बुधवार, 10 जनवरी 2018

👉 कंजूस और सोना

🔶 एक आदमी था, जिसके पास काफी जमींदारी थी, मगर दुनिया की किसी दूसरी चीज से सोने की उसे अधिक चाह थी। इसलिए पास जितनी जमीन थी, कुल उसने बेच डाली और उसे कई सोने के टुकड़ों में बदला। सोने के इन टुकड़ों को गलाकर उसने बड़ा गोला बनाया और उसे बड़ी हिफाजत से जमीन में गाड़ दिया। उस गोले की उसे जितनी परवाह थी, उतनी न बीवी की थी, न बच्‍चे की, न खुद अपनी जान की। हर सुबह वह उस गोले को देखने के लिए जाता था और यह मालूम करने के लिए कि किसी ने उसमें हाथ नहीं लगाया! वह देर तक नजर गड़ाए उसे देखा करता था।

🔷 कंजूस की इस आदत पर एक दूसरे की निगाह गई। जिस जगह वह सोना गड़ा था, धीरे-धीरे वह ढूँढ़ निकाली गई। आखिर में एक रात किसी ने वह सोना निकाल लिया।

🔶 दूसरे रोज सुबह को कंजूस अपनी आदत के अनुसार सोना देखने के लिए गया, मगर जब उसे वह गोला दिखाई न पड़ा, तब वह गम और गुस्‍से में जामे से बाहर हो गया।

🔷 उसके एक पड़ोसी ने उससे पूछा, ''इतना मन क्‍यों मारे हुए हो? असल में तुम्‍हारे पास कोई पूँजी नहीं थी, फिर कैसे वह तुम्‍हारे हाथ से चली गई? तुम सिर्फ एक शौक ताजा किए हुए थे कि तुम्‍हारे पास पूँजी थी। तुम अब भी खयाल में लिए रह सकते हो कि वह माल तुम्‍हारे पास है। सोने के उस पीले गोले की जगह उतना ही बड़ा पत्‍थर का एक टुकड़ा रख दो और सोचते रहो कि वह गोला अब भी मौजूद है। पत्‍थर का वह टुकड़ा तुम्‍हारे लिए सोने का गोला ही होगा, क्‍योंकि उस सोने से तुमने सोनेवाला काम नहीं लिया। अब तक वह गोला तुम्‍हारे काम नहीं आया। उससे आँखें सेंकने के सिवा काम लेने की कभी तुमने सोची ही नहीं।''

🔶 यदि आदमी धन का सदुपयोग न करे, तो उस धन की कोई कीमत नहीं।

✍🏻 सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 Jan 2018


👉 आज का सद्चिंतन 11 Jan 2018


👉 आत्मचिंतन के क्षण 11 Jan 2018

🔶 योग का उद्देश्य ‘‘चित्त वृत्तियों’’ का संशोधन है ।। पशु- प्रवृतियों को देव आस्थाओं में बदल देने वाल मानसिक उपचार का नाम योग है। योगीजन अपने संगृहीत कुसंस्कारों को उच्चस्तरीय आस्थाओं में परिणत करने के लिए भावनात्मक पुरूषार्थ करते रहते हैं और इन्हीं प्रयत्नों में तल्लीन रहते हैं। जिससे वे उतने ही अंशों में आत्मा को परमात्मा से जोड़ लेता है।

🔷 वातावरण मानवी चिंतन, विचारणा एवं गतिविधि के समन्वय से उत्पन्न होता है। जैसी भी पीढ़ियां बनानी हो ,जैसा भी समाज का ढ़ाँंचा खड़ा करना हो, उसके अनुरूप ही वातावरण बनाना होगा। जब जब भी महामानवों की पीढ़ियां जन्मी हैं, ऐसे सूक्ष्म घटकों के आधार पर ही विकसित हुई है।माहौल को विनिर्मित करने ,वातावरण को बदलने जिसमें श्रेष्ठ मानवों की ढलाई होती चले। आज उज्ज्वलमान व्यक्तियों की आवश्यकता है।

