Book आंतरिक उल्लास का विकास लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
Book आंतरिक उल्लास का विकास लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 16 मई 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग २८

प्रशंसा का मिठास चखिए और दूसरों को चखाइए

अपने दोषों की ओर से ओंखें बंद करके उन्हें बढने दें या आत्मनिरीक्षण करना छोड दें, ऐसा हमारा कथन नहीं हैं। हमारा निवेदन इतना ही है किं बुराइयों को भुला कर अच्छाइयों को प्रोत्साहित करिए। अपने में जो दोष हैं, जो दुर्भाव हैं उन्हें ध्यानपूर्वक देखिए और उनको कठोर परीक्षक की तरह तीव्र दृष्टि से जाँचते- . रहिए। जो त्रुटियाँ दिखाई पड़े उनके विरोधी सद्गुणों को प्रोत्साहन देना आरभ करिए यही उन दोषों के निवारण का सही तरीका है। मान लीजिए कि आपको क्रोध अधिक आता है तो उसकी चिंता छोड कर प्रसन्नता का, मधुर भाषण का अभ्यास कीजिए क्रोध अपने आप दूर हो जाएगा। यदि क्रोध का ही विचार करते रहेंगे तो विनयशीलता का अभ्यास न हो सकेगा। यदि कोई आपको आदेश करे कि भजन करते समय बंदर का ध्यान मत आने देना, तो बंदर का ध्यान आए बिना न रहेगा। वैसे भजन करने में कभी बंदर का ध्यान नहीं आता पर निषेध किया जाए तो बढोत्तरी होगी। बुराई कोई स्वतंत्र वस्तु नहीं है, भलाई के अभाव को बुराई कहते हैं, पाप कोई स्वतंत्र वस्तु नहीं है,पुण्य के अभाव को पाप कहते हैं। यदि भलाई की ओर, पुण्य' की ओर आपकी प्रवृत्ति हो तो बुराई अपने आप घटने लगेगी और एक दिन उसका पूर्णत: लोप हो जाएगा।
 
पीठ थपथपाने में घोडा खुश होता है, गरदन खुजाने से गाय प्रसन्न होती है, हाथ फिराने से कुत्ता हर्ष प्रकट करता है, प्रशंसा से हृदय हुलस आता है। आप दूसरों की प्रशंसा करने में कंजूसी मत किया कीजिए जिनमें जो अच्छे गुण देखें, उनकी मुक्त कंठ से सराहना किया करें, सफलता पर बधाई देने के अवसरों को हाथ से न जाने दिया करें। इसकी आदत डालना घर से आरंभ करें अपने भाई-बहिनों बालक-बालिकाओं की अच्छाइयों को उनके सामने कहा कीजिए। अपनी पत्नी के रूप, सेवाभाव, परिश्रम, आत्मत्याग की भूरि- भूरि प्रशंसा किया कीजिए। बड़ों के प्रति प्रशंसा प्रकट करने का रूप कृतज्ञता है। उनके द्वारा जो सहायता प्राप्त होती है उसके लिए कृतज्ञता प्रकट करनी चाहिए। किसी ने आपके ऊपर अहसान किया हो तो शुक्रिया, धन्यवाद, मैं आपका ऋणी ' आदि शब्दों के द्वारा थोड़ा-बहुत प्रत्युपकार उसी समय चुका दिया कीजिए। बाद में आप देखेगे कि चारों ओर कितना मिठास बरसता है। शत्रु-मित्र बन जाते हैं। आपकी वाणी के प्रशंसा युक्त मिठास से आकर्षित होकर मित्र और प्रिय पात्रों का दल आपके पीछे-पीछे लगा फिरेगा। आज यह बातें छोटी भलें ही प्रतीत होती हैं परंतु अनुभव के पश्चात आप पावेंगे कि प्रशंसा परायणता में जितना आध्यात्मिक लाभ है, उससे भी अधिक भौतिक लाभ है। धनी बनने, प्रेम पात्र बनने, नेता बनने, शत्रु रहित बनने की यह कुंजी है। दूसरों का हदय जीतने की यह अचूक दवा है।

आप अपने में अच्छाइयाँ देखिए 'दूसरों  में अच्छाईयाँ देखिए इस संसार में श्रेष्ठताएँ उत्कृष्टताएँ संपदाए कम नहीं हैं। आप उन्हें देखिए रूचिपूर्वक पहिचानिए और आग्रह पूर्वक ग्रहण करिए,ऐसा करने से आपके अंदर-बाहर, चारों ओर अच्छाइयों से भरा हुआ प्रसन्नतापूर्ण वातावरण एकत्रित हो जाएगा। इस वातावरण मे आपको आनन्द का, उल्लास का दर्शन होगा।

आनंददायक उल्लास प्रदान करने वाली परिस्थितियाँ वस्तुएँ बाहर नहीं हैं। जड भूतों में, चैतन्य आत्मा को उल्लसित करने वाली कोई शक्ति नहीं है। आप बाहर की ओर देखना छोड़ कर अपने अंतःकरण को तलाश कीजिए। क्योंकि अखंड आनंद का अक्षय स्रोत वहीं छिपा हुआ है। अपने सत् तत्वों को जागृत कीजिए उन्हें विकसित और समुन्नत कीजिए आपका जीवन उल्लास से परिपूर्ण हो जावेगा।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ ४०

शुक्रवार, 6 मई 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग २६

प्रशंसा का मिठास चखिए और दूसरों को चखाइए

सोते हुए व्यक्ति को जगाना आवश्यक हो तो उसे हाथ पकड कर बिठाया जाता है और जब तक नींद खुल न जाए तब तक उसें सहारा देना पडता है। ठीक यही स्थिति आपको अपने सद्गुणों को जगाने में सामने आवेगी। कुछ दिनों तक ऐसा अभ्यास करना पड़ेगा कि इच्छा न रहते हुए भी मधुर, रुचिकर और प्रेम व्यवहार करें। यदि किसी को हानि ठगने, धोखा देने इच्छा से कोई बनावटी व्यवहार करते तब तो वह अधर्म है, 'किंतु निःस्वार्थ भाव से, हित कामना से, दूसरे की हृदय की कली खिलाने की इच्छा से, अपने संपूर्ण को उन्नत करने की आकांक्षा से बनावटी व्यवहार करते हैं वह निर्दोष है। लंगडा आदमी नकली टांग लगाकर अपना काम चलाता है तो इसमें किसी का कुछ भी अहित नहीं होता, बिना टांग के रहने की अपेक्षा नकली टांग लगवा लेना कोई बुरी बात नहीं है।

इस प्रतीक्षा में बैठे रहना ठीक नहीं है कि जब हमारा हृदय सात्विक प्रेम से परिपूर्ण हो जाएगा, प्राणिमात्र के प्रति आत्मभाव प्रवाहित होने लगेगा, हृदय में प्रसन्नता और उल्लास की तरंगें उठने लगेंगी तभी उनको प्रकट करना आरंभ करेंगे। यह तो ऐसी बात है जैसे कोई कहे कि पानी में पैर तब दूँगा जब तैरने की विद्या में निपुण हो जाऊँगा। तैरना तब आता है जब अनेक बार असफल प्रयत्न कर लिए जाते हैं, अभ्यास न होते हुए भी उलटे-सीधे हाथ- पैर फैंके जाते हैं, कुछ समय बाद अभ्यास परिपक्व हो जाता है और सफलता निकट आती है। विद्यार्थी पहले गलत-सलत लिखता है फिर ठीक-ठाक लिखने लगता है। अध्यापक की खींची हुई रेखाओं के ऊपर कलम फेर कर बालक अक्षरों को लिखता है पीछे बिना सहायता के स्वयं उन्हें बनाने लगता है। आपको अपने सद्गुणों की वृद्धि में भी इसी परिपाटी से काम लेना पड़ेगा। हृदय का सद्गुणों से परिपूर्ण हो जाना अंतिम सफलता है, यह एक दिन में प्राप्त नहीं होती वरन एक या एक से अधिक जन्मों का भी समय इसमें लग सकता है। साधना काल में बार-बार गिर पड़ने, फिर उठ कर चलने का क्रम जारी रहेगा। कई बार भूलें होंगी, कई बार संभलेंगे, प्रतिज्ञाएँ करें प्राचीन संस्कारों के प्रबल झकझोरों से वे टूटेंगी, फिर संभलेंगे, फिर गिरेंगे। हर एक साधक अनेक बार असफल होता है, गिरता पड़ता लगा रहता है तो .एक दिन लक्ष्य तक पहुँच ही जाता है।
 
आप असली-नकली के वितंडाबाद में पड़ कर बेकार ही बहस मत कीजिए। हम कहते हैं कि आप ' को बनावटी रूप से ही सही पर प्रकट करने की आदत इससे हानि किसी की नहीं और लाभ सबका है। अपने को सद्गुणी घोषित करिए अपने को अच्छे काम करने वाला, अच्छे विचार रखने वाला प्रकट होने दीजिए। अपनी अच्छाइयों को प्रकाश में आने दीजिए। अत्यंत, सुगंधित नयनाभिराम पुष्प यदि अज्ञात वन में खिले तो उसकी शोभा 'सुगंधि का लाभ कोई न उठा सकेगा, वह स्वयं भी देवता के ' चरणों पर चढ़ने का सौभाग्य प्राप्त न कर सकेगा। आप में बहुत सी अच्छाइयां हों और लोग उससे परिचित न होने के कारण कुछ लाभ न उठा सकें तो उन अच्छाइयों का क्या महत्त्व रहा? अज्ञात स्थान में छिपकर पड़ा हुआ शीतल जल किसके काम का? जबकि अनेक जीव-जंतु पानी की खोज के लिए सूखे कंठ को लेकर इधर-उधर मारे-मारे फिर रहें हैं।
प्यासों की प्यास न बुझी, उधर बिना खींचे कुँए का पानी सड़ गया, यह अज्ञातवास किसके लिए क्या लाभदायक हुआ? आप दीपक के अनुयायी बनिए। छदाम के मिट्टी के सकोरे में एक पैसे का तेल भरा हुआ है, एक दमड़ी की रुई मिला कर सवा पैसे का सामान है। वह इस बात की लज्जा नहीं करता कि मैं सवा पैसे की पूँजी वाला होकर सिर उठाकर क्यों चमकूँ। वह टुच्चा नहीं है इसलिए टुच्चे विचार भी नहीं करता। सवा पैसे का दीपक सिर उठा कर अपना प्रकाश फैलाता है उसके उजाले में बड़े-बडे धनी, विद्वान अपना काम चलाते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ ३८

