मंगलवार, 22 जून 2021

👉 संघर्ष से बनती है जिंदगी बेहतर

हर किसी के जीवन में कभी ना कभी ऐसा समय आता है जब हम मुश्किलों में घिर जाते हैं और हमारे सामने अनेकों समस्यायें एक साथ आ जाती हैं। ऐसी स्थिति में ज्यादातर लोग घबरा जाते हैं और हमें खुद पर भरोसा नहीं रहता और हम अपना आत्मविश्वास खो देते हैं। और खुद प्रयास करने के बजाय दूसरों से उम्मीद लगाने लग जाते हैं जिससे हमें और ज्यादा नुकसान होता है तथा और ज्यादा तनाव होता है और हम नकारात्मकता के शिकार हो जाते हैं और संघर्ष करना छोड़ देते हैं।

एक आदमी हर रोज सुबह बगीचे में टहलने जाता था। एक बार उसने बगीचे में एक पेड़ की टहनी पर एक तितली का कोकून (छत्ता) देखा। अब वह रोजाना उसे देखने लगा। एक दिन उसने देखा कि उस कोकून में एक छोटा सा छेद हो गया है। उत्सुकतावश वह उसके पास जाकर बड़े ध्यान से उसे देखने लगा। थोड़ी देर बाद उसने देखा कि एक छोटी तितली उस छेद में से बाहर आने की कोशिश कर रही है लेकिन बहुत कोशिशो के बाद भी उसे बाहर निकलने में तकलीफ हो रही है। उस आदमी को उस पर दया आ गयी। उसने उस कोकून का छेद इतना बड़ा कर दिया कि तितली आसानी से बाहर निकल जाये | कुछ समय बाद तितली कोकून से बाहर आ गयी लेकिन उसका शरीर सूजा हुआ था और पंख भी सूखे पड़े थे। आदमी ने सोचा कि तितली अब उड़ेगी लेकिन सूजन के कारण तितली उड़ नहीं सकी और कुछ देर बाद मर गयी।

दरअसल भगवान ने ही तितली के कोकून से बाहर आने की प्रक्रिया को इतना कठिन बनाया है जिससे की संघर्ष करने के दौरान तितली के शरीर पर मौजूद तरल उसके पंखो तक पहुँच सके और उसके पंख मजबूत होकर उड़ने लायक बन सकें और तितली खुले आसमान में उडान भर सके। यह संघर्ष ही उस तितली को उसकी क्षमताओं का एहसास कराता है।

यही बात हम पर भी लागू होती है। मुश्किलें, समस्यायें हमें कमजोर करने के लिए नहीं बल्कि हमें हमारी क्षमताओं का एहसास कराकर अपने आप को बेहतर बनाने के लिए हैं अपने आप को मजबूत बनाने के लिए हैं।

इसलिए जब भी कभी आपके जीवन में मुश्किलें या समस्यायें आयें तो उनसे घबरायें नहीं बल्कि डट कर उनका सामना करें। संघर्ष करते रहें तथा नकारात्मक विचार त्याग कर सकारात्मकता के साथ प्रयास करते रहें। एक दिन आप अपने मुश्किल रूपी कोकून से बाहर आयेंगे और खुले आसमान में उडान भरेंगे अर्थात आप जीत जायेंगे।

आप सभी मुश्किलों, समस्यायों पर विजय पा लेंगे।

👉 भक्तिगाथा (भाग ३४)

भक्ति एक, लक्षण अनेक
    
मनन कब निदिध्यासन में बदला किसी को भी पता न चला। हिमालय के हिमाच्छादित शुभ्र शिखरों की छाँव में बैठा हुआ वह ऋषियों एवं देवों का समुदाय अनायास ही भावसमाधि में लीन हो गया। पल-क्षण की लहरें काल-सरिता में उठती-गिरती और विलीन होती रहीं। तभी वातावरण में अचानक ही ॐकार का दिव्य नाद ध्वनित होने लगा। धीरे-धीरे इस पवित्र नाद के स्पन्दन सघन होते गये, और इसी सघनता में कुछ ऐसा भावमय स्फोट हुआ कि वेदवाणी मुखर हो उठी। इसी के साथ वह दैवीय क्षेत्र एक अलौकिक आलोक से आलोकित हो गया। जब यह आलोकपुञ्ज कुछ मद्धम हुआ तो सभी ने देखा-चारों वेदों के सदृश्य भगवान ब्रह्मा जी के मानस पुत्र पधारे हैं।
    
