रविवार, 11 जून 2017

👉 मन को सदा सद्विचारों में संलग्न रखिये?

🔵 मनुष्य जब तक जीवित रहता है सर्वदा कार्य में संलग्न रहता है, चाहे कार्य शुभ हो या अशुभ। कुछ न कुछ कार्य करता ही रहता है और अपने कर्मों के फलस्वरूप दुःख सुख पाता रहता है, बुरे कर्मों से दुःख एवं शुभ कर्मों से सुख।

🔴 जब हम ईश्वर की आज्ञानुसार कर्म करते हैं तो हमें किसी प्रकार का कष्ट नहीं होता है क्योंकि वे कार्य शुभ होते हैं परन्तु जब हम उनकी आज्ञा के विरुद्ध कार्य करते हैं तभी दुःखी होते हैं, दुःख से छुटकारा पाने के लिये हमें सदैव यह प्रयत्न करना चाहिए कि हम बुराइयों से बचें।

🔵 ईश्वर आज्ञा देता है कि “हे मनुष्यों! इस संसार में सत्कर्मों को करते हुए 100 वर्ष तक जीने की इच्छा करो। सत्कर्म में कभी आलसी और प्रमादी मत बनो, जो तुम उत्तम कर्म करोगे तो तुम्हें इस उत्तम कर्म से कभी भी दुःख नहीं प्राप्त हो सकता है। अतः शुभ कार्य से कभी वंचित न रहो।”

🔴 हम लोगों का सबसे बढ़कर सही कर्त्तव्य है कि हम मन को किसी क्षण कुविचारों के लिए अवकाश न दें क्योंकि जिस समय हमें शुभ कर्मों से अवकाश मिलेगा उसी समय हम विनाशकारी पथ की ओर अग्रसर होंगे।

🔵 मनुष्य का जीवन इतना बहुमूल्य है कि बार-बार नहीं मिलता, यदि इस मनुष्य जीवन को पाकर हम ईश्वर की आज्ञा न मानकर व्यर्थ कर्मों में अपने समय को बरबाद कर रहे हैं तो इससे बढ़कर और मूर्खता क्या है? इससे तो पशु ही श्रेष्ठ है जिनसे हमें परोपकार की तो शिक्षा मिलती है।

🔴 हमारे जीवन का उद्देश्य सर्वदा अपनी तथा दूसरों की भलाई करना है। क्योंकि जो संकुचित स्वार्थ से ऊंचे उठकर उच्च उद्देश्यों के लिए उदार दृष्टि से कार्य करते हैं वे ही ईश्वरीय ज्ञान को पाते हैं और वही संसार के बुरे कर्मों से बचकर शुभ कर्मों को करते हुए आनन्द को उपलब्ध करते हैं। जो प्रत्येक जीव के दुःख को अपना दुःख समझता है तथा प्रत्येक जीव में आत्मभाव रखता है अथवा परमपिता परमात्मा को सदैव अपने निकट समझता है वह कभी पाप कर्म नहीं करता जब पाप कर्म नहीं तो उसका फल दुःख भी नहीं। इसलिए हमें सदा ईश्वर परायण होना चाहिए और सद्विचारों में निमग्न रहना चाहिए जिससे मानव जीवन का महान लाभ उपलब्ध किया जा सके।

🌹 अखण्ड ज्योति-मार्च 1949 पृष्ठ 19

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 108)

🌹 ब्राह्मण मन और ऋषि कर्म

🔵 अब पुरातन काल के ऋषियों में से किसी का भी स्थूल शरीर नहीं है, उनकी चेतना निर्धारित स्थानों में मौजूद है। सभी से हमारा परिचय कराया गया और कहा गया कि इन्हीं पद चिन्हों पर चलना है। इन्हीं की कार्य पद्धति अपनानी, देवात्मा हिमालय के प्रतीक स्वरूप शान्तिकुञ्ज हरिद्वार में एक आश्रम बनाना और ऋषि परम्परा को इस प्रकार कार्यान्वित करना है, जिससे युग परिवर्तन की प्रक्रिया का गति चक्र सुव्यवस्थित रूप से चल पड़े

