गुरुवार, 22 फ़रवरी 2018

👉 दोस्ती

🔷 एक तितली मायूस सी बैठी हुई थी।पास ही से एक और तितली उड़ती हुई आई। उसे उदास देखकर रुक गई और बोली - क्या हुआ? उदास क्यों इतनी लग रही हो?

🔶 वह बोली - मैं एक फूल के पास रोज जाती थी। हमारी आपस में बहुत दोस्ती थी। बड़ा प्रेम था। पर अब उसके पास समय ही नहीं है मेरे लिए। वह तो बहुत व्यस्त हो गया है।

🔷 दूसरी तितली बोली - वह व्यस्त हो गया है तो तेरे पास तो समय है न तू तो जा सकती है। तू गई?

🔶 मैं क्यों जाऊँ? जब अब उसे मेरी ज़रूरत नहीं में क्यों जाऊँ?

🔷 तितली बोली - पगली ! तू कैसे कह सकती है कि उसे तेरी ज़रूरत नहीं। अनुमान क्यों लगाती है? क्या पता वह तेरा ही उस भीड़ में इंतज़ार करता हो।

🔶 तितली के आँसू निकल आए। उसने अपनी सखी को गले लगाया और गई अपने मित्र से मिलने। फूल बोला - कहाँ रही इतने दिन ! मेरा बिल्कुल मन नहीं लगा तुम्हारे बिन !! कहाँ थी ??

🔷 तितली मुस्कुराई और बोली कहीं नहीं रास्ता गुम हो गया था।

🔶 प्रेम लेने का मन करे तो प्रेम दे दो। किसी से बात करने का मन करे तो बात कर लो। दूसरे का इंतज़ार न करो। कुछ पता नहीं दूसरा भी इंतज़ार कर रहा हो।

🔷 प्रभु हमसे प्रेम करें या प्रभु हमसे पहले प्रेम करें,यह सोचने की बजाय उनसे पहले ही प्रेम करना प्रारम्भ कर दो। उनके प्रेम के इंतज़ार में नहीं, अपितु उनसे लाड प्यार करने में समय व्यतीत करो।

🔶 प्यार देने में अलग आनन्द है ..और प्यार लेने में अलग।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 23 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 23 Feb 2018


👉 सुखी वही, जिसने सुख की वासना छोड़ दी

🔷 ‘‘जीवन की तृष्णा और सुख प्राप्ति की चाहत को दूर करो। किन्तु जो महत्त्वाकांक्षी हैं, उन्हीं की भाँति कठोर श्रम करो। जिन्हें जीवन की तृष्णा है, उन्हीं की भाँति सभी के जीवन का सम्मान करो। जो सुख के लिए जीवन यापन करते हैं, उन्हीं की भाँति सुखी रहो। अपने हृदय के भीतर पनपने वाले पाप के अंकुर को ढूँढक़र, उसे बाहर निकाल फेंको। यह अंकुर शिष्य के हृदय में भी यदा-कदा उसी तरह पनपने लगता है, जैसे कि वासना भरे मानव हृदय में। केवल महान वीर साधक ही उसे नष्ट कर डालने में सफल होते हैं। जो दुर्बल हैं, वे तो उसके बढऩे-पनपने के साथ भी नष्ट हो जाते हैं।’’
  
🔶 यह अनुभव सभी महान् शिष्यों का है। शिष्य के जीवन में तृष्णा और सुख की लालसा की कोई जगह नहीं है। मजे की बात है कि तृष्णा और सुख की लालसा किसी को भी सुखी नहीं कर पाती, हालांकि प्राय: सभी इसमें फँसे-उलझे रहते हैं। ऐसे लोगों के लिए जीवन आज में नहीं है, आने वाले कल में है। भविष्य में जीवन को खोजने वाले अपने वर्तमान से हमेशा असन्तुष्ट, असंतृप्त बने रहते हैं। इस सच्चाई का एक पहलू और भी है, जो तृष्णा और सुख की लालसा से अपने आप को जितना भरता जाता है- वह उतना ही अपने अहंकार को तुष्ट और पुष्ट करता रहता है। जबकि अहंकार का शिष्यत्व की साधना से कोई मेल नहीं है।
  
