सोमवार, 5 मार्च 2018

👉 मेरे पापा की औकात

🔷 पाँच दिन की छूट्टियाँ बिता कर जब ससुराल पहुँची तो पति घर के सामने स्वागत में खड़े थे। अंदर प्रवेश किया तो छोटे से गैराज में चमचमाती गाड़ी खड़ी थी स्विफ्ट डिजायर!

🔶 मैंने आँखों ही आँखों से पति से प्रश्न किया तो उन्होंने गाड़ी की चाबियाँ थमाकर कहा:-"कल से तुम इस गाड़ी में कॉलेज जाओगी प्रोफेसर साहिबा!"

🔷 "ओह माय गॉड!!''

🔶 ख़ुशी इतनी थी कि मुँह से और कुछ निकला ही नही। बस जोश और भावावेश में मैंने तहसीलदार साहब को एक जोरदार झप्पी देदी और अमरबेल की तरह उनसे लिपट गई। उनका गिफ्ट देने का तरीका भी अजीब हुआ करता है।

🔷 सब कुछ चुपचाप और अचानक!! खुद के पास पुरानी इंडिगो है और मेरे लिए और भी महंगी खरीद लाए।

🔶 6 साल की शादीशुदा जिंदगी में इस आदमी ने न जाने कितने गिफ्ट दिए। गिनती करती हूँ तो थक जाती हूँ। ईमानदार है रिश्वत नही लेते । मग़र खर्चीले इतने कि उधार के पैसे लाकर गिफ्ट खरीद लाते है।

🔷 लम्बी सी झप्पी के बाद मैं अलग हुई तो गाडी का निरक्षण करने लगी। मेरा फसन्दीदा कलर था। बहुत सुंदर थी। फिर नजर उस जगह गई जहाँ मेरी स्कूटी खड़ी रहती थी।
हठात! वो जगह तो खाली थी।

🔶 "स्कूटी कहाँ है?" मैंने चिल्लाकर पूछा। "बेच दी मैंने, क्या करना अब उस जुगाड़ का? पार्किंग में इतनी जगह भी नही है।" "मुझ से बिना पूछे बेच दी तुमने??"

🔷 "एक स्कूटी ही तो थी; पुरानी सी। गुस्सा क्यूँ होती हो?" उसने भावहीन स्वर में कहा तो मैं चिल्ला पड़ी:-"स्कूटी नही थी वो। मेरी जिंदगी थी। मेरी धड़कनें बसती थी उसमें। मेरे पापा की इकलौती निशानी थी मेरे पास।

मैं तुम्हारे तौफे का सम्मान करती हूँ मगर उस स्कूटी के बिना पे नही। मुझे नही चाहिए तुम्हारी गाड़ी। तुमने मेरी सबसे प्यारी चीज बेच दी। वो भी मुझसे बिना पूछे।'"

🔷 मैं रो पड़ी। शौर सुनकर मेरी सास बाहर निकल आई। उसने मेरे सर पर हाथ फेरा तो मेरी रुलाई और फुट पड़ी। "रो मत बेटा, मैंने तो इससे पहले ही कहा था। एक बार बहु से पूछ ले। मग़र बेटा बड़ा हो गया है। तहसीलदार!! माँ की बात कहाँ सुनेगा?

🔶 मग़र तू रो मत। और तू खड़ा-खड़ा अब क्या देख रहा है वापस ला स्कूटी को।" तहसीलदार साहब गर्दन झुकाकर आए मेरे पास। रोते हुए नही देखा था मुझे पहले कभी। प्यार जो बेइन्तहा करते हैं।

🔷 याचना भरे स्वर में बोले:- सॉरी यार! मुझे क्या पता था वो स्कूटी तेरे दिल के इतनी करीब है। मैंने तो कबाड़ी को बेचा है सिर्फ सात हजार में। वो मामूली पैसे भी मेरे किस काम के थे? यूँ ही बेच दिया कि गाड़ी मिलने के बाद उसका क्या करोगी? तुम्हे ख़ुशी देनी चाही थी आँसू नही। अभी जाकर लाता हूँ। " फिर वो चले गए।

🔶 मैं अपने कमरे में आकर बैठ गई। जड़वत सी। पति का भी क्या दोष था। हाँ एक दो बार उन्होंने कहा था कि ऐसे बेच कर नई ले ले। मैंने भी हँस कर कह दिया था कि नही यही ठीक है। लेकिन अचानक स्कूटी न देखकर मैं बहुत ज्यादा भावुक हो गई थी। होती भी कैसे नही।

🔷 वो स्कूटी नही "औकात" थी मेरे पापा की।

🔶 जब मैं कॉलेज में थी तब मेरे साथ में पढ़ने वाली एक लड़की नई स्कूटी लेकर कॉलेज आई थी। सभी सहेलियाँ उसे बधाई दे रही थी। तब मैंने उससे पूछ लिया:- "कितने की है?
उसने तपाक से जो उत्तर दिया उसने मेरी जान ही निकाल ली थी:-" कितने की भी हो? तेरी और तेरे पापा की औकात से बाहर की है।"

🔷 अचानक पैरों में जान नही रही थी। सब लड़कियाँ वहाँ से चली गई थी। मगर मैं वही बैठी रह गई। किसी ने मेरे हृदय का दर्द नही देखा था। मुझे कभी यह अहसास ही नही हुआ था कि वे सब मुझे अपने से अलग "गरीब"समझती थी। मगर उस दिन लगा कि मैं उनमे से नही हूँ।

🔶 घर आई तब भी अपनी उदासी छूपा नही पाई। माँ से लिपट कर रो पड़ी थी। माँ को बताया तो माँ ने बस इतना ही कहा" छिछोरी लड़कियों पर ज्यादा ध्यान मत दे! पढ़ाई पर ध्यान दे!" रात को पापा घर आए तब उनसे भी मैंने पूछ लिया:-"पापा हम गरीब हैं क्या?"

