सोमवार, 11 नवंबर 2019

Building a Person, his Family and his Society | Pt Shriram Sharma Acharya



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Teen Ganthen | तीन गांठें | Motivational Story



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👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 11 Nov 2019



👉 मन को स्वच्छ और सन्तुलित रखें (भाग ५)

उत्कृष्ट व्यक्तित्व का एक ही पक्ष है- भौतिक महत्त्वाकाँक्षाओं का दमन, न्यूनतम निर्वाह की अपरिग्रह परम्परा का वरण। जिनकी निजी महत्त्वाकांक्षाएँ अभिलाषाएँ, तृष्णा, लिप्साएँ असाधारण रूप से उभरी होती है, उनके लिए यह किसी भी प्रकार सम्भव नहीं हो सकता कि वे नीति-नियमों का व्यतिरेक न करें। इसी प्रकार यह भी नहीं बन पड़ता कि समय, श्रम या साधनों का उपार्जन से कम उपयोग अपने लिए करें और उस बचत को उच्च स्तरीय प्रयोजनों के लिए नियोजित करें। लिप्सा में भौतिक दोष यह है कि उसकी तृप्ति की कोई मर्यादा नियत नहीं रहती। कमी कभी दूर नहीं होती और अधिक कमाने, जोड़ने, उड़ाने की व्याकुलता उसी अनुपात से बढ़ती चली जाती है। फल यह होता है कि आदर्शवादिता की मात्र उथली चर्चा या खोखली विडम्बना ही बन पाती है। वैसा कोई ठोस प्रयत्न नहीं बन पड़ता जैसा कि उत्कृष्ट जीवन के लिए अपेक्षित है। अतएव निस्पृह जीवन के लिए यह अनिवार्य है कि भौतिक आकाँक्षाओं और आवश्यकताओं को उतना नियन्त्रित किया जाय कि वे लगभग औसत नागरिक स्तर की जा पहुँचे। आत्म-निर्माण का, आत्म-परिष्कार का सुनियोजन इससे कम में नहीं बन पड़ता।

अध्यात्म जीवन जीने की एक शैली है। पूजा उपचार उसके लिए भावनात्मक पृष्ठभूमि बनाने वाले उपचार हैं। उपासनात्मक क्रिया-कृत्यों को याचना, रिश्वत, जेबकटी, बाजीगरी के रूप में जो अपनाते हैं, वे भूल करते हैं। देवताओं को मन्त्रबल से वशवर्ती बनाकर उनसे उचित अनुचित कुछ करा लेने की दुरभिसन्धि में नियत व्यक्ति जब अपनी दुरभिसन्धियों को भक्ति भावना, योग साधना आदि का नाम देते हैं, तब हँसी रोके नहीं रुकती। बाल क्रीड़ाओं से यदि ऊँचा उठा जा सके, तो अध्यात्म का एक मात्र यही स्वरूप रहा जाता है कि व्यक्तित्व को अधिकतम पवित्र, प्रखर एवं उदात्त बनाया जाय। जो क्षमता विभूतियाँ उपलब्ध हैं उन्हें सत्प्रवृत्ति संवर्धन के लिए लगाया जाय। वसुधैव कुटुम्बकम् का आदर्श हर घड़ी सामने रखकर अपनेपन का दायरा इतना बड़ा बना दिया जाय कि आत्मवत् सर्वभूतेषु की प्रतीति होने लगे। दूसरों के दुःख को बँटा लेने और अपने सुख को बाँट देने की उमंग इतनी उमगे कि उसे रोक सकने में संकीर्ण स्वार्थपरता कोई व्यवधान प्रस्तुत न कर सकें।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 साधना से सिद्धि

साधना की गयी पर सिद्धि नहीं मिली। तप तो किया गया, पर तृप्ति नहीं मिली। अनेकों साधकों की विकलता यही है। लगातार सालों-साल साधना करने के बाद वे सोचने लगते हैं, क्या साधना का विज्ञान मिथ्या है? क्या इसकी तकनीकों में कोई त्रुटि है? ऐसे अनेकों प्रश्न कंटक उनके अन्तःकरण में हर पल चुभते रहते हैं। निरन्तर की चुभन से उनकी अन्तरात्मा में घाव हो जाता है। जिससे वेदना रिसती रहती है। बड़ी ही असह्य होती है चुभन और रिसन की यह पीड़ा। बड़ा ही दारुण होता है यह दर्द।
  
महायोगी गोरखनाथ का एक युवा शिष्य भी एक दिन ऐसी ही पीड़ा से ग्रसित था। वेदना की विकलता की स्पष्ट छाप उसके चेहरे पर थी। एक छोटे से नाले को पार करके वह एक खेत की मेड़ पर हताश बैठा था। रात प्रायः बीत गयी थी। खेतों पर सुबह का सूरज फैलने लगा था। पास से गुजरती बैलगाड़ी की आवाज सुनकर चाँदनी के फूलों-सी बगुलों की पात सूरज की ओर उड़ गयी। इनकी ओर उसने बड़ी ही निराश नजरों से देखा। तभी उसे पास के खेत से ही गोरखनाथ आते दिखाई दिये।
  
उनके चरणों पर सिर रखकर प्रणाम करते हुए उसने पूछा- गुरुदेव! मेरी वर्षों की साधना निष्फल क्यों हुई? भगवान् मुझसे इतना रूठे क्यों हैं? महायोगी हँसे और कहने लगे-पुत्र! कल मैं एक बगीचे में गया था। वहाँ कुछ दूसरे युवक भी थे। उनमें से एक को प्यास लगी थी। उसने बाल्टी कुएँ में डाली, कुआँ गहरा था। बाल्टी खींचने में भारी श्रम पड़ा। लेकिन जब बाल्टी लौटी तो खाली थी। उस युवक के सभी साथी हँसने लगे।
  
