रविवार, 24 नवंबर 2019

👉 मन और आत्मा

मन: कल तो में भाग मिल्खा भाग फिल्म देखकर आया, उस फिल्म के किरदार ने मेरे अंदर बहुत ही अधिक ऊर्जा भर दी है, और अब मुझमे इतना साहस आ चुका है कि में कुछ भी करके दिखा सकता हूँ।

मन घर आया और फिल्म की ऊर्जा के विश्वास पर अपने संकल्पो को पूरा करने लग गया, परन्तु दो दिन बाद ही उसकी ऊर्जा ध्वस्त हो गयी।

उस समय उसने सोचा की मुझे किसी और का मोटिवेशनल वीडियो देखना चाहिए। उसने you tube पर वीडियो देखे और फिर से उसने स्वयं के समस्त संकल्पो को मजबूत कर लिया और फिर से तैयारी शुरू कर दी। लेकिन वो फिर से हार गया।

परन्तु इस बार मन स्वयं की आत्मा से पूछने लगा आखिर में गलती क्या कर रहा हूँ।

आत्मा का जवाब: आप भाग मिल्खा भाग फिल्म देखकर आकर्षित तो हुए, किन्तु आपके आकर्षण का कारण उस  फिल्म के किरदार का अभिनय था। आपने बहुत ही कम समय में आपने आदर्श को चुन लिया

इसलिए  वो विचार आपकी "जीवात्मा" तक नही  पहुच सके

मन: है महान आत्मा अब मुझे क्या करना चाहिए। जिससे की मेरे विचार "आकर्षण के स्थान पर विवेक" को महत्व दें।
            
आत्मा: मेरे मित्र हमेशा उन्ही को सुनो उन्ही को अपनी अभिप्रेरणा बनाओ, जिनके पास "विचारो की सिद्धि हो"। जो पूजनीय है जिनका व्यक्तित्व अलौकिक है ऐसे लोग दुनिया में बहुत कम है जैसे कि👇👇

राम कृष्ण परमहंस, समर्थगुरु रामदास, प. श्रीराम शर्मा आचार्य, स्वामी विवेकानंद, महर्षि अरविन्द, महर्षि रमण आदि।

👉 निसंदेह: दुनिया में बहुत सारे विचारक है, हो सकता है वो श्रेष्ठ वक्ता भी हो, लेकिन वे लोग पूजनीय हो ये जरूरी नहीं।

👉 सद्गुरु का द्वार

चाहत सच्ची हो तो गहरी होती है, और यदि गहरी हो तो पूरी होती है। एक बूढ़ा साधु-भीख मांगने निकला था। बूढ़े होने के कारण उसे आँख से कम नजर आता था। सो वह अनजाने ही एक आश्रम के पास जाकर खड़ा हो गया और आवाज लगायी। किसी ने उससे कहा; आगे बढ़। यह मकान नहीं, आश्रम है, सद्गुरु का द्वार है। और जिन सद्गुरु का यह द्वार है, उन्होंने भी स्थूल शरीर का त्याग कर दिया है।
  
साधु ने सिर उठाकर आश्रम पर एक नजर डाली। उसके हृदय में भक्ति की ज्वाला जल उठी। कोई उसके अन्तर्मन में बोला; देह त्यागने से क्या हुआ, सद्गुरु कभी मरा नहीं करते। उनकी अविनाशी चेतना सदा ही उनकी तपस्थली में व्याप्त रहती है। बस यही आखिरी द्वार है। सद्गुरु के द्वार पर आकर फिर अब कहाँ जाना?
  
उसके भीतर एक संकल्प सघन हो गया। अडिग चट्टान की भाँति उसके हृदय ने कहा; यहाँ से खाली हाथ वापस नहीं जाऊँगा। जो सद्गुरु के द्वार, देहरी तक आकर भी खाली हाथों लौट गए, उनके भरे हाथों का भी क्या मोल है? बस इन्हीं अविचलित भावों के साथ वह आश्रम के द्वार पर ठहर गया। उसने अपने खाली हाथों को आकाश की ओर फेंक दिया। उसके दिल की प्यास चरम पर पहुँच गयी। और उसका अन्तःकरण करुण रव में गा उठा- ‘एक तुम्हीं आधार सद्गुरु।’
  
