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शनिवार, 2 अक्टूबर 2021

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (अन्तिम भाग)

बन्धन क्या? मुक्ति कैसे?

इस दुर्गति में पड़े रहने से आज का समय किसी प्रकार कट भी सकता है, पर भविष्य तो अन्धकार से ही भरा रहेगा। विवेक की एक किरण भी कभी चमक सके तो उसकी प्रतिक्रिया परिवर्तन के लिये तड़पन उठने के रूप में ही होगी। प्रस्तुत दुर्दशा की विडम्बना और उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना का तुलनात्मक विवेचन करने पर निश्चित रूप से यही उमंग उभरेगी कि परिवर्तन के लिये साहस जुटाया जाय। इसी उभार के द्वारा अध्यात्म जीवन में प्रवेश और साधना प्रयोजनों का अवलम्बन आरम्भ होता है।

परिवर्तन का प्रथम चरण है, बन्धनों का शिथिल करना। आकर्षणों के अवरोधों से विमुख होना। आसक्ति को वैराग्य की मनःस्थिति में बदलना। इसके लिये कई तरह के संयम परक उपायों का अवलम्बन करना पड़ता है। साधना रुचि परिवर्तन की प्रवृत्ति को उकसाने से आरम्भ होती है। इस संदर्भ में महर्षि पातंजलि का कथन है।
बन्धकारण शैथिल्यात्प्राचार सम्वेदनस्य ।

चित्तस्य पर शरीरावेशः ।।
—योग दर्शन 3-38
बन्धनों के कारण डीले हो जाने पर चित्त की सीमा, परिधि और सम्वेदना व्यापक हो जाती है।
मोक्षस्य नहि वासोऽस्ति न ग्रामान्तरमेव वा ।
अज्ञानहृदयग्रन्थिनाशो मोक्ष इति स्मृतः ।।
—शिव गीता 13।32
अर्थात्—मोक्ष किसी स्थान विशेष में निवास करने की स्थिति नहीं है। न उसके लिये किसी अन्य नगर या लोक में जाना पड़ता है। हृदय के अज्ञानांधकार का समाप्त हो जाना ही मोक्ष है।

मोक्ष में परमात्मा की प्राप्ति होती है। अथवा परमात्मा की प्राप्ति ही मोक्ष है। यह मोक्ष क्या है? भव बन्धनों से मुक्ति। भव-बन्धन क्या हैं? वासना, तृष्णा और अहंता के—काम, लोभ और क्रोध के नागपाश। इनसे बंध हुआ प्राणी ही माया ग्रसित कहलाता है। यही नारकीय दुर्दशा का दल-दल है। इससे उबरते ही आत्मज्ञान का आलोक और आत्म-दर्शन का आनन्द मिलता है। इस स्थिति में पहुंचा हुआ व्यक्ति परमात्मा का सच्चा सान्निध्य प्राप्त करता है और ज्ञान तथा सामर्थ्य में उसी के समतुल्य बन जाता है।
अथर्ववेद में कहा गया है—

ये पुरुषे ब्रह्मविदुः तेविदुः परमेष्ठितम् ।
अर्थात्—जो आत्मा को जान लेता है, उसी के लिये परमात्मा का जान लेना भी सम्भव है। ऋग्वेद में आत्मज्ञान को ही वास्तविक ज्ञान कहा गया है। ग्रन्थों के पढ़ने से जानकारियां बढ़ती हैं, आत्मानुभूति से अपने आपे को और परमतत्व को जाना जाता है। श्रद्धा-विहीन शब्दचर्चा का ऊहापोह करते रहने से तो आत्मा की उपलब्धि नहीं होती। एक ऋचा है—यः तद् न वेदकिम् ऋचा करिष्यति।’’

जो उस आत्मा तत्व को नहीं जान पाया वह मन्त्र, बात या विवेचन करते रहने भर से क्या पा सकेगा? उपनिषद् का कथन है—‘‘ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति’’ अर्थात् ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म ही बन जाता है।

यह स्थिति जीवन और जगत के पीछे छिपी हुई कारण सत्ता को देखने तथा उसे समझने, बोध प्राप्त करने के लिये साधना स्तर के प्रयासों से ही सम्भव है। भारतीय मनीषियों ने इसीलिये तत्व दर्शन को ही बन्धन मुक्ति का उपाय बताया है यह दृष्टि अपने मन, बुद्धि चित्त और अहंकार के परिष्कार पूर्वक ही विकसित की जा सकती है। योग तप, ब्रह्मविद्या, साधना, उपासना, अभ्यास, मनन, चिन्तन और ध्यान निदिध्यासन द्वारा चित्त वृत्ति को इतना निर्मल परिष्कृत बनाया जाता है कि यह तत्व दृष्टि विकसित की जा सके।

.... समाप्त
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ११०
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2021

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ७०)

बन्धन क्या? मुक्ति कैसे?

लालची मक्खी और चींटी की आसक्ति, आतुरता उसे विपत्ति के बन्धनों में जकड़ देती है और प्राण संकट उपस्थित करती है। चासनी को आतुरतापूर्वक निगल जाने के लोभ में यह अबोध प्राणी उस पर बेतरह टूट पड़ते हैं और अपने पंख, पैर उसी में फंसा कर जान गंवाते हैं। मछली के आटे की गोली निगलने और पक्षी के जाल में जा फंसने के पीछे भी वह आतुर अशक्ति ही कारण होती है, जिसके कारण आगा-पीछा सोचने की विवेक बुद्धि को काम कर सकने का अवसर ही नहीं मिलता।

शरीर के साथ जीव का अत्यधिक तादात्म्य बन जाना ही आसक्ति एवं माया है। होना यह चाहिए कि आत्मा और शरीर के साथ स्वामी सेवक का—शिल्पी उपकरण का भाव बना रहे। जीव समझता रहे कि मेरी स्वतन्त्र सत्ता है। शरीर के वाहन, साधन, प्रकृति यात्रा की सुविधा भर के लिए मिले हैं। साधन की सुरक्षा उचित है। किन्तु शिल्पी अपने को—अपने सृजन प्रयोजन को भूल कर—उपकरणों में खिलवाड़ करते रहने में सारी सुधि-बुद्धि खोकर तल्लीन बन जाया तो यह स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण हो होगी। तीनों शरीर तीन बन्धनों में बंधते हैं। स्थूल शरीर इन्द्रिय लिप्सा में, वासना में। सूक्ष्म शरीर (मस्तिष्क) सम्बन्धियों तथा सम्पदा के व्यामोह में। कारण शरीर-अहंता के आतंक फैलाने वाले उद्धत प्रदर्शनों में। इस प्रकार तीनों शरीर—तीन बन्धनों में बंधते हैं और आत्मा उन्हीं में तन्मय रहने की स्थिति में स्वयं ही भव बंधनों में बंध जाता है। यह लिप्सा लालसायें इतनी मादक होती है कि जीव उन्हें छोड़कर अपने स्वरूप एवं लक्ष्य को ही विस्मृति के गर्त में फेंक देता है। वेणुनाद पर मोहित होने वाले मृग वधिक के हाथों पड़ते हैं। पराग लोलुप भ्रमर-कमल में कैद होकर दम घुटने का कष्ट सहता है। दीपक की चमक से आकर्षित पतंगे की जो दुर्गति होती है व सर्वविदित है। लगभग ऐसी ही स्थिति व्यामोह ग्रसित जीव की भी होती है। उसे इस बात की न तो इच्छा उठती है और न फुरसत होती है कि अपने स्वरूप और लक्ष्य को पहचाने। उत्कर्ष के लिए आवश्यक संकल्प शक्ति जगाई जा सकती तो इस महान प्रयोजन के लिये मिली हुई विशिष्ट क्षमताओं को भी खोजा जगाया जा सकता था। किन्तु उसके लिये प्रयत्न कौन करे? क्यों करे? जब विषयानन्द की ललक ही मदिरा की तरह नस-नस पर छाई हुई है तो ब्रह्मानन्द की बात कौन सोचे? क्यों सोचे?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ १०८
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

बुधवार, 29 सितंबर 2021

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ६९)

बन्धन क्या? मुक्ति कैसे?

अधिकांश क्षमता तो भव बन्धनों में ही पड़ी जकड़ी रहती है। भ्ज्ञव बन्धन क्या है? व्यामोह ही भव बन्धन है। भव बन्धनों में पड़ा हुआ प्राणी कराहता रहता है और हाथ पैर बंधे होने के कारण प्रगति पथ पर बढ़ सकने में असमर्थ रहता है। व्यामोह का माया कहते हैं।माया का अर्थ है नशे जैसी खुमारी जिसमें एक विशेष प्रकार की मस्ती होती है। साथ ही अपनी मूल स्थिति की विस्मृति भी जुड़ी रहती है। संक्षेप में विस्मृति और मस्ती के समन्वय को नशे की पिनक कहा जा सकता है, चेतना की इसी विचित्र स्थिति को माया, मूढ़ता, अविद्या, भव बन्धन आदि नामों से पुकारा जाता है।

ऐसी विडम्बना में किस कारण प्राणी बंधता, फंसता है? इस प्रश्न पर प्रकाश डालते हुए आत्म दृष्टाओं ने विषयवती वृत्ति को इसका दोषी बताया है। विषयवती वृत्ति की प्रबलता को बन्धन का मूल कारण बताते हुये महर्षि पातंजलि ने योग दर्शन के कुछ सूत्रों में वस्तुस्थिति पर प्रकाश डाला है।

विषयवती वा प्रवृत्तित्पत्रा मनसः स्थिति निबंधिनि ।
—यो. द. 1-35
सत्व पुरुषायोरत्यन्ता संकीर्णयोः प्रत्यया विशेषो भोगः । परार्धात्स्वार्थ संयतात्पुरुषा ज्ञानम् ।
—यो. द. 3-35
ततः प्रतिम श्रावण वेदनादर्शी स्वाद वार्ता जायन्ते ।
—यो. द. 3-36
उपरोक्त सूत्रीं में यह बताने का प्रयत्न किया गया है कि शारीरिक विषय विकारों में आसक्ति बढ़ जाने से जीव अपनी मूल स्थिति को भूल जाता है और उन रसास्वादनों में निमग्न होकर भव बन्धनों में बंधता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ १०७
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

शनिवार, 25 सितंबर 2021

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ६८)

एक ही सत्ता ओत-प्रोत है

विकासवाद के सिद्धान्त के समर्थक यह कहते हैं कि अपने सुविधापूर्ण जीवन के लिए इच्छा ने उन जीवों के शरीर संस्थानों में अन्तर किया और यह अन्तर स्पष्ट होते-होते एक जीव से दूसरी किस्म का उसी से मिलता हुआ जीव विकसित होता गया। थोड़ी देर के लिये यह बात मान लें और मनुष्य शरीर को इस कसौटी पर कसें तो भी बात विकासवाद के विपरीत ही बैठेगी। मनुष्य कब से पक्षियों को देखकर आकाश में स्वतन्त्र उड़ने को लालायित है किन्तु उसके शरीर में कहीं कोई पंख उगा क्या, समुद्र में तैरते जहाज देखकर हर किसी का मन करने लगता है कि हम भी गोता लगायें और मछलियों की तरह कहीं से कहीं जाकर घूम आयें, पर वह डूबने से बच पायेगा क्या?