🔷 तब पापा ने सर पे हाथ फिराते हुए कहा था"-हम गरीब नही हैं बिटिया, बस जरासा हमारा वक़्त गरीब चल रहा है।" फिर अगले दिन भी मैं कॉलेज नही गई। न जाने क्यों दिल नही था। शाम को पापा जल्दी ही घर आ गए थे। और जो लाए थे वो उतनी बड़ी खुशी थी मेरे लिए कि शब्दों में बयाँ नही कर सकती। एक प्यारी सी स्कूटी। तितली सी। सोन चिड़िया सी। नही, एक सफेद परी सी थी वो। मेरे सपनों की उड़ान। मेरी जान थी वो। सच कहूँ तो उस रात मुझे नींद नही आई थी। मैंने पापा को कितनी बार थैंक्यू बोला याद नही है। स्कूटी कहाँ से आई ? पैसे कहाँ से आए ये भी नही सोच सकी ज्यादा ख़ुशी में। फिर दो दिन मेरा प्रशिक्षण चला। साईकिल चलानी तो आती थी। स्कूटी भी चलानी सीख गई।

🔶 पाँच दिन बाद कॉलेज पहुँची। अपने पापा की "औकात" के साथ। एक राजकुमारी की तरह। जैसे अभी स्वर्णजड़ित रथ से उतरी हो। सच पूछो तो मेरी जिंदगी में वो दिन ख़ुशी का सबसे बड़ा दिन था। मेरे पापा मुझे कितना चाहते हैं सबको पता चल गया। मग़र कुछ दिनों बाद एक सहेली ने बताया कि वो पापा के साईकिल रिक्सा पर बैठी थी। तब मैंने कहा नही यार तुम किसी और के साईकिल रिक्शा पर बैठी हो। मेरे पापा का अपना टेम्पो है।

🔷 मग़र अंदर ही अंदर मेरा दिमाग झनझना उठा था। क्या पापा ने मेरी स्कूटी के लिए टेम्पो बेच दिया था। और छः महीने से ऊपर हो गए। मुझे पता भी नही लगने दिया। शाम को पापा घर आए तो मैंने उन्हें गोर से देखा। आज इतने दिनों बाद फुर्सत से देखा तो जान पाई कि दुबले पतले हो गए है। वरना घ्यान से देखने का वक़्त ही नही मिलता था। रात को आते थे और सुबह अँधेरे ही चले जाते थे। टेम्पो भी दूर किसी दोस्त के घर खड़ा करके आते थे। कैसे पता चलता बेच दिया है।

🔶 मैं दौड़ कर उनसे लिपट गई!:-"पापा आपने ऐसा क्यूँ किया?" बस इतना ही मुख से निकला। रोना जो आ गया था। " तू मेरा ग़ुरूर है बिटिया, तेरी आँख में आँसू देखूँ तो मैं कैसा बाप? चिंता ना कर बेचा नही है। गिरवी रखा था। इसी महीने छुड़ा लूँगा।"

🔷 "आप दुनिया के बेस्ट पापा हो। बेस्ट से भी बेस्ट।इसे सिद्ध करना जरूरी कहाँ था? मैंने स्कूटी मांगी कब थी?क्यूँ किया आपने ऐसा? छः महीने से पैरों से सवारियां ढोई आपने। ओह पापा आपने कितनी तक़लीफ़ झेली मेरे लिए ? मैं पागल कुछ समझ ही नही पाई ।" और मैं दहाड़े मार कर रोने लगी। फिर हम सब रोने लगे। मेरे दोनों छोटे भाई। मेरी मम्मी भी।

🔶 पता नही कब तक रोते रहे। वो स्कूटी नही थी मेरे लिए। मेरे पापा के खून से सींचा हुआ उड़नखटोला था मेरा। और उसे किसी कबाड़ी को बेच दिया। दुःख तो होगा ही।

🔷 अचानक मेरी तन्द्रा टूटी। एक जानी-पहचानी सी आवाज कानो में पड़ी। फट-फट-फट,, मेरा उड़नखटोला मेरे पति देव यानी तहसीलदार साहब चलाकर ला रहे थे। और चलाते हुए एकदम बुद्दू लग रहे थे। मगर प्यारे से बुद्दू। मुझे बेइन्तहा चाहने वाले राजकुमार बुद्दू...

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 06 March 2018


👉 आज का सद्चिंतन 06 March 2018


👉 तीन महान् तत्त्व

🔷 अमृत, पारस और कल्पवृक्ष यह तीनों महान् तत्त्व सर्वसाधारण के लिए सुलभ हैं। हम जितना उनसे दूर रहते हैं उतने ही ये हमारे लिए दुर्लभ हैं परन्तु जब हम इनकी ओर कदम बढ़ाते हैं तो यह अपने बिल्कुल पास, अत्यन्त निकट आ जाते हैं। जिस ओर मुँह न हो उधर की चीजों का कोई अस्तित्व दृष्टिगोचर नहीं होता। पीठ पीछे क्या वस्तु रखी हुई है,  इसका पता नहीं चलता, किन्तु उलट कर जैसे ही हम मुँह फेरते हैं वैसे ही पीछे की चीज जो कुछ क्षण पहले तक अदृश्य थी, दिखाई देने लगती है। यह स्पष्ट है कि जिधर हमारी प्रवृत्ति होती है, जैसी हम इच्छा और आकांक्षाएँ करते हैं उसी के अनुरूप, वस्तुएँ भी उपलब्ध हो जाती है।
  
