शनिवार, 29 जून 2019

👉 मजदूर के जूते Labor shoes

एक बार एक शिक्षक संपन्न परिवार से सम्बन्ध रखने वाले एक युवा शिष्य के साथ कहीं टहलने निकले उन्होंने देखा की रास्ते में पुराने हो चुके एक जोड़ी जूते उतरे पड़े हैं, जो संभवतः पास के खेत में काम कर रहे गरीब मजदूर के थे जो अब अपना काम ख़त्म कर घर वापस जाने की तयारी कर रहा था।

शिष्य को मजाक सूझा उसने शिक्षक से कहा,  गुरु जी क्यों न हम ये जूते कहीं छिपा कर झाड़ियों के पीछे छिप जाएं; जब वो मजदूर इन्हें यहाँ नहीं पाकर घबराएगा तो बड़ा मजा आएगा!!

शिक्षक गंभीरता से बोले, किसी गरीब के साथ इस तरह का भद्दा मजाक करना ठीक नहीं है क्यों ना हम इन जूतों में कुछ सिक्के डाल दें और छिप कर देखें की इसका मजदूर पर क्या प्रभाव पड़ता है!!

शिष्य ने ऐसा ही किया और दोनों पास की झाड़ियों में छुप गए।

मजदूर जल्द ही अपना काम ख़त्म कर जूतों की जगह पर आ गया उसने जैसे ही एक पैर जूते में डाले उसे किसी कठोर चीज का आभास हुआ, उसने जल्दी से जूते हाथ में लिए और देखा की अन्दर कुछ सिक्के पड़े थे, उसे बड़ा आश्चर्य हुआ और वो सिक्के हाथ में लेकर बड़े गौर से उन्हें पलट -पलट कर देखने लगा फिर उसने इधर -उधर देखने लगा, दूर -दूर तक कोई नज़र नहीं आया तो उसने सिक्के अपनी जेब में डाल लिए अब उसने दूसरा जूता उठाया, उसमे भी सिक्के पड़े थे …मजदूर भावविभोर हो गया, उसकी आँखों में आंसू आ गए, उसने हाथ जोड़ ऊपर देखते हुए कहा – हे भगवान्, समय पर प्राप्त इस सहायता के लिए उस अनजान सहायक का लाख -लाख धन्यवाद, उसकी सहायता और दयालुता के कारण आज मेरी बीमार पत्नी को दावा और भूखें बच्चों को रोटी मिल सकेगी।

मजदूर की बातें सुन शिष्य की आँखें भर आयीं शिक्षक ने शिष्य से कहा –  क्या तुम्हारी मजाक वाली बात की अपेक्षा जूते में सिक्का डालने से तुम्हे कम ख़ुशी मिली?

शिष्य बोला, आपने आज मुझे जो पाठ पढाया है, उसे मैं जीवन भर नहीं भूलूंगा आज मैं उन शब्दों का मतलब समझ गया हूँ जिन्हें मैं पहले कभी नहीं समझ पाया था कि लेने की अपेक्षा देना कहीं अधिक आनंददायी है देने का आनंद असीम है देना देवत्त है।

👉 आज का सद्चिंतन Today's Thought 29 June 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 29 June 2019



👉 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति (भाग 18)

👉 कर्मफल के सिद्धान्त को समझना भी अनिवार्य
इस सम्बन्ध में एक बड़ी मार्मिक घटना है। महाराष्ट्र का कोई व्यक्ति उनसे मिलने आया। उसकी आयु यही कोई ३०- ३५ वर्ष रही होगी। पर जिन्दगी की मार ने उसे असमय बूढ़ा कर दिया था। रुखे- उलझे सफेद बाल, हल्की पीली सी धंसी आँखें। चेहरे पर विषाद की घनी छाया। दुबली- पतली कद- काठी, सांवला रंग- रूप। बड़ी आशा और उम्मीद लेकर वह गुरुदेव के पास आया था। आते ही उसने प्रणाम करते हुए अपना नाम बताया उदयवीर घोरपड़े। साथ ही यह कहा कि वह महाराष्ट्र के जलगांव के पास के किसी गांव का रहने वाला है। इतना सा परिचय देने के बाद वह फफक- फफक कर रो पड़ा। और रोते हुए उसने अपनी विपद् कथा कह सुनायी।