मैंने देखा-यह बाल्टी तो ठीक मनुष्य के अन्तःकरण जैसी है, इसमें छेद ही छेद हैं। बस यह कहने भर को बाल्टी थी, उसमें छेद ही छेद थे। बाल्टी कुएँ में गयी, पानी भी भरा, पर सब बह गया। वत्स! साधक के मन की यही दशा है। इस छेद वाले मन से कितनी ही साधना करो, पर छेदों के कारण सिद्धि नहीं मिलती। इससे कितना ही तप करो पर तृप्ति नहीं मिलती। सिद्धि और तृप्ति चाहिए तो पहले मन के छेदों को मिटाओ। अपने दोष, दुर्गुणों को दूर करो।
  
पहले संयम-तब साधना -फिर सिद्धि। यही साधना से सिद्धि का मर्म है। अपने मन की बाल्टी ठीक हो तो साधना सिद्धिदायी होती है। मन की बाल्टी में छेद हो तो तप तो खूब होता है, पर तृप्ति नहीं मिलती। भगवान् कभी भी किसी से रूठे नहीं रहते। बस साधक के मन की बाल्टी ठीक होनी चाहिए। कुआँ तो सदा ही पानी देने के लिए तैयार है। उसकी ओर से कभी भी इन्कार नहीं है।

✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 जीवन पथ के प्रदीप से पृष्ठ ११९

👉 आत्मचिंतन के क्षण 11 Nov 2019

★ कोई व्यक्ति विद्वानों के साथ रहे पर उसके मन में वेश्याओं की छवि भाव भंगी, कुचेष्टाएँ नाचती रहें, और विकार पूर्ण अंगों तथा चेष्टाओं का चिंतन करता रहे तो निश्चय ही विद्वानों की संगति का उतना प्रभाव न होगा जितना उन मानसिक काम विकारों का होगा।

◆ स्वाद को जीतने के लिए एक नियम तो यह है कि मसालों को सर्वथा अथवा जितना हो सके त्याग देना चाहिए, और दूसरा अधिक जोरदार उपाय यह है कि इस भावना की वृद्धि हमेशा की जाय कि हम स्वाद के लिए नहीं, केवल शरीर रक्षा के लिए ही भोजन करते हैं।

□ जीवन एक झूले है जिस में आगे भी और पीछे भी झोटे आती है। झूलने वाला पीछे जाते हुए भी प्रसन्न होता है। और आगे आते हुए भी, यह अज्ञानग्रस्त, माया मोहित, जीवन विद्या से अपरिचित लोग बात बात में अपना मानसिक संतुलन खो बैठते है। कभी हर्ष में मदहोश होते है तो कभी शोक में पागल बन जाते है।  
 
■ जो अलज्जा के काम में लज्जा करते हैं और लज्जा के काम में लज्जा नहीं करते, जो भय रहित काम में भय देखते हैं और भय के काम में निर्भय रहते हैं, और जो अदोष में दोष बुद्धि रखते हैं और दोष में अदोष रखते हैं वे झूठी धारणा वाले जीव दुर्गति को प्राप्त होते हैं।
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Gayatri Sadhna truth and distortions (Part 3)

👉 In what way the twenty-four emanations of Divine Mother (Matrikas) represent Gayatri?

★  As various organs perform specific functions in the human body, the primary divine energies inherent in the Primordial Supreme Power (Adyashakti) of God have been  conceived as twenty-four motherly emanations or nine Devis (female deities) - since, amongst the living beings in the world, only the female of the species is capable of creation.

👉 Are Gayatri and Savitri different?

★ Not exactly. They are different expressions of the Supreme Power of God. As such they are opposite faces of the same coin. Gayatri (idolised with nine faces) and Savitri (idolised with five faces) in fact identify the extra-sensory and sensory excellence in human life which are known as Riddhis and Siddhis in yogic parlance. Gayatri and Savitri are inseparable - inherent like heat and light in fire.

👉  What are the specific divine emanations associated with Gayatri and Savitri?

★ As mentioned in the answers to Q.No. 4, Gayatri and Savitri are two sides of the same coin. Gayatri has been referred to by innumerable names. Amongst its significant twenty-four thousand aliases, 24 represent its principal emanations. Twelve of these have been idolized for practical spiritual growth and the remaining twelve for material gains. These are enumerated as:

A) Emanations worshipped for spiritual growth (Adhyatmik pragati)
1) Adyashakti  2) Brahmi  3) Vaishnavi  4) Shambhavi     5) Vedmata   6)Devmata  7) Vishwamata  8) Ritambhara    9) Mandakini  10) Ajapa  11) Riddhi  12) Siddhi
  
B) Emanations worshipped for material gains
1) Savitri 2) Saraswati 3) Lakhyami 4) Durga 5) Kundalini 6) Pranagni 7) Bhawani 8) Bhuwaneshwari 9) Annapurna 10) Mahamaya 11) Payaswani 12)  Tripura    (For details please refer to the publication ‘Gayatri  ki Chaubis Shakti Dharaein’ in Hindi- Published by this mission.)

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya
📖 Gayatri Sadhna truth and distortions Page 17-18

👉 जीवन की सफलता

जीवन ऊर्जा का महासागर है। काल के किनारे पर अगणित अन्तहीन ऊर्जा की लहरें टकराती रहती हैं। इनकी न कोई शुरुआत है, और न कोई अन्त; बस मध्य है...