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बुधवार, 21 दिसंबर 2016

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (अन्तिम भाग) 22 Dec

🌹 गम्भीर न रहें, प्रसन्न रहना सीखें

🔵 एक शाम पंडित मोतीलाल नेहरू अपने पुत्र जवाहर लाल के साथ गांधीजी से मिलने साबरमती आश्रम पहुंचे। झोंपड़ी में मिट्टी का दीप जल रहा था और दरवाजे के बाहर लाठी रखी हुई थी। हवा जवाहरलाल से कुछ मजाक करने पर तुली थी, उसने झोंके से दीपक बुझा दिया। अंधेरे में जवाहरलाल लाठी से जा टकराये, उनके घुटने को चोट लगी—वैसे ही जवाहरलाल गर्म मिजाज थे, इस चोट ने उनमें झल्लाहट भर दी। वे गांधी जी से पूछ बैठे—‘बापू आप मुंह से अहिंसा की दुहाई देते हैं और लाठी हाथ में लेकर चलते हैं, आप ऐसा क्यों करते हैं?’ गांधीजी ने हंसकर कहा—‘तुम जैसे शैतान लड़कों को ठीक करने के लिये।’

🔴 गांधीजी दूसरे गोल मेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए इंग्लैंड गये। वहां के लोग नहीं माने, उन्हें बालरूम डांस दिखने ले गये। वहां सब अपने-अपने जोड़ों के साथ नाचने लगे। एक अंग्रेज ने उनसे कहा—‘आप भी अपना पार्टनर चुन लीजिए।’

🔵 गांधीजी ने अपनी लाठी दिखाकर कहा—‘मेरे साथ मेरा पार्टनर है।’ यह सुनकर सबको हंसी आ गई।

🔴 एक दिन की बात है। सेठ जमनालाल बजाज ने गांधीजी से कहा—‘बापू! यह तो मुझे ज्ञात है कि आपका मुझ पर अपार स्नेह है किन्तु मैं चाहता हूं कि आप मुझे देवीदास की तरह ही अपना पुत्र बना लें।’

🔵 उनका अभिप्राय गोद लेने से था। यह जानकर गांधीजी ने लम्बे-चौड़े बजाज जी की ओर देखकर कहा—‘कहते हो सो तो ठीक है। बाप बेटे को गोद लेता है, पर यहां तो स्थिति उल्टी है। बेटा बाप को गोद लेने जैसा दीखता है।’

🔴 विनोद प्रियता की प्रवृत्ति को जरा हम भी अपना स्वभाव का अंग बनाकर देखें, विषाद कभी हमारे निकट आ ही नहीं सकता।

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 20 दिसंबर 2016

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 41) 20 Dec

🌹 गम्भीर न रहें, प्रसन्न रहना सीखें

🔵 महात्मा गांधी कहा करते थे—‘यदि कोई मुझसे विनोद प्रियता छीन ले तो मैं उसी दिन पागल हो जाऊंगा।’ मुस्कान तथा आह्लाद थकान की दवा है विनोद इनका जनक है। विनोद प्रियता अधिकांश महापुरुषों का गुण रही है। गांधीजी के जीवन का तो यह अनिवार्य पहलू था।

🔴 कलकत्ता में गांधीजी ने खादी प्रदर्शनी का उद्घाटन करते हुए कहा—‘आज जो भी खादी खरीदेगा उसका कैशमीमो मैं बनाऊंगा।’ देखते ही देखते खरीददारों की भीड़ एकत्रित हो गई। थोड़ी सी देर में ढाई हजार रुपये की खादी बिक गई।

🔵 आचार्य कृपलानी ने यह चमत्कार देखा तो मजाक में कह उठे—‘लेना-देना कुछ नहीं बनिये ने ढाई हजार रुपये मार लिये।’ गांधीजी कब पीछे रहने वाले थे, चट बोल पड़े—‘यह काम मेरे जैसे बनिये ही कर सकते हैं, प्रोफेसर नहीं।’

🔴 9 अगस्त सन् 1942, प्रातःकाल पुलिस कमिश्नर गांधीजी को गिरफ्तार करने पहुंचा, उन्हें ले जाते हुए पुलिस कमिश्नर ने पास खड़े घनश्यामदास बिड़ला से कहा—‘गांधीजी के लिए आधा सेर बकरी का दूध दिलवा दीजिये।’

🔵 बिड़लाजी ने बापू से पूछा—‘ये लोग आपकी बकरी का दूध मांगते हैं।’ उन्होंने हंसते हुए कहा—‘चार आने धरा लो और दूध दे दो।’

🔴 एक बार एक अंग्रेज पत्रकार ने गांधीजी से पूछा—‘आप देश के महान नेता होकर भी हमेशा रेल के तीसरे दर्जे में ही सफर क्यों करते हैं?’

