बुधवार, 22 मार्च 2017

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 23 March 2017


👉 आज का सद्चिंतन 23 March 2017


👉 आँखें फट पड़ीं आँखों के डाक्टर की

🔴 वर्ष १९६३ की घटना है। अचानक ही मेरी आँखें दुखने लग गई थीं। शुरू में मैंने इस पर कोई खास ध्यान नहीं दिया। अध्ययन-अध्यापन से जुड़े होने के कारण मेरी आँखों की परेशानी दिन ब दिन कम होती चली गई। पढ़ना शुरू करते ही आँखों में जलन सी महसूस होती और पानी गिरने लगता था। इसी कारण हमेशा सिरदर्द भी बना रहता था। 
🔵 आखिरकार मैंने स्थानीय डॉक्टर से आँखों की जाँच कराई। डाक्टर ने बताया कि आँखों से ज्यादा काम लेने के कारण ही ऐसी स्थिति है। आँखों को अधिक से अधिक आराम देने की सलाह के साथ उन्होंने कुछ दवायें लिख दीं। लेकिन उन दवाओं से कुछ लाभ नहीं हुआ। धीरे-धीरे देखने में भी दिक्कत महसूस होने लगी। तब जाकर मैं अलीगढ़ आई हॉस्पिटल पहुँचा। वहाँ आधुनिकतम मशीनों से कई प्रकार की जाँच की गई। जाँच की रिपोर्ट देखकर मुझे तुरंत हॉस्पीटल में भर्ती कर लिया गया। लगातार इलाज चलता रहा।
🔴 महीनों अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा, लेकिन रोग था कि ठीक होने का नाम ही नहीं लेता। धीरे-धीरे एक आँख की रोशनी समाप्त सी हो चली। इलाज करने वाले डाक्टर भी हिम्मत हार चुके थे। जाँच की प्रक्रिया फिर से शुरू हुई। एक दिन नेत्र विभाग के मुख्य चिकित्सक प्रो. बी. आर. शुक्ला ने कहा कि वैसे तो हम अपनी पूरी कोशिश कर रहे हैं, लेकिन रिपोर्ट कहती है कि आपकी दूसरी आँख भी खराब हो सकती है। उनके ये शब्द सुनकर मुझे काठ मार गया। बहुत कुछ कहना चाहकर भी मैं कुछ बोल नहीं सका। डॉ. शुक्ला मेरा कन्धा थपथपाते हुए आगे बढ़ गए। 
🔵 मैं अन्दर ही अन्दर इस चिन्ता से घुला जा रहा था कि अगर मैं अन्धा हो गया तो मेरा शेष जीवन कैसे बीतेगा, मेरे परिवार का भरण-पोषण कौन करेगा। तभी मुझे पता चला कि आचार्यश्री उज्जैन आए हुए हैं। मैं तुरंत उनके दर्शन करने चल पड़ा। उनके सामने पहुँचा, तो उन्हें प्रणाम करके मैंने अपनी व्यथा सुनाई। सारा वृत्तांत सुनकर गरुदेव ने मेरी ओर गहरी नजर से देखा और कहा-तेरा डॉक्टर क्या कहता है, यह मैं नहीं जानता। पर मैं कहता हूँ कि तेरी दूसरी आँख खराब नहीं हो सकती।
🔴 पूज्य गुरुदेव के इस आश्वासन से मेरी आँखें डबडबा गईं। मैंने उन्हें डॉक्टर का पर्चा दिखाया। दवाएँ भी हाथ में ही लिए था। मैंने कहा-गुरुदेव, ये सब.....। गुरुदेव ने मेरा आशय समझकर कहा-तेरी मरजी। रखे रख, फेंके फेंक दे। उनकी बातों पर विश्वास न करने का कोई प्रश्न ही नहीं था। मैंने उसी वक्त डॉक्टर का पर्चा फाड़कर फेंक दिया। 
🔵 तब से लेकर आज तक मैंने कोई दवा नहीं खाई। आज भी मेरी आँख की रोशनी बनी हुई है। आश्चर्य तो यह है कि युगऋषि के उस आश्वासन के बाद मैंने दिन-रात एक करके पीएच.डी. तक पूरा किया।  
 
