शुक्रवार, 30 जुलाई 2021

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ४५)

सत् तत्व का नियामक

इतने पर ही उसके अनुदान समाप्त नहीं हो जाते अग्नि में चिंगारी, पदार्थ में—परमाणु सूर्य में किरणों की तरह वह स्वयं भी मनुष्य की हृदय गुहा में बैठकर उसे प्रतिपल आत्मोत्कर्ष की प्रेरणा देता रहता है। गलत मार्ग पर चलने से पहले ही उसकी प्रेरणा रोकती है, पर मनुष्य अन्तःकरण की उस पुकार को अनसुनी कर स्वेच्छाचारिता बरतता और उस अपराध का दण्ड, रोग, शोक, क्लेश, कलह और मानसिक सन्ताप के रूप में भुगतता रहता है। फिर भी उसकी वासनाएं शान्त नहीं होतीं, वह अपनी वासनाओं की, तृष्णा की, अतृप्त कामनाओं की प्यास बुझाने के लिए मानवेत्तर योनियों में भटकता है, तो भी उसकी दया, करुणा, उदारता एक पल को भी साथ नहीं छोड़ती और उसे निरन्तर ऊपर उठने, कामनाओं से मुक्ति पाकर शाश्वत, सनातन और दिव्य आनन्द की प्राप्ति के लिए प्रेरित करती रहती है। फिर भी इस सत्ता के अजस्र अनुदानों की ओर से आंख फेरकर मनुष्य प्यासा का प्यासा बना रहता है। माया के मूढ़ भ्रमजाल में पड़ा जीवन के बहुमूल्य क्षण मिट्टी के सोल नष्ट करता रहता है।

वैज्ञानिक सृष्टि की नियामक विधि-व्यवस्था प्रत्येक अणु में विद्यमान दिव्य चेतना को नहीं झुठलाती। हर्वर्ट स्पेंसर की दृष्टि में भगवान् एक विराट् शक्ति है जो संसार की सब गतिविधियों का नियन्त्रण उसी प्रकार करता है जिस प्रकार घर का मुखिया, गांव का प्रधान, जिले का कलेक्टर और प्रान्त का गवर्नर। राज्य के नियमों का हम इसलिए पालन करते हैं क्योंकि हमें राजदण्ड का भय होता है। नैतिक नियमों का पालन न करने पर हमें भय लगता है जब कि हम उसके लिए पूर्ण स्वतन्त्र होते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि संसार में कोई सर्वोच्च सत्ता काम करती है। निर्भीक व्यक्ति, नैतिक व्यक्ति ही हो सकता है इस तथ्य से वह भी स्पष्ट है कि वह प्रजावत्सल और न्यायकारी भी है।

दार्शनिक कान्ट ने इन्पेंसर के कथन को और भी स्पष्ट करते हुये लिखा है—नैतिक नियमों की स्वीकृति ही परमात्मा के अस्तित्व का प्रमाण और पूर्ण नैतिकता ही उसका स्वरूप है। संसार का बुरे से बुरा व्यक्ति भी किसी न किसी के प्रति नैतिक अवश्य होता है। चोर, डकैत और कसाई तक अपने बच्चों के प्रति दयालु और कर्त्तव्य-परायण होते हैं, जब कि वे जीवन भर कुत्सित कर्म ही करते रहते हैं। अपने भीतर से नैतिक नियमों की स्वीकृति इस बात का पुष्ट प्रमाण है कि संसार केवल नैतिकता के लिए ही जीवित है। उसी से संसार का निर्माण पालन और पोषण हो रहा है। इसलिए परमात्मा नैतिक शक्ति के रूप में माना जाने योग्य है।

हैब्रू ग्रन्थों में ईश्वर को ‘‘जेनोवाह’’ कहा गया है जेनोवाह का शाब्दिक अर्थ है—वह जो सदैव सत्य नीति ही प्रदान करता है। दार्शनिक प्लेटो ने उसे—‘‘अच्छाई का विचार’’ कहा है। संसार के प्रत्येक व्यक्ति यहां तक कि जीव-जन्तुओं में भी अच्छाई की चाह रहती है। अच्छाई में ही आनन्द और आत्म-तृप्ति मिलती है। अच्छाई शरीर और सौन्दर्य की जो संयम और सदाचार द्वारा सुरक्षित हो, अच्छाई समाज की जो ईमानदारी, नेकनीयती, विश्वास, सहयोग और परस्पर प्रेम व भाईचारे की भावना से सुरक्षित हो, अच्छाई प्रकृति की जो रंग-बिरंगे फूलों, भोले भाले पशु-पक्षियों के कलरव उनकी क्रीड़ा द्वारा सुरक्षित हैं। इस तरह संसार में सर्वत्र अच्छाई के दर्शन करके प्रसन्नता अनुभव करते हैं। परमात्मा इस तरह अच्छाई का वह बीज है जो आंखों को दिव्य मनोरम और बहुत प्यारा लगता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ७१
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग ४५)

प्रभु स्मरण, प्रभु समर्पण और प्रभु अर्पण का नाम है भक्ति

ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की वाणी ने सभी के अन्तःकरण को छू लिया। यह छुअन इतनी गहरी और कसक भरी थी कि सभी की भावनाएँ पिघल उठीं। देवों की दीप्ति एवं ऋषियों का तेज अनायास ही इसमें घुलने लगा। हिमवान की गोद में एक और सरिता बहने के लिए मचल उठी। इसका दृश्य रूप भले ही सामान्य दृष्टि न निहार पाए, परन्तु इसके अदृश्य प्रभाव से सभी प्रभावित हो रहे थे। यह भक्ति की पावन स्रोतस्विनी थी, जिसे देवर्षि के तप ने सप्तर्षियों के ज्ञान ने और देवों की दिव्यता ने साकार किया था। इस समय के संवेदन कुछ इतने अपूर्व एवं अद्भुत थे, जिन्हें ठीक-ठीक कहा नहीं जा सकता। ऋषि पुलह तो इतने भावमय हो उठे कि उनकी वाणी बरबस फूट पड़ी। वह बोले कि ‘‘भला अनुभूतियों की कोई भाषा होती है। वे तो बस होती हैं। उन्हें कहने चलो तो कभी भी ठीक से नहीं कहा जा सकता। जब भी कोशिश करो, सदा अधूरापन बना रहता है।’’
    
ऋषि पुलह की वाणी के सूत्रों को बड़ी सुकोमलता से सम्हालते हुए देवर्षि ने भक्ति के नए महामंत्र को उच्चारित किया-
‘अस्त्येवमेवम्’॥२०॥
ठीक ऐसा ही है।
    
ऐसा कहने के बाद देवर्षि थोड़े थमे फिर कहने लगे- ‘‘भक्ति की जितनी भी परिभाषाएँ हैं सब की सब ठीक हैं। इन सभी में भक्ति का कोई न कोई पहलू अवश्य उजागर होता है परन्तु सम्पूर्णता फिर भी बाकी रहती है। सारी परिभाषाएँ ठीक होने पर भी अधूरी हैं। बहुत कुछ कह देने के बाद भी काफी कुछ अनकहा रह जाता है। बची रह जाती हैं बातें। क्योंकि भक्ति की व्यापकता किसी सीमा में नहीं समाती। वह तो बस है असीम-सीमारहित, अपने में शून्यता को समेटे और अनन्तता का विस्तार लिए।’’
    
देवर्षि अपने सूत्र की व्याख्या का और विस्तार कर पाते, इसके पहले ही वातावरण में अपूर्व सुगन्धि एवं स्निग्ध प्रकाश व्याप्त हो गये। सभी समझ गए कि किन्हीं विशिष्ट विभूति का आगमन हो चुका है। हालांकि इस भक्तिगंगा के सान्निध्य में यह कोई नयी बात नहीं थी। पहले भी अनेकों विशिष्टजन पधार चुके थे। फिर भी सबकी अपनी -अपनी महत्ता थी। किसी की किसी से तुलना नहीं की जा सकती। सभी अतुलनीय और सभी अनुपमेय हैं। सभी के आगमन ने यहाँ उपस्थित सभी जनों को कृतार्थ किया था। जब कोई आया उसके आगमन से भक्तिगाथा में एक नयी कड़ी जुड़ गयी।
    
पर आज कौन? यह प्रश्न ज्यादा देर तक रहस्य न रह सका। थोड़ी देर में एक विचित्र किन्तु सम्मोहक व्यक्तित्व प्रकट हो गया। ये ऋषि अघोर थे। इनके सान्निध्य को सिद्धजन भी अपने लिए परम सौभाग्य मानते हैं। परम अवधूत, महाज्ञानी, भावमय भक्त, ऋषि अघोर को भगवान् दत्तात्रेय की ही भाँति पूजनीय माना जाता है। हालांकि वे भला कब किसी की पूजा स्वीकार करते हैं। उनका अस्तित्त्व तो मलय पवन के समान सदा प्रवाहित रहता है। वे कब कहाँ, किस को, किस तरह से कृतार्थ कर दें, इसे भला कौन जानता है। सिद्धों के सम्प्रदाय में कहा जाता है कि ऋषि अघोर मेघों की भाँति हैं, जो दैवी प्रेरणा से जाकर अपने कृपाजल की वृष्टि करते रहते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ८५

गुरुवार, 29 जुलाई 2021

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ४४)

सत् तत्व का नियामक

सर्व नियामक सत्ता की प्रबन्ध व्यवस्था का पता जीवन के आविर्भाव से ही चल जाता है। जीवन की उपयोगी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सृष्टि में ऐसा प्रबन्ध है कि वे सरलतापूर्वक पूरी हो जाया करे। सांस के बिना प्राणी एक क्षण को भी जीवित नहीं रह सकता, सो वह प्रचुर मात्रा में सर्वत्र उपलब्ध है। उसके बाद जल की आवश्यकता है उसके लिए थोड़ा प्रयत्न करने से ही काम चल जाता है। तीसरी आवश्यकता अन्न की है सो उसके लिए साधन न जुटा सकने वाले प्राणियों के लिए फल-फूल की प्राकृतिक व्यवस्था है वहीं बुद्धिधारी जीव थोड़े प्रयत्न से अपनी आवश्यकता पूरी कर लेते हैं इसके बाद के समस्त उपादान आवश्यकता के अनुपात में प्रयत्न और परिश्रम से प्राप्ति होते रहते हैं। इस सार्वभौम आवश्यकताओं की पूर्ति बिना संचालक-व्यवस्थापक के कैसे सम्भव हो सकती थी।

नैतिकता के सर्वमान्य सिद्धान्तों से न केवल जीव समुदाय जुड़ा है अपितु कर्त्ता ने वह अनुशासन स्वयं पर भी पूरी तरह लागू किया है। भ्रूण जैसी अत्यधिक कोमल और सम्वेदनशील सत्ता को विकसित होने के लिए खुला छोड़ दिया जाता तो प्राण-धारी के लिए उपयोगी वायु, ताप और अन्य प्राकृतिक परिस्थितियां ही  उसे नष्ट-भ्रष्ट कर डालतीं सो उसके लिए अति वातानुकूलित और सर्व सुविधा सम्पन्न निवास मां के गर्भाशय की व्यवस्था क्या किसी अत्यधिक प्रबुद्ध सत्ता के अस्तित्व का प्रमाण नहीं। जहां चारों तरफ से बन्द कोठरी में ही उसे विकास की समस्त सुविधायें उचित मात्रा में मिलती रहती है, जन्म के पूर्व ही उसके लिए सन्तुलित आहार मां के दूध जैसा उपलब्ध कराकर उसे अत्यधिक करुणा दरसाई। असहाय, असमर्थ शिशु के लिये न केवल भौतिक सहायताएं अपितु उसके लिए जिन भावनात्मक सुविधाओं की आवश्यकता थी वह समस्त उसे कुटुम्ब में, समुदाय और समाज में मिल जाती हैं। इस तरह जीवनसत्ता परिपक्व रूप में सामने आ जाती है इतने पर भी यह कितने आश्चर्य की बात है कि दूसरों के सहारे बढ़ा विकसित हुआ जीव न केवल सामाजिक कर्त्तव्यों के प्रति कृतघ्नता का परिचय देने लगता है, अपितु अपने परमपिता, अपनी मूलसत्ता को ही भुला बैठता है।

