शनिवार, 13 जून 2020

👉 "संकल्प"

बात नेताजी सुभाषचंद्र बोस के बचपन की है जब वे स्कूल में पढ़ा करते थे। बचपन से ही वे बहुत होशियार थे और सारे विषयो में उनके अच्छे अंक आते थे, लेकिन वे बंगाली में कुछ कमजोर थे। बाकि विषयों की अपेक्षा बंगाली मे उनके अंक कम आते थे।

एक दिन अध्यापक ने सभी छात्रों को बंगाली में निबंध लिखने को कहा। सभी छात्रों ने बंगाली में निबंध लिखा। मगर सुभाष के निबंध में बाकि छात्रों की तुलना में अधिक कमियाँ निकली।

अध्यापक ने जब इन कमियों का जिक्र कक्षा में किया तो सभी छात्र उनका मजाक उड़ाने लगे।

उनकी कक्षा का ही एक विद्यार्थी सुभाषचंद्र बोस से बोला- “वैसे तो तुम बड़े देशभक्त बने फिरते हो मगर अपनी ही भाषा पर तुम्हारी पकड़ इतनी कमजोर क्यों है।”

यह बात सुभाषचन्द्र बोस को बहुत बुरी और यह बात उन्हें अन्दर तक चुभ गई। सुभाषचंद्र बोस ने मन ही मन निश्चय कर लिया कि वह अपनी भाषा बंगाली सही तरीके से जरुर सीखेंगे।

चूँकि उन्होंने संकल्प कर लिया था इसलिये तभी से उन्होंने बंगाली का बारीकी से अध्ययन शुरू कर दिया। उन्होंने बंगाली के व्याकरण को पढ़ना शुरू कर दिया, उन्होंने दृढ निश्चय किया कि वे बंगाली में केवल पास ही नहीं होंगे बल्कि सबसे ज्यादा अंक लायेंगे।

सुभाष ने बंगाली पढ़ने में अपना ध्यान केन्द्रित किया और कुछ ही समय में उसमे महारथ हासिल कर ली। धीरे धीरे वार्षिक परीक्षाये निकट आ गई।

सुभाष की कक्षा के विद्यार्थी सुभाष से कहते – भले ही तुम कक्षा में प्रथम आते हो मगर जब तक बंगाली में तुम्हारे अंक अच्छे नहीं आते, तब तक तुम सर्वप्रथम नहीं कहलाओगे।

वार्षिक परीक्षाएं ख़त्म हो गई। सुभाष सिर्फ कक्षा में ही प्रथम नहीं आये बल्कि बंगाली में भी उन्होंने सबसे अधिक अंक प्राप्त किये। यह देखकर विद्यार्थी और शिक्षक सभी दंग रहे गये।

उन्होंने सुभाष से पूछा – यह कैसे संभव हुआ ?

तब सुभाष विद्यार्थियों से बोले – यदि मन ,लगन ,उत्साह और एकग्रता हो तो, इन्सान कुछ भी हाँसिल कर सकता है।

👉 नारी सम्बन्धी अतिवाद को अब तो विराम दें (भाग १)

कुछ समय से नर- नारी के सान्निध्य का प्रश्न अतिवाद के दो अन्तिम सिरों के साथ जोड़ दिया गया है। एक ओर तो नारी को इतनी आकर्षक चित्रित किया गया कि उसकी माँसलता को ही सृष्टि की सबसे बड़ी विभूति सिद्ध कर दिया गया। कला ने नारी के अंग- प्रत्यंग की सुडौलता को इतना सराहा कि सामान्य भावुक व्यक्ति यह सोचने के लिए विवश हो गया कि ऐसी सुन्दरता को काम तृप्ति के लिए प्राप्त कर लेना जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। गीत, काव्य, संगीत, नृत्य, अभिनय, चित्र, मूर्ति आदि कला के समस्त अंग जब नारी की माँसलता और कामुकता को ही आकाश तक पहुँचाने में जुट जाये, तो बेचारी लोकवृत्ति को उधर मुड़ना ही पड़ेगा। इस कुचेष्टा का घातक दुष्परिणाम सामने आया। यौन प्रवृत्तियाँ भड़की, नर- नारी के बीच का सौजन्य चला गया और एक दूसरे के लिए अहितकर बन गये। यौन रोगों की बाढ़ आई, शरीर और मन जर्जर हो गया, पीढ़ियाँ दुर्बल से दुर्बलतर होती चली गई, मनःस्थिति उस कुचेष्टा के चिन्तन में तल्लीन होने के कारण कुछ महत्त्वपूर्ण चिन्तन कर सकने में असमर्थ हो गयी। तेज, ओज, व्यक्तित्व, प्रतिभा, मेधा, शौर्य और वर्चस्व जो कुछ महान था, वह सब कुछ इसी कुचेष्टा की वेदी पर बलि हो गया। दुर्बल काया और मनःस्थिति को लेकर दीन- हीन और पतित- पापी ही बन सकता था, सो बनता चला गया। नारी को रमणी सिद्ध करके तुच्छ सा मनोरंजन भले पाया हो, पर उससे जो हानि हुई उसकी कल्पना कर सकना भी कठिन है। जिनने भी मानवीय प्रवृत्तियों को इस पतनोन्मुख दिशा में मोड़ने के लिये प्रयत्न किया है वस्तुतः एक दिन वे मानवीय विवेक और ईश्वरीय न्याय की अदालत में अपराधियों की तरह खड़े किये जायेंगे।
 
