बुधवार, 18 अप्रैल 2018

👉 गलतियाँ और उनके सुधार

🔷 तैरना सीखने वाला डूब जाने के सिवाय और सब गलतियाँ कर सकता है। तब वह अचानक किसी दिन देखता है कि उसे तैरना आ गया। इसलिए गलतियाँ होती है तो निराश होने की आवश्यकता नहीं है। जिस तरह बिना गलतियाँ किये तैरना नहीं आता उसी तरह गलतियों के बिना जिन्दगी जीना भी नहीं सीखा जाता।

🔶 मनुष्य अपूर्ण है इसलिए उसके कार्यों में गलती हो सकती है। इसमें शर्म की कोई बात नहीं है शर्म की बात यह है कि गलती को सही साबित करने और उस पर अड़े रहने की कोशिश की जाय। गलती को ढूँढ़ना मानना और सुधारना किसी मनुष्य के बड़प्पन का कारण हो सकता है। जो सीखने और सुधारने में लगा हुआ है वही एक दिन उस स्थिति को पहुँचेगा जिसमें त्रुटियों और बुराइयों से छुटकारा मिलता है।

📖 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 भगवान का जवाब

🔶 ये कहानी एक ऐसे व्यक्ति की है जो एक Busniss man था लेकिन उसका business डूब गया और वो पूरी तरह hopeless हो गया। अपनी life से बुरी तरह थक चुका था। अपनी life से frustrate होकर वो suicide करना चाहता था।

🔷 एक दिन परेशान होकर वो जंगल में गया और जंगल में काफी देर अकेले बैठा रहा। कुछ सोचकर भगवान से बोला – मैं हार चुका हूँ, मुझे कोई एक वजह बताइये कि मैं क्यों ना हताश होऊं, मेरा सब कुछ खत्म हो चुका है। मैं क्यों ना frustrate होऊं? Please help me God……………………..

🔶 भगवान का जवाब तुम जंगल में इस घास और बांस के पेड़ को देखो- जब मैंने घास और इस बांस के बीज को लगाया। मैंने इन दोनों की ही बहुत अच्छे से देखभाल की। इनको बराबर पानी दिया, बराबर Light दी।

🔷 घास बहुत जल्दी बड़ी होने लगी और इसने धरती को हरा भरा कर दिया लेकिन बांस का बीज बड़ा नहीं हुआ। लेकिन मैंने बांस के लिए अपनी हिम्मत नहीं हारी।

🔶 दूसरी साल, घास और घनी हो गयी उसपर झाड़ियाँ भी आने लगी लेकिन बांस के बीज में कोई growth नहीं हुई। लेकिन मैंने फिर भी बांस के बीज के लिए हिम्मत नहीं हारी।
तीसरी साल भी बांस के बीज में कोई वृद्धि नहीं हुई, लेकिन मित्र मैंने फिर भी हिम्मत नहीं हारी।

🔷 चौथे साल भी बांस के बीज में कोई growth नहीं हुई लेकिन मैं फिर भी लगा रहा। पांच साल बाद, उस बांस के बीज से एक छोटा सा पौधा अंकुरित हुआ……….. घास की तुलना में ये बहुत छोटा था और कमजोर था लेकिन केवल 6 महीने बाद ये छोटा सा पौधा 100 फ़ीट लम्बा हो गया।

🔶 मैंने इस बांस की जड़ को grow करने के लिए पांच साल का समय लगाया। इन पांच सालों में इसकी जड़ इतनी मजबूत हो गयी कि 100 फिट से ऊँचे बांस को संभाल सके। जब भी तुम्हें life में struggle करना पड़े तो समझिए कि आपकी जड़ मजबूत हो रही है। आपका संघर्ष आपको मजबूत बना रहा है जिससे कि आप आने कल को सबसे बेहतरीन बना सको।

🔷 मैंने बांस पर हार नहीं मानी, मैंने तुम पर भी हार नहीं मानूंगा, किसी दूसरे से अपनी तुलना(comparison) मत करो घास और बांस दोनों के बड़े होने का time अलग अलग है दोनों का उद्देश्य अलग अलग है।

🔶 तुम्हारा भी समय आएगा। तुम भी एक दिन बांस के पेड़ की तरह आसमान छुओगे। मैंने हिम्मत नहीं हारी, तुम भी मत हारो……………………..

