बुधवार, 1 फ़रवरी 2017

👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 25) 2 Feb

🌹 व्यावहारिक साधना के चार पक्ष   
🔴 अब जप और ध्यान की बारी आती है। दोनों एक साथ चल सकते हैं। गायत्री जप मानसिक हो तो भी ठीक है। जितनी देर करने का निश्चय हो उसका हिसाब माला या घड़ी के सहारे किया जाता है। जिन्हें गायत्री की अपेक्षा कोई अन्य मंत्र रुचिकर होवे उसे अपना सकते हैं। ॐकार भी सार्वभौम स्तर की जप मान्यता बन सकता है।               

🔵 जप के साथ प्रात:काल के उदीयमान स्वर्णिम सूर्य का ध्यान किया जाय। भावना करनी चाहिये कि अपना खुला शरीर सूर्य के सम्मुख बैठा है। इष्ट की सूूक्ष्म किरणें अपने स्थूल, सूक्ष्म और कारण-तीनों शरीरों में प्रवेश कर रही हैं। किरणें, ऊर्जा और आभा की प्रतीक हैं। ऊर्जा अर्थात् शक्ति, आभा अर्थात् प्रकाश प्रज्ञा। दोनों का समन्वय तीनों शरीरों में प्रवेश करके उन्हें प्रभावित करता है-ऐसी भावना की जानी चाहिये। प्रत्यक्ष शरीर में स्वास्थ्य और संयम, सूक्ष्म शरीर मस्तिष्क में विवेक और साहस, कारण शरीर अर्थात् अन्त:करण में श्रद्धा, सद्भावना सूर्य किरणों के रूप में प्रवेश करके अस्तित्त्व की समग्र सत्ता को अनुप्राणित कर रही है। यह ध्यान धारणा और मंत्र जप साथ-साथ नियत निर्धारित समय तक चालू रखे जायें और अन्त में पूर्णाहुति में सूर्य के सम्मुख जलरूपी अर्घ्य दिया जाये। इसका तात्पर्य है-परमसत्ता के सम्मुख जलरूपी आत्मसत्ता का समर्पण। भजन भावना इतनी ही है। यदि नियत स्थान पर बैठ सकना सम्भव नहीं, सफर में चलने जैसी स्थिति हो तो वह सारे कृत्य मानसिक रूप से बिना किसी वस्तु की सहायता के भी किये जा सकते हैं।   

🔴 प्रज्ञायोग साधना का चौथा चरण है- मनन यह मध्याह्नोत्तर कभी भी, कहीं भी किया जा सकता है। समय पन्द्रह मिनट हो, तो भी काम चल जायेगा। इसमें अपनी वर्तमान स्थिति की समीक्षा की जाती है और आदर्शों के मापदण्ड से जाँच-पड़ताल करने पर जो कमी प्रतीत हो, उसे पूरा करने की योजना बनानी पड़ती है। यही मनन है। इसके लिये एकान्त स्थान ढूँढ़ना चाहिये। आँखें बन्द करके अन्तर्मुखी होना और आत्मसत्ता के सम्बन्ध में परिमार्जन परिष्कार की उभयपक्षीय योजना बनानी चाहिये। इसमें आज के दिन को प्रधान माना जाये। प्रात: से मध्याह्न तक जो सोचा और किया गया हो, उसे आदर्शों के मापदण्ड से जाँचना चाहिये और उस समय से लेकर सोते समय तक जो कुछ करना हो उसकी भावनात्मक योजना बनानी चाहिये, ताकि दिन के पूर्वार्द्ध की तुलना में उत्तरार्द्ध और भी अच्छा बन पड़े।  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 आप हाथी नहीं इंसान हैं!

🔴 एक आदमी कहीं से गुजर रहा था, तभी उसने सड़क के किनारे बंधे हाथियों को देखा, और अचानक रुक गया. उसने देखा कि हाथियों के अगले पैर में एक रस्सी बंधी हुई है, उसे इस बात का बड़ा अचरज हुआ की हाथी जैसे विशालकाय जीव लोहे की जंजीरों की जगह बस एक छोटी सी रस्सी से बंधे हुए हैं!! ये स्पष्ठ था कि हाथी जब चाहते तब अपने बंधन तोड़ कर कहीं भी जा सकते थे, पर किसी वजह से वो ऐसा नहीं कर रहे थे।
🔵 उसने पास खड़े महावत से पूछा कि भला ये हाथी किस प्रकार इतनी शांति से खड़े हैं और भागने का प्रयास नही कर रहे हैं?

