शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 5 Feb 2017


👉 आज का सद्चिंतन 5 Feb 2017


👉 जीवन देवता की साधना-आराधना (भाग 28) 5 Feb

🌹 जीवन साधना के सुनिश्चित सूत्र-   
🔴 उपासना पक्ष के चार चरण पिछले पृष्ठों पर बताये जा चुके हैं- (१) प्रात:काल आँख खुलते ही नया जन्म, (२) रात्रि को सोते समय नित्य मरण, (३) नित्य कर्म से निवृत्त होने के बाद जप ध्यान वाला भजन, (४) मध्याह्न के बाद मनन के क्रम में अपनी स्थिति का विवेचन और उदात्तीकरण। कुछ दिन के अभ्यास से इन चारों को दिनचर्या का अविच्छिन्न अंग बना लेना सरल सम्भव हो जाता है।                   

🔵 इष्टदेव के साथ अनन्य आत्मीयता स्थापित कर लेना, उसके ढाँचे में ढलने का प्रयत्न करना, यही सच्ची भगवद्भक्ति है। द्वैत को अद्वैत में बदलना इसी आधार पर बन पड़ता है। सत्प्रवृत्तियों के समुच्चय परमात्मा के साथ लिपटने की वास्तविकता को इसी आधार पर परखा जा सकता है। जीवन क्रम में शालीनता, सद्भाव, उदारता, सेवा-संवेदना जैसी उमंगें अन्तराल में उठती हैं या नहीं। आग के सम्पर्क में आकर ईंधन भी अग्नि बन जाता है। ईश्वर भक्त में अपने इष्टदेव की अनुरूपता उभरनी चाहिये।

🔴 इस कसौटी पर हर किसी की भक्ति भावना कितनी यथार्थता है- इसकी जाँच-परख की जा सकती है। भगवान का अनुग्रह भी इसी आधार पर जाँचा जाता है। जहाँ सूर्य की किरणें पड़ेंगी वहाँ गर्मी और रोशनी अवश्य दृष्टिगोचर होगी। ईश्वर का सान्निध्य निश्चित रूप से भक्तजनों में प्रामाणिकता और प्रखरता की विभूतियाँ अवतरित करता है। इस आधार पर उसका चिन्तन, चरित्र और व्यवहार उत्कृष्ट आदर्शवादिता की हर कसौटी पर खरा उतरता चला जाता है। सच्ची और झूठी भक्ति की परीक्षा हाथोंहाथ प्राप्त होती चलती है। यह प्रतीत होता रहता है कि समर्थ सत्ता का अनुग्रह हाथोंहाथ प्राप्त होने की मान्यता पर उपासना खरी उतरी या नहीं।      

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 निर्बुद्धि संत और विद्वान बुढ़िया

🔴 एक दिन संत कन्फ्यूशियस के पास उनके कुछ शिष्य जाकर बोले गुरुदेव सच्चा झानी कौन होता है ?''

🔵 कन्फ्यूशियस ने कहा सब लोग बैठ जाओ, अभी बताते हैं-यह कहकर उन्होंने अपनी शेष दिनचर्या पूरी की और कपडे पहने फिर सब शिष्यों को लेकर एक ओर चल पडे।

🔴 सब लोग एक गुफा के अंदर प्रविष्ट हुए। वहाँ एक महात्मा निवास करते थे। जप, तप और चिंतन में अपना समय बिताया करते थे। कन्फ्यूशियस ने उनके प्रणाम किया और एक ओर बैठ गये फिर शांत होकर पूछा-भगवन! हम लोग आपके पास ईश्वर का ज्ञान प्राप्त करने आए है बताइए यह कौन है? क्या है? कहाँ रहता है ?

