सोमवार, 1 अप्रैल 2019

👉 ममता और महानता:-

एक बालक नित्य विद्यालय पढ़ने जाता था। घर में उसकी माता थी। माँ अपने बेटे पर प्राण न्योछावर किए रहती थी, उसकी हर माँग पूरी करने में आनंद का अनुभव करती। बालक भी पढ़ने-लिखने में बड़ा तेज़ और परिश्रमी था। खेल के समय खेलता, लेकिन पढ़ने के समय पढने का ध्यान रखता।

एक दिन दरवाज़े पर किसी ने- “माई! ओ माई!” पुकारते हुए आवाज़ लगाई तो बालक हाथ में पुस्तक पकड़े हुए द्वार पर गया, देखा कि एक फटेहाल बुढ़िया काँपते हाथ फैलाए खड़ी थी।

उसने कहा- “बेटा! कुछ भीख दे दे।“

बुढ़िया के मुँह से बेटा सुनकर वह भावुक हो गया और माँ से आकर कहने लगा- “माँ! एक बेचारी गरीब माँ मुझे ‘बेटा’  कहकर कुछ माँग रही है।“

उस समय घर में कुछ खाने की चीज़ थी नहीं, इसलिए माँ ने कहा- “बेटा! रोटी-भात तो कुछ बचा नहीं है, चाहे तो चावल दे दो।“

इसपर बालक ने हठ करते हुए कहा- “माँ! चावल से क्या होगा? तुम जो अपने हाथ में सोने का कंगन पहने हो, वही दे दो न उस बेचारी को। मैं जब बड़ा होकर कमाऊँगा तो तुम्हें दो कंगन बनवा दूँगा।“

माँ ने बालक का मन रखने के लिए सच में ही सोने का अपना वह कंगन कलाई से उतारा और कहा- “लो, दे दो।“

बालक खुशी-खुशी वह कंगन उस भिखारिन को दे आया। भिखारिन को तो मानो ख़ज़ाना ही मिल गया। उसका पति अंधा था। कंगन बेचकर उसने परिवार के बच्चों के लिए अनाज, कपड़े आदि जुटा लिए। उधर वह बालक पढ़-लिखकर बड़ा विद्वान हुआ, काफ़ी नाम कमाया।

उसे बचपन का अपना वचन याद था। एक दिन वह माँ से बोला- “माँ! तुम अपने हाथ का नाप दे दो, मैं कंगन बनवा दूँ।“

पर माता ने कहा- “उसकी चिंता छोड़। मैं इतनी बूढ़ी हो गई हूँ कि अब मुझे कंगन शोभा नहीं देंगे। हाँ, कलकत्ते के तमाम ग़रीब बालक विद्यालय और चिकित्सा के लिए मारे-मारे फिरते हैं, उनके लिए तू एक विद्यालय और एक चिकित्सालय खुलवा दे जहाँ निशुल्क पढ़ाई और चिकित्सा की व्यवस्था हो।“

पुत्र ने ऐसा ही किया। माँ के उस पुत्र का नाम ईश्वरचंद्र विद्यासागर है।

👉 आज का सद्चिंतन 1 April 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 1 April 2019


👉 सद्भावना ही श्रेष्ठ है। (अंतिम भाग)

जो व्यवहार हम चाहते हैं कि लोग हमसे करें, वैसा व्यवहार हमें स्वयं भी औरों से करना चाहिए। कोई नहीं चाहता कि उससे छल हो तो वह स्वयं किसी को क्यों छले? प्रायः लोग अपने से तो भला व्यवहार चाहते हैं पर दूसरों से सरल सीधा व्यवहार नहीं करना चाहते। यही कारण आपस के सन्देह का होता है। क्या एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र की राष्ट्रीयता को भंग करके वहाँ के लोगों को पददलित करके अपना स्वार्थ पूरा करे? पर इतिहास साक्षी है कि सबल राष्ट्रों ने ऐसा किया है। लूट-खसोट ही नहीं मानवता के नाते भी भुला दिये गये और विजित देख के लोग दास बनाये गये उनके उद्योग धंधे नष्ट किये गये और उन्हें बुरी तरह दबाया गया और यह सब विजित लोगों के ही हितों के नाम पर किया गया। यह क्यों हो सका? कारण स्पष्ट है विजित देशों में जब सहानुभूति नहीं रहती, सम्वेदना नहीं रहती, तो आपस का सहयोग भी नहीं रहा करता।