इतने पर भी वह दयालु पिता उस शिशु के यौवन में प्रवेश करते ही उसकी पितृत्व, कामेच्छा और भावनात्मक सहयोग की पूर्ति के लिए जोड़ी मिलाने, नर को नारी में नारी को नर में अपनी पूर्णता प्राप्त करने की सुविधा जुटाई, रोग निरोध की तथा सांसारिक प्रतिकूलताओं में अपने अस्तित्व की रक्षा की जन्म-जात सुविधाएं भी प्रदान की हैं। रोगों से लड़ने की शक्ति रक्त कणों में शारीरिक अवयवों की सुरक्षा त्वचा के द्वारा देखने के लिए आंखें, सुनने के लिए कान और विचार करने के लिए बढ़िया मस्तिष्क इतनी सुन्दर मशीन आज तक न कोई बना सका और न बना सकना सम्भव है जो इच्छानुसार हर परिस्थिति में मुड़ने, लचकने, संभालने में सक्षम है। आंख जैसी रेटिना, कान जैसा पर्दा गुर्दे जैसे सफाई अधिकारी, हृदय जैसे पोषण संस्थान और पांव जैसा सुन्दर आर्क बनाने वाली सत्ता कितनी बुद्धिमान होती इसकी तुलना न किसी इंजीनियर से हो सकती है न डॉक्टर से। वह प्रत्येक कला-कौशल का ज्ञाता, सर्व निष्णात और सर्व प्रभुता सम्पन्न दानी केवल परमात्मा ही हो सकता है इससे कम मानना न केवल उस परमात्मा की अवमानना होगी अपितु यह एक प्रकार से स्वयं का ही आत्मघात होगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ६९
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग ४४)

माँ- ये एक अक्षर ही है भक्ति का परम मंत्र
    
‘‘यह तो आपका आत्मीय अनुग्रह है ऋषिश्रेष्ठ! अन्यथा मेरी स्थिति से भला कौन अपरिचित है। पर मैं आपके कथन का सम्मान अवश्य करूँगा।’’ ऐसा कहते हुए विश्वामित्र ने अपने स्मृतिकोष में कुछ उलट-पुलट की और कहने लगे कि ‘‘आप सब तो जानते ही हैं कि मेरे साधनाजीवन में कितने ही उतार-चढ़ाव रहे हैं। काम, क्रोध एवं अहंता ने अपने कितने ही संघातक और संहारक आघात किये हैं। इनके इन प्राणलेवा हमलों से कितनी ही बार मेरी साधना टूटी और बिखरी है। अप्सरा मेनका से प्रेम, ब्रह्मर्षि वशिष्ठ की संतानों को शाप देना, त्रिशंकु का घटनाक्रम और फिर अंत में अप्सरा को शापित कर देना-यही सच्चाई है मेरे तप के मिथ्याभिमान के चकनाचूर होने की।
    
अपने साधनाजीवन के इन आघातों ने मुझे इतना अधिक विचलित किया कि मुझे सूझा ही नहीं कि अब मैं क्या करूँ? साधना का कौन सा उपक्रम करूँ। ऐसे में मुझे केवल याद आया जगन्माता के आँचल का छोर। अब मुझे अपने किसी प्रयास-पुरुषार्थ पर भरोसा न रह गया। स्मरण रहा तो केवल इतना कि मुझे इस भवसागर से केवल भावमयी भगवती ही पार कर सकती हैं और तब मैंने तप, साधना एवं सभी तरह की गुह्य विद्याओं के प्रत्येक आडम्बर को छोड़कर माता के स्मरण एवं उन्हीं के समर्पण को अपना सर्वस्व माना।
    
उन दिनों ‘माँ!’ इस एकाक्षर की रटन ही मेरा जीवन बन गया।
अपनी श्वास-श्वास में माता का स्मरण। विह्वल एवं विकल मन से उनकी पुकार ही मेरी जीवन साधना बन गयी। इसी के साथ मैंने एक नया निश्चय किया कि अब से मैं अपना प्रत्येक कर्म माँ को अर्पण करूँगा। इस तरह प्रत्येक कर्म का अर्पण ही मेरी साधना का कर्मकाण्ड बन गया और माँ! यह एक अक्षर मेरा परम मंत्र।
    
मेरे दिवस-रात्रि सब इसी में गुजरने लगे। मेरे पुरुषार्थ-प्रयास से मेरा भरोसा कब का उठ चुका था। भरोसा था तो केवल जगन्माता-वेदमाता की करुणा पर। मुझे विश्वास था कि माता कभी भी अपनी संतान पर निष्करुण नहीं हो सकती। वह कभी भी अपनी संतान की पुकार अनसुनी नहीं कर सकती। बीतते जाते रात-दिनों के श्याम-श्वेत रँगों में मेरे विश्वास का रंग गहरा और उजला होता गया। अपने प्रत्येक कर्म को नित्य-निरन्तर उन्हें अर्पित करते रहना और उनका कभी भी विस्मरण न करना। मेरा यह भाव इतना गहरा हुआ कि यदि कभी कुछ पल के लिए भी उन भगवती का विस्मरण हो जाता तो मैं व्याकुल हो उठता। मुझे इतनी पीड़ा होती कि जैसे मेरा सर्वस्व छीन लिया गया हो।’’ ऐसा कहते हुए ब्रह्मर्षि विश्वामित्र कुछ पलों के लिए मौन हो गये।
    
उनके इस मौन में देवर्षि का स्वर मुखर हुआ और उन्होंने भक्ति के नये सूत्र का मंत्रोच्चार किया-
‘नारदस्तुतदर्पिताखिला चारिता तद्विस्मरणे परमव्याकुलतेति’॥ १९॥
    
नारद के मत में अपने सब कर्मों को भगवान को अर्पण करना और उनका थोड़ा सा विस्मरण होने से परम व्याकुल होना भक्ति है। देवर्षि परम साक्षी की भावदशा में यह वचन बोले। उनकी बात को सुनकर ब्रह्मर्षि विश्वामित्र हाथ जोड़कर सिर नवाते हुए कहा-‘‘देवर्षि नारद यदि ऐसा कहते हैं तो यही सत्य है। यही भक्ति है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ८३

रविवार, 25 जुलाई 2021

👉 गैर हाज़िर कन्धे

विश्वास साहब अपने आपको भागयशाली मानते थे। कारण यह था कि उनके दोनो पुत्र आई.आई.टी. करने के बाद लगभग एक करोड़ रुपये का वेतन अमेरिका में प्राप्त कर रहे थे। विश्वास साहब जब सेवा निवृत्त हुए तो उनकी इच्छा हुई कि उनका एक पुत्र भारत लौट आए और उनके साथ ही रहे; परन्तु अमेरिका जाने के बाद कोई पुत्र भारत आने को तैयार नहीं हुआ, उल्टे उन्होंने विश्वास साहब को अमेरिका आकर बसने की सलाह दी। विश्वास साहब अपनी पत्नी भावना के साथ अमेरिका गये; परन्तु उनका मन वहाँ पर बिल्कुल नहीं लगा और वे भारत लौट आए।

दुर्भाग्य से विश्वास साहब की पत्नी को लकवा हो गया और पत्नी पूर्णत: पति की सेवा पर निर्भर हो गई। प्रात: नित्यकर्म से लेकर खिलाने–पिलाने, दवाई देने आदि का सम्पूर्ण कार्य विश्वास साहब के भरोसे पर था। पत्नी की जुबान भी लकवे के कारण चली गई थी। विश्वास साहब पूर्ण निष्ठा और स्नेह से पति धर्म का निर्वहन कर रहे थे।

एक रात्रि विश्वास साहब ने दवाई वगैरह देकर भावना को सुलाया और स्वयं भी पास लगे हुए पलंग पर सोने चले गए। रात्रि के लगभग दो बजे हार्ट अटैक से विश्वास साहब की मौत हो गई। पत्नी प्रात: 6 बजे जब जागी तो इन्तजार करने लगी कि पति आकर नित्य कर्म से निवृत्त होने मे उसकी मदद करेंगे। इन्तजार करते करते पत्नी को किसी अनिष्ट की आशंका हुई। चूँकि पत्नी स्वयं चलने में असमर्थ थी, उसने अपने आपको पलंग से नीचे गिराया और फिर घसीटते हुए अपने पति के पलंग के पास पहुँची।

उसने पति को हिलाया–डुलाया पर कोई हलचल नहीं हुई। पत्नी समझ गई कि विश्वास साहब नहीं रहे। पत्नी की जुबान लकवे के कारण चली गई थी; अत: किसी को आवाज देकर बुलाना भी पत्नी के वश में नहीं था। घर पर और कोई सदस्य भी नहीं था। फोन बाहर ड्राइंग रूम मे लगा हुआ था। पत्नी ने पड़ोसी को सूचना देने के लिए घसीटते हुए फोन की तरफ बढ़ना शुरू किया। लगभग चार घण्टे की मशक्कत के बाद वह फोन तक पहुँची और उसने फोन के तार को खींचकर उसे नीचे गिराया। पड़ोसी के नंबर जैसे तैसे लगाये।

पड़ौसी भला इंसान था, फोन पर कोई बोल नहीं रहा था, पर फोन आया था, अत: वह समझ गया कि मामला गंभीर है। उसने आस– पड़ोस के लोगों को सूचना देकर इकट्ठा किया, दरवाजा तोड़कर सभी लोग घर में घुसे। उन्होने देखा -विश्वास साहब पलंग पर मृत पड़े थे तथा पत्नी भावना टेलीफोन के पास मृत पड़ी थी। पहले विश्वास और फिर भावना की मौत हुई। जनाजा दोनों का साथ–साथ निकला। 

पूरा मोहल्ला कंधा दे रहा था परन्तु दो कंधे मौजूद नहीं थे जिसकी माँ–बाप को उम्मीद थी। शायद वे कंधे करोड़ो रुपये की कमाई के भार से पहले ही दबे हुए थे।

👉 भक्तिगाथा (भाग ४३)

माँ- ये एक अक्षर ही है भक्ति का परम मंत्र

परम भगवद्भक्त शुकदेव की वाणी ने सभी की चिंतन-चेतना को भावमय बना दिया। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र तो अपने भावों की गहनता में इतने लीन हुए कि उनकी आँखें छलक आयीं। तपोनिष्ठ, परम वीतराग, महान् कर्मयोगी ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की इस भावमयता को सभी ने निहारा। पुलह, पुलस्त्य, क्रतु, मरीचि आदि सभी महर्षियों को पता था कि मुनिवर विश्वामित्र यों ही इतने भावाकुल कभी नहीं होते। लगता है कि अतीत की कोई स्मृति आकर उनकी भावनाओं को भिगो गयी है। ब्रह्मर्षि सृष्टि के गुह्य रहस्यों के मर्मज्ञ हैं। वह अपने साधना काल में अनेकों विद्याओं के अन्वेषी रहे हैं। स्वभाव से ही तपस्वी हैं। उनके दीर्घ साधनाजीवन में कभी किसी ने उन्हें भावुक होते हुए नहीं देखा था, और आज अचानक उन तपोदीप्त ब्रह्मर्षि की आँखों में अश्रुबिन्दु...।
    
इस अनहोनी से सभी चकित तो थे, पर किसी का साहस नहीं हुआ कि कोई उनकी भावसमाधि भंग करे। काफी क्षणों तक यह स्थिति बनी रही। तभी विश्वामित्र की समाधिलीन चेतना को चेत हुआ और उनके मुख से ‘‘माँ! माँ!! माँ!!!!’’ शब्द उच्चारित हुआ। महर्षि के इस उच्चारण में गहरी भावाकुलता, विकल कर देने वाली विह्लता, परम कातरता थी। उन्होंने ‘‘माँ’’ शब्द को कुछ इस तरह पुकारा कि पर्वतराज हिमालय के उस दिव्य आँगन में बैठे ऋषियों, देवों, सिद्धों, गंधर्वों एवं विद्याधरों के समुदाय को रोमाँच हो आया। सभी के तन, मन व अंतःकरण रोमांचित हो उठे।
    