🔵 बापू ने उसी क्षण उत्तर दिया—‘इसलिए कि रेल में कोई चौथा दरजा नहीं है।’ पत्रकार यह उत्तर सुनकर सकपका गया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 40) 20 Dec

🌹 गम्भीर न रहें, प्रसन्न रहना सीखें

🔵 मनुष्य के पसीने में सम्पदायें भरी हुई हैं और पसीने की बूंदों के साथ सम्पदायें टपकती हैं। रुचिपूर्वक आज के कामों में संलग्न होने से बढ़कर तत्काल आनन्द प्राप्त करने का और कोई तरीका नहीं है।

🔴 जिन्हें जीवन से सचमुच प्यार है और वे उस उपलब्धि का बढ़ा-चढ़ा रसास्वादन करना चाहते हैं, उनके लिए जीवन विज्ञानियों का एक ही परामर्श है कि अपनी मस्ती किसी भी कीमत पर न बेची जाय अपनी स्वतन्त्रता में विवेक के अतिरिक्त और किसी को भी हस्तक्षेप न करने दिया जाय।

🔵 अनुकूल परिस्थितियां, लोगों की अनुकम्पायें, समृद्धि की संभावनाओं की आशा रखने में कोई हर्ज नहीं, पर हिम्मत एकाकी चल पड़ने की होनी चाहिए। हमारा सन्तोष और आनन्द इस बात पर केन्द्रित रहना चाहिए कि हमने भले काम किये, दायित्व निभायें और जो किया उसमें पूरा श्रम और मनोयोग लगाया। इस आधार पर हम हर घड़ी प्रमुदित रह सकते हैं भले ही परिणाम इच्छा के अनुरूप हों या प्रतिकूल।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

रविवार, 18 दिसंबर 2016

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 38) 19 Dec

🌹 गम्भीर न रहें, प्रसन्न रहना सीखें

🔵 रोलेण्ड विलियम्स बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे, उनकी जिम्मेदारियां और गतिविधियां भी सुविस्तृत थीं, पर वे अपनी मेज पर उन्हीं फाइलों को आने देते थे जिन्हें आज ही निपटाया जा सकता है। इसी सिद्धांत को अपनाकर वे अत्यन्त सफल व्यवस्थापक बन सके।

🔴 प्रकृति परिवर्तनशील है, उसकी दौड़ इतनी तेज है कि उसकी चाल-नाप सकना सम्भव नहीं। नदी में पैर डालकर थोड़ी देर में उन्हें ऊपर उठाया जाय तो मात्र इतने क्षणों से असंख्यों टन पानी आगे बढ़ गया होगा और पीछे से आने वाले ने उसकी जगह ले ली होगी। इस चाल के साथ किसी का दौड़ सकना सम्भव नहीं, इसी प्रकार भूतकाल की घटनाओं का आकलन करते हुए आज का निर्माण व्यर्थ है। इसी प्रकार भविष्य की उन कल्पनाओं में उड़ते रहने से कोई लाभ नहीं, जो कभी-कभी आशा के विपरीत अनोखे ढंग से बदल जाती है।

🔵 भूत के घटनाक्रमों का सही निष्कर्ष इतना ही है कि हम उन परिवर्तनों से कुछ सीखें और उस नसीहत को ध्यान में रखते हुए आज का कार्यक्रम बनायें। इसी प्रकार भविष्य को यदि सचमुच उत्तम बनाना है तो उसका भी एक ही तरीका है कि वर्तमान का श्रेष्ठतम उपयोग कर गुजरें और उन बोये हुए मीठे फलों को अवसर आने पर चखें। काम कम और चिन्ता अधिक यह बर्बादी का बहुत बुरा तरीका है।

🔴 जार्ज बर्नार्ड शा कहते थे कि हर समय व्यस्त रहो, इससे तुम्हारी वे शक्तियां बच जायेंगी जो सपनों और कल्पनाओं की चक्की में पिसती हैं और शरीर-मन को बुरी तरह निचोड़ देती हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 17 दिसंबर 2016

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 37)

🌹 गम्भीर न रहें, प्रसन्न रहना सीखें

🔵  कुछ लोग बोझिल मन से परेशान रहते हैं, ऐसे लोगों को प्रसन्न रहने की कला सीखनी चाहिए। यह अभ्यास करने के लिए आज और अभी से तैयार हुआ जा सकता है। दैनिक जीवन में जिससे भेंट हो उससे यदि मुस्कराते हुए मिला जाय तो बदले में सामने वाला भी मुस्कराहट भेंट करेगा। उसे हल्की-फुल्की बात करने में झिझक नहीं महसूस होगी और इस तरह अपने मन का भारीपन काफी दूर होगा।

🔴  अगर कोई चेहरे पर चौबीसों घण्टे गमगीनी लादे रहे तो धीरे-धीरे उसके सहयोगियों की संख्या घटती चली जाती है। यदि प्रतिक्षण प्रसन्नता बांटते रहने का न्यूनतम संकल्प शुरू किया जाय तो थोड़े दिनों के प्रयास से ही आशातीत परिणाम मिलने लगेंगे।

🔵  डेल कार्नेगी कहते थे कि भूतकाल पर विचार मत करो, क्योंकि अब वह फिर कभी लौटकर आने वाला नहीं है। इसी प्रकार भविष्य के बारे में साधारण अनुमान लगाने के अतिरिक्त बहुत चिन्तित एवं आवेशग्रस्त होना व्यर्थ है। क्योंकि कोई नहीं जानता कि परिस्थितियों के कारण वह न जाने किस ओर करवट ले। हमें सिर्फ वर्तमान के बारे में सोचना चाहिए और वही करना चाहिए जो आज की परिस्थितियों में सर्वोत्तम ढंग से किया जा सकता है। हमारी आशा कुछ भी क्यों न हो प्रसन्नता के केन्द्र वर्तमान के प्रति जागरूकता बरतना और सर्वोत्तम ढंग से निर्वाह करना ही होना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 36) 17 Dec

🌹 गम्भीर न रहें, प्रसन्न रहना सीखें

🔵 यहां शारीरिक स्वास्थ्य के नियमों की अवहेलना करने अथवा उन्हें नगण्य बताने का प्रयास नहीं किया जा रहा है। कहने का आशय केवल इतना है कि स्वस्थ शरीर का सदुपयोग जिस मनस्विता के आधार पर सम्भव होता है—उसके विकास पर भी पर्याप्त ध्यान दिया जाना चाहिए, मनःस्थिति हल्की-फुल्की रहनी चाहिए।

