गुरुवार, 14 दिसंबर 2017

👉 जो सर्वश्रेष्ठ हो वही अपने ईश्वर को समर्पित हो

🔶 एक नगर मे एक महात्मा जी रहते थे और नदी के बीच मे भगवान का मन्दिर था और वहाँ रोज कई व्यक्ति दर्शन को आते थे और ईश्वर को चढाने को कुछ न कुछ लेकर आते थे! एक दिन महात्मा जी अपने कुछ शिष्यों के साथ नगर भ्रमण को गये तो बीच रास्ते मे उन्हे एक फल वाले के वहाँ एक आदमी कह रहा था की कुछ सस्ते फल दे दो भगवान के मन्दिर चढाने है! थोड़ा आगे बढे तो एक दुकान पर एक आदमी कह रहा था की दीपक का घी देना और वो घी ऐसा की उससे अच्छा तो तेल है! आगे बढे तो एक आदमी कह रहा था की दो सबसे हल्की धोती देना एक पण्डित जी को और एक किसी और को देनी है!

🔷 फिर जब वो मन्दिर गये तो जो नजारा वहाँ देखा तो वो दंग रह गये!

🔶 उस राज्य की राजकुमारी भगवान के आगे अपना मुंडन करवा रही थी और वहाँ पर एक किसान जिसके स्वयं के वस्त्र फटे हुये थे पर वो कुछ लोगों को नये नये वस्त्र दान कर रहा था! जब महात्मा जी ने उनसे पूछा तो किसान ने कहा हॆ महात्मन चाहे हम ज्यादा न कर पाये पर हम अपने ईश्वर को वो समर्पित करने की ईच्छा रखते है जो हमें भी नसीब न हो और जब मैं इन वस्त्रहीन लोगों को देखता हूँ तो मेरा बड़ा मना करता है की इन्हे उतम वस्त्र पहनावे!

🔷 और जब राजकुमारी से पूछा तो उस राजकुमारी ने कहा हॆ देव एक नारी के लिये उसके सिर के बाल अति महत्वपुर्ण है और वो उसकी बड़ी शोभा बढ़ाते है तो मैंने सोचा की मैं अपने इष्टदेव को वो समर्पित करूँ जो मेरे लिये बहुत महत्वपुर्ण है इसलिये मैं अपने ईष्ट को वही समर्पित कर रही हूँ!

🔶 जब उन दोनो से पूछा की आप अपने ईष्ट को सर्वश्रेष्ठ समर्पित कर रहे हो तो फिर आपकी माँग भी सर्वश्रेष्ठ होगी तो उन दोनो ने ही बड़ा सुन्दर उत्तर दिया!

🔷 हॆ देव हमें व्यापारी नही बनना है और जहाँ तक हमारी चाहत का प्रश्न है तो हमें उनकी निष्काम भक्ति और निष्काम सेवा के अतिरिक्त कुछ भी नही चाहिये!

🔶 जब महात्मा जी मन्दिर के अन्दर गये तो वहाँ उन्होने देखा वो तीनों व्यक्ति जो सबसे हल्का घी, धोती और फल लेकर आये साथ मे अपनी मांगो की एक बड़ी सूची भी साथ लेकर आये और भगवान के सामने उन मांगो को रख रहे है!

🔷 तब महात्मा जी ने अपने शिष्यों से कहा हॆ मेरे अतिप्रिय शिष्यों जो तुम्हारे लिये सबसे अहम हो जो शायद तुम्हे भी नसीब न हो जो सर्वश्रेष्ठ हो वही ईश्वर को समर्पित करना और बदले मे कुछ माँगना मत और माँगना ही है तो बस निष्काम-भक्ति और निष्काम-सेवा इन दो के सिवा अपने मन मे कुछ भी चाह न रखना!

🔶 इसीलिये एक बात हमेशा याद रखना की भले ही थोड़ा ही समर्पित हो पर जो सर्वश्रेष्ठ हो बस वही समर्पित हो !

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 15 Dec 2017


👉 आज का सद्चिंतन 15 Dec 2017


👉 प्रतिकूलतायें जीवन को प्रखर बनाती हैं

🔷 आग के बिना न भोजन पकता है, न सर्दी दूर होती है और न ही धातुओं का गलाना- ढलाना सम्भव हो पाता है। आदर्शों की परिपक्वता के लिए यह आवश्यक है कि उनके प्रति निष्ठा की गहराई कठिनाइयों की कसौटी पर कमी और खरे- खोटे की यथार्थता समझी जा सके। बिना तपे सोने को प्रमाणिक कहाँ माना जाता है? उसका उपयुक्त मूल्य कहाँ मिलता है? यह तो प्रारंभिक कसौटी है।       

