शनिवार, 7 अक्तूबर 2017

👉 मनुज देवता बने, बने यह धरती स्वर्ग समान (अमृतवाणी भाग 3)

🔴 सफलता साहसिकता के आधार पर मिलती है। यह एक आध्यात्मिक गुण है। इसी आधार पर योगी को भी सफलता मिलती है, तांत्रिक को भी और महापुरुष को भी। हर एक को इसी साहसिकता के आधार पर सफलता मिलती है। वह डाकू क्यों न हो। आप योगी हैं तो अपनी हिम्मत के सहारे फायदा उठायेंगे। नेता हैं, महापुरुष हैं तो भी इसी आधार पर सफलता पायेंगे। यह एक दैवी गुण है। इसे आप अपनी इच्छा के अनुसार इस्तेमाल कर सकते हैं, यह आप पर निर्भर है। इनसान के भीतर जो विशेषता है, वह गुणों की विशेषता है।
  
🔵 देवता अगर किसी आदमी को देंगे तो गुणों की विशेषता देंगे, गुणों की सम्पदा देंगे। गायत्री माता, जिसकी आप उपासना करते हैं, अनुष्ठान करते हैं, अगर कभी कुछ देंगी तो गुणों की विशेषता देंगी। गुणों से क्या हो जाएगा? गुणों से ही होता है सब कुछ। भौतिक अथवा आध्यात्मिक जहाँ कहीं भी आदमी को उन्नति मिली है, केवल गुणों के आधार पर मिली है। श्रेष्ठ गुण न हों तो, न भौतिक उन्नति मिलने वाली है, न आध्यात्मिक उन्नति मिलने वाली है।

🔴 आदमी जितना समझदार है, नासमझ उससे भी ज्यादा है। यह भ्रान्ति न जाने क्यों आध्यात्मिक क्षेत्र में घुस पड़ी है कि देवता मनोकामना पूरी करते हैं, पैसा देते हैं, दौलत देते हैं, बेटा देते हैं, नौकरी देते हैं। इस एक भ्रान्ति ने इतना ज्यादा व्यापक नुकसान पहुँचाया है कि आध्यात्मिकता का जितना बड़ा लाभ, जितना बड़ा उपयोग था, सम्भावनाएँ थीं, उससे जो सुख होना सम्भव था, उस सारी की सारी सम्भावना को इसने तबाह कर दिया।

🔵 देवता आदमी को एक ही चीज देंगे और उनने एक ही चीज दी है, प्राचीनकाल के इतिहास में और भविष्य में भी। देवता अगर जिन्दा रहेंगे, भक्ति अगर जिन्दा रहेगी, उपासना-क्रम यदि जिन्दा रहेगा, तो एक ही चीज मिलेगी और वह है देवत्व के गुण। देवत्व के गुण अगर आएँ तब आप जितनी सफलताएँ चाहते हैं, उससे हजारों-लाखों गुनी सफलताएँ आपके पास आ जाएँगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Story of Kalidas

🔴 Kalidas was a big zero in terms of mental ability and was unattractive physically too. Once he was cutting the very branch he was sitting on.

🔵 Seeing him in this position, the pundits (priests) from the palace thought him to be the right candidate for marrying him off to Vidyotama, who had insulted them. They projected Kalidas as a silent wise person and made him participate in a debate with her over the scriptures. Cunningly they somehow explained his reactions as replies to all her questions in such a manner that she accepted him as husband.

🔴 But on the very first day, truth came out and she threw him out of the house. The sentences she spoke while pushing him out of the house, hurt Kalidas deep within. With great determination he started acquiring knowledge. In the end, that fool with his efforts became the great poet Kalidas and got reunited with Vidyotama.

🌹 From Pragya Puran

👉 आत्मचिंतन के क्षण 7 Oct 2017

🔵 जो स्वास्थ्य की रक्षा के लिए जागरूक नहीं है, उसे देर या सबेर बीमारियाँ आ दबोचेगी। जो काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद,मत्सर सरीखे मानसिक शत्रुओं की गतिविधियों की तरफ से आँखें बन्द किये रहता है, वह कुविचारों और कुकर्मों के गर्त में गिरे बिना नहीं रहेगा। जो दुनिया के छल, प्रपंच, झूठ, ठगी, लूट, अन्याय, स्वार्थपरता, शैतानी आदि की ओर से सावधान नहीं रहता, उसे उल्लु बनाने वाले, ठगने वाले, सताने वाले अनेकों पैदा हो जाते हैं। जो जागरूक नहीं है, उसे दुनियाँ के शैतानी तत्त्व बुरी तरह नोंच खाते हैं।

🔴 जागृत तन्द्रा के तीन दर्जे हैं।
१. लापरवाही २. आलस्य ३. प्रमाद। ये तीनों ही क्रमशः अधिक भयंकर एवं घातक हैं। हम सबको इनसे  बचना चाहिए। इसलिए गायत्री मंत्र हमें सावधान व जागृत रहने का संदेश देता है।

🔵 ‘‘वृद्ध जटायु रावण को परास्त करने में समर्थ न था,तो भी उसने अनीति होते देख कर चुप बैठना उचित न समझा, भिड़ गया। इसमें उसे प्राण त्यागने पड़े पर हारने पर भी वह विजयी से भी अधिक श्रेयाधिकारी बन गया।’’

🔴 वृक्ष धूप, शीत सहते रहते हैं, पर दूसरो को छाया, लकडी और फल-फूल बिना किसी प्रतिफल की आशा के मनुष्यो से लेकर पशु पक्षियों तक को बाँटते रहते हैं। क्या तुम इतना भी नहीं कर सकते बुद्धिमानी की निशानी उपलब्ध साधन और समय का श्रेष्ठतम उपयोग करना है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 जीवन की सफलता का रहस्य (अन्तिम भाग)