All World Gayatri Pariwar Official  Social Media Platform

Shantikunj Official WhatsApp

Youtube Channel Rishi Chintan

Youtube Channel Shantikunjvideo

बुधवार, 4 मई 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग २५

प्रशंसा का मिठास चखिए और दूसरों को चखाइए

कोरे कागज पर काली स्याही के अक्षर छपाकर इस माध्यम द्वारा हम अपने हृदयगत भावों को आपकी अंतःचेतना में उड़ेलने का प्रयत्न कर रहे हैं। हमारा लिखना और आपका पढना निःस्सार है यदि किसी कर्म प्रवृत्ति के लिए इससे प्रेरणा न मिले। आज इस पुस्तक को साक्षी बनाकर हम-आप हृदय से हृदय का वार्तालाप कर रहे हैं। आपके विचार इस समय एकांत की शांति में हैं इस अवसर पर हम अपनी समस्त सद्भावनाओं को एकत्रित करके, आपके सच्चे हित चिंतन से प्रेरित होकर, घुटने टेक कर विनयपूर्वक यह प्रार्थना कर रहे हैं कि बंधु जीवन की अमूल्य घडियो का महत्त्व समझो, सुर दुर्लभ मानव जीवन को यो ही बर्बाद मत करो, नरक की यातना में मत तपो, यह बिलकुल आपके हाथ की बात है कि आज के अव्यस्थित जीवन को स्वर्गीय आनंद से परिपूर्ण बना लें। पिछले दिनों आपसे गलतियाँ हो चुकी हैं इसके लिए न तो लज्जित होने की जरूरत है और न दु:खी, या निराश होने की। सच्चा पश्चाताप यह है कि गलती की पुनरावृत्ति न होने दी जाए। बुरे भूतकाल को यदि आप नापसंद करते और अच्छे भविष्य की आशा करते हैं तो वर्तमान काल का सुव्यवस्थित रीति से निर्माण करना आरंभ कर दीजिए। वह शुभ आज ही है, अब ही है, इसी क्षण ही है जबकि अपने चिर संचित सद्ज्ञान को कार्य रूप में लाना चाहिए। अब आप इसके लिए तत्पर हो जाइए कि उत्तम श्रेणी का, उच्चकोटि का, सद्गुणों से परिपूर्ण जीवन बिताते हुए इस लोक और परलोक में दिव्य आनंद का उपभोग करेंगे।

सात्विक जीवन में प्रवेश पाने के लिए आप अच्छे गुणों को अपने में धारण करने का प्रयत्न आरंभ कर दीजिए। विनय, नम्रता, मुस्कराहट, प्रसन्नता, मधुर भाषण, प्रेमभाव, आत्मीयता-यह सब प्रशंसनीय गुण हैं, यदि आपके भीतर पुराने दुर्भावों के संचित संस्कार भरे हैं और वे मन ही मन झुँझलाहट, क्रोध, स्वार्थ जैसी निम्नकोटि की आदतों को भड़काते रहते हैं तो हताश मत हूजिए ।
 
बाहरी मन से ही सही, बनावट से ही सही, इन गुणों को नकली तौर से प्रकट करना आरंभ कीजिए। मन में चिड़चिड़ाहट हो भीतर ही भीतर क्रोध आ रहा हो, इतने में कोई बाहर का आदमी आता है तो आप भीतर की वृत्तियों को बदल दीजिए और चेहरे पर प्रसन्नता की रेखाएँ प्रकट करिए मुस्कराइए और हँसते उसका अभिवादन कीजिए। किसी अन्य कारण से क्रोध आ रहा है तो भी  मधुर भाषण करिए नाराजी को दबा दीजिए। यदि किसी के प्रति प्रेम या आत्मीयता की न्यूनता है तो भी उसे कुछ बढा कर प्रकट करने का प्रयत्न करिए। मन में बसने वाले दुर्भावों को दबा कर उनके स्थान पर सद्भावों को जरा बढा-चढा कर प्रकट करने का अभ्यास आरंभ कीजिए। अभ्यास से किसी काम में सफलता मिलती है। जो गुण सोए हुए पड़े हैं, उन्हें जगाने के लिए बनावटी सहारा लगाने की आवश्यकता पड़े तो वैसा करना चाहिए। छोटे बालक को खड़ा होना और चलना सिखाने के लिए लकड़ी की गाडी का सहारा दिया जाता है या उँगली पकड़ कर चलाया जाता है। निस्संदेह यह बनावटी सहायता है, इसकी तुलना अपने आप दौड़ने वाले बालक की सफलता से नहीं हो सकती तो भी अपने समय पर वह भी आवश्यक है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ ३७

Our Other Official  Social Media Platform

Shantikunj Official WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Instagram

Official Telegram

Official Twitter


मंगलवार, 3 मई 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग २४

प्रशंसा का मिठास चखिए और दूसरों को चखाइए

अपनी मनुष्यता को उत्तमोत्तम 'सद्गुणों से सुसज्जित करने के लिए यह आवश्यक है कि उन विशेषता' को अपने में क्रियात्मक रूप से धारण किया जाए। सद्ज्ञानमयी पुस्तकें पढने से, सदुपदेश सुनने से, सत्संग करने से विचारधारा परिमार्जित होती है, यह समझ मे आता है कि सन्मार्ग पर चलना चाहिए। परंतु यदि वे विचार, कार्य रूप में परिणत न हों, मनोभावों का आचरण के साथ समन्वय न हो तो उस जानकारी से लाभ नहीं। वैसे तो हर कोई जानता है कि अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य अपरिग्रह बहुत धर्म कार्य हैं,अनेक ग्रंथों में इनकी महिमा सविस्तार गाई गई है। आप उपरोक्त धर्म लक्षणों को जानते हैं या अमुक  पुस्तक को बार-बार पाठ करके इनकी उपयोगिता को दुहराते है परंतु इतने मात्र से कुछ लाभ नहीं हो सकता, जब तक कि उनको कार्य रूप में प्रयोग करना आरंभ न किया जाए। सत्संग, स्वाध्याय, कथा श्रवण का महात्म इसलिए है कि इनके द्वारा उत्तम आचरण की प्रेरणा मिलती है। यदि वह उद्देश्य सफल न हो, ज्ञान का कर्म के साथ मेल न हो पावे तो कागज के हाथी की तरह वह निरर्थक है। केवल जानकारी होने मात्र से कुछ विशेष लाभ नहीं होता।

अनेक 'सद्गुणों की रचना का प्रयोजन यह है कि लोग इनकी सहायता से आचरण को उत्तम बनावें। यदि आप अनेक शास्त्र पढ लेते हैं, असाधारण ज्ञान संपादन कर लेते हैं किंतु उसको काम में नहीं लाते तो सोने से लदे हुए गधे का उदाहरण उपस्थित करते हैं। गधे की पीठ पर सोना लदा है पर वह स्वयं उससे कोई अच्छा पदार्थ नहीं खरीद सकता,अपनी पद वृद्धि नहीं कर सकता, वह सोना उसके लिए भार रूप है, जब तक लदा है तब .तक बोझ से और अपने को दबाए हुए है:। आपका बढा-चढ़ा ज्ञान दूसरे लोगों को मनोरंजन का साधन हो सकता है पर यदि उस पर अमल नहीं करते तो आपके निजी लाभ का उससे कोई विशेष प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। गणेशजी को पीठ पर लादे फिरने वाला चूहा आखिर चूहा ही रहेगा। ज्ञान की पयोनिधि को अपने अत्यंत समीप रखने पर भी उस बेचारे को विद्या से उत्पन्न होने वाला कोई सुख थोड़े ही प्राप्त होता है।
 
आपने अनेक उत्तम पुस्तकों का स्वाध्याय करके एवं अनेक सुयोग्य व्यक्तियों के समीप रहकर बहुत सारा ज्ञान एकत्रित कर लिया है। हम समझते हैं कि जितना आप जानते हैं उसका एक चौथाई भाग भी क्रिया रूप में ले आवें तो इस जीवन को सब दृष्टियों से सफल बना सकते हैं। इसके विपरीत आप ज्ञान का भण्डार जमा करते जावें और आचरण वैसे ही निम्न कोटि के रखें तो आप में और एक साधारण अशिक्षित व्यक्ति में क्या अंतर रहेगा?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ ३६

शनिवार, 30 अप्रैल 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग २३

अपने सदगुणों को प्रकाश में लाइए

यह मानी हुई बात है कि संसार के अन्य समस्त मनुष्यों की भाति न्यूनाधिक मात्रा में आप में भी कोई छोटे-बड़े दोष होंगे ही, पर वे एक दिन बिलकुल दूर होकर रहेंगे, पर जब तक फसल पकने की प्रतीक्षा है तब तक उन्हें इस प्रकार रखिए कि किसी के लिए हानिकर परिणाम उपस्थित न करें। शरीर में मल-मूत्र की गंदी इंद्रियाँ मौजूद हैं, इन्हें ढक कर रखने का नियम चला आता है। अपान वायु सभी कोई त्यागते हैं पर सभ्यता का तकाजा है कि जरा धीरे से उस वायु को निकलने देना चाहिए ताकि उसका शब्द दूसरों के चित्त मे घृणा उत्पन्न न करे। फोड़े पर पट्टी बँधी रहने देते हैं ताकि सडा हुआ मवाद और विकृत घाव देखने वालों को नाक-भौं सिकोडंने का अवसर न दे।
 
गंदी नालियाँ ढक कर रखी जाती हैं, शौचालय खुले हुए नहीं रखे जाते। जिधर भी डालिए इस सर्वमान्य नियम की प्रमुखता पावेंगे कि ' बुराई प्रकाशित मत करो वरन उसे ढक कर रखो। ' इस नियम का अपने चरित्र और विचारों का प्रकटीकरण करते हुए भी ध्यान रखा करें तो निःसंदेह जन समाज का एक बड़ा भारी उपकार करेंगे। इस प्रकार बुराई का प्रभाव कम होगा वह छूत की बीमारी की तरह उड-उड़कर चारों ओर न फैलने पावेगी। स्वस्थ स्थानों में अस्वस्थता उत्पन्न न करेगी।