🔶 सेवक कभी अपने मन में ऐसा भाव नहीं लाता कि वह सेवक है। वह अपने स्वामी अथवा सेव्य का आभार मानता है कि उन्होंने अपार कृपा करके उसे सेवा का अवसर प्रदान कि या अर्थात् वह सेवा नहीं कर रहा, अपितु उसके स्वमी उससे सेवा ग्रहण कर रहे हैं। वह उसे जब जिस सेवा के योग्य समझते हैं अथवा जब जैसी इच्छा होती है, वह सेवा ग्रहण करते हैं।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 MY LIFE: An indivisible Lamp (Akhand-Deepak) (Part 1)

🔷 I kindled an incessant lamp, continued to sit before it to count beads of GAYATRI mantra and also continued to emotionally undulate as if I were any snake. I kept asking myself, ‘‘can you light like a lamp to enlighten others?’’ a lamp of the cost of one fourth of a paisa, a little of oil and cotton, if all these taken together can show path to others in the form of a DEEPAK and can sacrifice itself to show others the path then, ‘‘O man! Why can’t you make your life like a Deepak?’’ my incessant Deepak continued to enlighten. I am not one of those who just burn the oil, ghee. I am not among those who misuse the things/ assets. Rather I am among those who believe to refine sentiments through rituals (tools). Thus I continued to refine my sentiments. My life is like a Deepak, enlightening others’ life, guiding the lives of millions of men, opening doors to millions of people. My life is like a Deepak. Enlightening, I have been. From beginning to the end, I have simply been burning.

🔶 I was kindled at the age of 15 years. I know only one thing that I have been burning like a Deepak for the last 60 years. I know nothing else. I have to spend my coming days in HIMAALAYA. What is there in HIMAALAYA? Is there any cinema in HIMAALAYA? Is there any sweet shop in HIMAALAYA? Is there any KACHAORI-SHOP in HIMAALAYA? No there is nothing like that and then what is there? There in HIMAALAYA are wild animals roaring all the night, wild pythons coming out of their holes in night. When in night there comes cold and air makes a different noise, the blood is freezed in veins of body and man finds it difficult to move. I am going to live in such a difficult place that is millions times more dangerous than jail. I am going, for what? For being engulfed in fire so that such a heat is generated within me that could awaken the sleeping fire within millions of people.
                                        
🔷 Has slept the honesty of man, the soul of man, the thinking-style of man and have slept the ideals of man. So now the man is alive like a beast-only to eat, sleep and marry. The soul within it has slept. I am going to be engulfed in fire. A dead body has to be either revitalized or reduced to ashes. I am going to generate fire. I am going to toil in order to generate fire, light and sense & knowledge of soul about which I have told you earlier that I had seen at the time of very first visit of my GUERDEV in my house. He gave me a different thinking style and light. I am going for that, so here I go. But wherever I go, I assure you to keep looking at you however you will not be able to see me. You cannot keep a distance from me.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 प्रत्येक परिस्थिति में प्रसन्नता का राजमार्ग (भाग 4)

🔶 बुराई की शक्ति अपनी सम्पूर्ण प्रबलता के साथ टक्कर लेती है। इसमें सन्देह नहीं है। ऐसे भी व्यक्ति संसार में हैं जिनसे ‘‘कुशल क्षेम तो है’’ पूछने पर ‘‘आपको क्या गरज पड़ी’’ जैसे उत्तर मिल जाते हैं। ऐसे प्रसंगों से आये दिन भेंट होती है। इनसे टकराया जाये तो मनुष्य का सारा जीवन टकराने में ही चला जाता है। उनसे निबटा न जाय यह तो नहीं कहा जाता, पर किसी भी काम में हमारी विचार और ग्रहण शक्ति सात्विक और ऊर्ध्ववती रहनी चाहिये। शत्रु से युद्ध करते हुये भी उसके गुण, साहस और सूझ-बूझ की प्रशंसा करनी चाहिये।

🔷 यही बात भगवान कृष्ण ने अर्जुन को सिखाई। जब उसे पता चला कि इस संसार में सब विरोधी ही विरोधी हैं तो भगवान कृष्ण ने समझाया—अर्जुन! भद्रं मनः कृणुष्व वृत्रतूर्ये इस संसार संग्राम में तू भद्र मनस्कता के साथ युद्ध कर। कोई भी काम करते समय अपने मन को उच्च भावों और संस्कारों से ओत-प्रोत रखना ही सांसारिक जीवन में सफलता का मूल मन्त्र है। यहां निरन्तर टकराने वाले से जो ‘‘अच्छा है सो सब मेरा’’ ‘‘बुरे से प्रयोजन नहीं’’ की धारणा रखने वाला व्यक्ति निश्चय ही अपने जीवन को ऊंचा उठाता और मनुष्य जीवन का वीरोचित लाभ प्राप्त करता है।