🔷 शिष्यत्व तो समर्पण की साधना है- जिसका एक ही अर्थ है- अहंकार का अपने सद्गुरु के चरणों में विसर्जन। हालांकि इस समर्पण-विसर्जन के साथ भी कई तरह के भ्रम जनमानस में व्याप्त हैं। कई लोगों का सोचना है कि जब हमने समर्पण कर दिया- तब हम फिर कुछ काम क्यों करें? जब तृष्णा नहीं सुख की लालसा नहीं तब फिर मेहनत किसलिए? ये सवाल दरअसल भ्रमित मन की उपज है। जो जानकार हैं, समझदार हैं वे जानते हैं कि समर्पण और श्रद्धा का मतलब-निकम्मापन या निठल्ले बैठे रहना नहीं है। बल्कि इसका अर्थ है- सत्य के लिए, अपने गुरुदेव के लिए स्वयं को सम्पूर्णरूप से झोंक देना। इस सम्बन्ध में रमण महर्षि कहा करते थे- यह कैसी उलटबांसी है कि मिट्टी की खोज में आदमी सब कुछ लगा देता है- पर अमृत की खोज में कुछ भी नहीं लगाना चाहता। जबकि शिष्य तो वही है- जो गुरु के एक इशारे पर जीवन पर्यन्त अटूट और अथक श्रम करता रहे।
  
🔶 केवल शिष्य ही जीवन का सच्चा ज्ञाता होता है, इसलिए उसे जीवन की महान्ï सम्भावनाओं को उजागर करने में तत्पर रहना चाहिए। यह तभी सम्भव है कि जब उसके मन में अपने और सभी के जीवन का सम्मान हो। साथ ही वह सुख के लिए इधर-उधर भटके नहीं बल्कि अपने कत्र्तव्य पालन में सुख की अनुभूति करे। भगवान् बुद्ध का कथन है कि इस संसार में सुखी वही है, जिसने सुख की वासना छोड़ दी है। वास्तविक दुख तो वासनाओं का है। जो जितना ज्यादा वासनाओं, कामनाओं एवं लालसाओं से भरा है, वह उतना ही ज्यादा दु:खी है। वासनाओं और लालसाओं के छूटते ही अन्तश्चेतना में शान्ति और सुख की बाढ़ आ जाती है। सब तरफ से सुख ही सुख बरसता है। समूची प्रकृति हर पल मन-अन्त:करण को सुख से भिगोती रहती है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी अतृप्ति और असंतोष का कारण

🔶 आवश्यकताओं को मर्यादा से बढ़ा देने का नाम अतृप्ति और दुःख है उन्हें कम कर पूर्ति करने से सुख और सन्तोष प्राप्त होता है। मनुष्य एक ही प्रकार के सुख से तृप्त नहीं रहता। अतः असंतोष सदैव बना रहता है। वह असंतोष निंदनीय है जिसमें किसी वस्तु की प्राप्ति के लिए मनुष्य दिन रात हाय-हाय करता रहे और न पाने पर असंतुष्ट, अतृप्त, और दुःखी रहे।

🔷 तृष्णाएं एक के पश्चात् दूसरी बढ़ेगी। एक आवश्यकता की पूर्ति होगी, तो दो नई आवश्यकताएं आकर उपस्थित हो जायेंगी। अतः विवेकशील पुरुष को अपनी आवश्यकताओं पर कड़ा नियंत्रण रखना चाहिए। इस प्रकार आवश्यकताओं को मर्यादा के भीतर बाँधने के लिए एक विशेष शक्ति-मनोनिग्रह की जरूरत है।

🔶 एक विचारक का कथन है-“जो मनुष्य अधिकतम संतोष और सुख पाना चाहता है, उसको अपने मन और इन्द्रियों को वश में करना अत्यन्त आवश्यक है। यदि हम अपने आपको तृष्णा और वासना में बहायें, तो हमारे असंतोष की सीमा न रहेगी।”

🔷 अनेक प्रलोभन तेजी से हमें वश में कर लेते हैं, हम अपनी आमदनी को भूल कर उनके वशीभूत हो जाते हैं। बाद में रोते चिल्लाते हैं। जिह्वा के आनन्द, मनोरंजन आमोद प्रमोद के मजे हमें अपने वश में रखते हैं। हम सिनेमा का भड़कीला विज्ञापन देखते ही मन को हाथ से खो बैठते हैं और चाहे दिन भर भूखे रहें, अनाप-शनाप व्यय कर डालते हैं। इन सभी में हमें मनोनिग्रह की नितान्त आवश्यकता है। मन पर संयम रखिये। वासनाओं को नियंत्रण में बाँध लीजिये, पॉकेट में पैसा न रखिये। आप देखेंगे कि आप इन्द्रियों को वश में रख सकेंगे।