गंदगी को ढक दो और दफना दो ' इस डॉक्टरी नियम का जीवन क्षेत्र में भी प्रयोग कीजिए और प्रसंगों को वीर्यपात की तरह गुप्त रखिए। दुनियाँ आपसे सौंदर्य की, सत की, प्रमोद की, प्रफुल्लता की, प्रोत्साहन की आशा करती है आप उसे वही दीजिए। अल्प बुद्धि के दुकानदार को देखि,ए वह अपना अच्छा- अच्छा माल कैसे सुदर ढंग से सजाकर आगे रखता है ताकि देखने वालों को प्रसन्नता हो। रास्ता चलते व्यक्ति को भले ही उस दुकान से कुछ खरीदना न हो पर उस सजावट से नेत्रों को तृप्त करता है और मन ही मन प्रसन्न होता जाता है। आप अपने को उस से अधिक बुद्धिमान समझते हैं तो अपने सद्गुणों को दुनिया की दुकान मे इस प्रकार सजावट के साथ रखिए कि देखने वाले उसके सौंदर्य से कुछ आनंद अनुभव करते जावें। अपने कमरे को सजाकर रखने में आप कुशल हैं त्यौहार और उत्सवों के अवसर पर शरीर और घर की सजधज करना खूब जानते हैं फिर क्या ऐसा नहीं कर सकते कि अपनी उत्तमताओं को कलापूर्ण ढंग से सजाकर एक मनमोहक चित्रशाला बना दें और विश्व सौंदर्य में एक और मात्रा जोड़ देने का यश ग्रहण करें।

हम कहते हैं कि आप झूँठी झिझक संकोच, ' नम्रता को छोड दीजिए। यह विनय का बहुत वीभत्स रूप है कि अपने को दीन, रोगी, अयोग्य कह कर सुनने वाले को यह जताया जाए कि हम नम्र हैं। आप सचमुच ही बहुत अधिक मात्रा में उत्तम, भले एवं सुयोग्य हैं, अपनी अच्छाइयों को प्रकाश में लाइए दूसरों को उन्हें जानने दीजिए उत्तमता को प्रकट होने दीजिए। इससे आपको सन्मार्ग पर चलने में प्रोत्साहन, प्रगति और प्रकाश की प्राप्ति होगी। आदर, प्रतिष्ठा और श्रद्धा के भाजन बनने से आपका अंतःकरण ऊर्ध्वमुखी होकर परमार्थ की ओर अग्रसर होगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ ३६

Our Other Official  Social Media Platform

Shantikunj Official WhatsApp
8439014110

Official Facebook Page

Official Instagram

Official Telegram

Official Twitter

गुरुवार, 28 अप्रैल 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग २२

अपने सदगुणों को प्रकाश में लाइए

अपने अच्छे गुणों को प्रकट होने देने में आपका भी लाभ है और दूसरों' का भी। हानि किसी की कुछ नहीं। यदि आपके योग्यताओं का पता दूसरों को चलता है तो उनके सामने एक आदर्श उपस्थित होता है, एक की नकल करने की प्रथा समाज में खूब प्रचलित है, संभव है उन गुणों और योग्यता,ओं का अप्रत्यक्ष प्रभाव किन्हीं पर पडे और वे उसकी नकल करने के प्रयास में अपना लाभ करें। सद्गुणी व्यक्ति के लिए स्वभावत: श्रद्धा, प्रेम और आदर की भावना उठती हैं, जिनके मन में यह उठती है उसे शीतल करती हैं, बल देती हैं, पुष्ट बनाती हैं। दुनियाँ में भलाई अधिक है या बुराई ? इसका निर्णय करने में अक्सर लोग आसपास के व्यक्तियों देखकर ही कुछ निष्कर्ष निकालते हैं। आपके संबंध में यदि अच्छे विचार फैले हैं तो सोचने वाले को अच्छाई का पक्ष भी मजबूत मालूम देता है और  वह संसार के संबंध में अच्छे विचार बनाता है एवं खुद भी भलाई पर विश्वास करके भली दुनियों के साथ त्याग और सेवा सत्कर्म करने को तत्पर होता है।

इसके विपरीत यदि उसके सामने लोगों के दुष्ट आचरणों का ही सा जमाव हो तो स्वभावत: वह झुँझला उठेगा, दुनियाँ को स्वार्थी,निकम्मी, धूर्त मानकर उसके साथ वैसा ही व्यवहार करने की सोचेगा, जबकि चारों ओर बुरे ही बुरे आचरण वाले लोग दीख रहे हैं तो संभव है कि सत्कर्म वाला निराश हो जाए, चिढकर बदला लेने, जैसे के साथ तैसा व्यवहार करने को उतारू होकर बुरे काम करने लगे। यदि आपके दुर्गुण ही उसके सामने पहुँचते हैं तो स्वभावत: घृणा, क्रोध, द्वेष, भय के भाव उसके मन मे उठेंगे और वे जहाँ से उत्पन्न हुए हैं उस स्थान को भी उसी प्रकार जलावेंगे जैसे अग्नि की चिनगारी जहाँ रखी है पहले उसी स्थान को जलाना शुरू करती है।
 
यदि आप दुर्गुणी प्रसिद्ध हैं तो किसी न किसी कमजोर स्वभाव के आदमी पर अप्रत्यक्ष रूप से उसका असर पड़ेगा और संभव है कि नकल करने की प्रवृत्ति से प्रेरित होकर वह उन दुर्गुणों' को अपनाने लगे। यह तो बिलकुल साधारण बात है कि मित्र लोग उन दुर्गुणों को तरह देकर आपसे स्नेह संबंध कायम रखेंगे, बुराई को तरह देने की आदत धीरे- धीरे संस्कार का रूप धारण करेगी और फिर उस बुराई या उससे मिलती-जुलती अन्य बुराई को बिना घृणा या क्रोध किए सहन करने की आदत मजबूत हो जाएगी। पाप को तरह देना, अर्द्ध, रूप से उसमें सम्मिलित होना ही है।

ध्यानपूर्वक विचार करके देखिए यदि आप अपने को दुर्गुणी प्रकाशित करते हैं, लोगों में अपनी अयोग्यताएँ फैलाते हैं तो इसका अर्थ यह है कि उनके साथ अपकार करते हैं। दोष जान लेने से किसी का कोई फायदा नहीं वरन हानि बहुत। यह समझना भ्रम है कि दोष प्रकट हो जाने से लोग सावधान रहेंगे '। सच बात यह है कि बुद्धिमान आदमी दुर्गुणी और किसी से धोखा नहीं खाएगा। मुर्ख को ईश्वर से भी धोखा होने का डर है। कई मूर्ख महात्मा गाँधी सरीखे प्रात: स्मरणीय महात्मा को गालियाँ देते हुए कहते हैं कि उनके कारण हमारी अमुक हानि हुई। ईश्वर पर अनुचित भरोसा करने वाले भी हानि उठाते हैं। निश्चय ही अपने को, अयोग्य या बुरे रूप में प्रकट होने देना, सचमुच बुरा होने की अपेक्षा भी बहुत बुरा है। इसमें अपनी हानि से भी अधिक दूसरों की हानि है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ ३४

सोमवार, 25 अप्रैल 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग २१

अपने सदगुणों को प्रकाश में लाइए

बाहरी रहन-सहन के कारण उन्हें गरीब ही समझा जाता है ' मरने के बाद जब घड़ों भरी हुई धन-दौलत जमीन में से निकलती है तब आश्चर्य करना पड़ता है कि लोगों को जिंदगी भर इसके इतने धनी होने का भेद प्रकट न हो पाया। बहुत लोग ऐसे रहस्यमय भेद अपने अंदर छिपाए पड़े रहते हैं जिनका पता उनके सगे- संबंधियों तक को नहीं लग पाता। गुप्त पुलिस के आदमी इस विद्या में बडे होते हैं वे अपनी असलियत का पता नहीं लगने देते और दूसरों सगे-संबंधी बनकर ऐसे घुल-मिल जाते हैं कि बड़े- बड़े भेदों को निकाल लाते हैं।

इससे प्रकट होता है कि दूसरों को उतनी बात का पता चल पाता है जितनी आसानी से उनके सामने आ जाती है। सामने रखी गेंद का अगला भाग देखा जा सकता है पर उसका पृष्ठ भाग है यह तब तक नहीं मालूम हो सकता जब तक कि उसे उलट-पलट कर न देखा जाए। सच तो यह है कि किसी वस्तु के बारे में हम बहुत ही थोडे अंशों में जानकारी रखते हैं। अपने शरीर के भीतरी अंग किस गतिविधि से कार्य कर रहे हैं, अपने रक्त में किन रोगों के कीटाणु प्रवेश कर रहे हैं? निजी बातों का इतना पता नहीं तो दूसरे लोगों के मनोभाव, आचरण, कैसे हैं इसको ठीक-ठीक मालूम करना और भी कठिन है  मोटी-मोटी प्रकट बातों को देखकर किसी के गुण- अवगुणों के बारे में लोग अपनी सम्मति निर्धारित करते हैं और एक से एक सुनकर दूसरा भी अपनी सहमति वैसी ही बना लेता है। दो-चार पूर्ण- अपूर्ण बातों के आधार पर ही अक्सर सारा समाज अपनी भली- बुरी धारणा बना लेता है। व्यक्ति चाहे बदल गया हो पर वह धारणा मुद्दतों तक चलती जाती है। इन बातों को ध्यान में रखते हुए आप अपने सुद्गुणों को प्रकाश में लाने का प्रयत्न कीजिए। जो अच्छाइया, भलाइयाँ योग्यताएँ उत्तमताएँ विशेषताएँ हैं उन्हें छिपाया मत कीजिए वरन इस प्रकार रखा करिए जिससे वे अनायास ही लोगों की दृष्टि में आ जावें। अपने बारे में बढ-चढ कर बातें करना ठीक नहीं, शेखीखोरी ठीक नहीं, अहंकार से प्रेरित होकर अपनी बड़ाई के पुल बाँधना यह भी ठीक नहीं, अच्छी बात को बुरी तरह रखने में उसका सौंदर्य नष्ट हो जाता है।
 
