गुरुवार, 30 अप्रैल 2020

👉 उदात्त अनुदानों के लिये युग चेतना का आह्वान (भाग २)

युग निर्माण परिवार के प्राणवान परिजनों को इन दिनों सृजन शिल्पी की भूमिका निभानी चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि भौतिक ललक लिप्साओं पर नियन्त्रण किया जाय। लोभ, मोह के बन्धन ढीले किये जाये। संकीर्ण स्वार्थपरता को हलका किया जाय। पेट और प्रजनन भर के लिए जीवन की सम्पदा का अपव्यय करते रहने की आदत को मोड़ा-मरोड़ा जाय। औसत भारतीय स्तर का निर्वाह पर्याप्त समझा जाय। महत्वाकाँक्षाओं की दिशा बदली जाय। वासना, तृष्णा और अहंता के आवेश शिथिल किये जांयें। युग धर्म के निर्वाह के लिए कुछ बचत इसी परिवर्तन से हो सकती है। परमार्थ तभी बन पड़ता है जब स्वार्थ पर अंकुश लगाया जाय। ब्राह्मणत्व और देवत्व की गरिमा स्वीकार करने और उच्चस्तरीय आदर्शों को व्यवहार में उतारने के साहस जुटाने का यही अवसर है। उसे चूका नहीं जाना चाहिए। युग पर्व के विशेष उत्तरदायित्वों की अवमानना करने वाले जीवन्त प्राणवानों को चिरकाल तक पश्चाताप की आग में जलना पड़ता है। देव मानवों की बिरादरी में रहकर कायरता के व्यंग, उपहास सहना जितना कठिन पड़ता है उतना उच्च प्रयोजन के लिए त्याग बलिदान को जोखिम उठाना नहीं।

जिनकी अन्तरात्मा में ऐसी अन्तः प्रेरणा उठती हो वे उसे महाकाल प्रेरित युग चेतना का आह्वान उद्बोधन समझें और तथाकथित बुद्धिमानों और स्वजनों की उपेक्षा करके भी प्रज्ञावतार का अनुकरण करने के लिए चल पड़े। इसमें इन्हें प्रथमतः ही प्रसव पीड़ा की तरह कुछ अड़चन पड़ेगी, पीछे तो सब कुछ शुभ और श्रेय ही दृष्टि-गोचर होगा।

ज्ञानयज्ञ के लिए समयदान यही है-प्रज्ञावतार की जागृत आत्माओं से याचना। उसे अनसुनी न किया जाये। प्रस्तुत क्रिया-कलाप पर नये सिरे से विचार किया जाय उस पर तीखी दृष्टि डाली जाय और लिप्सा में, निरत जीवन क्रम में साहसिक कटौती करके उस बचत को युग देवता के चरणों पर अर्पित किया जाय’। सोने के लिए सात घन्टे, कमाने के लिए आठ घन्टे, अन्य कृत्यों के लिए पाँच घन्टे लगा देगा साँसारिक प्रयोजनों के लिए पर्याप्त होना चाहिए। इनमें 20 घण्टे लगा देने के उपरान्त चार घण्टे की ऐसी विशुद्ध बचत हो सकती है जिसे व्यस्त और अभावग्रस्त व्यक्ति भी युग धर्म के निर्वाह के लिए प्रस्तुत कर सकता है। जो पारिवारिक उत्तरदायित्वों से निवृत्त हो चुके है-जिन पर कुटुम्बियों की जिम्मेदारियाँ सहज ही हलकी है जिनके पास संचित पूँजी के सहारे निर्वाह क्रम चलाते रहने के साधन है, उन्हें तो इस सौभाग्य के सहारे परिपूर्ण समय दान करने की ही बात सोचनी चाहिए। वानप्रस्थों की परिव्राजकों की-पुण्य परम्परा क अवधारणा है ही-ऐसे सौभाग्यशालियों के लिए। जो जिस भी परिस्थिति में हो समयदान की बात सोचें और उस अनुदान को नव जागरण के पुण्य प्रयोजन में अर्पित करें।

प्रतिभा, कुशलता, विशिष्टता से सम्पन्न कई विभूतिवान व्यक्ति इस स्थिति में होते है कि अनिवार्य प्रयोजनों में संलग्न रहने के साथ-साथ ही इतना कुछ कर या करा सकते है कि उतने से भी बहुत कुछ बन पड़ना सम्भव हो सके। उच्च पदासीन, यशस्वी, धनी-मानी अपने प्रभाव का उपयोग करके भी समय की माँग पूरी करने में अपनी विशिष्ट भूमिका निभा सकते हैं। विभूतिवानों का सहयोग भी, अनेकबार कर्मवीर समय-दानियों जितना ही प्रभावोत्पादक सिद्ध हो सकता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त १९७९, पृष्ठ ५७

