शुक्रवार, 5 मार्च 2021

👉 अपनी श्रद्धा को उर्वर एवं सार्थक बनने दें (अंतिम भाग)

विचार- क्रान्ति का मूल यही रत्रतन्त्र चिन्तन है। जन- मानस को उसी की प्राथमिक शिक्षा दी जानी है। अभी हमारी योजना का प्रथम चरण यही है। अगले चरणों में तो अनेक रचनात्मक और अनेक संघर्षात्मक काम करने को पड़े हैं। युग परिवर्तन और घरती पर स्वर्ग का अवतरण अगणित प्रयासों की अपेक्षा रखता है। वह बहुत व्यापक और बहुमुखी योजना हमारे मस्तिष्क में है। उसकी एक हलकी- सी झाकी गत दिनों योजना में करा भी चुके हैं। बह हमारा रचनात्मक प्रयास होगा। संघर्षात्मक पथ एक और ही जिसके अनुसार अवांछनीयता, अनैतिकता एवं अरामाजिकता के विरुद्ध प्रचलित 'घिराव' जैसे भाध्यमों से लेकर समग्र बहिष्कार तक और उतनी अधिक दबाव देने की प्रक्रियाएं सम्मिलित हैं जिससे दुष्टुता भी बोल जाय और उच्छ्खनता का कचू- मर निकल जाय। सजग, समर्थ लोगों की एक सक्रिय  स्वय- सेवक सेना प्राण हथेली पर रखकर खड़ी हो जाय तो आज जिन अनैतिकताओं का चारों और बोलबाला है और जो न हटने वालो न टलने वाली दीखती हैं। आंधी में उड़ते तिनकों की तरह तिरोहित हो जाँयगी।

वे बातें पीछे की हैं आज तो बिचार- क्रान्ति का प्रथम चरण उठाया जाना आवश्यक है ! अभी तो गहरी खुमारी में अवांछनीय रूप से देखने वालों को जगाया जाना ही प्रथम कार्य है जिसके बाद और कुछ सोचा और किया जाना सम्भव है। इसलिए लोक- शिक्षण को अनिवार्य आव श्यकता की पूर्ति के लिए अभी अपना प्रथम अभियान चल रहा है। इसके अन्तर्गत हमें अशुद्ध विचारों के दुष्परिणाम और सद्विचारों की उपयोगिता तथा स्वतन्त्र चिन्तन को पद्धति मात्र मिखानी बतानी है। इसी का क्षेत्र व्यापक बनाना है। परिजनों के समक्ष इस अंक में प्रस्तुत योजना इसी उद्देश्य के लिए उपस्थित की गई है जो सचमुच हमें प्यार करते हों- जो सचमुच हमारे निकट हों- जिन्हें सचमुच हमसे दिलचस्पी हो- उन्हें इसके लिए प्रस्तुत योजना को कार्यान्वित करने के लिए बीस महीने की इम तप- साधना में संलग्न होना ही चाहिये। हमारे लिए यदि कोई कुछ विदाई उपहार देना चाहते हों तो वह इस योजना में सम्मिलित होने के अतिरिक्त और कुछ नहीं दे सकता।

विचार- क्रान्ति के प्रथम चरण की प्रस्तुत योजना के दो आधार हैं। प्रति दिन थोड़ा- थोड़ा अथवा छुट्टी के दिन पूरा समय देना। दूसरी अपनी आजीविका का एक अंश इस पुण्य प्रयोजन में नियमित रूप से लगाना। महीने में एक दिन उपवास ही क्यों न करना पड़े- चाहे किसी आवश्यकता में कटौती ही क्यों न करनी पड़े पर इतना त्याग बलिदान तो किया ही जाना चाहिये। नियमितता से स्वभाव एवं अभ्यास का निर्माण होता है इसलिए एक बार थोड़ा समय या थोड़ा पैसा दे देने से काम न चलेगा इसमें नियमितता जुड़ी रहनी चाहिये। लगातार की नियमितता को ही साधना कहते हैं। जो कम ज्यादा समय या धन खर्च करना चाहें वे वैसा कर सकते हैं। पर होना सब कुछ नियमित हो चाहिये। लगातार चलने से मंजिल पार होती है। एक क्षण की उछाल चमत्कृत तो करती है पर उससे लम्बी मंजिल का पार होना सम्भव नहीं। इसलिए किसी से बड़ी धन राशि की याचना नहीं की है भले ही योड़ा- थोड़ा हो पर नियमित रूप से कुछ करते रहने के लिए कहा गया है।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1986