🔶 कहने को तो सभी कोई सुखदायक स्थिति में रहना और दु:खदायक स्थिति से बचना चाहते हैं, परन्तु यह हीन वीर्य चाहना, शेखचिल्ली के मनसूबों की तरह निष्फल और निरर्थक सिद्ध होती है। सच्ची चाहना की कसौटी यह है कि अभीष्ट वस्तु को प्राप्त करने की लगन अन्त:करण की गहराई तक समाई हुई  हो। आकांक्षा की तीव्रता का स्पष्ट सबूत अभीष्ट वस्तु को प्राप्त करने के प्रयत्न में भी जान से जुट जाना है। धुन का पक्का, निश्चित मार्ग का दृढ़  प्रतिज्ञ पथिक अपनी अविचल साधना के द्वारा ऊँचे से ऊँ चे सुदूर लक्ष्य तक आसानी से पहुँच जाता है। इस विश्व में कोई वस्तु ऐसी नहीं है कि मनुष्य सच्चे मन से इच्छा करने पर भी उसे प्राप्त न कर सके। लोभवश अनावश्यक वस्तुओं के संचय की लालसा में प्रकृति के नियम कुछ बाधक भले ही बनें, परन्तु आत्मिक सद्गुणों के विकास द्वारा सात्विक आनन्द प्राप्त करने की आकांक्षा तो सर्वथा उचित और आवश्यक होने के कारण पूर्णतया सरल है, उसकी पूर्ति में ईश्वरीय सहायता प्राप्त होती है। आत्म-कल्याण करने वाले सत् प्रयासों में भगवान् सदा ही अपना सहयोग देते हैं।
  
🔷 अमृत, पारस और कल्पवृक्ष मनुष्य के लिए पूर्णतया सुलभ हैं बशर्ते कि उन्हें प्राप्त करने का सच्चे मन से प्रयत्न किया जाय। अपने अविनाशी होने का दृढ़ विश्वास चिन्तन और मनन द्वारा अपनी अन्त: चेतना में भली प्रकार बिठाया जा सकता है। यह विश्वास इतना मजबूत होना चाहिए कि जीवन के किसी भी प्रश्र पर विचार किया जाय तो उस समय यह विश्वास स्पष्ट रूप से बीच में आ उपस्थित हो कि—यह जीवन, हमारे महा जीवन, अनन्त जीवन का अंश मात्र है। महा जीवन के लाभ-हानि को प्रधानता देने की नीति के आधार पर जीवन की गुत्थियों को सुलझाना चाहिए, उसी के अनुसार कार्यक्रम बनाना चाहिए। जब इस प्रकार का हमारा दृष्टिकोण निश्चित हो जाता है तो जीवन अत्यन्त पवित्र, निर्मल, निष्पाप, शान्तिदायक एवं आनन्दमय हो जाता है। यही अमृत है।
  
🔶 प्रेम की दृष्टि से सबको देखना, आत्मीयता, उदारता, सहानुभूति, सेवा, क्षमा, दया, सुधार, कल्याण, परमार्थ, त्याग के भाव रखकर लोगों से व्यवहार करना ऐसा उत्तम कार्य है, जिसकी प्रतिक्रिया बड़ी उत्तम होती है। व्यक्ति आज्ञाकारी, प्रशंसक, सहायक और सेवक बन जाता है। प्रेम मनुष्य जीवन का पारस है, इसका स्पर्श होते ही नीरस, शुष्क, तुच्छ व्यक्तियों में भी महानता उद्भुत होने लगती है। रोती हुई दुनियाँ को हँसती सूरत में बदल देने का जादू प्रेम में ही है। इसीलिए उसे पारस कहते हैं।
  
🔷 परिश्रम से, उद्योग से, कष्ट सहन से, अध्यवसाय से, कठिन से कठिन लक्ष्य तक मनुष्य पहुँच जाता है। तप से सारी सम्पदाएँ मिलती हैं। शक्ति संचय, परिश्रम, उत्साह, दृढ़ता, लगन यही तप के लक्षण हैं, जिसे तप की आदत है कल्पवृक्ष उसकी मुट्ठी में हैं, उसकी कोई इच्छा अधूरी न रहेगी, वह जो चाहेगा, वही प्राप्त कर लेगा।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 अपनी वासनाएं काबू में रखिए (भाग 2)

🔷 अपने किये हुए अपराधों को दूसरों के सिर मढ़ते फिरने की कुटेव के कारण मनुष्य अपने ऐबों को नहीं देख सकता। जो कार्य उसने किया है उसका बुरा फल होने पर वह तुरन्त किसी दूसरे व्यक्ति को पकड़ने की कोशिश करने लगता है। अपने आलस्य द्वारा समय पर किये गये कार्यों की आलोचना होने पर वह अपने सिर का दोष दूसरों पर मढ़ देता है। यदि ऐसा करने के बदले वह अपने अपराध को मुक्त कंठ से स्वीकार कर ले तो संदेह नहीं कि वह दुबारा वैसा कार्य न करे।

🔶 अपने अपराध को स्वीकार करना यह उन्नति पथ के ऊपर मानों कई कदम आगे बढ़ना है। साधनों को दोष देते फिरना मूर्खता है। वास्तव में कैद का दंड देने वाला मजिस्ट्रेट नहीं है, तुम्हारे कुकार्य ही हैं। इसमें संदेह नहीं कि संसार में पाप-समृद्ध रूपी राक्षस नाना प्रकार के मनोहर रूप धारण कर मनुष्यों के चित्त को विकृत करने का प्रयत्न करते हैं, परन्तु उन्हें अपने हृदय में स्थान देना या न देना तुम्हारे काबू में है। जिस प्रकार भूतों का भय दृढ़चित्त मनुष्यों के हृदय में फटकने भी नहीं पाता उसी प्रकार सच्चरित्र मनुष्यों के पास आने में पाप-वासनाओं को भी बड़ा डर लगता है। लालच उसी के लिए है जो लालची है। निर्लोभी व्यक्ति को वह अपने फंदे में कभी नहीं फँसा सकता ।