‘माँ!’ इस एकाक्षरी मंत्र की गूँज सभी के अंतस् की गहराइयों में गूँज उठी। सदा अडिग एवं अविचल कहे जाने वाले हिमालय के श्वेत शिखर भी पिघल उठे। हिमनदों की उत्तुंग लहरों में छलकते जलकणों में ‘माँ!’ की पुकार तरंगित हो उठी। हिम पक्षी भी विकल होकर ‘माँ!’ इस स्वर के साथ कलरव करने लगे। भाव चेतना की व्यापकता में कुछ ऐसी मेघमन्द्र तरंगें उठीं कि बरबस ही एक नयी अनुभूति ने सभी को भिगो दिया। जड़-चेतन सभी को बरबस यह अनुभव हो आया कि आदिशक्ति, मूल प्रकृति, सृष्टि, सृजन की मूल ऊर्जा के सबसे दुलारे शिशु ने आज बहुत दिनों के बाद अपनी प्यारी संतानवत्सल माँ को पुकारा हो।
    
अपने प्रिय पुत्र की पुकार को माँ भला अनसुना कैसे करतीं। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के अंतःकरण में और श्वेत निरभ्र आकाश में एक साथ हंसवाहिनी, वेदमाता की मनोरम छवि प्रकट हो गयी। वेदमाता गायत्री का रूप परम करुणामय था। कुछ ऐसा कि बस सृष्टि की समस्त करुणा सघनता में साकार हो उठी हो। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने बस भीगे मन और नयन के साथ अपने हाथ जोड़ लिये। ‘‘तुम्हारा कल्याण हो पुत्र!’’ आकाश से बरबस ये शब्द झरे और मूल प्रकृति, वेदमाता पुनः प्रकृतिलीन हो गयी। इस बीच इतना अवश्य हुआ कि ब्रह्मर्षि विश्वामित्र प्रकृतिस्थ हो चुके थे।
    
उन्हें इस तरह प्रकृतिस्थ देखकर देवर्षि नारद ने अपनी जिज्ञासा प्रकट की-‘‘हे ब्रह्मर्षि! लगता है कि अतीत की किसी स्मृति ने बरबस आपकी भावनाओं को भिगो दिया था।’’ उत्तर में अपने अधरों पर हल्का सा स्मित लाते हुए विश्वामित्र ने कहा- ‘‘आपका कथन सत्य है, देवर्षि! सदा स्मृतियाँ ही भावों को भिगोती हैं, चेतना को आलोड़ित करती हैं।’’ ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के इस कथन पर मुनि शुकदेव ने कहा-‘‘यदि आप उचित समझें तो हमें, हम सबको भी अपनी उस पवित्र स्मृति का सहभागी बनायें।’’ शुकदेव के इस कथन का सभी ने स्वगत अनुमोदन किया। हालाँकि ब्रह्मर्षि वशिष्ठ मुखर होकर बोले-‘‘ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की प्रत्येक स्मृति पवित्र है और उनकी किसी भी स्मृति का स्मरण पवित्रता का अहसास देता है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ८२

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ४३)

सिद्ध न होने पर भी

सृष्टि क्रम की सुव्यवस्था, विकासक्रम और जीवन चेतना की विचित्र अद्भुत विविधता फिर भी उनमें सुनियोजित साम्य—ईश्वरीय अस्तित्व का प्रबल प्रमाण है। इसके विरुद्ध यह कहा जाता है कि सृष्टि का कोई भी घटक, जीव-प्राणी पदार्थ से भिन्न कुछ नहीं है। कहा जाता है कि समस्त विश्व कुछ घटनाओं के जोड़ के अतिरिक्त कुछ नहीं है।

उसके उत्तर में ख्याति प्राप्त विज्ञान वेत्ता टेण्डल ने अपने ग्रन्थ ‘‘फ्रेगमेण्टस् ऑफ साइन्स’’ में लिखा है हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, कार्बन और कुछ ऐसे ही जड़ ज्ञान शून्य पदार्थों के परमाणुओं से जीवन चेतना का उदय हुआ यह असंगत है। क्योंकि जीवन चेतना का स्पन्दन हर जगह इतना-सुव्यवस्थित और सुनियोजित है कि उसे संयोग मात्र नहीं कहा जा सकता। चौपड़ के पांसे खड़खड़ाने से होमर के काव्य की प्रतिभा एवं गेंद की फड़फड़ाहट से गणित के डिफरेंशियल सिद्धान्त का उद्भव कैसे हो सकता है?

‘‘पुगमेण्ट्स ऑफ साइन्स’’ के लेखक ने लिखा है कि यान्त्रिक प्रक्रिया के माध्यम से देखना, सोचना, स्वप्न, सम्वेदना और आदर्शवादी भावनाओं के उभार की कोई तुक नहीं बैठती। शरीर यात्रा की आवश्यकता पूरी करने के अतिरिक्त मनुष्य जो कुछ सोचता, चाहता और करता है तथा संसार में जो कुछ भी ज्ञात-विज्ञात है वह इतना अद्भुत है कि जड़ परमाणुओं के संयोग से उनके निर्माण की कोई संगति नहीं बिठाई जा सकती।

रहस्यमय यह संसार और इसके जड़ पदार्थों का विश्लेषण ही अभी प्रयोगशालाओं में सम्भव नहीं हुआ है तो चेतना, ईश्वरीय सत्ता का विश्लेषण प्रमाणीकरण लैबोरेटरी के यन्त्रों से किस प्रकार हो सकेगा? फिर भी यह कहने का अथवा इस आग्रह पर अड़े रहने का कोई कारण नहीं है कि विज्ञान से सिद्ध न होने के कारण ईश्वर का अस्तित्व नहीं है। परमाणु का जब तक पता नहीं चला था, इसका अर्थ यह नहीं है कि उससे पहले परमाणु था ही नहीं। परमाणु उससे पहले भी था और आज तर्कों द्वारा उसे असत्य सिद्ध कर दिया जाय तो भी उसका अस्तित्व मिट नहीं जाता। स्वीकार करने या न करने, ज्ञात होने अथवा अज्ञात रहने से किसी का होना न होना कोई मतलब नहीं रखता।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ६८
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

मंगलवार, 20 जुलाई 2021

👉 प्रेम ही सुख-शांति का मूल है

भगवान ने अपनी सृष्टि को सुंदर और सुव्यवस्थित बनाने के लिए जड़ और चेतन पदार्थों को एक दूसरे से संबंधित कर रखा है। निखिल विश्वब्रह्मांड के ग्रह-नक्षत्र अपने-अपने सौरमंडलों में आकर्षण शक्ति के द्वारा एक-दूसरे से संबंधित हैं। यदि ये संबंध-सूत्र टूट जाएँ, तो किसी की कुछ स्थिरता न रहे। सारे ग्रह-नक्षत्र एक दूसरे से टकरा जाएँ और संपूर्ण व्यवस्था नष्ट हो जाए।

इसी प्रकार आपसी प्रेम संबंध न हों तो जीवधारियों की सत्ता भी स्थिर न रह सकेगी। जरा कल्पना तो कीजिए, माता का बालक से प्रेम न हो, पति का पत्नी से प्रेम न हो, भाई से प्रेम न हो तो कुटुंब की कैसी दयनीय अवस्था हो जाए? यह भ्रातृ-भाव, स्नेह-संबंध नष्ट हो जाए तो सहयोग के आधार पर चलने वाली सारी सामाजिक व्यवस्था पूर्णतया नष्ट-भ्रष्ट हो जाए। सृष्टि का सारा सौंदर्य जाता रहे।

हर एक प्राणी हृदय में प्रेम की अजस्र धारा बह रही है। यदि हम सुख, शांति और संपदा पसंद करते हैं, तो आवश्यक है कि प्रेमभाव को अपनाएँ। दूसरों से उदारता, दया, मधुरता, भलमनसाहत और ईमानदारी का बरताव करें। जिन लोगों ने अपनी जीवन नीति प्रेममय बना रखी है, वे ईश्वरप्रदत्त मानवोचित आज्ञा का पालन करने वाले धर्मात्मा हैं। ऐसे लोगों के लिए हर घड़ी सतयुग है। चूँकि वे स्वयं सतयुगी हैं, इसलिए दूसरे भी उनके साथ सतयुगी आचरण करने को विवश होते हैं।

📖 अखण्ड ज्योति, फरवरी 1944

शनिवार, 17 जुलाई 2021

👉 मैं तुम्हारे साथ हूँ ...

प्रतिवर्ष माता पिता अपने पुत्र को गर्मी की छुट्टियों में उसके दादा  दादी के घर ले जाते। 10-20 दिन सब वहीं रहते और फिर लौट आते। ऐसा प्रतिवर्ष चलता रहा। बालक थोड़ा बड़ा हो गया।

एक दिन उसने अपने माता पिता से कहा कि  अब मैं अकेला भी दादी के घर जा सकता हूं ।तो आप मुझे अकेले को दादी के घर जाने दो। माता पिता पहले  तो राजी नहीं हुए।  परंतु बालक ने जब जोर दिया तो उसको सारी सावधानी समझाते हुए अनुमति दे दी।

जाने का दिन आया। बालक को छोड़ने स्टेशन पर गए।
ट्रेन में उसको उसकी सीट पर बिठाया। फिर बाहर आकर खिड़की में से उससे बात की ।उसको सारी सावधानियां फिर से समझाई।

बालक ने कहा कि मुझे सब याद है। आप चिंता मत करो। ट्रेन को सिग्नल मिला। व्हीसिल लगी। तब  पिता ने एक लिफाफा पुत्र को दिया कि बेटा अगर रास्ते में तुझे डर लगे तो यह लिफाफा खोल कर इसमें जो लिखा उसको पढ़ना बालक ने पत्र जेब में रख लिया।

माता पिता ने हाथ हिलाकर विदा किया। ट्रैन चलती रही। हर स्टेशन पर लोग आते रहे पुराने उतरते रहे। सबके साथ कोई न कोई था। अब बालक को अकेलापन लगा। ट्रेन में अगले स्टेशन पर ऐसी शख्सियत आई जिसका चेहरा भयानक था।
           
पहली बार बिना माता-पिता के, बिना किसी सहयोगी के, यात्रा कर रहा था। उसने अपनी आंखें बंद कर सोने का प्रयास किया परंतु बार-बार वह चेहरा उसकी आंखों के सामने घूमने लगा। बालक भयभीत हो गया। रुंआसा हो गया। तब उसको पिता की चिट्ठी। याद आई।

उसने जेब में हाथ डाला। हाथ कांपरहा था। पत्र निकाला। लिफाफा खोला। पढा पिता ने लिखा था तू डर मत मैं पास वाले कंपार्टमेंट में ही इसी गाड़ी में बैठा हूं। बालक का चेहरा खिल उठा। सब डर दूर  हो गया।

मित्रों,
जीवन भी ऐसा ही है।
जब भगवान ने हमको इस दुनिया में भेजा उस समय उन्होंने हमको भी एक पत्र दिया है, जिसमें  लिखा है, "उदास मत होना, मैं हर पल, हर क्षण, हर जगह तुम्हारे साथ हूं। पूरी यात्रा तुम्हारे साथ करता हूँ। वह हमेशा हमारे साथ हैं।
अन्तिम श्वास तक।

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ४२)

सिद्ध न होने पर भी

सर ए.एस. एडिग्रन ने इसी तथ्य को यों प्रतिपादित किया है—‘‘भौतिक पदार्थों के भीतर एक चेतन शक्ति काम कर रही है जिसे अणु प्रक्रिया का प्राण कहा जा सकता है। हम उसका सही स्वरूप और क्रियाकलाप अभी नहीं जानते, पर यह अनुभव कर सकते हैं कि संसार में जो कुछ हो रहा है वह अनायास, आकस्मिक या अविचारपूर्ण नहीं है।