🔴 इस बीच मैं अलीगढ़ जाकर प्रो. शुक्ला से मिला। आँख की हालत सुधरती देखकर उन्होंने मुझसे पूछा-भाई, तुम कौन-सी दवा ले रहे हो, किस डॉक्टर का इलाज चल रहा है? मैंने कहा-दवा लेना तो मैंने कब का छोड़ दिया है। भगवान सरीखे मेरे गुरुदेव ने मेरी आँख की जाती हुई रोशनी वापस लौटा दी है। अब मैं पढ़ाई-लिखाई ही नहीं, बारीक से बारीक काम भी बड़े मजे में कर लेता हूँ। पूज्य गुरुदेव के इस अद्भुत, अविस्मरणीय अनुदान की बात सुनकर डॉ. शुक्ला आश्चर्यचकित रह गए।
🔵 कुछ दिनों बाद जब मैं गुरुदेव के दर्शन करने शांतिकुंज आया तो वे सूक्ष्मीकरण साधना में थे। इस दौरान आचार्यश्री से सामान्यतया परिजनों का मिलना संभव नहीं रह गया था, किन्तु फिर भी वन्दनीया माता जी ने मुझ पर विशेष कृपा करते हुए मुझे पूज्य गुरुदेव से मिलने भेज दिया। उन्हें प्रणाम करने के बाद मैं कुछ कह पाता, उसके पहले ही वे बोल पड़े-कैसे हो कर्मयोगी? तुम्हारी आँख ठीक है न? मैने कहा-गुरुदेव यह रोशनी तो आप ही की दी हुई है। मेरे ऐसा कहने पर उन्होंने अपनी छाती ठोककर कहा- हाँ, मैंने इसकी जिम्मेदारी ले रखी है। आँख की रोशनी जीवन के अन्तिम क्षण तक बनी रहेगी। 
🔴 पूज्य गुरुदेव की वह बात आज भी सच साबित हो रही है। आज मैं ८० वर्ष आयु पार कर रहा हूँ, लेकिन घण्टों लिखने-पढ़ने का काम करने के बाद भी मेरी आँखें कभी नहीं थकती हैं।

🌹 डॉ. आर.पी. कर्मयोगी, देव संस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार (उत्तराखण्ड)   
🌹 अदभुत, आश्चर्यजनक किन्तु सत्य पुस्तक से

👉 महाकाल का प्रतिभाओं को आमंत्रण (भाग 28)

🌹 आगे बढ़ें और लक्ष्य तक पहुँचें     

🔴 आत्म-विश्वास बड़ी चीज है। वह रस्सी को साँप और साँप को रस्सी बना सकने में समर्थ है। दूसरे लोगों का साथ न मिले, यह हो सकता है, किन्तु अपने चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को मनमर्जी के अनुरूप सुधारा-उभारा जा सकता है। सङ्कल्प-शक्ति की विवेचना करने वाले कहते हैं कि वह चट्टान को भी चटका देती है, कठोर को भी नरम बना देती है और उन साधनों को खींच बुलाती है, जिनकी आशा अभिलाषा में जहाँ-तहाँ प्यासे कस्तूरी हिरण की तरह मारा-मारा फिरना पड़ता है।                            

