शनिवार, 27 जनवरी 2018

👉 अपने सुख के लिए दूसरों के दुःख नहीं

🔶 सेवा ग्राम में गाँधी जी के पास एक कुष्ठ रोगी परचुरे शास्त्री रहते थे। उनके कुष्ठ रोग के लिए किसी ने दवा बताई कि- एक काला साँप लेकर हाँडी में बंद किया जाय फिर उस हाँडी को कई घंटे उपलों की आग में जलाया जाय। जब साँप की भस्म हो जाय तो उसे शहद में मिलाकर खाने से कुष्ठ अच्छा हो जायेगा। गाँधी जी ने पूछा- ‘क्या आप ऐसी दवा खाने को तैयार है?’ शास्त्री जी ने उत्तर दिया- बापू! यदि साँप की जगह मुझे ही हांडी में बन्द करके जला दिया जाय तो क्या हानि है? साँप ने क्या अपराध किया है कि उसे इस प्रकार जलाया जाय?

परचुरे शास्त्री की वाणी में उस दिन मानवता की आत्मा बोली थी। वे लोग जो पशु पक्षियों का माँस खाकर अपना माँस बढ़ाना चाहते हैं, इस मानवता की पुकार को यदि अपने बहरे कानों से सुन पाते तो कितना अच्छा होता।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 Jan 2018

👉 आज का सद्चिंतन 27 Jan 2018


👉 गायत्री की असंख्य शक्तियाँ

🔶 संसार में जितना भी वैभव, उल्लास दिखाई पड़ता है या प्राप्त किया जाता है, वह शक्ति के मूल्य पर ही मिलता है। जिसमें, जितनी क्षमता होती है, वह उतना ही सफल होता और वैभव उपार्जित कर लेता है। जीवन में शक्ति का इतना महत्त्वपूर्ण स्थान है कि उसके बिना कोई आनंद नहीं उठाया जा सकता, यहाँ तक कि अनायास उपलब्ध हुए भोगों को भी नहीं भोगा जा सकता। इन्द्रियों में शक्ति रहने तक ही विषय भोगों का सुख प्राप्त किया जा सकता है। यदि ये किसी प्रकार अशक्त हो जाएँ, तो आकर्षक से आकर्षक भोग भी उपेक्षणीय और घृणास्पद लगते हैं। नाड़ी संस्थान की क्षमता क्षीण हो जाय, तो शरीर का सामान्य क्रियाकलाप भी ठीक तरह नहीं चल पाता। मानसिक शक्ति घट जाने पर मनुष्य की गणना विक्षिप्तों और उपहासास्पदों में होने लगती है। धन-शक्ति न रहने पर दर-दर का भिखारी बनना पड़ता है। मित्र शक्ति न रहने पर एकाकी जीवन सर्वथा निरीह और निरर्थक लगने लगता है। आत्म-बल न होने पर प्रगति के पथ पर एक कदम भी यात्रा नहीं बढ़ती। जीवनोद्देश्य की पूर्ति आत्म-बल से रहित व्यक्ति के लिए सर्वथा असंभव ही है।
  
🔷 भारतीय मनीषियों ने विभिन्न शक्तियों को देवनामों से संबोधित किया है। ये समस्त देव-शक्तियाँ उस परम शक्ति की किरणें ही हैं, उनका अस्तित्व इस महत्तत्त्व के अंतर्गत ही है। विद्यमान सभी देव शक्तियाँ उस महत्तत्त्व के ही स्फुलिंग हैं, जिसे अध्यात्म की भाषा में गायत्री कहकर पुकराते हैं। जैसे जलते हुए अग्रिकुण्ड में से चिनगारियाँ उछलती हैं, उसी प्रकार विश्व की महान् शक्ति सरिता गायत्री की लहरें उन देव शक्तियों के रूप में देखने में आती हैं। संपूर्ण देवताओं की सम्मिलित शक्ति को गायत्री कहा जाय, तो यह उचित होगा।
  