🔷 अतएव इन कुवासनाओं को धिक्कारना और दोष देना निरर्थक है। मनुष्य की दृष्टि को भी हित करने वाले पाप-समूह की संसार में क्या आवश्यकता थी। भोले-भाले शुद्ध-हृदय मनुष्य को ठगना और उसे चक्कर में फंसाना निदान उसकी निन्दा करना और उसे दंड-पात्र ठहराना यह तो दुष्टों का माया-पूर्ण षड्यंत्र जंचता है। वास्तव में विचार करने से मालूम होता है कि पदार्थों की परीक्षा करने के लिए बहुधा भय-पूर्ण स्थलों का उपयोग किया जाता है। सोने की परीक्षा करने के लिए काली कसौटी चाहनी पड़ती है। इसी भाँति मनुष्य के हृदय की परीक्षा करने के हेतु ही पाप-वासनायें संसार में विद्यमान है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 महात्मा जेम्स ऐलन
📖 अखण्ड ज्योति अप्रैल 1950 पृष्ठ 9

👉 अचिन्त्य चिन्तन से मनोबल न गँवाएँ (भाग 4)

🔷 आलस्य शरीर को स्वेच्छापूर्वक अपंग बनाकर रख देने की प्रक्रिया है। इसी प्रकार प्रमाद मन को जकड़ देने वाली रीति-नीति है। प्रमादी सोचने का कष्ट सहन करना नहीं चाहता है, जो चल रहा है, उसी से समझौता कर लेता है। नया कुछ सोच न सकने पर, नया साहस न जुटा सकने पर, प्रगति की सुखद कल्पनाएँ करते रहना शेखचिल्ली की तरह उपहासास्पद बनना है। आलसी उन कामों को नहीं करते जो बिना कठिनाई के तत्काल किये जा सकते थे। इसी प्रकार प्रमादी उतार-चढ़ावों के सम्बन्ध में कुछ भी सोचने का कष्ट नहीं उठाते, मात्र जिस-तिस पर दोषारोपण करते हुए दुर्भाग्य का रोना रोते हुए मन हल्का करते रहते हैं, जबकि दोष उनका अपना होता है।

🔶 परिस्थितियों को बदलने, सुधारने के लिए जिस सूझबूझ, धैर्य, संतुलन, साहस एवं प्रयास की आवश्यकता पड़ती है, उसे जुटा न पाने का प्रतिफल यह होता है कि अनीति जड़ जमा लेती है। पिछड़ापन ऐसा सहचर बनकर बैठ जाता है जिसे हटाने या बदलने जैसी कोई बात बनती ही नहीं। अस्त-व्यस्त विचारों को यदि वर्तमान को सुधारने वाले उपाय ढूँढ़ने में लगाया जा सके और वर्तमान परिस्थितियों से तालमेल बिठाते हुए अगला कदम क्या हो सकता है, यदि इस पर व्यवहारिक दृष्टि से चिन्तन किया जा सके तो प्रगतिपथ पर बढ़ चलने का कोई मार्ग अवश्य मिलेगा। पर जिसने पत्थर जैसी जड़ता अपना ली है, उसे रचनात्मक प्रयासों में लग पड़ने के लिए न आलस्य छूट देता है, न विचारों की असंगत उड़ानों से निरत करके कुछ व्यवहारिक उपाय सोचने की सुविधा प्रमाद की खुमारी रहते बन पड़ती है। वस्तुतः प्रगतिशीलता के यही दो अवरोध चट्टान की तरह अड़ते हैं। इन्हें हटाये बिना कोई गति नहीं, कोई प्रगति नहीं।

🔷 मनुष्य को हीन बनाने वाले मनोविकारों में उदासी और निराशा प्रमुख हैं। पेट भरने के बाद नदी की बालू में लोटपोट करने वाले मगर और उदरपूर्ति के उपरान्त कीचड़ में मस्त होकर पड़े रहने वाले वाराह को फिर दीन-दुनिया की कोई सुध नहीं रहती। जब बासी पच जाता है और झोले में खालीपन प्रतीत होता है, तभी वे उठने और कुछ करने की बात सोचते हैं। ‘‘पंछी करे ना चाकरी, अजगर करे न काम’’ का उदाहरण बनकर जो समस्त कामनाओं से रहित परमहंसों की तरह दिन गुजारते हैं और ‘‘राम भरोसे जा रहे, पर्वत पै हरियाय’’ के भाग्य भरोसे जो समय काटते हैं, उन्हें ‘‘ना काहू सो दोस्ती, ना काहू सो बैर’’  वाली स्थिति रहती है। वे न कल की सोचते हैं न परसों की। उन उदासीनता सम्प्रदाय का दर्शन अपनाने वालों के लिए प्रगति और अवगति से कुछ लेना-देना नहीं होता, मुट्ठी बाँध कर आते और हाथ पसार कर चले जाते हैं, न शुभ की आकांक्षा, न अशुभ की उपेक्षा, ऐसी उदासीनता पिछड़े और गये गुजरे स्तर का प्रतीक है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 Sage Confucius

🔷 The disciples of sage Confucius often used to request him to show them someone who had attained the ultimate knowledge of God. One day while touring with them the sage took them to a cave where an ascetic was engrossed in singing devotional songs. The disciples curiously asked the ascetic to enlighten them about spiritual knowledge. The saint felt disturbed by their interruption and asked them to leave him alone. They all quickly moved ahead. As per the direction of their master, now they went to meet an oil-trader in a village.  He was a kind person and people used to have high regards for him.

🔶 The disciples humbly asked him – "We have heard that you have attained the true knowledge of God". Could you tell us where do we find him? The dutiful, honest trader smiled and said pointing to his ox; this ox is like God for me. It is only because of him that I can run the oil extracting machine ('kolhu', which is drawn by ox); thus, though indirectly, he sustains the lives of myself and my family. I also love him and take due care of him. We are both very happy with each other and I have no worries in my life.”

🔷 With confusion more confounded, the disciples continued their journey. Now, Confucius took them to a small house where an old woman was weaving on a small handloom in the compound. Her face glowed from inner happiness. Several children of the colony were playing around her. She was sometimes talking to them, laughing with them and also playfully teaching them in between. The disciples repeated their question to her. She replied – "I see and feel the presence of God everywhere around me. Look He is playing there. He is also in you and me. There is no moment when He is away from us.

🔶 Now the master explained to the disciples– "Hope you have now got the gist of the ultimate knowledge of God. Be happy and make others happy under all circumstances – this is the secret of true spiritual awareness and this is true devotion to God."