🔵 मनुष्य यदि उतारू हो जाए, तो दुष्कर्म भी कर गुजरता है। आत्महत्या तक के लिए उपाय अपना लेता है, फिर कोई कारण नहीं कि उत्थान का अभिलाषी अभीष्ट अभ्युदय के लिए सरञ्जाम न जुटा सके? दूसरों पर विश्वास करके उन्हें मित्र-सहयोगी बनाया जा सकता है। श्रद्धा के सहारे पाषाण-प्रतिमा में देवता प्रकट होते देखे गये हैं, फिर कोई कारण नहीं कि अपनी श्रेष्ठता को समझा-उभारा और सँजोया जा सके, तो व्यक्ति ऐसी समुन्नत स्थिति तक न पहुँच सके, जिस तक जा पहुँचने वाले हर स्तर की सफलता अर्जित करके दिखाते हैं।    

🔴 आत्म निरीक्षण को सतर्कतापूर्वक सँजोया जाता रहे, तो वे खोटें भी दृष्टिगोचर होती हैं, जो आमतौर से छिपी रहती हैं और सूझ नहीं पड़ती; किन्तु जिस प्रकार दूसरों का छिद्रान्वेषण करने में अभिरुचि रहती है, वैसी ही अपने दोष-दुर्गुणों को बारीकी से खोजा और उन्हें निरस्त करने के लिए समुचित साहस दिखाया जाए, तो कोई कारण नहीं कि उनसे छुटकारा पाने के उपरान्त अपने को समुचित और सुसंस्कृत न बनाया जा सके। इसी प्रकार औरों की अपेक्षा अपने में जो विशिष्टताएँ दिख पड़ती हैं, उन्हें सींचने-सम्भालने में उत्साहपूर्वक निरत रहा जाए, तो कोई कारण नहीं कि व्यक्तित्व अधिक प्रगतिशील, अधिक प्रतिभासम्पन्न न बनने की दशा अपनाई जा सके।    
            
🌹 अगले अंक में समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हाँ हाँ, मैं बहरा था, बहरा हूँ और बहरा रहूँगा,.......तुम लोगों के लिए………

🔴 एक बार एक सीधे पहाड़ में चढ़ने की प्रतियोगिता हुई. बहुत लोगों ने हिस्सा लिया. प्रतियोगिता को देखने वालों की सब जगह भीड़ जमा हो गयी. माहौल  में  सरगर्मी थी , हर तरफ शोर ही शोर था. प्रतियोगियों ने चढ़ना शुरू किया। लेकिन सीधे पहाड़ को देखकर भीड़ में एकत्र हुए किसी भी आदमी को ये यकीन नहीं हुआ कि कोई भी व्यक्ति ऊपर तक पहुंच पायेगा…

🔵 हर तरफ यही सुनाई देता …“ अरे ये बहुत कठिन है. ये लोग कभी भी सीधे पहाड़ पर नहीं चढ़ पायंगे, सफलता का तो कोई सवाल ही नहीं, इतने सीधे पहाड़ पर तो चढ़ा ही नहीं जा सकता और यही हो भी रहा था, जो भी आदमी कोशिश करता, वो थोडा ऊपर जाकर नीचे गिर जाता, कई लोग दो -तीन बार गिरने के बावजूद अपने प्रयास में लगे हुए थे …पर भीड़ तो अभी भी चिल्लाये जा रही थी, ये नहीं हो सकता, असंभव और वो उत्साहित प्रतियोगी भी ये सुन-सुनकर हताश हो गए और अपना प्रयास धीरे धीरे करके छोड़ने लगे,

🔴 लेकिन उन्हीं लोगों के बीच एक प्रतियोगी था, जो बार -बार गिरने पर भी उसी जोश के साथ ऊपर पहाड़ पर चढ़ने में लगा हुआ था ….वो लगातार ऊपर की ओर बढ़ता रहा और अंततः वह सीधे पहाड़ के ऊपर पहुच गया और इस प्रतियोगिता का विजेता बना. उसकी जीत पर सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ, सभी लोग उसे घेर कर खड़े हो गए और पूछने लगे, तुमने ये असंभव काम कैसे कर दिखाया, भला तुम्हे अपना लक्ष्य प्राप्त करने की शक्ति कहाँ से मिली, ज़रा हमें भी तो बताओ कि तुमने ये विजय कैसे प्राप्त की?

