सोमवार, 3 फ़रवरी 2020

👉 धन नहीं धन का संग्रह पाप:-

गोपाल्लव हजार गायों का स्वामी नगर-सेठ। धन की अथाह राशि थी उसके पास। किन्तु तो भी गोपाल्लव के जीवन में कोई रस नहीं था, शान्ति नहीं थी, कभी उसने सन्तोष का अनुभव किया हो ऐसा कभी भी नहीं हुआ। वैभव विलास से परिपूर्ण जीवन का एक क्षण भी तो उसे ऐसा याद नहीं आ रहा था जब उसने निर्द्वंदता प्राप्त की हो।

विषय-भोगी गोपाल्लव को यह सब भली प्रकार सोचने का अवसर तब मिला जब राजयक्ष्मा से पीड़ित होकर वह रोग शैया से जा लगा। गोपाल्लव सोच रहे- 'धन की आसक्ति, विषयों के सुख का आकर्षण कितना प्रबल है कि मनुष्य यह भी नहीं सोच पाता कि इस संसार से परे भी कुछ है क्या ? शरीर कृश और जराजीर्ण हो गया तब कहीं मृत्यु याद आती है और मनुष्य सोचता है कि जीवन व्यर्थ गया,पाया कुछ नहीं, गांठ में था सो भी खो दिया।'

गोपाल्लव पड़े यही सोच रहे थे तभी उसके कर्ण-कुहरों पर टकराई एक ध्वनि-बहुत मीठी, भक्ति की भावनाओं से ओत-प्रोत। ऐसा लगा द्वार पर ही बैठा हुआ कोई व्यक्ति भक्ति-गीत गा रहा है। मन को सच्चा सुख भावनाओं में मिलता है। जीवन भर के भूले भटके राही को परमपिता परमात्मा की क्षणिक अनुभूति भी कितना सुख कितना विश्राम देती है यह उस गोपाल्लव को देखता तो सहज ही पता चल जाता। भजन सुनने से ऐसा आराम मिला मानो जलते घावों पर किसी ने शीतल मरहम लगा दिया हो। गोपाल्लव को नींद आ गई आज वे पूर्ण-प्रगाढ़ नींद भर सोये।

नींद टूटी तो वह स्वर-अन्तर्धान हो चुका था। गोपाल्लव ने परिचारक से पूछा- "अभी थोड़ी देर पूर्व बाहर कौन गा रहा था उसे भीतर तो बुलाना, बड़ा ही कर्ण प्रिय स्वर था। उसने मुझे जो शान्ति प्रदान की वह अब तक कभी भी नहीं मिली।"

परिचारक ने हंसकर कहा- "वह कोई संगीतज्ञ नहीं था आर्य! वह तो नगर का मोची है यहीं बैठकर जूते गांठता है और दिन भर के निर्वाह योग्य धन मिलते ही उठकर चला जाता है। सुना है वह अपने ही बनाये पद गाता है, बड़ा ईश्वर भक्त है। तभी तो उसके हर शब्द से रस टपकता है।"

प्रातःकाल वही स्वर फिर सुनाई दिया। गोपाल्लव ने मोची को बुलाकर उसे एक स्वर्ण मुद्रा देते हुए कहा- "तात! यह लो स्वर्ण मुद्रा तुम्हारे कल के गीत ने मुझे अपूर्व शान्ति प्रदान की।"

स्वर्ण मुद्रा पाकर मोची बड़ा प्रसन्न हुआ। खुशी-खुशी घर लौट आया किन्तु उसके बाद कई दिन तक उसका स्वर सुनाई न दिया। सप्ताहान्त मोची आया और सीधे गोपाल्लव के पास जाकर बोला- ”अर्थ कामेष्वसक्तानाँ धर्म ज्ञानं विधीयते” तात! धन और इंद्रियों के वशवर्ती नहीं है जो वहीं धर्म और ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। आत्म-कल्याण के मार्ग में यह दोनों वस्तुयें बाधक हैं।"