सचमुच ही उसकी कहानी करुणा से भरी थी। लम्बी बीमारी से पत्नी की मृत्यु, डकैती में घर की सारी सम्पत्ति का लुट जाना और साथ ही सभी स्वजनों की नृशंस हत्या। वह स्वयं तो इसलिए बच गया क्योंकि कहीं काम से बाहर गया था। अब निर्धनता और प्रियजनों के विछोह ने उसे अर्ध विक्षिप्त बना दिया था। जीवन उसके लिए अर्थहीन था और मौत ने उसे अस्वीकार कर दिया था। अपनी कहानी सुनाते हुए उसने एक रट लगा रखी थी कि गुरुजी! मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ। मैंने तो किसी का भी कुछ नहीं बिगाड़ा था। भगवान ऐसा अन्यायी क्यों है? पूज्य गुरुदेव ने बड़े प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा- बेटा! अभी तेरा मन ठीक नहीं है। मैं तुझे कुछ बताऊँगा भी तो तुझे समझ नहीं आएगा। 

अभी तो मैं तुझे एक कहानी सुनाता हूँ। यह कहानी उस समय जन्मी जब भगवान श्रीकृष्ण पाण्डवों के दूत बनकर कौरव सभा में गए थे। और वहाँ उन्होंने उद्दण्ड दुर्योधन को डपटते हुए अपना विराट् रूप दिखाया। इस दिव्य रूप को भीष्म, विदुर जैसे भक्तों ने देखा। ऐसे में धृतराष्ट्र ने भी कुछ समय के लिए आँखों का वरदान माँगा, ताकि वह भी भगवान् की दिव्य छवि निहार सके। कृपालु प्रभु ने धृतराष्ट्र की प्रार्थना स्वीकार की। तभी धृतराष्ट्र ने कहा- भगवन् आप कर्मफल सिद्धान्त को जीवन की अनिवार्य सच्चाई मानते हैं। सर्वेश्वर मैं यह जानना चाहता हूँ, किन कर्मों के परिणाम स्वरूप मैं अन्धा हूँ।

भगवान ने धृतराष्ट्र की बात सुनकर कहा, धृतराष्ट्र इस सच्चाई को जानने के लिए मुझे तुम्हारे पिछले जन्मों को देखना पड़ेगा। भगवान के इन वचनों को सुनकर धृतराष्ट्र विगलित स्वर में बोले- कृपा करें प्रभु, आपके लिए भला क्या असम्भव है। कुरु सम्राट के इस कथन के साथ भगवान योगस्थ हो गए। और कहने लगे- धृतराष्ट्र मैं देख रहा हूँ कि पिछले तीन जन्मों में तुमने ऐसा कोई पाप नहीं किया है, जिसकी वजह से तुम्हें अन्धा होना पड़े? श्रीकृष्ण के इस कथन को सुनकर धृतराष्ट्र बोले- तब तो कर्मफल विधान मिथ्या सिद्ध हुआ प्रभु! नहीं धृतराष्ट्र अभी इतना शीघ्र किसी निष्कर्ष पर न पहुँचो और भगवान् धृतराष्ट्र के विगत जन्मों का हाल बताने लगे। एक- एक करके पैंतीस जन्म बीत गए।

सुनने वाले चकित थे। धृतराष्ट्र का समाधान नहीं हो पा रहा था। तभी प्रभु बोले- धृतराष्ट्र मैं इस समय तुम्हारे १०८ वें जन्म को देख रहा हूँ। मैं देख रहा हूँ- एक युवक खेल- खेल में पेड़ पर लगे चिड़ियों के घोंसले उठा रहा है। और देखते- देखते उसने चिड़ियों के सभी बच्चों की आँखें फोड़ दीं। ध्यान से सुनो धृतराष्ट्र, यह युवक और कोई नहीं तुम ही हो। विगत जन्मों में तुम्हारे पुण्य कर्मों की अधिकता के कारण यह पाप उदय न हो सका। इस बार पुण्य क्षीण होने के कारण इस अशुभ कर्म का उदय हुआ है।

इस कथा को सुनाते हुए परम पूज्य गुरुदेव ने उस युवक के माथे पर भौहों के बीच हल्का सा दबाव दिया। और वह निस्पन्द होकर किसी अदृश्य लोक में प्रविष्ट हो गया। कुछ मिनटों में उसने पता नहीं क्या देख लिया। जब वापस उसकी चेतना लौटी तो वह शान्त था। गुरुदेव उससे बोले- समझ गए न बेटा। वह बोला- हाँ गुरुजी मेरे ही कर्म हैं। यह सब मेरे ही दुष्कर्मों का फल है। कोई बात नहीं बेटा, जब जागो तभी सबेरा। अब से तुम अपने जीवन को संवारों। मैं तुम्हारा साथ दूँगा। क्या करना होगा, उस युवक ने पूछा। चित्त के संस्कारों को जानो और इनका परिष्कार करो। गुरुदेव के इस कथन ने उसके जीवन में नयी राह खोल दी।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति

👉 इस आपत्ति−काल में हम थोड़ा साहस तो करें ही! (भाग 2)