🔶 आर्थिक दृष्टि से मनोनिग्रह और संयम का मूल्य लाख रुपये से भी अधिक है। जो मनुष्य अपना स्वामी है और इन्द्रियों को इच्छानुसार चलाता है, वासना से नहीं हारता, वह सदैव सुखी रहता है।

🔷 प्रलोभन एक तेज आँधी के समान है जो मजबूत चरित्र को भी यदि वह सतर्क न रहे, गिराने की शक्ति रखती है। जो व्यक्ति सदैव जागरुक रहता है, वह ही संसार के नाना प्रलोभनों आकर्षणों, मिथ्या दंभ, दिखावा, टीपटाप से मुक्त रह सकता है। यदि एक बार आप प्रलोभन और वासना के शिकार हुए तो वर्षों उसका प्रायश्चित करने में लग जायेंगे।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1950 पृष्ठ 8

👉 मनःसंस्थान को विकृत उद्धत न बनने दें ( भाग 2)

🔶 शरीर के साथ अनाचार करने वाले ही आमतौर से दुर्बल, रुग्ण रहते हैं। स्वयं कष्ट सहते और साथियों को त्रास देते हैं। ठीक यही बात मस्तिष्क पर भी लागू होती है। विचारणा की भी एक विधा और मर्यादा है। पटरी पर चलने वाली रेल की तरह ही उसकी भी दिशाधारा होनी चाहिए। नदियाँ जब किनारों का अतिक्रमण करके उफनने लगती हैं तो बाढ़ के रूप में अपनी विकरालता का परिचय देती हैं। रेल भी पटरी छोड़कर बेहिसाब किधर को ही चल पड़े तो उससे होने वाले दुष्परिणाम की कल्पना कोई भी कर सकता है।

🔷 विचारों की शक्ति असीम है। इस संसार पर अदृश्य शासन करने वाले-दैत्य दानवों की पौराणिक मान्यता को यदि प्रत्यक्ष देखना हो तो एक शब्द में उस समूचे परिवार को विचार प्रवाह कह सकते हैं। यही क्षेत्र है जिसका स्तर मनुष्य के उत्थान-पतन का आधारभूत कारण माना जाता है। आम आदमी का मस्तिष्क सम्बद्ध वातावरण के अनुरूप ढलता पाया गया है। किन्तु यह पत्थर की लकीर नहीं है, कोई चाहे तो उसका परिपूर्ण परिशोधन और उपयुक्त नव निर्धारण कर सकने में भी समर्थ हो सकता है। आदिवासी वन प्रदेशों में रहते हैं, पर उन पर ऐसा कोई प्रतिबन्ध नहीं है कि वे नगरों में प्रवेश नहीं कर सकते या वहाँ जाकर कोई काम धन्धा नहीं कर सकते।

🔶 गाड़िया लुहार जहाँ-तहाँ भटकते और लोहा पीटकर गुजारा करने के अभ्यस्त हैं। पीढ़ियों से इसी तरह रहते हैं। फिर भी इसे उनका स्वेच्छा निर्धारण ही कहा जायेगा। वे चाहें तो अन्य नागरिकों की तरह अपने निवास निर्वाह में बिना किसी कठिनाई के स्थायित्व भी ला सकते हैं। विचारणा के सम्बन्ध में भी यही बात है। यों वह बनती और पकती तो वातावरण के चाक और आवे में ही है। फिर भी मनुष्य मिट्टी नहीं है, वह घोंसले के पक्षी की तरह किसी भी दिशा में कभी भी उड़ सकता है और अपने दायरे-कार्यक्षेत्र में असाधारण परिवर्तन कर सकने के लिए स्वतंत्र है। हमें अपना वर्तमान सुधारने की जब उमंग उठे तो सर्व प्रथम इस मनःक्षेत्र का ही निरीक्षण-परीक्षण करना चाहिए और उसकी दिशाधारा में, स्तर एवं अभ्यास में तदनुरूप परिवर्तन करना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 The Transformation of an Age (Part 2)

🔶 If it is allowed to go on this way and if the current trend of scientific progress, growth in selfishness within men is allowed to continue and if no control over humans is managed this world will end. If situation remains the same keep this in mind that the state of affairs of this world after 100 years is going to be worsened if any of you is alive by then, I however will not be alive. But there is one more situation I dream of. Dreams I see. My dream world is very beautiful world. It is such a world that is soaked in love, faith, mutual respects and cooperation. It is a world wherein each one is intending to serve other, so sweet, so nice is my dream world that keeps rounding in my mind. If somehow my dream comes true then all this wealth, science, amenities and facilities, I feel, will make this earth a heaven.
                                      
