मंगलवार, 27 जून 2017

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 120)

🌹  हमारी प्रत्यक्ष सिद्धियाँ

🔵 हमारी जीवन साधना की परिणतियाँ यदि कोई सिद्धि स्तर पर ढूँढ़ना चाहे तो उसे निराश नहीं होना पड़ेगा। हर कदम अपने कौशल और उपलब्ध साधनों की सीमा से बहुत ऊँचे स्तर का उठा है। आरम्भ करते समय सिद्धि का पर्यवेक्षण करने वालों ने इसे मूर्खता कहा और पीछे उपहासास्पद बनते फिरने की चेतावनी भी दी, किंतु मन में इस ईश्वर के साथ रहने का अटूट विश्वास रहा जिसकी प्रेरणा उसे हाथ में लेने को उठा रही थी। लिप्सारहित अंतःकरणों में प्रायः ऐसे ही संकल्प उठते जो सीधे लोकमंगल से सम्बन्धित हों और जिनके पीछे दिव्य सहयोग मिलने का विश्वास हो।

🔴 साधना की ऊर्जा सिद्धि के रूप में परिपक्व हुई तो उसने सामयिक आवश्यकताएँ पूरी करने वाले किसी कार्य में उसे खपा देने का निश्चय किया। कार्य आरम्भ हुआ और आश्चर्य इस बात का है कि सहयोग का साधन जुटाने का वातावरण दीखते हुए ही प्रयास इस प्रकार अग्रगामी बने मानों वे सुनिश्चित रहे हों और किसी ने उसकी पूर्व से ही सांगोपांग व्यवस्था बना रखी हो। पर्यवेक्षकों में से अनेकों ने इसे आरम्भ में दुस्साहस कहा था लेकिन सफलताएँ मिलती चलने पर वे उस सफलता को साधना की सिद्धि कहते चले गए।

🔵 इन दुस्साहसों की छुटपुट चर्चा तो की जा चुकी है। उन सबको पुनः दुहराया जा सकता है।
  
🔴 १. पंद्रह वर्ष की आयु में चौबीस वर्ष तक गायत्री महापुरश्चरण, चौबीस वर्ष में पूरा करने का अनेक अनुबंधों के साथ जुड़ा हुआ संकल्प लिया गया। वह बिना लड़खड़ाए नियत अवधि में सम्पन्न हो गया।
  
🔵 २. इस महापुरश्चरण की पूर्णाहुति में निर्धारित जप का हवन करना था। देश भरके गायत्री उपासक आशीर्वाद देने आमंत्रित करने थे। पता लगाकर ऐसे चार लाख पाए गए और वे सभी मथुरा में सन् १९५८ में सहस्र कुण्डीय यज्ञ में आमंत्रित किए गए। प्रसन्नता की बात थी कि उनमें से एक भी अनुपस्थित नहीं रहा। पाँच दिन तक निवास, भोजन, यज्ञ आदि का निःशुल्क प्रबंध रहा। विशाल यज्ञशाला, प्रवचन मंच, रोशनी, पानी सफाई आदि का सुनियोजित प्रबंध था। सात मील के घेरे में सात नगर बसाए। सारा कार्य निर्विघ्न पूरा हुआ। लाखों का खर्च हुआ, पर उसकी पूर्ति बिना किसी के आगे पल्ला पसारे ही होती रही।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/hari/hamari.2

👉 आज का सद्चिंतन 28 June 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 28 June 2017



👉 सफलता का रहस्य


🔴 एक बार एक नौजवान लड़के ने सुकरात से पूछा कि सफलता का रहस्य क्या  है?

🔵 सुकरात ने उस लड़के से कहा कि तुम कल मुझे नदी के किनारे मिलो.वो मिले. फिर सुकरात ने नौजवान से उनके साथ नदी की तरफ बढ़ने को कहा.और जब आगे बढ़ते-बढ़ते पानी गले तक पहुँच गया, तभी अचानक सुकरात ने उस लड़के का सर पकड़ के पानी में डुबो दिया. लड़का बाहर निकलने के लिए संघर्ष करने लगा , लेकिन सुकरात ताकतवर थे और उसे तब तक डुबोये रखे जब तक की वो नीला नहीं पड़ने लगा. फिर सुकरात ने उसका सर पानी से बाहर निकाल दिया और बाहर निकलते ही जो चीज उस लड़के ने सबसे पहले की वो थी हाँफते-हाँफते तेजी से सांस लेना.