🔵 महात्मा बिगड उठे "तुम लोग यहां मेरी शांति भंग करने क्यों आ गये, भागो मेरे भजन में विघ्न पड़ता है।" कन्फ्यूशियस शिष्यों को लेकर बाहर निकल आए। उन्होंने कहा एक ज्ञानी तो यह है कि जिन्होंने संसार से आँखें मूँद ली है। संसार में सुख-दुःख की परिस्थितियों से अलग एकांत मे शांति का इच्छा रखने वाले यह संत छोटे दर्ज के ज्ञानी हुए।''

🔴 और अब वे गांव में पहुँचे जहाँ एक तेली कोल्हू चला रहा था। बैल की आँखें बँधी थीं, वह अपनी मस्त चाल में उतना दायरा न मालूम कब से नाप रहा था और तेली कोल्ह पर बैठा कोई गीत गुनगुना रहा था।

🔴 कन्फ्यूशियस ने कहा- "भाई मैंने सुना है कि तुम ब्रहाज्ञानी हो, हमें भी थोडा ब्रह्म का उपदेश कीजिए।" तेली ने हँसकर उत्तर दिया- "भाई यह बैल ही मेरा ब्रह्म, मेरा परमात्मा है। इसकी सेवा मैं करता हूँ, यह मेरी सेवा करता है। बस हम दोनों सुखी हैं, सुख ही ब्रह्म है।''

🔵 गुरुदेव बाहर निकले और शिष्यों को संबोधित कर कहा- 'मध्यम ज्ञानी प्रबुद्ध गृहस्थ के रूप में यह तेली है, जिसके मन में ज्ञान-प्राप्ति की आकांक्षा है, यह धीरे-धीरे अपने लक्ष्य की ओर बढ रहा है।''

🔴 अब वे फिर आगे बढे़। उन्होंने कहा- 'संसार की खुली परिस्थितियों का अध्ययन करने से स्थिति का उतना अच्छा ज्ञान हो सकता है जितना कि पुस्तको के पढ़ने अथवा महात्माओं के प्रवचन से नहीं हो सकता। पुस्तक तो एक व्यक्ति का दृष्टिकोण होती है, प्रवचन एक व्यक्ति की ज्ञान-साधना का निष्कर्ष इसलिये संसार को देखो और यह पता लगाओ कि स्पष्ट स्थिति कहाँ है और भ्रम कहाँ जो निर्विकार और सही हो उसे तुम्हारी बुद्धि आप स्वीकार करेगी, फिर उसे अपने जीवन में धारण करने से कल्याण हो सकता है।"

🔵 इस तरह बातचीत करते हुए वे एक बुढि़या के दरवाजे पर रुके। कई लड़के बुढ़ि़या के आस-पास शोरगुल कर रहे थे। बुढि़या चरखा कात रही थी। बीच-बीच में किसी बच्चे के माँगने पर पानी पिला देती, कभी किसी नटखट बालक को डांट भी देती। कभी किसी को हँसकर समझाती, फिर बच्चे खेलने लगते तो वह भी अपना चरखा कातने में मग्न हो जाती।

🔴 कन्फ्यूशियस जैसे ही वहाँ पहुँचे सब लड़के भाग गए। उन्होंने पूछा माता जी! आप कृपा कर यह बताइये क्या आपने ईश्वर देखा है ?

🔵 बुढिया मुस्कराई और बोली हाँ-हाँ बेटा। वह अभी यहीं खेल रहा था, आपको देखते ही भाग गया। वह निरर्थक शोरगुल, बच्चों का रूठना, मेरा मनाना फिर हँसी फिर विनोद यही तो ईश्वर था जो तुम्हारे यहाँ आते ही चला गया।"

🔴 कन्फ्यूशियस शिष्यों को साथ लेकर घर लौट पडे़ उन्होंने बताया- निष्काम ज्ञानी के रूप में यह बुढिया ही सच्ची ज्ञानी है जो ज्ञान का संबंध किसी उपयोग या लाभ से नही जोड़ती, उसे उन्मुक्त रखकर स्वयं भी मुक्त-भाव का अनुभव करती है।''

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹  संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगे पृष्ठ 9, 10

👉 दोष-दृष्टि को सुधारना ही चाहिए (अन्तिम भाग)