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 21)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔷 मित्रो! आप पढ़े-लिखे हुए लोगों से कहना कि यदि आपका गुजारा हो जाता है, तो आपको ‘नाइट स्कूल’ रात्रि पाठशाला खोलनी चाहिए। बाहर विदेशों में लोग नाइट स्कूल चलाते हैं। सारे-के-सारे लोग पढ़ाई उसी में करते हैं। वहाँ दिन भर आठ घंटे मेहनत-मजदूरी हर आदमी को करनी पड़ती है। छोटे बच्चों की बात जाने दीजिए, वे तो स्कूलों में चले जाते हैं। वे साढ़े नौ बजे चले जाते हैं और शाम को चार बजे आ जाते हैं, पर जिसको पेट पालना पड़ेगा, वो किस तरीके से स्कूल जा सकता है। और जो बड़ा आदमी हो गया, जवान आदमी हो गया, वह कैसे जा सकता है? अतः हमको समाज में विद्या का विस्तार करना है।

🔶 विद्या का ऋण-कर्ज हमारे ऊपर है। इसे चुकाने के लिए हमको दूसरों को विद्यावान् बनाना चाहिए। शिक्षित बनाना चाहिए, ज्ञानवान् बनाना चाहिए, इसके लिए हममें से और आप में से हर आदमी को समाज का ऋण चुकाने के लिए वो काम करना चाहिए, जो कल मैंने आपको बताए थे और आपको बताता रहा हूँ। योरोप के तरीके से हमारे यहाँ भी रात्रि के विद्यालय चलने चाहिए, जहाँ मजदूर, धोबी आदि शाम के वक्त अपने काम से छुट्टी पाने के बाद चले जाते हैं और पढ़ाई करते हैं और जिंदगी के आखिरी वक्त तक एम.ए. हो जाते हैं, पी.एच.डी. हो जाते हैं और डी. लिट् हो जाते हैं। जिंदगी के आखिरी-से-आखिरी वक्त तक जो समय उनको पढ़ने को मिल जाता है, वे उसे पढ़ाई में लगा देते हैं।

🔷 मित्रो! हमारे देश में सिनेमाघरों में भीड़ बहुत है। हमारे समाज में गप्पें हाँकने के लिए भीड़ बहुत है, जुआघर में भीड़ बहुत, शराबखानों में भीड़ बहुत होती है, लेकिन आपको उस तरह की भीड़ कहीं भी नहीं दिखाई पड़ेगी कि अपने जातीय संगठन के नाम पर, अपने शिक्षित समुदाय के नाम पर इकट्ठे होकर के हमने सायंकाल के वक्त ‘रात्रि पाठशालाओं’ को चलाया हो। इन रात्रि पाठशालाओं में असंख्य महत्त्वपूर्ण बातें पढ़ाई जा सकती हैं। मैं यह तो नहीं कहता कि हरेक आदमी को बी.ई. पढ़ाना चाहिए, लेकिन जीवन जीने की कितनी समस्याएँ हैं, उनको हल करने के लिए विद्यावानों को आगे आना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 57)

👉 मद्गुरुः श्री जगद्गुरुः
🔷 गुरुगीता के गायन से भावनाओं में गुरुभक्ति का ज्वार उठता है। ऐसा वे कहते हैं, जो शिष्यत्व की, समर्पण की डगर पर चल रहे हैं। इन भावनाशीलों को प्रतिमास गुरुगीता की अगली कड़ी की प्रतीक्षा रहती है। उनके मन में बड़ी अकुलाहट, बड़ी त्वरा होती है। श्वास-श्वास में गुरुदेव का नाम, मन में उनका चिन्तन, भावनाओं में उनकी ही करुणापूर्ण छवि, यही शिष्य का परिचय है। जो शिष्य होने की लालसा में जी रहे हैं- उन्हें सब कुछ मिलेगा। उनकी राहों में भले ही काँटे बिछे हों, पर जल्दी ही उनकी डगर में फूल खिलेंगे। बस धीरज और साहस का सम्बल नहीं छोड़ना है। सद्गुरु ही जीवन की एकमात्र सच्चाई हैं। उनके चरणों की छाँव में अध्यात्म विद्या के सभी रहस्य अनायास मिल जाते हैं।
  
🔶 बस गुरु चरणों में भक्ति सदा बनी रहे। उनको सदा नमन होता रहे। जिनकी अन्तर्चेतना में सद्गुरु नमन के स्वर मुखरित होते हैं, उन्हें स्मरण होगा कि पिछले मंत्रों  में यह कहा गया है कि अखण्ड वलयाकार चेतना के रूप में जो इस सम्पूर्ण चर-अचर में व्याप्त हैं, ब्रह्मतत्त्व एवं आत्मतत्त्व के रूप में उन्हीं गुरुवर की चेतना दर्शित होती है। वैदिक ऋचाएँ हों या उपनिषदों के महावाक्य रत्न सभी गुरुदेव की कृपा से अपना प्रकाश देते हैं। गुरुदेव के स्मरण मात्र से ही ज्ञान उत्पन्न होता है। वे प्रभु ही परम चैतन्य, शाश्वत, शान्त और आकाश से भी अतीत  एवं माया से परे हैं। वे नादबिन्दु एवं काल से परे हैं, उन परम कृपालु सद्गुरु को नमन है।
  
🔷 गुरु नमन की इस पावन प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए भगवान् भोलेनाथ माँ पार्वती से कहते हैं-
  
स्थावरं  जंगमं  चैव  तथा  चैव चराचरम्। व्याप्तं  येन  जगत्सर्वं  तस्मै  श्रीगुरवे नमः॥ ७१॥
ज्ञानशक्तिसमारूढस्तत्त्वमालाविभूषितः। भुक्तिमुक्तिप्रदाताय  तस्मै  श्रीगुरवे   नमः॥ ७२॥
अनेकजन्मसंप्राप्त-सर्वकर्मविदाहिने। स्वात्मज्ञानप्रभावेण   तस्मै  श्रीगुरवे  नमः॥ ७३॥
न  गुरोरधिकं  तत्त्वं  न  गुरोरधिकं   तपः। तत्त्वम् ज्ञानात्परं नास्ति तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ ७४॥
मन्नाथः श्रीजगन्नाथो  मद्गुरुश्रीजगद्गुरुः। ममात्मा  सर्वभूतात्मा  तस्मै  श्रीगुरवे नमः॥ ७५॥

