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शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (अंतिम भाग) 4 Feb

🌹 प्रातः सायं उपासना

🔴 इस प्रकार आत्म-कल्याण और आत्मोत्थान का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए की गई गायत्री साधना, अन्य साधनाओं की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली सिद्ध होती है। गायत्री साधना की विशेषता यह है कि उसके पीछे अगणित साधकों का तप बल छिपा हुआ है और साधक सूक्ष्म जगत के माध्यम से अनायास ही उनका सहयोग प्राप्त कर लेता है और सफलता की ओर अग्रसर होने लगता है। गायत्री साधना अपरा प्रकृति को पराप्रकृति में रूपांतरित करने के विज्ञान पर आधारित है। मनुष्य की पाशविक वृत्तियों के स्थान पर ईश्वरीय सत् शक्ति को प्रतिष्ठित करना ही अध्यात्म विज्ञान का कार्य है। तुच्छ को महान्, ससीम को असीम, अणु को विभु, बद्ध को मुक्त और पशु को देवत्व के स्तर तप पहुंचाना ही साधना का मुख्य उद्देश्य गायत्री के माध्यम से भली भांति निरापद ढंग से पूरा होता है।

🔵 पिछले जमाने में धार्मिक जगत में विकृतियों के बढ़ जाने तथा विज्ञान-जगत में नये-नये चमत्कार दृष्टिगोचर होने के कारण लोगों में अध्यात्म तथा ईश्वर पर अनास्था का भाव विशेष रूप से उत्पन्न हो गया था। कितने ही नव-शिक्षित व्यक्ति तो इसे मात्र अन्धविश्वास मानकर इसको देना बुद्धिहीनता का चिन्ह मानने लगे थे। पर अब विज्ञान के चरम सीमा पर पहुंच जाने के पश्चात् भी संसार की गतिविधियों में कोई आशाजनक कल्याणकारी लक्षण न देखकर उनकी विचारधारा बदलने लगी है। अब यह अनुमान किया जा रहा है कि संसार में केवल भौतिक-पक्ष ही सब कुछ नहीं है वरन् अध्यात्म-पक्ष को मान्यता मिलने से ही मनुष्य वास्तविक मानवता के समीप पहुंच सकेगा। गायत्री-साधना सर्वजनीन, सुगम, स्पष्ट और सरल है। इसका आश्रय लेकर हम अध्यात्म मार्ग में उल्लेखनीय प्रगति कर सकते हैं और मानवता के लक्ष्य को अपेक्षाकृत न्यून प्रयास से ही प्राप्त कर सकते हैं।

🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 42) 3 Feb

🌹 प्रातः सायं उपासना

🔴 एक घण्टे में गायत्री मन्त्र की प्रायः ग्यारह मालाओं का जप सामान्य गति से पूरा हो जाता है। किन्हीं की गति कम हो सकती है और किन्हीं की ज्यादा भी, पर औसत गति यही मानी जा सकती है। इस प्रकार पन्द्रह माला जपने में लगभग डेढ़ घण्टा समय लगना चाहिए। यह सारा समय प्रातःकाल ही लग सके तो अधिक अच्छा है, अन्यथा इसे प्रातः सायं में दो बार भी पूरा किया जा सकता है। सायंकाल से तात्पर्य सूर्य अस्त होने का समय ही नहीं, उसके बाद में रात को सोते समय भी समझना चाहिए। काम पर लगने से पहले सुबह और काम से निवृत्त होने के बाद रात्रि को ही प्रायः समय मिलता है। यही दोनों समय उपासना के लिए सुविधाजनक हैं। अधिक रात्रि बीत जाने पर मुंह बन्द रखकर मानसिक जप द्वारा प्रातःकाल में बची हुई शेष मालाएं पूर्ण की जा सकती हैं। प्रयत्न यही करना चाहिए अधिकांश जप संख्या प्रातःकाल पूर्ण हो जाए। इसके लिए एक घन्टा सुबह और आधा घन्टा रात्रि में अथवा सवा घन्टा सुबह और पन्द्रह मिनट रात्रि में, इस प्रकार समय निर्धारित किया जा सकता है।

🔵 जप के समय गायत्री माता की छवि का अथवा निराकार साधक सविता देवता का मध्य भाग में ध्यान करे और भावना करे कि उसका दिव्य प्रकाश, स्थूल सूक्ष्म और कारण शरीर में प्रवेश कर उन्हें ज्योतिर्मय बना रहा है। उपासना के समय मन को पूरी तरह इष्ट छवि पर केन्द्रित रखना चाहिए, उसे इधर-उधर भटकने नहीं देना चाहिए और न ही दूसरे विचारों को मनःक्षेत्र में प्रविष्ट होने देना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 1 फ़रवरी 2017