🔵 तभी  पीछे  से  एक  आवाज़  आई … अरे उससे क्या पूछते हो, वो तो बहरा है तभी उस व्यक्ति ने कहा कि हर नकारात्मक बात के लिए -
" मैं बहरा था, बहरा हूँ और बहरा रहूँगा "।


🔴 मित्रों, अक्सर  हमारे अन्दर अपना लक्ष्य प्राप्त करने की काबीलियत होती है, पर हम अपने चारों तरफ मौजूद नकारात्मकता की वजह से खुद को कम आंक बैठते हैं और हमने जो बड़े-बड़े सपने देखे होते हैं उन्हें पूरा किये बिना ही अपनी ज़िन्दगी गुजार देते हैं

🔵 मित्रों, आवश्यकता इस बात की है हमें कमजोर बनाने वाली हर एक आवाज के प्रति बहरे और ऐसे हर एक दृश्य के प्रति अंधे होना पड़ेगा और तभी हमें सफलता के शिखर पर पहुँचने से कोई नहीं रोक पायेगा।

👉 दृष्टिकोण मे परिवर्तन

🔵 संसार में हर दुर्जन को सज्जन बनाने की, हर बुराई के भलाई में बदल जाने की आशा करना वैसी ही आशा करना है जैसी सब रास्तों पर से काँटे-कंकड़ हट जाने की। अपनी प्रसन्नता और सन्तुष्टि का, यदि हमने इसी आशा को आधार बनाया हो, तो निराशा ही हाथ लगेगी।

🔴 हाँ, यदि हम अपने स्वभाव एवं दृष्टिकोण को बदल लें तो यह कार्य जूता पहनने के समान सरल होगा और इस माध्यम से हम अपनी प्रत्येक परेशानी को बहुत अंशो में हल कर सकेंगे।

🔵 अपने स्वभाव और दृष्टिकोण में परिवर्तन कर सकना कुछ समयसाध्य और निष्ठासाध्य अवश्य है, पर असम्भव तो किसी प्रकार नहीं है। मनुष्य चाहे तो विवेक के आधार पर अपने मन को समझा सकता है, विचारों को बदल सकता है और दृष्टिकोण में परिवर्तन कर सकता है।

🔴 इतिहास के पृष्ठ ऐसे उदाहरणों से भरे पड़े हैं जिनसे प्रकट है की आरम्भ से बहुत हलके और ओछे दृष्टिकोण के आदमी अपने भीतर परिवर्तन करके संसार के श्रेष्ठ महापुरुष बने हैं।

🌹 श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 संस्कृति - संजीवनी श्रीमद् भागवत एवं गीता वांग्मय - 31- 1.127

👉 आत्मचिंतन के क्षण 23 March

🔴 निराशाग्रस्त मनुष्य दिन-रात अपनी इच्छाओं कामनाओं और वाँछाओं की आपूर्ति पर आँसू बहाता हुआ उनका काल्पनिक चिन्तन करता हुआ तड़पा करता है। एक कुढ़न, एक त्रस्तता एक वेदना हर समय उसके मनों-मन्दिर को जलाया करती है। बार-बार असफलता पाने से मनुष्य का अपने प्रति एक क्षुद्र भाव बन जाता है । उसे यह विश्वास हो जाता है कि वह किसी काम के योग्य नहीं है। उसमें कोई ऐसी क्षमता नहीं है, जिसके बल पर वह अपने स्वप्नों को पूरा कर सके, सुख और शान्ति पा सके।

🔵 जीवन का स्वरूप और अर्थ— जीवन का अर्थ है आशा, उत्साह और गति। आशा, उत्साह और गति का समन्वय ही जीवन है। जिसमें जीवन का अभाव है उसमें इन तीनों गुणों का होना निश्चित है। साथ ही जिसमें यह गुण परिलक्षित न हों समझ लेना चाहिये कि उसमें जीवन का तत्व नष्ट हो चुका है। केवल श्वास-प्रश्वास का आवागमन अथवा शरीर में कुछ हरकत होते रहना ही जीवन नहीं कहा जा सकता। जीवन की अभिव्यक्ति ऐसे सत्कर्मों में होती है, जिनसे अपने तथा दूसरों के सुख में वृद्धि हो?