यह अनुभूति जैसी देशों की जनता के विषय में सत्य हुई वैसी ही व्यक्तियों में भी देखी गई। जिन लोगों में आपस की सद्भावना नहीं रहती उनमें सहानुभूति भी नहीं रहती और वे मिलकर एक उद्देश्य से कार्य भी नहीं कर सकते। इन्हीं दुर्बलताओं को आक्रमणकारी राष्ट्र भांप लेता है और अपनी स्वार्थ पूर्ति करता है। विजित लोगों के हृदय आपस में तो मिले हुए होते ही नहीं उनमें और चौड़ी खाई बनादी जाती है, और विजेता लोगों को हर प्रकार से वृद्धि तथा विजित लोगों का ह्रास आरम्भ हो जाता है। दुःख की अनुभूति भी पुनरुत्थान के लिये मनुष्य को उत्तेजित करने में सहायक होती है और विजित लोग जिन्हें अपनी दासता असह्य हो जाती है वे विजेताओं से उकता कर आपस में मिलकर आपस में एक उद्देश्य के लिए संगठित होकर तत्परता और पूरी लगन से कार्य करना सीख लेते हैं।

सहानुभूति का उदय होता है, स्वार्थ नहीं उभरने पाता और आपस के सहयोग तथा विजेताओं से पूर्ण असहयोग करके वे शक्ति संपन्न हो जाते हैं। सहयोग में अनुपम शक्ति है। जो कार्य व्यक्ति से नहीं हो पाता वही कार्य मिलकर करने में सुगम हो जाता है और सहर्ष सम्पन्न होता है। सहयोग से इस प्रकार पुनः चक्र बदलने लगता है और वही जनता जो पहले पददलित और तिरस्कृत थी वश प्राप्त करती है और विश्व में उसकी कीर्ति फैलती है सहयोग महान अद्भुत शक्ति है। भारतीय जनता इसी प्रकार अपना खोया हुआ गौरव पा सकी है और अब हमारा जनतंत्र विश्व भर में आदर पा रहा है। सहयोग से सफलता और कीर्ति निहित है।

सद्भावना से एक दूसरे को ठीक-ठीक जानना और आपस में एका उत्पन्न करना, सहानुभूति से आपस में एक दूसरे के हृदय में प्रवेश करना और हृदयों का समन्वय करना तथा सहयोग से सामर्थ्य प्राप्त करना यह क्रम है महत्वाकांक्षी की पूर्ति का सहयोग ही यज्ञ है। यज्ञ कभी विफल नहीं हुआ। सभी शक्तियों में सहयोग होने से एक अत्यंत महान शक्ति का उदय होता है जिससे सभी में नया उत्साह साहस और वस्तुतः कार्यक्षमता युक्त नवजीवन उदय होता है।

📖 अखण्ड ज्योति फरवरी 1956 पृष्ठ 16

👉 THE ABSOLUTE LAW OF KARMA (Part 1)

PREFACE

The law of divine justice follows a mysterious course. In the world we come across many instances of virtuous persons undergoing endless suffering and pain; sinners perpetually enjoying pleasurable lives; indolents achieving success; hardworking persons meeting repeated failures; the wise suffering adversity; fools living in prosperity; egoists held in high esteem; and the righteous held in contempt. We find some persons born with silver spoon in their mouths and others facing one misfortune after another throughout life. The well-known human norms for achieving happiness and success do not always appear to hold good in practical terms.Such phenomena raise many questions and doubts about the role of fate in life, the will of God and the relationship of virtuous and evil deeds with happiness and unhappiness in life.

