शनिवार, 30 अप्रैल 2016

शिष्य संजीवनी (भाग 39):- एक उलटबाँसी काटने के बाद बोने की तैयारी

शिष्य संजीवनी को शिष्यों ने अजस्र स्रोत के रूप में अनुभव किया है। इसके चिंन्तन्- मनन से उन्हें शिष्यत्व की सुगन्धि और पुष्टि का अहसास होता है। इससे उनकी भावनाएँ न केवल प्रगाढ़ होती हैं, बल्कि पवित्र भी होती हैं। इस क्रम में कइयों के मन में प्रश्र उठना स्वाभाविक है कि आयुर्वेद आदि चिकित्सा शास्त्र के ग्रन्थों में प्रत्येक संजीवनी के साथ अनुपान की विधि क्या है? सचमुच ही यह प्रश्र सार्थक है। प्रश्रकत्ताओं की भावनाओं की सघनता को दर्शाता है। इसके उत्तर में यही कहना है कि जो शिष्य संजीवनी का सेवन कर रहे हैं अथवा करना चाहते हैं, उन्हें इस उत्तम औषधि का सेवन अपनी समर्पित भावनाओं के साथ करना चाहिए। ये समर्पित भावनाएँ ही इस औषधि का अनुपान हैं।

इस अनुपात के साथ यह औषधि अनेकों गुना प्रभावी हो जाती है। इसके शुभ परिणामों में भारी बढ़ोत्तरी हो जाती है। जो इस महासत्य को अनुभव कर रहे हैं, उन्हें अपनी नीरव भावनाओं में उस दिव्य तत्त्व की अनुभूति होती है- जो शिष्यत्व का सार है। यह क्या है? किस तरह है? इसके लिए शिष्य संजीवनी के नवें सूत्र पर चिंन्तन् करना होगा। इसमें शिष्यत्व की साधना करने वाले श्रेष्ठ साधक कहते हैं- ‘समर्पित भावनाओं की प्रगाढ़ता में नीरवता प्रकट होती है। यह नीरवता ही वह परम शान्ति है, जिसकी कामना सभी साधक करते हैं। इस शान्ति से ही परा वाणी की अनुगूंज प्रकट होती है।

वह वाणी अपने परम मौन में शिष्य को कहती है कि काट तो तुम चुके अब तुम्हें बोना चाहिए। यह वाणी- शिष्य के अन्तःकरण की परम शान्ति एवं सघन नीरवता का ही एक रूप है। यह स्वयं तुम्हारे सद्गुरु के स्वर हैं। उन्हें विश्वास है कि तुम उनके आदेश का पालन करोगे। इस अवस्था में तुम अब ऐसे शिष्य हो जो अपने पैरों पर खड़ा हो सकता है। तुम ब्राह्मी चेतना के संकेतों को सुन सकते हो, देख सकते हो, बोल सकते हो। ऐसा इसलिए हो सका है, क्योंकि तुमने अपनी वासनाओं को जीत लिया है और आत्मज्ञान प्राप्त कर लिया है।

क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
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आध्यात्मिक शिक्षण क्या है? (भाग 5)


कौन मना करेगा? कोई नहीं करेगा। खिला हुआ फूल बीबी के हाथ में रख दिया जाय, तो बीबी मना करेगी क्या? नाक से लगाकर सूँघेगी छाती से लगा लेगी और कहेगी कि मेरे प्रियतम ने गुलाब का फूल लाकर के दिया है। मित्रो! फूल को हम क्या करते हैं? उस सुगंध वाले फूल को हम पेड़ से तोड़कर भगवान् के चरणों पर समर्पित कर देते हैं और कहते हैं कि हे परम पिता परमेश्वर! हे शक्ति और भक्ति के स्रोत! हम फूल जैसा अपना जीवन तेरे चरणारविन्दों पर समर्पित करते हैं। यह हमारा फूल, यह हमारा अंतःकरण सब कुछ तेरे ऊपर न्यौछावर है।

हे भगवान्! हम तेरी आरती उतारते हैं और तेरे पर बलि बलि जाते हैं। हे भगवान्! तू धन्य है। सूरज तेरी आरती उतारता है, चाँद तेरी आरती उतारता है। हम भी तेरी आरती उतारेंगे। तेरी महत्ता को समझेंगे, तेरी गरिमा को समझेंगे। तेरे गुणों को समझेंगे और सारे विश्व में तेरे सबसे बड़े अनुदान और शक्ति प्रवाह को समझेंगे। हे भगवान्! हम तेरी आरती उतारते हैं, तेरे स्वरूप को देखते हैं। तेरा आगा देखते हैं, तेरा पीछा देखते हैं, नीचे देखते हैं। सारे मुल्क में देखते हैं। हम शंख बजाते हैं। शंख एक कीड़े की हड्डी का टुकड़ा है और वह पुजारी के मुखमंडल से जा लगा और ध्वनि करने लगा। दूर दूर तक शंख की आवाज पहुँच गयी। हमारा जीवन भी शंख की तरीके से जब पोला हो जाता है।

इसमें से मिट्टी और कीड़ा जो भरा होता है, उसे निकाल देते हैं।जब तक इसे नहीं निकालेंगे, वह नहीं बजेगा मिट्टी को निकाल दिया, कीड़े को निकाल दिया। पोला वाला शंख पुजारी के मुख पर रखा गया और वह बजने लगा। पुजारी ने छोटी आवाज से बजाया, छोटी आवाज बजी। बड़ी आवाज से बजाया, बड़ी आवाज बजी। हमने भगवान् का शंख बजाया और कहा कि मैंने तेरी गीता गाई। भगवान्! तूने सपने में जो संकेत दिये थे, वह सारे के सारे तुझे समर्पित कर रहे हैं। शंख बजाने का क्रियाकलाप मानव प्राणियों के कानों में, मस्तिष्कों में भगवान् की सूक्ष्म इच्छाएँ आकांक्षाएँ फैलाने का प्रशिक्षण करता है।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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गुरुवार, 28 अप्रैल 2016

आध्यात्मिक शिक्षण क्या है? भाग 4


मित्रो! हमने दीपक जलाया और कहा कि ऐ दीपक! जल और हमको भी सिखा। ऐ कम हैसियत वाले दीपक, एक कानी कौड़ी की बत्ती वाले दीपक, एक छटाँक भर तेल लिए दीपक, एक मिट्टी की ठीकर में पड़े हुए दीपक! तू अंधकार में प्रकाश उत्पन्न कर सकता है। मेरे जप से तेरा संग ज्यादा कीमती है। तेरे प्रकाश से मेरी जीवात्मा प्रकाशवान हो, जिसके साथ में खुशियों के इस विवेक को मूर्तिवान बना सकूँ। शास्त्रों में बताया गया है तमसो मा ज्योतिर्गमय’’। ऐ दीपक! हमने तुझे इसलिए जलाया कि तू हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चले तमसो मा ज्योतिर्गमय अंतरात्मा की भूली हुई पुकार को हमारा अंतःकरण श्रवण कर सके और इसके अनुसार हम अपने जीवन को प्रकाशवान बना सकें।

अपने मस्तिष्क को प्रकाशवान बना सकें।दीपक जलाने का यही उद्देश्य है। सिर्फ भावना का ही दीपक जलाना होता, तो भावना कहती कि दीपक जला लीजिए तो वही बात है, मशाल जला लीजिए तो वही बात है, आग जला लीजिए तो वही बात है। स्टोव को जला लीजिए, बड़ी वाली अँगीठी, अलाव जलाकर रख दीजिए। इससे क्या बनने वाला है और क्या बिगड़ने वाला है? आग जलाने से भगवान् का क्या नुकसान है और दीपक जलाने से भगवान् का क्या बनता है? अतः ऐ दीपक! तू हमें अपनी भावना का उद्घोष करने दे।

साथियो! हम भगवान् के चरणारविन्दों पर फूल चढ़ाते हैं। हम खिला हुआ फूल, हँसता हुआ फूल, सुगंध से भरा हुआ फूल, रंग बिरंगा फूल ले आते हैं। इसमें हमारी जवानी थिरक रही है और हमारा जीवन थिरक रहा है। हमारी योग्यताएँ प्रतिभायें थिरक रही हैं। हमारा हृदयकंद कैसे सुंदर फूल जैसे है। उसे जहाँ कहीं भी रख देंगे, जहाँ कहीं भी भेज देंगे, वहीं स्वागत होगा। उसे कुटुम्बियों को भेज देंगे, वे खुश। जब लड़का कमा कर लाता है। आठ सौ पचास रुपये कमाने वाला इंजीनियर पैसा देता है, तो सोफासेट बनते हुए चले जाते हैं। माया घर में आती हुई चली जाती है।


क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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शिष्य संजीवनी (भाग 38) : जैविक प्रवृत्तियों को बदल देती है सदगुरु की चेतना

