शनिवार, 21 नवंबर 2020

👉 हम कायर न बनें

निराशा एक प्रकार की कायरता है। बुज़दिल आदमी ही हिम्मत हारते हैं। जिसमें वीरता और शूरता का, पुरुषार्थ और पराक्रम का एक कण भी शेष होगा वह यह ही अनुभव करेगा कि मनुष्य महान है, उसकी शक्तियाँ महान है, वह दृढ़ निश्चय और सतत परिश्रम के द्वारा असंभव को संभव बना सकता है। यह जरूरी नहीं कि पहला प्रयत्न ही सफल होना चाहिए। असफलताओं का कल के लिए आशान्वित रहते हैं वस्तुतः वे ही शूरवीर हैं। वीरता शरीर में नहीं मन में निवास करती हैं। 

जो मरते दम तक आशा को नहीं छोड़ते और जीवन संग्राम को खेल समझते हुए हँसते, खेलते, लड़ते रहते हैं उन्हीं वीर पुरुषार्थों महामानवों के गले में अन्ततः विजय वैजयन्ती पहनाई जाती है। बार−बार अग्नि परीक्षा में से गुजरने के बाद ही सोना कुन्दन कहलाता है। कठिनाइयों और असफलताओं से हताश न होना वीरता का यह एक ही चिन्ह है। जिन्होंने अपने को इस कसौटी पर खरा सिद्ध किया है उन्हीं की जीवन साधना सफल हुई है और उन्हीं के नाम इतिहास के पृष्ठों पर अमर रहें हैं।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जून 1962 

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ७१)

मंत्र में छिपी है विघ्न विनाशक शक्ति

आलस्य पांचवा विक्षेप है। इस आलस्य का केवल इतना भर मतलब है कि हमने जीवन के प्रति उत्साह खो दिया है। बच्चे कभी आलसी नहीं होते। वे हमेशा ऊर्जा से भरे होते हैं। यहाँ तक कि उन्हें सोने के लिए मजबूर करना पड़ता है। यदि हमें अपना खोया हुआ उत्साह फिर से पाना है, तो मंत्र के माध्यम से मन की धूल हटानी होगी। तन में फिर से प्राण विद्युत् का प्रबल संचार करना होगा। मंत्र जप यदि ठीक गति से हो रहा है, तो सब कुछ सहज में ही हो जाता है। मंत्र साधक को अपनी साधना से एक नया साहस, एक नया विश्वास उपलब्ध होता है। उसमें यह अनुभूति जगती है कि वह भी कुछ कर सकता है।

विषयासक्ति छठवाँ विक्षेप है। रह-रहकर मन में वासना के ज्वार उठते हैं। कामुकता नयी-नयी कुलाँचे भरती है। क्यों होता है ऐसा? तो इस सवाल का सहज उत्तर है कि शरीर और मन ने ऊर्जा को काफी इकट्ठी कर ली है, पर उसका न तो सही तरह से खर्च हो पाया और न ही उसका ऊर्ध्वगमन सम्भव हो सका है। इस अप्रयुक्त ऊर्जा को ही सही ढंग से प्रयोग में लाया जाना ही हमें विषयसक्ति से छुटकारा दिलाता है। मंत्र साधना से यह आसानी से सम्भव हो पाता है। ॐकार अथवा इसके विस्तार रूप गायत्री के जप से जीवन की ऊर्जा का रूपान्तरण एवं ऊर्ध्वगमन होने लगता है। मंत्र साधना की निरन्तरता यदि बनी रहे, तो विषयासक्ति के बादल अपने आप ही छंटने लगते हैं।

योग साधना की सातवां विघ्न है भ्रान्तिदर्शन। यह खुली आँखों से सपने देखने जैसा है। इन सपनों के कारण हम हमेशा सच से वंचित रह जाते हैं। पतंजलि कहते हैं कि भ्रम तिरोहित हो जाएगा, यदि तुम होशपूर्वक ओम का जप करो। इस जप से जो जागृति आती है, वह सपनों का घोर विरोधी है। सपना हमेशा सोया हुआ और खोया हुआ आदमी देखता है। जाग्रत् व्यक्ति को भ्रान्तियाँ नहीं सताती हैं, मंत्र साधना से ऐसी ही अनूठी जागृति पनपती है।

दुर्बलता योग पथ का आठवाँ विक्षेप है। व्यक्ति कहीं न कहीं, कभी न कभी स्वयं असहाय एवं दुर्बल अनुभव करताहै। दरअसल जब तक विराट् से विलग है, उस सर्वसमर्थ से दूर है, कभी भी सम्पूर्ण समर्थ नहीं हो सकते। मंत्र साधना से यह दूरी, यह अलगाव दूर होता है। मंत्र हमारी चेतना को विराट् ब्राह्मी चेतना से जोड़ता है। सर्व समर्थ प्रभु से एकता सध जाने पर फिर कभी दुर्बलता नहीं सताती। साधना के साथ ही सिद्धि का प्रवाह चल पड़ता है और साध्य नजर आने लगता है।

नवाँ विक्षेप अस्थिरता का है। हम शुरूआत करते हैं, कुछ दूर तक चलते हैं फिर छोड़ देते हैं। अस्थिरता के कारण मंजिल तक पहुँचना नहीं हो पाता। हालाँकि हम इसके लिए बहाने बहुत गढ़ते हैं। पर बहाने तो केवल बहाने हैं। कभी परिस्थितियों का बहाना, कभी किसी व्यक्ति का बहाना, कभी कोई दूसरा नया बहाना। पर इस सबके पीछे यथार्थ कारण अस्थिरता ही होती है। मंत्र का जप यदि दृढ़तापूर्वक होता रहे, तो यह अस्थिरता स्वयं अस्थिर होने लगती है और साधक का चित्त हमेशा के लिए इससे मुक्त हो जाता है।

महर्षि पतंजलि के इन अनुभूत वचनों की व्याख्या में ब्रह्मर्षि परम पूज्य गुरुदेव कहते थे कि सभी मंत्रों का मूल ॐकार है। इसी का विस्तार गायत्री है। यह गायत्री योग-साधकों के लिए कल्पवृक्ष एवं कामधेनु है। इसकी कृपा से सब कुछ अनायास हो जाता है। बस, इसकी साधना में निरन्तरता बनी रहे। निश्चित संख्या, निश्चित समय एवं निश्चित स्थान इन तीन अनुशासनों को मान कर जो तीन पदों वाली गायत्री का जप करता है, उसकी साधना के विघ्न स्वयं ही नष्ट होते रहते हैं। गुरुदेव का कहना था कि गायत्री जप करने वाले को अपने मन की उधेड़बुन या मानसिक उथल-पुथल पर ध्यान नहीं देना चाहिए। यहाँ तक कि मन की ओर देखना ही छोड़ देना चाहिए। बस जप, जप और जप, मन की सुने बगैर जप की अविरामता बनी रहे, तो बाकी सब कुछ अनायास ही हो जाता है। 

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १२०
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 आत्मा-विश्वास की महती शक्ति सामर्थ्य (भाग 3)

आत्मनिषेधी से सारी शक्तियाँ सारे देव-तत्व और सारी सम्भावनायें एक साथ रुक जाती हैं। वह अकेला एकाकी आत्म-बहिष्कृत स्थिति में डूबते व्यक्ति की ...