सोमवार, 5 फ़रवरी 2018

👉 किसी से प्यार या नफ़रत

🔷 एक बार एक महात्मा ने अपने शिष्यों से अनुरोध किया कि वे कल से प्रवचन में आते समय अपने साथ एक थैली में बडे़ आलू साथ लेकर आयें, उन आलुओं पर उस व्यक्ति का नाम लिखा होना चाहिये जिनसे वे ईर्ष्या करते हैं। जो व्यक्ति जितने व्यक्तियों से घृणा करता हो, वह उतने आलू लेकर आये।

🔶 अगले दिन सभी लोग आलू लेकर आये, किसी पास चार आलू थे, किसी के पास छः या आठ और प्रत्येक आलू पर उस व्यक्ति का नाम लिखा था जिससे वे नफ़रत करते थे।

🔷 अब महात्मा जी ने कहा कि, अगले सात दिनों तक ये आलू आप सदैव अपने साथ रखें, जहाँ भी जायें, खाते-पीते, सोते-जागते, ये आलू आप सदैव अपने साथ रखें । शिष्यों को कुछ समझ में नहीं आया कि महात्मा जी क्या चाहते हैं, लेकिन महात्मा के आदेश का पालन उन्होंने अक्षरशः किया। दो-तीन दिनों के बाद ही शिष्यों ने आपस में एक दूसरे से शिकायत करना शुरू किया, जिनके आलू ज्यादा थे, वे बडे कष्ट में थे। जैसे-तैसे उन्होंने सात दिन बिताये, और शिष्यों ने महात्मा की शरण ली। महात्मा ने कहा, अब अपने-अपने आलू की थैलियाँ निकालकर रख दें, शिष्यों ने चैन की साँस ली।

🔶 महात्माजी ने पूछा – विगत सात दिनों का अनुभव कैसा रहा ? शिष्यों ने महात्मा से अपनी आपबीती सुनाई, अपने कष्टों का विवरण दिया, आलुओं की बदबू से होने वाली परेशानी के बारे में बताया, सभी ने कहा कि बडा हल्का महसूस हो रहा है… महात्मा ने कहा – यह अनुभव मैने आपको एक शिक्षा देने के लिये किया था…

🔷 जब मात्र सात दिनों में ही आपको ये आलू बोझ लगने लगे, तब सोचिये कि आप जिन व्यक्तियों से ईर्ष्या या नफ़रत करते हैं, उनका कितना बोझ आपके मन पर होता होगा, और वह बोझ आप लोग तमाम जिन्दगी ढोते रहते हैं, सोचिये कि आपके मन और दिमाग की इस ईर्ष्या के बोझ से क्या हालत होती होगी? यह ईर्ष्या तुम्हारे मन पर अनावश्यक बोझ डालती है, उनके कारण तुम्हारे मन में भी बदबू भर जाती है, ठीक उन आलुओं की तरह…. इसलिये अपने मन से इन भावनाओं को निकाल दो।

🔶 यदि किसी से प्यार नहीं कर सकते तो कम से कम नफ़रत मत करो, तभी तुम्हारा मन स्वच्छ, निर्मल और हल्का रहेगा, वरना जीवन भर इनको ढोते-ढोते तुम्हारा मन भी बीमार हो जायेगा।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 6 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 6 Feb 2018


👉 गायत्री की अमोघ शक्ति

🔶 गायत्री सद्बुद्धि का मंत्र है। इस महामंत्र में कुछ ऐसी विलक्षण शक्ति है कि उपासना करने वाले के मस्तिष्क और हृदय पर बहुत जल्दी आश्चर्यजनक  प्रभाव परिलक्षित होता है। मनुष्य के मन:क्षेत्र में समाए हुए काम, क्रोध, लोभ, मोह, चिंता, ईर्ष्या, कुविचार आदि चाहे कितनी ही गहरी जड़ जमाए बैठे हों, मन में तुरंत ही हलचल आरंभ होती है और उनका उखडऩा, घटना तथा मिटना प्रत्यक्ष दिखाई  पडऩे लगता है।
  
🔷 संसार में समस्त दु:खों की जननी कुबुद्धि ही है। जितने भी दु:खी मनुष्य इस विश्व में दीख पड़ते हैं, उनके दु:खों का एकमात्र कारण उनके कुविचार ही हैं। परमात्मा का युवराज मनुष्य दु:ख के निमित्त नहीं, अपने पिता के इस पुण्य उपवन-संसार में आनंद की क्रीड़ा करने के लिए आता है। इस स्वर्गादपि गरीयसी धरती माता पर वस्तुत: दु:ख का अस्तित्व ही नहीं है।
  