शोर का रूपान्तरण शान्ति में- यह शिष्य की श्रद्धा का सुफल है। यह उसकी भक्ति का सत्परिणाम है। जो इस नीरवता में अविचल भाव से अपने सद्गुरु को पुकारता रहता है। उसे ही मार्ग की सिद्धि मिलती है। यह मार्ग बाहरी दुनिया का मार्ग नहीं है। यह अन्तजर्गत की यात्रा का पथ है। यह ऐसा मार्ग है, जो शिष्य की चेतना को सद्गुरु की चेतना से जोड़ता है। बड़ा दुर्लभ पथ है यह। जिसे मिल चुका है, वे परम सौभाग्यशाली हैं क्योंकि वे सतत्- निरन्तर अपने सद्गुरु के सम्पर्क में रहते हैं। उनकी कृपा वर्षा को अनुभव करते हैं।

इस मार्ग को उपलब्ध करने वाले साधकों का अनुभव यही कहता है कि उनके सद्गुरु इस लोक में हों, या फिर किसी सुदूर लोक में, कोई अन्तर नहीं पड़ता। जिसे मार्ग मिल सका है, उसके कई चिह्न उनके जीवन में प्रकट हो जाते हैं। इन चिह्नों में सबसे महत्त्वपूर्ण चिह्न है, देहभाव का विलीन हो जाना। आचार्य शंकर कहते हैं देहादिभाव परिवर्तयन्त, परिवर्तित हो गए हैं देहभाव जिसके। इसका सार अर्थ इतना ही है कि उस पर बरसने वाली सद्गुरु की कृपा चेतना उसकी जैविक प्रवृत्तियों को आमूल- चूल बदल देती है। सच्चे शिष्य की देह दिखने में तो जस की तस बनी रहती है, पर उसकी प्रवृत्तियाँ घुल जाती हैं, धुल जाती हैं।

जैविक प्रवृत्तियों के रूपान्तरण के साथ ही शिष्य सतत् और निरन्तर अपने सद्गुरु की चेतना के लिए ग्रहणशील होता है। उसमें प्रकट होता है अडिग विश्वास, प्रबल निश्चय और व्यापक आत्मबोध। गुरुदेव उसे अपनी आत्मचेतना में स्वीकार लेते हैं। शिष्य उनकी सर्वव्यापी चेतना का अभिन्न अंश बन जाता है। उसके व्यक्तित्व से ऐसा प्रकाश फूटता है, जिससे कि उससे मिलने वालों का जीवन प्रकाशित हो जाता है। जिन्हें भी इसकी प्राप्ति हो सकी है, उन सभी के अन्तःकरण शान्ति से आप्लावित हो उठते हैं। इस सत्य के भेद और भी हैं। अगला सूत्र इस सत्य के नए आयाम उद्घाटित करेगा। 

क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
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मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

शिष्य संजीवनी (भाग 37): जैविक प्रवृत्तियों को बदल देती है सदगुरु की चेतना

शिष्य संजीवनी का यह सूत्र जितना गहन है, उतना ही रहस्यमय भी। इसे सही- सही वही अनुभव कर सकते हैं, जो अपने अन्तःकरण के महारण्य में मार्ग खोजने में लगे हैं। जो इस महत्कार्य में सम्पूर्ण तल्लीनता व तन्मयता से तत्पर हैं, उन्हीं में इस सूत्र से बिखर रही प्रकाश किरणें अवतरित हो पाएँगी। इस सूत्र के पहले जो भी सूत्र बताए गए थे, यह सूत्र उन सभी की अपेक्षा अति विशिष्ट है। इसकी पहली पंक्ति ‘भयंकर आँधी के पश्चात् जो निस्तब्धता छा जाती है, उसी में फूल खिलने की प्रतीक्षा करो, उससे पहले नहीं।’ सभी पंक्तियों का सार है।

हम सभी साधक- जो वर्षों से साधना कर रहे हैं, उनमें से प्रायः सभी को आँधियों का अनुभव है। हम सभी के अन्तर्गगन आँधियों के धूल- गुबार से भरे हुए हैं। संस्कारों, प्रवृत्तियों एवं कर्मों के भयावह जंगल में ये आँधियाँ जोर- शोर से उठती हैं। शुरूआती दौर में हम ज्यों- ज्यों साधना करते हैं, त्यों- त्यों इनका शोर बढ़ता है। आँधी की गर्द- गुबार तेज होती है। कभी- कभी तो इनके बढ़ने की दर साधना के बढ़ने के हिसाब से ही तेज होती है।

बड़ी विकट एवं विपन्न स्थिति होती है इस समय साधक की। ऐसे में उसके लिए गुरुभक्ति का ही सहारा होता है। गुरुभक्ति का रक्षा कवच ही उसे सुरक्षा प्रदान करता है। जो इस सुरक्षा का सम्बल बनाए अन्त तक टिके रहते हैं, उनके जीवन में आँधियों का यह शोर कम हो जाता है और इसका स्थान एक नीरव- निस्तब्धता ले लेती है।

क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
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आध्यात्मिक शिक्षण क्या है? भाग 3 ( 26 April 2016)

 
मित्रो! आध्यात्मिक व्यक्ति बनने के लिए पूजा की क्रिया करते- करते हम मर जाते हैं। यह आध्यात्मिक शिक्षण है। यह शिक्षण हमको सिखलाता है कि धूपबत्ती जलाने के साथ साथ में हमको यह विचार करना है कि यह हमारे भीतर प्रकाश उत्पन्न करती है। दीपक लेकर हम बैठ जाते हैं। दीपक जलता रहता है। रात में भगवान् को दिखाई न पड़े, बात कुछ समझ में आती है; लेकिन क्या दिन में भी दिखाई नहीं पड़ता? दिन में भगवान् के आगे दीपक जलाने की क्या जरूरत है? इसकी जरूरत नहीं है।

कौन कहता है कि दीपक जलाइए क्यों हमारा पैसा खर्च कराते हैं? क्यों हमारा घी खर्च कराते हैं। इससे हमारा भी कोई फायदा नहीं और आपका भी कोई फायदा नहीं। आपकी शक्ल हमको भी दिखाई पड़ रही है और बिना दीपक के भी हम आपको देख सकते हैं। आपकी आँखें भी बरकरार हैं; फिर क्यों दीपक जलाते हैं और क्यों पैसा खराब करवाते हैं?

मित्रो! सवाल इतना छोटा सा है, लेकिन इसके निहितार्थ बहुत गूढ़ हैं। इसका सम्बन्ध भावनात्मक स्तर के विकास से है। दीपक प्रकाश का प्रतीक है। हमारे अंदर में प्रकाश और सारे विश्व में प्रकाश का यह प्रतीक है। अज्ञानता के अंधकार ने हमारे जीवन को आच्छादित कर लिया है। उल्लास और आनन्द से भरा हुआ, भगवान् की सम्पदाओं से भरा हुआ जीवन, जिसमें सब तरफ विनोद और हर्ष छाया रहता है; लेकिन हाय रे अज्ञान की कालिमा! तूने हमारे जीवन को कैसा कलुषित बना दिया? कैसा भ्रान्त बना दिया? स्वयं का सब कुछ होते हुए भी कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता।

सब कुछ तो हमारे पास है, पर मालूम पड़ता है कि संसार में हम ही सबसे ज्यादा दरिद्र हैं। हमारे पास किसी चीज की कमी है क्या? हमारे मन की एक एक धारा ऐसी निकलती है कि हमको हँसी में बदल देती है; लेकिन हमको हर वक्त रूठे रहने का मौका, नाराज रहने का मौका, शिकायतें करने का मौका, छिद्रान्वेषण करने का मौका, देश घूमने का मौका, विदेश घूमने का मौका ही दिखाई देता है। सारा का सारा जीवन इसी अशांति में निकल गया।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 23 अप्रैल 2016

आध्यात्मिक शिक्षण क्या है? भाग 2


 
साथियो! आपने हर हाल में समाज की सेवा की; लेकिन जब चुनाव में खड़े हुए, तो एमपी एमएलए के लिए लोगों ने आपको वोट नहीं दिया और दूसरे को दे दिया। इससे आपको बहुत धक्का लगा। आपने कहा कि भाई। हमने तो अटूट सेवा की थी; लेकिन जनता ने चुनाव में जीतने ही नहीं दिया। ऐसी खराब है जनता। भाड़ में जाये, हम तो अपना काम करते हैं। हमें चुनाव नहीं जीतना है।
 
उपासना में भी ऐसी ही निष्ठा की आवश्यकता है। आपने पत्थर की एकांगी उपासना की और एकांगी प्रेम किया। उपासना के लिए, पूजा करने के लिए हम जा बैठते हैं। धूपबत्ती जलाते हैं। धूपबत्ती क्या है? धूपबत्ती एक कैंडिल का नाम है। एक सींक का नाम है। एक लकड़ी का नाम है। वह जलती रहती है और सुगंध फैलाती रहती है।