यह प्रश्न अब उन लोगों को भी विपरीत दिशा में सोचने और परमात्म-सत्ता के अस्तित्व में होने की बात मानने को विवश करते हैं जो कभी इस सिद्धान्त के समर्थक रहे हैं। राबर्ट ए मिल्लीकान का कथन है—विकासवाद के सिद्धान्त से पता चलता है कि जिस तरह प्रकृति अपने गुणों और नियमों के अनुसार पदार्थ पैदा करती है, उससे विपरीत परमात्मा में ही वह शक्ति है कि वह अपनी इच्छा से सृष्टि का निर्माण करता है। प्रकृति बीज से सजातीय पौधा पैदा करती है आम के बीज से इमली पैदा करने की शक्ति प्रकृति में नहीं है। इस तरह के बीज और ऊपर वर्णित विलक्षण रचनायें पैदा करने वाली सत्ता एकमात्र परमात्मा ही हो सकता है। वही अपने आप में एक परिपूर्ण सत्ता है और वही विभिन्न इच्छाओं, अनुभूतियों, गुण तथा धर्म वाली परिपूर्ण रचनायें सृजन करता है।

क्रमिक विकास को नहीं भारतीय दर्शन पूर्णता-पूर्णता की उत्पत्ति मानता है। श्रुति कहती है।
पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्ण मुच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्ण मेवावशिष्यते ।।

अर्थात्—पूर्ण परम ब्रह्म परमात्मा से पूर्ण जगत—पूर्ण मानव की उत्पत्ति हुई। पूर्ण से पूर्ण निकाल देने से पूर्ण ही शेष रहता है।

नदी का एक किनारा समुद्र से जुड़ा रहता है और दूसरा किनारा उससे दूर होता है। दूर होते हुए भी नदी समुद्र से अलग नहीं। नदी को जल समुद्र द्वारा प्राप्त होता है और पुनः समुद्र में मिल जाता है। जगत उस पूर्ण ब्रह्म से अलग नहीं। मनुष्य उसी पूर्ण ब्रह्म से उत्पन्न हुआ इसलिये अपने में स्वयं पूर्ण है यदि इस पूर्णता का भान नहीं होता, यदि मनुष्य कष्ट और दुःखों से त्राण नहीं पाता तो इसका एकमात्र कारण उसका अज्ञान और अहंकार में पड़े रहना ही हो सकता है। इतने पर भी पूर्णता हर मनुष्य की आन्तरिक अभिलाषा है और वह नैसर्गिक रूप से हर किसी में विद्यमान रहती है।

क्षुद्रता की परिधि को तोड़कर पूर्णता प्राप्त कर लेना हर किस के लिये सम्भव है। मनुष्य की चेतन सत्ता में वह क्षमता मौजूद है, जिसके सहारे वह अपने स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों का उपयोग कर देवोपम जीवन जी सकता है। यह क्षमता उसने खो दी है। मात्र जीवन निर्वाह क्रम पूरा होते रहने भर का लाभ उस क्षमता से उठा सकना सम्भव होता है। यह उस प्रचण्ड क्षमता का एक स्वरूप अंश मात्र है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ १०६
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

शुक्रवार, 24 सितंबर 2021

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ६७)

एक ही सत्ता ओत-प्रोत है

जीवन की सार्थकता पूर्णता प्राप्ति में है, इसका तात्पर्य यह हुआ कि अभी हम अपूर्ण हैं, असत्य हैं, अन्धकार में हैं। हमारे सामने मृत्यु मुंह बांये खड़ी है। अन्धकार, असत्य और मृत्यु पर विजय प्राप्त करने के लिये हम प्रकाश, सत्य और अमरता की ओर अग्रसर होना चाहते हैं। पर हो कोई नहीं पाता। हर कोई अपने आपको अशक्त और असहाय पाता है, अज्ञान के अन्धकार में हाथ-पैर पटकता रहता है।

इस अपूर्णता पर जब कभी विचार जाता है तब एक ही तथ्य सामने आता है और वह है ‘‘परमात्मा’’ अर्थात् एक ऐसी सर्वोपरि सर्वशक्तिमान सत्ता जिसके लिए कुछ भी अपूर्ण नहीं है। वह सर्वज्ञ है, सर्वव्यापी, सर्वदृष्टा, नियामक और एकमात्र अपनी इच्छा से सम्पूर्ण सृष्टि में संचरण कर सकने की क्षमता से ओत-प्रोत है।

विकासवाद के जनक डार्विन ने यह सिद्धान्त तो प्रतिपादित कर दिया कि प्रारम्भ में एक कोशीय जीव-अमीबा की उत्पत्ति हुई यही अमीबा फिर ‘‘हाइड्रो’’ में विकसित हुआ, हाइड्रा मछली, मण्डूक, समर्पणशील पक्षी, स्तनधारी जीवों आदि की श्रेणियों में विकसित होता हुआ वह बन्दर की शक्ल तक पहुंचा, आज का विकसित मनुष्य शरीर इसी बन्दर की सन्तान है। इसके लिए शरीर रचना के कुछ खांचे भी मिलाये गये। जहां नहीं मिले वहां यह मान लिया गया कि वह कड़ियां लुप्त हैं और कभी समय पर उसकी भी जानकारी हो सकती है।

इस प्रतिपादन में डार्विन और इस सिद्धान्त के अध्येता यह भूल गये कि अमीबा से ही नर-मादा दो श्रेणियां कैसे विकसित हुईं। अमीबा एक कोशीय था उससे दो कोशीय हाइड्रा पैदा हुआ क्या अन्य सभी जीव इसी गुणोत्तर श्रेणी में आ सकते हैं यदि सर्पणशील जीवों से परधारी जीव विकसित हुये तो वह कृमि जैसे चींटे, पतिंगे, मच्छर आदि कृमि जो उड़ लेते हैं वे किस विकास प्रक्रिया में रखे जायेंगे? पक्षी, जल-जन्तु और कीड़े सभी मांस खाते हैं। स्तनधारी उन्हीं से विकसित हुए तो गाय, भैंस, बकरी, हाथी आदि मांस क्यों नहीं खाते। हाथी के दांत होते हैं हथनियों के नहीं, मुर्गे में कलंगी होती है मुर्गी में नहीं। मोर के रंग-बिरंगे पंख और मोरनियां बिना पंख वाली, विकास प्रक्रिया में एक ही जीव श्रेणी में यह अन्तर क्यों? प्राणियों में दांतों की संख्या, आकृति, प्रकृति में अन्तर पाया जाता है। घोड़े के स्तन नहीं होते बैल के अण्डकोश के पास स्तन होते हैं। पक्षियों की अपेक्षा सर्प और कछुये हजारों वर्ष की आयु वाले होते हैं, यह सभी असमानतायें इस बात का प्रमाण हैं कि सृष्टि रचना किसी विकास का परिणाम नहीं अपितु किसी स्वयम्भू सत्ता द्वारा विधिवत् रची गई कलाकृति है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ १०५
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

गुरुवार, 23 सितंबर 2021

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ६६)

एक ही सत्ता ओत-प्रोत है

ब्रह्माण्ड की शक्तियों का और पिण्ड की—मनुष्य की शक्तियों का एकीकरण कहां होता है शरीर शास्त्री इसके लिए सुषुम्ना शीर्षक, मेडुला आवलांगाटा—की ओर इशारा करते हैं। पर वस्तुतः वह वहां है नहीं। मस्तिष्क स्थित ब्रह्मरन्ध्र को ही वह केन्द्र मानना पड़ेगा, जहां ब्राह्मी और जैवी चेतना का समन्वय सम्मिलन होता है।

ऊपर के तथ्यों पर विचार करने से यह एकांगी मान्यता ही सीमित नहीं रहती कि जड़ से ही चेतन उत्पन्न होता है इन्हीं तथ्यों से यह भी प्रमाणित होता है कि चेतन भी जड़ की उत्पत्ति का कारण है। मुर्गी से अण्डा या अण्डे से मुर्गी—नर से नारी या नारी से नर—बीज से वृक्ष या वृक्ष से बीज जैसे प्रश्न अभी भी अनिर्णीत पड़े हैं। उनका हल न मिलने पर भी किसी को कोई परेशानी नहीं। दोनों को अन्योन्याश्रित मानकर भी काम चल सकता है। ठीक इसी प्रकार जड़ और चेतन में कौन प्रमुख है इस बात पर जोर न देकर यही मानना उचित है कि दोनों एक ही ब्रह्म सत्ता की दो परिस्थितियां मात्र हैं। द्वैत दीखता भर है वस्तुतः यह अद्वैत ही बिखरा पड़ा है।