आधुनिक विज्ञान पदार्थ का अन्तिम विश्लेषण करने में भी अभी समर्थ नहीं हो सकता है। उदाहरण के लिए परमाणु का विखण्डन हो जाने के बाद पदार्थ का एक ऐसा सूक्ष्मतम रूप अस्तित्व में आया है जिसे वैज्ञानिक अभी तक पूरी तरह समझ नहीं पाये हैं। जैसे प्रकाश कोई वस्तु नहीं है। वस्तु अर्थ है जो स्थान घेरे, जिसमें कुछ भार हो और जिसका विभाजन किया जा सके। प्रकाश का न तो कोई भाव होता है, न वह स्थान घेरता है और न ही उसका विभाजन किया जा सकता है। पदार्थ का अन्तिम कण जो परमाणु से भी सूक्ष्म है ठीक प्रकाश की तरह है, परन्तु उसमें एक वैचित्र्य भी है कि वह तरंग होने के साथ-साथ स्थान भी घेरता है। वैज्ञानिकों ने परमाणु से भी सूक्ष्म इस स्वरूप को नाम दिया है—‘‘क्वाण्टा’’।

कहने का अर्थ यह है कि भौतिक विज्ञान अभी पदार्थ का विश्लेषण करने में भली-भांति समर्थ नहीं हो सका है फिर चेतना का विश्लेषण और प्रमाणीकरण करना तो बहुत दूर की बात है। शरीर संस्थान में चेतना का प्रधान कार्यक्षेत्र मस्तिष्क कहा जाता है। वहीं विचार उठते हैं, चिन्तन चलता है, भाव-सम्वेदनाओं की अनुभूति होती है। शरीर विज्ञान की अद्यतन शोध प्रगति भी मस्तिष्कीय केन्द्र का रहस्य समझ पाने में असमर्थ रही है। डा. मैकडूगल ने अपनी पुस्तक ‘‘फिजियौलाजिकल साइकोलाजी’’ में लिखा है—‘‘मस्तिष्क की संरचना को कितनी ही बारीकी से देखा समझा जाय यह उत्तर नहीं मिलता कि मानव प्राणी पाशविक स्तर से ऊंचा उठकर किस प्रकार ज्ञान विज्ञान की धारा में बहता रहता है और कैसे भावनाओं सम्वेदनाओं से ओत-प्रोत रहता है। भाव सम्वेदनाओं की गरिमा को समझाते हुए हमें यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि मनुष्य के भीतर कोई अमूर्त सत्ता भी विद्यमान है जिसे आत्मा अथवा भाव चेतना जैसा कोई नाम दिया जा सकता है।’’

जीवित और मृत्यु देह में मूलभूत रासायनिक तत्वों में कोई परिवर्तन होता है तो इतना भर कि उनकी गति, निरन्तर उनका होता रहने वाला रूपान्तरण विकास अवरुद्ध हो जाता है। इस अवरुद्ध क्रम को चालू करने के कितने ही प्रयास किये गये, परन्तु उनमें कोई सफलता नहीं मिल सकी। प्रयास अभी भी जारी हैं, परन्तु भिन्न ढंग के। अब यह सोचा जा रहा है कि मृत्यु के समय शरीर में विलुप्त हो जाने वाली चेतना को पुनः किसी प्रकार लौटाया जा सके तो पुनर्जीवन सम्भव है। इसी आधार पर ‘‘मिस्टिरियस यूनिवर्स’’ ग्रन्थ के रचयिता सरजेम्स जोन्स ने लिखा है विज्ञान जगत अब पदार्थ सत्ता का नियन्त्रण करने वाली चेतन सत्ता की ओर उन्मुख हो रहा है तथा यह खोजने में लगा है कि हर पदार्थ को गुण धर्म की रीति-नीति से नियन्त्रित करने वाली व्यापक चेतना का स्वरूप क्या है? पदार्थ को स्वसंचालिता इतनी अपूर्ण है कि उस आधार पर प्राणियों की चिन्तन क्षमता का कोई समाधान नहीं मिलता।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ६६
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग ४२)

अविनाशी चैतन्य के प्रति समर्पण है भक्ति
    
महर्षि शाण्डिल्य कहते हैं कि जब तुम्हारे सामने चुनाव का अवसर आये तो जड़ को मत चुनना। चुन लेना तुम चैतन्य को, क्योंकि वही तुम्हारा अविरोधी है। उससे अनुराग तुम्हें स्वाभाविक रूप से ही प्रकाशित कर देगा। यदि चुनाव इसके विपरीत हुआ तो चैतन्यता सुप्त हो जायेगी और प्रकाश लुप्त हो जायेगा।’’
    
‘‘इस प्रसंग में मुझे बड़ा ही मधुर कथाप्रसंग स्मरण हो रहा है।’’ परम भागवताचार्य शुकदेव के मधुर स्वर प्रस्फुटित हुए। मुनि शुकदेव कथा सुनाना चाहते हैं, यह सुनना ही सबके लिए सुखद था। सभी ने लगभग एक साथ उनसे कथा कहने का अनुरोध कर डाला। मुनि श्रेष्ठ शुकदेव ने हरि ॐ तत्सत् का मधुर उच्चारण करते हुए कहना शुरु किया-‘‘यह कथा विदर्भ देश के ब्राह्मण श्वेताक्ष की है। श्वेताक्ष वेद-शास्त्र आदि ज्ञान में पारंगत-यज्ञविद्या के परम आचार्य थे। उनकी शास्त्रनिष्ठा एवं ईश्वरनिष्ठा अपूर्व थी। उनकी विनयशीलता एवं मधुर वचनों की सभी सराहना करते थे। उनका प्रत्येक आचरण शुद्ध एवं निष्कपट था। निष्काम कर्मयोग की वे जीवन्त मूर्ति थे। गुरुकुलों में उनका दृष्टान्त दिया जाता था कि आचार्य हो तो श्वेताक्ष की भाँति। आरण्यकों के तपस्वी उनमें तपोनिष्ठा का प्रमाण पाते थे।
    
इसे दुर्देव कहें या दुर्भाग्य अथवा फिर काल का कोप, आचार्य श्वेताक्ष की युवा पत्नी अपने नवजात शिशु को छोड़कर परलोक सिधार गयी। श्वेताक्ष ने बड़ी प्रसन्नतापूर्वक उसके सभी अंतिम संस्कार पूर्ण किये और आनन्द पूर्वक अपने शिशु का पालन-पोषण करते हुए अपने नित्य, नैमित्तिक कर्त्तव्यों में लग गये। यह महाघात उन्हें तनिक भी विचलित न कर सका। उनके मुख की ्रसन्नता व कान्ति यथावत बनी रही। परन्तु क्रूर काल का कोप अभी थमा नहीं था। उनकी सम्पत्ति-समृद्धि का क्षय होने लगा। कुछ ही समय में ब्राह्मण श्रेष्ठ श्वेताक्ष कंगाल हो गये। उन्हें रोज का भोजन मिलना भी कठिन हो गया। लेकिन अभी भी उनके जीवन में विपत्तियों के विषादी स्वर थमे न थे।
    
एक दिन अनायास ही उनकी इकलौती संतान नागदंश से मृत्यु को प्राप्त हो गयी। रोग भी उन्हें घेरने लगे। परन्तु इन दारुण यातनाओं में भी वे अविचलित थे। दुःख के अनगिनत कारणों एवं घटनाक्रमों के बीच भी वे प्रसन्न थे।’’ ब्राह्मण श्वेताक्ष के इस कथा के करुण प्रसंग को सुनाते हुए शुकदेव ने कहा- ‘‘हे महर्षि गण! इन दिनों उन महाभाग से हमारी भेंट हुई। उनके बारे में मुझे बहुत कुछ सुनने को मिल चुका था। उन्हें प्रत्यक्ष देखकर उनकी प्रसन्नता, शान्ति एवं उनकी कान्ति देखकर मैंने मन ही मन उन्हें प्रणाम किया।
    
ब्राह्मणश्रेष्ठ श्वेताक्ष ने बड़े ही प्रसन्न मन से मेरा स्वागत किया। उनसे ईश्वर चर्चा करते हुए-वार्तालाप के प्रसंग में मैंने उनसे पूछा-हे विप्र! आप इन विपन्नताओं-विषमताओं के बीच किस तरह प्रसन्न रहते हैं। अपने उत्तर में वह पहले तो मुस्कराये, फिर कहने लगे-हे महामुनि! इस सबका रहस्य मेरी प्रभु भक्ति में है। मैं अपने आराध्य से-उन सर्वेश्वर से इतना प्रगाढ़ प्रेम करता हूँ कि किसी तरह की घटनाएँ मुझे विचलित कर ही नहीं पातीं।
    
इस प्रभु प्रेम ने ही मुझे इस सत्य का बोध कराया है कि परम चेतना की चैतन्यता ही एक मात्र सत्य एवं अविनाशी है। जड़ता सदैव ही नाशवान है। फिर वह कोई पदार्थ हो या लौकिक सम्बन्ध अथवा फिर यह नाशवान देह। जीवन में विपत्तियाँ एवं विषमताएँ कितनी भी और कैसी भी आएँ, पर वे नष्ट उन्हीं को कर पाती हैं जिनका कि स्वाभाविक नाश होना ही है। जो अविनाशी है उसे कोई भी व्यक्ति, वस्तु या घटना नहीं नष्ट करती। उन अविनाशी प्रभु की भक्ति ने मुझे इस जीवन सत्य का बोध दिया है। यही वजह है कि ज्यों-ज्यों विपत्तियाँ बढ़ती गयीं, त्यों-त्यों मेरी भक्ति भी प्रगाढ़ होती गयी।’’ मुनीश्वर शुकदेव द्वारा कहे गये इस कथाप्रसंग को सुनकर सभी भावाश्रुओं में डूब गये। सभी को बस इतना ही अनुभव हो सका कि सचमुच यही है भक्ति।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ७९

शुक्रवार, 16 जुलाई 2021

👉 यात्रा बहुत छोटी है

एक बुजुर्ग महिला बस में यात्रा कर रही थी। अगले पड़ाव पर, एक मजबूत, क्रोधी युवती चढ़ गई और बूढ़ी औरत के बगल में बैठ गई। उस क्रोधी युवती ने अपने  बैग से कई  बुजुर्ग महिला को चोट पहुंचाई।

जब उसने देखा कि बुजुर्ग महिला चुप है, तो आखिरकार युवती ने उससे पूछा कि जब उसने उसे अपने बैग से मारा तो उसने शिकायत क्यों नहीं की?

बुज़ुर्ग महिला ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया: "असभ्य होने की या इतनी तुच्छ बात पर चर्चा करने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि आपके बगल में मेरी यात्रा बहुत छोटी है, क्योंकि मैं अगले पड़ाव पर उतरने जा रही हूं।"

यह उत्तर सोने के अक्षरों में लिखे जाने के योग्य है: "इतनी तुच्छ बात पर चर्चा करने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि हमारी यात्रा एक साथ बहुत छोटी है।"

हम में से प्रत्येक को यह समझना चाहिए कि इस दुनिया में हमारा समय इतना कम है कि इसे बेकार तर्कों, ईर्ष्या, दूसरों को क्षमा न करने, असंतोष और बुरे व्यवहार के साथ जाया करना मतलब समय और ऊर्जा की एक हास्यास्पद बर्बादी है।

क्या किसी ने आपका दिल तोड़ा? शांत रहें।
यात्रा बहुत छोटी है।

क्या किसी ने आपको धोखा दिया, धमकाया, धोखा दिया या अपमानित किया? आराम करें - तनावग्रस्त न हों
यात्रा बहुत छोटी है।

क्या किसी ने बिना वजह आपका अपमान किया?  शांत रहें। इसे नजरअंदाज करो।
यात्रा बहुत छोटी है।

क्या किसी पड़ोसी ने ऐसी टिप्पणी की जो आपको पसंद नहीं आई?  शांत रहें।  उसकी ओर ध्यान मत दो। इसे माफ कर दो।
यात्रा बहुत छोटी है।

किसी ने हमें जो भी समस्या दी है, याद रखें कि हमारी यात्रा एक साथ बहुत छोटी है।

हमारी यात्रा की लंबाई कोई नहीं जानता। कोई नहीं जानता कि यह अपने पड़ाव पर कब पहुंचेगा।
हमारी एक साथ यात्रा बहुत छोटी है।

आइए हम दोस्तों और परिवार की सराहना करें।
आइए हम आदरणीय, दयालु और क्षमाशील बनें।

आखिरकार हम कृतज्ञता और आनंद से भर जाएंगे।

अपनी मुस्कान सबके साथ बाँटिये....