🔴 सुकरात ने पूछा, जब तुम वहाँ थे तो तुम सबसे ज्यादा क्या चाहते थे?”

🔵 लड़के ने उत्तर दिया, ”सांस लेना”

🔴 सुकरात ने कहा, यही सफलता का रहस्य है. जब तुम सफलता को उतनी ही बुरी तरह से चाहोगे जितना की तुम सांस लेना  चाहते थे  तो वो तुम्हे मिल जाएगी” इसके आलावा और कोई रहस्य नहीं है।

👉 धर्म का सार

🔵 नाना प्रकार के मत-मतांतरों, संप्रदायों के उलझन भरे कर्मकांडों के जंजाल में भटकते रहने से धर्म-तत्त्व की प्राप्ति नहीं हो सकती। जो धर्म को प्राप्त करना चाहते हैं, सच्चे अर्थों में धर्मात्मा बनना चाहते हैं, उन्हें चाहिए कि अपनी इच्छा, रुचि और आदतों की कड़ी समालोचना करके देखें कि इनमें कितने अंश ऐसे हैं, जो दूसरों के उचित अधिकारों से टकराते हैं।

🔴 अपनी स्वार्थपरता, अनुदारता, संग्रहशीलता और भोगेच्छा को घटाना चाहिए और दया, उदारता, परमार्थ, प्रेम, सेवा, सहायता, त्याग, सात्त्विकी प्रवृत्तियों को बढ़ाना चाहिए। स्वार्थ की मात्रा जितनी घटती जाती है और परमार्थ की मात्रा जितनी बढ़ती जाती है, उतना ही मनुष्य धर्मात्मा, पुण्यात्मा, बनता जाता है। इसी मार्ग पर चलता हुआ पुरुष स्वर्ग या मुक्ति प्राप्त कर सकता है।

🔵 संसार के सारे दु:खों, क्लेशों, संघर्षों का एकमात्र कारण यह है कि लोग अपने लिए जो बातें चाहते हैं, वैसा दूसरों के साथ व्यवहार नहीं करते। खरीदने के बाट और रखना चाहते हैं तथा बेचने के और। यह घातक नीति ही अशांति की जड़ है। स्वार्थ की निकृष्ट इच्छा से अंधे होकर जब हम अपने लिए बहुत अच्छा बर्ताव चाहते हैं और दूसरों के साथ बहुत बुरा व्यवहार करते हैं तो उसका निश्चित परिणाम कलह ही होता है। मनुष्य को आमतौर से जो व्यवहार नापसंद हैं, वे पाप हैं। जो इन पाप-कर्मों को करता है, वह पापी है।

🌹 अखण्ड ज्योति, मार्च 1944 पृष्ठ 13
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1944/March/v1.13



👉 Quintessence of Religion

🔵 The element of religion can’t be found in the mirage of rituals, cults or communal doctrines and rites. If you are true seeker, want to adopt religion in the truest sense, you must first introspect and sincerely analyze your aspirations, interests, habits and behavior to whether and to what extent these might trouble or hurt others or hinder their justified rights… You must restrain and curtail the tendencies of selfish possession, passions for sensual pleasures and ruthlessness and insensitivity to others.

🔴 Simultaneously, the altruistic tendencies and sentiments of kindness, generosity, love, amity, feeling of service, sharing and
cooperation should be cultivated and enhanced consistently. The only measure of one’s religiousness is – the less one’s selfishness and the more his/her altruism, the greater is his/her religiousness and spirituality. It is only through this path or religiousness that the individual self realizes higher realms of divine grace and salvation.

🔵 The major cause of all misery, adversities and sufferings in the world is that – knowingly or unknowingly, people do not behave with others in a manner, which they expect and like others to behave. This disparity of – “different weight used in the same balance for buying and for selling” is the root of all mistrusts, conflicts and animosity. Ego, avarice and selfishness make one blind and
debauch from the path of religion. If you do what your conscience would not allow, or what you would not like someone else doing to you, then you are committing a sin. So be vigilant towards your ambitions, attitude and actions.