न केवल चेतन समुदाय अपितु सृष्टि का प्रत्येक कण पूर्णता के लिये लालायित और गतिशील है। भौतिक-जीवन में जिसके पास स्वल्प सम्पदा है वह और अधिक की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील है, पर जो धनाढ्य हैं उन्हें भी सन्तोष नहीं। उसी के परिमाण में बह और अधिक प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील दिखाई देता है। बड़े-बड़े सम्राट तक अपनी इस अपूर्णता को पाटने के लिये आपाधापी मचाते और दूसरे साम्राज्यों की लूटपाट करते पाये जाते हैं तो लगता है सृष्टि का हर प्राणी साधनों की दृष्टि से अपूर्ण है इस दिशा में पूर्णता प्राप्त करने की हुड़क हर किसी में चढ़ी बैठी दिखाई देती है।

इतिहास का विद्यार्थी अपने आपको गणित में शून्य पाता है तो वह अपने आपको अपूर्ण अनुभव करता है, भूगोल का चप्पा छान डालने वाले को संगीत के स्वर बेचैन कर देते हैं उसे अपना ज्ञान थोथा दिखाई देने लगता है, बड़े-बड़े चतुर वकील और बैरिस्टरों को जब रोग बीमारी के कारण डाक्टरों की शरण जाना पड़ता है तो उनका अपने ज्ञान का—अभिमान चकनाचूर हो जाता है। बौद्धिक दृष्टि से हर प्राणी सीमित है और हर कोई अगाध ज्ञान का पण्डित बनने की तत्पर दिखाई देता है।

नदियां अपनी अपूर्णता को दूर करने के लिये सागर की ओर भागती हैं, वृक्ष आकाश छूने दौड़ते हैं, धरती स्वयं भी अपने आपको नचाती हुई न जाने किस गन्तव्य की ओर अधर आकाश में भागी जा रही है, अपूर्णता की इस दौड़ में समूचा सौर-मण्डल और उससे परे का अदृश्य संसार सम्मिलित है। पूर्णता प्राप्ति की बेचैनी न होती तो सम्भवतः संसार में रत्ती भर भी सक्रियता न होती सर्वत्र नीरव सुनसान पड़ा होता, न समुद्र उबलता, न मेघ बरसते, न वृक्ष उगते, न तारागण चमकते और न ही वे विराट् की प्रदक्षिणा में मारे-मारे घूमते?

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ १०४
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

सोमवार, 20 सितंबर 2021

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ६५)

एक ही सत्ता ओत-प्रोत है

नोवल पुरस्कार विजेता डा. एलेक्सिस कारेल उन दिनों न्यूयार्क के राक फेलर चिकित्सा अनुसंधान केन्द्र में काम कर रहे थे। एक दिन उन्होंने एक मुर्गी के बच्चे के हृदय के जीवित तन्तु का एक रेशा लेकर उसे रक्त एवं प्लाज्मा के घोल में रख दिया। वह रेशा अपने कोष्टकों की वृद्धि करता हुआ विकास करने लगा। उसे यदि काटा-छांटा न जाता तो वह अपनी वृद्धि करते हुए वजनदार मांस पिण्ड बन जाता। उस प्रयोग से डा. कारेल ने यह निष्कर्ष निकाला कि जीवन जिन तत्वों से बनता है यदि उसे ठीक तरह जाना जा सके और टूट-फूट को सुधारना सम्भव हो सके तो अनन्तकाल तक जीवित रह सकने की सभी सम्भावनायें विद्यमान हैं।

प्रोटोप्लाज्म जीवन का मूल तत्व है। यह तत्व अमरता की विशेषता युक्त है। एक कोश वाला अमीवा प्राणी निरन्तर अपने आपको विभक्त करते हुये वंश वृद्धि करता रहता है। कोई शत्रु उसकी सत्ता ही समाप्त करदे यह दूसरी बात है अन्यथा वह अनन्त काल तक जीवित ही नहीं रहेगा वरन् वंश वृद्धि करते रहने में भी समर्थ रहेगा।

रासायनिक सम्मिश्रण से कृत्रिम जीवन उत्पन्न किये जाने की इन दिनों बहुत चर्चा है। छोटे जीवाणु बनाने में ऐसी कुछ सफलता मिली भी हैं, पर उतने से ही यह दावा करने लगना उचित नहीं कि मनुष्य ने जीवन का—सृजन करने में सफलता प्राप्त करली।

जिन रसायनों से जीवन विनिर्मित किये जाने की चर्चा है क्या उन्हें भी—उनकी प्रकृतिगत विशेषताओं को भी मनुष्य द्वारा बनाया जाना सम्भव है? इस प्रश्न पर वैज्ञानिकों को मौन ही साधे रहना पड़ रहा है। पदार्थ की जो मूल प्रकृति एवं विशेषता है यदि उसे भी मनुष्य कृत प्रयत्नों से नहीं बनाया जा सकता तो इतना ही कहना पड़ेगा कि उसने ढले हुए पुर्जे जोड़कर मशीन खड़ी कर देने जैसे बाल प्रयोजन ही पूरा किया है। ऐसा तो लकड़ी के टुकड़े जोड़कर अक्षर बनाने वाले किन्डर गार्डन कक्षाओं के छात्र भी कर लेते हैं। इतनी भर सफलता से जीव निर्माण जैसे दुस्साध्य कार्य को पूरा कर सकने का दावा करना उपहासास्पद गर्वोक्ति है।

कुछ मशीनें बिजली पैदा करती हैं—कुछ तार बिजली बहाते हैं, पर वे सब बिजली तो नहीं हैं। अमुक रासायनिक पदार्थों के सम्मिश्रण से जीवन पैदा हो सकता है सो ठीक है, पर उन पदार्थों में जो जीवन पैदा करने की शक्ति है वह अलौकिक एवं सूक्ष्म है। उस शक्ति को उत्पन्न करना जब तक सम्भव न हो तब तक जीवन का सृजेता कहला सकने का गौरव मनुष्य को नहीं नहीं मिल सकता।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ १०३
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

शनिवार, 18 सितंबर 2021

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ६४)

एक ही सत्ता ओत-प्रोत है

जीव-विज्ञान को दो भागों में बांटा जा सकता है। वनस्पति विज्ञान (वौटनी), प्राणि विज्ञान (जूलौजी) इन दो विभाजनों से भी इस महा समुद्र का ठीक तरह विवेचन नहीं हो सकता। इसलिए इसे अन्य भेद-उपभेदों में विभक्त करना पड़ता है।

सूक्ष्मदर्शी यन्त्रों से जिन जीवधारियों को देखा समझा जाता है उसके सम्बन्ध में जानकारी सूक्ष्म जैविकी (माइक्रो बायोलॉजी) कही जाती है।

आकारिकी (मारफोलाजी) शारीरिकी (अनाटोमी) ऊतिकी (हिस्टोलाजी) कोशिकी (साइटोलोजी) भ्रूणी (एम्ब्रोलाजी) शरीर क्रिया (फिजियोलॉजी) परिस्थिति की (एकोलाजी) आनुवंशिकी (जैनेटिक्स) जैव विकास (आरगैनिक एवूलेशन) आदि।

इन सभी जीव-विज्ञान धाराओं ने यह सिद्ध किया है कि जीवन और कुछ नहीं जड़ पदार्थों का ही विकसित रूप है।

रासायनिक दृष्टि से जीवन सेल और अणु के एक ही तराजू पर तोला जा सकता है। दोनों में प्रायः समान स्तर के प्राकृतिक नियम काम करते हैं। एकाकी एटम—मालेक्यूल्स और इलेक्ट्रोन्स के बारे में अभी भी वैसी ही खोज जारी है जैसी कि पिछली तीन शताब्दियों में चलती रही है। विकरण—रेडियेशन और गुरुत्वाकर्षण ग्रेविटेशन के अभी बहुत से स्पष्टीकरण होने बाकी हैं। जो समझा जा सका है वह अपर्याप्त ही नहीं असन्तोषजनक भी है।

यों कोशिकाएं निरन्तर जन्मती-मरती रहती हैं, पर उनमें एक के बाद दूसरी में जीवन तत्व का संचार अनवरत रूप से होता रहता है। मृत होने से पूर्व कोशिकाएं अपना जीवन तत्व नवजात कोषा को दे जाती हैं, इस प्रकार मरण के साथ ही जीवन की अविच्छिन्न परम्परा निरन्तर चलती रहती है। उन्हें मरण धर्मा होने के साथ-साथ अजर-अमर भी कह सकते हैं। वस्त्र बदलने जैसी प्रक्रिया चलते रहने पर भी उनकी अविनाशी सत्ता पर कोई आंच नहीं आती।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ १०२
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

बुधवार, 15 सितंबर 2021

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ६३)

एक ही सत्ता ओत-प्रोत है

आइन्स्टाइन एक ऐसे फार्मूले की खोज में थे, जिससे जड़ और चेतन की भिन्नता को एकता में निरस्त किया जा सके। प्रकृति अपने आप में पूर्ण नहीं है, उसे पुरुष द्वारा प्रेरित प्रोत्साहित और फलवती किया जा रहा है। यह युग्म जब तक सिद्ध नहीं हो जाता, तब तक विज्ञान के कदम लंगड़ाते हुए ही चलेंगे।

जड़ और चेतन के बीच की खाई अब पटने ही वाली है। द्वैत को अद्वैत में परिणत करने का समय अब बहुत समीप आ गया है। विज्ञान क्रमशः इस दिशा में बढ़ रहा है कि वह जड़ को चेतन और चेतन को जड़ सिद्ध करके दोनों को एक ही स्थान पर संयुक्त बनाकर खड़ा करके। जीवन रासायनिक पदार्थों से—पंचतत्वों से बना है इस सिद्धान्त को सिद्ध करते-करते हम वहीं पहुंच जाते हैं जहां यह सिद्ध हो सकता है कि जीवन से पदार्थों की उत्पत्ति हुई है।