क्योंकि हमारी यात्रा बहुत छोटी है!

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ४१)

सिद्ध न होने पर भी

नास्तिक दर्शन की मूल मान्यता भी यही है कि ईश्वर सिद्ध नहीं किया जा सकता और जो सिद्ध नहीं होता उसका अस्तित्व कैसे हो सकता है यह मान्यता अपने आप में एकांगी और अधूरी है। मान्यता विज्ञान से सिद्ध नहीं होती उसका अस्तित्व ही नहीं है—यह अब से सौ वर्ष पूर्व तक तो अपने स्थान पर सही थी क्योंकि तब विज्ञान अपने शैशव में था। परन्तु जब विज्ञान ने अविज्ञात के क्षेत्र में प्रवेश किया और एक से एक रहस्य सामने आते गये तो यह माना जाने लगा कि ऐसी बहुत-सी वस्तुओं का, सत्ताओं का अस्तित्व है जो अभी विज्ञान द्वारा सिद्ध नहीं हो सका है अथवा जिन तक विज्ञान नहीं पहुंच सका है।

कुछ दशाब्दियों से पूर्व तक यह माना जाता था कि पदार्थ का सबसे सूक्ष्म कण अणु है और वह अविभाज्य है। पदार्थ के सूक्ष्मतम विभाजन के बाद अवशिष्ट स्वरूप को अणु कहा गया और माना जाने लगा कि यही अन्तिम है। परन्तु इसके कुछ वर्षों बाद ही वैज्ञानिकों को अणु से भी सूक्ष्म कण परमाणु का पता चला। परमाणु को अविभाज्य समझा जाने लगा। लेकिन परमाणु का विखण्डन भी सम्भव हो गया। पदार्थ के इस सूक्ष्मातिसूक्ष्म स्वरूप के विखण्डन से बहुत बड़ी ऊर्जा का विस्फोट दिखाई दिया, जिसके ध्वंस या सृजन में चाहे जिस प्रयोजन के लिए उपयोग सम्भव दिखाई देने लगा।

परन्तु अब भी यह नहीं मान लिया गया है कि परमाणु ही अन्तिम सत्य है। यह समझा जा रहा है कि परमाणु से भी सूक्ष्म पदार्थ का कोई अस्तित्व हो सकता है। इसी आधार पर प्रो. रिचर्ड ने अपनी पुस्तक ‘‘थर्टीईयर आफ साइकिक रिसर्च’’ में लिखा है—पचास वर्ष पूर्व यह माना जाता था कि जो बात भौतिक विज्ञान से सिद्ध न हो उसका अस्तित्व ही नहीं है। किन्तु भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में ही अब ऐसे प्रमाण मिलते हैं कि वह अभी भौतिक वस्तुओं को ही ठीक से समझ नहीं पाया है। फिर उसे सत्ता के अस्तित्व को इस आधार पर कैसे चुनौती दी जा सकती है जिसे भौतिक विज्ञान की पहुंच के बाहर कहा जाता है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ६५
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग ४१)

अविनाशी चैतन्य के प्रति समर्पण है भक्ति

परम भागवत शुकदेव की वाणी का रस देवर्षि की वीणा की झंकृति में घुलकर सभी के अंतस् में गहरे उतर गया। स्थिति कुछ ऐसी बनी कि भगवद्भक्तों की कौन कहे, परमज्ञानी एवं महाविरागी भी भावमय हो उठे। तत्त्वविचारकों के अंतःकरण में भी भक्ति की सरिता उफनने लगी। देर तक भावसमाधि का अपूर्व वातावरण बना रहा। इस वातावरण की पवित्रता एवं दिव्यता में कोई व्याघात न करने पाये-इसके लिए हिमवान के महाशिखर शुभ्र-धवल परिधान पहने प्रहरियों की भाँति सन्नद्ध खड़े थे। वायु भी निस्पन्द हो चली थी। हिम पक्षियों का कलरव थम चला था। इस निस्पन्द एवं अविचल शान्ति की स्थिति में भी एक अपूर्व भक्ति चैतन्य प्रवाहित हो रहा था।
    
न जाने यह कालातीत, तुरीय स्थिति कब तक रही। हाँ! इतना अवश्य है कि उस वातावरण में गायत्री महामंत्र के द्रष्टा ब्रह्मर्षि विश्वामित्र का स्वर सबसे पहले मुखरित हुआ। उन्होंने ही उदीयमान सूर्य के महाभर्ग को धारण करते हुए कहा-‘‘ऐसी अनुभूति हो रही है जैसी कि भक्त को चैतन्य का चिंतन करते हुए होती है तब वह स्वयं ही तद्रूप हो जाता है। जब तक विवेक नहीं जागता, तब तक जड़ता से मोह नहीं छूटता, तब तक किसी भी तरह भौतिकवादी-पदार्थवादी दृष्टि का परिष्कार नहीं होता। इसके बिना न तो आध्यात्मिक सोच बन पड़ती है और न ही परमात्म तत्त्व के प्रति समर्पण एवं प्रेम प्रस्फुटित होता है।’’
    
ब्रह्मर्षि विश्वामित्र का कथन उनकी चिंतन चेतना की कुछ ऐसी गहराई से प्रकट हुआ था कि सभी की सहमति एक साथ मुखर हो उठी। यहाँ तक कि हिमपक्षियों ने भी चहकते हुए अपनी सम्मति जतायी। महर्षि पुलह, क्रतु, वशिष्ठ आदि विशिष्ट जनों ने इस सत्य का समर्थन करते हुए कहा कि ‘‘दरअसल मनुष्य की समस्या ही यही है कि वह जड़ता से अतिशय मोहग्रस्त होकर स्वयं जड़ हो चला है। अब तो दशा यह बनी है कि वह चेतना के समाधान भी जड़ पदार्थों में ढूँढ़ता और खोजता है। इसी वजह से उसकी स्व-चेतना लुप्त और सुप्त हो चली है। यदि स्थिति से उबरना है तो उसे पुनः सभी जड़ पदार्थों व पाशों की व्यूहरचना से निकलकर पुनः चेतना के चैतन्य की ओर उन्मुख होना होगा। यही प्रक्रिया उसमें फिर से परम चेतना का प्रकाश उड़ेल सकती है।’’
    
महर्षि जनों के इस सम्पूर्ण वार्तालाप को देवर्षि बड़े ही धैर्य एवं स्थिरता से सुन रहे थे। उनकी दिव्य वीणा भी इस समय मौन थी। जबकि सबकी  अभिलाषा यही थी कि वह इस समय कुछ कहें, अपने नये सूत्र का मंत्रोच्चार करें। पर उन्हें इस तरह मौन देखकर ऋषियों में श्रेष्ठ क्रतु ने कहा-‘‘हे ब्रह्मपुत्र! इस समय आप मौन क्यों हैं? आपकी वाणी एवं वीणा ही आज के सत्र का प्रारम्भ करेगी।’’ उत्तर में देवर्षि के होंठों पर हल्का सा स्मित झलका। कुछ पलों के बाद उन्होंने कहा-‘‘मैं आप सबके विचारों पर चिंतन करते हुए सोच रहा था कि अरे! यही तो महर्षि शाण्डिल्य के मत में भक्ति है। ऐसा कहते हुए उन्होंने बड़े मधुर स्वरों में उच्चारित किया-
‘आत्मरत्यविरोधेनेति शाण्डिल्यः’॥ १८॥
अद्भुत और अभूतपूर्व है महर्षि शाण्डिल्य का मत। वे कहते हैं- ‘भक्ति है आत्मरति के अविरोधी विषय में अनुराग।’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ७८

मंगलवार, 13 जुलाई 2021

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ४०)

सृष्टि जगत का अधिष्ठाता

नियामक विधान किसी मस्तिष्कीय सत्ता का अस्तित्व में होना प्रमाणित करता है। हमारे जीवन का आधार सूर्य है। वह 10 करोड़ 30 लाख मील की दूरी से अपनी प्रकाश किरणें भेजता है जो 8 मिनट में पृथ्वी तक पहुंचती हैं। दिन भर में यहां के वातावरण में इतनी सुविधाएं एकत्र हो जाती हैं कि रात आसानी से कट जाती है। दिन रात के इस क्रम में एक दिन भी अन्तर पड़ जायें तो जीवन संकट में पड़ जायें। सूर्य के लिए पृथ्वी समुद्र में बूंद का-सा नगण्य अस्तित्व रखती है फिर, उसकी तुलना में रूप के साईबेरिया प्राप्त में एक गड़रिये के घर में जी रही एक चींटी का क्या अस्तित्व हो सकता है, पर वह भी मजे में अपने दिन काट लेती है।

सूर्य अनन्त अन्तरिक्ष का एक नन्हा तारा है ‘रीडर्स डाइजेस्ट’ ने एक एटलस छापा है उसमें सौर-मण्डल के लिए एक बिन्दु मात्र रखा है और तीर का निशान लगा कर दूर जाकर लिखा है—‘‘हमारा सौर-मण्डल यहां नहीं है’’ यह ऐसा ही हुआ कि कोई मेरी आंख का आंसू समुद्र में गिर गया। सूर्य से तो बड़ा ‘‘रीजल’’ तारा ही है जो उससे 15 हजार गुना बड़ा है। ‘‘अन्टेयर्स’’ सूर्य जैसे 3 करोड़ 60 लाख गोलों को अपने भीतर आसानी से सुला सकता है। जून 1967 के ‘‘साइन्स टुडे’’ में ‘‘ग्राहम बेरी’’ ने लिखा है। पृथ्वी से छोटे ग्रह भी ब्रह्माण्ड में हैं और 5 खरब मील की परिधि वाले भीमकाय नक्षत्र भी। किन्तु यह सभी विराट् ब्रह्माण्ड में निर्द्वन्द विचरण कर रहे हैं यदि कहीं कोई व्यवस्था न होती तो यह तारे आपस में ही टकरा कर नष्ट-भ्रष्ट हो गये होते।

सूर्य अपने केन्द्र में 1 करोड़ साठ लाख डिग्री से.ग्रे. गर्म है, यदि पृथ्वी के ऊपर अयन मण्डल (आइनोस्फियर) की पट्टियां न चढ़ाई गई होती तो पृथ्वी न जाने कब जलकर राख हो गई होती। सूरज अपने स्थान से थोड़ा सा खिसक जाये तो ध्रुव प्रदेशों की बर्फ पिघल कर सारी पृथ्वी को डुबो दे यही नहीं उस गर्मी से कड़ाह, में पकने वाली पूड़ियों की तरह सारा प्राणि जगत ही पक कर नष्ट हो जाये। थोड़ा ऊपर हट जाने पर समुद्र तो क्या धरती की मिट्टी तक बर्फ बनकर जम सकती है। यह तथ्य बताते हैं ग्रहों की स्थिति और व्यवस्था अत्यन्त बुद्धिमत्ता पूर्वक की गई है। यह परमात्मा के अतिरिक्त और कौन चित्रकार हो सकता है।

इतने पर भी कुछ लोग हैं जो यह कहते नहीं थकते कि ईश्वरीय सत्ता का कोई प्रमाण कोई अस्तित्व नहीं है। मार्क्स ने किसी पुस्तक में यह लिखा है कि—‘यदि तुम्हारा ईश्वर प्रयोगशाला की किसी परखनली में सिद्ध किया जा सके तो मैं मान लूंगा कि वस्तुतः ईश्वर का अस्तित्व है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ६४
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग ४०)