🔶 हम जहां रह रहे हैं, उसे नहीं बदल सकते पर अपने आपको बदल कर हर स्थिति से आनन्द ले सकते हैं। सामान्य सतह पर खड़े होकर दीखने वाला दृश्य कम अच्छा लगता है। अट्टालिका पर चढ़ जाने से वही वातावरण और भी व्यापक और अच्छा लगने लगता है। स्वतः की उच्च या निम्न स्थिति के कारण ही संसार अच्छा या बुरा लगता है। जब यह अपने ही हाथ की बात है तो संसार को क्यों बुरा देखें, क्यों बुराइयों का चिन्तन करें। हम भलाई की शक्ति में निमग्न रहकर उच्च स्थिति प्राप्त कर सकते हैं तो ऐसी सुन्दर जीवन व्यवस्था को छोड़ कर अपने आपको दुःखी और दलित क्यों बनावें?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1971 पृष्ठ 33
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1971/February/v1.33

👉 ध्यान का दार्शनिक पक्ष (भाग 5)

🔶 दूसरा वाला प्रकाश का ध्यान करने के लिए जो मैंने बताया था और यह कहा था कि आप अपने मस्तिष्क में प्रकाश का ध्यान किया कीजिए। आपके मस्तिष्क में-मन में जब प्रकाश आए, तब आपको ज्ञानयोगी होना चाहिए। कर्मयोगी शरीर से, ज्ञानयोगी मस्तिष्क से। आपके मस्तिष्क के भीतर जो भी विचार आएँ निषेधात्मक नहीं, विधेयात्मक विचार आने चाहिए। अभी तो आप लोगों के मस्तिष्क में विचारों को कितनी भीड़, कितने मक्खी मच्छर, कितनी वे चीजें जो आपके किसी काम की नहीं हैं, कितने विचार, कितनी कल्पनाएँ आती रहती हैं। उनका यदि आप विश्लेषण करें तो देखेंगे कि मस्तिष्क में जाने कितने मक्खी-मच्छरों जैसे विचार भरे पड़े हैं। अभी उनमें से एक तो गुस्से का भरा था, एक कामवासना का विचार करता रहा, एक सिनेमा का विचार करता रहा।

🔷 एक यह विचार करता रहा कि मैंने लॉटरी के तीन टिकट खरीदे हैं, उसमें से तीन-तीन लाख रुपए तो मिल ही जाएँगे। उन रुपयों से क्या-क्या करूँगा? अमुक काम करूँगा, अमुक बच्चे को, अमुक को दूँगा। आदि बेसिर-पैर की सारी को सारी बातें सारे के सारे ताने-बाने बुन रहा है। इससे आपकी सारी शक्तियाँ निरर्थक होती जा रही हैं। यह सब बेकार की कल्पनाएँ हैं जिनके पीछे न कोई तारतम्य है, न वास्तविकता है और न इनसे आपको कुछ लेना-देना है। इस प्रकार की कल्पनाएँ निरर्थक और अनर्थमूलक ही होती हैं। सार्थक कल्पनाएँ अगर आपके मस्तिष्क में आई होती, क्रमबद्ध रूप से आपने विचार किया होता तो आपमें से अधिकांश व्यक्ति वाल्टेयर हो गए होते, रवीन्द्रनाथ टैगोर हो गए होते अगर आपने अपनी कल्पनाओं को क्रमबद्ध बनाया होता, दिशाबद्ध बनाया होता, उत्कृष्ट और सक्षम बनाया होता।

🔶 हमारी एक ही विशेषता है कि हम विद्वान हैं। इसलिए विद्वान हैं कि हमने अपने चिंतन की धाराओं को सीमाबद्ध-दिशाबद्ध करके रखा है। हमारा चिंतन अनावश्यक बातों में कभी भी नहीं जाता। जब कभी जाएगा, क्रमबद्ध बातों में जाएगा, दिशाबद्ध बातों में जाएगा, आदर्श बातों में जाएगा और जो संभव है उनमें जाएगा। हमारा मस्तिष्क इतना ताना-बाना बुनता है कि वह एक वास्तविकता और व्यावहारिकता पर टिका रहता है। जो अवास्तविक है, अव्यावहारिक है और जो अनावश्यक है, ऐसे सारे के सारे विचारों को हम बाहर से ही मना कर देते हैं कि-'नो एडमीशन' यहाँ नहीं आ सकते, बाहर जाइए। आपको दाखिला हमारे मस्तिष्क में नहीं मिल सकता।
 