🌹 Akhand Jyoti, Mar. 1944

👉 आत्मचिंतन के क्षण 28 June

🔴 जीवन की महत्ता और सफलता उसकी आत्मिक प्रगति पर निर्भर है, यह विश्वास मन में रखना चाहिए व नित्य सुदृढ़ बनाना चाहिए। भौतिक सफलताएं तो उतनी ही देर आनन्द देती हैं, जब तक कि उनकी प्राप्ति नहीं हो जाती। मिलते ही आनन्द समाप्त हो जाता है व और अधिक के लिए व्याकुलता, बेचैनी आरंभ हो जाती है। जो मानव जीवन का श्रेष्ठतम सदुपयोग कर उस आनन्द की प्राप्ति के इच्छुक हैं, जिसके लिए यह जन्म मिला है, उन्हें आत्मिक प्रगति के लिए तत्पर होना चाहिए और उसके दोनों आधारों उपासना और साधना का अवलम्बन लेना चाहिए।

🔵 मनुष्य में जो असीम एवं अपरिमित शक्तियाँ भरी पड़ी हैं उनके अस्तित्व में विश्वास करने और तद्नुरूप उन्हें हस्तगत कर लेने की योग्यता-क्षमता को प्रतिभा के नाम से जाना जाता है। यह न तो जन्मजात उपलब्धि है और न किसी का दिया हुआ वरदान-आशीर्वाद। भाग्यवश मिला हुआ आकस्मिक संयोग-सुयोग भी नहीं कहा जा सकता। वह स्व उपार्जित ऐसी विलक्षण सम्पदा है, जिसके सहारे जीवन की प्रतिकूल दीखने वाली परिस्थितियों को अनुकूल बनाया जा सकता है।
                                              
🔴 जिन व्यक्तियों ने अपनी प्रसुप्त प्रतिभा को उपयोगी दिशा में लगाया है, उसके सत्परिणाम उन्हें हाथों हाथ मिलते देखे गये हैं। परिस्थितियाँ कितनी विपन्न और विषम क्यों न बनी रही हों, पर धुन के धनी लोगों ने जीवन की महत्वपूर्ण सफलताएँ अर्जित कर दिखाई हैं।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 इस धरा का पवित्र श्रृंगार है नारी (अंतिम भाग)

🔴 शास्त्रकार ने लिखा है-

“यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमन्ते तत्र देवताः’’ 
“जहाँ नारी की पूजा की जाती अर्थात् आदर-सत्कार होता है वहाँ देवता निवास किया करते है।”

🔵 इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि पिछले हजार बारह-सौ वर्षों से हम भारतीय लोग नारी का तिरस्कार उसकी उपेक्षा करते चले आ रहे है और जिसके अभिशाप पतन के गहरे गर्त में गिर पड़े है। अब हमें अपनी चेतना में आना चाहिए और नारी को उचित स्थान देकर अपना तथा अपने राष्ट्र का कल्याण करना चाहिए। हमें ऐसा प्रयत्न करना चाहिए कि हमारे राष्ट्र की नारियाँ, समाज की जननी अब असहाय अबला भीरु बनकर न रहे बल्कि वे देवी, दुर्गा, शक्ति बनकर शीघ्र ही उठे और समाज की नव रचना में बराबर का हाथ बँटायेंगे।

🔴 हम अपनी राष्ट्र निर्मात्री का घर की बंदिनी, परदे की प्रतिमा अथवा पैर की जूती न रखकर उसे स्वतंत्रता शिक्षा तथा प्रकाश की सुविधा दें जिससे कि वे सुसंस्कृत, संस्कारी सुयोग्य तथा स्वावलम्बी बनकर खड़ी हों ओर वर्तमान में राष्ट्र की सेवा में हाथ बँटायें और भविष्य के लिये सुन्दर स्वरूप तथा संस्कारवान् सन्तानें दे सकने में समर्थ हो सकें। नारी जीवन माता, पत्नी तथा भगिनी हर रूप में पूज्य है, उसका आदर होना ही चाहिए।

🌹 समाप्त
🌹 अखण्ड ज्योति- अगस्त 1995 पृष्ठ 27
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1995/August/v1.27

👉 कायाकल्प का मर्म और दर्शन (भाग 8)

🔴 आप अपना सम्मान चाहते रहें और दूसरों के लिए अपमान का व्यवहार करते रहें, तब आप ऐसा कीजिए, अब आप यहाँ से जब कायाकल्प करके जा ही रहे हैं, तो अपने आपको नम्र बनाकर जाइए और दूसरों को सम्मान देना शुरू कीजिए। अब तक आप यह अपेक्षा करते रहे कि दूसरे आदमी आपके प्रति नम्र रहें और आपका सम्मान करें, तब मैं आपसे यह प्रार्थना करता हूँ कि आप इस रवैये को बदल दीजिए। आप जो दूसरों से नम्रता की आशा करते थे, वह नम्रता आप अपने ऊपर हावी कर लें।