वर्तमान साधु−ब्राह्मणों का दरवाजा खटखटाते हमें एक युग बीत गया। उन्हें नीच−ऊँच समझाने में जितना श्रम किया और समय लगाया, उसे सर्वथा व्यर्थ चला गया ही समझना चाहिए। निराश होकर ही हमें इस नतीजे पर पहुंचना पड़ा है कि सड़ी वस्तु को पुनः स्वस्थ स्थिति में नहीं लाया जा सकेगा। हमें नई पौध लगाने और नई हरियाली उगाने के लिए अभिनव प्रयत्न करने होंगे। उसी का आरम्भ कर भी रहे हैं।

विश्वास किया जाना चाहिए कि आदर्शवादिता अभी पूरी तरह अपंग नहीं हो गई हैं। महामानव स्तर की भावनायें सर्वथा को विलिप्त नहीं हो गई हैं। लोभ और मोह ने मनुष्य को जकड़ा तो जरूर है, पर वह ग्रहण पूरा खग्रास नहीं है। सूर्य का एक ऐसा कोना अभी भी खाली है और उतने से भी काम चलाऊ प्रकाश किरणें विस्तृत होती रह सकती है। ऋषि−रक्त की प्रखरता उसकी सन्तानों की नसों में एक बूँद भी शेष रही हो—ऐसी बात नहीं है। दम्भ का कलेवर आकाश छू रहा है—सो ठीक है,पर सत्य न अभी भी मरण स्वीकार नहीं किया है। अपराधी में हर व्यक्ति अन्धा हो रहा हैं पर ऐसा नहीं समझना चाहिए कि परमार्थ की परम्परा का अस्तित्व ही समाप्त हो गया।

देश,धर्म, समाज और संस्कृति की बात सोचने के लिए किसी के भी मस्तिष्क में गुंजाइश नहीं रहीं ही, अभी ऐसा अन्धकार नहीं छाया है। अब किसी के भी मन में दूसरों के लिए दर्द ने रह गया हों, दूसरों के सुख में अपना सुख देखने वाले हृदय सर्वथा उजड़−उखड़ गये हों, ऐसी बात नहीं है। धर्म के बीच नष्ट तो कभी भी नहीं हुए हैं। आत्म−सत्ता की वरिष्ठता का आत्यन्तिक मरण हो गया हो— ऐसी स्थिति अभी नहीं आई है। मनुष्य ने पाप और पतन के हाथों अपने को बेच दिया हो और देवत्व से उसका कोई वास्ता न रह गया हो— ऐसा नहीं सोचना चाहिए। मानवी महानता अभी कहीं न कहीं, किसी न किसी अंश में जीवित जरूर मिल जायगी। हम उसी को ढूंढ़ेंगे। जहाँ थोड़ी−सी साँस मिलेगी,यहाँ आशा के चीवर ढुलाऐंगे और कहेंगे—पशुता से ऊँचे उठकर देवत्व की परिधि में प्रवेश करने का प्रयत्न करो।

मरणोन्मुख मनुष्यता तुम्हारी बाट जोहती है। चलो,उसे निराश न करों। हमें आशा है कि कहीं न कहीं से ऐसी आत्मा ढूंढ़ ही निकाली जा सकेगी, जिनमें मानवी महानता जीवित बच रही हो। उन्हें युग की दर्द भरी पुकार सुनने के लिए अनुरोध करेंगे और कहेंगे—मनुष्य जाति को सामूहिक आत्महत्या करने से रोकने का अभी भी समय बाकी है। कुछ तो अभी किया जा सकता है, सो करना चाहिए। अपने को खोकर यदि संस्कृति को जीवित रखा जा सकता है तो इस सौदे को पक्का कर ही लेना चाहिए।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1974 पृष्ठ 22

http://literature.awgp.org/hindi/akhandjyoti/1974/January/v1.22

👉 The Absolute Law Of Karma (Part 28)

THE RELATIVITY OF VIRTUES AND SINS

On many occasions, I have succeeded in reconciling the differences between bitter adversaries by making them understand the triviality of the root cause, which had made a mountain out of a molehill. Such situations arise because of gap in communication. With mutual understanding, sharing of feelings and objective analysis of each other’s expectations, behaviour and psychological background, ninety percent of estrangements can be amicably resolved. In fact the factors responsible for such estrangements are very minor. We may compare their incidence with the quantity of salt in our food. Salt and pepper themselves are distasteful, but a small quantity of these makes food palatable. Occasional cooling off of warmth in close relationships is required to break the monotony of life. Given mutual trust, we bounce back into the relationship with deeper understanding and warmth. It has already been discussed that on human birth, the soul brings with it many imperfections and traits of its past lives including its embodiments in sub-human species.