🔶 हमारे पूर्वजों ने चरित्र को उज्ज्वल तथा विचारों को उत्कृष्ट रखने के अतिरिक्त अपने व्यक्तित्व को महानता के शिखर तक पहुँचाने के लिए उपासना का मोहात्मक संबल गायत्री महामंत्र को पकड़ा था और इसी सीढ़ी पर चढ़ते हुए वे देव पुरुषों में गिने जाने योग्य स्थिति प्राप्त कर सके थे। देवदूतों, अवतारों, गृहस्थियों, महिलाओं, साधु ब्राह्मïणों, सिद्ध पुरुषों की ही नहीं, साधारण सद्गृहस्थों की उपास्य भी गायत्री ही रही है और उस अवलम्बन के आधार पर न केवल आत्म-कल्याण का श्रेय साधन किया है, वरन् भौतिक सुख-संपदाओं की सांसारिक आवश्यकताओं को भी आवश्यक मात्रा में उपलब्ध किया है।

🔷 संसार में कुछ भी प्राप्त करने की एकमेव महाशक्ति ने इस निखिल ब्रह्मण्ड में अपनी अनंत शक्तियाँ बिखेर रखी हैं। उनमें से जिनकी आवश्यकता होती है, उन्हें मनुष्य अपने प्रबल पुरुषार्थ द्वारा प्राप्त कर सकता है। विज्ञान द्वारा प्रकृति की अनेकों शक्तियों को मनुष्य ने अपने अधिकार में कर लिया है। विद्युत्, ताप, प्रकाश, चुम्बक, शब्द, अणु- शक्ति जैसी प्रकृति की कितनी ही अदृश्य और अविज्ञात शक्तियों को उसने ढूँढ़ा और करतलगत किया है; पर ब्रह्म की चेतनात्मक शक्तियाँ भी कितनी ही हैं, उन्हें आत्मिक प्रयासों द्वारा करतलगत किया जा सकता है। मनुष्य का अपना चुम्बकत्व असाधारण है। वह उसी क्षमता के सहारे भौतिक जीवन में अनेकों को प्रभावित एवं आकर्षित करता है। उसी आधार पर वह साधन जुटाता, सम्पन्न बनता और सफलताएँ उपलब्ध करता है। इसी चुम्बक शक्ति के सहारे वह व्यापक ब्रह्म-चेतना के महासमुद्र में से उपयोगी चेतन तत्त्वों को आकर्षित एवं करतलगत कर सकता है।
  
🔶 इन शक्तियों में सर्वप्रमुख और सर्वाधिक प्रभावशाली प्रज्ञा-शक्ति है। प्रज्ञा की अभीष्ट मात्रा विद्यमानï हो, तो फिर और कोई ऐसी कठिनाई शेष नहीं रह जाती, जो नर को नारायण, पुरुष को पुरुषोत्तम बनाने से वंचित रख सके। श्रम और मनोयोग तो आत्मिक प्रगति में भी उतना ही लगाना पर्याप्त होता है, जितना की भौतिक समस्याएँ हल करने में आये दिन लगाना पड़ता है। महामानवों को उससे अधिक कष्ट नहीं सहने पड़ते, जितने कि सामान्य जीवन में आये दिन हर किसी को सहने पड़ते हैं। लोभ और मोह की पूर्ति में जितना पुरुषार्थ और साहस करना पड़ता है, उससे कम में ही उत्कृष्ट आदर्शवादी जीवन का निर्माण-निर्धारण किया जा सकता है। मूल कठिनाई एक ही है- प्रज्ञा प्रखरता की। यदि वह प्राप्त हो सके, तो जीवन में ऋद्धि-सिद्धियों की उपलब्धियों से भर देने वाली संभावनाओं को प्राप्त कर सकने में अब कोई कठिनाई शेष नहीं रह गई।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 निरीक्षण और नियंत्रण आदतों का भी करें (भाग 1)


🔷 क्रियाशीलता का अपना महत्व है। श्रम और पुरुषार्थ की महिमा सर्वविदित है। आलस्य और निष्क्रियता की सर्वत्र निन्दा की गई है। इतने पर भी यह सोचना शेष ही रह जाता है कि हमारी क्रियाशीलता निरर्थक अथवा विकृत न हो। सुनियोजित और सुव्यवस्थित श्रम ही सत्परिणाम उत्पन्न करता है। निरर्थक और उद्देश्य रहित चेष्टाएँ न केवल उपहासास्पद होती हैं वरन् अपने व्यक्तित्व का वजन घटाती है।