सुगंध फैलाने में भगवान् को क्या कोई लाभ हो जाता है? हमारा कुछ लाभ हो जाता है क्या? हाँ, हमारा एक लाभ हो जाता है और वह यह कि इससे हमें ख्याल आता है कि धूप बत्ती के तरीके से और कंडी के तरीके से हमको भी जलना होगा और सारे समाज में सुगंध फैलानी होगी। इसलिए हमारा जीवन सुगंध वाला जीवन, खुशबू वाला जीवन होना चाहिए।

धूपबत्ती भी जले और हम भी जलें जलने से सुगंध पैदा होती है। धूपबत्ती को रखा रहने दीजिए और उससे कहिए कि धूपबत्ती सुगंध फैलाएँगी धूपबत्ती कहती है कि मैं तो नहीं फैलाती। क्यों? जलने पर सुगंध फैलाई जा सकती है। जलना होगा। इसीलिए मनुष्य को जीवन में जलना होता है। धूपबत्ती की तरह से सुगंध फैलानी पड़ती है।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शिष्य संजीवनी (भाग 36) : हों, सदगुरु की चेतना से एकाकार


 लेकिन जब तक शिष्य का सम्पूर्ण देहभाव विघटित होकर घुल न जाएगा, जब तक समूची अन्तःप्रकृति आत्म सत्ता से पूर्ण हार मानकर उसके अधिकार में न आ जाएगी तब तक महासिद्धि के फूल नहीं खिल सकते। यह पुण्य क्षण तो तब आता है जब एक ऐसी शान्ति का उदय होता है, जो गर्म प्रदेश में भारी वर्षा के पश्चात छाती है। इस गहन और नीरव शान्ति में ही यह रहस्यमय घटना घटित होती है। जो सिद्ध कर देती है कि मार्ग प्राप्ति हो गयी है।

यह क्षण बड़ा मार्मिक है। सिद्धि के ये फूल बड़े अनोखे हैं। इनकी महक भी बड़ी अनूठी है। इन क्षणों के मर्म को वही अनुभव करते हैं जो इन्हें जी रहे हैं। जिनके हृदय अपने सद्गुरु के प्रति श्रद्धा व समर्पण की सघनता से भरे हुए हैं। वे ही इस सत्य की संवेदना का स्पर्श कर पाते हैं। क्योंकि यही वे क्षण हैं जब शिष्यत्व का कमल सुविकसित व सुवासित होता है।

इन्हीं क्षणों में शिष्य की ग्रहण शक्ति जाग्रत् होती है। इस जागृति के साथ- साथ विश्वास, बोध और निश्चय भी प्राप्त होते हैं। ध्यान रहे, ज्यों ही शिष्य सीखने के योग्य हो जाता है, त्यों ही वह स्वीकृत हो जाता है। वह शिष्य मान लिया जाता है और परम पूज्य गुरुदेव उसे अपनी आत्म चेतना में ग्रहण कर लेते हैं।
 
यह घटना विरल होने पर भी सुनिश्चित है। क्योंकि जिस किसी शिष्य ने अपने शिष्यत्व का दीप जला लिया है, उसकी धन्यता छुपी नहीं रहती। उसके दीप की सुप्रकाशित ज्योति सब ओर फैले बिना नहीं रहती। अभी तक इस सूत्र के पहले जो भी नियम बताए गए हैं, वे नियम प्रारम्भिक हैं। ये और बाद में बताए जाने वाले अन्य सभी नियम परम- प्रज्ञा के मन्दिर की दीवारों पर लिखे हैं। जो शिष्य हैं- वे अच्छी तरह से जान लें कि जो मांगेंगे उन्हें जरूर मिलेंगे। जो पढ़ना चाहेंगे, वे अवश्य पढ़ेंगे और जो सीखना चाहेंगे, वे निश्चित रूप से सीखेंगे। इस सूत्र को पढ़ने वाले शिष्यों- इस पर गहन मनन करो। इस पर मनन करते हुए तुम्हें अविचल शान्ति प्राप्ति हो।
 
क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Devo/jaivic

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2016

Mutiny against faith and belief, thy name is corruption



Corruption - is not a thing, it is not an external object. It is an internal flaw in the character of a human being, which shakes up his moral and ethical foundations. It is a mental affliction.

Corruption pierces the boundaries of religion, sect, culture, society, history, clans and shows its presence everywhere. Today government, administration, politics, even our social life nothing is left untouched by corruption.

It has become an incurable epidemic. This is a global problem, it’s not about a country or a society.

Acharya Kautilya has described corruption in his epic work - Arthashastra (Science of means) - in the following way – “It is possible to track the flight of a bird flying high up in the sky, but its impossible to track the activities of people who abduct money from the royal treasury”.

Acharya Kautilya describes eight forms of corruption. They are - Suppression, Use, Behavior, Concealment, Deprivation, Consumption, Alteration and Forfeiture. In other words - pratibaṅdha or creating obstruction, prayoga or inappropriate usage, vyavahara or illicit trading, avastāra or faking accounts, pariahāyana or encouraging tax evasion, upabhoga or misappropriating funds for one’s own use, parivartana or exchange and apahāra or plundering.

General Nejushen has termed corruption as - Cancer of a nation. And according to him corruption is a product of a perverted mind. When a whole society becomes corrupt, it adversely affects the moral gauge of people and organizations. In them instead of honesty and truthfulness, selfishness and deceit flourish.

A Muslim scholar - Ibn Khaldun, 'Abd al-Rahman (1332-1406) has stated, “When a person gives in to consumerism, the desire to earn more than the current wages becomes quite strong”.

To achieve this he wants to break all the moral rules and boundaries and where this happens the "chain reaction" of corruption starts.

The word corruption is used in three contexts - bribes, extortion and favoritism.

All the three are of similar nature. If we analyze them, it would be like so - It always happens between more than one person. When a single person commits this crime its called cheating but when it transpires between a group of people its called corruption.

Chiefly it’s done in secret, behind closed doors. People deliberate between themselves and then for their own vested interests take action. Here, in such a fraud there is no explicit breaking of laws, but the fraud is executed with systematic precision.

Drafting a law cannot be the only option available to eradicate corruption. An individual’s strong moral character, honesty and courage are a must to tackle this vile demon. It requires both inner and outer strength to deal with the evils of corruption.

Therefore, people need to be educated to prevail over their weakness of greed (one’s own personal interest) and attachment (the interest of the near and dear ones) and become brave to act and be strong in character.

The widespread evil of corruption can be eradicated only when such thoughts and intents arise in people’s minds and they act on it.

- Pt. Shriram Sharma Acharya
Akhand Jyoti May 2001 - Page 30

आस्था और विश्वास के प्रति विद्रोह का नाम है भ्रष्टाचार



 
भ्रष्टाचार भौतिक पदार्थ नहीं है। यह मनुष्य की अंतर्निहित चारित्रिक दुर्बलता है। जो मानव के नैतिक मूल्य को डिगा देती है। यह एक मानसिक समस्या है। भ्रष्टाचार धर्म, संप्रदाय, संस्कृति, सभ्यता, समाज, इतिहास एवं जाति की सीमाएँ भेदकर अपनी व्यापकता का परिचय देता है। वर्तमान समय में शासन, प्रशासन, राजनीति एवं सामाजिक जीवनचक्र भी इससे अछूते नहीं हैं। इसने असाध्य महामारी का रूप ग्रहण कर लिया है। यह किसी एक समाज या देश की समस्या नहीं है वरन् समस्त विश्व की है।

आचार्य कौटिल्य ने अपनी प्रसिद्ध कृति “अर्थशास्त्र' में भ्रष्टाचार का उल्लेख इस तरह से किया है,” अपि शक्य गतिर्ज्ञातुं पततां खे पतत्त्रिणाम्| न तु प्रच्छन्नं भवानां युक्तानां चरतां गति। अर्थात् आकाश में रहने वाले पक्षियों की गतिविधि का पता लगाया जा सकता है, किंतु राजकीय धन का अपहरण करने वाले कर्मचारियों की गतिविधि से पार पाना कठिन है। कौटिल्य ने भ्रष्टाचार के आठ प्रकार बताये हैं। ये हैं प्रतिबंध, प्रयोग, व्यवहार, अवस्तार, परिहायण, उपभोग, परिवर्तन एवं अपहार।

जनरल नेजुशन ने भ्रष्टाचार को राष्ट्रीय कैंसर की मान्यता प्रदान की है। उनके अनुसार यह विकृत मन मस्तिष्क की उपज है। जब समाज भ्रष्ट हो जाता है, तो व्यक्ति और संस्थाओं का मानदंड भी प्रभावित होता है। ईमानदारी और सच्चाई के बदले स्वार्थ और भ्रष्टता फैलती है।