🔷 Dear friends, अपनी life में struggle से मत घबराओ, यही संघर्ष हमारी सफलता की जड़ों को मजबूत करेगा। लगे रहिये, आज नहीं तो कल आपका भी दिन आएगा। यही इस कहानी की शिक्षा है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 19 April 2018


👉 आज का सद्चिंतन 19 April 2018


👉 आस्तिकता

🔶 मित्रो ! आस्तिकता सच्ची शक्ति, सच्चा जीवन तथा सच्चा धर्म है। रामायण में श्रद्घा को भवानी और शिव को विश्वास की उपमा दी है और कहा है कि इन दोनों के बिना हृदय में विराजमान होते हुए भी इष्ट देव का दर्शन, अनुग्रह नहीं होता। इससे प्रकट है कि जितनी किसी देवता या मंत्र में शक्ति है उसकी तुलना में सघन श्रद्घा किसी प्रकार कम नहीं पड़ती। किसी कार्य की गरिमा के प्रति श्रद्घा रखते हुए सच्चे मन और पूरे परिश्रम के साथ जुट जाना सफलता का सुनिश्चित पथ प्रशस्त करना है।

🔷 शरीर में सत्कर्म, मन में सद्विचार और अन्त:करण में सदभाव की प्रेरक शक्ति को गायत्री कह सकते हैं। कुंडलिनी आद्यशक्ति है। कुशल गुरु के मार्गदर्शन में संभव हुए उसके उत्थान से ईश्वर दर्शन, आत्मबल जैसी जिज्ञासाएँ तो शांत होती ही हैं; शरीर, मन, प्राण और भावनाओं में ऐसे उच्चस्तरीय परिवर्तन होते हैं कि व्यक्ति साधारण न रहकर असाधारण स्तर का बन जाता है। वह नाना प्रकार की सिद्घियों और विभूतियों का स्वामी हो जाता है। उसकी बात लोग ध्यान से सुनते हैं। उसकी वाड़ी में ओज और चेहरे पर तेज आ जाता है। उसके हर कार्य में सुन्दरता और सुव्यवस्था झलकने लगती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Refinement of human nature and feelings

🔷 A feeling of togetherness and a sense of being close and connected to each other (as if belonging to the same family) will make individuals think about and help each other in every possible way. These days, my mind (is in a similar mood and) is passionately yearning to shape the character of all my spiritual kith and kin in such a glorious way that anyone who happens to see that character makeover will really get amazed and also get convinced that the Yug Nirman Yojana (i.e. Gayatri Pariwar’s mega-plan of creating a new era of bright future for all) is not a flight of fancy but a very simple and totally workable method which is neither difficult nor impossible to adopt and apply far and wide.

🔶 There is a widespread popular belief that the nature of every individual is firmly established right from birth and cannot be changed or remodeled afterwards. I wish to prove this wrong. I wish to transform the nature of my kith and kin. I’m about to start that process of extraordinary transformation in my spiritual laboratory. Physical science is bringing about so many amazing transformations in the material world. Knowledge too can definitely be hoped to bring about promising transformation in man’s inner world, i.e. his nature!

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Yug Nirman Yojana: Darshan, swaroop va karyakram 66:3.46

👉 स्वभाव तथा भावना का परिष्कार

🔷 परिवार की आत्मीयता की भावना जब बढ़ती है तो मनुष्य अपनों के लिए बहुत कुछ सोचता और करता है। हमारा मन इन दिनों अपने आत्मीयजनों को ऐसे बनाने के लिए मचल रहा है कि इस निर्माण को देखकर देखने वाले आश्चर्यचकित रह जायें और यह अनुभव करें कि युग-निर्माण योजना कोई शेखचिल्ली की कल्पना नहीं, वरन् एक अत्यंत सरल और पूर्ण व्यावहारिक पद्धति है जिसे अपनाया और व्यापक बनाया जा सकना न तो कठिन है और न असंभव।

🔶 समझा यह जाता है कि लोगों का स्वभाव जन्म से ही बना आता है, उसे बदला और बनाया नहीं जाता। इस धारणा को भ्रान्त सिद्ध करने का हमारा विचार है। हम अपनों को बदलना चाहते हैं। अपनी प्रयोगशाला में हम बबूलों को चन्दन बनाने की तैयारी कर रहे हैं। विज्ञान के द्वारा भौतिक जगत में इतने आश्चर्यजनक परिवर्तन हो रहे हैं तो ज्ञान के द्वारा मनुष्य की अन्त:स्थिति में भी आशाजनक परिवर्तन की आशा की जा सकती है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग निर्माण योजना - दर्शन, स्वरूप व कार्यक्रम-६६ (६.१०)

👉 Diksha

🔶 Impressed by the renunciation of a saint, a king, too, recieved diksha (spiritual initiation) from him. Many thousands had already been initiated by the saint. Seeing their king, too, among the initiates, the subjects went to him and said: “ Great king, now you are our Gurubhai; so do not damand tax from us”. Caught on the horns of a dilemma, the king remitted their tax dues. Consequently, the trasury began to deplete fast. The whole system went into disorder. People stopped doing any work and started living off the stored money.The king was very  perturbed at this situation and sought his guru’s adivice.
 