🔷 Thousands and millions of years ago where were such roads, electricity, lightening, telephone and post offices. There were nothing like that but in such a scenario our ancestors used to live heavenly life. Today when we have far better circumstances, the same world could be far more peaceful, easy and pleasuring and create immense happiness. Today we are positioned at a crossroad from here we have to proceed whether towards destruction or towards development. You have to play a role here at this point. You have to cast your vote. When two sides have same votes, vote of president proves to be game changer .your vote is game changer. It is up to you which side you choose to vote. You may either vote for destruction-side or other side of constructive measures.
                                           
🔶 I feel you must vote for peace and harmony. For this you must stop living like an animal rather start living like a man, thoughtful man and like a wise man. This is very crucial phase of time which is not going to repeat itself in future.   

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 12)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔷 मित्रो! आप वहाँ जाना और लोगों से यह कहना कि अगर कहीं आपके अंदर जिंदादिली हो, तो आपको समय की पुकार सुननी चाहिए और युग की पुकार सुननी चाहिए। समय की माँग को पूरा करना चाहिए और युग की माँग को पूरा करना चाहिए और महाकाल ने, भगवान् ने जहाँ आपको बुलाया है, वहाँ आपको चलना चाहिए। हनुमान् जी भगवान् की पुकार सुनकर चले गए थे, रीछ और बंदर चले गए थे, गिलहरी चली गई थी। आपके लिए क्या यह संभव नहीं है? क्या आप इस लोभ और मोह से, अपने वासना और तृष्णा के बंधनों को काटते हुए अंगद के तरीके से चलने के लिए तैयार हैं?

🔶 मित्रो! मैं आपको अंगद के तरीके से संदेशवाहक बनाकर के भेजता हूँ। मेरे गुरु ने मुझे संदेशवाहक बनाकर भेजा। हिंदुस्तान से बाहर कई बार अंगद की तरह से मैं केवल संदेशवाहक के रूप में गया हूँ। मैंने कोई व्याख्यान नहीं दिए और न संगठन किए। सारे-के-सारे देशों में, विदेशों में और न जाने कहाँ-से-कहाँ गया, लेकिन अपने गुरु का संदेश लेकर के गया। मैंने लोगों से कहा, देखो अपने को बदल दो। समय बदल रहा है। परिस्थितियाँ बदल रही हैं। धन किसी के पास रहने वाला नहीं है। अगले दिनों में, थोड़े दिनों में आप देखना कि धन किस तरीके से गायब हो जाता है। राजाओं के राज किस तरीके से चले गए, यह हमने और आपने देख लिया। आपने देखा कि थोड़े दिनों पहले जो लोग राजा कहलाते थे, सोने-चाँदी की तलवारें लेकर हाथी पर चला करते थे, आज वे किस तरीके से अपनी दोनों वक्त की रोटी का जुगाड़ कर रहे हैं।

🔷 साथियो! जहाँ कहीं भी जाएँगे, वहाँ आप लोगों से कहना कि समय बहुत जबरदस्त है। समय सबसे बड़ा है। धन बड़ा नहीं है। जहाँ कहीं भी विभूतियाँ आपको दिखाई पड़ती हों, वहाँ आप हमारे संदेशवाहक के रूप में जाना, जैसे कि हमारे गुरुजी ने सारी दुनिया के जबरदस्त आदमियों के पास और भावनाशील आदमियों के पास हमको संदेश दे करके भेजा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 49)

👉 सद्गुरु की कृपादृष्टि की महिमा

🔷 इनमें से एक सत्य घटना ऐसी है, जिसमें से गुरुगीता के इन महामंत्रों का मर्म उद्घाटित होता है। यह घटना विशिष्टाद्वैत सम्प्रदाय के संस्थापक भगवत्पाद श्री रामनुजाचार्य के जीवन की है। आचार्य की कृपा से अनेकों धन्य हुए। इन धन्यभागी लोगों में कुरेशभट्ट की चर्चा होती है। इन कुरेशभट्ट ने अपने सच्चे शिष्यत्व से, सार्थक समर्पण से, स्वयं की अहंता के विसर्जन से गुरु की कृपा दृष्टि को अनुभव किया। जीवन की सार्थकता पायी। सच्चा अध्यात्म लाभ अर्जित किया।
  