उपनिषद् का कहना है कि ईश्वर ने एक से बहुत बनने की इच्छा की, फलतः यह बहुसंख्यक प्राणी और पदार्थ बन गये। यह चेतन से जड़ की उत्पत्ति हुई। नर-नारी कामेच्छा से प्रेरित होकर रति कर्म में निरत होते हैं फलतः रज शुक्र के संयोग से भ्रूण का आरम्भ होता है। यह भी मानवी चेतना से जड़ शरीर की उत्पत्ति है। जड़ से चेतन उत्पन्न होता है, इसे पानी में काई और मिट्टी में घास उत्पन्न होते समय देखते हैं। गन्दगी में मक्खी-मच्छरों का पैदा होना, सड़े हुए फलों में कीड़े उत्पन्न होना यह जड़ से चेतन की उत्पत्ति है।

पदार्थ विज्ञानी इस बात पर बहुत जोर देते हैं कि ‘जड़’ प्रमुख है। चेतन उसी की एक स्थिति है। ग्रामोफोन का रिकार्ड और उसकी सुई का घर्षण प्रारम्भ होने पर आवाज आरम्भ हो जाती है, उसी प्रकार अमुक स्थिति में—अमुक अनुपात में इकट्ठे होने पर चेतन जीव की स्थिति में जड़ पदार्थ विकसित हो जाते हैं। जीव-विज्ञानी अपने प्रतिपादनों में इसी तथ्य को प्रमुखता देते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ १०१
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

रविवार, 12 सितंबर 2021

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ६२)

तत्वदर्शन से आनन्द और मोक्ष

इसी उपनिषद् में आगे क्रमशः इसे विक्षेप से आत्मा, आत्मा से आकाश, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथ्वी आदि उत्पन्न हुए बताये हैं। वस्तुतः यह परतें एक ही तत्व की क्रमशः स्थूल अवस्थायें हैं, जो स्थूल होता गया वह अधिकाधिक दृश्य, स्पर्श होता गया। ऊपरी कक्षा अर्थात् ईश्वर की ओर वही तत्व अधिक चेतन और निर्विकार होता गया। वायु की लहरों के समान विभिन्न तत्व प्रतिभासिक होते हुए भी संसार के सब तत्व एक ही मूल तत्व से आविर्भूत हुए हैं उसे महाशक्ति कहा जाये, आत्मा या परमात्मा सब एक ही सत्ता के अनेक नाम हैं।

विज्ञान की आधुनिक जानकारियां भी उपरोक्त तथ्य का ही प्रतिपादन करती हैं। कैवल्योपनिषद् में पाश्चात्य वैज्ञानिक मान्यताओं और अपने पूर्वात्म दर्शन को एक स्थान पर लाकर दोनों में सामंजस्य व्यक्त किया गया है और कहा है—

यत् परं ब्रह्म सर्वात्मा विश्वस्यायतनं महत् ।
सूक्ष्मात् सूक्ष्मतरं नित्यं तत्वमेव त्वमेव तत् ।।16।।
अणोरणीयान्हमेव तद्वत्महान्
विश्वमिदं विचित्रम् ।
पुरातनोऽहं पुरुषोऽमीशो
हिरण्ययोऽहं शिवरूपमस्मि ।।20।।

अर्थात्—जिस परब्रह्म का कभी नाश नहीं होता, जिसे सूक्ष्म यन्त्रों से भी नहीं देखा जा सकता जो इस संसार के इन समस्त कार्य और कारण का आधारभूत है, जो सब भूतों की आत्मा है, वही तुम हो, तुम वही हो। और ‘‘मैं छोटे से भी छोटा और बड़े से भी बड़ा हूं, इस अद्भुत संसार को मेरा ही स्वरूप मानना चाहिये। मैं ही शिव और ब्रह्मा स्वरूप हूं, मैं ही परमात्मा और विराट् पुरुष हूं।’’

उपरोक्त कथन में और वैज्ञानिकों द्वारा जीव-कोश से सम्बंधित जो अब तक की उपलब्धियां हैं, उनमें पाव-रत्ती का भी अन्तर नहीं है। प्रत्येक जीव-कोश का नाभिक (न्यूक्लियस) अविनाशी तत्व है वह स्वयं नष्ट नहीं होता पर वैसे ही अनेक कोश (सेल्स) बना देने की क्षमता से परिपूर्ण है। इस तरह कोशिका की चेतना को ही ब्रह्म की इकाई कह सकते हैं, चूंकि वह एक आवेश, शक्ति या सत्ता है, चेतन है, इसलिये वह अनेकों अणुओं में भी व्याप्त इकाई ही है। इस स्थिति को जीव भाव कह सकते हैं पर तो भी उनमें पूर्ण ब्रह्म की सब क्षमतायें उसी प्रकार विद्यमान् हैं, जैसे समुद्र की एक बूंद में पानी के सब गुण विद्यमान् होते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ १००
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

शनिवार, 11 सितंबर 2021

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ६१)

तत्वदर्शन से आनन्द और मोक्ष

पेंगल तब महर्षि नहीं बने थे। उसके लिए आत्म-सिद्धि आवश्यक थी। पर पेंगल साधना करते-करते पदार्थों की विविधता में ही उलझ कर रह गये। पशु-पक्षी, अन्य जन्तु, मछलियां, सांप, कीड़े मकोड़ों में शरीरों और प्रवृत्तियों की भिन्नता होने पर भी शुद्ध अहंकार और चेतना की एकता तो समझ में आ गई पर विस्तृत पहाड़, टीले, जंगल, नदी, नाले, समुद्र, सूर्य, चन्द्रमा, तारे, प्रकाश और पृथ्वी पर पाये जाने वाले विविध खनिज, धातुयें, गैसें, ठोस आदि क्या हैं, क्यों हैं, और उनमें यह विविधता कहां से आई है—यह उनकी समझ में नहीं आया। इससे उनकी आत्म-दर्शन की आकांक्षा और बेचैन हो उठी।

ये याज्ञवल्क्य के पास गये और उसकी बाहर वर्ष तक सेवा सुश्रुषा कर पदार्थ-विद्या का ज्ञान प्राप्त किया। इस अध्ययन से पेंगल का मस्तिष्क साफ हो गया कि जड़ पदार्थ भी एक ही मूल सत्ता के अंश हैं। सब कुछ एक ही तत्व से उपजा है। ‘एकोऽहं बहुस्यामः’, ‘एक नूर से सब जग उपजिआ’ वाली बात उन्हें पदार्थ विषम में भी अक्षरशः सत्य प्रतीत हुई। पेंगलोपनिषद् में इस कैवल्य का उपदेश मुनि याज्ञवलक्य ने इस प्रकार दिया है—

‘‘सदैव सोग्रयदमग्र आसीत् । तन्नित्यनुक्तमविक्रियं सत्य ज्ञानानन्द परिपूर्ण सनातनमेकवातीयं ब्रह्म ।। तस्मिन् मरुशुक्तिमस्थाणुस्फाटि कादो जल रौप्य पुरुष रेखाऽऽदिशल्लोहित शुक्ल कृष्ण गुणमयी गुण साम्या निर्वाच्या मूलप्रकृतिरासीत् । तत्प्रतिबिम्बितं यत्तद् साक्षि चैतन्यमासीत् ।।—’’
—पैंगलोपनिषद् 1।2-3

हे पैंगल! पहले केवल एक ही तत्व था। वह नित्य मुक्त, अविकारी, ज्ञानरूप चैतन्य और आनन्द से परिपूर्ण था, वही ब्रह्म है। उससे लाल, श्वेत, कृष्ण वर्ण की तीन प्रकाश किरणों या गुण वाली प्रकृति उत्पन्न हुई। यह ऐसा था जैसे सीपी में मोती, स्थाणु में पुरुष और मणि में रेखायें होती हैं। तीन गुणों से बना हुआ साक्षी भी चैतन्य हुआ। वह मूल प्रकृति फिर विकारयुक्त हुई तब वह सत्व गुण वाली आवरण शक्ति हुई, जिसे अवयक्त कहते हैं।.....उसी में समस्त विश्व लपेटे हुए वस्त्र के समान रहता है। ईश्वर में अधिष्ठित आवरण शक्ति से रजोगुणमयी विक्षेप शक्ति होती है, जिसे महत् कहते हैं। उसका जो प्रतिबिम्ब पड़ता है वह चैतन्य हिरण्य गर्भ कहा जाता है। वह महत्तत्व वाला कुछ स्पष्ट और कुछ अस्पष्ट आकार का होता है.....।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ९९
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

मंगलवार, 7 सितंबर 2021

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ६०)

हम विश्वात्मा के घटक

पृथ्वी का मात्र सूर्य से अथवा अपने ही उपग्रह चन्द्र से ही अन्तर्सम्बन्ध नहीं है। प्रोफेसर ब्राउन ने मंगल, शुक्र, बृहस्पति आदि ग्रहों का अध्ययन कर यह सिद्ध किया है कि इनकी गतियों और स्थितियों के परिवर्तन से पृथ्वी भी प्रभावित होती है। ये सभी सूर्य सन्तति ही तो हैं और जुड़वां बच्चों वाला सिद्धान्त यहां भी घटित होता है, तो आश्चर्य ही क्या?
रूसी वैज्ञानिक चीजेवस्की ने 1920 में ही यह सिद्ध कर दिया था कि सूर्य पर प्रति ग्यारहवें वर्ष होने वाले आणविक विस्फोट से पृथ्वी पर युद्ध एवं क्रान्तियों का उद्भव-विकास होता है। उनका कहना था कि पृथ्वी पर घटित होने वाले प्रत्येक प्रमुख परिवर्तन का सम्बन्ध सूर्य से होता है।

ऐसे ही निष्कर्षों के विस्तृत अध्ययन व इस दिशा में व्यापक अनुसन्धान प्रयासों के लिए 1950 में वैज्ञानिक जियोजारजी गिआर्डी ने ब्रह्माण्ड रसायन को जन्म दिया। गिआर्डी के अनुसार समूचा ब्रह्माण्ड एक शरीर है और इसके सभी अंग इससे सम्पूर्णतः एकात्म हैं। इसका अर्थ हुआ कि प्रत्येक नक्षत्र पिण्ड फिर वह कितनी भी दूरी पर क्यों न हो पृथ्वी के जीवन को प्रभावित करता है।