इस्लामी विद्वान् अब्दुल रहमान इबन खाल्दुन (1332-1406) ने कहा, व्यक्ति जब भोगवाद वृत्ति का अनुकरण करता है, तो वह अपनी आय से अधिक प्राप्ति की प्रबल कमाना करता है। इसलिए वह मर्यादा की हर सीमाएँ लाँघ जाना चाहता है और जहाँ ऐसा प्रयास सफल होता है, तो भ्रष्टाचार का 'चेन रिएक्शन' प्रारंभ होता है।

भ्रष्टाचार तीन तरह के अर्थों में प्रयुक्त होता है, रिश्वत, लूट-खसोट और भाई - भतीजावाद। इन तीनों की प्रकृति एक समान होती है। अगर इसके चरित्र का विश्लेषण किया जाए, तो इस तरह होगा, यह सदा एक से अधिक व्यक्तियों के बीच होता है। जब यह दुष्कृत्य एक व्यक्ति द्वारा होता है, तो उसे धोखेबाज कहते हैं और एक से अधिक व्यक्तियों के बीच होता है, तो भ्रष्टाचार कहलाता है। मुख्यतः यह गोपनीय कार्य है। व्यक्ति आपसी मंत्रणा कर अपने निहित स्वार्थ हेतु यह कदम उठाते हैं। इसमें नियम और कानून का खुला उल्लंघन नहीं
किया जाता है, बल्कि योजनाबद्ध तरीके से जालसाजी की जाती है।

भ्रष्टाचार उन्मूलन हेतु केवल कानून बनाना ही एकमात्र विकल्प नहीं हो सकता। इसके लिए व्यक्ति के अन्दर चारित्रिक सुदृढ़ता, ईमानदारी और साहस होना अनिवार्य है। क्योंकि भ्रष्टाचार रूपी दैत्य से जूझने के लिए अंदर और बाहर दोनों मजबूत होना चाहिए। भ्रष्टाचार की जड़ें इन दोनों क्षेत्रों में गहरी हैं। अतः जागरूकता यह पैदा की जाए कि व्यक्ति को लोभ, मोह को छोड़कर साहस एवं बलशाली होना चाहिए। यह विचार एवं भाव सभी जनों के अंदर से उमगे, तो ही भ्रष्टाचाररूपी महाकुरीति का उन्मूलन संभव है।

- पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
अखंड ज्योति - मई 2001 - पृष्ठ - 30

आध्यात्मिक शिक्षण क्या है? भाग 1




गायत्री मंत्र हमारे साथ साथ—
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥


देवियो भाइयो!

यह दुनिया बड़ी निकम्मी है। पड़ोसी के साथ आपने जरा सी भलाई कर दी, सहायता कर दी, तो वह चाहेगा कि और ज्यादा मदद कर दे। नहीं करेंगे, तो वह नेकी करने वाले की बुराई करेगा। दुनिया का यह कायदा है कि आपने जिस किसी के साथ में जितनी नेकी की होगी, वह आपका उतना ही अधिक बैरी बनेगा। उतना ही अधिक दुश्मन बनेगा; क्योंकि जिस आदमी ने आपसे सौ रुपये पाने की इच्छा की थी और आपने उसे पन्द्रह रुपये दिये। भाई, आज तो तंगी का हाथ है, पंद्रह रुपये हमसे ले जाओ और बाकी कहीं और से काम चला लेना।

पंद्रह रुपये आपने उसे दे दिये और वह आपके बट्टे खाते में गये, क्योंकि आपने पचासी रुपये दिये ही नहीं। इसलिए वह नाराज है कि पचासी रुपये भी दे सकता था, अपना घर बेचकर दे सकता था। कर्ज लेकर दे सकता था अथवा और कहीं से भी लाकर दे सकता था; लेकिन नहीं दिया। वह खून का घूँट पी करके रह जायेगा और कहेगा कि बड़ा चालाक आदमी है।

मित्रो! दुनिया का यही चलन है। दुनिया में आप कहीं भी चले जाइये, दुनिया की ख्वाहिशें बढ़ती चली जाती हैं कि हमको कम दिया गया। हमको ज्यादा चाहिए। असंतोष बढ़ता चला जाता है। और यह असंतोष अन्ततः वैर और रोष के रूप में परिणत हो जाता है। मित्रो, यह ऐसी ही निकम्मी दुनिया है। इस निकम्मी दुनिया में आप सदाचारी कैसे रह सकते हैं? जब कि आपके मन में पत्थर की उपासना करने की विधि न आये। पत्थर की उपासना करने का आनन्द जब आपके जी में आ जायेगा, उस दिन आप समझ जायेंगे कि इससे कोई फल मिलने वाला नहीं है।

कोई प्रशंसा मिलने वाली नहीं है और कोई प्रतिक्रिया होने वाली नहीं है। यह भाव आपके मन में जमता हुआ चला जाय, तो मित्रो! आप अन्तिम समय तक, जीवन की अंतिम साँस तक नेकी और उपकार करते चले जायेंगे, अन्यथा आपकी आस्थाएँ डगमगा जायेंगी।

क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/lectures_gurudev/44.2

शिष्य संजीवनी (भाग 35) : हों, सदगुरु की चेतना से एकाकार


शिष्य संजीवनी के सेवन से शिष्यों को नवप्राण मिलते हैं। उनकी साधना में नया निखार आता है। अन्तःकरण में श्रद्धा व भक्ति की तरंगे उठती हैं। अस्तित्त्व में गुरुकृपा की अजस्र वर्षा होती है। यह ऐसा प्रत्यक्ष अनुभव है जिसे असंख्यों ने अनुभव किया है, और असंख्य जन अनुभव की राह पर चल रहे हैं। जिन्होंने निरन्तर अध्यात्म साधना के मान सरोवर में अवगाहन किया है, वे जानते हैं कि शिष्यत्व से श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं है।

शिष्यत्व के मंदराचल से ही अध्यात्म का महासागर मथा जाता है। प्रखरता और सजलता की बलिष्ठ भुजाएँ ही इसे संचालित करती हैं। शिष्य- साधक की जिन्दगी में यदि ऐसा सुयोग बन पाए तो फिर जैसे अध्यात्म के महारत्नों की बाढ़ आ जाती है। शक्तियाँ, सिद्धियाँ और विभूतियाँ ऐसे शिष्य- साधक की चरण- चेरी बनकर रहती हैं।

यह दिव्य अनुभव पाने के लिए प्रत्येक साधक को अपने अन्तःकरण में मार्ग की प्राप्ति करनी होगी। यह महाकर्म आसान नहीं है। जन्म- जन्मान्तर के अनगिनत संस्कारों, प्रवृत्तियों से भरे इस भीषण अरण्य में यह महाकठिन पुरुषार्थ है। यह महापराक्रम किस तरह से किया जाय इसके लिए शिष्य संजीवनी का यह आठवां सूत्र बड़ा ही लाभकारी है।

इसमें शिष्यत्व की महासाधना के परम साधक कहते हैं- ‘भयंकर आँधी के बाद जो नीरव- निस्तब्धता छाती है, उसी में फूलों के खिलने का इन्तजार करो। उससे पहले यह शुभ क्षण नहीं आएगा। क्योंकि जब तक आँधी उठ रही है, बवंडर उठ रहे हैं, महाचक्रवातों का वेग तीव्र है, तब तक तो बस महायुद्ध के प्रचण्ड क्षण हैं। ऐसे में तो केवल साधना का अंकुर फूटेगा, बढ़ेगा। उसमें शाखाएँ और कलियाँ फूटेंगी।

क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
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मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

माँ: ईश्वर का भेजा फ़रिश्ता



एक समय की बात है, एक बच्चे का जन्म होने वाला था. जन्म से कुछ क्षण पहले उसने भगवान् से पूछा:  मैं इतना छोटा हूँ, खुद से कुछ कर भी नहीं पाता, भला धरती पर मैं कैसे रहूँगा, कृपया मुझे अपने पास ही रहने दीजिये, मैं कहीं नहीं जाना चाहता।

भगवान् बोले,  मेरे पास बहुत से फ़रिश्ते हैं, उन्ही में से एक मैंने तुम्हारे लिए चुन लिया है, वो तुम्हारा ख़याल रखेगा।
 
पर आप मुझे बताइए, यहाँ स्वर्ग में मैं कुछ नहीं करता बस गाता और मुस्कुराता हूँ, मेरे लिए खुश रहने के लिए इतना ही बहुत है।

तुम्हारा फ़रिश्ता तुम्हारे लिए गायेगा और हर रोज़ तुम्हारे लिए मुस्कुराएगा भी. और तुम उसका प्रेम महसूस करोगे और खुश रहोगे।

और जब वहां लोग मुझसे बात करेंगे तो मैं समझूंगा कैसे, मुझे तो उनकी भाषा नहीं आती?

