गुरुवार, 21 सितंबर 2017

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 70)

🌹  ‘‘हम बदलेंगे-युग बदलेगा’’, ‘‘हम सुधरेंगे-युग सुधरेगा’’ इस तथ्य पर हमारा परिपूर्ण विश्वास है।  

🔴 व्यक्ति और समाज की समग्र प्रगति के लिए चिंतन की स्वस्थ दिशा एवं उत्कृष्टता दृष्टिकोण का होना अनिवार्य एवं आवश्यक है। इसकी पूर्ति चाहे आज की जाए चाहे से हजार वर्ष बाद। प्रगति का प्रभाव उसी दिन उदय होगा, जिस दिन यह भली-भाँति अनुभव कर लिया जाएगा कि दुर्दशा से छुटकारा पाने के लिए दुर्बुद्धि का परित्याग आवश्यक है। आज की स्थिति में सबसे बड़ा शौर्य, साहस, पराक्रम और पुरुषार्थ यह है कि हम पूरा मनोबल इकट्ठा करके अपनी और अपने सवे संबंधित व्यक्तियों की विचार शैली में ऐसा प्रखर परिवर्तन प्रस्तुत करें, जिसमें विवेक की प्रतिष्ठापना हो और अविवेकपूर्ण दुर्भावनाओं एवं दुष्प्रवृत्तियों को पैरों तले कुचल कर रख दिया जाए।
   
🔵 मूढ़ता और दुष्टता के प्रति व्यामोह ने हमें असहाय और कायर बना दिया है। जिसे अनुचित अवांछनीय समझते हैं, उसे बदलने सुधारने का साहस कर नहीं पाते। न तो सत्य को अपनाने का साहस है और न असत्य को त्यागने का। कुड़-कुड़ाते भर जरूर हैं कि हम अनुपयुक्त विचारणा एवं परिस्थितियों से ग्रस्त हैं, पर जब सुधार और बदलाव का प्रश्न आता है, तो पैर थर-थर कर काँपने लगते हैं और जी काँपने लगता है। कायरता नस-नस में रम कर बैठ गई है। अपनी अवांछनीय मान्यताओं से जो नहीं लड़ सकता, वह आक्रमणकारियों से क्या लड़ेगा? जो अपनी विचारणा को नहीं सुधार सकता, वह परिस्थितियों को क्या सुधारेगा?
  
🔴 युग परिवर्तन का शुभारंभ अपनी मनोभूमि के परिवर्तन के साथ आरंभ करना होगा। हम लोग नव निर्माण के संदेशवाहक एवं अग्रदूत हैं। परिवर्तन की प्रक्रिया हमें अपनी चिंतन दिशा अविवेक से विलग कर विवेक के आधार पर विनिर्मित करनी चाहिए। जो असत्य है, अवांछनीय है, अनुपयोगी है, उसे छोड़कर हम साहस दिखाएँ। अब बहादुरी का मुकुट उनके सिर बाँधा जाएगा, जो अपनी दुर्बलताओं से लड़ सकें और अवांछनीयता को स्वीकार करने से इंकार कर सकें। नव निर्माण के अग्रदूतों की साहसिकता इसी स्तर की होनी चाहिए। उनका प्रथम चरण अपनी अवांछनीय मान्यताओं को बदल डालने और अपने क्रिया-कलाप में आवश्यक परिवर्तन करने के लिए एक बार पूरा मनोबल इकट्ठा कर लेना चाहिए और बिना दूसरों की निंदा-स्तुति की, विरोध-समर्थन की चिंता किए निर्दिष्ट पथ पर एकाकी चल देना चाहिए। ऐसे बड़े कदम जो उठा सकते हों, उन्हीं से यह आशा की जाएगी कि युग परिवर्तन के महान् अभियान में वास्तविकता योगदान दे सकेंगे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.99

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.18

👉 ज्ञान प्रधान धर्मशास्त्र (अंतिम भाग)