🔴 मनुष्य में एक बहुत बड़ी कमजोरी यह है कि उसे प्राप्त का अभिमान हो जाता है। यह घर मैंने बनाया है। यह खेत मेरे हैं। इतना धन मैंने कमाया है। मैं इस सम्पत्ति का स्वामी हूँ, जो चाहे करूं, जैसा चाहूँ बरतूँ। इसे अहंकार कहते हैं। कहते हैं अहंकार करने वाले का विवेक नहीं रहता और वह बुद्धि-भ्रष्ट होकर नष्ट हो जाती है। अभिमानी व्यक्ति की भावनायें बड़ी संकीर्ण होती हैं। दूर तक सोचने की उसमें क्षमता न होने से वह अज्ञानियों के काम करता और दुःख भोगता है। इसलिये उसके लिये यह मंगलमय विश्व भी दुःखरूप हो जाता है। वह क्लेश में जीता और क्लेश में मर जाता है।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति (भाग 43)

🌹 श्रेष्ठ व्यक्तित्व के आधार सद्विचार

🔴 इस प्रकार के उत्साही तथा सदाशयता पूर्ण चिंतन करते रहने से एक दिन आपका अवचेतन प्रबुद्ध हो उठेगा, आपकी सोई शक्तियां जाग उठेंगी, आप के गुण कर्म स्वभाव का परिष्कार हो जायेगा और आप परमार्थ पथ पर उन्नति के मार्ग पर अनायास ही चल पड़ेंगे। और तब न आपको चिन्ता, न निराश और न असफलता का भय रहेगा न लोक परलोक की कोई शंका। उसी प्रकार शुद्ध-बुद्ध तथा पवित्र बन जायेंगे जिस प्रकार के आपके विचार होंगे और जिन के चिन्तन को आप प्रमुखता दिये होंगे।

🔵 सभी का प्रयत्न रहता है कि उनका जीवन सुखी और समृद्ध बने। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए लोग पुरुषार्थ करते, धन-सम्पत्ति कमाते, परिवार बसाते और आध्यात्मिक साधना करते हैं। किन्तु क्या पुरुषार्थ करने, धन दौलत कमाने, परिवार बसाने और धर्म-कर्म करने मात्र से लोग सुख-शान्ति के अपने उद्देश्य में सफल हो जाते हैं। सम्भव है इस प्रकार प्रयत्न करने से कई लोग सुख शान्ति की उपलब्धि कर लेते हों, किन्तु बहुतायत में तो यही दीखता है कि धन-सम्पत्ति और परिवार परिजन के होते हुए भी लोग दुःखी और त्रस्त दीखते हैं। धर्म-कर्म करते हुए भी असन्तुष्ट और अशान्त हैं। 

🔴 सुख-शान्ति की प्राप्ति के लिए धन-दौलत अथवा परिवार परिजन की उतनी आवश्यकता नहीं है। जितनी आवश्यकता सद्विचारों की होती है। वास्तविक सुख-शान्ति पाने के लिए विचार साधना की ओर उन्मुख होना होगा। सुख-शान्ति न तो संसार की किसी वस्तु में है और न व्यक्ति में। उसका निवास मनुष्य के अन्तःकरण में है। जोकि विचार रूप से उसमें स्थित रहता है। सुख-शान्ति और कुछ नहीं, वस्तुतः मनुष्य के अपने विचारों की एक स्थिति है। जो व्यक्ति साधना द्वारा विचारों को उस स्थिति में रख सकता है, वही वास्तविक सुख-शान्ति का अधिकारी बन सकता है। अन्यथा, विचार साधना से रहित धन-दौलत से शिर मारते और मेरा-तेरा, इसका-उसका करते हुए एक झूठे सुख, मिथ्या शान्ति के मायाजाल में लोग यों ही भटकते हुए जीवन बिता रहे हैं और आगे भी बिताते रहेंगे। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 स्रष्टा का परम प्रसाद-प्रखर प्रज्ञा (भाग 22)