🔵 किसी में गुण की कल्पना न कर सकने के कारण दोषदर्शी अविश्वासी भी होता है। वह किसी की सद्भावना एवं सहानुभूति में भी कान खड़े करने लगता है। प्रेम एवं प्रशंसा में भी स्वार्थपूर्ण चाटुकारिता का दोष देखता है। इसलिये संपर्क में आने और स्नेहपूर्ण बरताव करने वाले हर व्यक्ति से भयाकुल और शंकाकुल रहा करता है। उसे विश्वास ही नहीं होता कि संसार में कोई निःस्वार्थ और निर्दोष-भाव से मिल कर हितकारी सिद्ध हो सकता है। विश्वास, आस्था, श्रद्धा, सराहना से रहित व्यक्ति का खिन्न असंतुष्ट और व्यग्र रहना स्वाभाविक ही है, जैसा कि दोष-दर्शी रहता भी है।

🔴 यदि आपको अपने अन्दर इस प्रकार की दुर्बलता दिखी हो तो तुरन्त ही उसे निकालने के लिए और उसके स्थान पर गुण-ग्राहकता का गुण विकसित कीजिये। इस दशा में आपको हर व्यक्ति, वस्तु और वातावरण में आनंद, प्रशंसा अथवा विनोद की कुछ-न-कुछ सामग्री मिल ही जायेगी। दूसरों के गुण-दोषों में से उस हंस की तरह केवल गुण ही ग्रहण कर सकेंगे, जोकि पानी मिले हुए दूध में से केवल दूध-दूध ही ग्रहण कर लेता है और पानी छोड़ देता है।

🔵 दूसरों की अच्छाइयों को खोजने, उनको देख-देख प्रसन्न होने और उनकी सराहना करने का स्वभाव यदि अपने अन्दर विकसित कर लिया जाये तो आज दोष-दर्शन के कारण जो संसार, जो वस्तु और जो व्यक्ति हमें काँटे की तरह चुभते हैं, वे फूल की तरह प्यारे लगने लगें। जिस दिन यह दुनिया हमें प्यारी लगने लगेगी, इसमें दोष, दुर्गुण कम दिखाई देंगे, उस दिन हमारे हृदय से द्वेष एवं घृणा का भाव निकल जायेगा और हमें हर दिशा और हर वातावरण में प्रसन्नता ही आने लगेगी। दुःख, क्लेश और क्षोभ, रोष का कोई कारण ही शेष न रह जायेगा।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति मई 1968 पृष्ठ 24 

👉 आत्मचिंतन के क्षण 5 Feb 2017

🔵 परिवार में और समाज में नारी का महत्त्वपूर्ण, अडिग, अक्षय और अनिवार्य स्थान है। उसे यदि जीवन से हटा दिया गया तो विकास की सारी प्रक्रिया ही अवरुद्ध हो जाएगी। कृष्ण पत्नी रुक्मिणी, बुद्ध पत्नी यशोधरा, मोहम्मद की अर्धांगिनी, चंद्रगुप्त की धर्मपत्नी साम्राज्ञी विशाखा, अशोक की गृहिणी, महात्मा गाँधी की कस्तूरबा, नेहरूजी की कमला, लालबहादुर शास्त्री की ये ललिता जितने भी महापुरुष हुए हैं, उन्होंने अपनी योग्य और सुसंस्कारी गृहिणियाँ के सहयोग से अभीष्ट मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्राप्त की और टूटते साहस को पुनः स्थिर किया।

🔴 शिक्षित महिलाओं को अपने घरों के वातावरण में धार्मिकता का समावेश करना चाहिए। विलास, सज्जा, आपाधापी, आलस्य, अपव्यय, असहयोग, अहंकारिता का स्वेच्छाचार दुष्प्रवृत्तियाँ पनपती रहे तो समझना चाहिए सुख-सुविधाओंके भरे-पूरे रहने पर भी उसमें पलने वालों का भविष्य अंधकारमय बनने जा रहा है। व्यक्तित्व घटिया रहा तो फिर मनःस्थिति और परिस्थिति सर्वथा असंतोषजनक ही रहेगी और विग्रहों का-संकटों का, समस्याओं का घटाटोप खड़ा ही रहेगा। इसलिए यह भी देखा जाय कि सुसंस्कारिता उभारने वाला प्रयास चल रहा है या नहीं।