🔴 जिन ऋषियों, तप पूत मानवों ने कभी हिमालय में रहकर विभिन्न कार्य किए थे, उनका स्मरण हमें मार्गदर्शक सत्ता ने तीसरी यात्रा में बार-बार दिलाया था। इनमें थे, भगीरथ (गंगोत्री), परशुराम (यमुनोत्री), चरक  (केदारनाथ), व्यास (बद्रीनाथ), याज्ञवल्क्य (त्रियुगी नारायण), नारद (गुप्तकाशी), आद्य शंकराचार्य (ज्योतिर्मठ), जमदग्नि (उत्तरकाशी), पातंजलि (रुद्र प्रयाग), पिप्पलाद, सूत-शौनिक, लक्ष्मण, भरत एवं शत्रुघ्न (ऋषिकेश), दक्ष प्रजापति, कणादि एवं विश्वामित्र सहित सप्त ऋषिगण (हरिद्वार), इसके अतिरिक्त चैतन्य महाप्रभु, संत ज्ञानेश्वर एवं तुलसीदास जी के कर्तव्यों की झाँकी दिखाकर भगवान् बुद्ध के परिव्राजक धर्म चक्र प्रवर्तन अभियान को युगानुकूल परिस्थितियों में संगीत, संकीर्तन, प्रज्ञा पुराण कथा के माध्यम से देश-विदेश में फैलाने एवं प्रज्ञावतार द्वारा बुद्धावतार का उत्तरार्द्ध पूरा किए जाने का भी निर्देश था। समर्थ रामदास के रूप में जन्म लेकर जिस प्रकार व्यायामशालाओं, महावीर मंदिरों की स्थापना सोलहवीं सदी में हमसे कराई गई थी, उसी को नूतन अभिनव रूप में प्रज्ञा संस्थानों, प्रज्ञापीठों, चरणपीठों, ज्ञानमंदिरों, स्वाध्याय मण्डलों द्वारा सम्पन्न किए जाने के संकेत मार्गदर्शक द्वारा हिमालय प्रवास में ही दे दिए गए थे।

🔵 देवात्मा हिमालय का प्रतीक प्रतिनिधि शान्तिकुञ्ज को बना देने का जो निर्देश मिला वह कार्य साधारण नहीं श्रम एवं धन साध्य था, सहयोगियों की सहायता पर निर्भर भी। इसके अतिरिक्त अध्यात्म के उस ध्रुव केंद्र में सूक्ष्म शरीर से निवास करने वाले ऋषियों की आत्मा का आह्वान करके प्राण प्रतिष्ठा का संयोग भी बिठाना था। यह सभी कार्य ऐसे हैं, जिन्हें देवालय परम्परा में अद्भुत एवं अनुपम कहा जा सकता है। देवताओं के मंदिर अनेक जगह बने हैं। वे भिन्न-भिन्न भी हैं। एक ही जगह सारे देवताओं की स्थापना का तो कहीं सुयोग हो भी सकता है, पर समस्त देवात्माओं ऋषियों की एक जगह प्राण प्रतिष्ठा हुई हो ऐसा तो संसार भर में अन्यत्र कहीं भी नहीं है। फिर इससे भी बड़ी बात यह है कि ऋषियों के क्रियाकलापों का न केवल चिह्न पूजा के रूप में वरन् यथार्थता के रूप में भी यहाँ न केवल दर्शन वरन् परिचय भी प्राप्त किया जा सकता है। इस प्रकार शान्तिकुञ्ज, ब्रह्मवर्चस् गायत्री तीर्थ एक प्रकार से प्रायः सभी ऋषियों के क्रियाकलापों का प्रतिनिधित्व करते हैं।  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/brahman.2

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 12 Jun 2017


👉 आज का सद्चिंतन 12 Jun 2017


👉 शिक्षा का निचोड

🔴 काशी में गंगा के तट पर एक संत का आश्रम था। एक दिन उनके एक शिष्य ने पूछा... "गुरुवर! शिक्षा का निचोड़ क्या है?"