👉 चिंतन के क्षण Chintan Ke Kshan 5 Mar 2021

◆ समय की चूक पश्चाताप की हूक बन जाती है। जीवन में कुछ करने की इच्छा रखने वालों को चाहिए कि वे अपने किसी भी कर्त्तव्य को भूलकर भी कल पर न डालें जो आज किया जाना चाहिए। आज के काम के लिए आज का ही दिन निश्चित है और कल के काम के लिए कल का दिन निर्धारित है। आज का काम कल पर डाल देने से कल का भार दो-गुना हो जाएगा जो निश्चय की कल के समय में पूरा नहीं हो सकता। इस प्रकार आज का कल पर और कल का परसों पर ठेला हुआ काम इतना बढ़ जाएगा कि वह फिर किसी प्रकार पूरा नहीं किया जा सकता। जिस स्थगनशील स्वभाव तथा दीर्घसूत्री मनोवृत्ति ने आपका काम आज नहीं करने दिया, वह कल करने देगी ऐसा नहीं माना जा सकता। स्थगन-स्थगन को और क्रिया-क्रिया को प्रोत्साहित करती है यह प्रकृति का एक निश्चित नियम है।

◇ जीवन में सफलता के लिए जहाँ परिश्रम एवं पुरुषार्थ की अनिवार्य आवश्यकता है, वहाँ सामयिकता का सामंजस्य उससे भी अधिक आवश्यक है। जिस वक्त को बरबाद कर दिया जाता है उस वक्त में किया जाने के लिए निर्धारित श्रम भी निष्क्रिय रहकर नष्ट हो जाता है। श्रम तभी सम्पत्ति बनता है, जब वह वक्त से संयोजित कर दिया जाता है और वक्त तभी संपदा के रूप में सम्पन्नता एवं सफलता ला सकता है, जब उसका श्रम के साथ सदुपयोग किया जाता है। समय का सदुपयोग करने वाले स्वभावत: परिश्रमी बन जाते हैं जबकि असामयिक परिश्रमी, आलसी की कोटि का ही व्यक्ति होता है। वक्त का सदुपयोग ही वास्तविक श्रम है और वास्तविक श्रम, अर्थ, धर्म, काम मोक्ष का संवाहन पुरुषार्थ एवं परमार्थ है।

◆ यदि हम दिनचर्या नियत निर्धारित कर लें और उस पर सावधानी के साथ चलते रहें तो देखा जाएगा कि शरीर ही नहीं मन भी उसके लिए पूरी तरह तैयार रहता है। पूजा-उपासना, साहित्य-सृजन, व्यायाम आदि के लिए यदि समय निर्धारित हो तो देखा जाएगा कि सारा कार्य बड़ी सुंदरता और सफलतापूर्वक सम्पन्न होता चला जाता है। इसके विपरित यदि आए दिन दिनचर्या में उलट-पुलट की जाती रहे तो अंतरंग की स्वचालित प्रक्रिया अस्त-व्यस्त एवं अभ्यस्त हो जाएगी और हर कार्य शरीर से बलात्कारपूर्वक ही कराया जा सकेगा और वह औंधा-सीधा ही होगा, उसकी सर्वांग पूर्णता की संभावना आधी-अधूरी ही रह जाएगी।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 भक्तिगाथा (भाग ७७)

भक्तवत्सल भगवान के प्रिय भीष्म देवर्षि ने उन्हें सत्कारपूर्वक अपने पास बिठाया और इसी के साथ भक्तिसूत्र के अगले सत्य का उच्चारण किया- ‘तत्तु ...