भारत में इसी तत्वदर्शन के अनुरूप अतीत में ज्योतिर्विज्ञान का विकास हुआ था। आर्यभट्ट का ज्योतिष सिद्धान्त, कालक्रिया पाद, गोलपाद, और सूर्य सिद्धान्त, फिर नारदेव, ब्रह्मगुप्त आदि द्वारा उन सिद्धान्तों का संशोधन-परिवर्धन, भाष्कराचार्य का महाभाष्करीय आदि ग्रन्थ उस महत् प्रयास के कुछ सुलभ अवशिष्ट परिणाम हैं। बाद में इस विशुद्ध विज्ञान का जो दुरुपयोग हुआ, उसे जातीय-जीवन क्रम के ह्रास-काल की अराजकता समझते हुए उसके मूल सिद्धान्त सूत्रों तथा संकेतों के आधार पर इस दिशा में बहुत कुछ जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

भारतीय तत्व मनीषी हजारों वर्ष पूर्व इस तथ्य से परिचित थे कि जड़ता वस्तुतः कहीं है नहीं। वह हमारी स्थूल दृष्टि की ‘एपियरेन्स’ या आभास मात्र है। यथार्थतः सर्वत्र आत्मचेतना ही विद्यमान है। यह सर्वव्यापी चैतन्यसत्ता ही विश्वात्मा है। विश्वात्मा के साथ आत्मा की जितनी समीपता घनिष्ठता होती है उसी अनुपात से उसे विशिष्ट अनुदान प्राप्त होते हैं।
भारतीय मनीषियों की मान्यता है कि सृष्टि के आरम्भ में एक मूल द्रव्य हिरण्यगर्भ था। उसी के विस्फोट से आकाश गंगायें विनिर्मित हुईं। इस विस्फोट की तेजी कुछ तो धीमी हुई है पर अभी भी उस छिटकाव की चाल बहुत तीव्र है। अनन्त आकाश में यों आकाश गंगाएं अपनी अपनी दिशा में द्रुतगति से दौड़ती जा रही हैं। इस संदर्भ में अपनी आकाश गंगा की चाल 24,300 मील प्रति सैकिंड नापी गयी है।

यह विश्व अनन्त है और उसके सम्बन्ध में जानकारियां प्राप्त करने का क्षेत्र भी असीम है। इस असीम और अनन्त की खोज के लिए बिना निराश हुए मनुष्य की असीमता किस उत्साह के साथ अग्रगामी हो रही है यह देख कर विश्वास होता है कि मानवी महत्ता अद्भुत है और यदि वह सही राह पर चले तो न केवल प्रकृति के रहस्यों का उद्घाटन करने में वरन् उन्हें करतलगत करने में भी समर्थ हो सकती है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ९६
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

सोमवार, 6 सितंबर 2021

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ५९)

हम विश्वात्मा के घटक

अमेरिका के पागलखानों में किए गए सर्वेक्षण में पाया गया कि पूर्णिमा के दिन मानसिक रोगी अधिक विक्षिप्त हो जाते हैं, जबकि अमावस के दिन यह दौर सर्वाधिक कम होता है। विक्षिप्त ही नहीं, सामान्य मनुष्यों की चित्त-दशा पर भी चन्द्रकलाओं के उतार-चढ़ाव का प्रभाव पड़ना सामूहिक मनश्चेतना का ही द्योतक है।

वनस्पति विज्ञानी वृक्षों के तनों में बनने वाले वर्तुलों द्वारा वृक्षों के जीवन का अध्ययन करते हैं। देखा गया है कि वृक्ष में प्रतिवर्ष एक वृन्त बनता है, जोकि उसके द्वारा छोड़ी गई छाल से विनिर्मित होता है। हर ग्यारहवें वर्ष यह वृन्त सामान्य वृन्तों की अपेक्षा बड़ा बनता है। अमेरिका के रिसर्च सेन्टर आफ ट्री रिंग ने पता लगाया कि ग्यारहवें वर्ष जब सूर्य पर आणविक विस्फोट होते हैं तो वृक्ष का तना मोटा हो जाता है और उसी कारण वृन्त बड़ा बनता है। स्पष्ट है कि सूर्य और चन्द्र के परिवर्तनों से मनुष्यों एवं पशु-पक्षी तथा पेड़ पौधे भी प्रभावित होते हैं। तब क्या मात्र मनुष्यों में ही सामूहिक मनश्चेतना न होकर सम्पूर्ण सृष्टि में ही कोई एक समष्टि चेतना विद्यमान है, यह प्रश्न आज वैज्ञानिकों के सामने खड़ा उन्हें आकर्षित कर रहा है।

डा. हेराल्ड श्वाइत्जर के नेतृत्व में आस्ट्रिया के वैज्ञानिकों ने सूर्यग्रहण के प्रभावों का निरीक्षण-परीक्षण कर यह निष्कर्ष निकाला कि पूर्ण सूर्यग्रहण के समय सामान्य कीट-पतंग भी विचित्र आचरण करने लगते हैं।

अनेक पक्षी सूर्यग्रहण के चौबीस घण्टे पूर्व ही चहचहाना बन्द कर देते हैं। चींटियां सूर्यग्रहण के आधा घण्टे पूर्व से भोजन की खोजबीन बन्द कर देती हैं और व्यर्थ ही भटकती रहती है। सदा चंचल बंदर वृक्षों को छोड़कर जमीन पर आ बैठता है। वुड लाइस, बीटल्स, मिली पीड्स आदि ऐसे कीट-पतंग जो सामान्यतः रात्रि में ही बाहर निकलते हैं, वे भी सूर्यग्रहण के दिन बाहर निकले देखे जाते हैं। दिशा-विज्ञान में दक्ष चिड़ियां चहकना भी भूल-सी जाती हैं।

जापान के प्रख्यात जैविकीविद् तोनातो के अनुसार हर ग्यारहवें वर्ष सूर्य पर होने वाले आणविक विस्फोटों के समय पृथ्वी पर पुरुषों के रक्त में अम्ल तत्व बढ़ जाते हैं और उनका रक्त पतला पड़ जाता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ९५
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

रविवार, 5 सितंबर 2021

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ५८)

हम विश्वात्मा के घटक

मनुष्य अपने को एकाकी अनुभव करके स्वार्थान्ध रहने की भूल भले ही करता रहे, पर वस्तुतः इस विराट् ब्रह्म का-विशाल विश्व का—एक अकिंचन सा घटक मात्र है। समुद्र की लहरों की तरह उसका अस्तित्व अलग से दीखता भले ही हो, पर वस्तुतः वह समिष्टि सत्ता का एक तुच्छ सा परमाणु भर है। ऐसा परमाणु जिसे अपनी सत्ता और हलचल बनाये रहने के लिए दूसरी महा शक्तियों के अनुदान पर निर्भर रहना पड़ता है।

अपनी पृथ्वी सूर्य से बहुत दूर है और उसका कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध दिखाई नहीं पड़ता फिर भी वह पूरी तरह सूर्य पर आश्रित है। सर्दी, गर्मी, वर्षा, दिन, रात्रि जैसी घटनाओं से लेकर प्राणियों में पाया जाने वाला उत्साह और अवसाद भी सूर्य सम्पर्क से सम्बन्धित रहता है। वनस्पतियों का उत्पादन और प्राणियों की हलचल में जो जीवन तत्व काम करता है उसे भौतिक परीक्षण से नापा जाय तो उसे सूर्य का ही अनुदान कहा जायेगा। असंख्य जीव कोशाओं से मिलकर एक शरीर बनता है, उन सबके समन्वित सहयोग भरे प्रयास से जीवन की गाड़ी चलती है। प्राण तत्व से इन सभी कोशाओं को अपनी स्थिति बनाये रहने की सामर्थ्य मिलती है। इसी प्रकार इस संसार के समस्त जड़ चेतन घटकों को सूर्य से अभीष्ट विकास के लिए आवश्यक अनुदान सन्तुलित और समुचित मात्रा में मिलता है।

यह सूर्य भी अपने अस्तित्व के लिए महासूर्य के अनुग्रह पर आश्रित है और महा सूर्यों को भी अतिसूर्य का कृपाकांक्षी रहना पड़ता है। अन्ततः सभी को उस महाकेन्द्र पर निर्भर रहना पड़ता है जो ज्ञान एवं शक्ति का केन्द्र है वह ब्रह्म है, सविता है। अति सूर्य, महासूर्य और सूर्य सब उसी पर आश्रित हैं।

प्राणियों, वनस्पतियों और पदार्थों की गतिविधियों पर सूर्य के प्रभाव का अध्ययन करने पर पता चलता है कि उनकी स्वावलम्बी हलचलें वस्तुतः परावलम्बी हैं।
(1) संसार अन्योन्याश्रित
(2) सूर्य चन्द मनुष्य वृक्ष जीवों को प्रभावित करते हैं। सूर्य की उंगलियों में बंधे हुए धागे ही बाजीगर द्वारा कठपुतली नचाने की तरह विभिन्न गतिविधियों की चित्र-विचित्र भूमिकाएं प्रस्तुत करते हैं। यहां तक कि प्राणियों का, मनुष्यों का चिन्तन और चरित्र तक इस शक्ति प्रवाह पर आश्रित रहता है।  केवल सूर्य वरन् न्यूनाधिक मात्रा में सौर मण्डल के ग्रह, उपग्रह तथा ब्रह्माण्ड क्षेत्र के सूर्य तारक भी हमारी सत्ता-स्थिरता एवं प्रगति को प्रभावित करते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ९४
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

गुरुवार, 2 सितंबर 2021

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ५७)