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 13)

👉 गुरु-चरण व रज का माहात्म्य

🔶 गुरुगीता के महामंत्र साधकों का पग-पग पर मार्गदर्शन करते हैं। साधना की सुगम, सरल, सहज विधियाँ सुझाते हैं। साधकों को इस गुह्यतत्त्व का बोध कराते हैं कि तुम क्यों इधर-उधर भटक रहे हो, क्यों व्यर्थ में परेशान हो? परम कृपालु सद्गुरु के होते हुए तुम्हें किसी भी तरह से भटकने या परेशान होने की जरूरत नहीं है। सद्गुरु के प्रति भाव भरा समर्पण सभी भव रोगों की अचूक दवा है। समस्याएँ भौतिक हों या आध्यात्मिक, लौकिक हों या अलौकिक गुरुचरणों में सभी के सारे समाधान समाए हैं। पिछले मंत्रों में गुरुचरणों की इसी महिमा की चर्चा की गई है। गुरु चरणों की कृपा से गुरुभक्त साधक को साधना का परम प्राप्य अनायास ही सुलभ हो जाता है। गुरु चरण सेवा से जीव ‘अयमात्माब्रह्म’ के दुर्लभ बोध को सुगमता से पा लेता है।
  
🔷 गुरुभक्ति की इसी भावकथा को आगे बढ़ाते हुए देवों के भी परम देव भगवान् सदाशिव आदिमाता पार्वती से कहते हैं-

गुरुपादाम्बुजं स्मृत्वा जलं शिरसि धारयेत्।
सर्वतीर्थावगाहस्य सम्प्राप्नोति फलं नरः॥ १२॥
  
शोषकं पापपङ्कस्य दीपनं ज्ञानतेजसाम्।
गुरुपादोदकं सम्यक् संसारार्णवतारकम्॥ १३॥
  
अज्ञानमूलहरणं जन्मकर्मनिवारणम्।
ज्ञानवैराग्यसिद्धर्य्थं गुरुपादोदकं पिबेत्॥ १४॥
  
🔶 सद्गुरु के चरणों का स्मरण करते हुए जल को सिर पर डालने से मनुष्य को सभी तीर्थों के स्नान का फल प्राप्त होता है॥ १२॥ श्री गुरु चरणों का जल पाप पंक को सुखाने वाला और ज्ञान तेज के दीपक को प्रकाशित करने वाला है। गुरुचरण जल की महिमा से मनुष्य ठीक तरह से संसार सागर को पार कर जाता है॥ १॥ गुरु चरणों का जल पीने से अन्तर्भूमि में  गहराई से जमा हुआ अज्ञान का महावृक्ष जड़ से उखड़ जाता है। जन्म-कर्म के बन्धन का निवारण होता है। गुरु पादोदक के पान से साधक को ज्ञान-वैराग्य की सहज सिद्धि होती है॥ १४॥

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 25

👉 समस्याओं का समाधान करें और आगे बढ़ें

🔶 एक गाँव में एक किसान रहता था। वह खेती बाड़ी करके अपने परिवार का पालन पोषण किया करता था। उसके खेत के बीचो-बीच पत्थर का एक छोटा सा हिस्सा ज़मीन से ऊपर निकला हुआ था जिससे ठोकर खाकर वह कई बार खुद भी गिर चुका था और ना जाने कितनी ही बार उससे पत्थर से टकराकर उसका हल भी टूट चुका था।

🔷 रोजाना की तरह एक दिन वह किसान सुबह-सुबह खेती करने पहुँचा लेकिन जो सालों से होता आ रहा था फिर वही हुआ, यानि एक बार फिर से उस किसान का हल उसी पत्थर के हिस्से से टकराकर टूट गया। किसान बिल्कुल क्रोधित हो उठा, और उसने मन ही मन सोचा कि आज जो भी हो जाए वह इस चट्टान को ज़मीन से निकाल कर अपने खेत के बाहर फ़ेंक ही देगा।