हरिकथा का श्रवण भी है भक्ति का ही रूप
    
वह कहने लगे कि ‘‘आप सभी अवगत हैं मेरे जीवन के एक दुर्लभ कथाप्रसंग से और वह है- मेरा कथावाचन और महाराज परीक्षित का कथाश्रवण। इस सम्पूर्ण घटनाक्रम में मेरा कथावाचन जितना अनमोल रहा, उससे कहीं अधिक अनमोल था-महाराज परीक्षित का कथाश्रवण। भावशुद्धि हो, हृदय में प्रभु मिलन की उत्कट अभिलाषा हो, भक्ति के अलावा किसी अन्य तत्त्व की कामना न बची हो तो कथा चमत्कार किये बिना नहीं रहती। श्रोता एवं वक्ता दोनों ही साथ-साथ सरिता में स्नान करें तो भक्ति एवं भगवान दोनों ही प्रकट हुए बिना नहीं रहते।’’
    
इतना कहकर शुकदेव किञ्चित ठहरे, उनके मुख के भावों में थोड़ा परिवर्तन हुआ और वह कहने लगे कि ‘‘यदि भगवान की कथा का वक्ता यश का आकांक्षी है, वह प्रभुनाम का प्रचार न करके स्वयं के नाम का प्रचार करने में लगा है तो फिर ऐसी कथाओं में भक्ति प्रकट नहीं होती। यदि भगवान की कथा का वाचन करने वाला धन के लोभी हैं और उनकी दृष्टि कथा से होने वाली आय में लगी रहती है तो फिर ऐसी कथाओं में जाना भगवान एवं भक्ति का अपमान है। यदि कथावाचक धन को कमाने के लिए काले-सफेद धन के कुटिल षड्यंत्र करने लगे तो फिर उसके अशुद्ध व्यक्तित्व से शुद्ध भक्ति कभी भी नहीं प्रवाहित हो सकती।’’
    
अपनी इन बातों को कहते हुए परम वीतराग महामुनि शुकदेव का कण्ठ रुद्ध हो आया। उनकी आँखें छलक पड़ीं। वे जैसे-तैसे भर्राये गले से बोले-‘‘कलिमलनाशिनी भगवान की कथा को भी इन कलियुग के दूत कथावाचकों ने मलिन कर दिया है। अरे! कथावाचक का जीवन तो तप एवं भक्ति का साकार विग्रह होना चाहिए। तप की अंतर्भूमि में ही भक्ति का पौधा पनपता है।’’ मुनि शुकदेव के इन वचनों में छिपी पीड़ा ने सभी को उद्वेलित किया। महर्षि वशिष्ठ की आँखें भीग गयीं, जबकि परम तेजस्वी विश्वामित्र की आँखें दहकने लगीं।
    
लेकिन शुकदेव तो अपने भावों में डूबे थे, वे कहे जा रहे थे-‘‘कथा कहने  वालों के साथ कथा सुनने वालों की भी महिमा है। ऐसा नहीं है कि आज किसी की कथा सुनने में रुचि नहीं। अरे कथा के लिए रुचि तो भारी है, परन्तु भगवान की कथा के प्रति अनुराग नहीं है। ईर्ष्या, निन्दा, चुगली, कलंक, लाँछन की कथाएँ कहने-सुनने के लिए सभी आतुर हैं। किसी के कलंक-लाँछन या अपमान की कथा हो तो कहने-सुनने के लिए बिना बुलाये पूरा गाँव सिमट आता है। इसके लिए न तो किसी को संदेशा भेजना पड़ता है और न कहलवाने की आवश्यकता पड़ती है। जबकि कथा भगवान की हो तो लोग बुलाने पर भी नहीं जाते हैं। यदि किसी तरह चले भी गये तो वहाँ भी भगवत कथा की अनदेखी करके अपनी कुटिल चर्चाएँ करते रहते हैं। ऐसों के जीवन में भला भक्ति का संचार कैसे होगा?’’
    
फिर शुकदेव ने कुछ क्षणों तक शून्य की ओर निहारा और फिर अपने अतीत की स्मृतियों को कुरेदा। उनके मानस पटल पर महाराज परीक्षित का मुख-मण्डल दमक उठा। वह बोले-‘‘यह सच है कि महाराज परीक्षित से ऋषि शमीक के प्रति प्रमाद हुआ था, परन्तु उनकी भावनाएँ शुद्ध थीं, उन्होंने अपने अपराध की अनुभूति भी कर ली थी और उसके प्रायश्चित के लिए तत्पर भी हुए थे। यह काल का कुयोग ही था कि ऋषिपुत्र ने उन्हें सर्पदंश का शाप दे डाला परन्तु महाराज परीक्षित अपनी मृत्यु को अवश्यम्भावी जानकर भी भयग्रस्त नहीं हुए थे, बल्कि उन्होंने तो मृत्यु को मोक्ष में परिवर्तित करने का निश्चय कर लिया था। यही है कथा सुनने वाले की सार्थक योग्यता। भला कौन नहीं जानता कि उसकी मृत्यु निश्चित है, फिर भी उपाय मोक्ष के नहीं, भोग के किये जाते हैं। कथाएँ भक्ति की नहीं, आसक्ति की कही-सुनी जाती है। और स्थितियों की तो जाने भी दें, उनकी कहें जो मृत्युशैय्या पर पड़े हैं, जिन्हें अपनी अगली साँस का भी भरोसा नहीं है, वे भी अपने नाती-पोतियों के लिए सुनहरे संसार के सपने देखते हैं। कल्पनाएँ रचते हैं-व्यूह बनाते हैं कि किस तरह उनकी सम्पदा युगों तक सुरक्षित रहेगी। ऐसे लोगों ने यदि मृत्यु समय प्रभु नाम लिया भी तो क्या, और न लिया तो क्या?
    
कथाश्रवण तो महाराज परीक्षित ने किया था। उनका सारा अस्तित्त्व भागवत एवं भगवान में विलीन हो गया था। हर दिन उनकी चेतना ऊर्ध्वगमन का एक सोपान चढ़ती थी। सातवें दिन तो वह ब्राह्मीस्थिति में पहुँच गये थे। राग-द्वेष, मोह-आसक्ति आदि सभी बन्धनों से मुक्त। भक्ति से आवेष्टित एवं अलंकृत थी उनकी चिंतन चेतना। उन्होंने कथा श्रवण का मर्म जाना था और मैं भी उन्हें कथा सुनाकर कृतकार्य हुआ था। ऐसी है भगवान की कथा महर्षि गर्ग जिसे भक्ति का पर्याय कहते हैं।’’ शुकदेव की इस भाववाणी ने सभी को  आत्मचिंतन में निमग्न कर दिया। इसी में अगले भक्ति सूत्र को प्रकट होना था।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ७५

शनिवार, 10 जुलाई 2021

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ३९)

सृष्टि जगत का अधिष्ठाता

यह छोटे-छोटे उपादान बिना कर्त्ता के अभिव्यक्ति नहीं पा सके होते तो इतना सुन्दर संसार जिसमें प्रातःकाल सूरज उगता और प्रकाश व गर्मी देता है। रात थकों को अपना अंचल में विश्राम देती, तारे पथ-प्रदर्शन करते, ऋतुएं समय पर आतीं और चली जाती है। हर प्राणी के लिए अनुकूल आहार, जल-वायु की व्यवस्था, प्रकृति का सुव्यवस्थित स्वच्छता अभियान सब कुछ व्यवस्थित ढंग से चल रहा है। करोड़ों की संख्या में तारागण किसी व्यवस्था के अभाव में अब तक न जाने कब के लड़ मरे होते। यदि इन सब में गणित कार्य न कर रहा होता तो अमुक दिन, अमुक समय सूर्य-ग्रहण-चन्द्र ग्रहण, मकर संक्रान्ति आदि का ज्ञान किस तरह हो पाता। यह प्राप्तोद्देश्य कर्म और सुन्दरतम रचना बिना किसी ऐसे कलाकार के सम्भव नहीं हो सकती थी जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को एकरस देखता हो, सुनता हो, साधन जुटाता हो, नियम व्यवस्थाएं बनाता हो, न्याय करता हो जीवन मात्र का पोषण संरक्षण करता हो।

नियामक के बिना नियम व्यवस्था, प्रशासक के बिना प्रशासन चल तो सकते हैं, पर कुछ समय से अधिक नहीं जब कि पृथ्वी को ही अस्तित्व में आये करोड़ों वर्ष बीत चुके। परिवार के वयोवृद्ध के हाथ सारी गृहस्थी का नियन्त्रण होता है। गांव का एक मुखिया होता है तो कई गांवों के समूह की बनी तहसील का स्वामी तहसीलदार, जिले का मालिक कलक्टर, राज्य का गवर्नर और राष्ट्र का राष्ट्रपति। मिलों तक के लिए मैनेजर कम्पनियों के डाइरेक्टर न हों तो उनकी ही व्यवस्था ठप्प पड़ जाती है और उनका अस्तित्व डावांडोल हो जाता है फिर इतनी बड़ी और व्यवस्थित सृष्टि का प्रशासक, स्वामी और मुखिया न होता तो संसार न जाने कब का विनष्ट हो चुका होता। जड़ में शक्ति हो सकती है व्यवस्था नहीं। नियम सचेतन सत्ता ही बना सकती है, सो इन तथ्यों के प्रकाश में परमात्मा का विरद् चरितार्थ हुए बिना नहीं रहता।

एक अखबार में एक लेख छपा था—‘‘वैज्ञानिक भगवान में विश्वास क्यों करते हैं? इस लेख में विद्वान् लेखक ने बताया है कि संसार का हर परमाणु एक निर्धारित नियम पर काम करता है, यदि इसमें रत्ती भर भी अव्यवस्था और अनुशासन हीनता आ जाये तो विराट ब्रह्माण्ड एक क्षण को भी नहीं टिक पाता। एक क्षण के विस्फोट से अनन्त प्रकृति में आग लग जाती और संसार अग्नि ज्वालाओं के अतिरिक्त कुछ न होता।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ६३
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग ३९)

हरिकथा का श्रवण भी है भक्ति का ही रूप

भावनाएँ अंतर्लीन-भगवन्लीन थीं, भक्तिरस से भीगे हृदय निस्तब्ध बने रहे। जिसने कहा और जिन्होंने सुना, सभी गहन भावसमाधि में खोये थे। तभी अचानक सभी ने अपने अन्तराकाश में एक साथ दिव्य स्पन्दनों की अनुभूति पायी। बड़े ही अनोखे एवं मधुर थे ये स्पन्दन। हिमवान के आँगन में उपस्थित सभी देवों, ऋषियों, सिद्धों-संतों के अस्तित्व में रोमांच हो आया। इस रोमांच के अतिरेक में सभी की अंतश्चेतना के बहिर्द्वार खुल गये। सभी ने निहारा, बाहर की झाँकी कम सुमनोहर न थी। हिमवान के महाशैलशिखर सजग प्रहरियों की भाँति अडिग थे। वातावरण में हिम पक्षियों की कलरव ध्वनि मंत्रगान की तरह गूँज रही थी। एक दिव्य सुवास वहाँ अनायास ही बिखर रही थी। सभी वहाँ एक अलौकिक अवतरण का संकेत पा रहे थे।
    
कुछ ही क्षणों में इस दिव्यता का सघन स्वरूप सबके नेत्रों में उद्भासित हो आया। सबने देखा कि महामुनि शुकदेव ज्योतिर्मय साकार भक्तितत्त्व बनकर प्रकट हुए हैं। श्रीमद्भागवत कथा के प्रवक्ता शुकदेव। महर्षि वेदव्यास के वीतराग पुत्र शुकदेव। भक्ति के सघन-साकार विग्रह शुकदेव। उनकी इस उपस्थिति में सभी ने अपनी आध्यात्मिक चेतना में नवांकुरण अनुभव किया। शुकदेव ने भी सप्तर्षियों सहित सभी ऋषियों, सिद्धों, देवों की अभ्यर्थना की। इन सभी ने भी इनकी उपस्थिति से स्वयं को कृतार्थ माना, क्योंकि सभी इस सत्य से अवगत थे कि शुकदेव भक्ति की दुर्लभ विभूति हैं। जो इनके पास है वह अन्य कहीं नहीं है।
    