The rationale given in the ancient literature in this respect does not adequately satisfy the inquisitiveness of modern minds. Consequently, the new generation is becoming more inclined to accept the atheistic ideologies of the West, which regard God and the religion as phantoms creations of sick and fearful minds; the human body merely a chemical combination of inert elements; and denies the very existence of an immortal soul. The new generation is made to believe that there is no Supreme Being or God; that destiny has no role to play in life; and that only arbitrary man-made state machinery has the powers to dispense punishments and rewards.

In the present book an attempt has been made to give rational and logical explanations of relationship between human deeds and
destiny. It explains how events of good fortune and misfortune, happiness and suffering in human life are results of one’s own
deeds.It is hoped that this booklet will provide satisfactory answers to the queries relating to the role played by the consequences of an individual’s deeds in the making of his destiny.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 आत्मचिंतन के क्षण

★ इस दानशील देश में हमें पहले प्रकार के दान के लिए अर्थात आध्यात्मिक ज्ञान के विस्तार के लिए साहसपूर्वक अग्रसर होना होगा! और यह ज्ञान-विस्तार भारत की सीमा में ही आबद्ध नहीं रहेगा, इसका विस्तार तो सारे संसार में करना होगा! और अभी तक यही होता भी रहा है! जो लोग कहते हैं कि भारत के विचार कभी भारत से बाहर नहीं गये, जो सोचते हैं कि मैं ही पहला सन्यासी हूँ जो भारत के बाहर धर्म-प्रचार करने गया, वे अपने देश के इतिहास को नहीं जानते! यह कई बार घटित हो चुका है! जब कभी भी संसार को इसकी आवश्यकता हुई, उसी समय इस निरन्तर बहनेवाले आध्यात्मिक ज्ञानश्रोत ने संसार को प्लावित कर दिया!

◆ वस्तुयें बुरी नहीं होती, उनका उपयोग बुरा होता है। विवेकवान पुरुष जिस वस्तु का उपयोग अच्छे कार्य के लिए करते हैं वहीँ विवेकहीन पुरुष उसी वस्तु का उपयोग बुरे कार्य के लिए करते हैं।

◇ इस दुनिया में वुद्धि के तीन स्तर पर आदमी जीवन जीता है। उसी के अनुसार कर्म करता है। माचिस की एक तीली से एक विवेकवान जहाँ मन्दिर में दीप जलाकर पूजा करता है, वहीँ अँधेरे में दीया जलाकर लोगों को गिरने से भी बचाता है। एक सामान्य वुद्धि वाला मनुष्य धूम्रपान के लिए उसका उपयोग करता है। एक कुबुद्धि किसी का घर जलाने के लिए माचिस जलाता है।

■ माचिस की तीली का कोई दोष नहीं है। दोष हमारी समझ, हमारी वुद्धि का है। अतः कोई भी वस्तु उपयोगी- अनुपयोगी नहीं है, हम अपनी समझ द्वारा उसे ऐसा बना देते है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 याचक ने पारस फेंक दिया

एक व्यक्ति एक संत के पास आया व उनसे याचना करने लगा कि वह निर्धन है। वे उसे कुछ धन आदि दे दें, ताकि वह जीविका चला सके। सन्त ने कहा- 'हमारे पास तो वस्त्र के नाम पर यह लंगोटी व उत्तरीय है। लंगोटी तो आवश्यक है पर उत्तरीय तुम ले जा सकते हो। इसके अलावा और कोई ऐसी निधि हमारे पास है नहीं।'' वह व्यक्ति बराबर गिड़गिड़ाता ही रहा, तो वे बोले- 'अच्छा, झोपड़ी के पीछे एक पत्थर पड़ा होगा। कहते हैं, उससे लोहे को छूकर सोना बनाया जा सकता है। तुम उसे ले जाओ। ''प्रसन्नचित्त वह व्यक्ति भागा व उसे लेकर आया, खुशी से चिल्ला पड़ा- 'महात्मन्! यह तो पारस मणि है। आपने इसे ऐसे ही फेंक दी। ''सन्त बोले' हाँ बेटा! मैं जानता हूँ और यह भी कि यह नरक की खान है। मेरे पास प्रभु कृपा से आत्म सन्तोष रूपी धन है जो मुझे निरन्तर आत्म ज्ञान, और अधिक यान प्राप्त करने को प्रेरित करता है। मेरे लिए इस क्षणिक उपयोग की वस्तु का क्या मूल्य?' वह व्यक्ति एकटक देखता रह गया।