🔴 प्रसन्नचित्त रहना मानसिक स्वास्थ्य के लिए सबसे अधिक आवश्यक है। उदासीन रहने वालों की अपेक्षा खुशमिज़ाज लोग अक्सर अधिक स्वस्थ, उत्साही और स्फूर्तिवान् पाये जाते हैं। गीताकार ने प्रसन्नता को महत्वपूर्ण आध्यात्मिक सद्गुण माना है और कहा है कि प्रसन्न चित्त लोगों को उद्विग्नता नहीं सताती एवं उन्हें जीवन में दुःख भी कभी सताते नहीं।

🔵 अकारण भय, आशंका, क्रोध, दुश्चिन्ता आदि की गणना मानसिक रोगों में की जाती है। जिस प्रकार शारीरिक रुग्णता का लक्षण मुख-मण्डल पर दृष्टिगोचर होता है, उसी प्रकार मन की रुग्णता भी चेहरे पर झलकती है। मनोविज्ञानी डा. लिली एलन के अनुसार ‘मुस्कान वह दवा है जो इन रोगों के निशान आपके चेहरे से ही नहीं उड़ा देगी वरन् इन रोगों की जड़ भी आपके अन्तः से निकाल देगी।’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 35)

🌹 गम्भीर न रहें, प्रसन्न रहना सीखें
🔵 स्वादिष्ट व्यंजन की कल्पना मात्र से मुंह में पानी भर आता है। शोक समाचार पाकर उदासी छा जाती है, चेहरा लटक जाता है। प्रफुल्ल मुखाकृति से आन्तरिक प्रसन्नता का पता चलता है। इस प्रकार अदृश्य होते हुए भी मन की हलचलों का भला और बुरा प्रभाव जीवन में पग-पग पर अनुभव होता है।

🔴 मनुष्य अपने मानस का प्रतिबिम्ब है। मानसिक दशा का स्वास्थ्य के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है। नवीनतम शोधों के आधार पर तो यह भी कहा जाने लगा है कि रोग शरीर में नहीं, बल्कि मस्तिष्क में उत्पन्न होता है। यही कारण है कि उत्तम और समग्र स्वास्थ्य के लिए मन का स्वस्थ होना सबसे जरूरी है।

🔵 राबर्ट लुई स्टीवेन्सन ने अंग्रेजी में कई साहसिक उपन्यास लिखे हैं, उन्हें पढ़ने वाले सोचते थे कि लेखक भी योद्धा जैसा दिखने वाला कोई भारी भरकम कद्दावर होगा, जबकि वास्तविकता यह थी कि उनने अपनी अधिकांश प्रसिद्ध कृतियां रुग्णावस्था में चारपाई पर पड़े हुए लिखीं। शंकराचार्य अपने जीवन के उत्तरार्ध में भगन्दर के मरीज रहे, वैद्य ने उनकी स्थिति को देखते हुए शारीरिक श्रम करने तथा चलने-फिरने की मनाही की थी। परन्तु उस जर्जर काया को लेकर ही उनने चारों धामों की स्थापना, शास्त्रार्थ द्वारा दिग्विजय तथा पातंजलि के भाष्य आदि का गुरुत्तर कार्य भी सम्पन्न किया।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 14 दिसंबर 2016

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 34)

🌹 गम्भीर न रहें, प्रसन्न रहना सीखें

🔵 गांधीजी हंसमुख थे, उनके सामने देश की अत्यन्त गम्भीर समस्यायें रहती थीं तो भी वे थोड़ी-थोड़ी देर में हंसते रहने के अवसर ढूंढ़ते रहते थे। कहते थे कि गम्भीरता को सुरक्षित रखने के लिए अपने को बोझिल न होने देने के लिए हंसना भी एक मानसिक टॉनिक है।

🔴 परिहास प्राणियों के मध्य एकता, समता और समस्वरता लाता है। यदि ऐसा न होता तो विषमता की आग में चेतना की दुनिया कभी की जल-भुनकर नष्ट हो गई होती।

🔵 यह मान्यता सही नहीं है कि बुद्धिमत्ता यथार्थवादी और कठोर होती है, इसलिए उसे भावुकतावश परिहास की आवश्यकता नहीं होती और न उसके लिए अवसर मिलता है। यदि ऐसा रहा होता तो बुद्धिमत्ता बड़ी कर्कश, कुरूप, बोझिल और संकट उत्पन्न करने वाली हो गई होती। मानवी परिहास की प्रवृत्ति संसार की सबसे बड़ी जीवन्त सुन्दरता है। यों प्रकृति की संरचना, ऋतुओं का परिवर्तन, चित्र-विचित्र वनस्पतियां और प्राणियों की विशेषतायें स्वयंमेव में ऐसी हैं कि मनुष्य उन्हें अपनी सौंदर्य दृष्टि से देखने पर मुग्ध होकर रह जाय।

🔴 यह कथन सही नहीं है कि उच्चस्तरीय व्यक्ति गम्भीर रहते हैं। इस गम्भीरता के पीछे भी उनके लक्ष्य विशेष का उत्साहवर्धक और आशाजनक सौन्दर्य समाहित रहता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 33) 14 Dec