🔴 तब महावत ने कहा, इन हाथियों को छोटे पर से ही इन रस्सियों से बाँधा जाता है, उस समय इनके पास इतनी शक्ति नहीं होती की इस बंधन को तोड़ सकें. बार-बार प्रयास करने पर भी रस्सी ना तोड़ पाने के कारण उन्हें धीरे-धीरे यकीन होता जाता है कि वो इन रस्सियों को नहीं तोड़ सकते, और बड़े होने पर भी उनका ये यकीन बना रहता है, इसलिए वो कभी इसे तोड़ने का प्रयास ही नहीं करते।

🔵 आदमी आश्चर्य में पड़ गया कि ये ताकतवर जानवर सिर्फ इसलिए अपना बंधन नहीं तोड़ सकते क्योंकि वो इस बात में यकीन करते हैं!!

🔴 इन हाथियों की तरह ही हममें से कितने लोग सिर्फ पहले मिली असफलता के कारण ये मान बैठते हैं कि अब हमसे ये काम हो ही नहीं सकता और अपनी ही बनायीं हुई मानसिक जंजीरों में जकड़े-जकड़े पूरा जीवन गुजार देते हैं।

🔵 याद रखिये असफलता जीवन का एक हिस्सा है, और निरंतर प्रयास करने से ही सफलता मिलती है. यदि आप भी ऐसे किसी बंधन में बंधें हैं जो आपको अपने सपने सच करने से रोक रहा है तो उसे तोड़ डालिए….. आप हाथी नहीं इंसान हैं।

👉 दोष-दृष्टि को सुधारना ही चाहिए (भाग 3)

🔵 अब दोष-दृष्टा को ले लीजिये। उसकी स्थिति बिल्कुल विपरीत होती है। जहाँ अन्य लोग उक्त महात्मा में गुण ही देख सके वहाँ उसे केवल दोष ही दिखाई दिये। उसका हृदय महात्मा के प्रशंसकों के बीच, उनकी कुछ खामियों के रखने के लिये बेचैन हो जाता। जब अवकाश अथवा अवसर न मिलता तो प्रशंसा में सम्मिलित होकर उनके बीच बोलने का अवसर निकाल कर कहना प्रारम्भ कर देता- ‘‘हाँ, महात्मा जी का व्याख्यान था तो अच्छा- लेकिन उतना प्रभावोत्पादक नहीं था, जितना कि लोग प्रभावित हुए अथवा प्रशंसा कर रहे हैं। कोई मौलिकता तो थी नहीं। यही सब बातें अमुक नेता ने अपनी प्रचार-स्पीच में शामिल करके देशकाल के अनुसार उसमें धार्मिकता का पुट दे दिया था। अजी साहब क्या नेता, क्या महन्त सबके-सब अपने रास्ते जनता पर नेतृत्व करने के सिवाय और कोई उद्देश्य नहीं रखते। यह सब पूजा, प्रतिष्ठा व पेट का धन्धा है।”

🔴 यदि लोग सच्चाई से विमुख होकर उससे सहमत न हुए तब तो वह वाद-विवाद के लिये मैदान पकड़ लेता है और अन्त में अपना दोषदर्शी चित्र दिखा कर लोगों की हीन दृष्टि का आखेट बन कर प्रसन्नता खो कर और विषण्ण होकर लौट आता है। जहाँ गुण ग्राहकों ने उस दिन महीनों काम आने वाली प्रसन्नता प्राप्त की, वहाँ दोष-दृष्टा ने जो कुछ टूटी-फूटी प्रसन्नता उस समय पास में थी वह भी गवाँ दी।

🔵 दोष-दर्शन की प्रक्रिया जोर पकड़ ही चुकी थी, उसकी सखी-सहेली झल्लाहट, खीझ, कुढ़न, कुण्ठा, अरुचि आदि सब साथ ही लगी हुई थीं। निदान घर आकर भोजन अच्छा न लगा पत्नी निहायत बेसऊर दिखाई देने लगी। बच्चे यदि सोते मिले तो नालायक हैं। शाम से ही सो जाते हैं। और यदि जगते मिले तो लापरवाह और तन्दुरुस्ती का ध्यान न रखने वाले बन गये। तात्पर्य यह कि उस दिन जहाँ अन्य सब लोग अधिक-से-अधिक प्रसन्नता के अधिकारी बने वहाँ दोषदर्शी के लिये हर बात खेदजनक और दुःखदायी बन गई।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति मई 1968 पृष्ठ 23  
http://literature.awgp.org/hindi/akhandjyoti/1968/May/v1.23