🔶 कुछ लोगों को शरीर के विभिन्न अंगों से विभिन्न प्रकार की निरर्थक क्रिया करने की आदत होती है। इसे मानसिक अस्त-व्यस्तता ही कहना चाहिए। बिना विचारे काम करने की ऐसी निष्प्रयोजन क्रियाएँ जिनके करने की कोई आवश्यकता या उपयोगिता नहीं है लगातार या बार-बार करना यह सिद्ध करता है कि मस्तिष्क के साथ शारीरिक क्रिया-कलाप का सम्बन्ध टूट गया। काम करने से पूर्व उसके प्रयोजन को ध्यान में रखने की व्यवस्था असम्बद्ध हो गई। यह बड़ी उपहासास्पद और दयनीय स्थिति है।

🔷 कुर्ते या कोट के सामने वाले बटन मरोड़ना, उंगलियां चटकाना, जमाइयाँ लेते रहना, आँखें मिचकाना, बैठे-बैठे पैर हिलाना, हाथ में कोई चीज लेकर उसे मरोड़ना, खटखटाना, पेन्सिल को मुँह में डालना, पिन से कान या दाँत कुरेदना, मूँछें ऐंठते रहना, नाक में उँगलियाँ डालते रहना, दाँत से नाखून कुतरना, किसी के घर जाकर उसकी पुस्तकें तथा वस्तुएँ उलटना-पलटना, किसी के शरीर को धक्के दे देकर बात करना आदि ऐसी हरकतें हैं जो आदत से सम्मिलित हो जाने के बाद अपने को तो बुरा नहीं लगता, पर दूसरे लोग इन्हें बहुत ही बचकाना मानते हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1975 पृष्ठ 31
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1975/January/v1.31

👉 जीवन को सार्थक बनाया या निरर्थक गँवाया जाय (भाग 3)

🔷 उपलब्ध वैभव का उपयोग एक ही है कि सृष्टा के प्रत्यक्ष कलेवर इस विराट विश्व में सौन्दर्य संवर्धन, सत्प्रवृत्तियों के परिपोषण में अपनी क्षमता नियोजित किये रहे और सृष्टा का श्रम सार्थक करे, उसका मनोरथ अगले उपहारों के रूप में महामानव, ऋषि, मनीषी, देवता, सिद्ध पुरुष एवं भगवान अवतार बनने जैसी पदोन्नतियों का लाभ मिलता है। जो प्रमाद बरतते, विश्वासघात करते और उपलब्धियों को संकीर्ण स्वार्थपरता के लिए प्रयुक्त करते हैं, उन्हें सुविधा छिनने और प्रताड़ना सहने का दुहरा दण्ड भुगतना पड़ता है। नरक-स्वर्ग की बात सभी जानते हैं। कुकर्मियों का चौरासी लाख योनियों में परिभ्रमण करना सर्वविदित है। यह इसी प्रमाद का प्रतिफल है।

🔶 जिसमें मनुष्य जीवन को लूट का माल समझा गया और उसे विलास व्यामोह की निजी लिप्साओं के लिए प्रयुक्त किया गया। बैंक का खजांची यदि हस्तगत हुई राशि का अपने निज के लिए उपयोग कर ले, सरकारी शस्त्र भंडार का स्टोर कीपर उन आयुधों को दस्युओं या शत्रुओं के हाथों थमा दे, मिनिस्टर अपने अधिकारों का प्रयोग सम्बन्धियों को लाभ देने के लिए करने लगे तो निश्चय ही उसे अपराधियों के कटघरे में खड़ा किया जायेगा। मनुष्य भी यदि जीवन सम्पदा को वासना, तृष्णा, अहंता जैसे क्षुद्र प्रयोजनों में खर्च करता है, तो समझना चाहिए कि आज जिसे अधिकार माना जा रहा है कल उसी को अपराध गिना जायेगा। और ठीक वैसा ही दण्ड मिलेगा जैसा कि प्रमादी, विश्वासघाती सेनाध्यक्ष को कोर्ट मार्शल द्वारा मिलता है।