🌹 गम्भीर न रहें, प्रसन्न रहना सीखें

🔵 इसके विपरीत जीवन के प्रति गम्भीर दृष्टिकोण अपनाने वाले लोग यद्यपि सस्ते मनोरंजन से अपने मन बहलाव के बहाने नहीं खोजते, प्रत्युत समस्याओं के महत्वपूर्ण हल निकालते और वास्तविक प्रसन्नता का अनुभव करते हैं। मनोरंजन के पुराने साधन सिनेमा, सिगरेट, शराब और गन्दे नाच-गाने अब बीते युग की बातें होती जा रही हैं, इन दुष्प्रवृत्तियों से जितनी जल्दी मुक्ति मिले अच्छा है। अब तो प्रबुद्ध वर्ग इलेक्ट्रानिक खोजों, चांद पर जाने या अन्तरिक्ष शोधों में व्यस्त रहना ही अपना मनोरंजन समझता है।

🔴 वस्तुतः गम्भीर दृष्टिकोण अपनाकर भी स्वस्थ मनोरंजन किया जा सकता है। कब गम्भीर रहना व कब हल्का रहना यह भी एक कला है। बच्चों का विकास करने के लिए उनमें हिल-मिलकर समय काटने में सबको बड़ा आनन्द आता है और एक महत्वपूर्ण उद्देश्य के दायित्व की पूर्ति होती है। ऐसे कार्यों में मन लगाना जिससे स्वस्थ मनोरंजन भी हो और उस मनोरंजन से लाभ भी मिले—गम्भीर लोगों को प्रिय होता है, इसी में वे स्वयं को तनावमुक्त कर लेते हैं।

🔵 उद्देश्यों-आदर्शों के प्रति गम्भीर रहने में हर्ज नहीं, इससे अपना चित्त एकाग्र रखने और हाथ में लिए काम को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाने उसका महत्व विचारने का अवसर मिलता है किन्तु यह गम्भीरता ऐसी नहीं होनी चाहिए जो उदासी-उपेक्षा जैसी प्रतीत हो और लगे कि मनुष्य किसी परेशानी में डूबा हुआ है। ऐसा होने पर लोग दूर रहने और बचने की कोशिश करते हैं, इस स्थिति में मनुष्य अपने को अकेला और जीवन को नीरस अनुभव करता है।

🔴 गम्भीरता के दबाव को हलका करने के लिए हंसने-हंसाने की आदत डालनी चाहिए, पर वह होनी बाल सुलभ चाहिए, उसमें व्यंग, उपहास, तिरस्कार जैसी भावनायें मिल जाने से वह हंसी भी विषाक्त हो जाती है। उसमें तो दूसरों को चोट पहुंचाने, किसी अनुपस्थित व्यक्ति की या अपनी अटपटी बातों की चर्चा करते हुए परिहास का अवसर ढूंढ़ा जाता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 13 दिसंबर 2016

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 32)

🌹 गम्भीर न रहें, प्रसन्न रहना सीखें
🔵 गम्भीर रहना वैसे सामान्यतया बुरा माना जाता है और समझा जाता है कि हंसना-हंसाना, हल्के-फुल्के रहना अच्छा होता है। इसमें कोई शक नहीं कि मनुष्य को प्रसन्न चित्त रहना चाहिए किन्तु गम्भीर रहना भी एक कला है। यहां पर गम्भीरता से तात्पर्य जीवन के प्रति गम्भीर दृष्टिकोण अपनाने से है। प्राचीनकाल से ही जीवन के प्रति गम्भीर दृष्टिकोण अपनाने की नीति प्रचलित थी, इस चिन्तन को प्रकारान्तर से दूरदर्शितापूर्ण कहा जा सकता है।

🔴 मनीषी, दार्शनिक तथा महत्वपूर्ण कार्यों में संलग्न लोग हमेशा जीवन के प्रति गम्भीर दृष्टिकोण अपनाने के पक्षधर रहे हैं। वर्तमान युग में लोग चिन्तित रहते हैं गम्भीर नहीं। चिन्तित रहना एक बात है और गम्भीर रहना दूसरी।

🔵 आधुनिक युग में लोग चिन्ता और तनाव से बचने के लिए हल्के-फुल्के मनोरंजन तथा नशाखोरी का सहारा लेते रहते हैं। ठाली बैठकर गपशप करना, हल्के-फुल्के तथा गन्दे मजाक करना, ठिठोली करना और उसी में समय काट देना ही एक उनका उद्देश्य होता है। ऐसे लोग अन्दर से चिन्तित तथा तनावग्रस्त होते हैं और बाहर से सस्ते मनोरंजन का आधार लेकर प्रसन्न रहते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 12 दिसंबर 2016

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 31) 12 Dec

🌹 क्रोध स्वयं अपने लिए ही घातक

🔵 आवेशग्रस्त लोगों का एक और भी तरीका है कि वे आत्महत्या या पलायन की बात सोचते हैं और यह कल्पना करते हैं कि उनके न रहने पर प्रतिपक्षी को कितनी व्यथा सहनी पड़ेगी या कठिनाई उठाने पड़ेगी? जिनको आक्रमण की अपेक्षा आत्मघात सरल प्रतीत होता है वे उस रीति को अपना लेते हैं और जो भी तरीका समझ में आता है उससे आत्मघात कर बैठते हैं।