🔶 संसार में जितने दु:ख हैं, सब कुबुद्धि के कारण हैं। लड़ाई, झगड़ा, आलस्य, अत्याचार आदि के पीछे मनुष्य की दुर्बुद्धि ही काम करती है। इन्हीं कारणों से रोग, अभाव, चिन्ता आदि का प्रादुर्भाव होता है और नाना प्रकार की पीड़ाएँ सहनी पड़ती हैं। कुबुद्धि से बुरे विचार बनते हैं। इसीलिए कुबुद्धि को पापों की जननी कहा गया है। गायत्री मंत्र का प्रधान कार्य इस कुबुद्धि को हटाना है। गायत्री उपासना से मस्तिष्क में सद्ïविचार और हृदय में सद्ïभाव उत्पन्न होते हैं।
  
🔷 जिनकी स्मरण शक्ति मंद है, मस्तिष्क जल्दी थक जाता है, उन्हें गायत्री उपासना करके थोड़े ही समय में इस महान्ï शक्ति के चमत्कार देखने को मिलते हैं। सिर में दर्द, चक्कर आना आदि रोगों की शिकायतें जिन्हें बनी रहती हैं, उन्हें गायत्री उपासना करनी चाहिए। इससे मस्तिष्क के सभी कल पुर्जे बलवान्ï और निरोग बनते हैं। जिनके घर में कुबुद्धि का साम्राज्य छाया रहता है, आपस में द्वेष, असहयोग, मनमुटाव, कलह, दुराव एवं दुर्भाव रहता है, आये दिन झगड़े होते रहते हैं, आपाधापी और स्वार्थपरता में प्रवृत्ति रहती है, गृह-व्यवस्था को ठीक रखने, समय का सदुपयोग करने, योग्यताएँ बढ़ाने, कुसंग से बचने, श्रमपूर्वक आजीविका कमाने, मन लगाकर विद्या-अध्ययन करने में प्रवृत्ति न होना आदि दुर्गुण कुबुद्धि के प्रतीक हैं। जहाँ यह बुराइयाँ भरी रहती हैं, वे परिवार कभी भी उन्नति नहीं कर सकते, अपनी  को कायम नहीं रख सकते। इसके विपरीत, उनका पतन होना आरंभ हो जाता है। बिखरी हुई बुहारी की सीकों की तरह छिन्न-भिन्न होने पर वर्तमान स्थिति भी स्थिर नहीं रहती। दरिद्रता, हानि, घाटा, शत्रुओं का प्रकोप, मानसिक अशांति की अभिवृद्धि आदि बातें दिन-दिन बढ़ती हैं और वे घर कुछ ही समय में अपना सब कुछ खो बैठते हैं। कुबुद्धि ऐसी अग्रि है, जहाँ भी वह रहती है, वहीं की वस्तुओं को जलाने और नष्ट करने का कार्य निरन्तर करती रहती है।
  
🔶 जहाँ उपरोक्त प्रकार की स्थिति हो, वहाँ गायत्री उपासना का आरम्भ होना एक अमोघ अस्त्र है। अँगीठी जलाकर रख देने से जिस प्रकार कमरे की सारी हवा गरम हो जाती है और उसमें बैठे हुए सभी मनुष्य सर्दी से छूट जाते हैं, उसी प्रकार घर के थोड़े से व्यक्ति भी यदि सच्चे मन से माता की शरण लेते हैं, तो उन्हें स्वयं तो शान्ति मिलती ही है, साथ ही उनकी साधना का सूक्ष्म प्रभाव घर भर पर पड़ता है और चिन्ता-जनक मनोविकारों का शमन होने तथा सुमति, एकता, प्रेम, अनुशासन तथा सद्भाव की परिवार में बढ़ोत्तरी होती हुई, स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती है। साधना निर्बल हो, तो प्रगति धीरे-धीरे होती है, पर होती अवश्य है। सद्बुद्धि एक शक्ति है, जो जीवन-क्रम को बदलती है। उस परिवर्तन के साथ-साथ मनुष्य की परिस्थितियाँ भी बदलती हैं। गायत्री माता की ओर उन्मुख होने वाला व्यक्ति सद्बुद्धि तथा सुख-शान्ति का वरदान प्राप्त करता है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 समर्थ और प्रसन्न जीवन की कुँजी (भाग 4)