🔷 अच्छा हो समय रहते भूल सुधरे और वह उपक्रम बने जो जिम्मेदारों और ईमानदारों को शोभा देता है। यदि ऐसा कुछ विचार विश्वास मन में उभरे तो फिर अपनाने योग्य विधा एक ही है कि शरीर वहन के लिए निर्वाह भर की व्यवस्था बनाने के उपरान्त शेष समूची क्षमता को उन प्रयोजनों में खपा दिया जाय, जिनसे विश्व व्यवस्था का सन्तुलन बनता है और सार्वभौम प्रगति का, सत्प्रवृत्ति संवर्धन का सुयोग बनता है। मनुष्य इस भूमिका को निभा सकने की स्थिति में असंदिग्ध रूप से समर्थ है। उसकी निजी आवश्यकताएँ इतनी कम है और उसकी पूत के साधन इतने अधिक है कि उस सन्तुलन को बिठाने में किसी को भी राई रत्ती भर कठिनाई अनुभव नहीं होनी चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Amrit Chintan 27 Jan

🔷 My affectionate scholars,
Life is a continous process from one life to the next and so on. The human nature and character brings all the impressions of previous life, which impregnates the thinking and his behaviour in the present life. One has to react, by himself from the point the present life starts. The art of living is to give a positive resistance to evil thoughts and control his actions and also develop and inculcate all what is good in life for self and others.
 
🔶 Power of mind is super. All the stages of life of pleasure and sorrow and ever your bondage and salvation depend on this mind power. The mind totally commands life. Our ancient Rishis mention that if man can control his own mind. He can achieve every thing worth achieve i.e. Arth, Dharma, Kama and Salvation. The sacredness of life and love for all develop by right thinking of mind. That is why it is said that if one can control own mind he controls the world.

🔷 Realization of God can be achieved by aquiring true wisdom. Man’s thinking is controlled by guidance of his intere in soul. That is why where the goods are collected and served are no less than any temple of God.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 7)

🔷 मित्रो! अध्यात्म जीवन जीने की कला है। जीवन किस तरह से जिया जा सकता है और जीवन को समग्र और समर्थ कैसे बनाया जा सकता है, इसके लिए है-अध्यात्म। वह अध्यात्म आज दुनिया से समाप्त हो गया है और उसके स्थान पर जादू आकर हावी हो गया है। हमारे और आपके सिर पर जादू बैठा हुआ है। अध्यात्म में आदमी को स्वावलम्बी बनना पड़ता था और अपने आपको परिष्कृत एवं श्रेष्ठ बनाना पड़ता था, लेकिन वह प्रक्रिया आज न जाने कहाँ खत्म हो गयी। उसके स्थान पर परावलम्बन आकर हम पर हावी हो गया। हम हर चीज को पराये से माँगने में विश्वास करने लगे हैं। हम यह विश्वास करने लगे हैं कि कोई भूत-पलीत आयेगा, कोई साधु-बाबा आयेगा और हमें सुख-शांति और सिद्धियाँ दे करके, मुक्ति देकर के और कुछ दे करके चला जायेगा।

🔶 मित्रो! अध्यात्म का सत्यानाश हो गया और धर्म चौपट हो गया। धर्म का सत्यानाश हो गया। समाज की सुव्यवस्था के लिए जिन सत्परम्पराओं का परिपालन करना चाहिए, जिन नागरिक कर्तव्यों को आदमी को समझना चाहिए और जिन सामाजिक जिम्मेदारियों को आदमी को निभाना चाहिए, उससे आदमी लाखों मील दूर चला गया। धर्म के नाम पर केवल उसके कलेवर को और आडम्बरों को छाती से चिपका कर बैठ गया। आज धर्म का सत्यानाश हो गया और सर्वनाश हो गया। आस्तिकता का सर्वनाश हो गया। यह क्या हो गया? यह आ गयी बाढ़ और आ गया भूकंप, जिससे सब मटियामेट हो गया। अब ईश्वर नाम की कोई चीज नहीं बची। ईश्वर स्तुति की विशेषताएँ, स्तुति की महत्ताएँ, मंत्र जप की विशेषताएँ आदि सबका प्रभाव जो मनुष्य के जीवन पर आना चाहिए था, वह सब चला गया, सब बाढ़ में बह गया। उसके स्थान पर केवल जादू रह गया। उसके स्थान पर केवल ठगी रह गयी है। अब केवल रह गया है कि हम भगवान को यह चीज देकर अमुक चीज, अमुक सिद्धियाँ प्राप्त कर लें। अमुक मंत्र घुमाकर अमुक चीज प्राप्त कर लें, स्वार्थ साध लें।