🔴 हत्या या आत्महत्या मनुष्य के हेय व्यक्तित्व का उभार है। मनुष्य में श्रेष्ठता और दुष्टता दोनों के अंश होते हैं। प्रयत्नपूर्वक उसकी करुणा और सहृदयता भी जगाई जा सकती है, जिससे प्रेरित होकर वह सेवा-सहायता जैसी सत्प्रवृत्तियां भी अपना सकता है, पर इसके लिए जन्मजात संस्कार ही नहीं वातावरण और प्रशिक्षण भी ऐसा मिलना चाहिए जिसके प्रभाव से सज्जनता उभरे। ऐसे छोटे-छोटे काम उसे आरम्भ में ही सौंपे जाय, जिसके सहारे सहानुभूति और संवेदना उभरे तथा निजी महत्वाकांक्षाओं के आवेशों पर नियन्त्रण करने का अभ्यास पड़े।

🔵  इसके विपरीत जिन्हें दुश्चिंतन का आधार मिलता है उन्हें कुकर्मियों के दुस्साहसों में शौर्य-पराक्रम ढूंढ़ने की आदत पड़ जाती है। वह दुर्बलों पर अनीति बरतते-बरतते इतने निष्ठुर हो जाते हैं जो दूसरों का अहित करने की तरह अपने आपको भी प्रतिशोध और आत्म प्रताड़ना का दुहरा काम सहने के लिए बाधित करे—इस मार्ग पर आने की रोकथाम किशोरावस्था में ही करनी चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 10 दिसंबर 2016

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 30)

🌹 क्रोध स्वयं अपने लिए ही घातक

🔵 आक्रमण के बदले में क्या दण्ड मिलते हैं? इसे जानते हुए भी वह उस सम्बन्ध में भी विचार नहीं करता और जिसके साथ चाहे जैसा व्यवहार कर बैठता है। एक ही पक्ष पर आरूढ़ रहता है, दूसरे विकल्प का विचार नहीं करता—ऐसा व्यक्ति शत्रुता को देर तक जकड़े रहता है। साधारणतया प्रेम और द्वेष के आवेश कुछ समय में उतर जाते हैं, पर जब घृष्टता चरम सीमा पर होती है तो उसका दुष्प्रयोजन एक निश्चय की तरह जड़ जमा लेता है और अपनी दृष्टि में जिसे भी अपराधी ठहरा लिया है, उससे प्रतिशोध लिए बिना नहीं मानता।

🔴 आमतौर से हत्याकाण्ड ऐसी ही आवेशग्रस्त मनःस्थिति में होते हैं। दूसरा कारण है—लालच। जिस उपाय से कोई बड़ी पूंजी हाथ लगे उसे कर गुजरने में भी निर्भय लोग चूकते नहीं। उसे यह सोचने की क्षमता नहीं होती कि जिसे सताया जा रहा है उस पर क्या बीतेगी? आवेशग्रस्तों की तरह निर्ममता या नृशंसता भी ऐसा ही मनोविकार है जो संवेदना रहित होता है। उसे दूसरों की पीड़ा के प्रति कोई सहानुभूति नहीं होती, वे ऐसे कुकृत्य कर बैठते हैं जिससे अपने राई भर लाभ के लिए दूसरों को भले ही मर्मांत पीड़ा सहनी पड़े।

🔵  यह अपराधी मनोवृत्ति का चिन्ह है जो संगति और सहमति से पनपती है। हत्याओं-अपराधों का साहित्य बाजार में भरा पड़ा है, अपनी शेखी बघारने के लिए क्रूरकर्मी दूसरे के सामने भी अपने कुकृत्यों की बढ़ी-चढ़ी शेखी बघारते हैं और बताते हैं कि उस शौर्य के बदले उनने कितना लाभ उठाया। ऐसे लोगों की संगति से भी आदर्श विहीन लोगों का मन उस ओर ढुलक जाता है और कौतूहलवश ऐसे कुकृत्य करते-करते वे उस व्यवसाय में कसाइयों की भांति नृशंस हो जाते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 29)

🌹 क्रोध स्वयं अपने लिए ही घातक

🔵 किन्तु आतुर व्यक्ति उतावला होता है, इच्छा पूर्ति न होने पर किसी न किसी को दोषी ठहराता है। यह नहीं सोचता कि इसमें अपनी गलती भी हो सकती है और उसे सुधारने के लिए दूसरे उपाय अपनाये जा सकते हैं।

🔴 इच्छा से करने का हर किसी को अधिकार है, पर उसे उतना उतावला नहीं होना चाहिए कि जो चाहा गया है वह नियत अवधि के अन्दर या नियत तरीके से ही पूरा होना चाहिए। अनुकूल अवसर पर इच्छा पूरी या अधूरी मात्रा में पूरी हो सके—इसके लिए धैर्य रखने और प्रतीक्षा करने की आवश्यकता है। परिस्थितियां नहीं बदलतीं तो मनःस्थिति को बदल लेना भी एक उपाय है। संसार में अनेक इच्छित वस्तुयें या परिस्थितियां हैं वे सभी पूरी नहीं होती हैं तो अधीर होने की अपेक्षा यही अच्छा है कि जितना उपलब्ध है उससे ही सन्तोष करें। हर किसी की हर इच्छा तुर्त-फुर्त पूरी होनी ही चाहिए—यह संसार का नियम नहीं है।

🔵 किसी जमाने में तानाशाह ऐसे होते थे जो न्याय या परिस्थितियों पर विचार करने की अपेक्षा अपनी हविश पूरी न होने को ही बढ़ा-चढ़ा अपराध मानते थे और उसके बदले मृत्युदण्ड सुना देते थे। सहकारियों में से किसी की इतनी हिम्मत नहीं होती थी कि उस निर्देश के सम्बन्ध में ननुनच कर सके। ऐसी पूछताछ करने में भी उस अहंकारी का अपमान होता था, वह समय अब नहीं रहा। जिस पर आरोप लगाया गया है उसे अपनी बात कहने, सफाई देने का अवसर दिया जाता है किन्तु अव्यवस्थित व्यक्ति को इतना भी अवसर देने की गुंजाइश नहीं रहती। प्रतिपक्षी को अपराधी ही निश्चित करता है और अपराध के बदले में मृत्युदण्ड से हल्की सजा भी हो सकती? यह वह नहीं सोच पाता कि ऐसा घातक निर्णय कर गुजरने पर अपने ऊपर क्या बीतेगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