🔵 दुष्ट प्रचलनों में सर्वनाशी है- विवाहोन्माद। खर्चीली शादियाँ हमें दरिद्र और बेईमान बनाती हैं। दहेज के लेन-देन में कितने घर-परिवार बर्बाद हुए और दर-छर के भिखारी बने हैं इसका बड़ा मर्मभेदी इतिहास है। बारात की धूमधाम, आतिशबाजी, गाजे-बाजे, दावतें, दिखावे, प्रदर्शन में इतना अपव्यय होता है कि एक सामान्य गृहस्थ की आर्थिक कमर ही टूट जाती है। लड़की का माँस बेचने वाला दहेज के व्यवसायी अपने मन में भले ही प्रसन्न होते और नाक ऊँची देखते हों, पर यदि विवेक से पूछा जाय तो इन अदूरदर्शियों के ऊपर दसों दिशाओं से धिक्कार ही बरसती दिखेगी। विवेकवान् युवकों का कर्त्तव्य है कि दहेज न लेने, धूमधाम की शादी स्वीकार न करने की प्रतिज्ञा आन्दोलन चलायें और उस व्रत को अभिभावकों की नाराजगी लेकर भी निभायें।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 1)

🌹 मानव जीवन विचारों का प्रतिविम्ब

🔴 मनुष्य का जीवन उसके विचारों का प्रतिविम्ब है। सफलता-असफलता, उन्नति-अवनति, तुच्छता-महानता, सुख-दुःख, शान्ति-अशान्ति आदि सभी पहले मनुष्य के विचारों पर निर्भर करते हैं। किसी भी व्यक्ति के विचार जानकर उसके जीवन का नक्शा सहज की मालूम किया जा सकता है। मनुष्य को कायर-वीर, स्वस्थ-अस्वस्थ, प्रसन्न-अप्रसन्न, कुछ भी बनाने में उसके विचारों का महत्वपूर्ण हाथ होता है। तात्पर्य यह है कि अपने विचारों के अनुरूप ही मनुष्य का जीवन बनता-बिगड़ता है। अच्छे विचार उसे उन्नत बनायेंगे तो हीन विचार मनुष्य को गिरायेंगे।

🔵 स्वामी रामतीर्थ ने कहा है— ‘‘मनुष्य के जैसे विचार होते हैं वैसा ही उसका जीवन बनता है।’’ स्वामी विवेकानन्द ने कहा था— ‘‘स्वर्ग और नरक कहीं अन्यत्र नहीं, इनका निवास हमारे विचारों में ही है।’’ भगवान् बुद्ध ने अपने शिष्यों को उपदेश देते हुए कहा था। ‘‘भिक्षुओ! वर्तमान में हम जो कुछ हैं अपने विचारों के ही कारण और भविष्य में जो कुछ भी बनेंगे वह भी अपने विचारों के कारण।’’ शेक्सपीयर ने लिखा है—‘‘कोई वस्तु अच्छी या बुरी नहीं है। अच्छाई-बुराई का आधार हमारे विचार ही हैं।’’

🔴 ईसामसीह ने कहा था—‘‘मनुष्य के जैसे विचार होते हैं वैसा ही बन जाता है।’’ प्रसिद्ध रोमन दार्शनिक मार्क्स आरीलियस ने कहा है—‘‘ हमारा जीवन जो कुछ भी है, हमारे अपने ही विचारों के फलस्वरूप है।’’ प्रसिद्ध अमेरिकी लेखक डेल कार्नेगी ने अपने अनुभवों पर आधारित तथ्य प्रकट करते हुए लिखा है— ‘‘जीवन में मैंने सबसे महत्वपूर्ण कोई बात सीखी है तो वह है विचारों की अपूर्व शक्ति और महत्ता, विचारों की शक्ति सर्वोच्च तथा अपार है।’’