दूसरे प्रसंगों के सिलसिले में कलापूर्ण ढंग से, मधुर वाणी से इस कार्य को बड़ी सुंदरता पूर्वक किया जा सकता है । अप्रिय सत्य को प्रिय सत्य बना कर कहने मैं बुद्धि-कौशल की परीक्षा है, बुराई की इसमें कुछ बात नहीं। जो गाय पाँच सेर दूध देती है क्या हर्ज है यदि इस बात से दुसरे लोग भी परिचित हो जाएँ?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ ३२

शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 
Shantikunj WhatsApp 8439014110 

गुरुवार, 21 अप्रैल 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग २०

अपने सदगुणों को प्रकाश में लाइए

इस ईश्वरीय प्रयोजन पर विश्वास करिए आत्मा की प्रगतिशीलता पर भरोसा करिए आप सतोगुणी हैं उन्नतिशील हैं सफलता के अधिकारी हैं, विजय यात्रा के लिए निर्वाध गति से आगे बढ़ रहे हैं।

आइए अब एक पेचीदा प्रश्न पर कुछ विचार-विमर्श करें। कई व्यक्तियों में साधारण योग्यताएँ होते भी उनकी कीर्ति बहुत विस्तृत होती है और कईयों में अधिक  योग्यता होते हुए भी उन्हें कोई नहीं पूछता,कोई दुर्गुणी होते हुए भी श्रेष्ठ समझे जाते हैं, कोई सद्गुणी होते हुए भी बदनाम हो जाते हैं, आपने विचार किया कि इस अटपटे परिणाम का क्या कारण है? शायद आप यह कहें कि-' ' दुनियाँ मूर्ख है, उसे भले-बुरे की परख नहीं '' तो आपका कहना न्याय संगत न होगा क्योंकि अधिकांश मामलों में उसके निर्णय ठीक होते हैं। आमतौर से भलों के प्रति भलाई और बुरों के प्रति बुराई ही फैलती है, ऐसे अटपटे निर्णय तो कभी-कभी ही होते हैं।

कारण यह कि वही वस्तुएँ चमकती हैं जो प्रकाश में आती हैं। सामने वाला भाग ही दृष्टिगोचर होता है। जो चीजें रोशनी में खुली रखी हैं वे साफ-साफ दिखाई देती हैं, हर कोई उनके अस्तित्व पर विश्वास कर सकता है परंतु जो वस्तुएँ अंधेरे में, पर्दे के पीछे, कोठरी में बंद रखी हैं उनके बारे में हर किसी को आसानी से पता नहीं लग सकता। बहुत खोजने वाले, खासतौर से ध्यान देने वाले, तीक्षा परीक्षक बुद्धि वाले लोग ही उन अप्रकट वस्तुओं के संबंध में थोडा- थोडा जान सकते हैं, सर्वसाधारण के लिए वह जानकारी सुलभ नहीं है। दुनियाँ में हर एक मनुष्य के सामने उसकी निजी परिस्थितियाँ और समस्याएँ भी पर्याप्त मात्रा में सुलझाने को पडी रहती हैं, सारा समय लगाकर वे ही कठिनाई से हल हो पाती हैं, इतनी फुरसत किसे है जो दूसरों को गहराई से देखकर तब उस पर कुछ मत निश्चित करे। आमतौर से यही होता है कि जो बात जिस रूप में सामने आ गई, उसे वैसे ही रूप में मान लिया गया। डॉक्टर लोग अपनी दुकानों को सजाने के लिए खाली बोतलों में रंगीन पानी भर कर रख लेते हैं, ग्राहक उन्हें दवाएँ ही समझते हैं, किसे इतनी फुरसत है कि उन बोतलों की जाँच करता फिरे कि इनमें पानी है या दवा? कोई कोई कंजूस लोग बहुत धन-दौलत जमा किए होते हैं,
 
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ ३०

शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 
Shantikunj WhatsApp 8439014110 

सोमवार, 18 अप्रैल 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग १९

अपने सदगुणों को प्रकाश में लाइए

हमारा तात्पर्य यह नहीं कि आप भूलों, त्रुटियों और गलतियों की ओर से ओंखें बंद कर लें और बार-बार उनको दुहराते चलें, आपको चाहिए कि ' भूलों को दूर करने की और पुनरावृत्ति रोकने का भरसक प्रयत्न करें। फिर भी यदि कभी ठोकर खाकर गिर पड़े, प्राचीन बुरे संस्कारों के खिंचाव से परास्त होकर कोई गलती कर बैठें तो उसकी विशेष चिंता न करें। सच्चा पश्चाताप यही है कि दुबारा वैसी गलती न करने का प्रण किया जाए उपवास आदि से आत्मशुद्धि की जाए जिसे हानि पहुँचती है उसकी या उसके समक्ष की क्षति पूर्ति कर दी जाए मन पर जो बुरी छाप पड़ी है अच्छे कार्य की छाप द्वारा हटाया जाए। साबुन से मैला कपडा स्वच्छ किया जाता है, भूलों का परिमार्जन, श्रेष्ठ कार्यों द्वारा करने के लिए खुला द्वार आपके सामने मौजूद है, फिर की अप्रिय स्मृतियों को जगा-जगा कर नित्य दु रू भ्र्राल स्थ्य? व क्या प्रयोजन? यदि सदैव अपने ऊपर दोषारोपण ही करते रहेंगे, अपने को कोसते ही रहेंगे, भर्त्सना, ग्लानि और तिरष्कार में जलते रहेंगे तो अपनी बहुमूल्य योग्यताओं को खो बैठेंगे, अपनी कार्यकारिणी शक्तियों नष्ट कर डालेंगे। अपने को अयोग्य मत मानिए। ऐसा विश्वास मत कीजिए कि आपमें मूर्खता, दुर्भावना, कमजोरी के तत्त्व अधिक हैं।
 
इस प्रकार की मान्यता को मन में स्थान देना झूँठा,भ्रमपूर्ण गिराने वाला और आत्मघाती है। यह किसी भी प्रकार नहीं माना जा सकता कि मानव शरीर के इतने ऊँचे स्थान पर चढ़ता आ आ पहुँचने वाला जीव अपने में बुराइयाँ अधिक भरे हुए हैं। यदि सचमुच ही वह नीची श्रेणी की योग्यताओं वाला होता तो किसी कीट-पतंग या पक्षी की योनि में समय बिताता होता। उन योनियों को उत्तीर्ण करके मनुष्य योनि में, विचार पूर्ण भूमिका में प्रवेश करने का अर्थ ही यह है कि मानवोचित सद्गुणों का पर्याप्त मात्रा में विकास हो गया है। भले ही आप अन्य सद्गुणी लोगों से कुछ पीछे हों पर इसी कारण अपने को पतित क्यों समझें? एक से एक आगे है, एक से एक पीछे है। इसलिए इस प्रकार तो बडे भारी बुद्धिमान को भी कहा जा सकता है क्योंकि उससें भी अधिक बुद्धिमान भी कोई न कोई निकल ही आवेगा। आप अपने को बुद्धिमान और सद्गुणी मानें इसके लिए एक आधार है कि बहुत से लोग आप से भी कम योग्यता वाले हैं। जब इस दुनियाँ में आप से भी कम अच्छाइयों के मनुष्य हैं तो यह मान्यता सत्य है कि आप अधिक बुद्धिमान हैं,अधिक अच्छे हैं,अधिक धर्मनिष्ठ हैं। इस सत्य को खुले ह्रदय से स्वीकार करके गहरे अंतःस्थल में उतार लीजिये कि आपकी सुयोग्यता बढ़ी हुई है,आप श्रेष्ठ हैं,सक्षम है,उन्नतिशील हैं।
 
चौरासी लाख बडे-ब,डे मोर्चे फतह कर चुके हैं, अंतिम मोर्चे पर विजयी होने की तैयारी कर रहे हैं, फिर छोटे- छोटे जीवन प्रसंगों का तो कहना ही क्या? छुट-पुट समस्याएँ जो प्रतिदिन स्वभावत: सामने आया ही करती हैं उनको हल कर लेना, उन पर विजय प्राप्त करना भला यह भी कोई बडी बात है? दस-पाँच असफलताओं के कारण खिन्न मत हूजिएं अपने बारे में गिरे हुए विचार मत रखिए असंख्य सफलताएं प्रतिदिन प्राप्त करते हैं, इससे भी अधिक आगे प्राप्त करेंगे। आप विजय की मूर्तिमान प्रतिमा हैं सफलताएँ आपके लिए बनाई गई है। बढ़ना, उन्नति करना और विजय प्राप्त करना-इन तीन क्रियाओं से आपका भूतकाल का इतिहास भरा पड़ा है, यह क्रम आज भी जारी है और आगे भी जारी रहेगा।
 
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ २८

शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 
Shantikunj WhatsApp 8439014110 

शनिवार, 16 अप्रैल 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग १८

अपने सदगुणों को प्रकाश में लाइए
 
नैपोलियन के बचपन में कोई यह नहीं कहता था कि बड़ा होकर यह किसी काम का निकलेगा। डॉक्टर कैलमर्स और डॉक्टर कुक को उनके अध्यापकों ने स्कूल में से यह कहकर निकाल दिया था कि इन पत्थरों से सिर मारना बेकार है। ' यह उदाहरण बताते हैं कि दूसरे लोग किसी के संबंध में जो कहते हैं वह पूर्णत: सत्य नहीं होता। आमतौर से चंद घटनाओं या बातों से प्रभावित होकर किसी के भले या के हनि का अनुमान लगाया जाता है। इस जल्दबाजी के निर्णय में गलती की बहुत बड़ी संभावना विद्यमान रहती है।

यदि आपको उपरोक्त भावों की तरह लोगों की ओर से निराशा, भर्त्सना, उपेक्षा मिलती है, आपको बुरा या असफल कहा जाता है तो इससे तनिक भी विचलित न हूजिए, मन को जरा भी गिरने न दीजिए। सर्दी, गर्मी के घातक प्रभावों से वस्रों द्वारा अपनी रक्षा करते हैं, मलेरिया या हैजा के कीटाणुओं को दवा के द्वारा शरीर में से मार भगाते हैं, इसी प्रकार आत्मविश्वास द्वारा उन प्रभावों को अपने मस्तिष्क में से निकाल बाहर करिए जो आपको नीच, असफल और मूर्ख ठहराते हैं। यह प्रभाव चाहे आपने स्वयं किया हो या किन्हीं अन्य महानुभावों ने अपनी तुच्छ बुद्धि के कारण संचरित कराया हो, जितनी जल्दी इन निराशाप्रद संक्रामक कीटाणुओं को मस्तिष्क में से मार कर भगा सके भगा दीजिए क्योंकि यह आस्तीन के साँप यदि प्रत्यक्षत: दिखाई नहीं पड़ते तो भी वे आपकी सारी उन्नति के मार्ग को रोक कर भारी विघ्न-बाधा के रूप में खड़े रहते हैं।