👉 आत्मचिंतन के क्षण 2 Feb 2017

🔵 जब तक नारी वस्त्रों में, बनाव, शृंगार में, फैशन में, जेवर-आभूषणों में अपना व्यक्तित्व देखती रहेगी, पुरुषों के लिए कामिनी बनकर उनकी वासनाओं की तृप्ति के लिए ही अपना जीवन समझती रहेगी या खा-पीकर घर की चहारदीवारी में पड़े रहना ही अपना आदर्श समझेंगी, तब तक कोई भी शक्ति, नियम, कानून उसका उद्धार नहीं कर सकेंगे।

🔴 स्त्रियों में सभ्यता के नाम पर बढ़ता हुआ फैशन, बनाव, शृंगार, चमकीले, भड़कीले वस्त्र आदि गृहस्थ जीवन की स्थिति और मर्यादाओं पर बहुत बुरा प्रभाव डाल रहे हैं और इसके प्रभाव से समाज में अनेकों बुराइयाँ फैलती जा रही हंै। हालांकि सौन्दर्य, स्वास्थ्य, स्वच्छता, व्यवस्थित रहन-सहन के आवश्यक अंग हैं, किन्तु कृत्रिमता, बाह्य साधनों के प्रयोग से नित-नूतन मेकअप बनाना अस्वाभाविक और गलत रास्ता है। समाज में बढ़ते अनाचार, दुराचार के प्रोत्साहन में नारी के ये बनाव-शृंगार भी कम जिम्मेदार नहीं है।

🔵 परिवार बसा लेना आसान है, लोग आये दिन बसाते ही रहते हैं, उसका पालन भी कोई विशेष कठिन नहीं। सभी उसका पालन करते हैं, किन्तु परिवार को समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाने के लिए उसका निर्माण करना एक श्रम साध्य कर्त्तव्य है। अधिकतर लोग परिजनों के लिए अधिकाधिक सुख-सुविधाएँ देने, उनके लिए अच्छा भोजन, वस्त्र तथा आराम की चीजें जुटाना ही पारिवारिक जीवन का उद्देश्य मान बैठे हैं। वे यह कभी नहीं सोच पाते कि भोजन, वस्त्र तथा शिक्षा, स्वास्थ्य के साथ परिवार की एक सर्वोपरि आवश्यकता भी है और वह है उसे सद्गुणी बनाना।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 41) 2 Feb

🌹 साधना की पूर्णाहुति

🔴 इस प्रकार यज्ञ को कहीं भी अनावश्यक नहीं माना गया है, बल्कि उसे तो और भी आवश्यक अनिवार्य बताया गया है। अस्तु अभियान साधना में निरत साधकों को अपने अनुष्ठान की पूर्णाहुति यज्ञ से करना चाहिए और फिर अगला अनुष्ठान आरम्भ करना चाहिए। यज्ञ छोटा करना हो तो उसमें अपने परिवार के लोगों को सम्मिलित किया जा सकता है और एक कुण्ड का अग्निहोत्र किया जा सकता है। सब लोगों द्वारा मिलकर की गई 2400 आहुतियां देने से भी काम चल सकता है। बड़ा रूप देना हो तो पड़ोसी सम्बन्धी मित्रों को भी सम्मिलित करके पांच कुण्डी आयोजन का रूप दिया जा सकता है। उसे हवन में सम्मिलित आहुतियां पांच हजार भी हो सकती हैं। अलग से प्रबन्ध न करना हो तो किसी बड़े सामूहिक आयोजन में भी पूर्णाहुति का नारियल चढ़ाया जा सकता है।

