मंगलवार, 5 मार्च 2019

👉 एक खूबसूरत सोच

मात्र कुढ़ते रहने से, चिन्ता की चादर ओढ़कर निष्क्रिय हो जाने से और मन ही मन कुड़ बुड़ाते रहने से किसी को रत्ती भर लाभ न तो कभी हुआ है न कभी आगे होने वाला है।

इसलिए ऐ परमेश्वर के प्यारे पुत्रों! जिन्दा ही मर जाने की बजाय तुम मरकर भी जीवित बने रहने की विद्या का अभ्यास करो। निष्क्रियता की घुटन का घेरा तोड़कर उत्फुल्ल क्रियाशीलता की खुली हवा में साँस लेना सीखो।

रेशम का कीड़ा अपना कोया खुद बुनता है और फिर उसी में घुटकर मर जाता है। घुटन की छटपटाहट से उबरने के लिए वह भी शायद हमारी ही तरह कभी विधाता, कभी व्यवस्था और कभी पड़ौसी को कोसता होगा। हमारे मन रूपी कीड़े को भी अपने ही बनाये कोयों की कैद में बंधना-घुटन पड़ता है।
‘कोयाबन्दी’ की निष्क्रियता के अँधेरे बंद तहखानों से निकलकर ऊपर आओ, ‘मानसिक कालकोठरी’ के वातायनों को सूर्य की ऊष्मा और स्वच्छ सुरभित पवन का स्वागत करने दो। तुम्हारे कुस्वास्थ्य का यही एक मात्र निदान है।

जाओ और यही संदेश अपने संपर्क में आने वाले जन-जन तक पहुंचाओ ताकि जहाँ-जहाँ भी किसी प्रकार की बुराई हो उसे दूर करने में अपनी-अपनी सीमा और शक्ति भर वे सक्रिय सहयोग दे सकें। उनकी समस्त सामर्थ्य केवल हवा के साथ लड़ने में ही व्यर्थ न चली जाये।

सेन्ट पाल

👉 आज का सद्चिंतन 5 March 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 5 March 2019


👉 चिंतन

एक बकरी के पीछे शिकारी कुत्ते दौड़े। बकरी जान बचाकर अंगूरों की झाड़ी में घुस गयी। कुत्ते आगे निकल गए।
              
बकरी ने निश्चिंतापूर्वक अँगूर की बेले खानी शुरु कर दी, और जमीन से लेकर अपनी गर्दन पहुचे उतनी दूरी तक के सारे पत्ते खा लिए। पत्ते झाड़ी में नहीं रहे। छिपने का सहारा समाप्त् हो जाने पर कुत्तो ने उसे देख लिया और मार डाला !!             
      
सहारा देने वाले को जो नष्ट करता है, उसकी ऐसी ही दुर्गति होती है।
       
मनुष्य भी आज सहारा देने वालीं जीवन दायिनी नदियां, पेड़ पौधो, जानवर, गाय, पर्वतो आदि को नुकसान पंहुचा रहा है और इन सभी का परिणाम भी अनेक आपदाओ के रूप में भोग रहा है।

प्राकृतिक सम्पदा बचाओ
अपना कल सुरक्षित करो

👉 प्रज्ञा पुराण (भाग 1) श्लोक 27 से 30

अवतार का लीला-संदोह

अवतार प्रक्रिया आदिकाल से चली आ रही है और आदिकाल से अब तक मनुष्य जाति ने अनेक प्रकार के उतार-चढाव देखे है। स्वाभाविक ही भिन्न-भिन्न कालों में समस्यायें और असन्तुलन भिन्न-भिन्न प्रकार के रहे है।

जिस प्रकार की समस्यायें उत्पन्न हुई हैं, तब उसी का समाधान करने के लिए एक दिव्य चेतना, जिसे अवतार कहा गया है प्रादुर्भूत हुई है और उसी क्रम से अवतार, युग प्रवाह को उलटने के लिए अपनी लीलाएँ रचते रहे है। सृष्टि के आरम्भ में जल ही जल था। प्राणी जगत में जलचरों की ही प्रधानता थी, तब उस असंतुलन को मत्स्यावतार ने साधा। जब जल और थल पर प्राणियों की हलचलें बढी तो उनके अनुरूप क्षमता सम्पन्न कच्छप काया ने सन्तुलन बनाया। उन्हीं के नेतृत्व में समुद्र-मन्थन के रूप में प्रकृति दोहन का पुरुषार्थ सम्पन्न हुआ। हिरण्याक्ष  समुद्र में छिपी सम्पदा को ढूँढ़कर उसे अपने ही एकाधिकार में कर लिया तो भगवान् का वाराह रूप ही उसका दमन करने में समर्थ-सक्षम हो सका। जब मनुष्य अपनी आवश्यकता से अधिक कमाने में समर्थ हो गया तो संकीर्ण स्वार्थपरता से प्रेरित संचय की-प्रवृत्ति भी बढी। संचय और उपभोग की पशु प्रवृत्ति को उदारता में परिणत करने के लिए भगवान् वामन के छोटे बौने और पिछडे़ लोग उठ खड़े हुए और बलि जैसे सम्पन्न व्यक्तियों को स्वेच्छापूर्वक उदारता अपनाने के लिए सहमत कर लिया गया।

उच्छृंखलता जब उद्धत और उद्दण्ड हो जाती है तब शालीनता से उसका शमन नहीं हो सकता। प्रत्याक्रमण द्वारा ही उसका दमन करना पड़ता है। ऐसे अवसरों पर नरसिंहों की आवश्यकता पड़ती है और उन्हीं का पराक्रम अग्रणी रहता है। उन आदिम परिस्थितियों में भगवान् ने नर और व्याघ्र का समन्वय आवश्यक समझा तथा नृसिंह अवतार के रूप में दुष्टता के दमन एवं सज्जनता के संरक्षण का आश्वासन पूरा किया'।

इसके बाद परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध के अवतार आते हैं। इन सभी का अवतरण बढ़ते हुए अनाचरण के प्रतिरोध और सदाचरण के समर्थन-पोषण के उद्देश्य के लिए हुआ। परशुराम ने शस्त्र बल से सामन्तवादी निरंकुश आधिपत्य को समाप्त किया। राम ने मर्यादाओं के पालन पर जोर दिया तो कृष्ण ने अपने समय की धूर्तता और छल-छद्म से घिरी हुई परिस्थितियों का दमन 'विषस्य विषमौषधम्' की नीति अपना कर किया। कृष्ण चरित्र में कूटनीतिक दूरदर्शिता की इसलिए प्रधानता है कि इस समय की परिस्थितियों में सीधी उँगली से घी नहीं निकल पा रहा था। इसलिए काटे से काँटा निकालने का उपाय अपनाकर अवतार प्रयोजन को पूरा करना पड़ा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 प्रज्ञा पुराण (भाग १) पृष्ठ 14