🔶 वह तुरंत गांव की ओर भागा और गाँव से चार पाँच लोगों को बुला लाया और सभी को लेकर वह उस पत्त्थर के पास पहुंचा ओर बोला – “मित्रो! ये देखो ज़मीन से निकले चट्टान के इस हिस्से ने मेरा बहुत नुक्सान किया है, और आज हम सभी को मिलकर इसे जड़ से निकालना है और खेत के बाहर फ़ेंक देना है।”

🔷 और ऐसा कहते ही वह फावड़े से पत्थर के आसपास पास खुदाई करने लगा, पर ये क्या! उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा क्योंकि अभी उसने एक-दो बार ही फावड़ा मारा था कि पूरा का पूरा पत्थर ज़मीन से बाहर निकल आया। साथ खड़े सभी लोग भी अचरज में पड़ गए और उन्ही में से एक ने हँसते हुए उस किसान से पूछा,” क्यों भाई, तुम तो कहते थे कि तुम्हारे खेत के बीच में एक बड़ी सी चट्टान दबी हुई है, पर ये तो एक मामूली सा पत्थर निकला?” खुद किसान भी आश्चर्य में पड़ गया क्योंकि सालों से जिसे वह एक भारी-भरकम चट्टान समझ रहा था दरअसल वह बस एक छोटा सा पत्थर था!

🔶 उसे बहुत पछतावा हुआ कि काश उसने पहले ही इसे निकालने का प्रयास किया होता तो ना उसे इतना नुकसान उठाना पड़ता और ना ही दोस्तों के सामने उसका मज़ाक बनता!

🔷 दोस्तों, कुछ इस किसान की तरह ही अक्सर हमारे साथ भी होता है। हम भी कई बार अपनी ज़िंदगी में आने वाली छोटी छोटी मुश्किलो, बाधाओं को बहुत बड़ा समझ लेते हैं और उनका सामना करने बजाय दुःख उठाते रहते हैं, नुकसान उठाते रहते हैं।

🔶 अगर हम उन मुश्किलों का सामना करे और उनसे निकलने की कोशिश करें तो हम देखेंगे कि चट्टान की तरह दिखने वाली समस्याएं एक छोटे से पत्थर के सामान दिखने लगेंगी जिन्हे हम बडी ही आसानी से ठोकर मारकर अपनी ज़िंदगी से निकाल सकते हैं। और अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ सकते हैं।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 10 Jan 2018

👉 आज का सद्चिंतन 10 Jan 2018


👉 अध्यात्मवाद

🔷 वर्तमान की समस्त समस्याओं का एक सहज सरल निदान है- ‘अध्यात्मवाद’। यदि शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, आर्थिक जैसे सभी क्षेत्रों में अध्यात्मवाद का समावेश कर लिया जाये, तो समस्त समस्याओं का समाधान साथ-साथ होता चले और आत्मिक प्रगति के लिए अवसर एवं अवकाश भी मिलता रहे। विषयों में सर्वथा भौतिक दृष्टिïकोण रखने से ही सारी समस्याओं का सूत्रपात होता है। दृष्टिïकोण में वांछित परिवर्तन लाते ही सब काम बनने लगेगें।
  
🔶 अध्यात्मवाद का व्यावहारिक स्परूप है, संतुलन, व्यवस्था एवं औचित्य। शारीरिक समस्या तब पैदा होती है, जब शरीर को भोग साधन समझ कर बरता जाता है। आहार-विहार और रहन-सहन को विचार परक बना लिया जाता है। इसी अनौचित्य एवं अनियमितता से रोग उत्पन्न होने लगते हैं और स्वास्थ्य समाप्त हो जाता है। विभिन्न शारीरिक समस्याओं का आसानी से हल निकल सकता है, यदि इस संदर्भ में दृष्टिïकोण को आध्यात्मिक बना लिया जाय। पवित्रता अध्यात्मवाद का पहला लक्षण है। यदि शरीर को पूरी तरह पवित्र और स्वच्छ रखा जाय, आत्म संयम और नियमितता द्वारा शरीर धर्म का पालन करते रहा जाय, तो शरीर पूरी तरह स्वस्थ बना रहेगा तथा शारीरिक संकट की संभावना ही न रहेगी। वह सदा स्वस्थ और समर्थ बना रहेगा।
  