🔶 कठिनाइयों के कारण उत्पन्न हुई असुविधाओं को सभी जानते हैं। इसलिए उनसे बचने का प्रयत्न भी करते हैं। इसी प्रयत्न के लिए मनुष्य को दूरदर्शिता अपनानी पड़ती है और उन उपायों को ढूँढना पड़ता है, जिनके सहारे विपत्ति से बचना सम्भव हो सके। यही है वह बुद्धिमानी जो मनुष्यों को यथार्थवादी और साहसी बनाती है। जिननेकठिनाईयों में प्रतिकूलता को बदलने के लिए पराक्रम नहीं किया, समझना चाहिए कि उन्हे सुदृढ़ व्यक्तित्व के निर्माण का अवसर नहीं मिला। कच्ची मिट्टी के बने बर्तन पानी की बूँद पड़ते ही गल जाते हैं। किन्तु जो देर तक आँवे की आग सहते हैं, उनकी स्थिरता, शोभा कहीं अधिक बढ़ जाती है।

🔷 तलवार पर धार रखने के लिए उसे घिसा जाता है। जमीन से सभी धातुऐँ कच्ची ही निकलती हैं। उनका परिशोधन भट्ठी के अतिरिक्त और किसी उपाय से सम्भव नहीं। मनुष्य कितना विवेकवान, सिद्धन्तवादी और चरित्रनिष्ठ है, इसकी परीक्षा विपत्तियों में से गुजरकर इस तप- तितीक्षा में पक कर ही हो पाती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सुख चाहिए किन्तु दुःख से डरिये मत (भाग 3)

🔶 सुख-सुविधा की कामना बेशक की जाये और उसके लिए अथक प्रयत्न भी, पर साथ ही कठिनाइयों का स्वागत करने के लिए भी प्रस्तुत रहना चाहिए। अनुकूलता पाकर हर्षोन्मत्त हो उठना और प्रतिकूलता देखते ही रो उठना मानसिक हीनता का लक्षण है। मनोहीन मनुष्य संसार में कुछ भी करने लायक नहीं होता। वह जीता जरूर है लेकिन मृतकों से भी बुरी जिन्दगी। जिसका हृदय विषाद से आक्रान्त है, चिन्ताओं से अभिभूत है उसका जीना जीने में नहीं गिना जा सकता। जिन्दगी वास्तव में वही है जिसमें जीने के साथ कुछ ऊंचा और अच्छा करते रहने का उत्साह सक्रिय होता रहे।
   
🔷 यह उत्साहपूर्ण सक्रियता केवल उसी में सम्भव है जो हर समय कठिनाइयों से लड़ने का साहस रखता है आपत्तियों से संघर्ष करने की हिम्मत वाला है। जो व्यग्र है त्रस्त है और निराश है वह न केवल संसार पर ही बल्कि अपने पर भी बोझ बना हुआ श्वासों का भार ढोया करता है। चिन्तित तथा निराश मनःस्थिति वाला व्यक्ति किसी पुरुषार्थ के योग्य नहीं रहता। जिसकी जड़ में दीमक लग चुकी है अथवा जिसका मूल किसी कीड़े ने काट डाला है उस लता से, उस वृक्ष से सुन्दर फल-फूलों की आशा नहीं की जा सकती।

🔶 सुख-सुविधा की कामना अवश्य करिए यह उपयुक्त है। किन्तु साथ ही कठिनाइयों से लोहा लेने के लिए भी सदैव तत्पर रहिये। कठिनाइयां स्वयं कष्ट लेकर नहीं आतीं। वे केवल आती है आपकी मानसिक प्रसन्नता, आपकी आशा तथा आपके उत्साह पर आवरण डालने। यदि आपने उनको अपनी इन आत्म-किरणों पर परदा डाल लेने दिया तो आपके मनो-मन्दिर में अन्धकार हो जायगा और तब तमोजन्य निराश, क्षोभ, दुःख, भय तथा असन्तोष की अशिव भावनायें आपको तरह-तरह से त्रस्त करने लगेंगी और आप अकारण ही पीड़ित रहने लगेंगे।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- दिसंबर 1966 पृष्ठ 23
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1966/July/v1.22

http://literature.awgp.org/book/sukh_shanti_ki_sadhana_/v1.3

👉 Be Silent, Be Strong

🔶 World serve both as nectar & poison. The speech which is true, inspiring & encouraging, free from deceit, sweet & beneficial will be called nectarine. On the contrary, the words which are harsh, egoistic, mocking. taunting, shallow & inimical will be poisonous & others.

🔷 Words should never be misused. If possible, observe silence for a day in a week or a month & engage the mind in self-analysis & contemplation of truth. Silence is very dynamic. The language of an individual who controls his words & observes silence. as for as possible is very sweet. Speak only as much as is necessary. Misuse of words wastes a large part of our energy. Therefore, just as brahmacharya etc. have been ordained for control of senses, similarly the practice of silence has been laid down for control of speech.

