मंगलवार, 8 अगस्त 2017

👉 प्रतिभाओं का नया वर्ग उठेगा

🔵 लेखकों दार्शनिकों का अब एक नया वर्ग उठेगा। वह अपनी प्रतिभा के बलबूते एकाकी सोचने और एकाकी लिखने का प्रयत्न करेगा। उन्हें उद्देश्य में सहायता मिलेगी। मस्तिष्क के कपाट खुलते जायेंगे और उन्हें सूझ पड़ेगा कि इन्हीं दिनों क्या लिखने योग्य है और मात्र वही लिखा जाना है।

🔴 क्या बिना सम्पन्न लोगों की सहायता लिए, बिना वर्तमान पुस्तक विक्रेताओं की मोटे मुनाफे की माँग पूरी किये, ऐसा हो सकता है कि जन-साधारण का उपयोग लोक साहित्य लागत मूल्य पर छपने लगे और घर-घर तक पहुँचने लगे। हमारा विश्वास है कि यह असम्भव नहीं है। समय अपनी आवश्यकता पूरी कराने के लिए रास्ता निकालेगा और छाये हुए अंधेरे में किसी चमकने वाले सितारे का प्रकाश दृष्टिगोचर होगा।

दार्शनिक और वैज्ञानिक दोनों ही मुड़ेंगे। इन दोनों खदानों में से ऐसे नर रत्न निकलेंगे जो उलझी हुई समस्याओं को सुलझाने में आश्चर्यजनक योगदान दे सकें ऐसी परिस्थितियाँ विनिर्मित करने में हमारा योगदान होगा, भले ही परोक्ष होने के कारण लोग उसे अभी देख या समझ सकें।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति- जुलाई 1984 पृष्ठ 19

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 127)

🌹  चौथा और अंतिम निर्देशन

🔵 इसके लिए तुम्हें एक से पाँच बनकर मोर्चों पर लड़ना पड़ेगा। कुन्ती के समान अपनी एकाकी सत्ता को निचोड़कर पाँच देवपुत्रों को जन्म देना होगा, जिन्हें भिन्न-भिन्न मोर्चों पर भिन्न-भिन्न भूमिका प्रस्तुत करनी पड़ेगी।

🔴 मैंने बात के बीच में विक्षेप करते हुए कहा- ‘‘यह तो आपने परिस्थितियों की बात कही। इतना सोचना और समस्या का समाधान खोजना आप बड़ों का काम है। मुझ बालक को तो काम बता दीजिए और सदा की तरह कठपुतली के तारों को अपनी उँगलियों में बाँधकर नाच नचाते रहिए। परामर्श मत कीजिए। समर्पित को तो केवल आदेश चाहिए। पहले भी आपने जब कोई मूल आदेश स्थूलतः या सूक्ष्म संदेश के रूप में भेजा है, उसमें हमने अपनी ओर से कोई ननुनच नहीं की।

🔵 गायत्री के चौबीस महापुरश्चरणों के सम्पादन से लेकर स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने तक, लेखनी पकड़ने से लेकर विराट यज्ञायोजन तक एवं विशाल संगठन खड़ा करने से लेकर करोड़ों की स्थापनाएँ करने तक आपकी आज्ञा, संरक्षण एवं मार्गदर्शन ने ही सारी भूमिका निभाई है। दृश्य रूप में हम भले ही सबके समक्ष रहे हों, हमारा अंतःकरण जानता है कि यह सब कराने वाली सत्ता कौन है? फिर इसमें हमारा सुझाव कैसा, सलाह कैसी। इस शरीर का एक-एक कण, रक्त की एक-एक बूँद, चिंतन-अंतःकरण आपको, विश्व मानवता को समर्पित है। उनने प्रसन्न बदन स्वीकारोक्ति प्रकट की एवं परावाणी से निर्देश व्यक्त करने का उन्होंने संकेत किया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.19

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 39)

🌹  चारों ओर मधुरता, स्वच्छता, सादगी और सज्जनता का वातावरण उत्पन्न करेंगे।

🔴 सादगी, शालीनता और सज्जनता का सृजन करती है। उसके पीछे गंभीरता और प्रामाणिकता, विवेकशीलता और बौद्धिक परिपक्वता झाँकती है। वस्तुतः इसी में इज्जत के सूत्र सन्निहित हैं। सादगी घोषणा करती है कि यह व्यक्ति दूसरों को आकर्षित या प्रभावित करने की चालबाजी नहीं, अपनी वास्तविकता विदित कराने में संतुष्ट है। यही ईमानदारी और सच्चाई की राह है। यह आमदनी बढ़ाने का भी एक तरीका है। फिजूलखर्ची रोकना अर्थात् आमदनी बढ़ाना। समय आ गया है कि इस बाल बुद्धि को छोड़कर प्रौढ़ता का दृष्टिकोण अपनाया जाए। हम गरीब देश की निवासी हैं।

