हैं। विवेकशील व्यक्ति जीवन में उपलब्ध सुख सुविधाओं का अधिक चिन्तन करते हैं और उन उपलब्धियों पर संतोष प्रकट करते हुए प्रसन्न रहते हैं और उस कृपा के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते रहते हैं। थोड़े से अभाव एवं कष्ट उन्हें वैसे ही कौतूहल वर्धक लगते है जैसे माता अपने सुन्दर बालक के माथे पर काजल की बूँद लगा कर “डिढौरा” बना देती है कि कहीं ‘नजर’ न लग जाय।

इसके विपरीत अनेकों लोग उपलब्ध अनेकों सुख साधनों को तुच्छ मानते हैं और जो थोड़े से कष्ट एवं अभाव हैं उन्हें ही पर्वत तुल्य मान कर अपने आपको भारी विपत्तिग्रस्त अनुभव करते हैं। ऐसे लोग निरन्तर असन्तुष्ट रहते हैं, अपने सभी सम्बन्धित लोगों पर दोषारोपण करते रहते हैं ईश्वर को गाली देते हैं कि उसने हमें अमुक अभाव क्यों दिया? भाग्य को कोसते हैं कि वह इतना दुर्भाग्यपूर्ण क्यों है? माता-पिता और अभिभावक को बुरा कहते हैं कि उन्होंने अमुक साधन नहीं जुटाये जिससे हम उन्नतिशील स्थिति में होते? मित्रों और अफसरों को कोसते हैं कि उन्होंने उन्नति के लिए असाधारण सहयोग देकर बड़ा क्यों नहीं बना दिया? परिस्थिति,ग्रहदशा,दुनिया की बेवफाई, कलियुग का जमाना आदि जो भी उनकी समझ में आता है उसे बुरा भला कहते हैं और अपनी कठिनाईयों का दोष उनके मत्थे मढ़ते रहते हैं।

ऐसे लोगों की अधिकाँश मानसिक शक्ति इस रोने झींकने में ही चली जाती है। उनके बहुमूल्य समय का बहुत सा भाग इस कोसते रहने की प्रक्रिया में नष्ट हो जाता है। जिस समय का उपयोग वे अपनी कठिनाइयों को पार करने का उपाय सोचने और प्रयत्न करने में कर सकते थे उसको वे अपनी खिन्नता बनाये रखने और बढ़ाने में करते हैं। यह तरीका अपने समय और बल को नष्ट करने का ही है इसमें लाभ कुछ नहीं, उलटे उन कीमती शक्तियों के नष्ट होने की हानि ही है जिन्हें यदि बर्बाद होने से बचा लिया गया होता तो वे कठिनाईयों का एक बहुत बड़ा भाग आसानी से हल कर देतीं।

.....क्रमशः जारी
📖 अखण्ड ज्योति 1960 अप्रैल

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 05 May 2026


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👉 प्रेरणादायक प्रसंग 05 May 2026


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👉 उपासना में इन्द्रिय-निग्रह की आवश्यकता (भाग 1)

मानव जीवन में उपासना का बड़ा महत्व है। उपासना से सद्गुणों का विकास होता है और यावत् परमात्मा-दशा प्राप्त होती है। सद्गुणों के विकास का सबसे ...