🔵 वस्तुतः अभियान साधना एक प्रकार का अनुष्ठान ही है, जो एक वर्ष की अवधि में पूरा होता है। अवधि लम्बी होने से उसमें अनुशासन की सफलताएं रखी गई हैं। सामान्य साधक इसे बिना किसी कठिनाई के सरलता पूर्वक पूर्ण कर सकते हैं। पूर्णाहुति के अवसर पर ब्रह्मभोज के रूप में अर्थदान का भी माहात्म्य है। मात्र शारीरिक और मानसिक श्रम ही पर्याप्त नहीं, उसके साथ अर्थदान भी आवश्यक है। यज्ञ के रूप में कुछ पैसा खर्च होता है, कुछ ब्रह्मभोज के रूप में करना चाहिए। वर्तमान परिस्थितियों में ब्रह्मदान ही ब्रह्मभोज का विकल्प हो सकता है। ब्रह्मदान अर्थात् गायत्री साहित्य का सत्पात्रों को प्रचार के रूप में वितरण। इसके लिए कुछ राशि श्रद्धापूर्वक संकल्पित करनी चाहिए। प्रसाद वितरण में मिठाई बांटने की अपेक्षा ज्ञान सामग्री देने की व्यवस्था अधिक उपयुक्त है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 5)

🌹 गरीबों द्वारा अमीरों का आडम्बर

🔵 लम्बे समय तक दुर्बलता के शिकार रहने वालों को धीरे-धीरे कई प्रकार की बीमारियाँ घेरती और दबोचती रहती हैं। छूत की बीमारियाँ एक से दूसरों को लगती और भले चंगों को चपेट में लेती चली जाती हैं। लम्बे समय की गुलामी और अवांछनीयता स्तर की मूढ़ मान्यताओं, दुष्प्रवृत्तियों के सम्बन्ध में भी यही बात है। वे यदि निर्बाध गति से बढ़ती रहें, तो किसी भी समुदाय को खोखला किए बिना नहीं रहतीं।

🔴 देश की दरिद्रता प्रख्यात है। अशिक्षा, गन्दगी और कुटेबों की बात भी छिपी हुई नहीं है। पर इस बात को समझने में जरा अधिक जोर लगाना पड़ेगा कि भारत में अमीरी का प्रदर्शन क्यों होता है? यहाँ अमीरों के साथ जुड़े हुए, प्रमुख दीख पड़ने वाले काले पक्ष को विशेष रूप से देखना होगा। यों इसके अपवाद भी देखे जाते हैं। अमीरी सदा अंवाछनीयताएँ ही उत्पन्न नहीं करतीं। सदुपयोग कर सकने वाले, उसका अपने तथा दूसरों के लिए समुचित लाभ भी उठा लेते हैं, पर आमतौर से वैसा कुछ नहीं बन पड़ता।

🔵 अपने देश में बड़प्पन का अर्थ आलस्य और अपव्यय है। दुर्व्यसनों की एक पूरी बटालियन भी साथ लग जाती है। देखा गया है कि अपने देश में परिश्रम करना पड़े तो उसे दुर्भाग्य का चिह्न माना जायेगा। राजा, सामन्त, अमीर-उमराव सन्त-महन्त स्तर के आदमी मेहनत करने में अपना अपमान समझते हैं। वे अपनी शारीरिक सेवाओं के लिए भी समीपवर्ती लोगों पर आश्रित रहते हैं। लड़की की शादी उस घर में करना चाहते हैं, जहाँ वह पलंग पर बैठी राज करे। जिसे दिन भर काम करना पड़े, उसे नीचा समझा जाता है। नेक-भले व्यक्तियों को भी छोटा इसलिए ही माना जाता है कि वे दिनभर कड़े परिश्रम में लगे रहते हैं। अमीर या मालदार तो उन्हें ही समझा जाता है, जिन्हें कुछ न करने की सुविधा हो। यह कामचोरी-हरामखोरी की आदत जहाँ भी जड़ जमाने लगेगी, वहाँ से ‘‘बेशरम, बेल’’ की तरह हटने का नाम ही न लेगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 आप अपने आपको पहचान लीजिये (भाग 11)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 अबकी बार वातावरण के संशोधन के लिए हमको फिर उतने ही बड़े यज्ञ की जरूरत पड़ी है। कितने बड़े की वातावरण १०० कुण्डीय यज्ञ से हमने सोचा था कि शायद जैसे भगवान् राम ने दशाश्वमेध किये थे और भगवान् श्रीकृष्ण ने राजसूय यज्ञ किया था ऐसे एक- एक यज्ञ से ही काम चल जायेगा परिस्थितियाँ ऐसी आपको तो नहीं मालूम पड़ती हैं पर हमको जो परिस्थितियाँ मालूम पड़ती है वह ऐसी भयंकर हैं ऐसी भयंकर हैं कि उसको देखकर के हमको एक लाख कुण्डों का संकल्प करना पड़ा। बड़ी ताकतों का मुकाबला करने के लिए बड़ी ताकत चाहिये आपने देखा न कि कितनी फौजें इकट्ठी हो गई हैं कितनी सेना इकट्ठी हो गई है और कितने एटम बम इकट्ठे हो गये हैं और उनके कितने स्टार वार वाले हथियार पैदा हो गये हैं। और दुनिया में क्या से क्या हो गया है इसके लिए सामान्य वस्तुओं से सामान्य वस्तुओं बड़ा काम चलने वाला नहीं है एक लाख कुण्ड की योजना तो आपने पढ़ ली होगी पढ़ी कि नहीं पढ़ी पढ़ ली होगी।