👉 मानसिक स्वच्छता का महत्त्व

मन की चाल दोमुँही है। जिस प्रकार दोमुँही साँप कभी आगे, कभी पीछे चलता है, उसी प्रकार मन में दो परस्पर विरोधी वृत्तियाँ काम करती रहती हैं। उनमें से किसे प्रोत्साहन दिया जाय और किसे रोका जाय, यह कार्य विवेक बुद्धि का है। हमें बारीकी के साथ यह देखना होगा कि इस समय हमारे मन की गति किस दिशा में है? यदि सही दिशा में प्रगति हो रही हैं, तो उसे प्रोत्साहन दिया जाय और यदि दिशा गलत है, तो उसे पूरी शक्ति के साथ रोका जाय, इसी में बुद्धिमत्ता है। क्योंकि सही दिशा में चलता हुआ मन जहाँ हमारे लिए श्रेयस्कर परिस्थितियाँ उत्पन्न कर सकता है, वहाँ कुमार्ग पर चलते रहने से एक दिन दुःखदायी दुर्दिन का सामना भी करना पड़ सकता है। इसलिए समय रहते चेत जाना ही उचित है।
  
उचित दिशा में चलता हुआ मन आशावादी, दूरदर्शी, पुरुषार्थी और सुधारवादी होता है। इसके विपरीत पतनोन्मुख मन सदा निराश रहने वाला, तुरन्त की बात सोचने वाला, भाग्यवादी, कठिनाइयों की बात सोच-सोचकर खिन्न रहने वाला होता है। वह परिस्थितियों के निर्माण में अपने उत्तरदायित्व को स्वीकार नहीं करता। मन पत्थर या काँच का बना नहीं होता जो बदला न जा सके। प्रयत्न करने पर मन को सुधारा और बदला जा सकता है। यह सुधार ही जीवन का वास्तविक सुधार है। समाज निर्माण का प्रमुख सुधार यह मानसिक परिवर्तन ही है। हमारा मन यदि अग्रगामी पथ पर बढ़ने की दिशा पकड़ ले, तो जीवन के सुख-शान्ति और भविष्य के उज्ज्वल बनने में कोई सन्देह नहीं रह जाता।
  
जिनने आशा और उत्साह का स्वभाव बना लिया है, वे उज्ज्वल भविष्य के उदीयमान सूर्य पर विश्वास करते हैं। ठीक है, कभी-कभी कोई बदली भी आ जाती है और धूप कुछ देर के लिए रुक भी जाती है। पर बादलों के कारण  सूर्य सदा के लिए अस्त नहीं हो सकता है। असफलताएँ और बाधाएँ आते रहना स्वाभाविक है। उनका जीवन में आते रहना वैसा ही है जैसा आकाश में धूप-छाँह की आँख मिचौनी होते रहना। कठिनाइयाँ मनुष्य के पुरुषार्थ को जगाने और आगे बढ़ने की चेतावनी देने आती हैं। आज यदि सफलता मिली है, प्रतिकूलता उपस्थित है, संकट का सामना करना पड़ रहा है, तो कल उस स्थिति में परिवर्तन होना स्वाभाविक है। आशावादी व्यक्ति छोटी-छोटी असफलताओं की परवाह नहीं करते। वे रास्ता खोजते हैं और धैर्य, साहस, विवेक एवं पुरुषार्थ को मजबूती के साथ पकड़े रहते हैं, क्योंकि आपत्ति के समय में यही चार सच्चे मित्र बताये गये हैं।
  
निराशा एक प्रकार की कायरता है। बुजदिल आदमी ही हिम्मत हारते हैं, जिसमें वीरता और शूरता का, पुरुषार्थ और पराक्रम का एक कण भी शेष होगा, वह यही अनुभव करेगा कि मनुष्य महान है, उसकी शक्तियाँ महान हैं, वह दृढ़ निश्चय और सतत परिश्रम के द्वारा असम्भव को सम्भव बना सकता है। यह जरूरी नहीं कि पहला प्रयत्न ही सफल होना चाहिए। असफलताओं का मन पर जो प्रभाव नहीं पड़ने देते और आगामी कल के लिए आशान्वित रहते हैं, वस्तुतः वे ही शूरवीर हैं। वीरता शरीर में नहीं मन में निवास करती है। जो मरते दम तक आशा को नहीं छोड़ते और जीवन संग्राम को एक खेल समझते हुए हँसते, खेलते, लड़ते रहते हैं उन्हीं वीर पुरुषार्थी महामानवों के गले में अनन्त विजय वैजयन्ती पहनाई जाती है। बार-बार अग्नि परीक्षा में से गुजरने के बाद ही सोना कुन्दन कहलाता है। कठिनाइयों और असफलताओं से हताश न होना, वीरता का यह एक ही चिह्न है। जिन्होंने अपने को इस कसौटी पर खरा सिद्ध किया है, उनकी जीवन साधना सफल हुई है।

पं. श्रीराम शर्मा आचार्य