सनक, सनन्दन, सनत् और सनातन की यह उपस्थिति सभी को आनन्द विभोर करने वाली थी। उनके आगमन के साथ सभी की चेतना भावसमाधि के भाव लोक से बाहर आयी। ब्रह्माजी के इन मानस पुत्रों को देखकर सभी के हृदय में श्रद्धा और सत्कार का ज्वार उमड़ आया। देवर्षि नारद अपने इन अग्रजों को देखकर भाव से जड़ीभूत हो गये। वह अचानक कुछ कह न सके, बस उनकी बरबस आँखों से आँसू छलक उठे। अनुरक्त हृदय, श्रद्धासिक्त अंतःकरण से उन्होंने इन चारों वेदमूर्तियों को प्रणाम किया। नारद को इस तरह से प्रणाम करते हुए देख अन्य सभी को चेत हुआ। सभी की भावनाएँ उनके श्रीचरणों में अर्पित होने के लिए आतुर होने लगीं। स्वयं सप्तर्षियों ने उनका अर्घ्य पाद्य आदि से सत्कार किया। सभी के सम्मिलित शील, सत्कार और सद्व्यवहार से पुलकित सनकादि ऋषियों ने सबको आशीर्वचन कहे।
    
वे बोले- ‘‘हे महर्षिजन! हे देवगण! आप सभी के रूप में समस्त सृष्टि का सत्त्व यहाँ पर सघनता से पुञ्जीभूत हुआ है। जहाँ शुद्ध सत्त्व है वहीं भावशुद्धि है और जहाँ भावशुद्धि है वहीं भक्ति है। जहाँ सघन और प्रगाढ़ भक्ति है वहाँ भावमय भगवान का सहज प्रत्यक्ष होता है। भक्ति का ऐसा पावन संगम समूची सृष्टि में बड़ा विरल है। यही कारण है कि हम सब भी यहाँ भक्ति सुरसरी में स्नान कर स्वयं को धन्य करने आ गये।’’ उनकी इस मधुर-मंजुल वाणी को सुनकर सप्तर्षियों ने कहा- ‘‘भगवन! हम सभी आपका सान्निध्य पाकर धन्य हैं। आप सभी को अपने पास देखकर हम सब यह अनुभव कर रहे हैं जैसे कि चारों वेद साकार स्वरूप होकर हमारे बीच पधारे हैं।’’
    
‘‘आप सभी का यह शील-विनय स्तुत्य है।’’ सनकऋषि ने वार्ता के सूत्र को नया आयाम देते हुए कहा- ‘‘लेकिन हम यहाँ भक्तिगाथा के श्रवण के लिए पधारे हैं।’’ इसलिए देवर्षि से मेरा आग्रह है कि वे अपना नया भक्तिसूत्र हमें सुनाएँ। उनके प्रति श्रद्धा से विनत देवर्षि ने कहा- ‘‘आपका आदेश मुझे शिरोधार्य है।’’ और फिर उन्होंने भक्ति के तारों को झंकृत करते हुए उच्चारित किया-
‘तल्लक्षणानि वाच्यन्ते नानामतमेदात्’॥ १५॥
अब नाना मतों के अनुसार उस भक्ति के लक्षण बताते हैं।
    