🔵 सर्वसाधारण को सामान्य सुसज्जा और परिमित खर्च में काम चलाना पड़ता है। अपनी वस्तु स्थिति यही है कि अपने करोड़ों भाई-बहनों की पंक्ति में ही हमें खड़े होना चाहिए और उन्हीं की तरह रहन-सहन का तरीका अपनाना चाहिए। इस समझदारी में ही इज्जत पाने के सूत्र सन्निहित हैं। फैशन परस्ती और अपव्यय की राह अपनाकर हम आर्थिक संकट को ही निमंत्रित करते हैं।
   
🔴 स्वच्छता के साथ जुड़ी हुई सादगी अपने आप में एक उत्कृष्ट स्तर का फैशन है। उसमें गरीबी का नहीं महानता का पुट है। सादा वेशभूषा और सुसज्जा वाला व्यक्ति अपनी स्वतंत्र प्रतिभा और स्वतंत्र चिंतन का परिचय देता है। भेड़-चाल को छोड़कर जो विवेकशीलता का रास्ता अपनाता है, वह बहादुर है। सादगी हमें फिजूलखर्ची से बचाकर आर्थिक स्थिरता में ही समर्थ नहीं करती वरन् हमारी चारित्रिक दृढ़ता भी प्रमाणित करती है। अकारण उत्पन्न होने वाले ईर्ष्या और लांछन से बचने का भी यही सरल मार्ग है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.53

👉 कभी उधार न लीजिये-

🔵 उधार एक ऐसी बला है, जो मनुष्य की सब शक्तियों को क्षीण कर डालती है। उसे सबके सामने नीचा देखना पड़ता है, हाथ तंग रहता है। 

🔴 “उधार लेने की आदत कैसी है, इस पर दो राये नहीं हो सकतीं। इसका तो एक ही उत्तर है- आदत बहुत बुरी है। उधार लेते समय तो चाहे वह रुपया हो या और कोई चीज कुछ पता नहीं चलता, परन्तु देते समय दशा बिगड़ जाती है। ऐसा लगता है, जैसे पैसे फेंक रहे हैं। धीरे-2 यह आदत इतनी जोर पकड़ती है कि उधार की चीज या पैसा लौटाने को मन नहीं होता और फल यह होता है- मित्रों का कन्नी काटना, समाज में निरादर, बदनामी आदि। फिर वह “भेड़िया आया” वाली बात होती है। यदि कभी वास्तविक आवश्यकता पड़ी भी तो पैसा नहीं मिलता। इसलिए निश्चय करना चाहिए कि कभी कोई चीज या रुपया उधार नहीं लेंगे।”

🔵 आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ऋण के चार प्रमुख कारण बतलाये हैं- कपड़े-लत्ते, जूता, तड़क भड़क और आमोद-प्रमोद। ऋण पर ऋण बढ़ता है और उसका तार जीवन भर नहीं छूटता। शुक्ल जी लिखते हैं-“ऋण एक नाले के समान है, जो ज्यों ज्यों आगे चलता है, त्यों त्यों बढ़ता है। सबसे बुरी बात ऋण में यह है कि जिसे ऋण का अभ्यास पड़ जाता है, उसकी घडक खुल जाती है, उसे आगम का भय नहीं रहता और जब तक उसका नाश नहीं होता, तब तक वह विष का घूँट बराबर पिये जाता है। यदि उसका चित्त ऐसा हुआ कि जिसमें लतें जल्दी लगती हो, तो वह निर्द्वन्द्व न रह सकेगा, ऋण के बराबर बढ़ते हुए बोझ से दब कर वह छटपटाया करेगा।

🔴 आमदनी और खर्च के ऊपर तीखी दृष्टि रखिये। व्यय से पूर्व आमदनी खर्च का एक चिट्ठा-बजट-तैयार कर लीजिये। जो बुद्धिमान व्यक्ति अपने रुपये से अधिकतम लाभ और उपयोगिता प्राप्त करना चाहता है, कर्ज से बच कर सज्जन नागरिक का प्रतिष्ठित जीवन व्यतीत करना चाहता है, उसे बजट बनाना आवश्यक है। बजट हमें फिजूलखर्ची से सावधान करता है। सब व्यय तथा आमदनी नक्शे की तरह हमारे समाने रहती है। टिकाऊ वस्तुओं पर खर्च होता है, विलासिता से मुक्ति होती है।