कहने वाला कोई कितना ही बडा, कितना ही धनवान, कितना ही प्रतिष्ठित क्यों न हो आप यह मानने को कदापि तत्पर मत हुजिए कि आपके ऊपर ' बुराइयों ने कब्जा जमा लिया है, दुर्भावना से ग्रसित हो गए हैं, 'योग्यता खो बैठे हैं, पाप में डूबे हुए हैं। यह हो सकता है कि अन्य लोगों की भांति आप में भी कुछ दोष हों। यह त्रुटियाँ ऐसी नहीं है जो दूर न हो सकें। भूतकाल में' कुछ ऐसे काम जरूर बन पड़े होंगे जो प्रतिष्ठा को घटाने वाले समझे जाते हों और आगे भी ऐसे अवसर बन पड़ने की संभावना है क्योंकि पूर्णता की मंजिल  क्रमश: पार होती है।
 
फसल अपनी अवधि पर पकती है, आपको ' हटाकर पूर्णता प्राप्त करने के लिए कुछ समय चाहिए पारे को शुद्ध करके रसायन बना देने में वैद्य को कुछ समय लगता है, आपको भी निर्दोष मनोस्थिति तैयार करने के लिए कुछ अवकाश चाहिए यह समय एक जन्म से अधिक भी हो सकता है। पथरीले मार्ग को पार करने में ठोकरें लगने की आशंका रहेगी ही, जिस दुर्गम पर्वत पर आप चढ रहे हैं, उसमें कंकड़- पत्थर पड़े हुए हैं, बहुत बार ठोकरें लगने का क्रम चलता रहेगा।  यदि हर ठोकर पर वेदना प्रकट करने की नीति ग्रहण करेंगे तो यह मार्ग रुदन और पीड़ाओं से भरा हुआ, आनंद रहित हो जाएगा। इसलिए समभूमि, चट्टान, पथरीले मार्ग का हर्ष-विषाद न करते हुए प्रधान लक्ष्य की ओरे आगे बढते चलिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ २७

शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 
Shantikunj WhatsApp 8439014110 

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग १७

अपने सदगुणों को प्रकाश में लाइए

लोग यदि आपके बारे में अच्छे विचार नहीं रखते, आपको बुद्धिमान नहीं मानते, निरुत्साहित करने वाले वचन कहते हैं, तो ' कहने दीजिए। अपने स्वतंत्र विचार रखने का हर एक को अधिकार है, परंह यह आवश्यक नहीं कि आप हर किसी  ऐरे-गैरे, नत्थू-खैरे ', के अविवेक वचनों को वेद वाक्य की तरह स्वीकार करके अपने भविष्य को अंधकारपूर्ण बना लें। कहने वाले कितने ही बुद्धिमान या बडे आदमी सही, पर यह आवश्यक नहीं कि वे जो कुछ कहते हैं बिलकुल सत्य ही कहते हैं। जब आप स्वयं अपने बारे में निर्णय करते हुए गलती करते हैं, सद्गुण प्रधान होते भी अपने को दुर्गुण प्रधान मान बैठते हैं, जब आप अपने निज के बारे में  इतनी. गलती कर सकते हैं तो यह बिलकुल आसान है कि दूसरे लोग जिन्हें आपको ठीक तरह से समझने का मौका नही मिला, गलती करते हों। जैसे आपने एक अच्छे प्रीतिभोज को दो उजड्डों की हरकतों और हलुआ में मिर्च पड जाने के कारण खराब ठहरा दिया था,वैसे ही यह भी संभव है कि दो-चार छोटी-मोटी बाहरी, आकस्मिक घटनाओं को देखकर उन लोगों ने कोई भ्रम धारणा बना ली हो और उसी झूठें विश्वास के कारण समय- समय पर आपकी योग्यता में अविश्वास प्रकट करते हों।
 
पूरी सावधानी के साथ, ठीक प्रकार छान-बीन करके किसी निर्णय पर पहुँचने की फुरसत लोगों को नहीं है, वे जल्दी में जो कुछ थोडा बहुत देख पाते हैं, उसी से अपनी धारण बनाते हैं। कहते हैं कि एक बार अंधों के सामने हाथी खड़ा किया गया। उन्होंने हाथी के एक दो अंगों को छुआ और अपनी अपूर्ण जानकारी के आधार पर बताया कि हाथी कैसा है? हाथी के एक अंग को ही वे लोग पूरा समझकर उसका वैसा रूप बताते थे। भले ही वे अंधे अपने विश्वास के अनुसार सच्चे हों, पर यह आवश्यक नहीं कि उनका कथन यथार्थ ही हो। एक पैर को पकड़ कर जिसने. यह कहा कि हाथी खंभे जैसा है, वह अंधा अपनी समझ से ठीक कहता है पर आप उसकी बात मानने के लिए बाध्य नहीं हैं। प्रत्यक्ष आँखों से यदि हाथी को असली रूप में देख रहे हैं तो आपका कर्त्तव्य है कि अंधों की बात को मानने से इंकार कर दें। कोई आदमी एक विशाल भवन के पिछवाड़े होकर आया-जाया करता है, पर वह उस भवन के पृष्ठ भाग की ही व्याख्या करेगा, उसने आगे का भीतर का भाग नहीं देखा है कभी उधर गया ही नहीं है तो कैसे बता सकता है कि यह भीतर, कैसा सुंदर बना हुआ है। पिछवाडे की टूटी दीवार तक ही उस दर्शक का ज्ञान सीमित है, वह तो उन्हीं बातों को कह सकता है।

प्रसिद्ध चित्रकार पाट्रोडी कोरडोना इतना मंदबुद्धि था कि उसे  गधे का सिर ' कह कर चिढाया जाता था। प्रसिद्ध गणितज्ञ सर आइजक न्यूटन अपने दर्जे में सबसे फिसड्डी लडका था। ऐकम क्लार्क के घर वाले उसे '' महामूढ़ '' कह कर पुकारते_ थे। नादयकार शैरीडन की माता से उसके अध्यापक ने कहा- ऐसे जड़ बुद्धि लड़के से मैं बाज आया, इसे घर ले जाइए। '' सर वाल्टर स्काट के अध्यापक ने अपना मत घोषित किया था कि ' यह लड़का जन्म भर बुद्ध रहेगा। ' लार्ड क्लाइव जिसने भारत में अँग्रेजी राज्य स्थापित किया, ऐसा मूढ़ बुद्धि था कि घर वाले उससे तंग आ गए थे और पीछा. छुडाने के लिए सात समुन्दर पार हिन्दुस्तान को भिजवा दिया था।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ २६

शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 
Shantikunj WhatsApp 8439014110 

बुधवार, 13 अप्रैल 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग १६

अपने सदगुणों को प्रकाश में लाइए
दो-चार छोटी-मोटी बुराइयाँ यदि आप में हैं तो वे विजातीय होने के कारण बार-बार आपका ध्यान खींचेंगी और पूर्ण विवेक एवं निष्पक्ष परीक्षण शक्ति की कमी रही तो संभव है आप कभी बुरे नतीजे पर पहुँच जाएँ। वे बुराइयाँ आपके ध्यान को अपने में उलझाए रहेंगी अच्छाइयों तक दृष्टि न पहुँचने' देंगी। ऐसी दशा में कोई व्यक्ति यह विश्वास कर बैठ सकता है कि मुझ में बुराइयाँ पाप-वासनाएँ दुर्भावनाएँ  अयोग्यताएँ अधिक हैं इससे नीची ही स्थिति में पड़ा रहूँगा आगे और भी नीचा हो जाऊँगा, ऊँचा चढ़ना कठिन है।
ऐसे निराशापूर्ण विचार और विश्वास, भ्रम पूर्ण, एकांगी और आवेश में आकर निश्चय किए हुए होते हैं। 
 
इनमें कोई तथ्य नहीं, इनसे कोई लाभ नहीं, यह निरर्थक विचार प्रेरक शक्ति से बिल्कुल शून्य होने के कारण सर्वथा अग्राह्य हैं। हानि, पतन और झुँझलाहट की आत्मघाती, विषैली भावनाएँ इससे उपजती हैं जिससे हर प्रकार का अपकार ही अधिक होता है।
असल में मानव तत्त्व में ' दुर्गुणों की मात्रा इतनी नहीं है जो सद्गुणों  से अधिक हो, कम से कम इतना तो निश्चित है कि जिनके हाथों में यह पुस्तक है जिनकी आँखें इन पंक्तियों को पढने में रुचि ले रही हैं वे दुर्गुण प्रधान नहीं हैं। आप अपने गुण- अवगुणों पर एक बार पुन: दृष्टिपात कीजिए निष्पक्षता पूर्वक निरीक्षण कीजिए तो हम विश्वास दिलाते हैं कि आपको इस परिणाम पर पहुँचने के लिए विवश होना पडेगा कि आप में 'दुर्गुणों की अपेक्षा सद्गुण अधिक हैं। सचाई इसके लिए मजबूर कि अपने अंदर उच्च ' गुणों की अधिकता को स्वीकार करें। मनुष्य शरीर, इसमें भी शिक्षित, फिर आध्यात्मिक विषयों में दिलचस्पी, यह तीनों एक से बढ़कर एक प्रमाण हैं जो साबित करते हैं कि आप अच्छे हैं, बुद्धिमान हैं, विवेकशील हैं और ऊपर की ओर चल रहे हैं।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ २४

शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 
Shantikunj WhatsApp 8439014110 