🔶  Mahatma Gandhi has said- “Silence is the best speech.” If it is necessary to speak, speak as little as possible. If one word can do, don’t use two. In Franklin’s words, “No teacher is better than an ant & it remains silent.” Carlyle has said- “Silence has more word-power than speech.”

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 संजीवनी विद्या बनाम जीवन जीने की कला (भाग 6)

🔶 हमने अपने जीवन के इस अन्तिम समय में सारी हिम्मत और शक्ति इस बात में लगा दी है कि शान्तिकुञ्ज को हम एक विश्वविद्यालय बना देंगे। पाँच सौ व्यक्तियों के लिए हमने एक माह में शिक्षण देने की व्यवस्था की है। इतना बड़ा काम व मात्र एक महीना? हमने इसलिए बड़ा नहीं रखा, क्योंकि हमको कम समय में एक लाख से अधिक सही जीवन जीने वाले आदमी तैयार करने हैं। हमने पाँच सौ आदमियों को प्रत्येक माह ट्रेण्ड करके स्वयं का महान् और शानदार जीवन जीने के लिए शिक्षण देने का प्रबन्ध किया है। न केवल स्वयं का जीवन बल्कि समाज की सेवा का शिक्षण। न केवल समाज की सेवा बल्कि यह भी कि आज की समस्याएँ क्या हैं? गुत्थियों का हल और समाधान निकालने के लिए क्या कदम बढ़ाए जाने चाहिए और किस तरीके से काम करना चाहिए? यह सिखाने का प्रबन्ध किया है।
                  
🔷 एक और आपको अचम्भा होगा। यहाँ बहुत दिनों से जब से यह आश्रम बना है, यहाँ के निवास के लिए, बिजली तो जलती है, कुएँ से पानी जो लेते हैं, उसके लिए किसी से कुछ भी नहीं लिया गया है। अब एक और हिम्मत बढ़ाई है। वह यह कि अब खाने की जिम्मेदारी भी हम अपने कन्धों पर उठाएँगे, गरीब और अमीर दोनों के लिए कोई खर्च वसूला नहीं जाएगा। यदि कोई कहे कि हमने आपका खाया है, दान का पैसा है, ब्राह्मण का, साधु का पैसा है, हम खाना नहीं चाहते तो हम कहेंगे कि मुट्ठी बन्द करके दे जाइए, हम रसीद काट देंगे आपकी। तो इस शिक्षण में यह नवीन विशेषता है कि अधिक से अधिक आदमी लाभान्वित हो सकें।
    
🔶 सरकारी स्कूलों-कॉलेजों में आपने देखा होगा कि वहाँ बोर्डिंग फीस अलग देनी पड़ती है। पढ़ाई की फीस अलग देनी पड़ती है, लाइब्रेरी फीस अलग व ट्यूशन फीस अलग। लेकिन हमने यह हिम्मत की है कि कानी कौड़ी की भी फीस किसी के ऊपर लागू नहीं की जाएगी। यही विशेषता नालन्दा-तक्षशिला विश्वविद्यालय में भी थी। वही हमने भी की है, लेकिन बुलाया केवल उन्हीं को है, जो समर्थ हों, शरीर या मन से बूढ़े न हो गए हों, जिनमें क्षमता हो, जो पढ़े-लिखे हों। इस तरह के लोग आयेंगे तो ठीक है, नहीं तो अपनी नानी को, दादी को, मौसी को, पड़ोसन को लेकर के यहाँ कबाड़खाना इकट्ठा कर देंगे तो यह विश्वविद्यालय नहीं रहेगा? फिर तो यह धर्मशाला हो जाएगी। साक्षात् नरक हो जाएगा। इसे नरक मत बनाइए आप।

🔷 जो लायक हों वे यहाँ की ट्रेनिंग प्राप्त करने आएँ और हमारे प्राण, हमारे जीवट से लाभ उठाना चाहें, चाहे हम रहें या न रहें, वे लोग आएँ। प्रतिभावानों के लिए निमन्त्रण है, बुड्ढों, अशिक्षितों, उजड्डों के लिए निमन्त्रण नहीं है। आप कबाड़खाने को लेकर आएँगे तो हम आपको दूसरे तरीके से रखेंगे, दूसरे दिन विदा कर देंगे। आप हमारी व्यवस्था बिगाड़ेंगे? हमने न जाने क्या-क्या विचार किया है और आप अपनी सुविधा के लिए धर्मशाला का लाभ उठाना चाहते हैं? नहीं, यह धर्मशाला नहीं है। यह कॉलेज है, विश्वविद्यालय है। कायाकल्प के लिए बनी एक अकादमी है। हमारे सतयुगी सपनों का महल है। आपमें से जिन्हें आदमी बनना हो, बनाना हो, इस विद्यालय की संजीवनी विद्या सीखने के लिए आमन्त्रण है। कैसे जीवन को ऊँचा उठाया जाता है, समाज की समस्याओं को कैसे हल किया जाता है? यह आप लोगों को सिखाया जाएगा। दावत है आप सबको। आप सबमें जो विचारशील हों, भावनाशील हों, हमारे इस कार्यक्रम का लाभ उठाएँ। अपने को धन्य बनाएँ और हमको भी।