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 93

👉 गर्वोत्सव संस्कार बनें एक बड़ा अभियान


आओ बहनों आज,
         चलों करें समाज मे कुछ खास........
बदलाव नही सिर्फ़ कहने से होगा!
          जागरूक होगी हर नारी तभी,
भारत का भाग्योदय होगा........
          जन्म दे जो प्राण फूक सकती हैं,
वह ठान ले यदि तो,
          नया संस्कारित समाज गढ़ सकती हैं.........
स्वयं के स्वाभिमान को बचाना उसके हाथ हैं,
          रानी लक्ष्मी बाई से साहस दिखाने की अब बात है...…...
डर नही ...तू डर ....नहीं,
          लड़ना तुझको आज हैं......
गौरी बन अब अपने पुत्रों अंधक और विनायक में,
           चुनाव करना तेरे हाथ हैं.....
हाँ ममतामयी हैं तू, प्रेम की भंडार हैं........
पर देखना आज स्थिति है कैसी,
           क्या उसका भी तुझको भान हैं........
चल उठ खड़ी हो,उठ खड़ी हो....
         सम्हालना कमान हैं......
ले सहारा ज्ञान का,विज्ञान का,आध्यात्म का......
             पर लड़ना तुझको आज है.......
बनाना है....बनाना हैं.......
  बिगडों को बनाना हैं.........
लाना हैं....हां लाना है.......
 दैवीय आत्माओं को फिर धरती पर लाना हैं.......
कर दिखाना है...दिखाना है.....
    युग निर्माण कर दिखाना है....
बनाना है...बनाना हैं आज धरती को स्वर्ग बनाना हैं........
नारियों अब जागृत हो ....
नव निर्माण के लिए तुम्हें,
"गर्भोत्सव संस्कार " को बड़ा अभियान आज बनाना हैं.......
संस्कारित पीढ़ियों को लाना हैं.....
माँ... बहनों....की लाज बचाना हैं....
फिर राम...कृष्ण....से पुत्र तुम्हे जन्माना हैं....
इसे बड़ा अभियान अब बनाना हैं......
नारी को दुर्गा शक्ति बन दिखाना हैं.......
जागृत हो...जागृत हो...
समाज में बदलाव तुम्हे ही लाना है........

👉 आज का सद्चिंतन 05 March 2018


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 05 March 2018

👉 मन को सुधारा जाय

🔶 मनुष्य के अस्तित्व पर गंभीरता पूर्वक विचार किया जाय, तो उसकी एक मात्र विशेषता उसका मनोबल ही दृष्टिगोचर होता है। शरीर की दृष्टि से वह अन्य प्राणियों की तुलना बहुत गया-गुजरा है। मनोबल की विशेषता के कारण ही मनुष्य सृष्टि का मुकुटमणि है। मन वस्तुत: एक बड़ी शक्ति है। अनन्त चेतना के केन्द्र परमात्मा का प्रकाश इस जड़ प्रकृति में जो पड़ता, तो उसका प्रतिबिम्ब मन के रूप में ही सामने आता है। जड़ पदार्थ कितने ही उत्कृष्ट क्यों न हो, चेतना के बिना वे निरर्थक है।

🔷 इस पृथ्वी के गर्भ में रत्नों की खान, स्वर्ण-भण्डार और न जाने क्या-क्या बहुमूल्य सम्पदाएँ भरी पड़ी हैं। पर वे तब तक प्रकाश में नहीं आतीं, जब तक कोई चेतना सम्पन्न मनुष्य उनसे सम्पर्क स्थापित नहीं करता है। स्वर्ण और रत्न का मूल्य चेतन प्राणी की चेतना के कारण ही है अन्यथा वे मिट्टी कंकड़ के समान ही पड़े रहते हैं। इस देह को ही लीजिए। कितनी बहुमूल्य, प्रिय एवं उपयोगी लगती है पर यदि चेतना नष्ट हो जाय-मूर्छा उन्माद या मृत्यु की स्थिति आ जाय, तो यह देह किसी काम का नहीं रह जाती। मानव-जीवन में जो कुछ श्रेष्ठता एवं महत्ता है, वह केवल उसकी मानसिक स्थिति-मनोभूमि के कारण ही है।
  
🔶 आलसी और उत्साही, कायर और वीर, दीन और समृद्ध, पापी और पुण्यात्मा, अशिक्षित और विद्वान्ï, तुच्छ और महान, तिरस्कृत और प्रतिष्ठित का जो आकाश पाताल जैसा अन्तर मनुष्यों के बीच में दीख पड़ता है, उसका प्रधान कारण उस व्यक्ति की मानसिक स्थिति ही है। परिस्थितियाँ भी एक सीमा तक इन भिन्नताओं में सहायक होती है। पर उनका प्रभाव पाँच प्रतिशत ही होता है, पचानवे प्रतिशत कारण मानसिक। बुरी से बुरी परिस्थितियों पड़ा हुआ मनुष्य भी अपनी कुशलता और मानसिक विशेषताओं के द्वारा उन पर बाधाओं को पार करता हुआ, देर-सबेर में अच्छी स्थिति प्राप्त कर लेगा। अपने सद्गुणों, सद्विचारों एवं सत्प्रयत्नों द्वारा कोई भी मनुष्य बुरी से बुरी परिस्थिति को पार करके ऊँचा उठ सकता है। पर जिसकी मनोभूमि निम्न श्रेणी की है, जो दुर्बुद्धि से, दुर्गुणों से, दुष्प्रवृत्तियों से ग्रसित है, उसके पास यदि कुबेर जैसी सम्पदा और इन्द्र जैसी सुविधा हो, तो भी वह अधिक दिन ठहर न सकेगी, कुछ ही दिन में नष्ट हो जायगी।
  