🔵 संसार के समस्त विचारकों ने एक स्वर से विचारों की शक्ति और उसके असाधारण महत्व को स्वीकार किया है। संक्षेप में जीवन की विभिन्न गतिविधियों का संचालन करने में हमारे विचारों का प्रमुख हाथ रहता है। हम जो भी करते हैं विचारों की प्रेरणा से ही करते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 मन: स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले (भाग 8)

🌹 तीनों उद्यान फलेंगे और निहाल करेंगे  

🔵 शरीर के कण-कण में सम्पन्नता भरी पड़ी है। आमतौर से उसे खोद निकालने के लिए श्रम और समय का सुनियोजन भर बन पड़ना है। अभिरुचि, उत्कण्ठा, मनोयोग एवं उत्साह का भी यदि साथ में नियोजन हो, तो फिर समझना चाहिए कि श्रम का स्तर अनेक गुना ऊँचा उठ गया। आलस्य और उपेक्षापूर्वक जैसे-तैसे बेगार भुगतने की तरह काम करना तो ऐसा ही है, जिसे ‘‘न कुछ’’ की तुलना में ‘‘कुछ’’ कहा जा सके।

🔴 सुव्यवस्थित और सर्वांगपूर्ण काम करने से श्रम का मूल्य भी बढ़ता है और स्तर भी। मस्तिष्क में इससे सूझ-बूझ की क्षमता बढ़ती है, जिसके सहारे अभ्यस्त ढर्रे से आगे बढ़कर, कुछ अधिक उपयुक्त सोचा, किया और पाया जा सकता है। सुव्यवस्था एक उच्चस्तरीय कलाकौशल है, जो किसी भी काम को सर्वांगपूर्ण सुन्दर, सुसज्जित और कलात्मक बनाती है। संसार भर के प्रगतिशीलों को इसी आधार पर आश्चर्यजनक उन्नति करते देखा गया है।

🔵 छप्पर फाड़कर कदाचित ही किसी के घर में स्वर्ण वर्षा हुई हो? दूसरों के सहारे, पराश्रित रहकर कदाचित् ही किसी ने गौरव भरा जीवन जिया हो? उत्तराधिकार में भी किसी को वैभव मिल तो सकता है, पर हराम का माल हजम नहीं होता। जिसने परिश्रमपूर्वक कमाया नहीं है, वह उसका सदुपयोग भी कदाचित् ही कर सकेगा। उठाईगीर, लुच्चे-लफंगे छल-छद्मों के सहारे आए दिन बहुत कुछ कमाते रहते हैं, पर मुफ्त के माल का सदुपयोग कर सकना कदाचित् ही किसी से बन पड़ा हो? भोजन तभी हजम होता है, जब पचाने के लिये कड़ी मेहनत की जाये। मेहनत की, ईमानदारी की कमाई ही फलती-फूलती देखी गयी है। यदि शरीर को व्यस्त एवं उत्साह भरी श्रमशीलता के सहारे साध लिया जाये, तो न दरिद्रता से ही पाला पड़ेगा और न किसी का मुँह ताकने की अनीति पर उतारू होने की आवश्यकता पड़ेगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 संकल्पवान्-व्रतशील बनें (भाग 1)

👉 युग ऋषि की अमृतवाणी

🔴 आपको यहाँ से जाने के बाद में कई काम करने हैं, बड़े मजेदार काम करने हैं, बहुत अच्छे काम करने हैं। लेकिन ये चलेंगे नहीं, बस आपका मन बराबर ढीला होता चला जायेगा। मन की काट करने के लिये आप एक विचारों की सेना और विचारों की शृंखला बनाकर के तैयार रख लीजिए। विचारों से विचारों को काटते हैं, जहर को जहर से मारते हैं, काँटे को काँटे से निकालते हैं। कुविचार जो आपके मन में हर बार तंग करते रहते हैं, उसके सामने ऐसी सेना खड़ी कर लीजिए, जो आपके बुरे विचारों के सामने लड़ सकने में समर्थ हो। अच्छे विचारों की भी एक सेना होती है।

