बुधवार, 2 जनवरी 2019

👉 समोसे वाला

एक बडी कंपनी के गेट के सामने एक प्रसिद्ध समोसे की दुकान थी, लंच टाइम मे अक्सर कंपनी के कर्मचारी वहाँ आकर समोसे खाया करते थे।

एक दिन कंपनी के एक मैनेजर समोसे खाते खाते समोसे वाले से मजाक के मूड मे आ गये।

मैनेजर साहब ने समोसे वाले से कहा, "यार गोपाल, तुम्हारी दुकान तुमने बहुत अच्छे से maintain की है, लेकीन क्या तुम्हे नही लगता के तुम अपना समय और टैलेंट समोसे बेचकर बर्बाद कर रहे हो.? सोचो अगर तुम मेरी तरह इस कंपनी मे काम कर रहे होते तो आज कहा होते.. हो सकता है शायद तुम भी आज मैंनेजर होते मेरी तरह.."

इस बात पर समोसेवाले गोपाल ने बडा सोचा, और बोला, " सर ये मेरा काम आपके काम से कही बेहतर है, 10 साल पहले जब मै टोकरी मे समोसे बेचता था तभी आपकी जाॅब लगी थी, तब मै महीना हजार रुपये कमाता था और आपकी पगार थी 10 हजार।

इन 10 सालो मे हम दोनो ने खूब मेहनत की..
आप सुपरवाइजर से मॅनेजर बन गये.
और मै टोकरी से इस प्रसिद्ध दुकान तक पहुँच गया.
आज आप महीना 50,000 कमाते है
और मै महीना 2,00,000

लेकिन इस बात के लिए मै मेरे काम को आपके काम से बेहतर नही कह रहा हूँ।

ये तो मै बच्चों के कारण कह रहा हूँ।

जरा सोचिए सर मैने तो बहुत कम कमाई पर धंधा शुरू किया था, मगर मेरे बेटे को यह सब नही झेलना पडेगा।

मेरी दुकान मेरे बेटे को मिलेगी, मैने जिंदगी मे जो मेहनत की है, वो उसका लाभ मेरे बच्चे उठाएंगे। जबकी आपकी जिंदगी भर की मेहनत का लाभ आपके मालिक के बच्चे उठाएंगे।

अब आपके बेटे को आप डाइरेक्टली अपनी पोस्ट पर तो नही बिठा सकते ना.. उसे भी आपकी ही तरह जीरो से शुरूआत करनी पडेगी.. और अपने कार्यकाल के अंत मे वही पहुच जाएगा जहाँ अभी आप हो।

जबकी मेरा बेटा बिजनेस को यहा से और आगे ले जाएगा..
और अपने कार्यकाल मे हम सबसे बहुत आगे निकल जाएगा..

अब आप ही बताइये किसका समय और टैलेंट बर्बाद हो रहा है ?"

मैनेजर साहब ने समोसे वाले को 2 समोसे के 20 रुपये दिये और बिना कुछ बोले वहाँ से खिसक लिये.......!!!

👉 दुःखों का स्वागत कीजिये।

दुःख से लोग बहुत डरते हैं और चाहते है कि वह न आवे, फिर भी न चाहते हुए भी वह आ ही जाता है, इसमें महान ईश्वरीय प्रयोजन है। मनुष्य के अहंकार और दुर्भावों का शमन शोधन करने के लिए दुःख का आगमन ऐसी रामबाण औषधि की तरह साबित होता है जो पीने में कड़वी होते हुए भी व्याधि का नाश कर डालती है। जब नाना प्रकार की यंत्रणाएं, घोर दुःख, संकटों का अपार समूह उमड़ता चला आता है और बाहुबल कुछ काम नहीं करता, शक्तियाँ असमर्थ हो जाती हैं, तब मनुष्य सोचता है कि मुझसे भी ऊँची कोई शक्ति मौजूद है और उस शक्ति का विधान इतना प्रबल है जिसे मैं तोड़ नहीं सकता।