🔷 आज सारा का सारा मानव समुदाय इसी अज्ञान में डूबा हुआ है। इसलिए मनुष्य में जो सुख और शांति लाने की व्यवस्थाएँ थीं, वे सब चौपट हो गयीं, उनका सत्यानाश हो गया। आज सब कुछ चौपट दिखाई पड़ रहा है। हमें चारों ओर अंधकार दिखाई पड़ रहा है। हमको चारों ओर पतन दिखाई पड़ रहा है। हमें पीड़ाओं से चारों ओर से घिरा हुआ मनुष्य दिखाई पड़ रहा है। जबकि इस जमाने में इस संसार में ऐसी कोई चीज नहीं है, जिसको हम मनुष्य के लिए अभाव कह सकें। अभाव कहाँ है? जमीन में से कितना सारा अनाज पैदा होता है। अभाव कहाँ है? कैसी अच्छी हवा चला करती है। अभाव किस चीज का है? ढेरों पानी भरा पड़ा है। कपड़े के लिए जमीन ढेरों की ढेरों रुई पैदा कर देती है। फिर अभाव किस चीज का है? किसी चीज का अभाव नहीं है। मित्रो! हमारे पड़ोसी हैं, हमारी स्त्री है, बच्चे हैं, हमारे पास चिड़िया घूमती है और जानवर घूमते हैं। कैसा सुंदर संसार है। फिर अभाव किस बात का है? पीड़ायें किस बात की? कष्ट किस बात का? किसी बात का कष्ट नहीं है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 24)

👉 आओ, गुरु को करें हम नमन

🔶 गुरुगीता अध्यात्मविद्या के साधकों की प्राणचेतना का स्रोत है। इसके महामंत्रों के अनुशीलन से साधकों को नवप्राण मिलते हैं। उनमें आत्मतत्त्व का अंकुरण होता है। ब्रह्मविद्या स्फुरित होती है। वे यह सत्य जानने में समर्थ हो पाते हैं कि सद्गुरु ही सदाशिव हैं। भगवान् महेश्वर ने ही शिष्य-साधक पर कृपा करने के लिए गुरुदेव का रूप धरा है। गुरु और इष्ट में कोई भेद नहीं है। निराकार परब्रह्म परमेश्वर की सर्वव्यापी चेतना ही कृपालु सद्गुरुदेव के रूप में साकार हुई है। सद्गुरु को नमन इष्ट-आराध्य को नमन है। सद्गुरु को समर्पण सर्वव्यापी परमेश्वर को समर्पण है। गुरु और गोविन्द दो नहीं हैं। गुरु ही गोविन्द हैं और गोविन्द ही गुरु हैं।
  
🔶 पूर्व मंत्र में गुरुभक्त साधकों ने इस सत्य की किंचित् झलक पायी, जिसमें बताया गया है कि शिष्य को यह सत्य भली भाँति जान लेना चाहिए कि गुरु से श्रेष्ठ अन्य कोई भी तत्त्व नहीं है। ऐसे परम श्रेष्ठ और शिष्य वत्सल गुरुदेव की सेवा करना शिष्य का कर्त्तव्य है। उनके द्वारा किए जाने वाले लोक कल्याणकारी कार्यों में शिष्य को उत्साहित होकर भागीदार होना चाहिए। अंशदान-समयदान और बन सके तो जीवनदान करने में किसी भी शिष्य को कोई भी संकोच नहीं होना चाहिए।

🔶 जिसे सेवा करने में अभी संकोच या हिचकिचाहट है, समझना चाहिए—उसमें शिष्यत्व अंकुरित ही नहीं हुआ है। मात्र दीक्षा संस्कार का कर्मकाण्ड करा लेने भर से कोई शिष्य नहीं हुआ करता। इसके लिए तो ‘सीस उतारे भुईं धरे’ वाली कबीर बाबा की उक्ति को साकार करना पड़ता है। जब शिष्य बन गए तो, अहं के विसर्जन में संकोच क्यों? जब हम अपने को शिष्य कहाते हैं, तो फिर गुरुवर को नमन में देरी किसलिए?
  
.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 45

👉 वास्तविक सौंदर्य

राजकुमारी मल्लिका इतनी खूबसूरत थी कि कईं राजकुमार व राजा उसके साथ विवाह करना चाहते थे, लेकिन वह किसी को पसन्द नहीं करती थी। आखिरकार उन र...