🔷 कर्म जो आँखों से दिखाई देता है, वह अदृश्य विचारों का ही दृश्य रूप है। मनुष्य जैसा सोचता है वैसा करता है। चोरी, बेईमानी, दगाबाजी, शैतानी, बदमाशी कोई आदमी यकायक कभी नहीं कर सकता। उसके मन में उस प्रकार के विचार बहुत दिनों से झूमते रहते हैं। अवसर न मिलने से वे दबे हुए थे, समय पाते ही वे कार्यरूप में परिणित हो जाते हैं। बाहर के लोगों को किसी दुष्कर्म होने की बात सुनकर इसलिए आश्चर्य होता है कि वे उसकी भीतरी स्थिति को नहीं जानते थे। इसी प्रकार कोई अधिक उच्चकोटि का सत्कर्म करने का भी आकस्मिक समाचार भले ही सुनने को मिले पर वस्तुुत: उसकी तैयारी वह मनुष्य भीतर ही भीतर बहुत दिनों से कर रहा होता है। इसी तरह जो व्यक्ति आज उन्नतिशील एवं सफलता सम्पन्न दिखाई पड़ते हैं, वे अचानक ही वैसे नहीं बन गये, वरन् चिरकाल से उनका प्रयत्न उसके लिए चल रहा होता है। भीतरी पुरुषार्थ को उन्होंने बहुत पहले जगा लिया होता है। उन्होंने अपने मन:क्षेत्र में भीतर ही भीतर वह अच्छाइयाँ जमा कर ली होती हैं, जिनके द्वारा बाह्य जगत में दूसरों का सहयोग एवं उन्नति का आधार निर्भर रहता है। बाह्य जीवन हमारे भीतरी जीवन का प्रतिबिम्ब मात्र है। पर्दे के पीछे दीपक जल रहा है, तो कुछ प्रकाश बाहर भी परिलक्षित होता है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 जीवंत विभूतियों से भावभरी अपेक्षाएँ (भाग 20)

(17 अप्रैल 1974 को शान्तिकुञ्ज में दिया गया उद्बोधन)

🔶 साथियो! ये दावत खाने का निमंत्रण नहीं है। गुरुजी से आशीर्वाद लेने का निमंत्रण नहीं है। मालदार होने का और बीमारियों को अच्छा करने का नहीं है। औलाद प्राप्त करने का नहीं है। आप ये निमंत्रण मत देना किसी को। ये तो बिना आपके निमंत्रण दिए खुद ही चले आते हैं और उन पर मुझको झल्लाना पड़ता है और ये रोज कहना पड़ता है कि बाबा! यहाँ ठहरने की जगह नहीं है, चला जा। ये तो पहले भी आते रहे हैं और आते ही रहेंगे। उनको निमंत्रण देने की आपको जरूरत नहीं है। वे तो अपने आप बिना बुलाए आ जाएँगे और सब तरीके से आ जाएँगे।

🔷 मित्रो! आप उन लोगों के पास जाना जिनके पास क्षमताएँ हैं, जिनके पास प्रतिभाएँ हैं, जिनके पास जीवन है, जिनके पास कसक है, जिनके पास विचार हैं। जिनके पास इस तरह की चीजें दिखाई पड़ें, वहाँ आप जाना और जा करके हमारा संदेश दे करके आना। जहाँ कहीं भी आपको विद्या दिखाई पड़े, जिस किसी के पास भी विद्या दिखाई पड़े कि उसके पास विद्या है, तो आप उन विद्यावानों के पास जाना और यह कहना कि आपकी विद्या की समाज को आवश्यकता है और युग को आवश्यकता है।

🔶 विद्या पेट पालने के लिए नहीं होती है, पेट भरने के लिए नहीं होती है। विद्या का उद्देश्य भिन्न है। विद्या का उद्देश्य है, जो ज्ञान हमको मिला हुआ है, उससे हमको वकालत भी करनी पड़े, तो उस विद्या के द्वारा लोगों के अज्ञान के निवारण के लिए खरच करना चाहिए। आपकी सारी-की-सारी विद्या धन के लिए, पैसे के लिए खरच नहीं होनी चाहिए। अगर आप पढ़े-लिखे आदमी हैं, जीवट वाले आदमी हैं, तो आपकी विद्या का लाभ उन लोगों को मिलना चाहिए, जो पढ़े-लिखे नहीं हैं, जो निरक्षर हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 56)

👉 सद्गुरु की कठोरता में भी प्रेम छिपा है
🔶 यहाँ पर एक सत्य घटना की चर्चा की जा रही है। यह चर्चा अनेक शिष्यों के मनों को सत्प्रेरणाओं से भरेगी-ऐसा विश्वास है। यह घटना महान् संत रामदास काठिया बाबा के शिष्य गरीबदास के बारे में है। गरीबदास पढ़े-लिखे तो नहीं थे,पर उनके हृदय में अपने गुरुदेव के प्रति अगाध भक्ति थी; लेकिन इस भक्ति के बावजूद बाबा रामदास उनसे बड़ी कठोरता व उपेक्षा का बर्ताव करते थे। आगन्तुक शिष्यों को बाबा के इस व्यवहार पर बड़ा अचरज भी होता। वे सोचते कि सभी के साथ प्रेम भरी कोमल-मीठे बोल बोलने वाले बाबा आखिर गरीबदास पर ही क्यों बात-बात पर बरसते हैं? पर किसी की हिम्मत नहीं पड़ती थी कि उनसे कोई कुछ पूछे। लेकिन बाबा के इस बर्ताव से न तो गरीबदास की श्रद्धा कम हुई और न ही उसका विश्वास डिगा।
  