🔶 कुरेशभट्ट असाधारण मनीषी, परम तपस्वी एवं ख्याति प्राप्त विद्वान् थे। उनके तर्कों की धार, प्रवाहपूर्ण प्राञ्जल भाषा पण्डित मण्डली को कुण्ठित कर देती थी। पण्डित समाज में उनका भारी मान था। अनेकों योग एवं तंत्र की सिद्धियाँ उन्हें सहज सुलभ थीं; पर अध्यात्म के यथार्थ तत्त्व से वे वंचित थे। इस बात की कसक उनमें थी; लेकिन साथ ही उनमें कहीं इस बात का सूक्ष्म अहं भी था कि वे परम विद्वान् एवं सिद्धि सम्पन्न हैं। अध्यात्म की जिज्ञासा एवं विद्वत्ता के अहं ने उन्हें द्वन्द्व में डाल रखा था। समझ में नहीं आ रहा था कि वे किसे अपना मार्गदर्शक गुरु बनाएँ। अन्त में बड़े सोच-विचार के बाद उन्होंने आचार्य रामानुज की शरण में जाने का निश्चय किया। आचार्य उन दिनों भारत की धरती पर सर्वमान्य विद्वान् थे। उनके तप की प्रभा से समस्त दिशाएँ प्रकाशित थीं।
  
🔷 अपनी जिज्ञासा को लेकर वे रामानुज के पास पहुँच गए; परन्तु उनकी अहं वृत्ति के कारण आचार्य ने उन्हें अस्वीकृत कर दिया। कई बार उन्होंने इसके लिए प्रयास किया, पर हर बार असफल रहे। एक दिन जब वे आचार्य के पास बैठे थे, आचार्य की मुँहबोली बहिन अतुला उनके पास आयी और बोली- भैया ससुराल में मुझे रोटी बनाने में बड़ा कष्ट होता है। आपके पास यदि कोई उपयुक्त व्यक्ति हो, तो उसे मुझे दे दीजिए ; ताकि वह मेरी ससुराल में खाना पका सके। कुछ देर सोचने के बाद आचार्य की दृष्टि पास बैठे कुरेश भट्ट की ओर गयी और उन्होंने कहा- कुरेश, मैं तुम्हें अपना शिष्य तो नहीं बना सकता, परन्तु यदि तुम चाहो तो मेरी इस बहिन के यहाँ रसोइया बन सकते हो। परम धनवान्, महाविद्वान्, प्रचण्ड तपस्वी सिद्धि सम्पन्न कुरेश के लिए ऐसा प्रस्ताव सुनकर पास बैठे लोग चौंक पड़े।
  
🔶 लेकिन कुरेश अहंभाव से भले ग्रस्त हो, पर शास्त्रों के मर्म से परिचित थे। उन्हें सद्गुरु की कृपादृष्टि का मर्म पता था। बिना क्षण की देर लगाए उन्होंने प्रस्ताव स्वीकार करते हुए कहा, प्रभु! आप शिष्य न सही, मुझे अपना सेवक होने का गौरव दे रहे हैं। यही मेरे लिए सब कुछ है। उस क्षण से लेकर वर्षों तक वह अतुला की ससुराल में रोटी बनाते रहे। सबको प्रेमपूर्ण भोजन कराते रहे। साथ ही उनका मन सद्गुरु के ध्यान में रमा रहा। प्रार्थना की इस निरन्तरता ने उनके अहं को धो डाला।  उनकी चेतना उनके सद्गुरु से एक हो गयी। आत्मज्ञान एवं ब्रह्मज्ञान की विभूतियाँ उनमें आ विराजी। एक दिन आचार्य स्वयं उन्हें लेने उनके पास आए और बोले- वत्स! अब तुम स्वतः ही मेरे शिष्य बन गए हो। सद्गुरु की अमृतवर्षिणी कृपा दृष्टि को पाकर उनका जीवन कृतकृत्य हो गया। सचमुच ही सद्गुरु कृपा ऐसी है, जो शिष्य के जीवन को शुद्धतम बना देती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 78

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग 33)

युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव ऐसे ही आध्यात्मिक चिकित्सक थे। मानवीय चेतना के सभी दृश्य- अदृश्य आयामों की मर्मज्ञता उन्हें हासिल थी। जब भी कोई...