असीम को खोजें

सूर्य की दूरी पृथ्वी से सवा नौ करोड़ मील है। इसके बाद का सबसे निकटवर्ती तारा 2,50,00,00,00,00,000 मील दूरी पर है। अन्य तारे तो इससे भी लाखों गुनी दूरी पर हैं। इस दूरी का हिसाब रखने के लिए ‘प्रकाश वर्ष’ का नया पैमाना बनाया गया है। प्रकाश की किरणें एक सैकिण्ड में एक लाख छियासी हजार मील की चाल से चलती हैं। इस गति से चलते हुए प्रकाश एक वर्ष में जितनी दूरी तय करले उसे एक प्रकाश वर्ष कहा जायेगा। इस पैमाने के हिसाब से पृथ्वी से सूर्य की दूरी सिर्फ सवा आठ प्रकाश सैकिण्ड रह जाती है। इसके आगे किसी और तारे की खोज में आगे बढ़ा जाय तो सबसे निकटवर्ती तारा सवा चार प्रकाश वर्ष चल लेने के बाद ही मिलेगा।

ब्रह्माण्ड का 99 प्रतिशत भाग शून्य है। एक प्रतिशत भाग को ही ग्रह नक्षत्र घेरे हुए हैं। अनुमान है कि आकाश में सूर्य जैसे अरबों तारकों का अस्तित्व है। वह तारे आकाश गंगाओं से जुड़े हैं। वे उसी से निकले हैं और उसी से बंधे हैं। मुर्गी अण्डे देती है उन्हें सेती है और जब तक बच्चे समर्थ नहीं हो जाते उन्हें अपने साथ ही लिए फिरती है। आकाश गंगाएं ऐसी ही मुर्गियां हैं जिनके अण्डे बच्चों की गणना करना पूरा सिर दर्द है। हमारी आकाश गंगा एक लाख प्रकाश वर्ष लम्बी और 20 हजार प्रकाश वर्ष मोटी है। सूर्य इसी मुर्गी का एक छोटा चूजा है जो अपनी माता से 33000 प्रकाश वर्ष दूर रहकर उसकी प्रदक्षिणा 170 मील प्रति सैकिण्ड की गति से करता है। आकाश गंगायें भी आकाश में करोड़ों हैं। वे आपस में टकरा न जायें या उनके अण्डे-बच्चे एक-दूसरे से उलझ न पड़ें इसलिए उनने अपने सैर-सपाटे के लिए काफी-काफी बड़ा क्षेत्र हथिया लिया है। प्रायः ये आकाशगंगाएं एक-दूसरे से 20 लाख प्रकाश वर्ष दूर रहती हैं।

अब तक खोजे गये तारकों में सबसे बड़ा ‘काला तारा’ है। यह अपने सूर्य से 20 अरब गुना बड़ा है। यहां यह भूलना नहीं चाहिए कि सूर्य अपनी पृथ्वी से 13 लाख गुना बड़ा है। उस हिसाब से पृथ्वी की तुलना में काला तारा कितना बड़ा होगा उसे कागज पर जोड़ लेना तो सरल है पर उस विस्तार को मस्तिष्क में यथावत बिठा सकना बहुत ही कठिन है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ९३
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

बुधवार, 1 सितंबर 2021

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ५६)

असीम को खोजें

तारे और नक्षत्र में यह अन्तर है कि तारा अपनी रोशनी से चमकता है जब कि नक्षत्रों में अपनी रोशनी नहीं होती। वे तारकों की धूप के प्रकाश में आते हैं तभी चमकते हैं। अपने सौर मण्डल में केवल एक ही सूर्य है शेष 9 नक्षत्र हैं। ब्रह्माण्ड की तुलना में अपने सूर्य का सीमा क्षेत्र बहुत छोटा है पर पृथ्वी की तुलना में वह बहुत बड़ा है। नक्षत्रों के अपने उपग्रह होते हैं जैसे पृथ्वी का उपग्रह चन्द्रमा। ग्रह स्थिति के 12 चन्द्रमा हैं।

जिस प्रकार अपने सौर-मण्डल के नव-ग्रह सूर्य-तारक के साथ जुड़े हैं उसी प्रकार ब्रह्माण्ड के अगणित तारक अपनी-अपनी नीहारिकाएं जो अरबों की संख्या में हैं, जुड़े हैं। उनमें भीतर ऐसी हलचल चलती रहती है जिसके कारण कुछ समय बाद भयंकर विस्फोट होते हैं और अन्तर्भूत पदार्थों में से कुछ टुकड़े बाहर छिटक कर स्वतन्त्र तारक के रूप में विकसित होते हैं। इन्हीं नवोदित तारकों का नाम ‘नोवा और सुपर नोवा’ दिया गया है। जिस प्रकार बिल्ली हर साल कई-कई बच्चे देती है इसी प्रकार से नीहारिकाएं भी थोड़े-थोड़े दिनों बाद प्रसूता होती हैं और विस्फोट जैसी भयानक प्रसव पीड़ा के साथ नव-तारकों को जन्म देती हैं। बच्चों की सारी हरकतें वे सिलसिले होती हैं ऐसा ही कुछ ऊंट-पटांग यह नवोदित तारे भी करते रहते हैं। जब वे घिस-पीट कर ठीक हो जाते हैं। शैशव से आगे बढ़कर किशोरावस्था में प्रवेश करते हैं तब उनकी व्यवस्था क्रमबद्ध हो जाती है। तब तक उनका फुलाव, सिकुड़न, रुदन, उपद्रव शयन सब कुछ अचंभे जैसा ही है। छोटे बच्चे जैसे बार-बार टट्टी कर देते हैं उसी प्रकार इन नवोदित तारकों की गरमा-गरम गैस भी फटती चिटखती रहती है और उससे भी ग्रह, उपग्रह, उल्का धूमकेतु आदि न जाने क्या-क्या अन्तरिक्षीय फुलझड़ियों का सृजन विसर्जन होता रहता है। इसके अतिरिक्त इन बच्चों में लड़-झगड़ और मारपीट भी कम नहीं होती। निश्चित व्यवस्था का कार्यक्षेत्र न बन पाने के कारण उनके टकराव भी होते रहते हैं और कभी-कभी तो यह टकराव ऐसे विचित्र होते हैं कि दोनों पक्ष अपना अस्तित्व गंवा बैठें और फिर उनके ध्वंसावशेष से कुछ-कुछ और नवीन संरचना सामने आये।

आकाश की नापतोल मीलों की संख्या में करना कौड़ियां बिछाकर मुहरों का हिसाब करने बैठने की तरह उपहासास्पद होगा। इस प्रकार तो इतनी विन्दियां प्रयोग करनी पड़ेंगी कि ज्योतिर्विदों को बाध्य विन्दियों से ही भरने पड़ें।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ९२
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

मंगलवार, 31 अगस्त 2021

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ५५)

असीम को खोजें

यह खोज, खबर इसलिए भी उपयोगी है कि ‘एकाकी पन’ नामक कोई तत्व अगले दिनों शेष नहीं रहने वाला है। इस विश्व का कण कण एक-दूसरे से अत्यन्त सघनता और जटिलता के साथ जुड़ा हुआ है, उन्हें प्रथक करने से किसी की सत्ता अक्षुण्य नहीं रह सकती। सब एक दूसरे के साथ इतनी मजबूत जंजीरों से बंधे हुए हैं कि प्रथकता की बात सोचना दूसरे अर्थों में मृत्यु को आमन्त्रण देना ही कहा जा सकता है।

शरीर में कोशिकाओं की स्वतन्त्र सत्ता अवश्य है पर वह अपने आप में पूर्ण नहीं है। एक से दूसरे का पोषण होता है और दूसरे-तीसरे को बल मिलता है। हम सभी एक दूसरे पर निर्भर हैं। यहां न कोई स्वतन्त्र है न स्वावलम्बी। साधन सामूहिकता ही विभिन्न प्रकार के क्रियाकलापों, अस्तित्वों और तथ्यों की जननी है मानवी प्रगति का यही रहस्य है। प्रकृति प्रदत्त समूह संरचना का उसने अधिक बुद्धिमत्ता पूर्वक लाभ उठाकर समाज व्यवस्था बनाई और सहयोग के आधार पर परिवार निर्माण से लेकर शासन सत्ता तक के बहुमुखी घटक खड़े किये हैं। एक-दूसरे के लिए वे किस प्रकार उपयोगी सिद्ध होंगे। पारस्परिक सहयोग से किस किस प्रकार एक दूसरे की सुख−सुविधा बढ़ाये इसी रीति-नीति के अभिवर्धन को अग्रगामी बनाने के लिए धर्म, अध्यात्म तत्व-ज्ञान की आधारशिला रखी गई। भौतिक विज्ञान की खोज और प्रगति ने प्रकृति गत परमाणुओं की इसी रीति-नीति का परिचय दिया है। जड़ अथवा चेतन किसी भी पक्ष को देखें, इस विश्व के समस्त आधार परस्पर सम्बद्ध प्रतीत होते हैं और उनकी सार्थकता एक-दूसरे के साथ जुड़े हुए रहने से ही सिद्ध होती है। एकाकी इकाइयां तो इतनी नगण्य है कि वे अपने अस्तित्व का न तो परिचय दे सकती हैं और न उसे रख सकती हैं।

यह सिद्धान्त ग्रह-नक्षत्रों पर भी लागू होता है। विश्व-ब्रह्माण्ड के समस्त ग्रह नक्षत्र अपनी सूत्र संचालक आकाश गंगाओं के साथ जुड़े हैं और आकाश गंगाएं महत्त्व हिरण्य गर्भ की उंगलियों में बंधी हुई कठपुतलियां भरे हैं। अगणित और मण्डल भी एक-दूसरे का परिपोषण करते हुए अपना क्रिया-कलाप चला रहे हैं। सूर्य ही अपने ग्रहों को गुरुत्वाकर्षण में बांधे हो और उन्हें ताप प्रकाश देता हो सो बात नहीं है, बदले में ग्रह परिवार भी अपने शासनाध्यक्ष सूर्य का विविध आधारों से पोषण करता है। सौर परिवार के ग्रह अपनी जगह से छिटक कर किसी अन्तरिक्ष में अपना कोई और पथ बनालें तो फिर सूर्य का सन्तुलन भी बिगड़ जायेगा और वह आज की स्थिति में न रहकर किसी चित्र-विचित्र विभीषिका में उलझ हुआ दिखाई देगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ९०
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