तुम्हारा फ़रिश्ता तुमसे सबसे मधुर और प्यारे शब्दों में बात करेगा, ऐसे शब्द जो तुमने यहाँ भी नहीं सुने होंगे, और बड़े धैर्य और सावधानी के साथ तुम्हारा फ़रिश्ता तुम्हे बोलना भी सीखाएगा।

और जब मुझे आपसे बात करनी हो तो मैं क्या करूँगा?

तुम्हारा फ़रिश्ता तुम्हे हाथ जोड़ कर प्रार्थना करना सीखाएगा, और इस तरह तुम मुझसे बात कर सकोगे।

मैंने सुना है कि धरती पर बुरे लोग भी होते है उनसे मुझे कौन बचाएगा?

तुम्हारा फरिश्ता तुम्हे बचाएगा, भले ही उसकी अपनी जान पर खतरा क्यों ना आ जाये।

लेकिन मैं हमेशा दुखी रहूँगा क्योंकि मैं आपको नहीं देख पाऊंगा।

तुम इसकी चिंता मत करो; तुम्हारा फ़रिश्ता हमेशा तुमसे मेरे बारे में बात करेगा और तुम वापस मेरे पास कैसे आ सकते हो बतायेगा।

उस वक़्त स्वर्ग में असीम शांति थी, पर पृथ्वी से किसी के कराहने की आवाज़ आ रही थी….बच्चा समझ गया कि अब उसे जाना है, और उसने रोते- रोते भगवान् से पूछा, हे ईश्वर, अब तो मैं जाने वाला हूँ, कृपया मुझे उस फ़रिश्ते का नाम बता दीजिये?

भगवान् बोले,  फ़रिश्ते के नाम का कोई महत्त्व नहीं है, बस इतना जानो कि तुम उसे “माँ” कह कर पुकारोगे।

सोमवार, 18 अप्रैल 2016

घास की रोटियां और कीचड़ का पानी पीने को मजबूर हैं बुंदेलखंड के किसान।


बालिका वधु की एक्ट्रेस प्रत्यूषा बनर्जी की मौत के दुःख ने सारे देश को झकझोर कर रख दिया. टेलीविज़न पर भी स्टार्स और न्यूज़ एंकरों ने प्रत्युषा को लेकर जम कर बहस की. फेसबुक और ट्विटर पर हर दूसरा यूज़र प्रत्यूषा को श्रंद्धाजलि देने में लग गया. ऐसा लगा जैसे सारे देश में बस प्रत्यूषा ही एकलौता मुद्दा है, जिससे सब आहत हैं. ऐसा नहीं कि प्रत्युषा की मौत का दुःख लाज़मी नहीं था या उससे हमें दुःख नहीं. पर क्या आप जानते हैं कि हर रोज कितने किसान गरीबी की मार झेल कर मौत को गले लगाते हैं या बीती रात कितने लोग बगैर खाये सो गए थे? शायद नहीं. इससे हमें क्या फर्क पड़ता है? वो लोग थोड़ी न कोई सेलेब्स हैं, जिनकी मौत का दुःख करके हम भी फेसबुक के ट्रेंड कर रहे ऑप्शन से लोगों की नज़रों में आ पाएंगे. अब कुछ लोग कह सकते हैं कि मीडिया जो दिखाता है हम वही देखते हैं. पर मीडिया को ये अधिकार दिया किसने? हमनें. जो TRP बढ़ाने के लिए हर वो खबर दिखाने पर आमादा है, जो उनकी जेब भरने में सहायक हो. इस सब के बीच में धरातल और सतही ख़बरें बेशक ही छूट क्यों न जाएं.


यह हालत है खुद को विकासशील कहने वाले भारत की, जहां के बुंदेलखंड में बीते 6 सालों में 3223 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. जबकि 62 लाख से ज़्यादा लोग पलायन कर अपने पीछे छप्पर और मिट्टी वाले कच्चे मकान छोड़ गए हैं.


यहां सूखे का आलम यह है कि लोग भूख मिटाने के लिए घास से बनी रोटियां और कीचड़ से पानी निकाल कर पीने को मजबूर हैं.


देश तरक्की कर रहा है, हम सबको दिखाई दे रहा है. हमारी GDP भी आज विश्व सूचकांक पर अपनी स्थिति दर्ज करा रही है. रोज नई योजनाएं बनाई जा रही हैं, रोज नए वादे किये जा रहे हैं. पर असल में हमारे देश की क्या स्थिति है, ये हम खुद नहीं जानते.

जवान पिता बूढ़े हो जाते हैं..

 
हर साल सर के बाल कम हो जाते हैं

बचे बालों में और भी चांदी पाते  हैं 

चेहरे पे झुर्रियां बढ़ जाती हैं

रीसेंट पासपोर्ट साइज़ फोटो में कितना अलग नज़र आते हैं

"कहाँ पहले जैसी बात" कहते जाते हैं

देखते ही देखते, जवान पिताजी बूढ़े हो जाते हैं.....


सुबह की सैर में चक्कर खा जाते हैं

मौहल्ले को पता पर हमसे छुपाते हैं 

प्रतिदिन अपनी खुराक घटाते हैं 

तबियत ठीक है, फ़ोन पे बताते हैं

ढीली पतलून को टाइट करवाते हैं

देखते ही देखते, जवान पिताजी बूढ़े हो जाते हैं....


किसी का देहांत सुन घबराते हैं

और परहेजो की संख्यां बढ़ाते हैं 

हमारे मोटापे पे, हिदायतों के ढेर लगाते हैं

तंदुरुस्ती हज़ार नियामत, हर दफे  बताते हैं

"रोज की वर्जिश" के फायदे गिनाते हैं

देखते ही देखते जवान पिताजी बूढ़े हो जाते हैं....


हर साल शौक से बैंक जाते हैं

अपने जिन्दा होने का सबूत दे कितना हर्षाते है 

जरा सी बड़ी पेंशन पर फूले नहीं समाते हैं

एक नई  "मियादी जमा" करके आते हैं

अपने लिए नहीं, हमारे लिए ही बचाते हैं 

देखते ही देखते जवान पिताजी बूढ़े हो जाते हैं....

चीज़े रख कर अब अक्सर भूल जाते हैं

उन्हें  ढूँढने में सारा घर सर पे उठाते हैं

और मां को पहले की ही तरह हड़काते हैं

पर उससे अलग भी नहीं रह पाते हैं

एक ही किस्से को कितनी बार दोहराते हैं

देखते ही देखते जवान पिताजी बूढ़े हो जाते हैं....


चश्मे से भी अब
ठीक से नहीं देख पाते हैं

ब्लड प्रेशर की दवा लेने में
आनाकानी मचाते हैं

एलोपैथी के साइड इफ़ेक्ट बताते हैं

योग और आयुर्वेद की ही रट लगाते हैं

अपने ऑपरेशन को और आगे टलवाते हैं

देखते ही देखते जवान पिताजी बूढ़े हो जाते हैं....


उड़द की दाल अब नहीं पचा पाते हैं

लौकी, तुरई और धुली मूंग ही अधिकतर खाते हैं

दांतों में अटके खाने को  तिल्ली से खुजलाते हैं

पर डेंटिस्ट के पास कभी नहीं जाते  हैं

काम चल तो रहा है की ही धुन लगाते हैं

देखते ही देखते जवान पिताजी बूढ़े हो जाते हैं....


हर त्यौहार पर हमारे आने की बाट जोहते जाते हैं
अपने पुराने घर को नई दुल्हन सा चमकाते हैं
हमारी पसंदीदा चीजों के ढेर लगाते हैं

हर  छोटे-बड़ी  फरमाईश पूरी करने  के लिए
फ़ौरन ही बाजार दौडे चले जाते हैं

पोते-पोतियों से मिल कितने आंसू टपकाते हैं
देखते ही देखते जवान पिताजी बूढ़े हो जाते हैं....

