सोमवार, 18 मई 2020

👉 कलंक और आक्रमण से निष्कलंक की सुरक्षा (भाग २)

ईसा को अपराधी ठहराया और शूली पर लटकाया गया। सुकरात को जहर का प्याला पीना पड़ा। दयानन्द को विष दिया गया। गाँधी को गोली से उड़ाया गया। व्याध ने कृष्ण के प्राण हरण किये। गुरु गोविंद सिंह के अबोध बालकों को जल्लादों के सुपुर्द किया गया। मीरा निर्दोष होते हुए भी उत्पीड़न सहती रहीं। जहाँ तक अपराधों, आक्रमणों और प्रताड़नाओं का सम्बन्ध हैं वहाँ तक जो जितना उच्चस्तरीय आत्मवेत्ता हुआ है उसे उतना ही अधिक भार सहन करना पड़ा है। भगवान बुद्ध की जीवन गाथा पढ़ने से पता चलता है कि पुरातन पंथी और ईर्ष्यालु उनके प्राणघाती शत्रु बने हुए थे। उन्होंने अंगुलिमाल को आक्रमण के लिए उकसाया था। चरित्र हनन के लिए ढेरों दुरभिसंधियाँ रची थी। समर्थकों में अश्रद्धा उत्पन्न करने के लिए जो षड़यन्त्र रचे जा सकते थे उसमें कुछ कसर नहीं छोड़ी गई थी। गाँधी को विरोध होता रहा। उन पर पैसा बटोरने और हड़पने का लांछन लगाने वालों की संख्या आरम्भ में तो अत्यधिक थी, प्रताप बढ़ने के बाद ही वह घटने लगी थी। अन्ततः उन्हें गोली से ही उड़ा दिया गया। मध्यकाल में सन्तों में से प्रायः प्रत्येक को शत्रुओं की प्रताड़नाएं सहनी पड़ी हैं। आद्य शंकराचार्य, चैतन्य महाप्रभु, नामदेव, एकनाथ, तुकाराम, ज्ञानेश्वर, रामदास, गुरु गोविंदसिंह, बन्दा वैरागी आदि इसके जी-जागते प्रमाण हैं।

संसार के सुधारकों में प्रत्येक को प्रायः ऐसे ही आक्रमण न्यूनाधिक मात्रा में सहने पड़े है। संगठित अभियानों को नष्ट करने के लिए कार्यकर्त्ताओं में फूट डालने, बदनाम करने, बल प्रयोग से आतंकित करने, जैसे प्रयत्न सर्वत्र हुए है। ऐसा क्यों होता है यह विचारणीय हैं। सुधारक पक्ष को अवरोधों का सामना करने पर उनकी हिम्मत टूट जाने, साधनों के अभाव से प्रगति क्रम शिथिल या समाप्त हो जाने जैसे प्रत्यक्ष खतरे तो हैं, किन्तु परोक्ष रूप से इसके लाभ भी बहुत हैं। व्यक्ति की श्रद्धा एवं निष्ठा कितनी सच्ची और कितनी ऊँची हैं इसका पता इसी कसौटी पर कसने से लगता हैं कि आदर्शों का निर्वाह कितनी कठिनाई सहन करने तक किया जाता रहा। अग्नि तपाये जाने और कसौटी पर कसे जाने से कम में, सोने के खरे-खोटे होने का पता चलता ही नहीं। आदर्शों के लिए बलिदान से ही महा-मानवों की अन्तःश्रद्धा परखी जाती है और उसी अनुपात से उनकी प्रामाणिकता को लोक-मान्यता मिलती हैं। जिसे कोई कठिनाई नहीं सहनी पड़ी ऐसे सस्ते नेता सादा सन्देह और आशंका का विषय बने रहते हैं। श्रद्धा और सहायता किसी पर कभी पर तभी बरसती हैं जब वह अपनी निष्ठा का प्रभाव प्रतिकूलताओं से टकरा कर प्रस्तुत करता हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति अगस्त 1979 पृष्ठ 53