मंगलवार, 22 मार्च 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग १५

अपने सदगुणों को प्रकाश में लाइए

सद्गुणों की मनुष्य में कमी नहीं है, जिसे बुरा या दुर्गुणी कहते हैं वह बेशक देव श्रेणी के सुसंस्कृत मनुष्यों से सात्विक गुणों में पीछे है तो भी यथार्थ में ऐसी बात नहीं है, वह बिलकुल बुरा ही हो। निष्पक्ष रीति से यदि उसकी मनःस्थिति का परीक्षण किया जाए तो बुराइयों की ही अधिक मात्रा उसमें न मिलेगी। चौरासी लाख योनियों को पार करता हुआ जो प्राणी मुक्ति के अंतिम प्रवेश द्वार पर आ खड़ा हुआ है वह उतना घृणित नहीं हो सकता जितना कि समझा जाता है। जो विद्यार्थी एम० ए० के प्रथम वर्ष में है, कॉलेज की सर्वोच्च डिग्री प्राप्त करने में जिसे केवल एक ही वर्ष और लगाना शेष रह गया है, क्या आप उसे अशिक्षित, बेपढ़ा -लिखा कहेंगे? आवेश में चाहे जो कह सकते हैं पर शांत अवस्था में यह मानना पडेगा कि इतना अधिक परिश्रम करने के उपरांत इतनी कक्षाओं को उत्तीर्ण करता हुआ जो छात्र एम० ए० के प्रथम वर्ष में है वह पढ़ा है, विद्यावान है।
संभव है आप अपने को, दुर्गुणी अनुभव रहित, अल्पज्ञ, अशक्त या ऐसे ही अन्य दोषों युक्त समझते हैं, दूसरे लोग जब आपका मजाक उडाते हैं मूर्ख बताते हैं विश्वास नहीं करते, नाक- भौं सिकोड़ते है, सहयोग नहीं करते और बार-बार यह कहते हैं कि अभागे हैं, बेवकूफ हैं। नहीं, सदा असफल ही रहेंगे, तो संभव है कि आपका मन बैठ जाता हो और सोचते हों कि इतने लोगों का कहना क्या झूँठ थोडे ही होगा, हो सकता है कि मैं ऐसा ही होऊँ। पिछली अपनी दों-चार असफलताओं की ओर जब ध्यान जाता होगा और उन घटनाओं को लोगों के कथन से जोडकर देखते होंगे तो संभव है मन में यह बात और भी बैठ जाती हों कि हम अशक्त हैं, अल्प बुद्धि हैं, ' सद्गुणों से रहित हैं, हमें इस जीवन में कोई सफलता नहीं मिल सकती।
 
ऐसा भी है कि जब आत्मनिरीक्षण करने बैठते हैं तो विजातीय तत्त्वों पर ही पहले दृष्टि जाती है। किसी प्रीतिभोज में पाँच सौ सभ्य सज्जन उपस्थित हों और उसी में दो उजड्ड शामिल हो जाएँ तो देखने वालों का ध्यान उन उजड्डों की तरफ अधिक आकर्षित होगा। उनकी बेढंगी हरकतें बहुत बुरी लगेंगी, पाँच सौ सभ्य आदमियों की सज्जनता की ओर विशेष ध्यान न जाएगा पर उन दो की करतूतें स्मृति पटल पर गहरी जम जाएँगी। प्रीतिभोज में अनेक सुस्वादिष्ट सामान हों पर हलुआ में मिर्चें गिर पड़ने से उसका स्वाद बिगड़ गया हो तो अनेक सुस्वादिष्ट भोजनों का ध्यान आपको भले ही न रहे पर उस अटपटे हलुए को न भूलेंगे। जब कभी उस प्रीतिभोज का ध्यान आवेगा, उजड्ड आदमियों की हरकतें और मिर्च पड़ा हुआ हलुआ-यह दो बातें जरूर और सबसे पहले याद आवेंगी। शायद आप उन दो ही कारणों से उस भोजन को नापसंद करें। बुराइयों की अपेक्षा अच्छाइयाँ उसमें अधिक थीं, सभ्य आगंतुकों' की और स्वादिष्ट भोंजनों की संख्या अधिक थी तो भी थोडे विजातीय तत्त्वों का मिश्रण आपका ध्यान अधिक खींचने और बुरे निष्कर्ष पर पहुँचाने में समर्थ हो गया।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ २३

शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 
Shantikunj WhatsApp 8439014110 

शनिवार, 19 मार्च 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग १४

त्याग और सेवा द्वारा सच्चे प्रेम का प्रमाण दीजिए।

त्याग के साथ-साथ सेवा भी होनी चाहिए। जिस व्यक्ति को जिस वस्तु की आवश्यकता है, उसे वही दी जाए। कौन क्या चाहता है, इसके आधार पर यह निर्णय नहीं हो सकता कि उसे वही वस्तु मिलनी चाहिए। सन्निपात का रोगी मिठाई माँगता है, पर मिठाई देना तो उससे दुश्मनी करना है। आपका कोई प्रियजन कुमार्ग पर चलता है और उस दुष्कर्म की पूर्ति में आपको सहायक बनाना चाहता है। यदि आप उसकी सहायता करने लगें, तो यह उसके साथ एक भयंकर अपकार करना होगा। आपको सुयोग्य सिविल सर्जन की तरह यह जाँच करनी होगी कि उसे वास्तव में क्या कष्ट है और उसका उपचार किस प्रकार करना चाहिए। हैजे की बीमारी में बड़ी भारी प्यास लगती है, पर सुयोग्य डॉक्टर बीमार को मनमानी मात्रा में पानी नहीं पीने देता।
 
हो सकता है कि रोगी उस समय डॉक्टर से नाराज हो और उसके साथ अभद्र व्यवहार करे, पर डॉक्टर प्रेमी है, इसलिए वह तात्कालिक प्रतिक्रिया की ओर ख्याल नहीं करता और रोगी के दीर्घकालीन हित को अपने मन में रखता हुआ अपना कार्य प्रारंभ करता है।

घर के जिन लोगों की मनोभूमि में जो त्रुटि देखें, उसे दूर करने में प्रयत्नशील रहें। त्याग वृत्ति से उन्हें प्रसन्न रखने का प्रयत्न करें पर कैंची से काट-छाँट कर इन पेड़ों को सुरम्य बनाने के .प्रयत्न में भी न चूकें। ', अन्यथा यदि उनकी कुभावना ओं को सिंचन मिलता रहा तो एक दिन बडे विकृत कंटीले झाड बन सकते हैं। प्रेम के दो अंगों को पूरी तरह हृदयंगम कीजिए-त्याग और सेवा, दान और सुधार। खेती को पानी की जरूरत है, पर निराई की भी कम आवश्यकता नहीं है। दोनों काम एक दूसरे से कुछ विपरीत जान पड़ते हैं, सहायता और सुधार का एक साथ मेल मिलता नहीं दीखता, यह कार्य बड़ा कठिन प्रतीत होता है, इसलिए तो प्रेम करना तलवार की धार पर चलना कहा गया है। प्रेमी को तलवार की धार पर चलना पडता है।

नट अपने घर कें आँगन में कला खेलना सीखता है। आप अपने परिवार में प्रेम की साधना आरंभ कीजिए। शिक्षा से अपने प्रियजनों के अंतःकरणों में ज्ञान की ज्योति जलाइए उन्हें सत-असत का विवेक प्राप्त करने में सहायता दीजिए परंतु सावधान, यह कार्य गुरु की तरह आरंभ न किया जाए अहंकार का इसमें एक कण भी न हो। सेवा का दूध अहंकार की खटाई से फट जाएगा। अहंकार पूर्वक उपदेश करेंगे तो तिरस्कार और उपहास ही हाथ लगेगा। इसलिए जिसमें जो सुधार करना हो वह विनय पूर्वक उसे सलाह देते हुए कहिए या करिए। '' धीरे- धीरे, बार-बार और सद्भावना से '' ढाक को चंदन, कौए को हंस बनाया जा सकता है। आप प्रेम की महान साधना में प्रवृत्त हो जाइए। त्याग और सेवा को अपना साधन बनाइए आरंभ अपने घर से कीजिए। आज से ही अपनी पुरानी दुर्भावनाएँ मन के कोने-कोने से ढूँढकर निकालिए और उन्हें झाडू-बुहार कर दूर फेंक दीजिए। प्रेम की उदार भावनाओं से अंतःकरण को परिपूर्ण कर लीजिए और सगे-संबंधियों के साथ त्याग एवं सेवा का व्यवहार करना आरंभ कर दीजिए।
 
कुछ क्षणों के उपरांत आप एक चमत्कार हुआ देखने लगेंगे। आपका यही छोटा सा परिवार जो आज शायद कलह-क्लेशों का घर बना हुआ है आपको सुख-शांति का स्वर्ग दीखने लगेगा। आपकी प्रेम भावनाएँ आस-पास के लोगों से टकरा कर आपके पास लौट आवेंगी और वे आनंद के भीने- भीने सुगंधित फुहार से छिड़क कर प्रेम के रंग में सरोबोर कर देंगी। प्रेम की पाठशाला का आनंद अनुभव करके ही जाना जा सकता है। विलंब मत कीजिए आज ही आप इसमें भरती हो जाइए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ २१

शुक्रवार, 11 मार्च 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग १३

त्याग और सेवा द्वारा सच्चे प्रेम का प्रमाण दीजिए।

आप प्रेमी बनना चाहते हैं, तो पवित्र प्रेम का अभ्यास पहिले अपने घर से आरंभ कीजिए। प्रेम की प्रारंभिक पाठशाला अपना घर ही हो सकता है। घर के समस्त स्री-पुरुषों, बालक-बालिकाओं से निःस्वार्थ प्रेम करिए। फिर देखिए कि बदले में कितना अधिक प्रेम आपको प्राप्त होता है।

जानना चाहिए कि प्रेम का अर्थ है-त्याग और सेवा। आप घर के हर एक व्यक्ति के पक्ष में स्वार्थों को छोड़िए और जिसे जिस की आवश्यकता है, उसे वह प्रदान कीजिए। वृद्ध आप से शारीरिक सेवा  चाहते हैं, बालक आप के साथ हँसना-खेलना चाहते हैं, भाइयों को आपका आर्थिक सहयोग चाहिए,स्त्री को आपके स्नेह पूर्ण वार्तालाप की आवश्यकता है।
 
 जो जिस वस्तु को चाहता है, उसे वह प्रदान कीजिए परंतु ध्यान रखिए प्रेम कोई व्यापार नहीं है। एक हाथ से देकर दूसरे हाथ से माँगने की नीति प्रेमी को शोभा नहीं दे सकती। वृद्धों से आप आशा मत करिए कि वे आपकी प्रशंसा करें। न भाइयों से यह चाहिए कि कमाऊ होने के नाते आपको कुछ अधिक महत्त्व दें। स्त्री यदि आपकी इच्छानुसार  सेवा-सुभूषा करने में असमर्थ है, तो उस पर झुंझलाएँ मत,क्योंकि आप प्रेमी बनने जा रहे है। प्रेमी देकर माँग नहीं सकता।