🌹  हमारी बात समाप्त।
🌹  ॐ शान्ति।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 166)

🌹  तीन संकल्पों की महान् पूर्णाहुति
🔷 तीसरा वर्ग प्रज्ञा परिवार का है। इसमें हमारा व्यक्तिगत लगाव है। लम्बे समय से जिस-जिस बहाने साथ-साथ रहने के कारण घनिष्ठता ऐसी और इतनी बढ़ गई है कि उसका समापन किसी भी प्रकार हो सकना सम्भव नहीं। इसके कई कारण हैं। प्रथम यह कि हमें अनेक जन्मों का स्मरण है। लोगों को नहीं। जिनके साथ पूर्व जन्मों में सघन सम्बन्ध रहे हैं उन्हें संयोगवश या प्रयत्नपूर्वक हमने परिजनों के रूप में एकत्रित कर लिया है और वे जिस-तिस कारण हमारे इर्द-गिर्द जमा हो गए हैं। इन्हें अखण्ड ज्योति अपने आँचल में समेटे बटोरे रही है। संगठन के नाम पर चलने वाले रचनात्मक कार्यक्रम भी इस संदर्भ में आकर्षण उत्पन्न करते रहे हैं।

🔶  इसके अतिरिक्त बच्चों और अभिभावकों के बीच जो सहज वात्सल्य भरा आदान -प्रदान रहता है, वह भी चलता रहा है। बच्चे सहज स्वभाव अभिभावकों से कुछ चाहते हैं। भले ही मुँह खोलकर माँगे नहीं अथवा भाव-भंगिमा से प्रकट करते रहें। बच्चों की आकाँक्षा बढ़ी-चढ़ी होती हैं। भले ही वह उपयोगी हो या अनुपयोगी, आवश्यक हो या अनावश्यक। दे दिलाकर ही उन्हें चुपाया जाता है। इतनी समझ होती नहीं कि पैसा व्यर्थ जाने और वस्तु किसी काम न आने का तर्क उसके गले उतारा जा सके। बच्चों और अभिभावकों के बीच यह दुलार भरी खींचतान तब तक चलती रहती है, जब तक वे परिपक्व नहीं हो जाते और उपयोगिता-अनुपयोगिता का अंतर नहीं समझने लगते। हमारे साथ एक रिश्ता परिजनों का यह भी चलता रहा है।

🔷 मान्यता सो मान्यता। आदत सो आदत। प्रत्यक्ष रिश्तेदारी न सही पूर्व संचित सघनता का दबाव सही। एक ऐसा सघन सूत्र हम लोगों के बीच विद्यमान है जो विचार विनियम, सम्पर्क-सान्निध्य तक ही सीमित नहीं रहता, कुछ ऐसा भी चाहता है कि अधिक प्रसन्नता का कोई साधन कोई अवसर हाथ लगे। कइयों के सामने कठिनाइयाँ होती हैं। कई भ्रमवश जंजाल में फँसे रहते हैं। कइयों को अधिक अच्छी स्थिति चाहिए। कारण कई हो सकते हैं, पर देखा यह जाता है कि अधिकाँश लोग इच्छा आकाँक्षा लेकर आते हैं। वाणी से या बिना वाणी के व्यक्त करते हैं, साथ ही सोचते हैं कि हमारी बात यथा स्थान पहुँच गई। उसका विश्वास उन्हें तब होता है जब पूरा न सही आधा-अधूरा उपलब्ध भी हो जाता है।

🔶 याचक और दानी का रिश्ता दूसरा है, पर बच्चों और अभिभावकों के बीच यह बात लागू नहीं होती। बछड़ा दूध न पिए तो गाय का बुरा हाल होता है। मात्र गाय ही बछड़े को नहीं देती, बछड़ा भी गाय को देता है। यदि ऐसा न होता तो कोई अभिभावक बच्चे जनने और उनके लालन-पालन में समय लगाने, पैसा खर्च करने का झंझट मोल न लेते।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.192

👉 अपना अपना भाग्‍य

एक राजा के तीन पुत्रियाँ थीं और तीनों बडी ही समझदार थी। वे तीनो राजमहल मे बडे आराम से रहती थी। एक दिन राजा अपनी तीनों पुत्रियों सहित भोज...