🔵 अच्छा दूसरी योजना पढ़ी आपने नहीं पढ़ी। किसी अंक में निकल गयी है या निकलने वाली है भगवान् बुद्ध के जमाने में दो विश्वविद्यालय स्थापित हुये थे। एक नालंदा का हुआ था एक तक्षशिला का हुआ था दो यूनिवर्सिटी थी अब तो यूनीवर्सिटी नाम रख लेते हैं और उसमें जो विद्यार्थी होते हैं लोकल विद्यार्थी होते हैं एकाध जिले के विद्यार्थी होते हैं। सारे भारत के होते है सारे भारत में तो ऐसी न जाने कितनी यूनीवर्सिटी हैं। सारे विश्व में अरे बाबा सारे विश्व में एक एक देश में अमेरिका में ६००० यूनिवर्सिटी हैं और कहाँ कहाँ कितनी कितनी यूनीवर्सिटी है विश्व में। विश्वविद्यालय काय बात का। लेकिन विश्वविद्यालय में ३०००० धर्मप्रचार पढ़ायें जा रहे थे हमने एक विश्वविद्यालय चलाने का संकल्प किया है उसमें एक लाख प्रचारक चाहिये।

🔴 एक लाख प्रचारक एक लाख हाँ भगवान् बुद्ध के पास थे नई थे तो सही बहरहाल उस समय थे जब भगवन् बुद्ध का स्वर्गवास हो गया था उसके बाद जिन लोगों ने दीक्षा ली थी उस समय तो थे। गाँधी जी के आन्दोलन में एक लाख आदमी थे सत्याग्रही नहीं वह पहले एक बार चले गये दुबारा गये तिबारा गये चौबारा इस तरह से जेल जाने वालों की संख्या तो एक लाख हो गयी होगी लेकिन व्यक्ति एक लाख नहीं थे एक लाख व्यक्तियों को हमने प्रशिक्षित करने का संकल्प लिया है।

🔵 खुली हुई यूनीवर्सिटियाँ हिन्दुस्तान में कई जगह स्थापित होने वाली हैं अभी। उनमें कितने विद्यार्थी होंगे। किसी में हजार होंगे किसी में ५०० होंगे किसी में २००० होंगे लेकिन एक लाख विद्यार्थियों का प्रशिक्षण करने का विद्यार्थियों को नहीं धर्मप्रचारकों को विद्यार्थियों का नहीं युग का सृजन करने वालों का ऐसे एक लाख व्यक्ति हमको तैयार करने हैं ऐसा एक विश्वविद्यालय चलाना है जिसमें से ऐसे विद्यार्थी निकले, ऐसे विद्यार्थी निकले जो जहाँ कहीं भी जायें तहलका मचाते हुये चले जायें।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/lectures_gurudev/31.4

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 4)

🌹 गरीबों द्वारा अमीरों का आडम्बर
🔵 रोम के एक दार्शनिक के मन में भारत की महत्ता देखने की ललक उठी। समय और धन खर्च करके आए, घूमे और रहे। लौटे तो उदास थे। साथियों ने पूछा तो केवल इतना कहा ‘‘भारत में जहाँ गरीब अधिकांश रहते हैं, वहाँ भी अमीरों जैसा स्वाँग बनाया जाता है।’’ ऐसा ही कथन एक जापानी शिष्टमण्डल का भी है। उन्होंने भ्रमण के बाद कहा था। यहाँ अमीरी का माहौल है, परन्तु उसकी छाया में पिछड़े, गए-गुजरे लोग रहते हैं।