गुरुवार, 8 दिसंबर 2016

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 28)

🌹 क्रोध स्वयं अपने लिए ही घातक

🔵 मस्तिष्कीय ज्वर की भांति ही आवेश एक ऐसी उत्तेजना है जो पैर पटकने, सिर धुनने की तरह कुछ न कुछ अनर्थ करके ही विराम लेता है। आवेशग्रस्त व्यक्ति परिस्थितियों को अपने अनुकूल-अनुरूप ही देखना चाहता है, पर यह व्यवहार में संभव नहीं। हर व्यक्ति की अपनी स्वतन्त्र प्रकृति और विचारधारायें हैं। इसी प्रकार परिस्थितियां अनेक उलझनों के बीच निकलती हुई अपना ढांचा बनाती हैं, उन पर इतना अधिकार किसी का नहीं कि इच्छा मात्र से अनुकूलन को आमंत्रित कर सके और उसे सदा वशवर्ती बनाये रह सके।

🔴 आतुर व्यक्ति में इतना धैर्य नहीं होता कि वह परिस्थितियों की अनुकूलता के लिए आवश्यक चिंतन या प्रयास कर सके। वह किसी तानाशाह की तरह तुरन्त अपनी इच्छा या आकांक्षा को कार्यान्वित होते देखना चाहते हैं, पर चाहने भर से आकांक्षा की पूर्ति कहां होती है।

🔵 होना यह चाहिए कि व्यक्ति धैर्य रखे और तालमेल बिठाने के उपाय करे। इच्छित परिस्थितियों के बिना काम चलाये अथवा इतना धैर्य रखे कि परिवर्तन में जो समय लगे उसकी प्रतीक्षा बन पड़े। उत्तेजना को यह समझ करके भी शान्त किया जा सकता है कि संसार केवल हमारी ही इच्छा के अनुरूप चलने के लिए नहीं बनाया गया है, उनके साथ और भी कितने ही प्रयोजन जुड़े हुए हैं। उनमें से जितनी सुविधायें जब मिल सकें तब तक के लिए धैर्य रखना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 7 दिसंबर 2016

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 27)

🌹 क्रोध स्वयं अपने लिए ही घातक

🔵 प्रसिद्ध वैज्ञानिक डा. जे. एस्टर ने क्रोध से पीड़ित मनःस्थिति का अध्ययन किया तथा यह निष्कर्ष प्रस्तुत किया कि ‘पन्द्रह मिनट के क्रोध से शरीर की जितनी शक्ति नष्ट हो जाती है उससे व्यक्ति नौ घण्टे तक कड़ी मेहनत करने में समर्थ हो सकता है, इसके अतिरिक्त क्रोध शरीर सौष्ठव को भी नष्ट करता है। भरी जवानी में बुढ़ापे का लक्षण, आंखों के नीचे चमड़ी का काला होना, आंखों में लाल रेखाओं का उद्भव तथा शरीर में जहां-तहां नीली नसों का उभरना क्रोध के ही परिणाम है।’

🔴 न्यूयार्क के वैज्ञानिकों ने चूहों के ऊपर एक प्रयोग किया है। उसमें क्रोधी मनुष्य के रक्त को चूहे के शरीर में डाला गया तथा उसके परिणामों का अध्ययन किया गया। 22 मिनट के उपरान्त ही चूहे में आक्रोश का भाव देखा गया, वह मनुष्य को काटने दौड़ा। लगभग 35 मिनट बाद उसने स्वयं को ही काटना शुरू किया और अन्ततः एक घण्टे के बाद मर गया।

🔵 वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष प्रस्तुत किया कि क्रोध के कारण विषाक्तता उत्पन्न होती है जो पाचन-शक्ति के लिए अत्यन्त खतरनाक सिद्ध होता है। क्रोधी स्वभाव की माताओं का दूध भी विषाक्त पाया गया है, उससे बच्चे के पेट में मरोड़ की शिकायत उत्पन्न होती है तथा कभी-कभी तो अधिक विषाक्तता के कारण बच्चे की मृत्यु तक हो जाती है। आमतौर से आत्महत्या की घटनायें भी क्रोध से ही अभिप्रेरित होती हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 26) 7 Dec

🌹 क्रोध स्वयं अपने लिए ही घातक

🔵 जिसके साथ मतभेद हुआ या विवाद चला है, उसके ऊपर एकाएक बरस पड़ने से गुत्थी सुलझती नहीं वरन् और भी अधिक उलझ जाती है। लड़ पड़ना किसी को अपना प्रत्यक्ष शत्रु बना लेना है और इस बात के लिए उत्तेजित करना है कि वह भी बदले में वैसा ही अपमानजनक व्यवहार करे। आक्रोश और प्रतिशोध का एक कुचक्र है जो सहज ही टूटता नहीं।