🔵 संत ने मुस्करा कर कहा... "एक दिन तुम खुद-ब-खुद जान जाओगे।"

🔴 बात आई गई हो गई।

🔵 कुछ समय बाद एक रात संत ने उस शिष्य से कहा... "वत्स! इस पुस्तक को मेरे कमरे में तख्त पर रख दो।"

🔴 शिष्य पुस्तक लेकर कमरे में गया लेकिन तत्काल लौट आया। वह डर से कांप रहा था।

🔵 संत ने पूछा... "क्या हुआ? इतना डरे हुए क्यों हो?"

🔴 शिष्य ने कहा... "गुरुवर! कमरे में सांप है।"

🔵 संत ने कहा... "यह तुम्हारा भ्रम होगा। कमरे में सांप कहां से आएगा। तुम फिर जाओ और किसी मंत्र का जाप करना। सांप होगा तो भाग जाएगा।"

🔴 शिष्य दोबारा कमरे में गया। उसने मंत्र का जाप भी किया लेकिन सांप उसी स्थान पर था। वह डर कर फिर बाहर आ गया और संत से बोला... "सांप वहां से जा नहीं रहा है।"

🔵 संत ने कहा... "इस बार दीपक लेकर जाओ। सांप होगा तो दीपक के प्रकाश से भाग जाएगा।"

🔴 शिष्य इस बार दीपक लेकर गया तो देखा कि वहां सांप नहीं है। सांप की जगह एक रस्सी लटकी हुई थी। अंधकार के कारण उसे रस्सी का वह टुकड़ा सांप नजर आ रहा था।

🔵 बाहर आकर शिष्य ने कहा... "गुरुवर! वहां सांप नहीं रस्सी का टुकड़ा है। अंधेरे में मैंने उसे सांप समझ लिया था।"

🔴 संत ने कहा... "वत्स, इसी को भ्रम कहते हैं। संसार गहन भ्रम जाल में जकड़ा हुआ है। ज्ञान के प्रकाश से ही इस भ्रम जाल को मिटाया जा सकता है। यही शिक्षा का निचोड है।"

🔵 वास्तव में अज्ञानता के कारण हम बहुत सारे भ्रमजाल पाल लेते हैं और आंतरिक दीपक के अभाव में उसे दूर नहीं कर पाते। यह आंतरिक दीपक का प्रकाश निरंतर स्वाध्याय और ज्ञानार्जन से मिलता है। जब तक आंतरिक दीपक का प्रकाश प्रज्वलित नहीं होगा, लोग भ्रमजाल से मुक्ति नहीं पा सकते।

👉 युग-निर्माण आन्दोलन की प्रगति (भाग 2)

🌹 उत्तराधिकार का पात्रत्व

🔴 अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों में से जिन विशिष्ट परिजनों का हम अपने उत्तराधिकारी के रूप में चुनाव कर रहे हैं, उनमें प्रमुख गुण यही होना चाहिए कि अपनी ही उलझनों तक सुलझे रहने में सीमित न रखकर “वसुधैव कुटुम्बकम्” की प्रवृत्ति को समुचित मात्रा में धारण किए हुए हों। घर का बड़ा वही कहलाता है जो अपने छोटे भाई बहिनों, अशक्त असमर्थों का भी पूरा ध्यान रखे। ऐसे ही गृहपति प्रशंसनीय कहे जाते हैं और वे ही उसे कुटुम्ब का ठीक तरह पालन पोषण कर सकने में समर्थ हो सकते हैं। जो व्यक्ति अपनी निजी इच्छाओं, कामनाओं को ही सर्वोपरि स्थान देता हो और उतनी ही परिधि में सोचता विचारता हो, ऐसे स्वार्थी के हाथ में यदि बूढ़े पिता का उत्तरदायित्व आ जाय तो घर के छोटे लोगों को क्या प्रसन्नता होगी ? वे सब घाटे में ही रहेंगे और संकट में ही पड़ेंगे। बूढ़ा बाप भी इतना समझदार तो होता ही है कि जिसे अपना उत्तरदायित्व सौंपे, उसमें स्वार्थपरता की मात्रा कम ही होनी चाहिए।