🌹 अखण्ड ज्योति जनवरी 1950 पृष्ठ 10

👉 आत्मचिंतन के क्षण 8 Aug 2017

🔴 जीवन में आए दिन दुरंगी घटनाएं घटित होती रहती हैं। आज लाभ है तो कल नुकसान, आज बलिष्ठता है तो कल बीमारी, आज सफलता है तो कल असफलता। दिन रात का चक्र जैसे निरंतर घूमता रहता है वैसे ही सुख-दुःख का, सम्पत्ति-विपत्ति का, उन्नति-अवनति का पहिया भी घूमता रहता है। यह हो नहीं सकता कि सदा एक सी स्थिति रही आवे। जो बना है वह बिगड़ेगा, जो बिगड़ा है वह बनेगा, श्वासों के आवागमन का नाम ही जीवन है।

🔵 साँस चलना बन्द हो जाय तो जीवन भी समाप्त हो जायेगा। सदा एक सी ही स्थिति बनी रहे परिवर्तन बन्द हो जाय तो संसार का खेल ही खत्म हो जायेगा। एक के लाभ में दूसरे की हानि है और एक की हानि में दूसरे का लाभ। एक शरीर की मृत्यु ही दूसरे शरीर का जन्म है। यह मीठे और नमकीन हानि और लाभ दोनों ही स्वाद भगवान ने मनुष्य के लिये इसलिए बनाये हैं कि वह दोनों के अन्तर और महत्व को समझ सके।

🔴 खिलाड़ी लोग जो गेंद, ताश, शतरंज, नाटक आदि खेलों को मनोरंजन के उद्देश्य से खेलते है और उसकी अनुकूल प्रतिकूल प्रतिक्रियाओं के कारण अपने आपको उत्तेजित, उचित या अशाँत नहीं करते वैसा ही दृष्टिकोण जीवन की विविध समस्याओं के सम्बन्ध में रखा जाना चाहिए। किंतु हम देखते हैं कि लोग इन स्वाभाविक आवश्यक एवं साधारण से उतार चढ़ावों को देखकर असाधारण रूप से उत्तेजित हो जाते हैं और अपना मानसिक सन्तुलन खो बैठते हैं।
                                        
🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 कर्म योग द्वारा सर्व सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। (भाग 1)

🔵 संसार की उत्पत्ति भगवान से हुई है और भगवान ही सारे जगत में परिपूर्ण हैं। मनुष्य अपने कर्मों द्वारा इन भगवान की पूजा करके परम सिद्धि रूप भगवान को सहज ही प्राप्त कर सकता है। जो जिस कार्य को करता हो, जिसका जो स्वाभाविक कर्म हो उसी को करे, न तो सबके कर्म एक से हो सकते हैं और न एक सा बनाने की व्यर्थ चेष्टा ही करनी चाहिये। नाटक में सभी पात्र एक ही पात्र का पार्ट करना चाहें तो वह खेल बिगड़ जायेगा। इसलिये अपनी अपनी जगह सभी की जरूरत है और सभी का महत्व है। राजा और मजदूर दोनों की ही आवश्यकता है और दोनों ही अपना अपना महत्व रखते हैं। इसलिये कर्म न बदलो मन के भाव को बदल डालो। कर्म का छोटा बड़ा पन बाहरी है। महत्व तो हृदय के भाव का है। ऊँच नीच का भाव रखकर राग द्वेष पूर्वक पराये अहित के लिये लोक दृष्टि में शुभ कर्म करने वाला नरक गामी हो सकता है।

🔴 स्वार्थ को सर्वथा छोड़कर निष्काम भाव से श्री भगवान की प्रीति के लिये भगवद्ज्ञानसार साधारण स्वकर्म करता हुआ ही मनुष्य परम सिद्धि रूप परमात्मा को पा सकता है। मनुष्य इस प्रकार अपने प्रत्येक कर्म को मुक्ति या भगवत् प्राप्ति का साधन बना सकता है। जिस कर्म में काम, क्रोध, लोभ आदि नहीं हैं जिसमें भगवान को छोड़कर अन्य किसी भी फल की आकाँक्षा नहीं हैं जो कर्म की अथवा फल की आसक्ति से नहीं किन्तु भगवान के दिये हुये स्वाँग का खेल अच्छी तरह खेलने की इच्छा से निरन्तर भगवत्- स्मरण करते हुये भगवत् प्रीत्यर्थ सात्विक कर्म उत्साह पूर्वक किया जाता है, उसी विशुद्ध कर्म से भगवान की पूजा होती है।