दुनियाँ में सारे झगड़ों की जड यह है कि हम देते कम हैं और माँगते ज्यादा हैं। हमें चाहिए यह किं दें बहुत और बदला बिलकुल न माँगे या बहुत कम पाने की आशा रखें। यह नीति ग्रहण करते ही हमारे आसपास के सारे झगड़े मिट जाते हैं। प्रेमी त्याग करता है- उसका त्याग बेकार नहीं जाता, वरन हजार होकर लौट आता है। झगड़ा करने पर जितना बदला मिलता है, उससे अनेक गुना उसे बिना माँगे मिल जाता है। कदाचित कुछ कम भी मिले तो प्रेम से उत्पन्न होने वाले आंतरिक आनंद के मुकाबिले में वह कमी नगण्य है। निरंतर देते रहने का स्वभाव जिसके ह्दयों में स्थान कर लेता है, वह जानते हैं कि स्वर्गीय निर्धन आत्माएँ हर्षान्दोलित करने में कितनी समर्थ हैं। त्याग की दैवी वृत्तियाँ हमारे आसपास के वातावरण को स्वर्गीय संपदाओं से भर देती हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ २०

सोमवार, 7 मार्च 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग १२

त्याग और सेवा द्वारा सच्चे प्रेम का प्रमाण दीजिए।

निःसंदेह आत्मा प्रेममय है। उसे सुख अपने विषय में ही प्राप्त होता है। मछली को पानी में आनंद है, इसके अतिरिक्त और कहीं चैन नहीं। प्राणी का मन तब तक शांति लाभ नहीं कर सकता जब तक कि वह प्रेम में निमग्न न हो जाए। जब तक प्यास नहीं बुझती तब तक हम इधर-उधर भटकते हैं और जब मधुर शीतल जल भर पेट पीने को मिल जाता है तो चित्त ठिकाने आ जाता है, संतोष लाभ करके एक स्थान पर बैठ जाते हैं। सर्प का जब पेट भर जाता है तो वह अपने बिल में प्रवेश कर जाता है, बाहर की उसे कुछ जरूरत नहीं रहती। सीप समुद्र के ऊपर उतराती फिरती है, पर जब स्वाति की बूँद उसमें पड़ जाती है तो मोती को प्राप्त करके समुद्र की तली में बैठ जाती है। आत्मा प्रेम का आनंद लूटने इस भूमण्डल पर आई है, अपनी प्रिय वस्तु को ढूँढने के इधर-उधर भटकती फिरती है। जिस दिन उसे इच्छित वस्तुएँ प्राप्त हो जाएँगी उसी दिन तृप्ति लाभ करके अपने परमधाम को लौट जाएँगी। भव भ्रमण और मुक्ति का यही धर्म है।

हमें बार-बार जन्म इसलिए धारण करना पड़ता है कि प्रेम की प्यास बुझा नहीं पाते। मोह-ममता की मृगतृष्णा में मारे-मारे फिरते हैं भव-बंधनों में उलझते फिरते हैं। जिस दिन हमें सद्गुरु की कृपा से यह समझ आ जाएगा कि जीवन का सार प्रेम है, उस दिन हम शाश्वत प्रेम को अपने अंतःकरण में से ढूँढ निकालेंगे।
 
अंतःकरण में जिस दिन प्रेम भक्ति का अविरल  स्त्रोत फूट निकलेगा, जिस दिन प्रेम गंगा में आत्मा स्नान कर लेगी, जिस दिन प्रेम का सागर हमारे चारों ओर लहरावेगा, उसी दिन आत्मा को तृप्ति मिल जाएगी और वह अपने धाम को लौट जाएगी। सच्चा प्रेमी अपने सुखों की भी इच्छा नहीं करता वरन जिस पर प्रेम करता है उसके सुख  पर अपने सुख को उत्सर्ग कर देता है। लेने का उसे ध्यान भी नहीं, देना ही एक मात्र उसका कर्त्तव्य हो जाता है। जिसके हृदय में प्रेम की ज्योति जलेगी वह गोरे चमडे पर फिसल कर अपने चमारपन का परिचय न देगा और न व्यभिचार की कुदृष्टि रखकर अपनी आत्मा को पाप पंक में घसीटेगा। वह किसी स्त्री के रंग, चमक-दमक, हाव-भाव या स्वर कंठ पर मुग्ध नहीं होगा वरन किसी देवी में उज्ज्वल कर्त्तव्य का दर्शन करेगा तो उसको झुककर प्रणाम करेगा। प्रेमी का दम तो बेकाबू हो सकता है पर दिमाग काबू में रहेगा। वह दूसरों के सुख के लिए त्याग करने में अपने को बेकाबू पावेगा परतु किसी को पतन के मार्ग पर घसीटने का स्मरण आते ही उसकी आत्मा कांप जाएगी। इस दशा में उसका एक कदम भी आगे नहीं बढ सकता। अपने प्रेम पात्र को बदनामी, पतन, दुख, भ्रम और नरक में घसीटने वाला व्यक्ति किसी भी प्रकार प्रेमी नहीं कहा जा सकता, वह तो नरक का कीड़ा है जो अपनी विषय ज्वाला में जलाने के लिए प्रेम पात्र को फँसाकर काँटों में घसीटता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ १९

शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 
Shantikunj WhatsApp 8439014110 

शनिवार, 5 मार्च 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग ११

त्याग और सेवा द्वारा सच्चे प्रेम का प्रमाण दीजिए।

मैंने इतना प्यार दिया पर इसका बदला मुझे क्या मिला?'' ऐसे विचार करने में उतावली न कीजिए। बादलों को देखिए वे सारे संसार पर जल बरसाते फिरते हैं, किसने उसके अहसान का बदला चुका दिया? बडे-बडे भूमि खंडों का सिंचन करके उनमें हरियाली उपजाने वाली नदियों के परिश्रम की कीमत कौन देता है? हम पृथ्वी की छाती पर जन्म भर लदे रहते हैं और उसे मल-मूत्र  से गंदी करते रहते हैं किसने उसका मुआवजॉ अदा किया है। वृक्षों से फल, छाया, लकड़ी पाते हैं पर उन्हें क्या कीमत देते हैं? परोपकार स्वयं ही एक बदला है। त्याग करना आपको भले ही घाटे का सौदा प्रतीत होता हो पर जब आप उपकार करने का अनुभव स्वयं करेंगे तो देखेंगे कि ईश्वरीय वरदान की तरह यह दिव्य गुण स्वयं ही कितना शांतिदायक है, हृदय को कितनी महानता प्रदान करता  है। उपकारी जानता है कि मेरे कार्यों से जितना लाभ दूसरों का होता है उससे  कई गुना स्वयं मेरा होता है। ज्ञानवान पुरुष जो कमाते हैं वह दूसरों को बाँट देते हैं, वे सोचते हैं कि प्रकृति जब जीवन वस्तु मुफ्त दे रही है तो हम अपनी फालतू चीजें दूसरों को देने में कंजूसी क्यों करें ? आप बुरे दिनों और विपत्ति की घड़ियों में भी परोपकार के दिव्य गुण का परित्याग मत कीजिए। जब आप किसी को भौतिक पदार्थ देने में असमर्थ हो तो भी अपनी सद्भावनाएँ  और शुभकामनाएँ दूसरों को देते रहिए।

निःस्वार्थ भावना से जीवन व्यतीत करने वाले के लिए संसार में निरुत्साह, पश्चाताप और दुःख की कोई बात नहीं है। आप जरा सी बात के आवेश में आकर लडने-मरने पर उतारू मत हूजिये वरन अपने विरोधियों पर दया और प्रेम की वर्षा करते रहिए।
 
सद्भावना से दिव्य- दृष्टि मिलती है। जिसके हृदय में समस्त प्राणियों के प्रति सद्भावना भरी हुई है यथार्थ में वही दिव्य ज्ञान का अधिकारी है। मनुष्यों' में देवता वह है जो पवित्र है, निःस्वार्थ है, प्रेमी है, त्याग भावी है। अपन शारीरिक स्वार्थो को परित्याग करने के उपरांत जो संतोष प्राप्त होता है,वह चक्रवर्ती राजा हो जाने के सुख से भी हजारों गुना अधिक है। इसलिए आप स्वार्थ को त्यागने का अभ्यास आरम्भ कीजिए। ज्ञान के द्वारा अपनी पाशविक कंजूस वृत्ति को काबू में लाने का प्रयत्न करिए। तुच्छ स्वार्थों के गुलाम बनने से इंकार कर दीजिए। नम्रता, भलमनसाहत, क्षमा, दया, प्रेम और त्याग भावना को अंदर धारण करने से हृदय में शाश्वत शांति का आविर्भाव होता है। स्वार्थ रहित प्रेम के इस महान नियम में अपने को केंद्रस्थ करना मानो संतोष, शीतलता, विश्राम और ईश्वर को प्राप्त करने के मार्ग पर पदार्पण करना है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ १७

शांतिकुंज की गतिविधियों से जुड़ने के लिए 
Shantikunj WhatsApp 8439014110 

गुरुवार, 3 मार्च 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग १०

त्याग और सेवा द्वारा सच्चे प्रेम का प्रमाण दीजिए।
 
आज नहीं तो कल, हँसकर नहीं तो रोकर आपको किसी दिन त्याग करना ही पडेगा। आप इकट्ठा करते हैं संसार की संपदाएँ अपनी मुट्ठी मैं बाँध लेते हैं' परंतु प्रकृति यह पसंद नहीं करती कि उसकी चलती-फिरती चीजों पर एक व्यक्ति कब्जा करके बैठ जाए वह आपका गला दबा कर मुट्ठी खुलवा लेती है। जब आप कहते हैं कि' ' नहीं मैं न दूँगा। ' उसी क्षण जोर की चपत पडती है और अाप घायल हो जाते है। संसार में कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो प्रत्येक वस्तु  को देने, परित्याग करने के लिए बाध्य न हो। इस अखंड नियम प्रतिकूल आचरण करने के लिए जो जितना ही प्रयत्न करेगा वह अपने को उतना ही दुःखी अनुभव करेगा।