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 41) 2 Feb

🌹 साधना की पूर्णाहुति

🔴 इस प्रकार यज्ञ को कहीं भी अनावश्यक नहीं माना गया है, बल्कि उसे तो और भी आवश्यक अनिवार्य बताया गया है। अस्तु अभियान साधना में निरत साधकों को अपने अनुष्ठान की पूर्णाहुति यज्ञ से करना चाहिए और फिर अगला अनुष्ठान आरम्भ करना चाहिए। यज्ञ छोटा करना हो तो उसमें अपने परिवार के लोगों को सम्मिलित किया जा सकता है और एक कुण्ड का अग्निहोत्र किया जा सकता है। सब लोगों द्वारा मिलकर की गई 2400 आहुतियां देने से भी काम चल सकता है। बड़ा रूप देना हो तो पड़ोसी सम्बन्धी मित्रों को भी सम्मिलित करके पांच कुण्डी आयोजन का रूप दिया जा सकता है। उसे हवन में सम्मिलित आहुतियां पांच हजार भी हो सकती हैं। अलग से प्रबन्ध न करना हो तो किसी बड़े सामूहिक आयोजन में भी पूर्णाहुति का नारियल चढ़ाया जा सकता है।

🔵 वस्तुतः अभियान साधना एक प्रकार का अनुष्ठान ही है, जो एक वर्ष की अवधि में पूरा होता है। अवधि लम्बी होने से उसमें अनुशासन की सफलताएं रखी गई हैं। सामान्य साधक इसे बिना किसी कठिनाई के सरलता पूर्वक पूर्ण कर सकते हैं। पूर्णाहुति के अवसर पर ब्रह्मभोज के रूप में अर्थदान का भी माहात्म्य है। मात्र शारीरिक और मानसिक श्रम ही पर्याप्त नहीं, उसके साथ अर्थदान भी आवश्यक है। यज्ञ के रूप में कुछ पैसा खर्च होता है, कुछ ब्रह्मभोज के रूप में करना चाहिए। वर्तमान परिस्थितियों में ब्रह्मदान ही ब्रह्मभोज का विकल्प हो सकता है। ब्रह्मदान अर्थात् गायत्री साहित्य का सत्पात्रों को प्रचार के रूप में वितरण। इसके लिए कुछ राशि श्रद्धापूर्वक संकल्पित करनी चाहिए। प्रसाद वितरण में मिठाई बांटने की अपेक्षा ज्ञान सामग्री देने की व्यवस्था अधिक उपयुक्त है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 30 जनवरी 2017

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 40) 31 Jan

🌹 साधना की पूर्णाहुति

🔴 गायत्री और यज्ञ का अनिवार्य सम्बन्ध है। यज्ञ भारतीय संस्कृति का आदि प्रतीक है। गायत्री को भारतीय संस्कृति की जननी कहा गया है तो यज्ञ को संस्कृति का पिता। भारतीय धर्मानुयायियों के जीवन में यज्ञ का बड़ा महत्व है। कोई भी कार्यक्रम बिना यज्ञ के पूरा नहीं होता। साधनाओं में तो हवन और भी अनिवार्य है। जितने भी पाठ, पुरश्चरण, जप, साधन किये जाते हैं वे चाहे वेदोक्त हों चाहे तांत्रिक उनमें किसी न किसी रूप में यज्ञ, हवन अवश्य करना पड़ता है। प्रत्येक कथा, कीर्तन, व्रत, उपवास, पर्व, त्यौहार, उत्सव, उद्यापन सभी में यज्ञ अवश्य करना पड़ता है।

🔵 इस प्रकार गायत्री उपासना में भी हवन आवश्यक है। अनुष्ठान या पुरश्चरण में जप से दसवां भाग हवन करने का विधान है। यदि इतना न बन पड़े तो शतांश [सौवां भाग] हवन करना चाहिए। गायत्री उपासना के साथ यज्ञ का युग्म बनता है। गायत्री को माता और यज्ञ को पिता माना गया है। इन्हीं दोनों के संयोग से मनुष्य का आध्यात्मिक जन्म होता है, जिसे द्विजत्व कहते हैं। द्विज का अर्थ है दूसरा जन्म। जैसे अपने शरीर को जन्म देने वाले माता, पिता की सेवा पूजा करना मनुष्य का कर्तव्य है, उसी प्रकार गायत्री माता और यज्ञ पिता की पूजा भी प्रत्येक द्विज का आवश्यक धर्म कर्तव्य है।