🔴 दूसरी बात यह है कि हम लोगों की यह एक विचित्र आदत-सी पड़ गयी है कि जो भी दुष्परिणाम हमको भोगने हैं, जो भी कठिनाईयाँ आपत्तियाँ हमारे सामने आती हैं, उनके लिये हम अपने को दोषी न समझ कर दूसरों के सर दोष मढ़ दिया करते हैं। हमारा यह दृढ़ विश्वास होता है कि इसका कारण हमारे दुष्कृत्य नहीं है। दूसरों को हम दोष देते समय न जाने क्या क्या कह डालते हैं, “अन्धा अपनी नेत्रविहीनता की ओर ध्यान न देकर काने को दोष देता है, कैसी विडम्बना है। संसार बुरा है, नारकीय है, भले लोगों के रहने की यह जगह नहीं है, यही हम लोग मुसीबत के समय कहा करते हैं।

🔵 यदि संसार ही बुरा होता और हम अच्छे होते तो भला हमारा जन्म ही यहाँ क्यों होता? यदि थोड़ा सा भी आप विचार करो तो तुरन्त विदित हो जायगा कि यदि आप स्वयं स्वार्थी न होते तो स्वार्थियों की दुनिया में आपका वास असम्भव था। किसी हरिश्चन्द्र के सामने झूठ बोलने का साहस कोई नहीं कर सकता हमें तो जो कुछ भी मिलता है वह हमारे कर्मों के अनुसार। दूसरों को इसके लिये दोष देना व्यर्थ है। हम अच्छे हो और संसार जिसमें हम रहते हैं, बुरा हो यह हो नहीं नहीं सकता। इससे बढ़ कर असत्य कथन नहीं हो सकता।

🔴 अतः सबसे पहली बात यह है कि हमें दूसरों को किसी प्रकार भी दोषी नहीं ठहराना चाहिये। क्योंकि यदि हमारे कर्म वैसे न होते तो वह दुष्परिणाम हमको न भोगना पड़ता। इसलिये ऐसे समय आत्मनिरीक्षण करना चाहिये और अपने अन्दर जो दोष हों उनको दूर करना चाहिये।

🔵 ऐसा करने से, अनासक्त रहने से, निर्लिप्त रहने से ही हम सुधर सकते हैं। दूसरों की चिन्ता छोड़ कर हमें अपनी चिन्ता करनी चाहिये। संसार के प्राणी ही हमारा अभिप्राय यहाँ मनुष्य से है, संसार को बनाते हैं। यदि मनुष्य का सुधार हो जाये तो संसार में सुख प्राप्त कर सकता है, जीवन में सफल हो सकता है एवं अपने जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।

🌹 समाप्त
🌹 स्वामी विवेकानन्द
🌹 अखण्ड ज्योति- जुलाई 1950 पृष्ठ 6
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/July/v1.9

👉 आज का सद्चिंतन 7 Oct 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 7 Oct 2017



👉 कर्म फल:-

🔴  इन्सान जैसा कर्म करता है कुदरत या परमात्मा उसे वैसा ही उसे लौटा देता है।

🔵  एक बार द्रोपदी सुबह तडके स्नान करने यमुना घाट पर गयी भोर का समय था तभी उसका ध्यान सहज ही एक साधु की ओर गया जिसके शरीर पर मात्र एक लँगोटी थी। साधु स्नान के पश्चात अपनी दुसरी लँगोटी लेने गया तो वो लँगोटी अचानक हवा के झोके से उड पानी मे चली गयी ओर बह गयी।

🔴  सँयोगवस साधु ने जो लँगोटी पहनी वो भी फटी हुई थी। साधु सोच मे पड़ गया कि अब वह अपनी लाज कैसे बचाए थोडी देर मे सुर्योदय हो जाएगा और घाट पर भीड बढ जाएगी।

🔵  साधु तेजी से पानी के बाहर आया और झाडी मे छिप गया। द्रोपदी यह सारा दृश्य देख अपनी साडी जो पहन रखी थी, उसमे आधी फाड कर उस साधु के पास गयी ओर उसे आधी साडी देते हुए बोली-तात मै आपकी परेशानी समझ गयी। इस वस्त्र से अपनी लाज ढँक लीजिए।

🔴  साधु ने सकुचाते हुए साडी का टुकडा ले लिया और आशीष दिया। जिस तरह आज तुमने मेरी लाज बचायी उसी तरह एक दिन भगवान तुम्हारी लाज बचाएगे। और जब भरी सभा मे चीरहरण के समय द्रोपदी की करुण पुकार नारद ने भगवान तक पहुचायी तो भगवान ने कहा-कर्मो के बदले मेरी कृपा बरसती है क्या कोई पुण्य है द्रोपदी के खाते मे।

🔵  जाँचा परखा गया तो उस दिन साधु को दिया वस्त्र दान हिसाब मे मिला जिसका ब्याज भी कई गुणा बढ गया था।

🔴  जिसको चुकता करने भगवान पहुच गये द्रोपदी की मदद करने, दुस्सासन चीर खीचता गया और हजारो गज कपडा बढता गया।

🔵  इंसान यदि सुकर्म करे तो उसका फल सूद सहित मिलता है और दुस्कर्म करे तो सूद सहित भोगना पडता है।

👉 निर्माण से पूर्व सुधार की सोचें (भाग ५)

कुरीतियों की दृष्टि से यों अपना समाज भी अछूता नहीं हैं, पर अपना देश तो इसके लिए संसार भर में बदनाम है। विवाह योग्य लड़के लड़कियों के उपयुक...