हर पिता को समर्पितं ..... सादर 🙏 🙏

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016

शिष्य संजीवनी (भाग 34) :हों, सदगुरु की चेतना से एकाकार


बाहरी जीवन को पवित्र बनाते हुए समूचे साहस के साथ आगे बढ़कर मार्ग की शोध करो। कभी मत भूलो, जो मनुष्य साधना पथ पर चलना चाहता है उसे अपने सम्पूर्ण स्वभाव को बुद्धिमत्ता के साथ उपयोग में लाना पड़ता है। प्रत्येक मनुष्य अपने आप में खुद ही अपना मार्ग, अपना सच और अपना जीवन है। इस सूत्र को अपना कर उस मार्ग को ढूँढो।

उस मार्ग को जीवन और प्रकृति के नियमों के अध्ययन के द्वारा ढूँढों। अपनी आध्यात्मिक साधना एवं परा प्रकृति की पहचान करके इस मार्ग को ढूँढों। ज्यों- ज्यों सद्गुरु की चेतना के साथ तुम्हारा सान्निध्य सघन होगा, ज्यों- ज्यों तुम्हारी उपासना प्रगाढ़ होगी, त्यों- त्यों यह परम मार्ग तुम्हारी दृष्टि पथ पर स्पष्ट होगा।

उस ओर से आता हुआ प्रकाश तुम्हारी ओर बढ़ेगा और तब तुम इस मार्ग का एक छोर छू लोगे। और तभी तुम्हारे सद्गुरु का प्रकाश, हां उन्हीं सद्गुरु का प्रकाश, जिन्हें कभी तुमने देहधारी के रूप में देखा था, हां उनका ही प्रकाश एकाएक अनन्त प्रकाश का रूप धारण कर लेगा। उस भीतर के दृश्य से न भयभीत होओ और न आश्चर्य करो। क्योंकि तुम्हारे सद्गुरु ही सर्वेश्वर हैं।

जो गुरु हैं वही ईष्ट हैं। हां इतना जरूर है कि इस सत्य तक पहुँचने के पहले अपने भीतर के अन्धकार से सहायता लो और समझो कि जिन्होंने प्रकाश देखा ही नहीं है, वे कितने असहाय हैं और उनकी आत्मा कितने गहन अंधकार में है।

क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
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गुरुवार, 14 अप्रैल 2016

शिष्य संजीवनी (भाग 33) : हों, सदगुरु की चेतना से एकाकार


शिष्य संजीवनी का सीधा मतलब है शिष्यत्व का सम्वर्धन। जो शिष्य अपने शिष्यत्व के खरेपन के लिए सजग, सचेष्ट एवं सतर्क नहीं है, उनका मन रह- रहकर डगमगाता है। साधना पथ की दुष्कर परीक्षाएँ उनके साहस को कंपाती रहती हैं। उनका उत्साह एवं उल्लास कभी भी धराशाही हो जाता है। अन्तःकरण में उठने वाली अनेकों छद्म प्रवंचनाएँ उन्हें किन्हीं भी नाजुक क्षणों में बहकाने में समर्थ होती हैं। सन्देह एवं भ्रम के झोंके उनकी आस्थाओं को सूखे पत्तों की भांति कहीं भी किधर भी उड़ा ले जाते हैं।

ये विडम्बनाएँ हमारे अपने जीवन में न घटें इसके लिए एक ही सार्थक समाधान है कि अपना शिष्यत्व हरदम खरा बना रहे। अपने शिष्यत्व के परिपाक एवं निखार के लिए एक ही साधना व समाधान है। शिष्य संजीवनी का नियमित एवं निरन्तर सेवन। जो यह सेवनकर रहे हैं उन्हें इसके गुणों की अनुभूति भी हो रही है।

यह अनुभूति और भी अधिक स्पष्ट हो, अपना शिष्यत्व और भी अधिक प्रमाणिक हो, इसके लिए शिष्य संजीवनी का यह सातवां सूत्र बड़ा ही लाभकारी है। इसमें कहा गया है- मार्ग की शोध करो। थोड़ा ठहरो और सोचो कि तुम सचमुच ही गुरु भक्ति का मार्ग पाना चाहते हो या फिर तुम्हारे मन में ऊँची स्थिति प्राप्त करने के लिए, आगे बढ़ने और एक भव्य भविष्य निर्माण करने के लिए स्वपन हैं।

सावधान! केवल और केवल गुरुभक्ति के लिए ही मार्ग को प्राप्त करना है। ध्यान रहे गुरुभक्ति किसी महत्त्वाकांक्षा पूर्ति का साधन बनकर कलंकित न होने पाए। इसके लिए कहीं बाहर भटकने की बजाय अपने अन्तःकरण में समाहित होकर मार्ग की शोध करो।

क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
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बुधवार, 13 अप्रैल 2016

शिष्य संजीवनी (भाग 32) : स्वयं को स्वामी ही सच्चा स्वामी

 
अन्तरात्मा की इस शुद्ध भावदशा में ही आत्मा की सम्पदा प्रकट होती है। सूर्य की रश्मियों की भाँति ही आत्मा की सम्पत्तियां साधक में प्रकट होती है। यहीं पर शिष्य के जीवन में, साधक के जीवन में सच्चा स्वामित्व विकसित होता है। इसी स्वामित्व की चाहत शिष्य के जीवन में होनी चाहिए। दुनियावी जीवन में हम स्वामित्व की चाहत तो रखते हैं पर यह चाहत होती धन, साधन, भवन- सम्पत्ति का स्वामी बनने की। स्वयं का स्वामी भला कौन होना चाहता है? हालांकि जो स्वयं का स्वामी है, अपना मालिक है वही सच्चे अर्थों में स्वामी है। बाकी सब तो धोखा है। धन, दुकान- मकान का मालिक बनकर हम केवल गुलाम बनते हैं।

इस अटपटे वचन को समझने के लिए सूफी सन्त फरीद के जीवन की एक घटना को समझ लेना ठीक रहेगा। बाबा फरीद अपने शिष्यों के साथ एक गाँव से गुजर रहे थे। वहीं रास्ते में एक आदमी अपनी गाय को रस्सी से बांधे लिए जा रहा था। फरीद ने उस आदमी से थोड़ी देर रुकने की प्रार्थना की। उनकी प्रार्थना पर वह रुक गया। अब बाबा फरीद ने अपने शिष्यों से पूछा- इन दोनों में मालिक कौन है- गाय या आदमी। शिष्यों ने कहा- यह भी कोई बात हुई, जाहिर है, आदमी गाय का मालिक है।

फरीद ने फिर कहा- यदि गाय के गले की रस्सी काट दी जाय तो कौन किसके पीछे दौड़ेगा- गाय आदमी के पीछे या फिर आदमी गाय के पीछे। शिष्यों ने कहा- जाहिर है आदमी गाय के पीछे भागेगा। तो फिर मालिक कौन हुआ? फरीद ने शिष्यों से कहा, यह जो रस्सी तुम्हें दिखाई पड़ती है गाय के गले में, यह दरअसल आदमी के गले में है। आत्मा की सम्पत्ति को छोड़कर बाकी हर सम्पत्ति हमारे गले का फंदा बन जाती है। यथार्थ में आत्म सम्पदा ही सच्ची सम्पदा है। सच्चे शिष्य ही इसे पाने में समर्थ होते हैं। शिष्यत्व की यह सामर्थ्य किस तरह बढ़े- इसका विवरण अगले पृष्ठों में अनावृत्त होगा।

क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
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मंगलवार, 12 अप्रैल 2016

शिष्य संजीवनी (भाग 31) : स्वयं को स्वामी ही सच्चा स्वामी


शक्ति के साथ शान्ति की चाहत भी शिष्यत्व की एक कसौटी है। और इस तरह का मेल भी बड़ा विरल है। क्योंकि दुनियादारी से भरे जीवन में शक्ति अशान्ति का पर्याय बनकर ही आती है। जितनी ज्यादा शक्ति, जितना ज्यादा रूतबा- मर्तबा उतनी ही ज्यादा अशान्ति। इसका कारण एक ही है कि दुनियादारी में शक्ति के मायने अहंता के पोषण के सिवा और कुछ नहीं। और अहंता का पोषण अशान्ति से ज्यादा और कुछ भी नहीं दे सकता।

अहंता- जितनी बढ़ेगी अशान्ति भी उतनी ही बढ़ेगी। परन्तु शिष्यत्व की साधना में ये सारे समीकरण एकदम उलट जाते हैं। शिष्य की शक्ति तो समर्पण की शक्ति की है। अहंता के विसर्जन और विलीनता की शक्ति है। यह शक्ति ज्यों- ज्यों बढ़ती है, त्यों- त्यों शान्ति भी बढ़ती है। क्रमिक रूप में यह सघन और प्रगाढ़ होती जाती है।

इस शक्ति और शान्ति के प्रसार के साथ साधक का अन्तर्मन एवं अन्तःकरण पवित्र एवं निर्मल होता जाता है। शिष्य के जीवन में पवित्रता की बाढ़ आती है। भक्ति का समुद्र उमड़ता है। निर्मल भावनाओं का तूफान उठता है। अन्तःकरण के ऐसे वातावरण में शिष्य की आत्मा उत्तरोत्तर विकसित होती है। उसमें सद्गुरु कृपा का सहज अवतरण होता है। गुरुकृपा की अनुभूति की सहज अवस्था यही है।

इस अवस्था को पाए बिना गुरुकृपा का रहस्य कभी भी अनुभव नहीं हो पाता। यह दुर्लभ अनुभूति जिन्हें हुई है अथवा जिन्हें हो रही है वही हां केवल वही इस सत्य को समझ सकते हैं। बाकी के पल्ले तो केवल बौद्धिक तर्क- वितर्क का संजाल ही पड़ता है।

क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
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रविवार, 10 अप्रैल 2016