🔵 यह पूजा अपने किसी भी उपर्युक्त दोषों से रहित विहित स्वकर्म के द्वारा प्रत्येक स्त्री पुरुष सहज ही अपने अपने स्थान में रहते हुये ही कर सकता है। केवल मन के भाव को बदल कर कर्म का प्रवाह भगवान की ओर मोड़ देने की जरूरत है। फिर प्रत्येक कर्म तुम्हारी मुक्ति का साधन बन जायेगा और अपने सहज कर्मों को करते हुये भी तुम भगवान को प्राप्त कर जीवन सफल कर सकोगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति जनवरी 1960 पृष्ठ 9
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1960/January/v1.9

👉 आज का सद्चिंतन 8 Aug 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 8 Aug 2017


👉 जैसा बीज वैसा फल

🔵 अफ्रीका के दयार नोवा नगर में जगत प्रसिद्ध हकीम लुकमान का जन्म हुआ था। हब्शी परिवार में जन्म होने के कारण उन्हें गुलामों की तरह जीवन बिताने के लिए बाध्य होना पड़ा। मिश्र देश के एक अमीर ने तीस रुपयों में अपनी गुलामी करने के लिए लुकमान को खरीद लिया ओर उनसे खेती बाड़ी का काम लेने लगा।

🔴 यह अमीर बड़ा क्रूर और निर्दयी था वह जरा सी बात पर अपने गुलामों को बहुत सताता था। किन्तु बाहर से उसने धर्म का बड़ा आडम्बर रच रखा था। दिखाने के लिए वह ईश्वर की रट लगाता और खूब धर्म शास्त्र सुनता ताकि लोग उसे बड़ा धर्मात्मा समझें। अमीर का ख्याल था कि धार्मिक कर्मकाण्डों को करके ही मैं स्वर्ग का अधिकारी हो जाऊंगा।

🔵 एक बार मालिक ने हुक्म किया कि अमुक खेत में जाकर जौ बो आओ लुकमान उस खेत में गये और चने बो आये जब खेत उगा और मालिक ने चने के पौधे खड़े देखे तो वह बहुत नाराज हुआ और लुकमान से पूछा कि मैंने तो तुझे जौ बोने के लिये कहा था। तूने चने क्यों बो दिये लुकमान ने शिर झुकाकर नम्रता से कहा मालिक मैंने यह समझ कर चने बोये थे कि इसके बदले जौ उपजेंगे।

🔴 मालिक का पारा बहुत गरम हो गया। उसने गरज कर कहा- ‘मूर्ख कहीं दुनिया भर में आज तक ऐसा हुआ है कि चने बोये जायं और जौ उपजें?

🔵 लुकमान और नम्र हो गये उन्होंने मन्द स्वर में कहा- ‘मालिक मेरा कसूर माफ हो। मैं देखता हूँ कि आप दया के खेत में हमेशा पाप के बीज बोते हैं और सोचते हैं कि ईश्वर मुझे अच्छे फल देगा। इसलिए मैंने भी सोचा कि जब ईश्वर के खेतों में पाप बोने पर भी पुण्य फल मिल सकते हैं, तो मेरे चने बोने पर जौ भी पैदा हो सकते हैं।”

🔴 अमीर के दिल में लुकमान की बात तीर की तरह गई उसने निश्चय किया कि अब मैं अपना आचरण करूंगा और शुभ कर्म करने में दत्त चित्त रहूँगा, क्योंकि बिना पुण्य फल प्राप्त नहीं हो सकता। अमीर को धन के उपदेश से बहुत शिक्षा मिली उसने उन्हें पूर्वक गुलामी से मुक्त कर दिया।

🌹 अखण्ड ज्योति जुलाई 1942 पृष्ठ 29
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1942/July.29

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ८१)

👉 अथर्ववेदीय चिकित्सा पद्धति के प्रणेता युगऋषि युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव इस अथर्ववेदीय अध्यात्म चिकित्सा के विशेषज्ञ थे। उनका कहना था कि...