🔷 शारीरिक स्वास्थ्य की अवनति या बीमारियों की चढ़ाई अपने आप नहीं होती, वरन्ï उसका कारण भी अपनी भूल है। आहार में असावधानी, प्राकृतिक नियमों की उपेक्षा, शक्तियों का अधिक खर्च, स्वास्थ्य में गिरावट के  प्रधान कारण होते हैं। जो लोग अपने स्वास्थ्य पर अधिक ध्यान देते हैं, उसके नियमों का ठीक-ठीक पालन करते हैं, वे सुदृढ़ एवं निरोग बने रहते हैं।
  
🔶 मनुष्य का मन शरीर से भी अधिक शक्तिशाली साधन है। इसके निद्र्वन्द रहने पर मनुष्य आश्चर्यजनक उन्नति कर सकता है, किंतु यह खेद का विषय है कि आज लोगों की मनोभूमि बुरी तरह विकारग्रस्त बनी हुई है। चिंता, भय, निराशा, क्षोभ, लोभ एवं आवेगों का भूकंप उसे अस्त-व्यस्त बनाये रखता है। यदि इस प्रचण्ड मानसिक पवित्रता, उदार भावनाओं और मन:शांति का महत्त्व समझ लिया जाय और नि:स्वार्थ, निर्लोभ एवं निर्विकारिता द्वारा उसको सुरक्षित रखने का प्रयत्न कर लिया जाय,  तो मानसिक विकास के क्षेत्र में बहुत दूर तक आगे बढ़ा जा सकता है।
  
🔷 सुदृढ़ स्वास्थ्य, समर्थ मन, स्नेह-सहयोग क्रिया-कौशल, समुचित धन, सुदृढ़ दाम्पत्य, ससुंस्कृत संतान, प्रगतिशील विकास क्रम, श्रद्धा, सम्मान, सुव्यवस्थित एवं संतुष्टï जीवन का एकमात्र सुदृढ़ आधार अध्यात्म ही है। आत्म-परिष्कार से संसार परिष्कृत होता चला जाता है। अपने को सुधारने से सारी समस्याओं का समाधान होता चला जाता है। अपने को ठीक कर लेने से आसपास के वातावरण के ठीक बनने में देर नहीं लगती। यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि जो अपना सुधार नहीं कर सका, अपनी गतिविधियों को सुव्यवस्थित नहीं कर सका, उसका भविष्य अंधकार मय ही बना रहेगा। इसीलिए मनीषियों ने मनुष्य की सबसे बड़ी बुद्धिमत्ता उसकी आध्यात्मिक प्रवृत्ति को ही माना है।

👉 आत्मचिंतन के क्षण 10 Jan 2018

🔶 आध्यात्मिक दृष्टिकोण का अर्थ है मन की उच्च भूमिका में प्रवेश करना। आध्यात्मिक दृष्टिकोण को प्रकट करने वाला एक अत्यन्त संक्षिप्त साधना है- और वह है अपनी आत्मा का विकास। शक्ति का एक वृहत् परिमाण इस भण्डार में एकत्रित है, उसे संकल्प, सूचना तथा मनोबल से विकसित करना पड़ता है। हमारी आत्मा में महान् शक्ति इसीलिए दी गई है कि हम उसका जितना भी सम्भव हो सदुपयोग करें, उससे यथेष्ट लाभ उठावें और उस अनन्त चेतन तत्व की समीचीन रूप से अभिवृद्धि करें।

🔷 गुरु- शिष्य संबंध बड़ा कोमल, किन्तु कल्याणकारी होता है। गुरु शिष्य को पुत्रवत् समझकर, उसे टेढ़े- मेढ़े मागों से निकाल ले जाते हैं, जिन्हें शिष्य के लिए समझ पाना कठिन होता है ।। इसलिए कई बार शिष्य अभिमान में आकर गुरु की अवज्ञा कर जाता है, इच्छा तथा आदेश की अवहेलना करता है। यद्यपि गुरु उसे कुछ भी न कहें, किन्तु फिर भी वह संभावित लाभ से वंचित रह जाता है। इसके लिए शिष्य में गुरु के प्रति सम्पूर्ण समर्पण की आवश्यकता है।