शनिवार, 28 अगस्त 2021

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ५४)

समर्थ सत्ता को खोजें

घटना 29 जून सन् 1954 की है। न्यूयार्क अमेरिका के एक डॉक्टर श्री रेमर की धर्मपत्नी विश्राम कर रही थी। उनकी एक पुत्री—जेस्सी 9 माह पूर्व ही अपनी दादी के पास कैलिफोर्निया गई हुई थी। मां-बेटी के बीच की भौगोलिक दूरी 3000 किलोमीटर थी। अकस्मात श्रीमती रेमर चीख कर पलंग से खड़ी हो गई डॉक्टर साहब दौड़े-दौड़े आये। पूछा क्या बात है? श्रीमती रेमर ने कहा—मैंने अभी-अभी जेस्सी के चीखने की आवाज सुनी, ऐसा लगा वह किसी संकट में है। डॉक्टर ने धर्मपत्नी के शरीर का परीक्षण किया।
उस समय और कोई बात तो नहीं हुई किन्तु दो दिनों तक घर में विलक्षण मायूसी छाई रही। तीसरे दिन वह निराशा की स्थिति पूर्ण विहाग में तब बदल गई जब सचमुच जेस्सी के दुर्घटनाग्रस्त होने का तार मिला। आश्चर्य की बात यह थी कि श्रीमती रेमर ने जिस समय यह चीख सुनी वह और जेस्सी के कार ऐक्सीडेंट-जिससे उसका प्राणान्त हुआ—का समय एक ही था।

एक अन्य घटना—फ्रान्स के रियर एडमिरल गैलरी की आत्मकथा से उद्धृत।—आठ घन्टियां (एट बेल्स) नामक उक्त आत्मकथा में गैलरी महाशय लिखते हैं—मुझे सोमवार को अपनी ड्यूटी पर जाना था। रविवार की रात जब मैं सोया तो स्वप्न देखा कि मैं अपने जहाज पर बैठा हूं, जहाज चलने की तैयारी में है। यात्री ऊपर आ रहे हैं, दो युवक आते हैं, मैंने उनसे नाम पूछा—एक ने अपना नाम डिक ग्रेन्स दूसरे ने पाप-कनवे बताया। तभी जहाज में एकाएक विस्फोट होता पर यही दोनों जख्मी होते हैं और पाप मर जाता है। स्वप्न इतनी गम्भीर मनःस्थिति में देखा था कि सोकर उठने के बाद भी वह मानस पटल पर छाया रहा। जब कि आये दिन दिखने वाले स्वप्न जोर देने पर भी याद नहीं आते।

आश्चर्य वहां से प्रारम्भ हुआ जब मैंने आफिस जाकर जहाज के यात्रियों की लिस्ट पर दृष्टि दौड़ाई मुझे यह देखकर भारी हैरानी हुई कि जो नाम इससे पहले कभी सुने भी नहीं थे—जो रात स्वप्न में देखे थे वे सचमुच उस लिस्ट में थे। यह देखते ही हृदय किसी अज्ञात आशंका से भर गया। फिर भी जीवन की गति तो कोई न चलाना चाहे तो भी चलती है। जहाज ने ठीक समय पर प्रस्थान किया पर अभी उसने अच्छी तरह बन्दरगाह भी नहीं छोड़ा था कि एक इंजन में विस्फोट हुआ, केवल डिकग्रेन्स और पाप कनवे दुर्घटनाग्रस्त हुये, जिनमें से पाप कनबे की तत्काल मृत्यु हो गई।

एक तीसरी घटना—डरहम की एक स्त्री से सम्बन्धित है, पैरासाइकोलॉजी संस्थान कैलीफोर्निया के रिकार्ड से ली गई—डरहम की एक स्त्री अपने बच्चों के साथ स्नान के लिये निकली। घर में उस समय उक्त महिला अर्थात् उस स्त्री की सास ही रह गई। अभी वह स्त्री वहां से कुछ सौ गज ही मोड़ पार कर गई होगी कि उसकी सास बुरी तरह चिल्लाई—बहू को खतरा है। पास-पड़ौस के लोग दौड़े और इस पागलपन पर हंसे भी। किन्तु दो घन्टे पीछे ही शेरिफ ने सूचना दी कि रास्ते में ऐक्सिडेन्ट हो जाने से अस्पताल में महिला का प्राणान्त हो गया है।

ऊपर एक ही तरह की तीन घटनायें दी हैं जो न तो भाव सम्प्रेषण (टेलेपैथी) है और न ही परोक्षदर्शन (क्लेरबायेन्स)। टेलीपैथी का अर्थ उस आभास से है जिसमें किसी मित्र, परिचित, कुटुम्बी या प्रिय परिजन द्वारा भावनाओं की अत्यधिक गहराई से याद किया गया हो और वह संवेदना इस व्यक्ति तक पहुंची हो। इसी तरह दूर-दर्शन का अर्थ तो मात्र भौगोलिक दूरी को किसी अतीन्द्रिय क्षमता से पार कर किसी घटना का आभास पाया गया हो। ऊपर तीन घटनायें प्रस्तुत की गई हैं उनमें एक का सम्बन्ध वर्तमान से है तो शेष दो का अतीत और भविष्य से। जो हो रहा है वह देखा जा सकता है जो हो चुका है उसे भी जाना जा सकता है कि अभी तक जो हुआ ही नहीं यदि उसकी जानकारी हो जाती है तो उसे न तो दूरदर्शन ही कहा जायेगा और न ही दूर संचार। वास्तव में इस तरह की अनुभूतियां आये दिन हर किसी को होती रहती हैं। और उनका मानव-जीवन से गहन आध्यात्मिक सम्बन्ध भी है। तथापि उन्हें समझ पाया हर किसी के लिये सम्भव नहीं होता।

वेदान्त दर्शन के अनुसार सृष्टि में एक ‘ब्राह्मी चेतना’ या परमात्मा ही एक ऐसा तत्व है जो सर्वव्यापी है अर्थात् ब्रह्माण्ड उसी में अवस्थित है। वह काल की सीमा से परे है अर्थात् भूत, भविष्य वर्तमान तीनों भी उसी में समाहित हैं। उक्त तीनों घटनाओं का उल्लेख करते हुए ‘एक्स्प्लोरिंग साइकिक फेनामेना बियाण्ड एण्ड मैटर’ पुस्तक के लेखक श्री डी. स्काट रोगों ने उक्त तथ्य का स्मरण कराते हुये लिखा है कि भावनायें तथा विचार ‘प्राणशक्ति की स्फुरणा’ (डिस्चार्ज आफ वाइटल फोर्स) के रूप में होती हैं। यह स्फुरणा यदि एक ही समय में एक-दूसरे को आत्मसात् करती है तब तो वह दूर संचार हो सकता है किन्तु यदि वह समय की सीमाओं का अतिक्रमण करता है तो उसका अर्थ यही होगा कि माध्यम को आधार-भूत सत्ता या ब्राह्मी चेतना होती है। इस चेतना की कल्पना आइन्स्टीन ने भी सापेक्षवाद के सिद्धान्त में की है और यह लिखा है कि यदि प्रकाश की गति से भी कोई तीव्र गति वाला तत्व होता है तो उसके लिये बीते कल, आज और आने वाले कल में कोई अन्तर ही न रहेगा। भारतीय शास्त्र पग-पग पर उसी महान् सत्ता में अपने आप घुलाने और परम पद पाने की बात कहते हैं निस्सन्देह वह एक अति समर्थ, अत्यन्त संवेदनशील स्थिति होगी। यह घटनायें इस दिक्कालातीत चिन्मय ब्रह्म सत्ता से अपनी अभिन्नता जुड़ने की अनुभूति ही हो सकती है। क्षणिक सम्पर्क इतना आश्चर्यजनक हो सकता है तो उसकी प्रत्यक्ष अनुभूति कितनी सामर्थ्य प्रदान करने वाली होगी—तब मनुष्य को किसी प्रकार के अभाव वस्तुतः क्योंकर सताते होंगे?

ऋग्वेद में एक ऋचा आती है—‘अग्निना अग्नि समिध्यते, अर्थात् अग्नि से अग्नि प्रदीप्त होती है। आत्मज्ञान आत्मानुभूति से ब्रह्म प्राप्ति इसी सिद्धान्त पर होती है। उपरोक्त घटनायें ‘अन्त स्फुरण’ तथा ‘आत्म जागृति’ की क्षणिक अनुभूतियां हैं। रेडियो घुमाते-घुमाते अनायास कोई अति सूक्ष्म स्टेशन सैकिंड के सौवें हिस्से में पकड़ में आ जाता है फिर ढूंढ़ने से भी नहीं मिलता। यह घटनायें वैसा ही तत्व बोध हैं, विस्तृत अनुभूति, ज्ञान प्राप्ति, ईश्वर की शक्तियों को अनुभव करने के लिये तो आत्म परिष्कार की गहराई में ही उतरना पड़ेगा। जो लोग सांसारिकता में ही पड़े रहेंगे वे न तो उस महान् को अनुभव कर सकेंगे न पा सकेंगे। वे तो ऐसी घटनाओं पर भी अटकलें ही लगाते रहेंगे।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ८४
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

मंगलवार, 24 अगस्त 2021

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ५३)