🔴 प्रश्न उठता है कि ऐसी विडम्बना क्यों कर बन पड़ी? अमीरों में जो दुर्गुण पाए जाते हैं, वे यहाँ जन-जन में विद्यमान हैं, किन्तु प्रगतिशीलों में जो सद्गुण पाए जाने चाहिए, उनका बुरी तरह अभाव है। इस कमी के रहते गरीबी ही नहीं, अशिक्षा, गन्दगी, कामचोरी जैसी अनेकों पिछड़ेपन की निशानियाँ बनी ही रहेंगी। वे किसी बाहरी सम्पत्ति के बलबूते दूर न हो सकेंगी। भूमि की अपनी उर्वरता न रहे, तो बीज बोने वाला सिंचाई-रखवाली करने वाला भी उपयुक्त परिणाम प्राप्त न कर सकेगा।

🔵 मनुष्य की वास्तविक सम्पदा उसका निजी व्यक्तित्व है। वह जीवन्त स्तर का हो, तो उसमें वह खेत-उद्यानों की तरह अपने को निहाल करने वाली और दूसरों का मन हुलसाने वाली सम्पदाएँ प्रचुर मात्रा में उत्पन्न हो सकती हैं, पर चट्टान पर हरियाली कैसे उगे? व्यक्तित्व अनायास ही नहीं बन जाता है। वह इर्द-गिर्द के वातावरण से अपने लिए प्राणवायु खींचता है। जहाँ विषाक्तता छाई हुई हो, वहाँ साँस लेना तक कठिन हो जायेगा। लम्बे समय तक जीवित रहने की बात तो वहाँ बन ही कैसे पड़ेगी?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 दोष-दृष्टि को सुधारना ही चाहिए (भाग 2)

🔵 देखिये और जरा ध्यान से देखिये कि आपके अन्दर ‘दोष-दर्शन’ करने की दुर्बलता, तो नहीं घर पर बैठी है। क्योंकि ‘दोष-दर्शन’ का दृष्टिकोण भी जीवन को कुछ-कुछ ऐसा ही बना देता है। दोष-दर्शन और संतोष, दोष-दर्शन और प्रसन्नता, दोष-दर्शन तथा सामंजस्य का नैसर्गिक विरोध है। दोष-दृष्टि मनुष्य के हृदय पर उसके मानस पर एक ऐसा आवरण है, जो न हो बाहर की प्रसन्न- किरणों को भीतर प्रतिबिम्बित होने देता है और न भीतर का उल्लास बाहर ही प्रकट होने देता है। इसे मनुष्य एवं आनन्द के बीच एक लौह दीवार ही समझना चाहिये। लीजिये दोषदर्शी व्यक्तियों की दशा से अपना मिलान कर लीजिये और यदि अपने में दोष पायें तो तुरन्त सुधार कर डालिये, जिससे, अगले दिनों में आप भी उस प्रकार प्रसन्न रह सकें, जिस प्रकार लोग रहते हैं और उन्हें रहना ही चाहिये।

🔴 दोष-दर्शन से दूषित व्यक्ति जब किसी व्यक्ति के संपर्क में आता है, तब अपने मनोभाव के अनुसार उसके अन्दर बुराइयाँ ढूँढ़ने लगता है और हठात् कोई न कोई बुराई निकाल ही लेता है। फिर चाहे वह व्यक्ति कितना ही अच्छा क्यों न हो। उदाहरण के लिये किसी विद्वान महात्मा को ही ले लीजिये। लोग उसे बुलाते, आदर सत्कार करते और उसके व्याख्यान से लाभ उठाते हैं। महात्मा जी का व्याख्यान सुन कर सारे लोग पुलकित, प्रसन्न व लाभान्वित होते हैं।

🔵 उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते और अपने उतने समय को बड़ा सार्थक मानते। अनेक दिनों, सप्ताहों तथा मासों तक उस सुखद घटना का स्मरण करते और ऐसे संयोग की पुनरावृत्ति चाहने लगते। अधिकाँश लोग उस व्याख्यान का लाभ उठा कर अपना ज्ञान बढ़ाते, कोई गुण ग्रहण करते और किसी दुर्गुण से मुक्ति पाते हैं। वह उनके लिए एक ऐसा सुखद संयोग होता है जो गहराई तक अपनी छाप छोड़ जाता है, ऐसे ही सुव्यक्ति गुणाग्राही कहे जाते हैं।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति मई 1968 पृष्ठ 22
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1968/May.22

👉 निर्माण से पूर्व सुधार की सोचें (भाग १)

महत्त्व निर्माण का ही है। उपलब्धियाँ मात्र उसी पर निर्भर हैं। इतना होते हुए भी पहले से ही जड़ जमाकर बैठी हुई अवांछनीयता निरस्त करने पर सृ...