🔵 उपासना की दृष्टि से कई लोग काफी बढ़े-चढ़े होते हैं। यह प्रसन्नता की बात है कि जहाँ दूसरे लोग भगवान् को बिल्कुल ही भूल बैठे हैं वहाँ वह व्यक्ति ईश्वर का स्मरण तो करता है, औरों से तो अच्छा है। इसी प्रकार जो बदमाशियों से बचा है, अनीति और अव्यवस्था नहीं फैलाता, संयम और मर्यादा में रहता है, वह भी भला है। उसे बुद्धिमान कहा जायगा क्योंकि दुर्बुद्धि को अपनाने से जो अगणित विपत्तियाँ उस पर टूटने वाली थीं, उनसे बच गया। स्वयं भी उद्विग्न नहीं हुआ और दूसरों को भी विक्षुब्ध न करने की भलमनसाहत बरतता रहा। यह दोनों ही बातें अच्छी हैं- ईश्वर का नाम लेना और भलमनसाहत से रहना एक अच्छे मनुष्य के लिये योग्य कार्य हैं। उतना तो हर समझदार आदमी को करना ही चाहिए था। जो उतना ही करता है उसकी उतनी तो प्रशंसा ही की जायगी कि उसने अनिवार्य कर्तव्यों की उपेक्षा नहीं की और दुष्ट दुरात्माओं की होने वाली दुर्गति से अपने को बचा लिया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति 1965 जनवरी पृष्ठ 50
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/January/v1.50

👉 आत्मचिंतन के क्षण 12 June

🔴 उत्तरदायित्वों की जो बोझ मानकर उपेक्षा करता है। उस अच्छे परिणामों से वंचित रह जाना पड़ता है। प्रत्येक मानव की आजीविका कमाने में शर्म, संकोच का भाव नहीं रखना चाहिये। आत्म-निर्भरता तो जीवनोत्कर्ष के पथ पर अग्रसर करती है। परिस्थितियों से सामंजस्य बिठाने का अद्भुत गुण मनुष्य में है। इसलिये अपने प्रत्येक कार्य की पूरी शक्ति से करना चाहिये। प्रत्येक कार्य ईश्वर का है, अतः उसे आत्म समर्पित भाव से करना चाहिये। कार्य में सद्भावना का प्रभाव उज्ज्वल चरित्र निर्माण के विकास के लिये होता है। कार्य करने का सौंदर्य, रुचिकर ढंग सफलता की निशानी है। कार्य की श्रेष्ठता में जीवन की श्रेष्ठता निहित है।

🔵 आत्म-विश्वास और परिश्रम के बल पर जीवन को सार्थकता प्रदान की जा सकती है। भाग्य का निर्माणकर्ता मनुष्य स्वयं है। ईश्वर निर्णयकर्ता और नियामक है। मनुष्य परिश्रम से चाहे तो अपने भाग्य की रेखाओं को बना सकता है-परिवर्तित कर सकता है। हैनरी स्ल्यूस्टर कहता है कि-“जिसे हम भाग्य की कृपा समझते हैं, वह और कुछ नहीं। वास्तव में हमारी सूझ-बूझ और कठिन परिश्रम का फल है।” विश्वास रखें परिश्रम और आत्मविश्वास एक दूसरे के बिना अधूरे है। दोनों मिलकर के ही लक्ष्य तक पहुँचने में समर्थ हो पाते हैं। संकल्प करें-बाधाओं को हमेशा हँस-हँस स्वीकार करना है। डर कर मार्ग से हटाना नहीं है। लक्ष्य विहीन नहीं होना है। हमेशा गतिमान रहना हैं-गतिहीन नहीं होना है।       
                                                