अतिवाद का एक सिरा यह है कि कामिनी, रमणी, वैश्या आदि बना कर उसे आकर्षण का केन्द्र बनाया गया। अतिवाद का दूसरा सिरा है कि उसे पर्दे, घूँघट की कठोर जंजीरों में जकड़ कर अपंग सदृश्य बना दिया गया, उस पर इतने प्रतिबन्ध लगाये गये जितने बन्दी और पशु भी सहन नहीं कर सकते। जेल के कैदियों को थोड़ा घूमने- फिरने की, हँसने- बोलने की आजादी रहती है। पर घर की छोटी सी कोठरी में कैद नववधू के लिए परिवार के छोटी आयु वालों के सामने ही बोलने की छूट है। बड़ी आयु वालों से तो उसे पर्दा ही करना होता है। न उनके सामने मुँह खोला जा सकता है और न उनसे बात की जा सकती है। पर्दा सो पर्दा, प्रथा सो प्रथा, प्रतिबन्ध सो प्रतिबन्ध। इससे न्याय, औचित्य और विवेक के लिए क्यों गुंजायश छोड़ी जाय। पशु को मुँह पर नकाब लगाकर नहीं रहना पड़ता। वे दूसरों के चेहरे देख सकते हैं और अपने दिखा सकते है। जब मर्जी हो चाहे जिसके सामने अपनी टूटी- फूटी वाणी बोल सकते हैं। पर नारी को इतने अधिकार से भी वंचित कर दिया गया।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Where is God?

Many of us feel an inner urge to find God. We also make several attempts, but find no clues. He is said to be Omnipresent, so He should be everywhere? Then why, despite our devoted efforts, we can’t find him anywhere? Some people spend lot of wealth and all their time in religious rituals and activities aimed at HIS search but remain in the void. Some get frustrated and lose faith in HIS existence. Who is right? What is the truth?

Well, the universal fact is – God is Eternal, Omnipresent. The flaw is in your approach. You can’t find him by worldly attempts or by any ascetic means either. It is only a pure heart full of love that can feel and find God. Learn to love the soul, love every one, every thing around you. You don’t have to renounce the world and go to the forests or high mountaintops, or spend time and resources in any sacrament to experiences HIS light. HE is everywhere, so rest assured, HE is also near you, within you. Where? Within your soul. Have you ever bothered to listen to the voice of your soul? No! This is why you are not able to experience God.

Just think, who governs your life force, who inspires auspicious sentiments or motivate you for noble deeds? Whose voice is that which warns you against doing something wrong or harming someone? You may ignore that inner voice. But that is the voice of God indwelling in your inner self. It is only in the deeper depths of your own self that you can find HIM.

📖 Akhand Jyoti, Apr 1944

👉 Chintan Ke Kshan चिंतन के क्षण 13 June 2020

■ सुख और दुःख किन्हीं परिस्थितियों का नाम नहीं, वरन् मन की दशाओं का नाम है। संतोष और असंतोष वस्तुओं में नहीं, वरन् भावनाओं और मान्यताओं से होता है। इसलिए उचित यही है कि सुख-शान्ति की परिस्थितियाँ ढूँढते-फिरते रहने की अपेक्षा अपने दृष्टिकोण को ही परिमार्जित करने का प्रयत्न करें। इस प्रयत्न में हम जितने ही सफल होंगे अंतःशक्ति के उतने ही निकट पहुँच जायेंगे।

□ अपने प्रति उच्च भावना रखिए। छोटे से छोटे काम को भी महान् भावना से करिये। बड़ी से बड़ी विपत्ति में भी निराश न होइए। आत्म विश्वास एवं आशा का प्रकाश लेकर आगे बढ़िए। जीवन के प्रति अखण्ड निष्ठा रखिए और फिर देखिए कि आप एक स्वस्थ, सुंदर, सफल एवं दीर्घजीवन के अधिकारी बनते हैं या नहीं।

◆ आनंद के लिए किन्हीं वस्तुओं या परिस्थितियों को प्राप्त करना आवश्यक नहीं और न उसके लिए किन्हीं व्यक्तियों के अनुग्रह की आवश्यकता है। वह अपनी भीतरी उपज है। परिणाम में संतोष और कार्य में उत्कृष्टता का समावेश करके उसे कभी भी, कहीं भी और कितने ही बड़े परिमाण में  पाया जा सकता है।

◇ सच्ची लगन से काम करने वाले किसी बाह्य वातावरण अथवा परिस्थिति को काम में विघ्न डालने वाला बताकर कार्य से मुख मोड़ने का बहाना नहीं निकालते, बल्कि घोरतम विपरीत परिस्थितियों में भी अंगद के चरण की तरह अपने कर्त्तव्य पर अटल रहते हैं। उन्हें छोटी-मोटी परिस्थितियाँ काम से उखाड़ नहीं पातीं।

□ अनेक लोग पीठ पीछे बुराई करने और सम्मुख आवभगत दिखलाने में बड़ा आनंद लेते हैं। समझते हैं कि संसार इतना मूर्ख है कि उनकी इस द्विविध नीति को समझ नहीं सकता। वे इस दोहरे व्यवहार पर भी समाज में बड़े ही शिष्ट एवं सभ्य समझे जाते हैं। अपने को इस प्रकार बुद्धिमान् समझना बहुत बड़ी मूर्खता है। एक तो दूसरे को प्रवंचित करना स्वयं ही आत्म-प्रवंचना है, फिर बैर प्रीति की तरह वास्तविकता तथा कृत्रिमता छिपी नहीं रह सकती।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य