🔵 बुरे विचार आते हैं, लोभ के विचार आते हैं, लालच और बेईमानी के विचार आते हैं, आप ईमानदारों के समर्थन के लिये उनके इतिहास और वर्ण और स्वास्थ्य और आप्त-पुरुषों के  वचन उन सबको मिलाकर के रखिए। हम ईमानदारी की कमाई खायेंगे, बेईमानी की कमाई हम नहीं खायेंगे। काम-वासना के विचार आते हैं, व्यभिचार के विचार आते हैं। आप ऐसा किया कीजिए, कि उसके मुकाबले की एक और सेना खड़ी कर लिया कीजिए। अच्छे विचारों वाली सेना। जिसमें आपको यह विचार करना पड़े, हनुमान् कितने सामर्थ्यवान हो गये ब्रह्मचर्य की वजह से। भीष्म पितामह कितने समर्थ हो गये, ब्रह्मचर्य के कारण। आप शंकराचार्य से लेकर के और अनेक व्यक्तियों, संतों की बात याद कर सकते हैं। महापुरुषों की जिन्होंने अपने कुविचारों से लोहा लिया है।

🔴 कुविचारों से लोहा नहीं लिया होता तो विचारे संकल्पों की क्या बिसात थी, चलते ही नहीं, टूट जाते। कुविचार हावी हो जाते और जो विचार किया गया था, वो कोने पे रखा रह जाता। ऐसे समय में विचारों की एक सेना तैयार खड़ी कर लीजिये तो आपके लिये स्वर्ग होगा। जब बेईमानी के विचार आयें, काम-वासना के विचार आयें, ईर्ष्या के विचार आयें, अधःपतन के विचार आयें तो आप उनकी रोकथाम के लिये अपनी सेना को तैयार कर दें और उनके सामने फिर लड़ा दें। लड़े बिना काम कैसे चलेगा, बताइये न?

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/amart_vachan_jivan_ke_sidha_sutra/sankalpvaan_vratsheel_bane

👉 हमारी युग निर्माण योजना (भाग 94)

🌹 आदर्श विवाहों के लिए 24 सूत्री योजना

🔴 (5) प्रचार की आवश्यकता— आदर्श विवाहों की ख्याति दूर-दूर तक फैलानी चाहिए ताकि वैसा करने का उत्साह दूसरे लोगों में भी उत्पन्न हो। हमारे देश में अभी विवेकशीलता जागृत नहीं हुई है। हर बात ‘भेड़ियाधसान’ की तरह एक दूसरे की देखा-देखी होती है। लोग चाहते हुए भी किसी सुधार को साहस के अभाव में अपना नहीं पाते, पर जब उन्हें पता लगता है कि ऐसा तो अन्य कितने ही लोग कर रहे हैं तब उनकी हिम्मत बढ़ जाती है और वे भी वैसा ही करने उद्यत हो जाते हैं। इसलिए प्रत्येक शुभ कर्म का अधिकाधिक प्रचार होना चाहिए। विशेषतः आदर्श विवाहों की ख्याति को दूर-दूर तक अवश्य ही फैलाई जानी चाहिए।

🔵 समाचार पत्रों में ऐसे समाचार अवश्य भेजे जांय। युग-निर्माण योजना पत्रिका में ऐसे समाचार बहुत प्रेम और उत्साहपूर्वक छापे जाते हैं। जिन अभिभावकों या लड़की-लड़के के विशेष साहस से वह शुभ कार्य सम्पन्न हुआ हो उनके फोटो भी छापे जाते हैं। मथुरा केन्द्रीय कार्यालय से ऐसे समाचार भारत भर में अनेक भाषाओं में छपने वाले पत्रों में छपने भेज दिये जाते हैं।