इस नयी उपस्थिति के साथ सभी को भक्ति के नवीन सूत्र की जिज्ञासा भी हो आयी। महर्षि मरीचि एवं मेघातिथि ने लगभग एक साथ ही देवर्षि की ओर देखा। हालाँकि देवर्षि स्वयं अभी तक शुकदेव की ओर देख रहे थे। उनकी यह एकटक एकाग्रता इन महर्षियों की दृष्टि से विच्छिन्न हुई। उन्हें आत्मचेत हो आया और उन्होंने ऋषि समुदाय की ओर निहारा। उन्हें इस तरह निहारते देख महर्षियों में श्रेष्ठ पुलह ने कहा-‘‘भक्ति के नवीन सूत्र को प्रकट करें देवर्षि!’’ ‘‘हे महर्षि आपका आदेश शिरोधार्य है। अब मैं भक्ति के विषय में ऋषि गर्ग के मत को प्रकट करता हूँ। यही मेरा अगला सूत्र है-
‘कथादिष्वति गर्गः’॥ १७॥
गर्गाचार्य के मत से भगवान की कथा में अनुराग भक्ति है।
    
जो भगवान की कथा सुनता है, अहोभाव से सुनता है, विभोर होकर सुनता है, अपने को मिटाकर सुनता है, वह स्वाभाविक भक्ति के तत्त्व को अनुभव कर पाता है।’’
    
इस सूत्र को कहने के साथ देवर्षि नारद ने फिर से एक बार परम वीतरागी मुनि शुकदेव को देखा और ऋषियों को सम्बोधित करते हुए कहा-‘‘श्रेष्ठ यही होगा कि इस सूत्र की व्याख्या भागवत कथा के परम आचार्य शुकदेव करें।’’ सभी ने देवर्षि के इस कथन को स्वीकारा और शुकदेव के पवित्र आभा से प्रदीप्त मुख की ओर देखा। शुकदेव के होंठों पर बड़ी ही सुख प्रदायी स्मित रेखा झलकी और वे बोले- ‘‘आपका आदेश मुझे शिरोधार्य है।’’

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ७४

शुक्रवार, 9 जुलाई 2021

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ३८)

सृष्टि जगत का अधिष्ठाता

इस सम्बन्ध में कई लोगों को संदेह होता है कि ईश्वर है भी अथवा नहीं, सामान्य दृष्टि से विचार करने पर भी ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करने वाले अनेकों प्रमाण मिल जाते हैं। कोई यह सिद्ध करने के लिये पूर्वाग्रह ग्रस्त होकर ही चले कि ईश्वर नहीं है तो बात अलग है। अन्यथा ईश्वर का अस्तित्व उदित और चमकते सूरज से भी अधिक प्रत्यक्ष है। उदाहरण के लिये प्रत्येक कर्म का कोई अधिष्ठाता, प्रत्येक रचना का कोई कलाकार अवश्य होता है। आगरे का ताजमहल संसार के सर्व प्रसिद्ध सात आश्चर्यों में से एक है। उसके निर्माण में प्रतिदिन 20 हजार मजदूर काम करते थे, इतिहासकारों के अनुमान के अनुसार उसका निर्माण 6 करो रुपये में हुआ। उसके निर्माण में साढ़े अट्ठारह वर्ष लगे। उसमें राजस्थान से आया संगमरमर, तिब्बत की नीलम मणि, सिंहल की सिपास्लाजुली मणि, पंजाब के हीरे, बगदाद के पुखराज रत्न लगे हैं। इतनी सारी व्यवस्था और साधन सामग्री जुटाने में एक व्यक्ति की बुद्धि काम कर रही थी वह था शाहजहां। ताजमहल की रचना के साथ शाहजहां चिरकाल अमर है।

कोरिया का मेलोलियम संसार का दूसरा आश्चर्य। 62 हाथ लम्बी उतनी ही चौड़ी चहारदीवारी के मध्य 40-40 हाथ ऊंचे 36 स्तम्भ जो नीचे मोटे पर ऊपर क्रमशः पतले होते गये हैं। सीढ़ियों पर नीचे से ऊपर तक संगमरमर की बहुमूल्य मूर्तियों की सजावट। प्रसिद्ध कलाकार पाइथिस और माटीराम द्वारा विनिर्मित इस समाधि मन्दिर का निर्माण केवल एक व्यक्ति की इच्छित रचना है वह थीं वहां की महारानी ‘आर्टीमिसिया’।

20 लाख रुपये की लागत से बनी 25 फुट ऊंची ओलम्पिया की जुपिटर प्रतिमा एथेन के सम्राट पैराक्लीज की हार्दिक इच्छा का अभिव्यक्त रूप है। इफिसास का डायना मन्दिर चांदफिन की कल्पना  का साकार है तो अजन्ता की 29 गुफाओं में 5 मन्दिरों और 24 बौद्ध बिहारों में प्रवर सेन युग के आचार्य सुनन्द का नाम अंकित है। सिकन्दरिया का प्रकाश स्तम्भ सिकन्दर के संकल्प का मूर्तिमान है। 263 हाथ के घेरे में 22 फुट ऊंचे ठोस घेरे में खड़ा किया गया बैबिलोन का लटकता हुआ बाग (हैंगिंग गार्डन) साम्राज्ञी ने बनवाया। रोम का कोलोसियस, पीसा की मीनार, रोडस की पीतल की मूर्ति, मिस्र के पिरामिड चार्टेज गिरजाघर डेविड, मोजेट, सिस्टाइन चैपिल पियेंटा की प्रतिमाएं, एफिल टावर (पेरिस) ह्वाइट हाउस अमेरिका, लाल किला दिल्ली आदि जितनी भी सर्वश्रेष्ठ रचनाएं हैं, उनके रचनाकार आला मस्तिष्क और भाव सम्पन्न आत्माएं रही हैं किसी भी सांसारिक निर्माण को स्वनिर्मित नहीं कहा जा सकता इसी से रचना के साथ रचनाकार का नाम अविच्छिन्न रूप से चलता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ६१
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग ३८)

भगवान में अनुराग का नाम है भक्ति
    
उसका बालमन एक दिन भगवान की मूर्ति को नजदीक से देखने के लिए मचल पड़ा और उसने अपने पिता को अपनी यह इच्छा कह सुनायी। पुत्र कीयह बात सुनकर पिता तो सहम ही गये, क्योंकि उस युग की प्रथा-परम्परा के मुताबिक चण्डाल भला किस तरह मंदिर में प्रवेश पा सकता था। पिता ने पुत्र को समझाने की भरपूर कोशिश की पर पुत्र का बालमन नहीं माना। उसे तो भगवान को नजदीक से देखने की जिद थी। उसके मन में ललक थी- हुलस थी प्रभु के श्रीविग्रह की पूजा करने की। अपनी जिद में उसने खाना-पीना छोड़ दिया। हारकर पिता ने गाँव से दूर वनप्रान्त में रहने वाले एक तपस्वी संत को अपनी समस्या बतायी। उन्होंने सुगना को बेधक दृष्टि से देखा और उसके पिता से बोले-जिसके हृदय में भगवान की इतनी प्रगाढ़ भक्ति हो, वह तो हजारों-हजार ब्राह्मणों से भी श्रेष्ठ और पवित्र है।
    
फिर उन्होंने सुगना से कहा-पुत्र! तुम तो भगवान को पुकारो-वे अवश्य आयेंगे। पर मेरे पास तो उनकी मूर्ति नहीं है, लगभग रोते हुए उस चण्डाल पुत्र ने कहा। वह तुम गढ़ लो- या फिर किसी भी मिट्टी-पत्थर के टुकड़े को मूर्ति मानकर उनका आह्वान करो। तुम्हारी पुकार पर वे अवश्य आयेंगे। उन तपस्वी संत की बात में कुछ ऐसा जादुई असर था कि बालक सुगना प्रसन्न हो गया और उसने जंगल के एकांत में वृक्षों के झुरमुट के पास अपने ही हाथों से भगवान की मूर्ति गढ़ ली। उस मिट्टी की मूर्ति के लिए फूस का छप्पर भी बनाया, ताकि उसके प्रिय प्रभु भींगे नहीं।
    
और फिर प्रारम्भ हो गयी उसकी अद्भुत पूजा। जंगल के फूल-पत्ते, जंगली फल, झरने का जल उसकी पूजा सामग्री बन गये। प्रकृति से प्रदत्त चीजों को वह अपने प्रिय परमेश्वर को चढ़ाने लगा। पूजा करते-करते वह बालक विह्वल हो जाता, बार-बार बस यही कहता कि हे प्रभु! मुझे तो यह पता भी नहीं है कि तुम कैसे हो? तुम्हें क्या पसन्द है? हे स्वामी! अपने इस भक्त की पूजा स्वीकार करो-इसकी भक्ति को स्वीकारो और हे प्रभु! अपने इस भक्त को भी अपने दास के रूप में स्वीकार करो। सुगना की इस पूजा का यह क्रम वर्षों चलता रहा। न तो परिस्थितियों के व्याघात उसे विचलित कर सके, न तो उसका मन ही कहीं किसी और ओर गया। एक दिन वह पूजा करके आँख बन्द करके भगवान से प्रार्थना कर रहा था तो अचानक ही उसका अस्तित्व एक अपूर्व ज्योति से भर उठा-भगवान आज स्वयं ही भक्त के हृदय में प्रकट हो गये थे। इस विचित्र दृश्य को अपने अंतर में निहारकर उसने आँखें खोल दीं, पर यह क्या वही भगवान बाहर भी खड़े मुस्करा रहे हैं।
    
उसे बोध हो गया कि आज उसकी पूजा स्वीकार हुई, उसकी भक्ति पूर्ण   हुई। भक्तवत्सल भगवान ने उसे अपना लिया है।’’ देवर्षि के मुख से यह भक्तिकथा सुनकर महर्षि अंगिरा कहने लगे, भक्त की भावनाओं से बढ़कर भला और भगवान को क्या प्रिय हो सकता है। सच तो यही है कि भावनाओं के जितने भी प्रकार हैं-वही सब तो भक्ति के विविध रूप हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ७२

बुधवार, 7 जुलाई 2021

👉 सच्चे साधकों की परीक्षा

असुरता इन दिनों अपने चरम उत्कर्ष पर हैं। दीपक की लौ जब बुझने को होती है तो अधिक तीव्र प्रकाश फेंकती और बुझ जाती है। असुरता भी जब मिटने को होती है तो जाते-जाते कुछ ना कुछ करके जाने की ठान लेती है। इन दिनों हो भी यही रहा है। असुर का अपने नए तेवर और नए हथियार के साथ आक्रमण करने पर उतारू है। यह भ्रम, अश्रद्धा, लांछन, लोकापवाद फैलाने तथा कोई आक्रमण करने या दुर्घटना उत्पन्न करने जैसे किसी भी रूप में हो सकता है। असुरता इस प्रकार के अपने षडयंत्रों को सफल बनाने में पूरी तत्परता के साथ लगी हुई है। उसका पूतना और ताड़का जैसा विकराल रूप देखने के लिए हम में से हरेक को तैयार रहना चाहिए।
             
समुद्र मंथन के समय सबसे पहले विष निकला था बाद में वारुणी, फिर धीरे-धीरे क्रमशः उसमें से रत्न निकलते गए। अमृत सबसे पीछे निकला था। गायत्री महायज्ञ की धर्म अनुष्ठान में भी पहले विष ही निकल रहा है ईष्यालु लोग विरोध और  विलगता करते हैं, आगे और भी अधिक करेंगे। यह इस बात की परीक्षा के लिए है कि आयोजन के कार्यकर्ताओं में किसकी निष्ठा सच्ची, किसकी झूठी है। जो दृढ़ निश्चय ही है वहीं अंत तक ठहरे तो उन्हें लाभ मिलेगा। उथले स्वभाव और बालबुद्धि वाले सहयोगी यदि हट जाएँ तो कोई हर्ज भी नहीं है। इस छाँट का काम निंदको द्वारा बड़ी सरलता से पूरा हो जाता है। दुर्बल मनो भूमि वाले लोग तनिक थी संदेहास्पद बात सुनकर भाग खड़े होते हैं भीड़ को हटाने की दृष्टि से यह पलायन उचित भी है।...........
                 
