सोमवार, 2 नवंबर 2020

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ५९)

बाँसुरी बनें, तो गूँजे प्रभु का स्वर

अन्तर्यात्रा के पथ पर मार्गदर्शन करने वाले प्रदीप भी अनोखे हैं। बाहरी जीवन में हम जो यात्रा करते हैं, उसकी रीतियों से हम सभी प्रायः परिचित होते हैं। मंजिल का पता, राह की तैयारी, रास्ते के अवरोध इन सभी की पड़ताल करनी पड़ती है। सभी से परिचित होना होता है। तभी यात्रा सफल होती है। अन्तर्यात्रा में भी बातें तो लगभग यही है, परन्तु यहाँ सब कुछ अपरिचित सा है। जिन्हें देखा नहीं, जिसे जाना नहीं, जो सुना हुआ नहीं है- ऐसा सब कुछ है यहाँ। पथ अपरिचित है, चलना भी अकेले है। शायद इसीलिए इस पथ को प्रकाशित करने वाले प्रदीप भी अनोखे होने चाहिए।

गोस्वामी जी महाराज कहते हैं- ‘राम नाम मनि दीप धरू’। यानि कि राम नाम रूपी मणियों के दीप रखो। सचमुच ही अन्तर्यात्रा पथ को प्रकाशित करने वाले दीपक मणियों के होने चाहिए। जिसमें न तेल की जरूरत है, न बाती की और मिट्टी के दीए का भी यहाँ कोई काम नहीं। मणियों के दीपक तो स्व प्रकाशित होते हैं। ये तो बिना किसी दूसरे की सहायता के पथ को प्रकाशित करते रहते हैं। 
    
मणिदीप रूपी यह ईश्वर कैसे हैं इस विषय में और प्रकाश डालते हुए महर्षि कहते हैं-
तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम्॥ १/२५॥
    
शब्दार्थ-तत्र= उस (ईश्वर) में, सर्वज्ञबीजम्= सर्वज्ञता का बीज (कारण) अर्थात् ज्ञान, निरतिशयम् = निरतिशय (सर्वोच्च) है। अर्थात्- ईश्वर में सर्वज्ञता का बीज अपने उच्चतम विस्तार में विकसित होता है।
    
यह योग सूत्र साधना का परम रहस्य है। हालाँकि इसमें सब कुछ सरल, सहज एवं स्पष्ट है फिर भी इसे आत्मसात कर लेना विरल है। इन्सानी फितरत ही कुछ अजीब है। उसे कठिनताएँ, जटिलताएँ लुभाती हैं, ललचाती हैं। सहजता, सरलता को वह प्रायः बेकार समझ लेता है। जीवन की प्रत्येक गतिविधि में, प्रत्येक क्षेत्र में उसे अपने अहं की प्रतिष्ठा करना भाता है। और अहं को प्रतिष्ठता प्रायः कठिनाइयों के बीच ही मिल पाती है। इसी वजह से सहजता को अनावश्यक समझने की भूल की जाती है। इस भूल की वजह से भक्ति पथ पर चलने का विवेक विरले ही साधक जाग्रत् कर पाते हैं। ज्यादातर तो भस्त्रिका, भ्रामरी के चक्करों में ही भ्रमण करते रहते हैं।
    
.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १०२
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

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