🔷 किसी मित्र या सहयोगी से आड़े वक्त में आप सहायता की आशा करते थे पर उसने सहानुभूति तक न दिखाई। इसमें भी आवेश क्रोध करने की आवश्यकता नहीं। किन्हीं से आपके अच्छे सम्बन्ध रहे हो, इसे आप अपनी सज्जनता का तकाजा समझे। जितने अधिक लोगों के साथ आपके सद्भाव रहे उतना ही अच्छा पर इसका मूल्य कोई आपकी सहायता करके चुकाये यह आवश्यक नहीं। आप अपने निज के बल पर विश्वास कीजिए। इतना साहस रखिये कि अपनी गुत्थियों को अपने बलबूते सुलझा लेंगे न सुलझेगी तो उस अन सुलझा स्थिति से भी काम चलायेंगे आपकी इच्छानुरूप सारी समस्याओं का हल निकलता रहे यह आवश्यक नहीं। गुत्थियाँ और भी अधिक उलझ सकती है।

🔶 प्रतिकूलताओं का दबाव और भी अधिक बढ़ सकता है। यह अनुमान लगाकर चलेंगे तो आप जीवन संग्राम के सच्चे खिलाड़ी कहे जा सकते है। खिलाड़ी का पहला और आवश्यक गुण यह है कि वह हारती हुई मुख मुद्रा में भी संतुलित मन स्थिर और निश्चय वाला होना चाहिए। उसके लिए तैश, आवेश किन्हीं भी परिस्थितियों में क्षम्य नहीं है। हर आदमी खिलाड़ी तो नहीं हो सकता, पर उसे समझदार तो होना ही चाहिए। समझदारी की जिम्मेदारियाँ खिलाड़ी जिम्मेदारी से किसी भी प्रकार कम नहीं है। उसका स्वभाव उससे भी घटिया नहीं होना चाहिए। उसका मानसिक स्वास्थ्य सही रहना चाहिए।

🔷 बीमारियों को यदि दो भागों में विभक्त करना पड़े तो उनमें एक आवेशजन्य और दूसरी अवसादजन्य होगी। रक्तचाप के उदाहरण से इसे और भी अच्छी तरह समझा जा सकता है। एक हाई ब्लड प्रेशर दूसरा लो ब्लड प्रेशर। मानसिक रोगियों में एक किस्म उत्तेजितों की है। दूसरी अवसाद ग्रस्तों की। अवसाद ग्रस्त अर्थात् निराश, उदास, आलसी, अकर्मण्य, डरपोक, कायर आदि। उत्तेजितों में क्रोधी, आवेश ग्रस्त, जल्दबाज, झगड़ालू आदि दुःस्वभाव ग्रस्त। दो ही प्रकृति वाले अस्वाभाविक जीवन जीते है और अर्ध विक्षिप्त कहलाते है। यदि उनके सामने कोई गुत्थी या कठिनाई आए तो वे उसे हल करना तो दूर अपनी मानसिक अस्त–व्यस्तता के कारण दूनी बढ़ा लेंगे। सफलता के अवसर सामने होंगे तो उन्हें जल्दी ही गंवा देंगे। ऐसे लोग इस या उस प्रकार असफल ही रहेंगे। हैरानी उन्हें हर घड़ी घेरे रहेगी

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1988 पृष्ठ 57
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1988/March/v1.57

👉 खाने तक में नासमझी की भरमार (भाग 5)

🔷 मिर्च मसालों के आवेश में मनुष्य अधिक खा जाता है। जो अभक्ष्य थे उन्हें भी निगल जाता है। अवांछनीय तत्वों को शरीर में प्रवेश देने पर कोई अपनी चतुरता की डींग क्यों न हाँके, पाक विद्या के निष्णात अपने कौशल की शेखी कितनी ही क्यों न बघारें, वास्तविकता यह है कि उस चतुरता के सहारे आरोग्य के सर्वनाश का ही द्वार खुलता है। लाड़-चाव में प्रियजनों को स्वादिष्ट व्यंजन बना-बनाकर खिलाना और अधिक खाने का आकर्षण या दबाव प्रस्तुत करना वस्तुतः ऐसी शत्रुता है, जिसे लोक व्यवहार में मित्रता, शुभेच्छा का प्रदर्शन समझा जाने लगा है।

🔶 न जाने यह समझदारी कहाँ से मनुष्य पर चढ़ दौड़ी कि अधिक खाने से अधिक बल मिलता है, जबकि बात तथ्य के सर्वथा विपरीत है। पेट की बनावट ही ऐसी है कि यदि वह आधा भरा हो तो ही पाचन का ठीक प्रबन्ध कर सकता है। हाँडी खाली रहे तो ही उफनने-उबलने की गुंजायश रहने पर ठीक प्रकार पकेगी। मथानी में दही बिलोने के कारण जो हलचल होती है उसके लिए जगह छोड़नी पड़ती है। यदि हांडी खचाखच भरी हो तो पकने की प्रक्रिया कैसे पूरी हो? मथानी को गरदन तक भर दिया गया हो तो बिलोने पर जो उथल-पुथल होती है उसके लिए स्थान कैसे मिले?

