सोमवार, 28 जून 2021

👉 आखिरी प्रयास

किसी दूर गाँव में एक पुजारी रहते थे जो हमेशा धर्म कर्म के कामों में लगे रहते थे। एक दिन किसी काम से गांव के बाहर जा रहे थे तो अचानक उनकी नज़र एक बड़े से पत्थर पे पड़ी। तभी उनके मन में विचार आया कितना विशाल पत्थर है क्यूँ ना इस पत्थर से भगवान की एक मूर्ति बनाई जाये। यही सोचकर पुजारी ने वो पत्थर उठवा लिया।        

गाँव लौटते हुए पुजारी ने वो पत्थर के टुकड़ा एक मूर्तिकार को दे दिया जो बहुत ही प्रसिद्ध मूर्तिकार था। अब मूर्तिकार जल्दी ही अपने औजार लेकर पत्थर को काटने में जुट गया। जैसे ही मूर्तिकार ने पहला वार किया उसे एहसास हुआ की पत्थर बहुत ही कठोर है। मूर्तिकार ने एक बार फिर से पूरे जोश के साथ प्रहार किया लेकिन पत्थर टस से मस भी नहीं हुआ। अब तो मूर्तिकार का पसीना छूट गया वो लगातार हथौड़े से प्रहार करता रहा लेकिन पत्थर नहीं टुटा। उसने लगातार 99 प्रयास किये लेकिन पत्थर तोड़ने में नाकाम रहा।

अगले दिन जब पुजारी आये तो मूर्तिकार ने भगवान की मूर्ति बनाने से मना कर दिया और सारी बात बताई। पुजारी जी दुखी मन से पत्थर वापस उठाया और गाँव के ही एक छोटे मूर्तिकार को वो पत्थर मूर्ति बनाने के लिए दे दिया। अब मूर्तिकार ने अपने औजार उठाये और पत्थर काटने में जुट गया, जैसे ही उसने पहला हथोड़ा मारा पत्थर टूट गया क्यूंकि पत्थर पहले मूर्तिकार की चोटों से काफी कमजोर हो गया था। पुजारी यह देखकर बहुत खुश हुआ और देखते ही देखते मूर्तिकार ने भगवान शिव की बहुत सुन्दर मूर्ति बना डाली।

पुजारी जी मन ही मन पहले मूर्तिकार की दशा सोचकर मुस्कुराये कि उस मूर्तिकार ने 99 प्रहार किये और थक गया, काश उसने एक आखिरी प्रहार भी किया होता तो वो सफल हो गया होता।

मित्रों यही बात हर इंसान के दैनिक जीवन पे भी लागू होती है, बहुत सारे लोग जो ये शिकायत रखते हैं कि वो कठिन प्रयासों के बावजूद सफल नहीं हो पाते लेकिन सच यही है कि वो आखिरी प्रयास से पहले ही थक जाते हैं। लगातार कोशिशें करते रहिये क्या पता आपका अगला प्रयास ही वो आखिरी प्रयास हो जो आपका जीवन बदल दे।

👉 भक्तिगाथा (भाग ३६)

भगवान में अनुराग का नाम है भक्ति
    
विभावरी बीती-भगवान सूर्यदेव अपने स्वर्णिम रश्मिकरों से हिमालय के शुभ्र हिमशिखरों पर राशि-राशि स्वर्ण बरसाने लगे। बड़ा ही सुरम्य मोहक और मनोरम लग रहा था वह दृश्य, जब हिम पक्षी कलगान और ऋषिगण मंत्रगान से उनकी स्तुति कर रहे थे। सस्वर स्वरों में उच्चारित हो रहा था-
ॐ चित्रान्देवामुदगानीकञ्च क्षुर्मित्रस्यवरुणस्याग्नेः।
आप्राद्यावापृथ्वीऽअंतरिक्ष œ  सूर्यऽआत्मा जगस्तस्थुषश्च॥
    
-यह कैसा आश्चर्य है कि देवताओं के जीवनाधार, तेजसमूह तथा मित्र, वरुण और अग्नि के नेत्र स्वरूप सूर्य उदय को प्राप्त हुए हैं। स्थावर-जंगममय जगत् के आत्मस्वरूप इन सूर्यदेव ने पृथ्वी द्युलोक और अंतरिक्ष को अपने तेज से पूर्णतः व्याप्त कर रखा है। पक्षियों के कलगान के संगीत में पिरोया यह मंत्रगीत इतना सम्मोहक था कि वहाँ उपस्थित ऋषियों एवं देवों का समुदाय जड़ीभूत हो गया।
    