यह कहकर उसने स्वर्ण मुद्रा लौटा दी। गोपाल्लव ने पूछा- "कई दिन से आये नहीं।"

मोची ने उत्तर दिया- "आर्य! धन की तृष्णा बुरी होती है आपकी दी इस स्वर्ण मुद्रा की रक्षा और उसके उपयोग का चिन्तन करने के आगे मुझे अपना मार्ग ही भूल गया था इसीलिए तो इसे लौटाने आया हूँ।"

गोपाल्लव ने अनुभव किया धन का जीवनोपयोगी उपभोग ही पर्याप्त है परिग्रह से कभी शान्ति नहीं मिल सकती अपना धर्म धर्मार्थ व्यय कर उसने भी मोची की तरह परम शान्ति पाई।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1971 पृष्ठ

👉 QUERIES ABOUT GAYATRI YAGYA (Part 4)

Q.6. What is the necessity of collective-Yagyas?

Ans. Yagyas at a larger scale are required to be performed to purify the subtle environment and destroy pollution permeating the atmosphere. It infuses religious sentiments and enthusiasm in persons who are present and those who participate in it get an opportunity to take a vow to abandon one vice by way of offering Dev-dakshina and adopt one virtue or righteous tendency. In this way big Yagyas help in uplifting the moral and ethical levels of the participants.  

The meaning of the word Yagya is to do sacrifice, to give money in charity and do worship. Its practical meaning is that one ought not to spend his entire earnings on himself and his family, but should also contribute a part of it  for the welfare of others. It also implies that divinity and gentlemanliness should be respected and people should live together in mutual cooperation.


Q.7. Is ‘Agnihotra’ during the nights justified for matrimonial functions?
Ans. In fact scriptures advise performance of marriages and associated Agnihotra (Yagya) during the day only. However, it has become customary in India to perform marriages during the night because of the convenience and leisure of participants. Agnihotra associated with matrimonial functions performed during the night are, therefore, exceptions. Although marriages during the night  have become a norm for this reason, the best period for the ceremony is considered as the dusk time.

Q.8. What type of clothes are recommended during performance of  Yagya?

Ans. During a Yagya, the purifying energy emanating from the Agnihotra stimulates the outer skin and permeates the body through the physical perforations, bringing out sweat and other impurities from within. It is therefore, advisable to wear loose clothes to permit an easy intake of ‘ Pran’- the life-force and excretion of impure elements (Kalmash). For this reason, in ancient times a two-piece wear of Dhoti and Dupatta was recommended which permitted a free circulation of air in and around the body. Course, heavy and tight clothing is not advisable for this very reason, Dhoti and Kurta are cheap and convenient wears, which, besides meeting the above objectives, also serve the purpose of religious and cultural integrity. Dhoti and Kurta are also easily washable. In those regions where Dhoti-Kurta are not traditional wears, clean-washed Pyjama may be used. Socks should never be worn during the Sadhana. These are considered as dirty as shoes. (However, to ward off extreme cold, one may wear clean socks reserved exclusively, for this purpose).

Though traditionally a yellow Dupatta (Angavastra) on shoulders is recommended, it is not mandatory. Ladies may wear yellow Saree  or a loose traditional wear.
  
For Group performance, it is advisable to keep stock of spare clothes for the visiting participants. Continuance of a Yagya in the night is not justifiable.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 67

👉 बोध

बोध का परिणाम है त्याग। जो अन्तस में बोध के घटित हुए बिना त्याग करते हैं, उनका जीवन केवल आडम्बर बन कर रह जाता है। अन्तर्भावों की घुटन, बेचैनी उन्हें निरन्तर सालती रहती है। एक युवक भगवान् तथागत के पास पहुँचा। उसके चेहरे पर विजय का भाव था। अपने भावों को व्यक्त करते हुए उसने शास्ता से कहा- उसने गृह त्याग करने की सारी तैयारियाँ पूरी कर ली हैं। अब वह भिक्षु बनने के योग्य हो गया है। उस युवक के इस दर्प भरे कथन पर भगवान् हँस दिए।
  