🔵 आप स्वयं नम्र रहें, जितने ज्यादा नम्र हो सकते हों, सुशील हो सकते हों, विनयशील हो सकते हों, सज्जन हो सकते हों, बन जाइए, दूसरों पर इस सम्बन्ध में दबाव मत डालिए और सम्मान? सम्मान आप प्राप्त करना चाहते थे न? मेरी प्रार्थना है, आप यह नियम बदल दीजिए। दूसरों को सम्मान दीजिए। दूसरों को सम्मान देंगे, तो आप देखेंगे कि यह प्राप्त कर सकना आपके लिए सम्भव था। दूसरे आपका सम्मान करें, इसमें दबाव डालने के लिए आप क्या कर सकते हैं, बताइए? नहीं दिया तब? इसलिए पाने का एक ही तरीका है—देना, सम्मान दीजिए और बदले में लीजिए।

🔴 आप उज्ज्वल भविष्य की उम्मीदें कीजिए। आप भविष्य के बारे में समय-समय पर जो बुरी आशाएँ लगाये बैठे रहते हैं, कहीं ऐसा न हो जाए, वैसा न हो जाए, ऐसा हो गया फिर क्या होगा? आप ऐसी कल्पनाएँ क्यों करते हैं? यह कल्पनाएँ क्यों नहीं करते कि भविष्य हमारा अच्छा-ही है। भविष्य अच्छा-अच्छा करते रहे और न हुआ तब? होगा कैसे नहीं? पानी के गिलास में आधा गिलास पानी आपके पास है, आप चाहें, तो यह कहिए कि आधा गिलास कम है और चाहे आप यह कहिए कि खाली गिलास की तुलना में आधा गिलास आ गया। आधा गिलास क्या कम है? पहले खाली गिलास था। अब आधा गिलास हो गया। आप यों प्रसन्न क्यों नहीं हो सकते कि आधा गिलास पानी हमारे पास है।

🔵 आप यही सोचते रहेंगे कि पूरा गिलास नहीं है। बात तो वही हुई; लेकिन विचार करने के तरीके अलग-अलग हो गए। आप विचार करने के तरीके बदलिए। अपने भविष्य के बारे में हमेशा अच्छी आशाएँ कीजिए। लेकिन बुरे के लिए तैयार भी रहिए। अगर ऐसी मुसीबत आयेगी, तो हम लड़ेंगे, मुकाबला करेंगे और साहस का परिचय देंगे—यह हिम्मत भी रखिए और उम्मीदें भी अच्छी कीजिए, खराब उम्मीदें आप क्यों करेंगे? क्या खराब उम्मीद की गारण्टी है कोई? जब खराब भविष्य की गारण्टी नहीं है, फिर आप अच्छे भविष्य की कल्पना करने में क्यों संकोच करते हैं? अच्छे भविष्य की कल्पना करने के लिए आप अपने आपको तैयार कीजिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 21)

🌹  अपने आपको समाज का एक अभिन्न अंग मानेंगे और सबके हित में अपना हित समझेंगे।

🔴 स्त्रियों के बारे में पुरुषों ने जो ऐसी मान्यता बना रखी है कि शरीर में भिन्नता रहने मात्र से नर और नारी में से किसी की हीनता या महत्ता मानी जाए, वह ठीक नहीं। यह भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि हम समाज के अभिन्न अंग हैं। जिस प्रकार एक शरीर से संबंधित सभी अवयवों का स्वार्थ परस्पर संबद्ध है, उसी प्रकार सारी मानव जाति एक ही नाव में बैठी हुई है। पृथकता की भावना रखने वालो, भिन्न स्वार्थों, भिन्न आदर्शों और भिन्न मान्यताओं वाले लोग कहीं बहुत बड़ी संख्या में अधिक इकट्ठे हो जाएँ तो वे एक राष्ट्र, एक समाज, एक जाति नहीं बन सकते। एकता के आदर्शों में जुड़े हुए और उस आदर्श के लिए सब कुछ निछावर कर देने की भावना वाले व्यक्तियों का समूह ही समाज या राष्ट्र है। शक्ति को स्रोत इसी एकानुभूति में है। यह शक्ति बनाए रखने के लिए हर व्यक्ति स्वयं को विराट् पुरुष का एक अंग, राष्ट्रीय मशीन का एक प्रामाणिक पुर्जा मानकर चले, सबके संयुक्त हित पर आस्था रखे, यह आवश्यक है। हमारी सर्वांगीण प्रगति का आधार यही भावना बन सकती है।
  