🔶 कुविचारों और दुःस्वभावों से पीछा छुड़ाने का तरीका यह है कि सद्विचारों के सम्पर्क में निरन्तर रहा जाये उनका स्वाध्याय, सत्संग और चिंतन- मनन किया जाये। साथ ही अपने सम्पर्क क्षेत्र में सुधार कार्य जारी रखा जाये। सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन का सेवा कार्य किसी न किसी रूप में कार्यान्वित करते रहा जाये। इतना करने पर ही मन को स्वच्छ, निर्मल व स्वयं को प्रगति के पथ पर अग्रगामी बनाए रखा जा सकता है।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 प्रत्येक परिस्थिति में प्रसन्नता का राजमार्ग (भाग 3)

🔶 किसी व्यक्ति में मित्रता का गुण होता है। मित्रता आनन्द देने वाली वस्तु है उससे मित्रता का गुण सीख लें। दूसरा व्यक्ति संयमी है उससे शरीर को सुदृढ़ बनाने और सौन्दर्य तथा यौवन बचाये रखने की धारणा पुष्ट करलें। एक व्यक्ति में और सब दुर्गुण हैं किन्तु वह स्वच्छ, सुथरा रहता है। यह गुण प्रसन्नता और प्रेरणा ग्रहण करने के लिये कम महत्वपूर्ण नहीं। मौन से मनःशक्तियों के संरक्षण का पाठ पढ़ लें तो वाणी विलास प्रिय व्यक्ति से विनोद और हास्य युक्त जीवन की सीख ले सकते हैं।

🔷 वेश-भूषा, रहन-सहन, रीति-रिवाज, संस्कार-संस्कृति, समाज-व्यवस्था, वर्णाश्रम-व्यवस्था, शासन पद्धति, नगर-ग्राम, शिक्षा-दीक्षा, इतिहास, भूगोल, स्मृति-कर्मकांड, उपासना, पर्व उत्सव, नदी, नाले, जंगल, पर्वत, खेत, खलिहान, परिपाटी प्रक्रिया, आशा विश्वास, मन्तव्य—मान्यताओं आदि में से ढेर से सद्गुणों का संचय कर हम अपनी मनोवृत्ति को सतोगुणी बना सकते हैं और आत्म-पुलक का शाश्वत सुख उपलब्ध कर सकते हैं।

🔶 जीवन की सफलता किस बात पर निर्भर है? इसका एक ही उत्तर है—अपनी भावनाओं पर। मनुष्य अपनी कल्पना से ही अपने आपको सफल अथवा विफल बनाता है। जैसी कल्पना की जाती है, अपने आस-पास उसी प्रकार की दृष्टि रच जाती है। कसाई की कल्पना जानवरों का वध करना होता है, उस तरह की अन्य क्रियायें और सहयोगी उसे अपने आप मिल जाते हैं। भेड़-बकरियां बेचने वाले, खाल और मांस खरीदने वाले, वध करने का स्थान और औजार सब कुछ उसकी इच्छा शक्ति जुटा देती है। यदि एक कसाई के लिये मनोवांछित सृष्टि जुटा लेना कुछ असम्भव नहीं होता तो उत्कृष्ट मनोभूमि द्वारा उत्कृष्ट वातावरण और उच्च सफलतायें प्राप्त कर लेना भी कोई असंभव बात नहीं है। केवल मनुष्य की मानसिक शक्ति का भलाई की दिशा में विकेन्द्रीकरण होना चाहिये।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति- फरवरी 1971 पृष्ठ 33
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1971/February/v1.33

👉 Significance of Birthday (Last Part)

🔷 There are some occasions in human life, when given suggestions leave long-lasting impressions on human mind and not only this, they also inspire and compel the man to revisit his past life in order to overhaul the same with a bright future taking shape in mind. The birthday is one such day that facilitates the mind of that man to execute & implement the rules that he firmly takes that day for his life ahead. He is compelled to accept the presence and majesty of ‘SVA’ (the self) so that he gets a chance to live his life in such a way that leaves the dignity and pride of his own life intact.