🌹 जीवन-साधना एवं ईश-उपासना  

🔵 सोने को कसौटी पर कसने के अतिरिक्त आग में भी तपाया जाता है, तब पता चलता है कि उसके खरेपन में कहीं कोई कमी तो नहीं हैं। इसी प्रकार देखा यह भी जाना चाहिये कि सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन जैसे लोकमंगल-कार्यों में किसका कितना बढ़ा-चढ़ा अनुदान रहा। अद्यावधि संसार के इतिहास में महामानवों तथा ईश्वर-भक्तों का इतिहास इन्हीं दो विशेषताओं से जुड़ा हुआ रहा है। इनने इन्हीं दो चरणों को क्रमबद्ध रूप से उठाते हुए उत्कृष्टता के उच्च लक्ष्य तक पहुँच सकना संभव बनाया है। अन्य किसी के लिये भी इसके अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं है। कोई ऐसा शार्टकट कहाँ है, जिसे पकड़कर जीवन के स्तर को घटिया बनाये रखकर भी कोई ठोस सार्थक प्रगति की जा सके।             

🔴 चतुरता के हथकण्डों में से कई ऐसे हैं तो सही, जो बाजीगरों जैसे चमत्कार दिखाकर भोले दर्शकों को अपने कुतूहलों से चमत्कृत कर देते हैं। बेईमानी से भी कभी-कभी कोई कुछ सफलता प्राप्त कर लेता है, पर इस तथ्य को भुला न दिया जाए कि बाजीगर हथेली पर सरसों जमा तो देते हैं, पर उसका तेल निकालते और लाभ मिलते किसी ने नहीं देखा। पानी के बबूले कुछ ही देर उछल-कूद करते और फिर सदा के लिये अपना अस्तित्व गँवा बैठते हैं। 

🔵 धातुओं की खदानें जहाँ कहीं होती हैं, उस क्षेत्र के अपने सजातीय कणों को धीरे-धीरे खींचती और एकत्र करती रहती हैं। उनका क्रमिक विस्तार इसी प्रकार हो जाता है। जहाँ सघन वृक्षावली होती है, वहाँ भी हरीतिमा का चुंबकत्व आकाश से बादलों को खींचकर अपने क्षेत्र में बरसने के लिये विवश किया करता है। खिले हुए फूलों पर तितलियाँ न जाने कहाँ-कहाँ से उड़-उड़कर आ जाती हैं। 

🔴 इसी प्रकार प्रामाणिकता और उदारता की विभूतियाँ जहाँ-कहीं भी सघन हो जाती हैं वे अपने आप में एक चुंबक की भूमिका निभाती हैं और अखिल ब्रह्मांड में अपनी सजातीय चेतना को आकर्षित करके अवधारण कर लेती हैं। ईश्वरीय अंश इसी प्रकार मनुष्यों की अपेक्षा निश्चित रूप से प्राणवानों में अधिक पाया जाता है। सामान्य प्राण को महाप्राण में परिवर्तित करना ही ईश्वर-उपासना का उद्देश्य है। इसी के फलित होने पर मनुष्य को मनीषी, क्षुद्र को महान् और नर को नारायण बनने का अवसर मिलता है।            
     
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 पहले अपने अंदर झांको Pehle Apne Andar Jhanko

पुराने जमाने की बात है। गुरुकुल के एक आचार्य अपने शिष्य की सेवा भावना से बहुत प्रभावित हुए। विधा पूरी होने के बाद शिष्य को विदा करते समय...