🔷 पेट के खाली रहने पर ही पाचन की गुंजायश रहती है। सीमित रस-स्राव होने पर सीमित मात्रा का आहार ही पचता है। गले तक बोरा भर लेने पर यह आशा छोड़ ही देनी चाहिए कि वह ठीक प्रकार पचेगा और उपयुक्त पोषण प्रदान कर सकेगा। मिर्च-मसाले इस व्यवस्था को बुरी तरह बिगाड़ देते हैं। उनसे दुहरी हानि है। एक यह कि वे अपनी उत्तेजक विषाक्तता के कारण पाचन तंत्र की तोड़-फोड़ करते हैं। दूसरी यह कि उस लालच में अधिक मात्रा में खाते जाने पर भी हाथ रुकता नहीं। फलतः पेट को अकारण अत्यधिक श्रम करने पर भी पोषण के नाम पर खाली हाथ रहना पड़ता है। अपच उत्पन्न होने पर बीमारियों का आक्रमण दौड़ पड़ता हैं सो अलग। इस प्रकार स्वादिष्ट के नाम पर नमक और मसालों का उपयोग होता हैं। उनसे लाभ जैसा तो कुछ मिलता नहीं। शरीर पर विपत्ति लदती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Saving a Life is True Worship

🔶 Saint Gyaneshwar was walking along a river. A monk was deep in meditation while a small child was swimming in the river. All of a sudden, the child was swept away by a strong wave. Now, the poor child was in trouble. He was drowning and frantically crying for help, but the monk sat calmly in his meditation. He opened his eyes momentarily, saw the drowning boy and closed his eyes again.

🔷 Saint Gyaneshwar immediately jumped into the river and saved the kid. He then turned to the meditating monk and asked, "May I ask what you are doing, sir?" "Can't you see? I am meditating!" the monk replied and closed his eyes again. The saint again asked, "Could you succeed in witnessing God?" "No", replied the monk, "I can't concentrate due to disturbances."

🔶 And Saint Gyaneshwar said, "Then get up, and help the poor and needy. Learn to share the misfortunes and sorrows of others, otherwise you will never succeed in your worship" Now the monk realized his folly. He thought, "True worship would have been an attempt to save the drowning kid, rather than ignoring the incident" From that day the monk changed completely. He regularly dedicated some time to help others in addition to his meditation.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 14)

🔶 मित्रो! आप अपनी वाणी का सही प्रयोग करना और ठीक रूप में इस्तेमाल करना। वहाँ इस बात का अहंकार मत होने देना कि हम पहले अमीर आदमी थे, मालदार आदमी थे, जमींदार थे। हम पहले वकील थे, डाक्टर थे, इंजीनियर थे। यह क्या है? अहंकार है। आप अपना अहंकार जितना ज्यादा अपने मुँह से बताने की कोशिश करेंगे, उतना ही समझदार व्यक्तियों की श्रेणी में आपका छोटापन जाहिर होता हुआ चला जायेगा कि यह आदमी बड़ी कच्ची तबियत का आदमी है और बड़ी कमजोर तबियत का आदमी है। पुराने जमाने में आप वकील थे, तो हम क्या कर सकते हैं? आप वकील थे तो आपने रुपये कमाये होंगे, आपने रोटी खायी होगी। इससे हमें क्या लेना-देना? हमें तो आप अभी की बात बताइये कि इस समय आपकी मनःस्थिति क्या मनुष्य सेवा के लिए तत्पर है? सेवा की वृत्ति आपके मन में है क्या? आप पुराने किस्से बताकर हमारे ऊपर रौबदारी क्यों करना चाहते हैं? आप तो हमें इस समय की बात बताइये कि आप इस समय क्या हैं?