सद्गुरु के द्वार आश्रम वालों के अपमान, तिरस्कार के झंझावातों को सहते हुए उसके दिन बीतने लगे। पखवाड़े-मास बीत गए। वर्ष भी बीते। इस तरह कितने साल गुजरे उसने गिनती भी नहीं की। अब तो उसके जीवन की मियाद भी पूरी हो गयी थी। पर अन्तिम क्षणों में उसे आश्रमवासियों ने नाचते देखा। उसकी आँखें ज्योति की स्रोत बन गयी थीं। उसके बूढ़े शरीर से प्रकाश झर रहा था। उसने मरने से पहले एक व्यक्ति को अपनी अनुभूति बतायी, सद्गुरु के द्वार से कोई खाली नहीं जाता। केवल अपने को मिटाने का साहस चाहिए। जो स्वयं को मिटा देता है, वह सद्गुरु के द्वार से सब कुछ पा लेता है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ १३०

👉 आत्मचिंतन के क्षण 24 Nov 2019

★ सुख- दुःख हर तरह की परिस्थिति में सन्तुष्ट रहने को सन्तोष कहते हैं। कुसंस्कारों के परिशोधन एवं सुसंस्कारों के अभिवर्द्धन के लिए स्वेच्छापूर्वक जो कष्ट उठाया जाता है- वह तप कहलाता है। स्वयं के अध्ययन- विश्लेषण के लिए किया जाने वाला अध्यवसाय स्वाध्याय है। अपने चित्त को श्रद्धापूर्वक परमात्मा के दिव्य स्वरूप में नियोजित करना ईश्वर प्राविधान कहलाता है।

◆ संकीर्ण स्वार्थपरता एवं आसुरी जीवन दर्शन को निरस्त करने के लिए आवश्यक है कि चिन्तन की उत्कृष्टता ,स्वभावगत शालीनता और व्यवहार की आदर्शवादिता के दूरगामी सत्परिणामों को तर्क, प्रमाण और उदाहरणों सहित समझाया जाय।   

□  भगवान् पत्र, पुष्पों के बदले नही, भावनाओं के बदले प्राप्त किये जाते हैं और वे भावनाएँ आवेश, उन्माद या कल्पना जैसी नहीं, वरन् सच्चाई की कसौटी पर खरी उतरने वाली होनी चाहिए। उनकी सच्चाई की परीक्षा मनुष्य के त्याग, बलिदान, संयम, सदाचार एवं व्यवहार से होती है। 
 
■  आदर्शवादी और उत्कृष्टता वादी चिंतन के साथ जब गायत्री उपासना की जाती है, तो उसे सोने में सुगन्ध मिलने की तरह सराहा जाता है। इस सम्बन्ध में अपना दृष्टिकोण साफ रखना चाहिए कि उपासना का जितना महत्त्व है, उतना ही, बल्कि उससे भी कहीं अधिक महत्त्व साधना का है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Gayatri Sadhna truth and distortions (Part 10)

Q.13. What are the basic aims of Gayatri Sadhana?

Ans. The science of Gayatri Upasana has been developed to help human beings in ridding themselves of base animal instincts and replace them with the divine virtues. Adherence to the laws of this science provides a Sadhak permanent relief from the shackles of unhappiness and misery.

Q.14. What is the relevance of Gayatri Upasana in the modern society?

Ans. During the last few decades concepts of religion have been increasingly distorted by vested interests. The deliberately induced misconceptions about religion led to the miraculous achievements in the field of material sciences, created an environment wherein people began to doubt the utility of spirituality and became sceptic about the very existence of God. Many of the neo-literates began to regard religion as superstition to the extent that being an atheist became a symbol of intellectualism.
              
Now, on the peak of its achievements, science has failed to achieve the wellbeing of the society as a whole, and people have begun to revise their attitude about spirituality. It is being realised that for restoring ethical and the moral values, spirituality is as important as the material aspects of life. Gayatri Sadhana is within the reach of common man, Its methodology is easy to adopt, it is well defined and is easily understood. With the help of Gayatri Sadhana, therefore, one can make remarkable progress in imbibing basic ethical and moral values with minimal effort.


✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 24