फेंक दी उसने भी पारस मणि। बोला- ' भगवन्। जो आत्म सन्तोष आपको है व जो कृपा आप पर बरसी है उससे मैं इस '' पत्थर '' के कारण वंचित नहीं होना चाहता। आप मुझे भी उस दिशा में बढ़ने की प्रेरणा दें जो सीधे प्रभु प्राप्ति की ओर ले जाती है। '' सन्त ने उसे शिष्य के रूप में स्वीकार किया। वे दोनों मोक्ष सुख पा गए।

विवेकवान के समक्ष हर वैभव, हर सम्पदा तुच्छ है। वह सतत् अपने चरम लक्ष्य, परम पद की प्राप्ति की ओर बढ़ता रहता है।

📖 प्रज्ञा पुराण भाग 1

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1) श्लोक 81 से 82

साहसादर्शरूपा ये चेतनामुच्चभूमिकाम्।
निजेन बलिदानेन त्यागेनोद्भावयन्ति ये ॥८१॥
आत्मसन्तोषमासाद्य लोकसम्मानमेव च।
दैवानुग्रहलाभं च कृतकृत्या भवन्ति ते ॥८२॥

टीका- आदर्श और साहस के धनी अपने त्याग-बलिदान से उच्चस्तरीय चेतना उत्पन्न करते हैं और आत्म-सन्तोष लोक-सम्मान तथा दैवी-अनुग्रह के तीन लाभ एक साथ प्राप्त करते तथा धन्य बनते है ॥८१-८२॥

व्याख्या- नव-सृजन में अपना सब कुछ लुटा देने वाले कभी घाटे में नहीं रहते। भगवान के काम में लग जाने वाले तीन असामान्य लाभ सहज पा लेते हैं जो एक दूसरे की प्रतिक्रियाएँ ही हैं। जागृत आत्माएँ आदर्शवादिता अपनाकर सत्साहस दिखाती हैं और अन्त: में सन्तोष, बहिरंग में सम्मान-सहयोग पाती हैं और ऐसों पर ही दैवी अनुदान बरसते हैं, जो उन्हें कृतकृत्य कर जाते हैं। पेड़ अपने पत्ते गिराते, जमीन को खाद देते और बदले में जड़ों के लिए उपयुक्त खुराक उपलब्ध करते हैं। फल-फूलों से दूसरों को लाभानित करते हैं। यह परमार्थ व्रत आज की चिन्तन धारा के अनुसार तो मूर्खता ही ठहराया जायगा और व्यंग्य-उपहास का ही कारण बनेगा। किन्तु पर्यवेक्षकों को इस निष्कर्ष पर पहुँचने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि विश्व-व्यवस्था में ऐसी परिपूर्ण गुंजायश है कि परमार्थ परायणों को लोक सम्मान ही नहीं दैवी अनुदान भी अजस्र परिमाण में मिलते रहें। पेड़ों को बार-बार नये पल्लव और नये फल-फूल देते रहने में प्रकृति कोताही नहीं बरतती। उदारमना घाटा उठाते लगते भर हैं। वस्तुत: वे जो देते हैं उसे ब्याज समेत वसूल कर लेते हैं।

इतिहास के पृष्ठों पर स्वर्णाक्षरों में अंकित महामानवों में से प्रत्येक ने परमार्थ-परायणता की दूरदर्शितापूर्ण नीति अपनाई है। वे बीज की तरह गले और वृक्ष की तरह बढ़े हैं, इस मार्ग पर चलने के लिए उन्हें प्राथमिक पराक्रम यह करना पड़ा कि संचित कुसंस्कारों की पशु-प्रवृत्तियों से जूझे और उन्हें सुसंस्कारी बनने के लिए पूरी तरह दबाया-दबोचा और तब छोड़ा जब वे ची बोल गईं और संकीर्ण स्वार्थपरता से ऊँचे उठकर आदर्शवादी परमार्थ प्रवृत्ति को अंगीकार करने के लिए सहमत हो गईं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 34