🔶 Some occasions are there in a human life that proves to be important and jesting. The happiness on the face of a winner of wrestling, an award or gift or toys can easily be read. How much happy he looks and such happiness develops his physical and mental powers. We can help man develops his internal & outer life both by giving him pleasure and sensation. This way man enters into an enlightened life leaving behind ordinary dull life & this change proves to be important for him.
                                        
🔷 Let such occasion is available to everyone on the basis of birthday for the purpose of realizing the dignity, attaining happiness and preparing ground of self-realization. Self-realization is the biggest awareness of the life. To know about the self, to see the self is the biggest knowledge. BHAGWAN has repeatedly said in GEETA, ‘‘know who you are, see who you are, analyze who you are. Set yourself free and don’t degrade/underestimate it.’’  The doors to spiritual progress are opened with attainment of this awareness about the self. The birthday can be supposed to be the most important day for the purpose of thoroughly analyzing about the self. Finished, today’s session.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 ध्यान का दार्शनिक पक्ष (भाग 4)

🔶 तीन योग हैं- कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग। प्रकाश के माध्यम से इन तीनों योगों को हृदयंगम करने के लिए मैंने आपको कहा है। भगवान का प्रकाश जब कभी शरीर में आएगा तो कर्मयोग के रूप में आएगा और आदमी कर्तव्यनिष्ठ होता हुआ दिखाई पड़ेगा। उसके लिए 'वर्क इज वरशिप' होगा। पूजा कर्म, श्रेष्ठ कर्म, आदर्श कर्म, लोकोपयोगी कर्म, मर्यादाओं से बँधे हुए कर्म सभी कर्मयोग के अंतर्गत आते हैं। जो हमें सिखाते हैं कि जब प्रकाश हमारे शरीर में आता है तो हमारे शरीर की प्रत्येक क्रिया को कर्मनिष्ठ होना चाहिए। परिश्रमी होना चाहिए। यह बताता है कि आदमी को जो प्रकाश का ध्यान करता है, उसे हरामखोर और आलसी नहीं होना चाहिए। चोर और हरामखोर मेरी दृष्टि से दोनों बराबर हैं।

🔷 महाराज जी हमारा बेटा बड़ा हो गया है और खूब कमाता-खाता है और हम तो अपनी मौज करते हैं। नहीं बेटे, कामचोर और चोर में तो कामचोर ही बड़ा होता है। मनुष्य के लिए यह सबसे बड़ी गाली है। कामचोर सबसे खराब आदमी है। नहीं गुरुजी हमको तो पेंशन मिलती है और हम मौज करते हैं। नहीं बेटे, हम तुझे मौज नहीं करने देंगे। जब तक जिंदा है, तब तक शरीर से तुझे कर्म करना पड़ेगा। अपने लिए रोटी खाने, पेट भरने को है, दूसरों के लिए तो नहीं है। उसके लिए कर। गुरुजी ! हमारे बेटे तो पढ़ गए और हम अब निश्चिंत हो गए। तेरे ही तो पढ़ गए समाज के बेटे तो नहीं पढ़े। चल रात को नाइट स्कूल चलाया कर और दूसरों के बच्चों को पढ़ाया कर।
 
🔶 इसलिए मित्रो, क्या करना पड़ेगा कि जब वह प्रकाश, जो मैंने जप के साथ-साथ करने के लिए बताया है, अगर वह आपके भीतर नसों में स्फूर्ति के रूप में आए तो जब तक आप जिंदा हैं, तब तक हम काम करेंगे, कर्मयोगी बनेंगे, मेहनत करेंगे, मशक्कत करेंगे, श्रेष्ठ काम करेंगे, कर्तव्यों का पालन करेंगे। जो हमारे लिए, हमारे समाज के लिए, देश के लिए, धर्म के लिए सबके लिए कर्तव्यों का बंधन बँधा हुआ है, इसका हम पालन करेंगे। अगर इस तरह की स्फूर्ति और नाड़ी अभ्यास बन जाए तो मैं समझूँगा कि आप कर्मयोगी हैं और आपने उस प्रकाश के ध्यान को जो मैंने बताया था उसे सीख लिया और उसका मकसद समझ गए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 पहले अपने अंदर झांको Pehle Apne Andar Jhanko

पुराने जमाने की बात है। गुरुकुल के एक आचार्य अपने शिष्य की सेवा भावना से बहुत प्रभावित हुए। विधा पूरी होने के बाद शिष्य को विदा करते समय...