नास्तिकता से आस्तिकता की ओर, अधर्म से धर्म की ओर, अहंकार से नम्रता की ओर ले चलने की क्षमता दुःखों में है। जो मनुष्य हजार उपदेशों से भी कुपथ पर चलने से बाज नहीं आते थे वे विपत्ति की एक करारी ठोकर खाकर तिलमिला गये और ठीक रास्ते पर आ गये। विपत्ति में ईश्वर का स्मरण आता है और अधर्म के दुखद परिणामों को देखकर सुपथ पर चलने की इच्छा होती है। कष्टों की खराद पर घिसे जाने के उपरान्त मनुष्य की बुद्धि, सावधानी, क्रियाशीलता सभी तेज हो जाती हैं। संसार में जितने महापुरुष हुए हैं, वे विपत्तियों की खराद पर खूब रगड़-रगड़ कर घिसे गये हैं तब उनका उज्ज्वल स्वरूप दुनिया को दिखाई पड़ा हैं।

विपत्ति से डरने की कोई बात नहीं है, कष्टों में ऐसा कोई तथ्य नहीं है जो अन्ततः हानिकर सिद्ध हो। एक पहुँचे हुए ईश्वर भक्त का कहना है कि “ईश्वर जिसे अपनी शरण में लेना चाहते हैं उसके पास दुख भेजते हैं ताकि वह मोह को छोड़कर प्रेम के, भक्ति के मार्ग पर पदार्पण करे।”

अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1943 पृष्ठ 13

👉 आज का सद्चिंतन 2 Jan 2019

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 2 Jan 2019


👉 Not run away from challenges

One day, Swami Vivekananda was returning from temple of Ma Kali. On the path, Swamiji saw a number of monkeys who were not allowing him to pass through it. Whenever Swamiji would take a step forward, those monkeys would make a lot of noise and make angry face, showing their anger by shrieking near his feet.

As Swami Vivekananda took a step forward, monkeys got close to him. Swamiji began to run and the monkeys started chasing him. Faster Swamiji ran, bolder monkey got and tried to catch him and bite him.
Just then an old Sanyasi shouted from a distance, "Face them…"

Those words brought Swamiji to senses and he stopped running. He turned back to boldly face them. As soon as Swamiji did that, the monkeys ran away and left.

Moral: We should not run away from challenges; instead we should face them boldly.

👉 आत्मवत् सर्व भूतेषु

यदि हम अपने से चन्द सवाल पूछें और जो उत्तर उन सवालों का हम दूसरों के लिए दें, उन्हें ही अपने ऊपर लागू करें तो हमें सच्चे नागरिक बनने में देर न लगे। यदि मुझ से कोई वस्तु माँग ले जाय तो मैं यह चाहता हूँ या नहीं, कि वह वापिस मिल जाय और वैसी ही अच्छी हालत में जिस हालत में मैंने दी थी? यदि मुझसे किसी ने कोई वायदा किया है तो मैं चाहता हूँ या नहीं, कि वह ठीक तरह से समय पर उसे पूरा करे? यदि मैं सड़क पर चलता हूँ तो मैं चाहता हूँ या नहीं, कि किसी के फेंके हुए केले के छिलके से मैं फिसल न पड़ूं और यदि फिसल पड़ूं तो कोई मेरी सहायता कर मुझे उठा दे और मेरी फिक्र करे न कि मेरा उपहास? मैं चाहता हूँ या नहीं, कि यदि मेरा बच्चा कहीं रास्ता भूल गया हो तो उसे कोई मेरे घर पहुँचा दे और उसे इधर-उधर भटकता न छोड़ दे? यदि मैं किसी सभा में जा रहा हूँ, तो मैं चाहता हूँ या नहीं, कि लोग इस प्रकार बैठे हों, कि मुझे भीतर जाकर बैठने की जगह हो और व्यर्थ एक तरफ भीड़ और दूसरी तरफ कुर्सियाँ खाली न हों? यदि किसी के घर मेरा निमन्त्रण है तो मैं चाहता हूँ या नहीं, कि मेरे पहिले पहुँचने वाले लोगों ने जूता इस तरह उतारा हो कि मुझे भी अपने जूतों को रखने की जगह मिल जाय?