🔵 सबके हित में अपना हित सन्निहित होने की बात जब कही जाती है तो लोग यह भी तर्क देते हैं कि अपने व्यक्तिगत हित में भी सबका हित साधना चाहिए। यदि यह सच है तो हम अपने हित की बात ही क्यों न सोचें? यहाँ हमें सुख और हित का अंतर समझना होगा। सुख केवल हमारी मान्यता और अभ्यास के अनुसार अनुभव होता है, जबकि हित शाश्वत सिद्धांतों से जुड़ा होता है। हम देर तक सोते रहने में, कुछ भी खाते रहने में सुख का अनुभव तो कर सकते हैं, किंतु हित तो जल्दी उठने, परिश्रमी एवं संयमी बनने से ही सधेगा। अस्तु व्यक्तिगत सुख को गौण तथा सार्वजनिक हित को प्रधान मानने का निर्देश सत्संकल्प में रखा गया है।
 
🔴 व्यक्तिगत स्वार्थ को सामूहिक स्वार्थ के लिए उत्सर्ग कर देने का नाम ही पुण्य, परमार्थ है, इसी को देशभक्ति, त्याग, बलिदान, महानता आदि नामों से पुकारते हैं। इसी नीति को अपनाकर मनुष्य महापुरुष बनता है, लोकहित की भूमिका संपादन करता है और अपने देश, समाज का मुख उज्ज्वल करता है। मुक्ति और स्वर्ग का रास्ता भी यही है। आत्मा की शांति और सद्गति भी उसी पर निर्भर है। इसके विपरीत दूसरा रास्ता यह है जिसमें व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए, सारे समाज का अहित करने के लिए मनुष्य कटिबद्ध हो जाता है। दूसरे चाहे जितनी आपत्ति में फँस जाएँ, चाहे जितनी हानि और पीड़ा उठाएँ, पर अपने लिए किसी की कुछ परवाह न की जाए। अपराधी मनोवृत्ति इसी को कहते हैं। आत्म- हनन का, आत्म- पतन का मार्ग यही है। इसी पर चाहते हुए व्यक्ति नारकीय यंत्रणा से भरे हुए सर्वनाश के गर्त में गिरता है।
  
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.30

http://hindi.awgp.org/gayatri/AWGP_Offers/Literature_Life_Transforming/Books_Articles/Sankalpaa/apane.1

👉 Quintessence of Religion

🔵 The element of religion can’t be found in the mirage of rituals, cults or communal doctrines and rites. If you are true seeker, want to adopt religion in the truest sense, you must first introspect and sincerely analyze your aspirations, interests, habits and behavior to whether and to what extent these might trouble or hurt others or hinder their justified rights… You must restrain and curtail the tendencies of selfish possession, passions for sensual pleasures and ruthlessness and insensitivity to others.

🔴 Simultaneously, the altruistic tendencies and sentiments of kindness, generosity, love, amity, feeling of service, sharing and
cooperation should be cultivated and enhanced consistently. The only measure of one’s religiousness is – the less one’s selfishness and the more his/her altruism, the greater is his/her religiousness and spirituality. It is only through this path or religiousness that the individual self realizes higher realms of divine grace and salvation.

🔵 The major cause of all misery, adversities and sufferings in the world is that – knowingly or unknowingly, people do not behave with others in a manner, which they expect and like others to behave. This disparity of – “different weight used in the same balance for buying and for selling” is the root of all mistrusts, conflicts and animosity. Ego, avarice and selfishness make one blind and
debauch from the path of religion. If you do what your conscience would not allow, or what you would not like someone else doing to you, then you are committing a sin. So be vigilant towards your ambitions, attitude and actions.

🌹 Akhand Jyoti, Mar. 1944

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 20)

🌹  अपने आपको समाज का एक अभिन्न अंग मानेंगे और सबके हित में अपना हित समझेंगे।

🔴 सामाजिक न्याय का सिद्धांत ऐसा अकाट्य तथ्य है कि इसकी एक क्षण के लिए भी उपेक्षा नहीं की जा सकती। एक वर्ग के साथ अन्याय होगा तो दूसरा वर्ग कभी भी शांतिपूर्वक जीवनयापन न कर सकेगा। सामाजिक न्याय, अधिकारों का उपयोग दूसरों की भाँति ही कर सकें, ऐसी स्थिति पैदा किए बिना हमारा समाज शोषण- मुक्त नहीं हो सकता। सौ हाथों से कमाओ भले ही, पर उसे हजार हाथों से दान अवश्य कर दो अर्थात् अगणित बुराइयों को जन्म देने वाली संग्रह- वृत्ति को पनपने न दो।
  