🔴 जो यह कहते हैं कि विवेकबुद्धि की तराजू पर तोलना मूर्खता है, वे निश्चय अदूरदर्शी है। मान लीजिए, एक ईसाई किसी मुसलमान से इस प्रकार झगड़ रहा है :—”मेरा धर्म प्रत्यक्ष ईश्वर ने ईसा से कहा है।” मुसलमान कहता है :—”मेरा भी धर्म ईश्वर-प्रणीत है।” इस पर ईसाई जोर देकर बोला—”तेरी धर्म पुस्तक में बहुत सी झूठी बात लिखी हैं, तेरा धर्म कहता है कि हर एक मनुष्य को सीधे से नहीं तो जबरदस्ती मुसलमान बनाओ। यदि ऐसा करने में किसी की हत्या भी करनी पड़े तो पाप नहीं है। मुहम्मद के धर्म प्रचारक को स्वर्ग मिलेगा।” मुसलमान ने कहा :—”मेरा धर्म जो लिखा है सो सब ठीक है।” ईसाई ने उत्तर दिया :—”ऐसी बातें मेरी धर्म पुस्तक में नहीं लिखी हैं, इससे वे झूठी नहीं हैं।”

🔵 मुसलमान झल्लाकर बोला:— ”तेरी पुस्तक से मुझे क्या प्रयोजन है? काफिरों को मार डालने की आज्ञा को झूँठ करने का तुझे क्या अधिकार है? तेरा कथन है कि ईसा का लिखा सब सच है मैं कहता हूँ मुहम्मद जो कुछ कह गये हैं, वही ठीक है।” इस प्रकार के प्रश्नोत्तरों से दोनों को लाभ नहीं पहुँचता। एक दूसरे की धर्मपुस्तक को बुरी दृष्टि से देखते हैं इससे वे निर्णय नहीं कर सकते कि किस पुस्तक के नीतितत्व श्रेष्ठ हैं। यदि विवेचक बुद्धि को दोनों काम में लावें तो सत्य वस्तु का निर्णय करना कठिन न होगा। किसी धर्म पुस्तक पर विश्वास न होने पर भी उसमें लिखी हुई किसी खास बात को यदि विवेचक बुद्धि स्वीकार कर ले तो तुरन्त समाधान हो जाता है।

🔴 हम जिसे विश्वास कहते हैं वह भी विवेचक बुद्धि से ही उत्पन्न हुआ है। परन्तु यहाँ पर यह प्रश्न उठता है कि दो महात्माओं के कहे हुए जुदे-जुदे या परस्पर विरुद्ध विधानों की परीक्षा करने के शक्ति हमारी विवेचक बुद्धि में है या नहीं? यदि धर्मशास्त्र इन्द्रियातीत है और उसकी मीमाँसा करना हमारी शक्ति के बाहर का काम हो तो समझ लेना चाहिये कि पागलों की व्यर्थ बकबक या झूठी किस्सा कहानियों की पुस्तकों से धर्मशास्त्र का अधिक महत्व नहीं है। धर्म ही मानवी अन्तःकरण के विकास का फल है। अन्तःकरण के विकास के साथ-साथ धर्म मार्ग चल निकले हैं। धर्म का अस्तित्व पुस्तकों पर नहीं किन्तु मानवी अन्तःकरण पर अवलम्बित है। पुस्तकें तो मनुष्यों की मनोवृत्ति के दृश्यरूप मात्र हैं। पुस्तकों से मनुष्यों के अन्तःकरण नहीं बने हैं किन्तु मनुष्यों के अन्तःकरणों से पुस्तकों का आविर्भाव हुआ है। मानवी अन्तःकरण का विकास ‘कारण’ और ग्रन्थ रचना उसका ‘कार्य’ है, ‘कारण’ नहीं। विवेचक बुद्धि की कसौटी पर रख कर यदि हम किसी कार्य को करेंगे तो उसमें धोखा नहीं उठाना पड़ेगा। धर्म को भी उस कसौटी पर परख लें तो उसमें हमारी हानि ही क्या है?

🌹 समाप्त
🌹 स्वामी विवेकानन्द जी
🌹 अखण्ड ज्योति- सितम्बर 1952 पृष्ठ 4
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1952/September/v1.4

👉 आज का सद्चिंतन 21 Sep 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 21 Sep 2017