👉 यदि कोई आप को महत्त्व न दे, तो भी आप दुखी न हों

इस संसार में व्यक्ति अकेला नहीं जी  सकता, क्योंकि उसमें इतना शक्ति सामर्थ्य नहीं है, कि वह अपने सारे काम स्वयं सुख पूर्वक कर लेवे। उसे समाज का सहयोग तो लेना ही पड़ता है। इसीलिए मनुष्य सामाजिक प्राणी कहलाता है। आपके परिवार के लोग, आपके संबंधी रिश्तेदार, आपके मित्र, और देश विदेश के लोग भी आपको अनेक क्षेत्रों में सहयोग देते हैं।
     
जब आप समाज में एक दूसरे के साथ व्यवहार करते हैं, तो आपको एक दूसरे को सम्मान या महत्त्व भी देना होता है।
     
इस सम्मान या महत्त्व देने के व्यवहार से परस्पर प्रेम संगठन विश्वास आनंद उत्साह आदि गुणों की वृद्धि होती है। जब आप किसी दूसरे व्यक्ति को उसके गुणों और योग्यता के आधार पर कुछ महत्त्व देते हैं, तो आप उससे भी वैसी ही आशा रखते हैं, कि वह भी आपके गुणों और योग्यता के आधार पर आपको सम्मान देगा, महत्त्व देगा। ऐसी आशा रखना, स्वाभाविक ही है।
       
परंतु कभी कभी, कोई व्यक्ति, जो कुछ अधिक ही अभिमानी होता है, वह आपकी योग्यता को या तो समझता नहीं अथवा  समझते हुए भी जानबूझकर आपको उचित सम्मान या महत्त्व नहीं देता। ऐसी स्थिति में आपको कष्ट होता है। उस स्थिति में भी आप दुखी न हों। इसका उपाय यह है कि मान लिया, 10 में से 1 व्यक्ति ने आपके साथ कुछ ठीक व्यवहार नहीं किया। आपको उचित महत्त्व नहीं दिया, तो उस एक व्यक्ति की आप भी उपेक्षा करें। आप भी उस पर ध्यान न दें। (उससे द्वेष नहीं करना है। उपेक्षा करनी है।) शेष 9 व्यक्ति जो आपको सम्मान और महत्त्व देते हैं, उनके साथ अपना व्यवहार रखें, और आनंद से जिएं।

याद रहे, आप का रिमोट कंट्रोल आपके हाथ में ही रखें, दूसरे के हाथ में न दें। अर्थात् ऐसा न हो, कि सामने वाला व्यक्ति एक बटन दबाए, और आपको क्रोध आ जाए; आपका जीवन अस्त-व्यस्त हो जाए। बल्कि ऐसे अनुचित व्यवहारों का समाधान (उपेक्षा करना) अपने पास तैयार रखें। ऐसा अवसर आते ही उस समाधान का प्रयोग करें। क्रोध, लोभ, अभिमान और तनाव मुक्त होकर आनंदित जीवन जिएं।

👉 When is a Prayer Granted?

Our prayers deserve to be heard by the Almighty only when we take care of making use of the potentials he has already bestowed upon us. Accumulation of negative tendencies of lethargy, dullness, escapism from duties, ignorance, etc makes one hazardous – for his own life – like a balloon full of concentrated acid, which is most likely to explode anytime or ruin due to the acidic burning.

The rules in the system of God work like a vigilant gardener who uproots the useless and harmful wild growth and carefully nurses the saplings of the useful vegetation. If a field is not ploughed and is full of useless grass or shrubs etc, how can it yield a crop (even if the soil is fertile)? Who will praise a farmer, who lets his field be destroyed without bothering to clean it? The system of God certainly can’t allow its field of Nature to be left unguarded. The rules of the Omnipresent are such that the vices, the evils, the futile, get eliminated continuously so that the perfection and eternal beauty of HIS creation remains unperturbed. If you expect your calls to be heard, you will also have to constantly strive for self-refinement.

The best way to get the response to your prayers is to awaken your self confidence and follow the path of duties. Then alone your inner self will awake. The opening to the path to the Light Divine lies deep within the realm of soul and enlightened inner self provides the only bridge to reach this sublime source.

Those who don’t have faith in the dignity of their own souls, who keep ignoring the inner voice and hunt in the external world to quench their wishes are lost in the smog of passions and confusions and invite adversities for themselves. Those who scorn their own (inner) selves are also rebuked at God’s end and their prayers evaporate in the void…

📖 Akhand Jyoti, March 1943