🔷 The guru after hearing the full details said: “If the spirit of diksa is not implemented in actual conduct, it remains meaningless. Besides being an initiated disciple, you should also be a pragmatic king. Those whom you consider your gurubhais are all lazy shirkers. You must run your administration in accordance with the rules and regulations of your regime, otherwise you, too, will be a sinner like them and also be guilty of the impending anarchy”. The king began to rule sternly. The new order with well oiled coordination  soon put the wheels of administration back on the rails.

📖 From Akhand Jyoti

👉 साधना

🔷 साधना किसे कहते हैं आपको मालूम नहीं? आप हनुमान जी की पूजा करते हैं, सन्तोषी माता की पूजा करते हैं। यह मन्त्र है, न यन्त्र है, न पूजा है। आप हनुमान जी या सन्तोषी माता को साधते हैं। अरे पहले अपने आपको तो साधिये न, पर यह जो जादूगरी आप करते हैं, वह बदमाशी के सिवा कुछ नहीं है। अगर आप पूजा- उपासना करते हैं, तो ठीक, यह आपकी मर्जी है, पर यह न तो कोई मन्त्र जप है, न भजन है, यह मात्र धूर्तगीरी है। पूजा के नाम पर यदि आप ऐसी बदमाशी करते हैं तो आपकी मर्जी, पर इससे कुछ होने वाला नहीं है। पहले आप समर्पण करना सीखिये, यह मोटी- मोटी बातें थीं जो हमने किसी तरह से आपसे कह दीं।

🔶 हमारे गुरुजी की यही मर्जी है कि हम आपमें से- हर आदमी में से ब्राह्मण तथा सन्त को जिन्दा करें और हम यही चाहते हैं कि अगर हमारे अन्दर बल हो तथा आपके अन्दर ब्राह्मणत्व तथा साधु हो तो वह जिन्दा हो जाए। इस विदाई के अवसर पर यही कहकर हम आप लोगों को विदा कर रहे हैं। मित्रों, गुरुजी ने हमेशा दिया है, आगे भी देते रहेंगे, शर्त एक ही है कि आप अपनी ब्राह्मण तथा सन्त की प्रवृत्ति जिन्दा करें। आप जाइये एवं अपने- अपने कामों में जुट जाइये।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 वाङमय- नं 68 पेज 1.13

👉 गुरुगीता (भाग 89)

👉 गुरुभक्ति ही साधना, वही है सिद्धि

🔷 इस प्रसंग में एक बड़ी प्यारी कथा है। यह कथा उत्तर भारत के सुविख्यात सन्त बाबा नीम करौरी व उनके विदेशी शिष्य रिचर्ड के बारे में है। इन रिचर्ड को बाबा ने अपने शिष्य के रूप में अपनाया था और नाम दिया था रामदास। इन रामदास में अपने गुरु के प्रति भक्ति तो थी, किन्तु साथ कहीं सिद्धि-शक्ति की आकाक्षा भी छुपी थी। एक बार वह एक स्वामी जी के साथ दक्षिण भारत की यात्रा कर रहे थे। बातों ही बातों में उन्होंने अपनी सिद्धि-शक्ति की चाहत के बारे में स्वामी जी को बताया। स्वामी जी ने उन्हें एक शक्तिशाली शिव मंत्र की दीक्षा दी और बताया कि इस मंत्र का जाप करने से वह अपार सम्पत्ति व शक्ति का स्वामी हो जायेगा। रामदास को शक्ति लोभ तो था ही सो वह लगातार कई हफ्ते तक मंत्र का जाप करते रहे। इस मंत्र जाप के प्रभाव से शरीर के बाहर होने व सूक्ष्म शरीर से भ्रमण करने की शक्ति मिल गयी।
  