शिष्य संजीवनी (भाग 30) : स्वयं को स्वामी ही सच्चा स्वामी


शिष्य संजीवनी के इस सूत्र में श्रुतियों का सार है, सन्त वचनों की पवित्रता है, सिद्ध परम्परा का रहस्य है। बड़े ही गुह्य एवं अटपटे भाव हैं इस सूत्र के। सूत्र की पहली बात में ही बड़ी उलटबांसी है। सामान्य जीवन की रीति यही है कि शक्ति की अभीप्सा इसलिए की जाती है कि लोगों की नजर में, जन समुदाय के बीच में अपने अहंकार को प्रतिष्ठित किया जा सके।

अहंता की प्रतिष्ठा जितनी ज्यादा होती है, लोगों की नजर में व्यक्ति का रूतबा, दबदबा, मर्तबा उतना ही ज्यादा होता है। उसकी बड़ी धाक होती है सबकी दृष्टि में। सभी उससे डरते, दबते या घबराते हैं। जितना ज्यादा मान उतनी ही ज्यादा शक्ति। यही सोच है जमाने की। यही चलन है दुनिया की। इसे यूं भी कहा जा सकता है कि मान पाने के लिए, मर्तबा पाने के लिए लोग शक्ति की चाहत रखते हैं।

लेकिन शिष्य के जीवन में तो इसका अर्थ ही उल्टा है। शिष्य तो शक्ति इसलिए चाहता है कि वह स्वयं को पूरी तरह से अपने सद्गुरु के चरणों में समर्पित कर सके। अपने अस्तित्त्व को गुरुदेव के अस्तित्त्व को विलीन कर सके। समर्पण की साधना के लिए विसर्जन की भावदशा के लए, विलीनता की अनुभूति के लिए गहन शक्ति की आवश्यकता है। यह काम थोड़ी- बहुत शक्ति से नहीं हो सकता। अपने बिखरे हुए अस्तित्त्व को समेटना, एकजुट करना और फिर उसे गुरुदेव के अस्तित्त्व में मिला देना बड़े साहस का काम है।

इसके लिए महान् शक्ति चाहिए। अपने को बनाने, बड़ा सिद्ध करने के लिए तो सभी प्रयासरत रहते हैं। परन्तु स्वयं को मिटाने, विसर्जित करने के लिए विरले ही तैयार होते हैं। शिष्य को यही विरल काम करना होता है। उसे अपने शिष्यत्व का खरापन साबित करने के लिए स्वयं को पूरी तरह मिटा देना होता है। उसे लोगों की नजर में नहीं भगवान् और अपने सद्गुरु की नजर में खुद को प्रमाणित करना होता है। जो ऐसा करने में समर्थ होता है वही खरा शिष्य बन पाता है।

क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
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सोमवार, 4 अप्रैल 2016

शिष्य संजीवनी (भाग 29) : स्वयं को स्वामी ही सच्चा स्वामी

शिष्य संजीवनी का सेवन करने वालों का आध्यात्मिक वैभव बढ़ने लगा है। ऐसा अनेकों साधकों की अनुभूतियां कहती हैं। इन अनुभूतियों के हर पन्ने में एक अलग अहसास है। निखरते शिष्यत्व की एक अलग चमक है। महकती साधना की एक अनूठी खुशबू है। समर्पण की सरगम इनमें हर कहीं सुनी जा सकती है। जिन्होंने भी शिष्य संजीवनी के सत्त्व को, सार को पिया है- उन सभी में शिष्यत्व की नयी ऊर्जा जगी है।

कइयों ने गुरुवर की चेतना को अपने में उफनते- उमगते पाया है। कुछ ने गुरुदेव के रहस्यमय स्वरों को अपनी भाव चेतना में सुना है। अनेकों का साधना जीवन उच्चस्तरीय चेतना के संकेतों- संदेशों से धन्य हुआ है। निश्चित ही बड़भागी हैं ये सब जिनका जीवन शिष्यत्व की सघन भावनाओं से आवृत्त हुआ है। उनसे भी धन्यभागी हैं वे जो इन पंक्तियों को पढ़ते हुए सच्चे शिष्यत्व के लिए प्रयासरत हो रहे हैं।

इस प्रयास को तीव्र से तीव्रतर बनाने के लिए शिष्य संजीवनी का यह छठा सूत्र बड़ा ही गुणकारी है। इसमें कहा गया है- ‘शक्ति की उत्कट अभीप्सा करो। लेकिन ध्यान रहे कि जिस शक्ति की कामना शिष्य करेगा, वह शक्ति ऐसी होगी जो उसे लोगों की दृष्टि में ना कुछ जैसा बना देगी। इसी के साथ शान्ति की अदम्य अभीप्सा भी करो।

पर ध्यान रहे कि जिस शान्ति की कामना तुम्हें करनी है, वह ऐसी पवित्र शान्ति है, जिसमें कोई विघ्र न डाल सकेगा। और इस शान्ति के वातावरण में आत्मा उसी प्रकार विकसित होगी, जैसे शान्त सरोवर में पवित्र कमल विकसित होता है। शक्ति और शान्ति के साथ ही स्वामित्व की भी अपूर्व अभीप्सा करो। परन्तु ये सम्पत्तियाँ केवल शुद्ध आत्मा की हों। और इसलिए सभी शुद्ध आत्मा इनकी समान रूप से स्वामी हों।

क्रमशः जारी
डॉ. प्रणव पण्डया
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गुरु का अवलंबन



 
बिजलीघर से तार जोड़ लेने पर नगर के अनेकों पंखे , बल्ब, हीटर, कूलर आदि चलने लगते हैं । भरी टंकी के साथ जुड़ा नल बराबर पानी देता रहता है । हिमालय के साथ जुड़ी हुई नदियाँ सदा प्रवाहित रहती हैं , पति की कमाई पर पत्नी , बाप की कमाई पर औलाद मौज मनाती रहती है । यही बात साधना क्षेत्र में भी है ।

एकाकी साधक अपने बलबूते कुछ तो कर ही सकता है और देर- सबेर में लम्बी यात्रा भी पूरी कर लेता है। इसलिए एकाकी प्रयास को भी झुठलाया तो नहीं जा सकता पर सुविधा इसी में है कि किसी शक्ति भण्डार के साथ जुड़कर अपनी प्रगति सम्भावना को सुनिश्चित किया जाय। गुरु वरण इसी को कहते हैं ।

यह एक अनुबन्ध है जिसमें दोनों पक्ष अपनी -अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करते और परस्पर पूरक बनकर दोनों पक्ष प्रसन्नता एवं सफलता उपलब्ध करते हैं । अंधे -पंगे के सयोंग से नदी पार कर लेने वाली बात इसी प्रकार बनती है ।

नारद के साथ जुड़कर पार्वती, सावित्री, वाल्मीकि, ध्रुव , प्रहलाद, आदि ने अपने साधारण स्तर को असाधारण बनाया था । बुद्ध के साथ जुड़कर अंगुलिमाल, आम्रपाली, अशोक जैसों ने अपने स्तर का कायाकल्प कर लिया था। चाणक्य और चन्द्रगुप्त, समर्थ
और शिवाजी, परमहंस और विवेकानंद, गाँधी और विनोबा आदि के अगणित युग्म ऐसे हैं जिनमें शक्ति संपन्नों के साथ जुड़कर असमर्थों ने भी उच्चस्तरीय सफलता पायी। गुरु शिष्य का गठबंधन इसीलिए आध्यात्मिक प्रगति के लिए आवश्यक माना गया है ।

-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य
जीवन देवता की साधना- आराधना वांग्मय 2/1.45

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रविवार, 3 अप्रैल 2016

क्या बनेंगे ये ?



 
यूनिवर्सिटी के एक प्रोफ़ेसर ने अपने विद्यार्थियों को एक एसाइनमेंट दिया।  विषय था मुंबई की धारावी झोपड़पट्टी में रहते 10 से 13 साल की उम्र के लड़कों के बारे में अध्यन करना और उनके घर की तथा सामाजिक परिस्थितियों की समीक्षा करके भविष्य में वे क्या बनेंगे, इसका अनुमान निकालना।

कॉलेज विद्यार्थी काम में लग गए।  झोपड़ पट्टी के 200 बच्चो के घर की पृष्ठभूमिका, मा-बाप की परिस्थिति, वहाँ के लोगों की जीवनशैली और शैक्षणिक स्तर, शराब तथा नशीले पदार्थो के सेवन, ऐसे कई सारे पॉइंट्स पर विचार किया गया। तदुपरांत हर एक लडके के विचार भी गंभीरतापूर्वक सुने तथा ‘नोट’ किये गए।

करीब करीब 1 साल लगा एसाइनमेंट पूरा होने में।  इसका निष्कर्ष ये  निकला कि उन लड़कों में से 95% बच्चे गुनाह के रास्ते पर चले जायेंगे और 90% बच्चे बड़े होकर किसी न किसी कारण से जेल जायेंगे।  केवल 5% बच्चे ही अच्छा जीवन जी पाएंगे।