🔴 जहां समाचार पत्र नहीं पहुंचते वहां पच, विज्ञप्ति आदि छाप कर वह समाचार घर-घर पहुंचाया जा सकता है और उनके पोस्टर दीवारों खम्भों आदि पर चिपकाये जा सकते हैं। और भी जो तरीके ऐसे समाचार दूर प्रदेशों तक अधिक जनता तक पहुंचाये जाने के लिए सम्भव हों वे सभी करने का प्रयत्न करना चाहिए। ताकि बढ़ती हुई सुधारात्मक प्रवृत्तियों का परिचय अधिकाधिक जनता को हो सके और सर्व साधारण के मन में उसी तरह के अनुकरण की आकांक्षा जागृत हो सके।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 42)

🌹 गुरुदेव का प्रथम बुलावा-पग-पग पर परीक्षा
🔴 किंतु यहाँ भी विवेक समेटना पड़ा, साहस सँजोना पड़ा। मौत बड़ी होती है, पर जीवन से बड़ी नहीं। अभय और मैत्री भीतर हो तो हिंसकों की हिंसा भी ठंडी पड़ जाती है और अपना स्वभाव बदल जाती है। पूरी यात्रा में प्रायः तीन चार सौ की संख्या में ऐसे डरावने मुकाबले हुए, पर गड़बड़ाने वाले साहस को हर बार सँभालना पड़ा। मैत्री और निश्चिंतता की मुद्रा बनानी पड़ी। मृत्यु के सम्बन्ध में सोचना पड़ा कि उसका भी एक समय होता है। यदि वहीं-इसी प्रकार जीवन की इतिश्री होनी है, तो फिर उसका डरते हुए क्यों? हँसते हुए ही सामना क्यों न किया जाए? यह विचार उठे तो नहीं, बल पूर्वक उठाने पड़े। पूरा रास्ता डरावना था। एकाकीपन, अँधेरे और मृत्यु के दूत मिल-जुलकर डराने का प्रयत्न करते रहे और वापस लौट चलने की सलाह देते रहे, पर संकल्प शक्ति साथ देती रही और यात्रा आगे बढ़ती रही।

🔵 परीक्षा का एक प्रश्न-पत्र यह था कि सुनसान का अकेलेपन का डर लगता है क्या? कुछ ही दिनों में दिल मजबूत हो गया और उस क्षेत्र में रहने वाले प्राणी अपने लगने लगे। डर न जाने कहाँ चला गया। सूनापन सुहाने लगा, मन ने कहा-प्रथम पत्र में उत्तीर्ण होने का सिलसिला चल पड़ा। आगे बढ़ने पर असमंजस होता है, वह भी अब न रहेगा।

🔴   दूसरा प्रश्न पत्र था, शीत ऋतु का। सोचा कि जब मुँह, नाक, आँखें, सिर, कान, हाथ खुले रहते हैं, अभ्यास से इन्हें शीत नहीं लगता, तो तुम्हें भी क्यों लगना चाहिए। उत्तरी ध्रुव, नार्वे, फिनलैंड में हमेशा शून्य से नीचे तापमान रहता है। वहाँ एस्किमो तथा दूसरी जाति के लोग रहते हैं, तो इधर तो दस बारह हजार फुट की ही ऊँचाई है। यहाँ ठंड से बचने के उपाय ढूँढ़े जा सकते हैं। वे उधर के निवासी से मालूम भी हो गए। पहाड़ ऊपर ठंडे रहते हैं, पर उनमें जो गुफाएँ पाई जाती हैं, वे अपेक्षाकृत गरम होती हैं। कुछ खास किस्म की झाड़ियाँ ऐसी होती हैं, जो हरी होने पर भी जल जाती हैं। लाँगड़ा, मार्चा आदि शाकों की पत्तियाँ जंगलों में उगी होती हैं, वे कच्ची खाई जा सकती हैं।