🔴 परिश्रम और सफलता की आशा करते हुए हमें लक्ष्य प्राप्ति के बीच आने वाले दुष्परिणामों को भी सामान्य करने का साहस करना चाहिये। “सर्वश्रेष्ठ के लिये प्रयत्न कीजिये मगर निकृष्टतम के लिये तैयार रहिये।” अँग्रेजी की यह कहावत बड़ी सार्थक है। हैनरी फोर्ड से एक व्यक्ति ने उनकी सफलता का रहस्य पूछा, तो उन्होंने कहा, “सफलता का सबसे पहला रहस्य है, हर परिस्थिति के लिए तैयार रहना।
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 इक्कीसवीं सदी का संविधान - हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 9)

🌹  शरीर को भगवान् का मंदिर समझकर आत्मसंयम और नियमितता द्वारा आरोग्य की रक्षा करेंगे।

🔵 रुग्णता या बीमारी कहीं बाहर से नहीं आती। विकार तो बाहर से भी प्रविष्ट हो सकते हैं तथा शरीर के अंदर भी पैदा होते हैं, किंतु शरीर संस्थान में उन्हें बाहर निकाल फेंकने की अद्भुत क्षमता विद्यमान है। मनुष्य अपने इंद्रिय असंयम द्वारा जीवनी शक्ति को बुरी तरह नष्ट कर देता है। आहार-विहार के असंयम से शरीर के पाचन तंत्र, रक्त संचार, मस्तिष्क, स्नायु संस्थान आदि पर भारी आघात पड़ता है। बार-बार के आघात से वे दुर्बल एवं रोगग्रस्त होने लग जाते हैं। निर्बल संस्थान अंदर के विकारों को स्वाभाविक ढंग से बाहर नहीं निकाल पाते। फलस्वरूप वे शरीर में एकत्रित होने लगते हैं तथा अस्वाभाविक ढंग से बाहर निकलने लगते हैं। यही स्थिति बीमारी कहलाती है।

🔴 स्वस्थ रहने पर ही कोई अपना और दूसरों का भला कर सकता है। जिसे दुर्बलता और रुग्णता घेरे हुए होगी, वह निर्वाह के योग्य भी उत्पादन न कर सकेगा। दूसरों पर आश्रित रहेगा। परावलम्बन एक प्रकार से अपमानजनक स्थिति है। भारभूत होकर जीने वाले न कहीं सम्मान पाते हैं और न किसी की सहायता कर सकने में समर्थ होते हैं। जिससे अपना बोझ ही सही प्रकार उठ नहीं पाता, वह दूसरों के लिए किस प्रकार कितना उपयोगी हो सकता है?  

🔵 मनुष्य जन्म अगणित विशेषताओं और विभूतियों से भरा पूरा है। किसी को भी यह छूट है कि उतना ऊँचा उठे जितना अब तक कोई महामानव उत्कर्ष कर सका है, पर यह संभव तभी है, जब कि शरीर और मन पूर्णतया स्वस्थ हो। जो जितनों के लिए, जितना उपयोगी और सहायक सिद्ध होता हैं, उसे उसी अनुपात में सम्मान और सहयोग मिलता है। अपने और दूसरों के अभ्युदय में योगदान करते उसी में बन पड़ता है, जो स्वस्थ, समर्थ रहने की स्थिति बनाए रहता है। इसलिए अनेक दुःखद दुर्भाग्यों और अभिशापों में प्रथम अस्वस्थता को ही माना गया है। प्रयत्न यह होना चाहिए कि वैसी स्थिति उत्पन्न न होने पाए। सच्चे अर्थों में जीवन उतने ही समय का माना जाता है, जितना कि स्वस्थतापूूर्वक जिया जा सके। 