विचार से भी परे

परब्रह्म एक ऐसी चेतना है जो ब्रह्माण्ड के भीतर और बाहर एक नियम व्यवस्था के रूप में ओत-प्रोत हो रही है। उसके सारे क्रिया-कलाप एक सुनियोजित विधि-विधान के अनुसार गतिशील हो रहे हैं। उन नियमों का पालन करने वाले अपनी बुद्धिमत्ता अथवा ईश्वर की अनुकम्पा का लाभ उठाते हैं। भगवान की बिजली से उपमा दी जा सकती है। बिजली का ठीक उपयोग करने पर उससे अनेक प्रकार के यन्त्र चलाये और लाभ उठाये जा सकते हैं। पर निर्धारित नियमों का उल्लंघन किया जाय तो बिजली उन्हीं भक्त सेवकों की जान ले लेती है, जिनने उसे घर बुलाने में ढेरों पैसा, मनोयोग एवं समय लगाया था। उपासना ईश्वर को रिझाने के लिए नहीं, आत्मपरिष्कार के लिए की जाती है। छोटी मोटर में कम पावर रहती है और थोड़ा काम होता है। बड़ी मोटर लगा देने से अधिक पावर मिलने लगती है और ज्यादा लाभ मिलता है। बिजली घर में तो प्रचण्ड विद्युत भण्डार भरा पड़ा है। उससे गिड़गिड़ा कर अधिक शक्ति देने की प्रार्थना तब तक निरर्थक ही जाती रहेगी जब तक घर का फिटिंग मीटर, मोटर आदि का स्तर ऊंचा न उठाया जाय। प्रार्थना के सत्परिणामों की बहुत चर्चा होती रहती है। भगवत् कृपा के अनेक चमत्कारों का वर्णन सुनने को मिलता रहता है। उस सत्य के पीछे यह तथ्य अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ मिलेगा कि भक्त ने पूजा उपासना के प्रति गहरी श्रद्धा उत्पन्न की और उस श्रद्धा ने उसके चिन्तन एवं कर्तृत्व को देवोपम बना दिया। जहां यह शर्त पूरी की गई हैं वहीं निश्चित रूप से ईश्वरीय अनुकम्पा की वर्षा भी हुई है, पर जहां फुसलाने की धूर्तता को भक्ति का नाम दिया गया है वहां निराशा ही हाथ लगी है।

ईश्वर का सृष्टि विस्तार अकल्पनीय है। उसमें निवास करने वाले प्राणियों की संख्या का निर्धारण भी असम्भव है। पृथ्वी पर रहने वाले जलचर, थलचर, नभचर, दृश्य, अदृश्य प्राणियों की संख्या कुल मिलाकर इतनी बड़ी है कि उनके अंक लिखते-लिखते इस धरती को कागज बना लेने से भी काम न चलेगा। इतने प्राणियों के जीवन-क्रम में व्यक्तिगत हस्तक्षेप करते रहना—अलग-अलग नीति निर्धारित करना और फिर उसे प्रार्थना उपेक्षा के कारण बदलते रहना ईश्वर के लिये भी सम्भव नहीं हो सकता। ऐसा करने से तो उस पर व्यक्तिवादी द्वेष का आक्षेप लगेगा और सृष्टि संतुलन का कोई आधार ही न रहेगा। ईश्वर ने नियम मर्यादा के बन्धनों में क्रिया की प्रतिक्रिया के रूप में अपनी सारी व्यवस्था बना दी है और उसी चक्र में भ्रमण करते हुये, जीवधारी अपने पुरुषार्थ प्रमाद का भरा बुरा परिणाम भुगतते रहते हैं। ईश्वर दृष्टा और साथी की तरह यह सब देखता रहता है। उसकी जैसी महान् सत्ता के लिये यही उचित है और यही शोभनीय। पूजा करने वालों के प्रति राग और न करने वालों के प्रति उपेक्षा अथवा द्वेष की नीति यदि उसने अपनाई होती तो निश्चय ही इस संसार में भ्रष्टाचार एवं अव्यवस्था का कोई अन्त ही न रहता। जो लोग इस दृष्टि से पूजा उपासना करते हैं कि उसके फलस्वरूप ईश्वर को फुसलाकर उससे मनोवांछाएं पूरी करालीं जायगी, वे भारी भूल करते हैं। पूजा को कर्म व्यवस्था का प्रतिद्वंदी नहीं बनाया जा सकता। भगवान् के अनुकूल हम बनें यह समझ में आने वाली बात है, पर उलटा उसी को कठपुतली बना कर मर्जी मुताबिक नचाने की बात सोचना बचकानी ढिठाई के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। हमें ईश्वर से व्यक्तिगत रागद्वेष की अपेक्षा नहीं करनी चाहिये वरन् उसकी विधि व्यवस्था के अनुरूप बनकर अधिकाधिक लाभान्वित होने के राजमार्ग पर चलना चाहिये।

भगवान को इष्टदेव बनाकर उसे प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाता है। इष्ट का अर्थ है लक्ष्य। हम भगवान के समतुल्य बनें। उसी की जैसी उदारता व्यापकता, व्यवस्था, उत्कृष्टता तत्परता अपनायें, यही हमारी रीति-नीति होनी चाहिये। इस दिशा में जितना मनोयोग पूर्वक आगे बढ़ा जायेगा उसी अनुपात से ईश्वरीय सम्पर्क का आनन्द और अनुग्रह का लाभ मिलेगा। वस्तुतः अध्यात्म साधना का एकमात्र उद्देश्य आत्मसत्ता को क्रमशः अधिकाधिक पवित्र और परिष्कृत बनाते जाना है। यही सुनिश्चित ईश्वर की प्राप्ति और साथ ही उस मार्ग पर चलने वालों को जो विभूतियां मिलती रही हैं, उन्हें उपलब्ध करने का राजमार्ग है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ८४
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

सोमवार, 23 अगस्त 2021

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ५२)

विचार से भी परे

आत्मा चिंगारी है और परमात्मा ज्वाला। ज्वाला की समस्त सम्भावनाएं चिनगारी में विद्यमान हैं। अवसर मिले तो वह सहज ही अपना प्रचण्ड रूप धारण करके लघु से महान् बन सकता है। बीज में वृक्ष की समस्त सम्भावनाएं विद्यमान हैं। अवसर न मिले तो बीज चिरकाल तक उसी क्षुद्र स्थिति में पड़ा रह सकता है, किन्तु यदि परिस्थिति बन जाय तो वही बीज विशाल वृक्ष के रूप में विकसित हुआ दृष्टिगोचर हो सकता है। छोटे से शुक्राणु में एक पूर्ण मनुष्य अपने साथ अगणित वंश परम्पराएं और विशेषताएं छिपाये रहता है। अवसर न मिले तो वह उसी स्थिति में बना रह सकता है किन्तु यदि उसे गर्भ के रूप में विकसित होने की परिस्थिति मिल जाय तो एक समर्थ मनुष्य का रूप धारण करने में उसे कोई कठिनाई न होगी। अणु की संरचना सौर-मण्डल के समतुल्य है। अन्तर मात्र आकार विस्तार का है। जीव ईश्वर का अंश है। अंश में अंशी के समस्त गुण पाये जाते हैं। सोने के बड़े और छोटे कण में विस्तार भर का अन्तर है तात्विक विश्लेषण में उनके बीच कोई भेद नहीं किया जा सकता।

उपासना और साधना के छैनी हथौड़े से जीव के अनगढ़ रूप को कलात्मक देव प्रतिमा के रूप में परिणत किया जाता है। अध्यात्म शब्द का तात्पर्य ही आत्मा का दर्शन एवं विज्ञान है। इस सन्दर्भ के सारे क्रिया-कलापों का निर्माण निर्धारण मात्र एक ही प्रयोजन के लिये किया गया है कि व्यक्तित्व को—चेतना की उच्चतम—परिष्कृत—सुविकसित, सुसंस्कृत स्थिति में पहुंचा दिया जाय। इस लक्ष्य की उपलब्धि का नाम ही ईश्वर प्राप्ति है। आत्म साक्षात्कार एवं ईश्वर दर्शन इन दोनों का अर्थ एक ही है। आत्मा में परमात्मा की झांकी अथवा परमात्मा में आत्मा की सत्ता का विस्तार। द्वैत को मिटा कर अद्वैत की प्राप्ति मनुष्य जीवन का लक्ष्य है। इसकी पूर्ति के लिए या तो ईश्वर को मनुष्य स्तर का बनना पड़ेगा या मनुष्य को ईश्वर तुल्य बनने का प्रबल पुरुषार्थ करना पड़ेगा।

अध्यात्म क्षेत्र की भ्रान्तियां भी कम नहीं है। बाल-बुद्धि के लोग आत्मा पर चढ़े कषाय-कल्मषों को काटने के लिये जो संघर्ष करना पड़ता है उस झंझट से कतराते हैं और सस्ती पगडण्डी ढूंढ़ते हैं। वे सोचते हैं पूजा-पत्री के सस्ते क्रिया-कृत्यों से ईश्वर को लुभाया, फुसलाया जा सकता है और उसे मनुष्य स्तर का बनने के लिये सहमत किया जा सकता है वे सोचते हैं हम जिस घटिया स्तर पर है उसी पर बने रहेंगे। प्रस्तुत दृष्टिकोण एवं क्रिया-कलाप में कोई हेर-फेर न करना पड़ेगा। ‘ईश्वर को अनुकूल बनाने के लिए इतना ही काफी है कि पण्डितों की बताई पूजा-पत्री का उपचार पूरा कर दिया जाय। इसके बाद ईश्वर मनुष्य का आज्ञानुवर्ती बन जाता है और उचित अनुचित जो भी मनोकामनाएं की जायं उन्हें पूरी करने के लिए तत्पर खड़ा रहता है। आमतौर से उपासना क्षेत्र में यही भ्रान्ति सिर से पैर तक छाई हुई है।’’ मनोकामना पूर्ति के लिए पूजा-पत्री का सिद्धान्त तथाकथित भक्तजनों के मन में गहराई तक घुसा बैठा है। वे उपासना की सार्थकता तभी मानते हैं जब उनके मनोरथ पूरे होते चलें। इसमें कमी पड़े तो वे देवता मन्त्र, पूजा, सभी को भरपेट गालियां देते देखे जाते हैं। कैसी विचित्र विडम्बना है कि छोटा सा गन्दा नाला गंगा को अपने चंगुल में जकड़े और यह हिम्मत न जुटाये कि अपने को समर्पित करके गंगाजल कहलाये।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ८३
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 छिद्रान्वेषण की दुष्प्रवृत्ति

छिद्रान्वेषण की वृत्ति अपने अन्दर हो तो संसार के सभी मनुष्य दुष्ट दुराचारी दिखाई देंगे। ढूँढ़ने पर दोष तो भगवान में भी मिल सकते है, न हों तो...