🔵 भोजपत्र के तने पर उठी हुई गाँठों को उबाल लिया जाए, तो ऐसी चाय बन जाती है कि जिनसे ठंड दूर हो सके। पेट में घुटने और सिर लगाकर उँकडू बैठ जाने पर भी ठंडक कम लगती है। मानने पर ठंड अधिक लगती है। बच्चे थोड़े से कपड़ों में कहीं भी भागे-भागे फिरते है। उन्हें कोई हैरानी नहीं होती। ठंड मानने भर की होती है। उसमें अनभ्यस्त बूढ़े बीमारों की तो नहीं कहते, अन्यथा जवान आदमी ठंडक से नहीं मर सकता है। बात यह भी समझ में आ गई और इन सब उपायों को अपना लेने पर ठंडक भी सहन होने लगी। फिर एक और बात है कि ठंडक-ठंडक रटने की अपेक्षा मन में कोई और उत्साह भरा चिंतन बिठा लिया जाए, तो भी काम चल जाता है। इतनी महत्त्वपूर्ण शिक्षाओं से उस क्षेत्र की समस्याओं का सामना करने के हल निकल आए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/gur.2

👉 "सुनसान के सहचर" (भाग 42)

🌞  हिमालय में प्रवेश (तपोवन का मुख्य दर्शन)

🔵 भगवती भागीरथी के मूल उद्गम गोमुख के दर्शन करके अपने को धन्य माना। यों देखने में एक विशाल चट्टान में फटी हुई दरार में से दूध जैसे स्वच्छ जल का उछलता हुआ झरना बस यही गोमुख है। पानी का प्रवाह अत्यन्त वेग वाला होने से बीच में पड़े हुए पत्थरों से टकरा कर वह ऐसा उछलता है कि बहुत ऊपर तक छींटें उड़ते हैं। इस जल कणों पर जब सूर्य की सुनहरी किरणें पड़ती हैं तो वे रंगीन इन्द्रधनुष जैसी बहुत ही सुन्दर दीखती हैं।

🔴 इस पुनीत निर्झर से निकली हुई माता गंगा लाखों वर्षों से मानव जाति को जो तरण-तारण का संदेश देती रही है, जिस महान् संस्कृति को प्रवाहित करती रही है उसके स्मरण मात्र से आत्मा पवित्र हो जाती है। इस दृश्य को आंखों में बसा लेने को जी चाहता है।

🔵 चलना इससे आगे था। गंगा वामक, नंदनवन, भागीरथ शिखर, शिवलिंग पर्वत से घिरा हुआ तपोवन यही हिमालय का हृदय है। इस हृदय में अज्ञात रूप में अवस्थित कितनी ऊंची आत्माएं संसार के तरण-तारण के लिए आवश्यक शक्ति भण्डार जमा करने में लगी हुई हैं इनकी चर्चा न तो उचित है न आवश्यक। वह असामयिक भी होगी इसलिए उस पर प्रकाश न डालना ही ठीक है।

🔴 यहां से हमारे मार्ग दर्शक ने आगे का पथ-प्रदर्शन किया। कई मील की विकट चढ़ाई को पार कर तपोवन के दर्शन हुए। चारों ओर हिमाच्छादित पर्वत श्रृंखलाएं अपने सौन्दर्य की अलौकिक छटा बिखेरे हुए थीं। सामने वाला शिवलिंग पर्वत का दृश्य बिलकुल ऐसा था मानो कोई विशालकाय सर्प फन फैलाए बैठा हो। भावना की आंखें जिन्हें प्राप्त हों वह भुजंगधारी शिव का दर्शन अपने चर्म चक्षुओं से ही यहां कर सकता है। दाहिनी ओर लालिसा लिए हुए सुमेरु हिम पर्वत है। कई और नील आभा वाली चोटियां ब्रह्मपुरी कहलाती हैं। इससे थोड़ा और पीछे हटकर बांई तरफ भागीरथ पर्वत है। कहते हैं कि यहीं बैठकर भागीरथ जी ने तप किया था जिससे गंगावतरण सम्भव हुआ।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 निर्माण से पूर्व सुधार की सोचें (भाग १)

महत्त्व निर्माण का ही है। उपलब्धियाँ मात्र उसी पर निर्भर हैं। इतना होते हुए भी पहले से ही जड़ जमाकर बैठी हुई अवांछनीयता निरस्त करने पर सृ...