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Sankalpaa/body

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.15

👉 इक्कीसवीं सदी का संविधान - हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 8)

🌹  शरीर को भगवान् का मंदिर समझकर आत्मसंयम और नियमितता द्वारा आरोग्य की रक्षा करेंगे।

🔵 यह सब अज्ञान के कारण होता है, जो होश सँभालने से पूर्व ही अभिभावकों के अनाड़ीपन के कारण वह अपने ऊपर लाद लेता है। स्वस्थ-समर्थ रहना कुछ भी कठिन नहीं है। प्रकृति के संकेतों का अनुसरण करने भर से यह प्रयोजन सिद्ध हो सकता है। प्रकृति के सभी जीवधारी यही करते और दुर्घटना जैसी आकस्मिक परिस्थितियों को छोड़कर साधारणतया निरोग रहते और समयानुसार अपनी मौत मरते हैं। प्रकृति के संदेश-संकेतों को जब सृष्टि के सभी जीवधारी मोटी बुद्धि होने पर भी समझ लेते हैं तो कोई कारण नहीं कि मनुष्य जैसा बुद्धिजीवी उन्हें न अपना सके। प्रकृति के स्वास्थ्य रक्षा के नियम व्यवहार में अति सरल हैं। उचित और अनुचित का निर्णय करने वाले यंत्र इसी शरीर में लगे हैं, जो तत्काल यह बता देते हैं कि क्या करना चाहिए, क्या नहीं? मर्यादाओं का पालन और वर्जनाओं का अनुशासन मानने भर से उद्देश्य की पूर्ति हो जाती है।

🔴 आहार-विहार का ध्यान रखने के स्वास्थ्य रक्षा की समस्या हल हो जाती है। आहार प्रमुख पक्ष है, जिसे स्वास्थ्य, अनुशासन का पूर्वार्द्ध कहा जा सकता है। उत्तरार्द्ध में विहार आता है, जिसका तात्पर्य होता है नित्य कर्म, शौच, स्नान, शयन, परिश्रम, संतोष आदि। इन्हीं के संबंध में समुचित जानकारी प्राप्त कर लेने और उनका परिपालन करते रहने से एक प्रकार से आरोग्य का बीमा जैसा हो जाता है।  

🔵 शरीर को ईश्वर के पवित्र निवास के रूप में मान्यता देना उचित है। यह तथ्य ध्यान में बना रहे तो शरीर के प्रति निरर्थक मोहग्रस्तता से बचकर, उसके प्रति कर्तव्यों का संतुलित निर्वाह संभव है। मंदिर को सजाने, सँवारने में भगवान् को भुला देना निरी मूर्खता है, किंतु देवालयों को गंदा, तिरस्कृत, भ्रष्ट, जीर्ण-शीर्ण रखना भी पाप माना जाता है। शरीर रूपी मंदिर को मनमानी बुरी आदतों के कारण रुग्ण बनाना प्रकृति की दृष्टि में बड़ा अपराध है। उसके फलस्वरूप पीड़ा, बेचैनी, अल्पायु, आर्थिक हानि, तिरस्कार जैसे दंड भोगने पड़ते हैं।  

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Sankalpaa/body

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.14

👉 युग-निर्माण आन्दोलन की प्रगति

🌹 उत्तराधिकार और प्रतिनिधित्व का प्रयोजन
 
🔵 नवम्बर और दिसम्बर की अखण्ड-ज्योति में इसी स्तम्भ के अंतर्गत ‘प्रतिनिधियों की नियुक्ति’ वाली योजना छपी है। प्रसन्नता की बात है कि परिजनों ने उसे गम्भीरता-पूर्वक समझा और ग्रहण किया है। बात सचमुच ऐसी है भी कि उस पर विचार करना हर सदस्य के लिए आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी है।