🔵 कोई व्यक्ति अपने पास सामान्य लोगों की अपेक्षा अत्यधिक धन तभी संग्रह कर सकता है जब उसमें कंजूसी, खुदगर्जी, अनुदारता और निष्ठुरता की भावना आवश्यकता से अधिक मात्रा में भरी हुई हो। जबकि दूसरे लोग भारी कठिनाइयों के बीच अत्यंत कुत्सित और अभावग्रस्तता जीवनयापन कर रहे हैं, उनके बच्चे शिक्षा और चिकित्सा तक से वंचित हो रहे हों, जब उनकी आवश्यकताओं की ओर से जो आँखें बंद किए रहेगा, किसी को कुछ भी न देना चाहेगा, देगा तो राई- रत्ती को देकर पहाड़- सा यश लूटने को ही अवसर मिलेगा तो कुछ देगा, ऐसा व्यक्ति ही धनी बन सकता है। सामाजिक न्याय का तकाजा यह है कि हर व्यक्ति उत्पादन तो भरपूर करे, पर उस उपार्जन के लाभ में दूसरों को भी सम्मिलित रखे। सब लोग मिल- जुलकर खाएँ, जिएँ और जीन दें। दुःख और सुख सब लोग मिल- बाँट कर भोगे। यह दोनों ही भार यदि एक के कंधे पर आ पड़ते हैं, तो वह दब कर चकनाचूर हो जाता है, पर यदि सब लोग इन्हें आपस में बाँट लेते हैं तो किसी पर भार नहीं पड़ता, सबका चित्त हलका रहता है और समाज में विषमता का विष भी उत्पन्न नहीं हो पाते।
 
🔴 जिस प्रकार आर्थिक समता का सिद्धांत सनातन और शाश्वत है उसी प्रकार सामाजिक समता का मानवीय अधिकारों की समता का आदर्श भी अपरिहार्य है। इसको चुनौती नहीं दे सकते। किसी जाति, वंश या कुल में जन्म लेने के कारण किसी मनुष्य के अधिकार कम नहीं हो सकते और न ऊँचे माने जा सकते हैं। छोटे या बड़े होने की, नीच या ऊँच होने की कसौटी गुण, कर्म, स्वभाव ही हो सकते हैं। अपनी व्यक्तिगत विशेषताओं के कारण किसी का न्यूनाधिक मान हो सकता है, पर इसलिए कोई कदापि बड़ा या छोटा नहीं माना जा सकता कि उसने अमुक कुल में जन्म लिया है। इस प्रकार की अविवेकपूर्ण मान्यताएँ जहाँ भी चल रही हैं, वहाँ कुछ लोगों का अहंकार और कुछ लोगों का दैन्य भाव ही कारण हो सकता है। अब उठती हुई दुनियाँ इस प्रकार के कूड़े- कबाड़ा जैसे विचारों को तेजी से हटाती चली जा रही है।
  
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.29

👉 कायाकल्प का मर्म और दर्शन (भाग 7)

🔴 परिणामों के बारे में कोई कुछ नहीं कर सकता। जो परिणाम आपके हाथ में नहीं हैं, फिर क्यों आप ऐसा करते हैं कि उनके बारे में इतना ज्यादा लालच बनाये रखें और अपनी शान्ति को खो बैठें। आप केवल कर्तव्य की बात सोचिए, केवल माली की बात सोचिए, मालिक की बात खत्म, अधिकार की बात खत्म। कर्तव्य आपके हाथ में हैं, अधिकार दूसरों के हाथ में हैं। दूसरे देंगे तो अधिकार मिलेगा, नहीं देंगे, तो कैसे मिलेगा? आप अधिकार को लौंग मानिए और अपने कर्तव्यों को, जिम्मेदारी को उससे सुगन्धित कीजिए।