गायत्री आंदोलन के प्रभाव से अब साधकों की भीड़ भी बहुत बड़ी हो गई है इनमें उच्च श्रेणी की सच्चे साधकों की परीक्षा के लिए यह उचित भी है कि झूठे-सच्चे लोकापवाद फैलें। विवेकवान लोग इन निंदाओं का वास्तविक कारण ढूँढेंगे तो सच्चाई मालूम पड़ जाएगी और उनकी श्रद्धा पहले से भी दूनी- चौगुनी बढ़ जाएगी, और जो लोग दुर्बल आत्मा के है वे तलाश करने की झगडेमें ना पडकर सुनने मात्र से ही भाग खड़े होंगे। इस प्रकार दुर्बल आत्माओं की भीड़ सहज ही छूट जाएगी। असुरता के आक्रमणों से जहां यज्ञों में बड़ी और अड़चने पड़ती है वहाँ (1) संयोजक में दृढ़ता पुरुषार्थ का मुकाबला करने की शक्ति की अभिवृद्धि, (2) सच्चे धर्मप्रेमियों की सच्चाई जान लेने पर श्रद्धा का और अधिक विकास और (3) दुर्बल आत्माओं की अनावश्यक भीड़ की छँटनी यह यह तीन लाभ भी हैं।

📖 यज्ञ का ज्ञान विज्ञान, pg-5.8.
✍🏻 श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 Ramkrishna Paramhansa used to tell a beautiful story

Ramkrishna Paramhansa used to tell a beautiful story

A bird was flying with mouse in mouth and twenty or thirty birds were chasing him.

The bird was very worried "I am not doing anything to them, why are they chasing me?"

The other birds hit him hard, and in the conflict, in the struggle the bird opened his mouth and the mouse dropped.

Immediately the other bird opened his mouth and the mouse dropped. Immediately the other birds all flew towards the mouse;they all forgot about him.

They were not against him, they were also on the same trip - they wanted the mouse.

If people are hurting you without reason it is quiet possible you may be carrying the dead mouse !

Drop it and suddenly you will see that they have forgotten about you.

They are no longer concerned about you.

Ramkrishna dev use to conclude

People are never concerned about you they want the mouse.

Their problem is not you the mouse you are carrying. They also want the mouse...

They also want bite in the flesh...They have to push you away to get it..

Once you are in a position they aspire to then be prepared to be pushed and pulled.

So drop the mouse or it would be snatched.

👉 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति (भाग ३७)

ईश्वर की सच्चिदानन्दमय सत्ता

विश्व अस्तित्व की इकाइयां मानी गई है, (1) ईश्वर, (2) जीव, (3) प्रकृति। ईश्वर तीन गुण वाला है। सत्, चित, आनन्द। यह तीन उसके गुण हैं। सत् अर्थात् अस्तित्व युक्त। जो है, था, जो रहेगा, उस अविनाशी तत्व को सत् कहते हैं। चित् अर्थात् चेतना। जिसमें सोचने, विचारने, निर्णय करने एवं भावाभिव्यक्ति युक्त होने की विशेषताएं हैं उसे चित् कहेंगे। आनन्द—अर्थात् सुख, सन्तोष और उल्लास का समन्वय। ईश्वर अस्तित्ववान है, चैतन्य है तथा आनन्दानुभूति में पूरा है। इसलिये उसे सच्चिदानन्द कहते हैं।

जीवन के दो गुण हैं—सत् और चित्। वह अस्तित्ववान है। ईश्वर से उत्पन्न अवश्य है पर लहरों की तरह उसकी स्वतन्त्र सत्ता भी है और वह ऐसी है कि सहज ही नष्ट नहीं होती। मुक्ति में भी उसका अस्तित्व बना रहता है और निर्विकल्प, सविकल्प स्थिति में सारूप्य, सायुज्य, सालोक्य, सामीप्य का आनन्द अनुभव करता है। प्रलय में सब कुछ सिमट कर एक में अवश्य इकट्ठा हो जाता है फिर भी वह आटे की तरह एक दीखते हुये भी जीव कणों की स्वतन्त्र सत्ता बनी रहती है। मूर्छा, स्वप्न, सुषुप्ति, तुर्या एवं समाधि अवस्था में भी मूलसत्ता यथावत् रहती है। मरणोत्तर जीवन तो रहता ही है। इस प्रकार जीव की सत्—अस्तित्ववान स्थिति अविच्छिन्न रूप से बनी रहती है।

जीव का दूसरा गुण है—चित्। चेतना उसमें रहती ही है। यह चेतना ही उसका ‘स्व’ है। अहंता—ईगो—सैल्फ—आत्मानुभूति इसी को कहते हैं। तत्वज्ञानियों से लेकर अज्ञानियों तक में यह स्थिति सदैव पाई जायगी। ईश्वर में आनन्द परिपूर्ण है। जीव उसकी खोज में रहता है, उसे प्राप्त करने के लिये विविध प्रयास करता है। और न्यूनाधिक मात्रा में, भले बुरे रूप में उसी की प्राप्ति के लिये लालायित और यत्नशील रहता है।

प्रकृति में एक ही गुण है, सत्। उसका अस्तित्व है। अणु परमाणुओं के रूप में—दृश्य और अदृश्य प्रक्रिया के साथ जगत की सत्ता के रूप में प्रकृति को देखा जा सकता है। ईश्वर और जीव दोनों का क्रिया-कलाप इस प्रकृति प्रक्रिया के साथ ही गतिशील रहता है। महाप्रलय में प्रकृति सघन होकर—पंच तत्वों की अपेक्षा एक महातत्व में विलीन हो जाती है। इस प्रकार जब कभी इस विश्व ब्रह्माण्ड की लय प्रलय होगी तब ईश्वर के सत् तत्व में प्रकृति लीन हो जायगी जीवन चित् में घुल जायेगा और उसका अपना अतिरिक्त गुण आनन्द, यथावत्—बना रहेगा।

महासृष्टि के आरम्भ का क्रम भी यही है। तत्वदर्शियों के अनुसार ब्रह्म में स्फुरणा होती है एक से बहुत होने की। वह अपने को अंश रूप में विभक्त करके एक से अनेक बनता है और जीव सत्ता का अस्तित्व विनिर्मित होता है। स्फुरणा द्वारा जीवन की उत्पत्ति के बाद उसकी दूसरी उमंग आगे आती है। वह है—इच्छा। आनन्द को निराकारिता को साकारिता में परिणत करने के लिये पदार्थ की आवश्यकता होती है। इच्छा का प्रतिफल ही आवश्यकता, आविष्कार और आविर्भाव के रूप में सामने आता है। यह प्रकृति है। स्फुरणा से जीव और इच्छा से प्रकृति का निर्माण करके ब्रह्म साक्षी और दृष्टा के रूप में सर्वत्र विद्यमान रहता है और इस जगत की सारी प्रक्रिया की स्वसंचालित पद्धति को बनाकर अपने क्रिया कर्तृत्व का आनन्द लेता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 तत्व दृष्टि से बन्धन मुक्ति पृष्ठ ६०
परम पूज्य गुरुदेव ने यह पुस्तक 1979 में लिखी थी

👉 भक्तिगाथा (भाग ३७)

भगवान में अनुराग का नाम है भक्ति
    
‘‘अद्भुत हैं आप और आपके द्वारा सम्पन्न पूजा! यह तो भक्ति का अनूठा आयाम है’’, महर्षि क्रतु जो सभी ब्रह्मर्षियों के पूज्य थे, बोल पड़े।

इस पर देवर्षि कुछ पलों के मौन के बाद मुखर हो बोले-
‘पूजादिष्वनुराग इति पाराशर्यः’॥ १६॥
पाराशर के पुत्र व्यास के अनुसार भगवान की पूजा आदि में अनुराग होना भक्ति है।
    
फिर अपने ही सूत्र की व्याख्या में देवर्षि ने कहा-‘‘प्रभु तो सर्वव्यापी और अनन्त हैं। पर भक्त उन्हें अपनी भावनाओं में बाँधता है-पूजा की प्रक्रिया से। वह परमात्मा को प्रतिस्थापित करता है-मूर्ति में, चित्र में। वह उन प्रभु को आमंत्रित करता है। वह उनसे कहता है कि इसमें आओ और विराजो। क्योंकि तुम तो हो निराकार, कहाँ और कैसे तुम्हारी आरती उतारूँ मैं? हाथ मेरे छोटे हैं, तुम छोटे बनो। तुम तो हो विराट्, कहाँ धूप-दीप सजाऊँ? मैं छोटा और सीमित हूँ, तुम मेरी सीमा के भीतर आ जाओ। तुम्हारा तो कोई ओर-छोर नहीं-कहाँ नाचूँ? किसके सामने गीत गाऊँ? तुम इस मूर्ति में बैठो।’’
    
ऐसा कहते हुए देवर्षि की वाणी भावों से भीग गयी और वह चुप हो गये। ऐसा लग रहा था जैसे कि उन्हें किसी की स्मृतियों ने घेर लिया है। उनकी यह चुप्पी गंधर्व विश्वावसु से सही न गयी। वह विनीत स्वर में बोले-‘‘हम सब पर कृपा करके अपने भावों को प्रकट करें।’’ उत्तर में देवर्षि अपने भावों की गहनता से उबरते हुए बोले-‘‘हमें चण्डाल पुत्र ‘सुगना’ की कथा याद आ रही है। यदि आप सब अनुमति दें तो मैं उस परम भगवद्भक्त की भक्तिगाथा कहूँ।’’ ‘‘अवश्य देवर्षि!’’, परम तेजस्वी अग्निशिखा की भाँति प्रज्वलित अंगिरा कह उठे-‘‘धन्य है वह सुगना जो चण्डाल होते हुए भी अभी तक अपनी भक्ति के कारण आपकी स्मृतियों में बना हुआ है।’’
    
‘‘वह था ही कुछ ऐसा भक्तिपरायण। उसके पिता भारत की धरती पर बहने वाली पवित्र गोदावरी के किनारे एक छोटे से गाँव में रहते थे। उस समय उस प्रदेश में महापराक्रमी राजा इन्द्रादित्य का शासन था। जो महावीर होने के साथ अनन्य भगवद्भक्त भी थे। उन्होंने स्थान-स्थान पर कई देवमंदिर बनवाये थे। उन्हीं के द्वारा बनवाया एक मंदिर सुगना के गाँव में भी था जिसमें गाँव के एक वृद्ध ब्राह्मण पूजा किया करते थे। बालक सुगना भी जब-तब मंदिर के सामने से गुजरता और ब्राह्मण देवता की इस पूजा प्रक्रिया को छिप-छिप करके देख लेता। उसे पुजारी ब्राह्मण के द्वारा बोले गये संस्कृत के मंत्र तो समझ में नहीं आते थे, परन्तु भगवान के श्रीविग्रह पर पुष्प चढ़ाना-नैवेद्य अर्पित करना, उनकी आरती उतारना उसे बहुत ही भाता।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 भक्तिगाथा नारद भक्तिसूत्र का कथा भाष्य पृष्ठ ७१

👉 भक्तिगाथा (भाग ७५)

महारास की रसमयता से प्रकट हुआ है भक्तिशास्त्र देवर्षि का यह सूत्र सभी को भक्तिकाव्य की मधुर-सम्मोहक पंक्ति की तरह लगा। यह सच सभी अनुभव कर रह...