शास्त्र कहते हैं कि मनुष्य जीवन में परोपकार ही सार है, हमें सदैव परोपकार में रत रहना चाहिए। किंतु यह अभिमान, दंभ या कीर्ति के लिए नहीं, आत्म कल्याण के लिए होना चाहिए। मेरे कारण दूसरों का भला हुआ यह सोचना मूर्खता है। हमारे बिना संसार का कोई कार्य अटका न रहेगा। पैदा होने से पहले संसार का सब काम ठीक-ठीक चल रहा था और हमारे बाद भी वैसा ही चलता रहेगा। परमात्मा इतना गरीब नहीं है कि हमारी मदद के बिना उसका काम न चला सके। किसी भिखारी को हमारे ही देने की बड़ी भारी आवश्यकता नहीं है, वह हमारी एक रोटी के बिना भूखा न मर जाएगा।

सच पूछे तो जिसने हमें उपकार करने का अवसर दिया है उसका कृतज्ञ होना चाहिए। हमारी उपकार बुद्धि जाग्रत करके वह हमें ऋणी कर देता है। इससे जो मानसिक उन्नति होती है और आत्मा को जो शक्ति प्राप्ति होती है वह दान लेने वाले को नहीं वरन देने वाले को प्राप्त होती है। दूसरों का उपकार करना मानो एक प्रकार से अपना ही कल्याण करना है। किसी को एक पैसा देकर हम भला उसका कितना भला कर सकते हैं? किंतु उसकी अपेक्षा अपना भला हजारों गुना कर लेते हैं। हमारी उदारता का विकास न होने से संसार को रत्ती भर भी हर्ज न होगा किंतु हमारा ही आनंद स्रोत नष्ट हो जाएगा इसलिए आप परोपकार को अपना जीवन लक्ष्य बनाइए। जितना हो सके दूसरों की भलाई कीजिए इसमें आपका ही भला है, आपका ही लाभ है, आपका ही कल्याण है।
 
त्याग करना, किसी की कुछ सहायता करना, उधार देने की एक वैज्ञानिक पद्धति है। जो हम दूसरों को देते हैं हमारी रक्षित पूँजी की तरह जमा हो जाता है । जो अपनी रोटी दूसरों को बाँट कर खाता है उसको किसी बात की कमी न रहेगी। जो अपनी संपदा को जोड़-जोड़ कर जमा करता जाता है उस पाषाण हृदय को क्या मालुम होगी कि दान में कितनी मिठास है?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ १५

सोमवार, 21 फ़रवरी 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग ९

त्याग और सेवा द्वारा सच्चे प्रेम का प्रमाण दीजिए।

त्याग में कितना मिठास है, इसे बेचारे स्वार्थ परायण और कंजूस भला क्या समझेंगे? जो इस के अमर मिठास का आस्वादन करना चाहते हैं उनकी नीति होनी चाहिये "आप लीजिए-मुझे नहीं चाहिए। '' यही नीति है जिसके आधार पर सुख और शांति का होना संभव है। "मैं लूँगा आपको न दूँगा की नीति को अपनाकर कैकेयी ने अयोध्या को नरक बना दिया था।
 
सारी नगरी विलाप कर रही थी। दशरथ ने तो प्राण ही दे दिए। राजभवन मरघट की तरह शोकपूर्ण हो गया। राम जैसे निर्दोष तपस्वी को वनवास ग्रहण करना पड़ा। किंतु जब '' आप लीजिए- मुझे नहीं चाहिए '' की नीति व्यवहार में आई तो दूसरे ही दृश्य हो गए। राम ने राज्याधिकार को त्यागते हुए भरत से कहा-' बंधु ! तुम्हें राज्य सुख प्राप्त हो, मुझे यह नहीं चाहिए। ' सीता ने कहा- नाथ! यह राज्यभवन मुझे चाहिए मैं तो आपके साथ रहूँगी।'

सुमित्रा ने  लक्ष्मण से कहा-' ' अवध तुम्हार  काम कछु नाहीं। जो पै राम सिय बन जाहीं।। '' पुत्र! जहा राम रहे, वहीं अयोध्या मानते हुए उनके साथ रहो। कैसा स्वर्गीय प्रसंग है। भरत ने तो इस नीति को और भी सुंदर ढंग से चरितार्थ किया। उन्होंने राज-पाट में लात मारी और भाई के चरणों से लिपट कर बालकों की तरह रोने लगे। बोले-' भाई! मुझे नहीं चाहिए इसे तो आप ही लीजिए। ' राम कहते हैं-' भरत! मेरे लिए तो वनवास ही अच्छा है। राज्य सुख तुम भोगो। ' त्याग के इस सुनहरी प्रसंग में स्वर्ग छिपा हुआ है। एक परिवार के कुछ व्यक्तियो ने त्रेता को सतयुग में परिवर्तित कर दिया। सारा अवध सतयुगी रंग में रंग गया। वहां के सुख सौभाग्य का वर्णन करते-करते वाल्मीकी  और तुलसीदास अघाते नहीं है।

प्रभु ने मनुष्य को इसलिए इस पृथ्वी पर नहीं भेजा है कि एक दूसरे को लूट खाए और आपस में रक्त की होली खेलें। परम पिता की इच्छा है कि लोग प्रेमपूर्वक भाई- भाई की तरह आपस में मिल-जुल कर रहें। यह तभी हो सकता है जब त्याग की नीति को प्रधानता दी जाए स्वार्थ की अपेक्षा परमार्थ का अधिक ध्यान रखा जाए।

आप किसी को कुछ दें या उसका किसी प्रकार का उपकार करें तो बदले में किसी प्रकार की आशा न रखें। जो कुछ आप देंगे वह हजार गुना होकर लौट आवेगा परंतु उसके लौटने की तिथि नहीं गिननी चाहिए। अपने में देने की शक्ति रखिए देते चलिए क्योंकि देकर ही फल प्राप्त कर सकेंगे। ध्यानपूर्वक देखिए सारा विश्व आपको कुछ दे रहा है जितने आनंदादायक पदार्थ आपके पास हैं वे सब आपके ही बनाए हुए नहीं हैं वरन वे दूसरों के द्वारा आपको प्राप्त होते हैं फिर आप  दूसरों को देने में इतना संकोच क्यों करते हैं?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ १४

शनिवार, 19 फ़रवरी 2022

👉 आंतरिक उल्लास का विकास भाग ८

प्रेम का अमृत छिड़क कर शुष्क जीवन को सजीव बनाइये

आत्मभाव का प्रयास करिए इससे आसपास रूखी, उपेक्षणीय, अप्रिय वस्तुओं का रूप बिल्कुल बदल जाएगा। विज्ञ लोग कहते हैं कि अमृत छिडकने से मुर्दे उठते हैं। हम कहते हैं कि प्रेम की दृष्टि  से अपने चारों ओर निहारिए मुर्दे सी अस्पृश्य और अप्रिय वस्तुए सजीव और सजीव सर्वांग सुंदर बनकर आपके सामने आनंद नृत्य करने लगेंगी। ऐसा कहा गया है कि पारस को छूकर काला-कलूटा लोहा बहुमूल्य सोना हो जाता है। हम कहते हैं कि सच्चे प्रेम का अरूचिकर और उपेक्षणीय से स्पर्श कराइए वे कुंदन के समान जगमगाने लगेगी। 'दुनियाँ आपको काटने दौडती है, दुर्व्यवहार करती है, सताती है, पाप अंक में धकेलती हैं, इसका कारण एक ही है कि आपके मन मानस में प्रेम का सरोवर सूख गया है, उसमें एकांत शून्यता की सांय-सांय बीत रही है, उसका डरावना अंदर से निकल कर बाहर आ खड़ा होता है और दुनियाँ बुरी दीखने लगती है। जब कोई व्यक्ति दुनियाँ ' से बिलकुल घबराया हुआ, डरा हुआ, निराश, चिढ़ा हुआ सामने आता है और संन्यासी हो जाने का विचार प्रकट करता है तब हम उसके सिर पर हाथ फेरते हुए समझाया करते हैं कि दोस्त इस दुनियाँ में कुछ भी बुरा नहीं है, आओ अपने पीलिया का इलाज करें और संसार का उसके असली आनंददायी रूप में दर्शन करके शांति लाभ करें।

कुटिलता, अनुदारता, कंजूसी और संकीर्णता को छोड़ दीजिए। इसके स्थान पर सरलता और उदारता को विराजमान कीजिए।  मुद्दतों से सूखे पडे हृदय सरोवर को प्रेम के अमृत जल से भर लीजिये। इस सरोवर ' लोगों को पानी पीकर प्यास बुझाने दीजिए,स्नान,करने, शांति लाभ करने दीजिए क्रीडा करके आनंदित होने दीजिए। अपना प्रेम उदारतापूर्वक सबके लिए खुला रखिए। आत्मीयता की शीतल छाया मे थके हुए पथिकों को विश्राम करने दीजिए। प्रेम इस भूलोक का अमृत है, आत्मभाव इसका पारस है। इस सुर दुर्लभ मानव जीवन को सफल बनाना है तो इन दोनों महातत्त्वों को उपार्जित करने से वंचित मत रहिए।

अपने प्रेम रूपी अमृत को चारों ओर छिडक दीजिए जिससे यह श्मशान सा भयंकर दिखाई पड़ने वाला जींवन देवी-देवताओं की क्रीडा भूमि बन जाए। अपने आत्मभाव रूपी पारस को कुरूप लोहा-लंगड से स्पर्श होने दीजिए जिससे स्वर्णमयी इंद्रपुरी बन कर खडी हो जाए। यह स्वर्ग सच्चे विश्ववासियों और दृढ़ निश्चय वालों के लिए बिलकुल सरल और सुसाध्य है। यह : आपके हाथ में है कि इच्छा और प्रयत्न द्वारा जीवन में स्वर्ग का प्रत्यक्ष आनंद उपलब्ध करें।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ १२

👉 परमार्थ की उपेक्षा न करें ( भाग 2)

पुण्य परमार्थ की इस आवश्यकता को प्रायः सज्जन व्यक्ति अनुभव करते हैं। किन्तु उसको कार्यान्वित करने में प्रमाद बरतते हैं। इस प्रमाद का व्यवहार...