🔵 एक और बात मैं कहता हूँ, आप अपने स्वभाव में से एक और चीज को बदल सकते हैं। खीज़ बदल दीजिए, नाउम्मीदी की खीज़, अभावों की खीज़। आप खीज़ को छोड़कर एक नई चीज ग्रहण कर लें—मुसकराना। आप हर समय मुसकराने की कोशिश कीजिए, बनावटी ही मुसकराहट, फिर देखिए आपके स्वभाव में किस तरह परिवर्तन होता है? मन को हल्का-फुल्का रखें, खिलाड़ी की तरह जिन्दगी जिएँ, नाटक के तरीके से अभिनय तो आप कीजिए; पर इतने ज्यादा मशगूल मत हो जाइए, जिससे आपकी स्वाभाविक प्रसन्नता ही चली जाए। आप हँसते रह सकते हैं। ताश खेलते समय में बादशाह काट दिया, बेगम काट दी, गुलाम भी काट दिया, सब काट दिये; लेकिन तब भी चेहरे पर शिकन नहीं। आप ऐसा ही कीजिए।

🔴 आपको प्रसन्नता हो, खुशी के, सफलताओं के मौके आएँ, ठीक हैं, आप अच्छे रहिए; लेकिन जब मुसीबतों के मौके आएँ, तब? तब भी आप प्रसन्न रहिए, मुसकराते रहिए। मुसीबतें जो-जो आती हैं, वह आपको मजबूत बनाने के लिए आती हैं, आपकी हिम्मत और दिलेरी जताने के लिए आती हैं, आपकी समझदारी को तीखा करने के लिए आती हैं और आपका व्यक्तित्व सोने में तपाकर खरा जैसा बना देने के लिए आती हैं। आप मुसीबतों की भी शोहबत कीजिए। यह नहीं कहता हूँ कि मुसीबतों को न्यौत बुलाइए; लेकिन मुसीबतें जब आएँ, तब घबड़ाइए मत, हिम्मत से काम लीजिए। ऐसा आप नहीं कर पायेंगे क्या? आप ऐसा ही कीजिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 इस धरा का पवित्र श्रृंगार है नारी (भाग 6)

🔴 नारी अपने विभिन्न रूपों में सदैव मानव जाति के लिये त्याग, बलिदान, स्नेह श्रद्धा, धैर्य, सहिष्णुता का जीवन बिताती रही है। नारी धरा पर स्वर्गीय ज्योति की साकार प्रतिमा मानी गई है। उसकी वाणी जीवन के लिये अमृत स्रोत है। उस नेत्रों में करुणा, सरलता और आनन्द के दर्शन होते है। उसके हास में संसार की समस्त निराशा और कटुता मिटाने की अपूर्व क्षमता है। नारी संतप्त हृदय के लिये शीतल छाया और स्नेह सौजन्य की साकार प्रतिमा है। नारी पुरुष की पूरक सत्ता है। वह मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति है। उसके बिना पुरुष का जीवन अपूर्ण है। नारी ही उसे पूर्ण बनाती हैं जब मनुष्य का जीवन अंधकार युक्त हो जाता है तो नारी की संवेदना पूर्ण मुस्कान उसमें उजाला बिखेर देती है।

🔵 पुरुष के कर्तव्य शुष्क जीवन की वह सरलता प्रकट करते हुए श्रीमती महादेवी वर्मा ने एक स्थान पर लिखा है-

🔴 नारी केवल माँस-पिंड की संज्ञा नहीं है। आदिम काल से आज तक विकास पथ पर पुरुष का साथ देकर उसकी यात्रा को सफल बनाकर उसके अभिशापों को स्वयं झेलकर और अपने वरदानों से जीवन में अक्षय शाँति भर कर मानवों ने जिस व्यक्तित्व, चेतना और हृदय का विकास किया है, उसी का पर्याप्त नारी है।

🔵 कहना न होगा कि नारी का सहयोग तथा उसका महत्व मानव जीवन में उन्नति एवं विकास के लिये सदा अनिवार्य रहा है, आज भी है और आगे भी रहेगा। वह समाज, राष्ट्र, परिवार अथवा व्यक्ति उन्नति नहीं कर सकता जो किसी भी रूप में नारी का आदर नहीं कर सकता। जो समाज परिवार अथवा राष्ट्र नारी का जो कि उनका आधार तथा भक्ति स्रोत है अधिकार छीन लेता है वह पंगु होकर पर-दलित अथवा पतित अवस्था में पड़ा रहता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति- अगस्त 1995 पृष्ठ 26
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1995/August/v1.26