थोड़े में यदि हम सदा यह याद रखें, कि जो हम दूसरों से अपने लिए चाहते हैं, वही दूसरे हम से चाहते हैं, जिससे उन्हें भी आराम और आशाइश मिले और यदि हम उसी के अनुसार कार्य करें तो हम सच्चे और अच्छे नागरिक फौरन बन सकते हें। चाहे हम कितने ही छोटे आदमी क्यों न हों, हम भी काफी हिस्सा देश के लिए सच्चा स्वराज्य प्राप्त करने में ले सकते हैं।

प्रत्येक व्यक्ति को अधिकार है कि वह आशा रखे कि उसके प्रति जो समुचित कर्तव्य दूसरों का है, वे उसका पालन करेंगे। जब हम सड़क पर चलते हैं, तो हमें इसका अधिकार है कि हमको समुचित सुविधा अन्य सब चलने वालों से मिले। पर हमको सदा भय रहता है कि हम पर कोई अपने मकान के ऊपर से कूड़ा फेंक देगा, कोई केले का छिलका इस तरह से फेंकेगा, कि हम उस पर से फिसल कर गिर जायेंगे, कोई साहब आगे से छाता इस तरह से कन्धे पर रखकर चलते होंगे, कि हमारी आँख में उसकी नोंक चुभ जायगी। ऐसा ही भय हम से अन्य भाइयों को रहता है। मेरी तो दृढ़ भावना है, कि जो केले का छिलका सड़क पर फेंकता है, या ठीक तरह से छाता लेकर नहीं चलता, वह स्वराज्य के रास्ते में रोड़ा अटकाता है और स्वराज्य के आने में देर कराता है।

रेल पर चलने वालों का भी यही अनुभव है कि खिड़की के बाहर न थूक कर लोग डब्बे के भीतर थूकते हैं, खाने-पीने के सकोरे पत्तल बाहर न फेंक, भीतर ही छोड़ देते हैं, जिससे दूसरे मुसाफिरों को तकलीफ होती है। जगह रहते भी रात को जो मुसाफिर गाड़ी में आते हैं, वे व्यर्थ ही इतना शोर मचाते हैं, दरवाजा इतने जोर से खोलते बन्द करते हैं, कि दूसरों को बेमतलब कष्ट पहुँचता है। कोई किसी को भीतर नहीं आने देता, आये हुए लोगों को बैठने नहीं देता, स्वयं उतरते समय दरवाजा खुला छोड़ जाता है। यदि हम केवल यह छोटा सा उसूल सदा याद रखें, कि हमें भी दूसरों के साथ वैसा ही बर्ताव करना चाहिए जैसा हम चाहते हैं कि दूसरे हमारे साथ करें, तो हम ऐसी भूल न करेंगे जिसके कारण हम भरोसे के योग्य नहीं रह जाते।

अखण्ड ज्योति मार्च 1943 पृष्ठ 7

👉 आत्मचिंतन के क्षण 2 Jan 2019

◾ अपनी सफलता को ऐतिहासिक स्त्री पुरुषों के कार्यों से तुलना करके नम्रता सीखो। ऊँट तभी तक अपने को ऊँचा समझता है, जब तक पहाड़ के नीचे नहीं आता। अपने से बड़े प्रसिद्ध पुरुषों से मिलते जुलते रहते का उद्योग करो। इस प्रकार की मित्रता आपको अत्यन्त प्रभाव पूर्ण नम्रता की शिक्षा देगी।

◾ आपके शरीर का रचयिता कोई दूसरा नहीं है, आप स्वयं अपने शरीर के रचयिता हैं। आपके भाग्य का रचयिता कोई दूसरा नहीं है अपने भाग्य के विधाता आप स्वयं हैं। विधाता के वचन में जो शक्ति है वही आपके वचन में हैं। विश्वास के साथ जो कहियेगा अवश्य पूरा होगा।

◾ जो वस्तु जितनी ही उत्तम है वह उतने ही कठिन प्रयास से मिलती है। जिनमें दृढ़ता, साहस, पौरुष, पराक्रम लगन की परिश्रम शीलता है वे ही इस सम्पदा के अधिकारी होते हैं। साधना से सिद्धि मिलती है। जो लोग एकाग्रता पूर्वक अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर रहते हैं वे ही विजयीश्री को प्राप्त करते हैं।

◾ किसी भूल अथवा बुरे काम के संबंध में पश्चाताप करना उत्तम है, लेकिन यह तारक होना चाहिए। भविष्य में ऐसा न करने का संकल्प करके सदैप उससे बचते रहने का प्रयत्न करना, ऐसे वातावरण, संग-साथ एवं साधनों से दूर रहना जो बुराई की ओर प्रवृत्त करें, इसके लिए आवश्यक होता है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 अपना मूल्याँकन, आप कीजिये (भाग 1)