🔶 बस फिर क्या था रामदास का कौतुकी मन जाग उठा और सूक्ष्म शरीर से निकल कर भ्रमण करने लगे। इसमें उन्हें आनन्द आने लगा। इस क्रम में उनकी यात्रा अन्य सूक्ष्म लोक-लोकान्तरों में भी होने लगी। एक बार जब वह अपनी इस प्रक्रिया के दौरान किसी अन्य लोक में पहुँचे, तो वहाँ उन्हें अपने सद्गुरु बाबा नीम करौरी दिखाई दिये। रामदास को अचरज भी हुआ और हर्ष भी। वे हर्षोन्माद में बाबा नीम करौरी की ओर दौड़ पड़े। बाबा उस समय अपने तख्त पर एक कम्बल ओढ़े बैठे थे। उनके आने पर उन्होंने कम्बल से अपना मुँह ढक लिया और तीन बार ऐसी फूँक मारी जैसे कि कोई मोमबत्ती बुझा रहे हों। उनकी इस फूँक से रामदास को महसूस हुआ कि जैसे हर फूँक के साथ उनका शरीर फूलता जा रहा है, मानो उनकी किसी आन्तरिक नली में हवा भरी जा रही हो। तीसरी बार की फूँक के बाद रामदास ने स्वयं को अपने स्थूल शरीर में पाया और वह अपने उसी स्थान पर थे, जहाँ उनकी नियमित साधना हो रही थी। लेकिन इस समूची प्रक्रिया में एक अचरज घटित हुआ कि दक्षिण भारत की यात्रा में स्वामी जी ने उन्हें जो मंत्र दिया था, उसकी शक्ति समाप्त हो गयी थी। यही नहीं उनके मन में उस मंत्र के जपने की इच्छा भी मर गयी थी।
  
🔷 इस .... तमाशे से उनके मन में थोड़ी उलझन भी पैदा हुई और वह इस उलझन को सुलझाने के लिए अपने गुरुदेव बाबा नीम करौरी के पास गये। उन्हें आते हुए देखकर बाबा हँस पड़े और बोले-चल बता कैसी चल रही है तेरी साधना और कैसा है तू? उनके पूछने से कुछ ऐसा लग रहा था, जैसे वे कुछ भी जानते ही न हों। हालाँकि रामदास को मालूम था कि अन्तर्यामी गुरुदेव को सब कुछ ज्ञात है। फिर भी उन्होंने स्वामी जी के मंत्र की कथा, अपनी साधना और सूक्ष्म भ्रमण के अपने अनुभव के बारे में उन्हें ब्योरेवार बताया। साथ ही यह भी बताया कि किस तरह गुरुदेव बाबा नीम करौरी ने उनकी सारी शक्ति समाप्त कर दी।
  
🔶 रामदास के इस कथन पर बाबा बोले-बेटा! शिष्य तो बच्चा होता है, उसकी अनेकों चाहतें भी होती हैं और  ये जो चाहते हैं—वह कभी ठीक होती हैं, तो कभी निरी बचकानी। गुरु को इन सब पर ध्यान रखना पड़ता है कि कहीं उसका शिष्य भटक न जाये। कहीं उसे कोई नुकसान न हो। तुम्हारे साथ जो हुआ, वह तुम्हें नुकसान से बचाने के लिए हुआ। तुम्हारी साधना अभी कच्ची है। तुम्हारे सूक्ष्म शरीर में भी अभी पर्याप्त ऊर्जा नहीं है। ऐसी स्थिति में सूक्ष्म शरीर से भ्रमण करने पर अन्य लोकों के निवासी तुम्हें नुकसान पहुँचा सकते हैं। यहाँ तक कि तुम्हें अपने यहाँ कैदकर सकते हैं। ऐसी स्थिति आने पर तुम्हारे सूक्ष्म शरीर का सम्बन्ध स्थूल शरीर से टूट जायेगा और न केवल तुम्हारी मृत्यु हो जायेगी, बल्कि तुम्हारी तप-साधना भी अधूरी रह जायेगी। तुम्हारे साथ मैंने जो कुछ भी किया, वह तुम्हें इसी अप्रत्याशित स्थिति से बचाने के लिए किया। अपने सद्गुरु की इस कृपा को अनुभूत करके रामदास की आँखें छलक आयीं। सचमुच ही सद्गुरु के बिना भला और कौन सहारा है। इसलिए गुरुगीता के प्रत्येक  मंत्र का सार यही है कि शिष्य को सतत अपने गुरुदेव का ध्यान व स्मरण करते रहना चाहिए। इस क्रम में ध्यान की अन्य विधियाँ भी हैं, जिसकी चर्चा अगले मंत्र में की गई है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 134

👉 बुरी आदत:-

एक अमीर आदमी अपने बेटे की किसी बुरी आदत से बहुत परेशान था। वह जब भी बेटे से आदत छोड़ने को कहते तो एक ही जवाब मिलता, “अभी मैं इतना छोटा ह...