🔷 एक बार तो जैसे बाबा रामदास ने कठोरता की सारी सीमाएँ ही पार कर डाली। हुआ यूँ कि उन दिनों ब्रज परिक्रमा हो रही थी। ८४ कोस की उस परिक्रमा में उसे काफी सामान लाद कर चलना पड़ता था। जहाँ यात्रा रुकती, वहाँ उसे थके-हारे होने पर भी ४०-५० आदमियों का भोजन बनाना पड़ता। इतना कठिन श्रम करने के बाद भी उसका नियम था कि वह सभी को खाना खिलाकर  स्वयं भोजन करता था। श्रद्धासिक्त भक्ति और अद्भुत विनयशीलता इसी को उसने अपनी भक्ति की परिभाषा बना लिया था।
  
🔶 उस दिन गरीबदास ने यात्रा के पड़ाव पर अपने नियम के अनुसार भोजन बनाया। सभी साधुओं व अभ्यागतों के साथ अपने गुरुदेव बाबा रामदास को भी आदर सहित बुलाया और प्रेम सहित उसने उन्हें खाना परोसा। पर यह क्या-आसन पर बैठते ही उन्होंने रोटी हाथ में ली और उसे दूर फेंकते हुए गरज कर कहा- बेशरम मेरे लिए कच्ची रोटियाँ बनाता है, जबकि रोटियाँ अच्छी तरह सिकी हुई थीं। इतना कहकर भी वह चुप नहीं रहे और अपनी लाठी उसके सिर पर दे मारी। लाठी की चोट से गरीबदास के सिर से खून बहने लगा। हारा-थका वह गुरुभक्त दर्द से बुरी तरह चीखा और बेहोश हो गया। बाबा रामदास का यह व्यवहार वहाँ उपस्थित जनों में से किसी को अच्छा न लगा। पर इससे बेखबर बाबा मजे से एक ओर चलते बने।
  
🔷 इधर जब गरीबदास को होश आया, तो उन्होंने बड़ी आतुरता से अपने गुरुदेव बाबा रामदास को ढूँढ़ा और उनके चरणों पर सिर रखते हुए बोला- हे मेरे कृपालु गुरुदेव, हे मेरे आराध्य! मुझसे अपराध हो गया, क्षमा करें भगवन्! शिष्य की गहरी श्रद्धा आज विजयी हुई। परम कठोर बर्ताव करने वाले उसके गुरुदेव आज मातृवत् हो उठे। उसे उन्होंने अपनी छाती से लगाते हुए कहा-बेटा! सद्गुरु की कठोरता में ही उनका प्रेम है। जो इसे जानता है-वही सच्चा शिष्य है। मेरी कठोरता से तेरे जन्म-जमान्तर के कर्म नष्ट हो गये हैं। अब तू मेरे आशीर्वाद से परमहंसत्व प्राप्त कर धन्य हो जायेगा। गुरु की कृपा की यह महिमा अनन्त है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 91

👉 सबसे शक्तिशाली:-

🔷 एक बार गौतम बुद्ध अपने शिष्यों के साथ किसी पर्वतीय स्थल पर ठहरे थे। शाम के समय वह अपने एक शिष्य के साथ भ्रमण के लिए निकले। दोनों प्रकृति के मोहक दृश्य का आनंद ले रहे थे। विशाल और मजबूत चट्टानों को देख शिष्य के भीतर उत्सुकता जागी।

🔶 उसने पूछा, “इन चट्टानों पर तो किसी का शासन नहीं होगा क्योंकि ये अटल, अविचल और कठोर हैं।”

🔷 शिष्य की बात सुनकर बुद्ध बोले, “नहीं, इन शक्तिशाली चट्टानों पर भी किसी का शासन है।

🔶 लोहे के प्रहार से इन चट्टानों के भी टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं।”

🔷 इस पर शिष्य बोला, “तब तो लोहा सर्वशक्तिशाली हुआ?”

🔶 बुद्ध मुस्कराए और बोले, “नहीं। अग्नि अपने ताप से लोहे का रूप परिवर्तित कर सकती है।”

🔷 उन्हें धैर्यपूर्वक सुन रहे शिष्य ने कहा, “मतलब अग्नि सबसे ज्यादा शक्तिवान है।”

🔶 “ नहीं।” बुद्ध ने फिर उसी भाव से उत्तर दिया, “जल, अग्नि की उष्णता को शीतलता में बदलता देता है तथा अग्नि को शांत कर देता है।”

🔷 शिष्य कुछ सोचने लग गया। बुद्ध समझ गए कि उसकी जिज्ञासा अब भी पूरी तरह शांत नहीं हुई है।

🔶 शिष्य ने फिर सवाल किया, “आखिर जल पर किसका शासन है?”

🔷 बुद्ध ने उत्तर दिया, “वायु का। वायु का वेग जल की दिशा भी बदल देता है।”

🔶 शिष्य कुछ कहता उससे पहले ही बुद्ध ने कहा, “अब तुम कहोगे कि पवन सबसे शक्तिशाली हुआ। नहीं। वायु सबसे शक्तिशाली नहीं है।

🔷 सबसे शक्तिशाली है मनुष्य की संकल्पशक्ति क्योंकि इसी से पृथ्वी, जल, वायु और अग्नि को नियंत्रित किया जा सकता है। अपनी संकल्पशक्ति से ही अपने भीतर व्याप्त कठोरता, ऊष्णता और शीतलता के आगमन को नियंत्रित किया जा सकता है, इसलिए संकल्पशक्ति ही सर्वशक्तिशाली है। जीवन में कुछ भी महत्वपूर्ण कार्य संकल्पशक्ति के बगैर असंभव है। इसलिए अपने भीतर संकल्पशक्ति का विकास करो।” यह सुनकर शिष्य की जिज्ञासा शांत हो गई।

👉 ऊंचा क़द

चार महीने बीत चुके थे, बल्कि 10 दिन ऊपर हो गए थे, किंतु बड़े भइया की ओर से अभी तक कोई ख़बर नहीं आई थी कि वह पापा को लेने कब आएंगे. यह कोई ...