🔴 क्रोध करके हम दूसरे को कितनी क्षति पहुंचा सके, दबाव देकर अपनी मनमर्जी किस हद तक पूरी कर सके—यह कहना कठिन है, पर इतना निश्चित है कि उससे अपना रक्त-मांस जलने से लेकर मानसिक संतुलन गड़बड़ाने जैसी कितनी ही हानियां तत्काल होती हैं। गलती किसी की कुछ भी क्यों न हो, पर जब दर्शक किसी को आप से बाहर होते देखते हैं तो उसी को दोषी मानते हैं। जो अपनी शालीनता गंवा चुका उसके साथ किसी को सहानुभूति नहीं हो सकती। इस प्रकार क्रोधी कारण विशेष पर उत्तेजित होते हुए भी अपने आपको अकारण अपराधी बना लेता है।

🔵 दार्शनिक सोना का मत है कि ‘‘क्रोध शराब की तरह मनुष्य को विचार शून्य और लकवे की तरह शक्तिहीन कर देता है। दुर्भाग्य की तरह यह जिसके पीछे पड़ता है उसका सर्वनाश ही करके छोड़ता है।’’

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 5 दिसंबर 2016

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 25) 6 Dec

🌹 क्रोध स्वयं अपने लिए ही घातक

🔵 एक बार वे एक वीथिका से गुजर रहे थे, उसी समय दूसरी ओर से कल्याणपाद नाम का एक और व्यक्ति आ गया। दोनों एक दूसरे के सामने आ गये, पथ बहुत संकरा था। एक के राह छोड़े बिना, दूसरा जा नहीं सकता था, लेकिन कोई भी रास्ता छोड़ने को तैयार न हुआ और हठपूर्वक आमने-सामने खड़े रहे। थोड़ी देर खड़े रहने पर उन दोनों ने हटना न हटना, प्रतिष्ठा-अप्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया—अजीब स्थिति पैदा हो गयी।।

🔴 यहां पर समस्या का हल यही था कि जो व्यक्ति अपने को दूसरे से अधिक सभ्य, शिष्ट और समझदार समझता होता वह हट कर रास्ता दे देता और यही उसकी श्रेष्ठता का प्रमाण होता। निश्चित था कि प्रचेता कल्याणपाद से श्रेष्ठ थे, एक साधक थे और आध्यात्मिक उन्नति में लगे थे। कल्याणपाद एक धृष्ट और ढीठ व्यक्ति था, यदि ऐसा न होता तो एक महात्मा को रास्ता तो देता ही, साथ ही नमन भी करता। प्रचेता को यह बात समझ लेनी चाहिए थी, किन्तु क्रोधी स्वभाव के कारण उन्होंने वैसा नहीं किया बल्कि उसी के स्तर पर उतर कर अड़ गये। कुछ देर दोनों खड़े रहे, पर फिर प्रचेता को क्रोध हो आया। उन्होंने उसे श्राप दे दिया कि राक्षस हो जाए। श्राप के प्रभाव से कल्याणपाद राक्षस बन गया और प्रचेता को ही खा गया। क्रोध से विनष्ट प्रभाव हुए प्रचेता अपनी रक्षा न कर सके।

🔵 वस्तुतः क्रोध एक प्रकार का मानसिक बुखार है। चाहे तो एक विशेष प्रकार का उन्माद कह सकते हैं, जिसके चढ़ने पर यह नहीं सूझ पड़ता कि अनचाही स्थिति से निपटने के लिए क्या करना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 24) 5 Dec

  🌹 क्रोध स्वयं अपने लिए ही घातक

🔵 क्रोध होने पर मनुष्य का ज्ञान नष्ट हो जाता है। क्रोधाक्रान्त मनुष्य यह नहीं समझ पाता कि वह क्या कह रहा है और क्या कर रहा है। क्रोध में आकर लोग अधिकतर अपनी ही हानि कर लेते हैं। दो परस्पर विरोधी व्यक्तियों में जो अपेक्षाकृत अधिक शान्त और संतुलित रहता है वही जीतता है। बुद्धिमान लोग अपने शत्रु को क्रोध से नहीं, शांति से नष्ट करते हैं। क्रोधी व्यक्ति जब एक बार किसी एक से क्रुद्ध हो जाता है तब उसका सन्तुलन यहां तक बिगड़ जाता है कि वह अन्य असम्बंधित व्यक्तियों से भी क्रोधपूर्ण व्यवहार एवं वार्ता करने लगता है और इस प्रकार और भी विरोधी बना लिया करता है।

🔴 क्रोधी व्यक्ति जब किसी पर क्रुद्ध होकर उसका कुछ बिगाड़ नहीं पाता तो अपने पर क्रोध करने लगता है, अपने को दण्ड देने और अपनी ही हानि करने लगता है। क्रोध मनुष्य को पागल की स्थिति में पहुंचा देता है। बुद्धिमान और मनीषी व्यक्ति क्रोध का कारण उपस्थित होने पर भी क्रोध का आक्रमण अपने पर नहीं होने देते। वे विवेक का सहारा लेकर उस अनिष्टकर आवेग पर नियंत्रण कर लेते हैं और इस प्रकार संभावित हानि से बच जाते हैं।

🔵 प्रचेता एक ऋषि के पुत्र थे। स्वयं भी साधन थे, वेद-वेदांग के ज्ञाता थे, संयम और नियम से रहते थे। दिन-अनुदिन तप संचय कर रहे थे किन्तु उनका स्वभाव बड़ा क्रोधी था, जब-तब इससे हानि भी उठाते थे, किन्तु न जाने वे अपनी इस दुर्बलता को दूर क्यों नहीं करते थे। इसकी उपेक्षा करने से होता यह था कि एक लम्बी साधना से जो आध्यात्मिक शक्ति प्रचेता संचय करते थे वह किसी कारण से क्रोध करके नष्ट कर लेते थे। इसलिए साधना में रत रहते हुए भी वे उन्नति के नाम पर यथास्थान ही ठहरे रहते थे। होना तो यह चाहिए था कि अपनी प्रगति के इस अवरोध का कारण खोजते और उसको दूर करते, लेकिन वे स्वयं पर ही इस अप्रगति से क्रुद्ध रहा करते थे। अस्तु एक मानसिक तनाव बना रहने से वे जरा-जरा सी बात पर उत्तेजित हो उठते थे।