🔴 ‘अखण्ड-ज्योति’ छपे कागजों का व्यापार नहीं है। न उसके पाठक इस तरह के मनचले लोग ही है कि मनोरंजन के लिए, खाली समय काटने के लिये कुछ भी पढ़ते रहने की तरह इस पत्रिका को मँगाते हों। हमने विशेष प्रयत्न और मनोयोगपूर्वक पिछले पच्चीस वर्ष के परिश्रम से इस विशाल जनसमुद्र में से थोड़े से मोती चने हैं। वे ही अखण्ड-ज्योति के सदस्य हैं। जिनकी अन्तरात्मा में पूर्व जन्मों की संग्रहीत उत्कृष्टता मौजूद है, जिन्होंने इस जन्म में भी अपनी अन्तरात्मा को परिष्कृत किया है - जिनके सामने मानव-जीवन की महत्ता और उसकी सार्थकता का प्रश्न उपस्थित रहता है-ऐसे ही लोग इस परिवार के सदस्य बन सके हैं और इन प्रबुद्ध आत्माओं की अन्तःप्रेरणा को जागृत एवं समुन्नत बनाने के लिए एक उपयुक्त साधन के रूप में “अखण्ड-ज्योति” अपना अस्तित्व बनाये हुए है और इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये वह जीवित है

🌹 जागृत आत्माओं का चुनाव

🔵 जागृत आत्माओं को ढूंढ़ने और संग्रह करने में हमको ‘अखण्ड-ज्योति’ के 25 वर्ष पूरे हो गये। अब उसे दूसरे कदम उठाने हैं। जिन विचारों का पिछले वर्षों में प्रचार किया जाता रहा है अब उन्हें मूर्त रूप देने के लिये ठोस गतिविधियाँ अपनानी हैं, और रचनात्मक कार्य खड़े करने हैं। यह सब हम अकेले ही न कर लेंगे, प्रस्तुत योजना की पूर्ति के लिए अनेक सहचरों का श्रम एवं मनोयोग आवश्यक होगा। ऐसे लोग कौन हो सकते हैं, यही चुनावक्रम इन दिनों चल रहा है। तीस हजार अखण्ड-ज्योति सदस्यों में से सभी इतने उत्साही और निष्ठावान नहीं हैं जिन पर इतना भार डाला जा सके कि वे इस मिशन को गतिशील बनाये रहने के लिये हमारी ही तरह कुछ करने के लिये कटिबद्ध हो जाएँ। यों परिवार के सभी परिजन, अखण्ड ज्योति के प्रायः सभी सदस्य अपनी आध्यात्मिक विशेषताओं से सम्पन्न हैं। पर बड़े उत्तरदायित्व संभालने की क्षमता हर किसी में नहीं हैं। बूढ़ा बाप, परिवार के बड़े लड़कों को गृह व्यवस्था चलाने का उत्तरदायित्व सौंपता है, इसको अर्थ यह नहीं कि घर के शेष सब लोगों का महत्व कम है। आगे चलकर छोटे बच्चे भी होनहार हो सकते हैं-वे बूढ़े बाप से भी अधिक योग्य सिद्ध हो सकते हैं, पर आज तो जो भी कंधे पर बोझ ढोने की क्षमता रखते होंगे, उन्हें ही कार्यभार सौंपा जाएगा

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति 1965 जनवरी

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1965/January/v1.50

👉 अपना अपना भाग्‍य

एक राजा के तीन पुत्रियाँ थीं और तीनों बडी ही समझदार थी। वे तीनो राजमहल मे बडे आराम से रहती थी। एक दिन राजा अपनी तीनों पुत्रियों सहित भोज...