क्षण-पल की उर्मियों को अपने में समेटे कालधारा में सभी की चेतना में चैतन्य का पुनः नवोन्मेष हुआ। एक बार पुनः भक्ति की अंतःसलिला सभी के भावों को रससिक्त करने लगी। सभी को प्रतीक्षा थी देवर्षि के नये सूत्र के प्रकट होने की, क्योंकि पिछली कथाकड़ी में तो केवल इतना ही कहा गया था कि भक्ति के नाना मत हैं। ये मत क्या हैं, कौन से हैं? यह सच तो देवर्षि को ही प्रकट करना था और वह इस समय सम्भवतः अपने हृदय मंदिर में विद्यमान भगवान नारायण की झाँकी निहार रहे थे। उनके होठों पर मधुर मुस्कान थी और आँखों से अजस्र भाव सरिता प्रवाहित हो रही थी। प्रतीक्षारत तो सभी थे कि महर्षि के नेत्र खुलें और वह अपना नया सूत्र कहें।
    
ब्रह्मवेत्ता ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने ज्यों ही देवर्षि नारद के नेत्रों को उन्मीलित होते देखा, वे सहज ही पूछ बैठे- ‘‘हम सबको भी अपनी भावानुभूतियों का भागीदार बनायें देवर्षि!’’ उत्तर में नारद के होठों पर हल्का सा स्मित आया और कहने लगे-‘‘आप तो सर्वान्तर्यामी हैं ब्रह्मर्षि। भला आपसे क्या छुपा रह सकता है? मैं तो बस यूँ ही अपने आराध्य की पूजा कर रहा था। मेरे प्रभु भी मेरे मन में थे और पूजा सामग्री भी मन में थी-इतना ही नहीं पूजा की ये सभी क्रियाएँ भी अंतर्मन में ही सम्पन्न कर रहा था और जो आनन्द छलक रहा था-वह भी अंतर्मन में ही था। हाँ! उससे मेरा सम्पूर्ण अस्तित्व अवश्य अभी तक भक्ति में भीगा हुआ है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ७०

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ३६)

सुख का केन्द्र और स्रोत आत्मा

अध्यात्म विद्या का उद्देश्य मनुष्य के चिन्तन और कर्तव्य को अमर्यादित न होने देने—अवांछनीयता न अपनाने के लिए आवश्यक विवेक और साहस उत्पन्न करता है मनुष्य अपने अस्तित्व को, लक्ष्य को व्यवहार को सही तरह समझे। सही मार्ग को अपनाकर सही परिणाम उपलब्ध करते हुए, प्रगति के पथ पर निरन्तर आगे बढ़ता चले। अपूर्णता से पूर्णता में विकसित हो। यही मार्गदर्शक करता—इसका व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करना आत्मविद्या का मूल प्रयोजन है।

यह स्मरण रखा जाना चाहिए मानव का निर्माण जड़ एवं चेतन दोनों के युग्म से हुआ है। जब तक शरीर में चेतना है तब तक हमारी सभी इन्द्रियां क्रियाशील हैं और शरीर में हलचल है, लेकिन जिस क्षण चेतना या आत्मा शरीर से अलग हो जाती है। शरीर मिट्टी का ढेला मात्र ही रहता है। कोई स्पन्दन, कोई क्रिया, कोई सार्थकता नहीं रह पाती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि शरीर एवं आत्मा का संयोग जहां जीवात्मा में विराट् शक्ति का स्रोत है वहां आत्मा से रहित शरीर का कोई मूल्य नहीं। अपने जीवन का प्रत्येक क्षण हम अपने शरीर के सुख साधन जुटाने में खर्च करते हैं और इन्द्रियजन्य भोगों में मरते-खपते रहते हैं। लेकिन मृत्यु के समय तक भी हम अपनी वासनाओं, तृष्णाओं एवं लिप्साओं को तुष्ट नहीं कर पाते।

जीवन के समग्र उद्देश्य की पूर्ति के लिये यह आवश्यक है कि हम शरीर एवं आत्मा दोनों के समन्वित विकास, परिष्कार एवं तुष्टि-पुष्टि का दृष्टिकोण बनावें। एक को ही सिर्फ विकसित करें और एक को उपेक्षित करें—ऐसा दृष्टिकोण अपनाने से सच्चा आनन्द नहीं मिल सकता।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ५९
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 स्वाध्याय मंडल, प्रज्ञा संस्थान और प्रज्ञा केन्द्र (भाग १)

भव्य भवन थोड़े से या झोंपड़े बहुत से, इन दोनों में से एक का चयन जन कल्याण की दृष्टि से करना है, तो बहुलता वाली बात को प्रधानता देनी पड़ेगी। राम...