इस सूत्र को सभी ने चिंतन के लिए प्रेरित किया। ‘एक भक्ति के अनेक लक्षण’ यह बात अनूठी थी, पर देवर्षि की अनुभूति यही कह रही थी। थोड़ी देर वातावरण निःस्तब्ध रहा। फिर महर्षि क्रतु ने कहा- ‘‘देवर्षि इस सूत्र का रहस्य स्पष्ट करें।’’ उत्तर में ऋषि नारद ने कहा- ‘‘आज मेरा अनुरोध है कि सृष्टि के सभी रहस्यों में निष्णात मेरे अग्रज बन्धु सनकादि ऋषि इस सूत्र के रहस्यार्थ को बताएँ।’’ नारद का यह कथन सभी को प्रीतिकर लगा, क्योंकि आज सभी ब्रह्माजी के इन मानस पुत्रों के मुख से कुछ सुनना चाहते थे। देवर्षि नारद ने तो जैसे सभी की चाहत को स्वीकारोक्ति दे दी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ६६

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ३४)

सुख का केन्द्र और स्रोत आत्मा

आंख का साधारण काम है वस्तुओं को देखना ताकि हमारी जीवन यात्रा ठीक तरह चलती रह सके। पर आंखों में कितनी अद्भुत विशेषता भर दी है कि वह रूप, सौन्दर्य, कौतुक, कौतूहल जैसी रस भरी अनुभूतियां ग्रहण करके चित्त को प्रफुल्लित बनाती हैं। संसार में उत्पादन, परिपुष्टि, विनाश का क्रम नितान्त स्वाभाविक है। मध्यवर्ती स्थिति में हर चीज तरुण होती है और सुन्दर लगती है। क्या पुष्प क्या मनुष्य हर किसी को तीनों स्थितियों में होकर गुजरना पड़ता है। मध्यकाल सौन्दर्य लगता है। वस्तुतः यह तीनों ही स्थितियां अपने क्रम, अपने स्थान और अपने समय पर सुन्दर हैं। पर आंखों को सुन्दर-असुन्दर का भेद करके मध्य स्थिति को सुन्दर समझने की कुछ अद्भुत विशेषता मिली है।
फलस्वरूप जो कुछ उभरता हुआ विकसित, परिपुष्ट दीखता है सो सुन्दर लगता है। सुन्दर असुन्दर का तात्विक दृष्टि से यहां कुछ भी अस्तित्व नहीं है। पर हमारी अद्भुत आंखें ही हैं जो अपनी सौन्दर्यानुभूति वाली विशेषता के कारण हमारे दैनिक जीवन से सम्बन्धित समीपवर्ती वस्तुओं में से सौन्दर्य वाला भाग देखतीं, आनन्द अनुभव करतीं, उल्लसित और पुलकित होती हैं। चित्त को प्रसन्न करती हैं।

इसी प्रकार जननेन्द्रिय की प्रक्रिया है। प्रजनन मक्खी मच्छरों, कीट-पतंगों, बीज अंकुरों में भी चलता रहता है। यह सृष्टि का सरल स्वाभाविक क्रम है पर हमारी जननेन्द्रिय में कैसा अजीब उल्लास सराबोर कर दिया है कि संभोग के क्षण ही नहीं—उसकी कल्पना भी मन के कोने-कोने में सिहरन पुलकन, उमंग और आतुरता भर देती है। तत्वतः बात कुछ भी नहीं है। दो शरीरों के दो अवयवों का स्पर्श—इसमें क्या अनोखापन है? क्या अद्भुतता है? क्या उपलब्धि है? फिर स्पर्श का कुछ प्रभाव हो भी तो उसकी कल्पना से किस प्रकार, क्यों, किस लिये चित्त को बेचैन करने वाली ललक पैदा होनी चाहिये? बात कुछ भी नहीं है। मात्र जननेन्द्रिय की बनावट में एक अद्भुत प्रकार की सरसता का समावेश मात्र है जो हमें सामान्य स्वाभाविक दाम्पत्य-जीवन के वास्तविक या काल्पनिक प्रत्यक्ष और परोक्ष क्षेत्र में एक विचित्र प्रकार की रसानुभूति उत्पन्न करके—जीने भर के लिये प्रयुक्त हो सकने वाले जीवन को निरन्तर उमंगों से भरता रहता है।