महात्मा बुद्ध की इस हँसी को वहाँ पास बैठे सारिपुत्र ने देखा। युवक के चले जाने के बाद उन्होंने भगवान् से हँसी का रहस्य जानना चाहा। उत्तर में सारिपुत्र की ओर देखते हुए बुद्ध बोले, संसार की तैयारियों की बात तो सुनी थी, पर संन्यास की तैयारियाँ क्या है? यह कथन समझ में नहीं आया। संसार से संन्यास में परिवर्तन, चित्त में बोध क्रान्ति के बिना घटित नहीं हो सकता। त्याग करना, संन्यास लेना, भिक्षु होना, न तो वेष परिवर्तन है, न नाम परिवर्तन और न गृह परिवर्तन है। यह तो विशुद्ध दृष्टि परिवर्तन है।
  
त्याग के लिए तो चित्त का समग्र परिवर्तन होना चाहिए। इस क्रान्ति के लिए बौद्धिक गणितीय जोड़-तोड़, विभाजन गुणन फल के समीकरण काम नहीं देते। संसार में सफल होने की सारणियाँ भी यहाँ काम नहीं आती। सांसारिकता का सम्पूर्ण गणित इस बोध के लिए न केवल व्यर्थ है, बल्कि विघ्न भी है। स्वप्न की नियमावलियाँ, जैसे जागरण में काम नहीं आती हैं, वैसे ही संसार के सत्य संन्यास में काम नहीं आते। आखिर वैराग्य और संन्यास संसार के स्वप्न से जागरण ही तो है।
  
शास्ता के इन शाश्वत वचनों ने सारिपुत्र के अन्तःकरण को छुआ। पर इनसे अछूता वह युवक फिर से एक दिन बुद्ध के पास आया और थोड़ा चिन्तित स्वर में बोला, त्याग की सारी तैयारियों में एक कसर बाकी रह गयी है। अभी चीवर की व्यवस्था जुटानी है। उसके इस कथन पर बुद्ध विहंस कर बोले, युवक सारा सामान छोड़ने के लिए ही कोई भिक्षु होता है, तू उसी को जुटाने के लिए परेशान है। जा अपनी दुनियाँ में लौट जा, तू अभी भिक्षु होने योग्य नहीं है। इसके लिए तो बोध की सम्पदा चाहिए जो विवेक-वैराग्य के बिना नहीं मिलती

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १७९

👉 असाधारण कभी साधारण की इच्छा नहीं करते !!

बाली वध तथा सुग्रीव के राज्याभिषेक पश्चात्  वर्षा ऋतु के आने के कारण श्रीराम जी भैया लक्ष्मण सहित प्रवर्षण पर्वत के गुफा में निवास करते हैं। इसी काल में श्रीराम जी भैया लक्ष्मण जी से भक्ति, वैराज्ञ,राजनीति और विवेक से संबंधित कई कथा कहते हैं।

कहत अनुज सन कथा अनेका।
भगति बिरति नृपनीति बिबेका।।

लेकिन लक्ष्मण जी के मन में प्रभु के विचित्र लीला से संबंधित जिज्ञासा है जिसे वे अनुकूल समय पर पूछते हैं।

लक्ष्मण जी कहते हैं कि-
हे प्रभु! आप कैसी विचित्र लीला करते हैं कि सुग्रीव के दुख देखकर बाली को एक ही वाण से मारने की प्रतिज्ञा करते हुए कहते हैं...