बस, उस समय यह एसाइनमेंट तो पूरा हो गया, और बाद में यह बात का विस्मरण हो गया। 25 साल के बाद एक दुसरे प्रोफ़ेसर की नज़र इस अध्यन पर पड़ी, उसने अनुमान कितना सही निकला यह जानने के लिए 3-3 विद्यार्थियो की 5 टीम बनाई और उन्हें धारावी भेज दिया।  200 में से कुछ का तो देहांत हो चुका था तो कुछ  दूसरी जगह चले गए थे। फिर भी 180 लोगों से मिलना हुवा। कॉलेज विद्यार्थियो ने जब 180 लोगों की जिंदगी की सही-सही जानकारी प्राप्त की तब वे आश्चर्यचकित हो गए। पहले की गयी स्टडी के विपरीत ही परिणाम दिखे।

उन में से केवल 4-5 ही सामान्य मारामारी में थोड़े समय के लिए जेल गए थे! और बाकी सभी इज़्ज़त के साथ एक सामान्य ज़िन्दगी जी रहे थे। कुछ तो आर्थिक दृष्टि से बहुत अच्छी स्थिति में थे।

अध्यन कर रहे विद्यार्थियो तथा उनके प्रोफ़ेसर साहब को बहुत अचरज हुआ कि जहाँ का माहौल गुनाह की और ले जाने के लिए उपयुक्त था वहां लोग महेनत तथा ईमानदारी की जिंदगी पसंद करे, ऐसा कैसे संभव हुवा ?

सोच-विचार कर के विद्यार्थी पुनः उन 180 लोगों से मिले और उनसे ही ये जानें की कोशिश की।  तब उन लोगों में से हर एक ने कहा कि “शायद हम भी ग़लत रास्ते पर चले जाते, परन्तु हमारी एक टीचर के कारण हम सही रास्ते पर जीने लगे। यदि बचपन में उन्होंने हमें सही-गलत का ज्ञान नहीं दिया होता तो शायद आज हम भी अपराध में लिप्त होते…. !”

विद्यार्थियो ने उस टीचर से मिलना तय किया। वे स्कूल गए तो मालूम हुवा कि वे तो सेवानिवृत हो चुकी हैं। फिर तलाश करते-करते वे उनके घर पहुंचे। उनसे सब बातें बताई और फिर पूछा कि “आपने उन लड़कों पर ऐसा कौन सा चमत्कार किया कि वे एक सभ्य नागरिक बन गए ?”

शिक्षिका बहन ने सरलता और स्वाभाविक रीति से कहा : चमत्कार? अरे! मुझे कोई चमत्कार-वमत्कार तो आता नहीं। मैंने तो मेरे विद्यार्थियो को मेरी संतानों जैसा ही प्रेम किया। बस! इतना ही!” और वह ठहाका देकर जोर से हँस पड़ी।

मित्रों, प्रेम व स्नेह से पशु भी वश हो जाते है। मधुर संगीत सुनाने से गौ भी अधिक दूध देने लगती है। मधुर वाणी-व्यवहार से पराये भी अपने हो जाते है। जो भी काम हम करे थोड़ा स्नेह-प्रेम और मधुरता की मात्रा उसमे मिला के करने लगे तो हमारी दुनिया जरुर सुन्दर होगी। 

आपका दिन मंगलमय हो, ऐसी शुभभावना।

शनिवार, 2 अप्रैल 2016

दाम्पत्य-जीवन को सफल बनाने वाले कुछ स्वर्ण-सूत्र (अन्तिम भाग)



 
पति की आर्थिक कमी अथवा कम कमाई की आलोचना तो कभी करनी ही नहीं चाहिये। जहाँ तक संभव हो ऐसी-व्यवस्था रखिये कि उसका आभास कम से कम ही हो। पति की आर्थिक आलोचना करने का अर्थ है उसका मन अपनी ओर से विमुख कर देना। बाजार अथवा बाहर जाते समय अपनी फरमाइश की सूची पेश करने और आने पर उनके लिए तलाशी लेने लगने का स्वभाव पति को रुष्ट कर देने वाला होता है।

पति के प्रिय मित्रों की अनुचित आलोचना करना अथवा उनका सम्बन्ध विच्छेद कराने का प्रयत्न करना पति के एक सुन्दर सुख को छीन लेने के बराबर है। पति के मित्रों को स्वजन और शत्रु को शत्रु मानना पत्नी का प्रमुख कर्तव्य है जो पत्नियाँ अपना स्वतन्त्र अस्तित्व मान कर केवल अपने मित्र को मित्र और अपने विरोधी को विरोधी मानती हैं, वे अपने दोनों के बीच खाई खोदने की भूल करती हैं।

इसके अतिरिक्त संकट के समय में भी पति के पास मुस्काती हुई ही रहो। पति के सम्मुख गन्दी दशा में रहने वाली स्त्रियाँ अपने प्रति घृणा को जन्म देती हैं। अनेक स्त्रियों का स्वभाव होता है कि पति के पीछे तो वह खूब सजी-धजी रहती है, बाहर सज-धज कर निकलती हैं लेकिन घर में खासतौर से पति के सम्मुख गंदा व पुराना कपड़ा पहन कर आती हैं। उनका ख्याल रहता है कि पति उनके पास कपड़ों की कमी समझ कर और नयी साड़ियाँ लाकर देगा।

किन्तु यह प्रयत्न उल्टा है। इससे पति उसे स्वभाव से गन्दा समझ कर कपड़े लाकर देना बेकार समझते हैं। सदा मधुर और मृदुल बोलिये। नारियों की मीठी वाणी और अनुकूल मुस्कान का जादू पुरुष पर अधिकार जमा लेता है। यदि इस प्रकार पति-पत्नी एक दूसरे की भावनाओं का ध्यान रखते हुए अपने यह कतिपय बाह्य और मनोवैज्ञानिक कर्तव्यों का पालन करते रहें तो उनके बीच कभी कलह-क्लेश होने की सम्भावना ही न रहे और दाम्पत्य-जीवन का अधिक से अधिक आनन्द पा सकते हैं।

समाप्त
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जुलाई 1968 पृष्ठ 28
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1968/July.28

Team Spirit



Many individuals, even though being quite talented and capable, do not benefit society for a simple reason that they cannot harmonize with others.

Take for example a football player who happens to be so proficient in his game that if its left to him he can juggle the ball extremely well without letting it drop even once to the ground.

However, the very same talented player may not be able to make a meaningful contribution when playing in a team because he cannot work together harmoniously with other teammates, as part of a team.

Many organizations experience a similar phenomenon. They may have someone very capable who can single-handedly manage various responsibilities. However, he may shy away from playing his part when he is asked to team up with other people to accomplish some big responsibility. When a few people are given to carry out a task together, most of them may think of turning their back on their responsibility thinking that other people in the team would fulfill it.

In Buddhist literature, there is a fascinating story revealing lack of collective responsibility. It goes like this… A king once decided to organize a huge religious event. He instructed his citizens to bring milk in a pot and offer it into a pool constructed at the site of ceremony. The pool was covered up with a lid. After everyone had his or her turn, the lid was removed. The king was surprised to see that the pool was filled with water instead of milk. When he investigated its cause, he came to know that everyone had brought water in their pot instead of milk thinking that they were the only ones who poured water, the rest would surely have had poured milk!

The social skill of living together harmoniously with other people and being able to impart the benefit of our individual capabilities as a team member is a learning process that can be mastered only through living together cohesively and thereby learning to develop community spirit.

-Pt. Shriram Sharma Acharya
Jivan Devta ki sadhana aradhana Vol 2 - Page 2.20

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2016

Contentment, the meaning of...



 
To be content is a human trait, bliss and peace are its outcomes. But unfortunately we mistake idleness and negligence to be the synonyms for contentment. Idleness and negligence are the signs of TamoGun   where as Contentment is born of SatoGun

Then what does it mean to be content? To be content does not mean that we sit idle, hum to idle tunes and be blissfully unaware of realities.

To be content is to walk, tread patiently towards our goal and be immune to all the difficulties that shall obstruct us. We cannot get rid of all the thorns [difficulties] in this world; but if we are wearing the shoes of contentment, none of them will impede our progress.

Being content is to, try our utmost best for our holistic betterment, in every possible situation stand resolute; face the circumstances boldly and at all the times maintain our mental balance and peace of mind.

People try to achieve contentment by satisfying their desires, but this is the wrong way. Contentment can only be got by the elimination of desires.

- Pt. Shriram Sharma Acharya
Samsrti sanjivani Srimad-Bhagwata evam Gita - Vol 31 Pg 5.10

👉 विशेष अनुदान विशेष दायित्व

भगवान् ने मनुष्य के साथ कोई पक्षपात नहीं किया है, बल्कि उसे अमानत के रूप में कुछ विभूतियाँ दी हैं। जिसको सोचना, विचारणा, बोलना, भावनाएँ, सिद...