👉 आत्मचिंतन के क्षण 27 June

🔴 सर्वव्यापी निराकार सत्ता से व्यक्तिगत मैत्री इस प्रकार नहीं जगायी जा सकती जैसे कि दुनियादार मतलब के लिए गधे को भी बाप बना लेते हैं और स्वार्थ सिद्ध न होने पर उसके साथ उपेक्षा या शत्रुता का व्यवहार करने लगते हैं। स्मरण रहे ईश्वर पर किसी की निन्दा प्रेरणा का प्रभाव नहीं पड़ता। वह अपने सामने वालों को सदा महानता अपनाने की प्रेरणा देता है और जिसने इस अनुशासन को जितनी मात्रा में अपनाया, उसे उतनी ही मात्रा में अपने स्नेह एवं अनुग्रह प्रदान करता है।

🔵 ईश्वर के निकटवर्ती एवं विश्वासी वे हैं जो उसके इस विश्व उद्यान को अधिक सुन्दर, समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाने का प्रयत्न करते हैं, जो अपने आप को मलीनताओं से छुड़ाकर अधिक से अधिक पवित्र और प्रखर बनाने का प्रयत्न करते हैं। वस्तुतः जीवन साधना ही सच्ची ईश्वर उपासना है। पूजाकृत्य ऐसी ही मनोभावना विकसित करने के लिए अपनाये जाते हैं।
                                              
🔴 मनुष्य के मस्तिष्क को यदि भानुमति का पिटारा कहा जाय, तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी, क्योंकि इसमें इतनी और ऐसी-ऐसी अद्भुत और आश्चर्यजनक क्षमताएँ भरी पड़ी हैं, जिन्हें यदि जीवन्त जाग्रत कर लिया जाय, तो यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि मनुष्य दीन-हीन स्थिति में पड़ा नहीं रह सकता। यदा-कदा यही क्षमताएँ दुर्घटनावश जग पड़ती है, तो हर कोई यह विश्वास करने लगता है कि यदि प्रयासपूर्वक मनुष्य इन्हें जगा ले, तो मनुज - चोले में ही वह नारायण की क्षमता अर्जित करने में सफल हो सकता है ।

🌹 ~पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 लक्ष्य की दिशा में अग्रसर

🔵 मनुष्य उज्ज्वल भविष्य की मनोरम कल्पनाएँ किया करता है। सुखमय जीवन का स्वप्न देखता है। उन्नति की योजनाएँ बनाता है। सफलता के सूत्र ढूँढ़ता है। लक्ष्य की दिशा में अग्रसर होने के लिए हर तरह की कोशिशें करता है। पर जब वह पीछे मुड़कर उपलब्धियों का मूल्याँकन करना चाहता है तो पता चलता है कि उसकी मनचाही योजनाएँ या तो मन में धरी रही गईं अथवा उनका क्रियान्वयन आधा-अधूरा हो पाया। इससे इसे अपने पुरुषार्थ पर खीज भी आती है व आक्रोश भी कारण ढूँढ़ पाने में वह सफल नहीं हो पाता।

🔴 असफलताजन्य खीज की प्रतिक्रियाएँ प्रायः दो अतिवादी स्वरूपों में अभिव्यक्ति होती हैं। एक व्यक्ति अपने को नितान्त अयोग्य मानकर घोर निराशा में निमग्न हो जाता है। एवं सारा दोष, भाग्य, भगवान अथवा परिस्थितियों के मत्थे मढ़कर निश्चित हो जाता है। इस प्रकार के व्यक्तियों के जीवन में सफलता की सम्भावनाएँ क्रमशः धूमिल होती जाती हैं।

🔵 दूसरा वर्ग सफल व्यक्तियों का है। असफलता के कारणों की छान-बीन करते समय इनका दृष्टिकोण सन्तुलित रहता है। अपनी गतिविधियों का पर्यवेक्षण निष्पक्ष न्यायाधीश की तरह करने पर पता चलता है कि स्वयं के भीतर पल रही अवाँछनीय और अनुपयुक्त विचार ही असफलताओं का मूल कारण है।

🔴 आदतें क्रियात्मक नहीं मूलतः विचारात्मक होती हैं। अतः सुधार की प्रक्रिया बहिरंग के साथ अन्तरंग में भी चलनी चाहिए। चिन्तन और व्यवहार का अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है। इसलिए सुधार-परिवर्तन के लिए दोनों मोर्चों पर समान रूप से तैनाती की आवश्यकता रहती है। इस उभय पक्षीय प्रयोजन की पूर्ति का सरल उपाय यह है कि विचारों को विचारों से ही काटा जाय। लब्ध प्रतिष्ठ मनोचिकित्सक सर नार्मन विंसेंट पील के प्रयोग इस संदर्भ में उल्लेखनीय हैं।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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