🌹 *क्रमशः जारी*
🌹 *पं श्रीराम शर्मा आचार्य*

शनिवार, 3 दिसंबर 2016

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 23) 4 Dec

🌹 दुष्टता से निपटें तो किस तरह?
🔵  कोई समय था जब शासन, समाज, न्याय-व्यवस्था आदि का कोई उचित प्रबन्ध नहीं था। उस आदिमकाल में प्रतिद्वन्दियों से भी स्वयं ही भुगतना पड़ता था। यह पिछले काल की व्यवस्था थी, अब हम विकसित समाज में रह रहे हैं और यहां न्यायालयों का भी हस्तक्षेप है। अनीति की रोकथाम के लिए पुलिस का ढांचा बना हुआ है और आक्रमण किस स्तर का था? किन परिस्थितियों में बन पड़ा? इसका पर्यवेक्षण करने की गुंजाइश है, भले ही वह प्रक्रिया दोषपूर्ण हो और उसे सुधारने में समय लगे तो भी धैर्य रखना चाहिए और कानून अपने हाथ में लेने का बर्बर तरीका अपनाने की अपेक्षा, न्याय का निर्देश और समाजगत यश-अपयश के सहारे ही काम चला लेना चाहिए।

🔴  क्षमा का समर्थन यहां सिद्धांत के रूप में नहीं किया जा रहा है। किसी को अपने कृत्य पर वास्तविक पश्चात्ताप हो और भविष्य में वैसा न कर गुजरने का कोई स्पष्ट कारण हो तो क्षमा की भी अपनी उपयोगिता है, वह समर्थों द्वारा दुर्बलों पर किया गया अहसान है। किन्तु यदि आक्रान्त अपने को सबल समझकर आक्रामकता अपना रहा है तो क्षमा की बात करना दुष्ट की दुष्टता को बढ़ाना और संसार में अनीति का अधिक विस्तार होने की संभावना को अधिकाधिक प्रबल बनाना है। उसका उपचार क्षमा के नाम पर कायरता अपनाने से नहीं हो सकता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

👉 सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र (भाग 22) 3 Dec

🌹 दुष्टता से निपटें तो किस तरह?

🔵  चिकित्सक वही बुद्धिमान माना जाता है जो रोग को मारे किन्तु रोगी को बचा ले। रोग और रोगी को साथ-साथ ही मार डालने का काम तो कोई गंवार ही कर सकता है। किन्तु मनुष्य जीवन असामान्य है, उसमें सृष्टा की सर्वोत्तम कलाकृति का नियोजन हुआ है। हो सकता है कि उसमें कुछ दोष-दुर्गुण किसी कारण घुस पड़ें, पर वह जन्मजात रूप से वैसा नहीं है। प्रकृतितः वह वैसा नहीं है। सृष्टा ने अपनी अनेक विशेषतायें भी दी हैं, ऐसी दशा में किसी को भी पूर्णतया हेय या दुष्ट नहीं माना जा सकता। मनुष्य को दुष्टता के ढांचे में ढालने का कुकृत्य हेय-दर्शन द्वारा ही होता है।

🔴  कुकृत्यों के लिए मूलतः कुविचार ही उत्तरदायी हैं और वे किसी के भी अन्तराल से नहीं निकलते, दूत की तरह बाहर से लगते हैं। संक्रामक रोगों की तरह उनका आक्रमण होता है—इस विपर्यय की यदि समय रहते रोकथाम हो सके तो मनुष्य की मौलिक श्रेष्ठता अक्षुण्ण ही बनी रह सकती है अथवा यदि वह मलेरिया की तरह चढ़ ही दौड़े तो उसे कड़वी कुनैन पिलाने भर से काम चल सकता है। इस अधिक उपयोगी और कारगर प्रक्रिया के रहते उस घृणा का उपयोग क्यों किया जाय जो शीतल जल की तरह विद्वेष को घटाने के काम नहीं आती वरन् ईंधन डालने की तरह आग को और बढ़ाती है।

🔵  कई बार मनुष्य इतना विद्वेषी नहीं होता जितना कि वह घृणा का तिरस्कार सहकर उद्धत हो उठता है और अपेक्षाकृत अधिक बड़ा प्रतिशोध लेने की चेष्टा करता है, जो एक तक ही सीमित न रहकर अनेकों को अपनी चपेट में लेता है। संसार में पहले से ही विद्वेष की कमी नहीं, उसे और अधिक भड़काने की अपेक्षा यह अधिक उपयुक्त है कि रोग को ही मरने दिया जाय। रोगी तो अच्छा होने पर उससे भी अधिक अच्छा सिद्ध हो सकता है जितना कि पिछले दिनों बुरा रह चुका है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 परमार्थ की उपेक्षा न करें ( भाग 2)

पुण्य परमार्थ की इस आवश्यकता को प्रायः सज्जन व्यक्ति अनुभव करते हैं। किन्तु उसको कार्यान्वित करने में प्रमाद बरतते हैं। इस प्रमाद का व्यवहार...