🔷 इसलिए मित्रो! आप अपनी कमजोरियों को जाहिर न होने दें। आप श्रेष्ठ, समझदार और बलवान व्यक्ति हो करके वहाँ जाइये, जहाँ हम आपको भेज रहे हैं। आप सशक्त होकर जायँ जिससे लोगों के अंदर आप इतनी प्रेरणा उत्पन्न करने में समर्थ हो जायँ। लोगों को अज्ञान और लोभ-मोह से हटाने में कितने समर्थ हुए, कितनी सफलता प्राप्त की, यही आपकी कसौटी है। इस पर आपको अपने आपको, अपने कार्यों को, हमारे कार्यों को कसना चाहिए।

🔶 मित्रो! यह आपका मिशन, जिसके लिए आपने वक्त देना-समय देना मंजूर कर लिया, जिसके आप सरपरस्त हैं। इसकी महिमा और गरिमा के बारे में जितना ज्यादा आपका विश्वास होगा, जितनी ज्यादा आपकी निष्ठा होगी, उतना ही ज्यादा निष्ठा और विश्वास आप लोगों में पैदा करने में समर्थ होंगे। यह जमाना निष्ठाओं से रहित है। यह जमाना भावनाओं से रहित है। इस जमाने में वे उच्चस्तरीय सिद्धांत और आदर्श न जाने कहाँ से कहाँ गायब हो गये जो कि हमारे ऋषियों की विरासत थी, सम्पदा थी। उसे लोगों ने खो दिया। हम लोगों ने उन विशेषताओं को खो दिया, जिसके आधार पर हम सारे संसार के जगद्गुरु कहलाते थे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 33)

👉 गुरु से बड़ा तीनों लोकों में और कोई नहीं

🔶 गुरुगीता में गुरुतत्त्व की अनुभूति समायी है। सद्गुरु भक्तों के लिए सहज-सुलभ यह अनुभूति बुद्धिप्रवण जनों के लिए परम दुर्लभ है। ऐसे लोग अपनी तर्क-बुद्धि से देहधारी गुरुसत्ता को सामान्य मानव समझने की भूल करते रहते हैं। वे सोचते हैं—हमारी ही तरह दिखने वाला यह व्यक्ति हमसे इतना अलग और असाधारण किस भाँति हो सकता है? जो ठीक हमारी तरह खाता-पीता व सोता है, वह भला किस तरह ईश्वरीय तत्त्व की सघन प्रतिमूर्ति हो सकता है? अनेकों शंकाएँ-कुशंकाएँ उनके मन-अन्तःकरण को घेरे रहती हैं। अनगिनत संदेह-भ्रम उन्हें परेशान करते रहते हैं। मूढ़ताओं का यह कुहासा इतना गहरा होता है कि सूर्य की भाँति प्रकाशित सद्गुरु चेतना उन्हें नजर ही नहीं आती। अपनी तर्कप्रवण बुद्धि में उलझकर वे यह भूल जाते हैं कि गुरुदेव तो तर्क से अतीत हैं। वे महामहेश्वर गुरुदेव बुद्धिगम्य नहीं, भावगम्य हैं।
  
🔷 उन भावगम्य भगवान् को तर्क से नहीं, श्रद्धा से समझा जा सकता है। उन्हें नमन एवं समर्पण से ही इस सत्य का बोध होता है कि वे कौन हैं? गुरु भक्ति कथा की पिछली पंक्तियों में इसी तत्त्व की अनुभूति कराने की चेष्टा की गई है। इसमें यह ज्ञान कराया गया है कि गुरुदेव ब्राह्मी चेतना से सर्वथा अभिन्न होने के कारण इस जगत् के परम स्रोत हैं। यह जगत् भी उन्हीं का विराट् रूप है। वे एक साथ महाबीज भी हैं और महावट भी। ऊपरी तौर पर हर कहीं-सब कहीं कितना भी भेद क्यों न दिखाई दे, पर गुरुदेव की परम पावन चेतना सभी कुछ अभिन्न और अभेद है।

🔶 उनके चरण कमलों में आश्रय पाने से शिष्यों के सभी दुःख, द्वन्द्व और तापों का निवारण हो जाता है। उनका प्रभाव और प्रताप कुछ ऐसा है कि महारुद्र यदि कु्रद्ध हो जायें, तो गुरु कृपा से शिष्य का त्राण हो जाता है; परन्तु सद्गुरु के रुष्ट होने से स्वयं महारुद्र भी रक्षा नहीं कर पाते हैं। सद्गुरु चरण युगल शिव-शक्ति का ही रूप हैं। उनकी बार- बार वन्दना करने से शिष्यों का सब भाँति कल्याण होता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 57

👉 पहले अपने अंदर झांको Pehle Apne Andar Jhanko

पुराने जमाने की बात है। गुरुकुल के एक आचार्य अपने शिष्य की सेवा भावना से बहुत प्रभावित हुए। विधा पूरी होने के बाद शिष्य को विदा करते समय...