एक साधारण परिवार में पल कर अपनी योग्यता, लगन व पुरुषार्थ के बल पर बैजापिनडिजरायली ब्रिटेन के पार्लियामेंट में सदस्य चुने गए, तो धनी परिवार से आये साँसद उन्हें बड़ी उपेक्षा से देखने लगे। न जाने क्यों पुराने सांसद उन्हें अपने पास तक नहीं फटकने देते। शायद इसलिए कि डिजरायली का वेष विन्यास अथवा रहन-सहन राजसी नहीं था। वे साधारण वस्त्र पहनते और गरीब लोगों की तरह रहते। अर्थ प्रधान दृष्टिकोण वाले लोग गरीब व्यक्ति का क्यों कर सम्मान करते? उलटे उनके साथी साँसद उनकी इतनी उपेक्षा करते कि जब वे सदन में बोलने के लिए उठते थे तो उन्हें बोलने तक नहीं देते। लेकिन इन परिस्थितियों में भी डिजरायली का मनोबल नहीं डिगा। जब उनके भाषणों में व्यवधान उपस्थित किया जाता तो वे कहते, आपको एक दिन मेरी बातें अवश्य सुननी पड़ेगी।

यह डिजरायली नहीं उनका आत्मविश्वास बोल रहा था। उन्हें अपनी आन्तरिक शक्तियों पर पूरा विश्वास था। वे अपना उचित मूल्याँकन करना जानते थे। भविष्य के सम्बन्ध में उनके सामने एक सुनिश्चित योजना थी और उस योजना को भी दृढ़तापूर्वक क्रियान्वित करने के लिए वे कृत संकल्प था। इसी का परिणाम था कि अपने प्रयत्न और परिश्रम के बल पर वे एक दिन ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बन गये। लोगों ने उनके प्रति, उनकी योग्यताओं के प्रति इतना विश्वास व्यक्त किया, उन्हें इतना ठीक-ठीक पहचाना कि वे ब्रिटेन के सफल तथा योग्यतम प्रधानमंत्री सिद्ध हुये। पहले जो लोग उनका उपहास किया करते थे वे ही उनके प्रशंसक बन गये और उनका गुणगान करने लगे।

यदि डिजरायली अपने साथियों द्वारा की जाने वाली उपेक्षा से, उनके द्वारा हुए उपहास से हतोत्साहित होकर चुपचाप बैठ जाते, तो संसार उन्हें उस रूप में नहीं जान पाता, जिस रूप में आज जानता है। उनकी सफलता का एक ही कारण है कि उन्होंने अपनी योग्यताओं को पहचाना, अपना मूल्याँकन किया और उसके बल पर सफलता की सीढ़ियां चढ़ते गये। इस संसार का यह विचित्र नियम है कि बाजार में वस्तुओं की कीमत दूसरे लोग निर्धारित करते हैं, पर मनुष्य अपना मूल्याँकन स्वयं करता है और वह अपना जितना मूल्याँकन करता है, उससे अधिक सफलता उसे कदापि नहीं मिल पाली है, प्रत्येक व्यक्ति को, जो जीवन में सफलता प्राप्त करना चाहते हैं तथा आगे बढ़ने की आकाँक्षा रखते हैं उन्हें यह मानकर चलना चाहिए कि परमात्मा ने उसे मनुष्य के रूप में इस पृथ्वी पर भेजते समय उसकी चेतना में समस्त सम्भावनाओं के बीज डाल दिये हैं। इतना ही नहीं उसके अस्तित्व में सभी सम्भावनाओं के बीज डालने के साथ-साथ उनके अंकुरित होने की क्षमताएं भी भर दी है। लेकिन प्रायः देखने में यह आता है कि अधिकाँश व्यक्ति अपने प्रति ही अविश्वास से भरे होते हैं तथा उन क्षमताओं और सम्भावनाओं के बीजों को विकसित तथा अंकुरित करने की चेष्टा तो दूर रही उनके सम्बन्ध में विचार तक नहीं करना चाहते।

.....क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1981 पृष्ठ 13
http://literature.awgp.org/hindi/akhandjyoti/1981/January/v1.13

👉 संस्कारो पर नाज

बेटा अब खुद कमाने वाला हो गया था ... इसलिए बात-बात पर अपनी माँ से झगड़ पड़ता था ये वही माँ थी जो बेटे के लिए पति से भी लड़ जाती थी। मगर अब ...