ऊपर जीभ, आंख और जननेन्द्रिय की चर्चा हुई, कान और नाक के बारे में भी इसी प्रकार समझना चाहिए। यहां पान भाग वाला इन्द्रिय समूह अपने साथ रसानुभूति की विलक्षणता इसलिये धारण किये हुये हैं कि सरस, स्वाभाविक सामान्य जीवन क्रम ऐसे ही नीरस ढर्रे का जीने भर के लिये मिला हुआ प्रतीत न हो वरन् उसमें हर घड़ी उत्साह, उल्लास, रस, आनन्द बना रहे और उसे उपलब्ध करते रहने के लिये जीवन की उपयोगिता, सार्थकता और सरसता का भान होता रहे। इन्द्रिय समूह हमें इसी प्रयोजन के लिए उपलब्ध है। यदि उनका उचित, संयमित, विवेकपूर्ण, व्यवस्था पूर्वक उपयोग किया जा सके, तो हमारा भौतिक सांसारिक जीवन पग-पग पर सरसता, आनन्द उपलब्ध करता रह सकता है।

दूसरा उपकरण मन इसलिए मिला है कि संसार में जो कुछ चेतन है उसके साथ अपनी चेतना का स्पर्श करके और भी ऊंचे स्तर की आनन्दानुभूति प्राप्त करे। इन्द्रियां जड़ शरीर से सम्बन्धित हैं। जड़ पदार्थों को स्पर्श करके—उस संसर्ग का सुख लूटती हैं। जड़ का जड़ से स्पर्श भी कितना सुखद हो सकता है, इस विचित्रता का अनुभव हमें इन्द्रियों के माध्यम से होता है। चेतन का चेतन के साथ, जीवधारी का जीवधारी के साथ स्पर्श—सम्पर्क होने से मित्रता, ममता, मोह, स्नेह, सद्भाव, घनिष्ठता, दया, करुणा, मुदिता जैसी अनुभूतियां होती हैं। प्रतिकूल परिस्थितियों में द्वेष, घृणा जैसे भाव भी उत्पन्न होते हैं पर उनका अस्तित्व है इसीलिए कि मित्रता के वातावरण में सम्पर्क, संसर्ग का आनन्द बिखरता रहे, यदि अन्धकार न हो तो प्रकाश की विशेषता ही नष्ट हो जाय। वस्तुतः मन की बनावट दूसरों के सम्पर्क, सहयोग, स्नेह भावों के आदान-प्रदान का सुख प्राप्त करने में है। मेले-ठेलों में सभा सम्मेलनों में जाने की इच्छा इसीलिए उठती है उन जन संकुल स्थानों में व्यक्तियों की घनिष्ठता न सही समीपता का अदृश्य सुख तो अनायास मिलता ही है।

चूंकि इन्द्रिय सुख और जन सम्पर्क की घनिष्ठता में सहायक एक और नया माध्यम सभ्यता के विकास के साथ-साथ बनकर खड़ा हो गया है इसलिये अब प्रिय वह भी लगने लगा है—इस तीसरे मनुष्य कृत—आकर्षण तत्व का नाम है—धन में स्वभावतः कोई आकर्षण नहीं। इसमें इन्द्रिय समूह या मन को पुलकित करने वाली कोई सीधी क्षमता नहीं है। धातु के सिक्के या कागज के टुकड़े भला आदमी के लिए प्रत्यक्षतः क्यों आकर्षक हो सकते हैं। पर चूंकि वर्तमान समाज व्यवस्था के अनुसार धन के द्वारा इन्द्रिय सुख के साधन प्राप्त होते हैं। मैत्री भी सम्भव होती है। इसलिए धन भी प्रकारान्तर रूप से मन का प्रिय विषय बन गया। अस्तु धन की गणना भी सुखदायक माध्यमों से जोड़ ली गई है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ५४
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 आत्मा-विश्वास की महती शक्ति सामर्थ्य (भाग 3)

आत्मनिषेधी से सारी शक्तियाँ सारे देव-तत्व और सारी सम्भावनायें एक साथ रुक जाती हैं। वह अकेला एकाकी आत्म-बहिष्कृत स्थिति में डूबते व्यक्ति की ...