सुनु सुग्रीव मारिहउँ बालिहि एकहिं बान।
ब्रह्म रुद्र सरनागत गएँ न उबरिहिं प्रान।।

"हे सुग्रीव  सुनिए ! मैं बाली को एक ही वाण से मार डालूँगा । यदि वह ब्रह्मा जी या शंकर जी के शरण में भी चला जाए तो अब जीवित नहीं रहेगा।"

श्रीराम जी- हाँ भैया लक्ष्मण! मैंने ये प्रतिज्ञा की थी और उसे पूर्ण भी किया तो इसमें तूझे संदेह क्यों है??

लक्ष्मण जी- "प्रभु! संदेह का प्रश्न ये है कि जब आपने बिना किसी परिश्रम के दुंदुंभी राक्षस के विशाल अस्थि और सातों ताल वृक्षों को गिरा दिए तो सुग्रीव ने आपके बल पौरूष देखकर बाली से वैर भाव त्याग देने की इच्छा प्रकट की...

बाली परम हित जासु प्रसादा।
मिलेहु राम तुम्ह समन बिषादा।।

तो आपने सुग्रीव को अपनी प्रतिज्ञा याद दिलाई...

...सखा! बचन मम मृषा न होई"!!!

"हे मित्र सुग्रीव! मेरी वाणी असत्य नहीं हो सकती। मैंने बाली वध की प्रतिज्ञा की है। लेकिन आपके वाण के प्रहार से पृथ्वी पर गिरा बाली ज्यों ही आपके शरण आया कि आपने कहा कि...."

"अचल करौं तनु ! राखहु प्राना !!"

हे बाली! तुम्हारे शरीर को अचल कर देता हूँ, अतः तुम जीवित रहो।

👉👉तो क्या ये वचन आपके प्रतिज्ञा से मेल खा रहा है? और यदि वह जीवित रहना स्वीकार कर लेता तो क्या होता?? हे प्रभु! मैं आपकी लीला देखकर कभी कभी भारी उलझन में पड़ जाता हूँ!!!

अति बिचित्र रघुपति चरित !!

श्रीराम जी मुस्कुराते हुए कहते हैं कि -"देखो भैया! मैंने शरीर रखने के लिए,जीवित रहने के लिए केवल बाली को ही नहीं कहा है।बल्कि गीधराज जटायु से भी विनती की थी लेकिन क्या वे हमारे प्रस्ताव को स्वीकार किए ??जरा दोनों के वचन स्मरण करो...

राम कहा- तनु राखहु ताता!!

गीधराज जटायु असह्य पीड़ा में भी हँसते हुए कहते हैं -

जाकर नाम मरत मुख आवा।अधमउ मुकुत होइ श्रुति गावा।।
"सो" मम लोचन गोचर आगे।राखौं देह हेतु केहि खाँगें ??

बाली...

जन्म जन्म मुनि जतन कराहीं।अंत राम कहि आवत नाहीं।।
मम लोचन गोचर सोइ आवा।बहुरि कि प्रभु अस बनिहि बनावा??

बाली ने स्पष्ट कह दिया कि...

अस कवन सठ हठि काटि सुकतरु,बारि करिहि बबूरही?

ऐसा कौन मूर्ख होगा जो अपने खेत से सर्व इच्छित फल दाता कल्प वृक्ष काट कर कँटीले बबूर की खेती करेगा??

हे लक्ष्मण! बाली अपनी पत्नी तारा से कहकर आया था कि...

कह बाली-सुनु भीरु प्रिय! समदरसी रघुनाथ।
"जौं कदाच मोहि मारिहि तौ पुनि होउ सनाथ"!!!

हे लक्ष्मण! बाली उतना मूर्ख नहीं था जो मेरे धाम के बदले
(राम बाली निज धाम पठावा) पृथ्वी,जल ,अग्नि, आकाश और वायु से निर्मित अधम शरीर को रख लेता!!!

बाली कोई साधारण बंदर नहीं था! बाली  असाधारण  था!! और 👉 असाधारण कभी साधारण की इच्छा नहीं करते हैं।