The newly born human child is very little qualified to live amongst human beings. It falls asleep anytime during the day, keeps awake during nights, soils the clothes and makes loud hues and cries for its biological needs of fondling, food and water. Nevertheless, neither these babytantrums disturb the household, nor does addition of one more member make the house unlivable. On the contrary, the innocent and immature child becomes a means of entertainment for the family. The morally less evolved persons of the society should be treated in the same way.

For evolutionary soul growth, it is the duty of each enlightened soul to work for the progress of other persons, who are at lower stages of soul-growth and encourage them, to work for their own upliftment. Wickedness will always be there in this world. There is no reason to be afraid of it. Whosoever is desirous of self-enlightenment should learn to face and overcome the disturbances caused by the wicked. It is necessary to restrain the evil and prevent the beastly traits from polluting humane values. Flies have to be kept away from sweets. The efficiency of one’s karmas is demonstrated in preventing spread of sinful traits in the society. A great deal of caution is required in this endeavour. It is like walking on the razor’s edge. This truly is yog-the skill in works- equanimity in the face of all provocations.

.... to be continue
✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 The Absolute Law Of Karma Page 49

👉 आत्मचिंतन के क्षण Moments of self-expression 29 June 2019

■ अपने भाग्य को स्वयं बन जाने की राह देखना भूल ही नहीं, मूर्खता भी है। यह संसार इतना व्यस्त है कि लोगों को अपनी परवाह से ही फुरसत नहीं। यदि कोई थोड़ा सा सहारा देकर आगे बढ़ा भी दे और उतनी  योग्यता न हो तो फिर पश्चाताप, अपमान और अवनति का ही मुख देखना पड़ता है। स्वयं ही मौलिक सूझबूझ और परिश्रम से बनाये हुए भाग्य में इस तरह की कोई आशंका नहीं रहती, क्योंकि वैसी स्थिति में अयोग्य सिद्ध होने का कोई कारण नहीं होता।

◇ विश्वास बड़ा मूल्यवान् भाव है। जिस विषय में समझ-बूझकर विश्वास बना लिया जाय, उसका दृढ़तापूर्वक निर्वाह भी किया जाना चाहिए। आज विश्वास बनाया और कल तोड़ दिया, विश्वास का यह सस्तापन न तो योग्य है और न ही वांछनीय।

★ जिस प्रकार कमाना, खाना, सोना, नहाना जीवन के आवश्यक नित्य कर्म होते हैं, उसी प्रकार परमार्थ भी मानव जीवन का एक अत्यन्त आवश्यक धर्म कर्त्तव्य है। इसकी उपेक्षा करते रहने से आध्यात्मिक पूँजी घटती है, आत्मबल नष्ट होता है और अंतःभूमिका दिन-दिन निम्न स्तर की बनती चली जाती है। यही तो पतन है।

□ सत्कर्मों की पुण्य प्रवृत्ति कभी-कभी ही पैदा होती है। ऐसा उत्साह भगवान् की प्रेरणा और पूर्व संचित शुभ कर्मों का उदय होने पर ही जाग्रत् होता है, अन्यथा मनुष्य स्वार्थ और पाप की बातें सोचने में ही दिन गुजारता रहता है। इसलिए परमार्थ की पुण्य प्रवृत्तियाँ जब कभी उत्पन्न हों, तब कार्यान्वित करने के लिए साहस का प्रयोग ही कर डालना चाहिए।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Moments of self-expression 29 June 2019

◇ A wandering monk once visited the city of Mithila, ruled by the Sage King Janaka. “Who is the best teacher around here?” He asked We have to create strength where it does not exist; we have to change our natures, and become new men with new hearts, to be born again… We need a nucleus of men in whom the Shakti is developed to its uttermost extent, in whom it fills every corner of the personality and overflows to fertilize the earth. These, having the fire of Bhawani in their hearts and brains, will go forth and carry the flame to every nook and cranny of our land.
Sri Aurobindo

★ A student asked his teacher: "Who are the two angels who nurture life?" "Heart and tongue", was the reply. The next question was: “Who are the two demons who destroy life?" "Heart and tongue", was the reply again. The cruelty or tenderness of heart and tongue makes a person mean or great respectively.

■ It is already becoming clearer that a chapter which has a western beginning will have to have an Indian ending if it is not to end in the self-destruction of human race…. At this supremely dangerous moment in history, the only way of salvation for mankind is the Indian way.
Arnold Toynbee

□ By simplifying our lives, we rediscover our child-like stalk of innocents that reconnects us with the central resin of our innate humanity that knows truth and goodness. To see the world through a lens of youthful rapture is to see life for what it can be and to see for ourselves what we wish to become. In this beam of newly discovered ecstasy for life, we realize the splendor of love, life, and the unbounded beauty of the natural world.
Kilroy J. Oldste