🔴 यह नहीं सोचना चाहिए कि सामान्य और नियमित उपासना क्रम में यज्ञ की कोई आवश्यकता नहीं है। यज्ञ को प्रत्येक व्यक्ति का आवश्यक नित्य कर्म माना गया है। यह बात अलग है कि लोग उसका महत्व एवं विधान भूल गये हैं और केवल चिन्ह पूजा करके काम चला लेते हैं। घरों में स्त्रियां किसी रूप में यज्ञ की चिन्ह पूजा करती हैं। त्यौहारों या पर्वों पर अग्नि को जिमाने या अज्ञारी करने का कृत्य प्रचलित है। थोड़ी-सी अग्नि को लेकर, घी डालकर उसे प्रज्वलित करना और उस पर पकवान के छोटे-छोटे ग्रास चढ़ाना तथा फिर अग्नि से जल की परिक्रमा करा देना, यही प्रक्रिया प्रत्येक घर में पर्व एवं त्यौहारों पर सम्पन्न होते देखी जा सकती है। शास्त्रों में बलिवैश्व का नित्य विधान है। प्रतिदिन भोजन बनने के बाद बलिवैश्व के लिए अग्नि में आहुति देनी होती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 39) 30 Jan

🌹 अभियान साधना और संयम

🔴 इन्द्रिय संयम तपश्चर्या का आरम्भ है, अन्त नहीं। अपनी शक्तियों के अपव्यय को रोककर उन्हें आत्मिक विकास की दिशा में नियोजित करना ही तपश्चर्या का मूल उद्देश्य है और स्मरण रखा जाना चाहिए कि रसना, बकवाद यथा यौन-लिप्सा के कारण जीवनी-शक्ति का अस्सी प्रतिशत भाग नष्ट होता है। यदि इन छिद्रों को बन्द कर दिया जाय तो जीवन की प्रवृति स्वतः ही शुभ से अशुभ की ओर अग्रसर होने लगेगी। इन तीन मुख्य छिद्रों को बन्द कर देने पर अशुभ दृष्टि, विलासी जीवन तथा अन्य इन्द्रिय लिप्साओं को नियन्त्रित कर पाना अपेक्षाकृत बहुत आसान हो जायगा।

🔵 फिर भी यह नहीं समझ लेना चाहिए कि संयम से तात्पर्य उपवास, मौन और ब्रह्मचर्य भर ही है। उसकी परिधि और साधना क्षेत्र बहुत व्यापक है तथा उसमें सभी प्रकार के अपव्ययों को रोकने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है, इन्द्रिय संयम उनमें से एक है। मनोनिग्रह उसका दूसरा पक्ष है। मनोनिग्रह अर्थात् चिन्तन को अभीष्ट प्रयोजनों में नियोजित करना और अवांछनीय विचारों को आते ही भगा देना।

🔴 अभियान साधना में सभी स्तर के संयम पर जोर दिया गया है। जैसे समय संयम अर्थात् सोने से लेकर जागने तक एक भी क्षण आलस्य या प्रमाद में बर्बाद न करना। रम सन्तुलन को बुद्धिमता पूर्वक बनाये रहना। न का संयम अर्थात् उचित और न्याय, नीति पूर्वक उपार्जन करना तथा कमाई को आवश्यक प्रयोजनों में ही व्यय करना। यही चारों संयम मिलकर जीवन साधना को तपश्चर्या का समग्र रूप बनाते हैं। इन्द्रिय संयम उनमें प्रथम है। अभियान साधना में निरत साधकों का लक्ष्य प्रथम चरण की चिन्ह पूजा को ही सब कुछ नहीं मान बैठना चाहिए वरन् समग्र संयम की तपश्चर्या को साधना का आवश्यक अंग मानकर चलना चाहिए तथा इन उपचारों के सहारे संयम शीलता अपनाने की व्यावहारिक रूपरेखा निर्मित की जाय।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 28 जनवरी 2017

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 38) 29 Jan

🌹 अभियान साधना के नियम
🔴 अभियान साधकों को गुरुवार के दिन प्रमुखतः तीन नियमों का पालन करना होता है उपवास, मौन और ब्रह्मचर्य। इन तीनों का जितनी ही कड़ाई के साथ पालन किया जाय उतना ही उत्तम है। उपवास में हो सके तो दूध, छाछ, रस जैसे पेय पदार्थ ही लिए जाएं तो सर्वोत्तम है। किन्तु इससे काम न चले तो शाकाहार भी लिया जा सकता है। इतना भी कठिन पड़े तो एक समय भोजन किया जा सकता है। उस एक समय के भोजन में अस्वाद व्रत का पालन अनिवार्य रूप से करना चाहिए। नमक और शक्कर दोनों में से एक भी न लिया जाय।

🔵 यह स्वाद संयम जिव्हा संयम का एक पक्ष है। इसका दूसरा पक्ष है—संतुलित और सुसंस्कृत भाषण। इसके लिए पुराने अभ्यास को रोकने और नया अभ्यास आरम्भ करने का मध्यम उपाय मौन है। पूरे दिन मौन रखना तो कामकाजी व्यक्ति के लिए कठिन पड़ता है पर प्रातःकाल अथवा जब भी सुविधा हो दो घण्टे की मौन साधना बिना किसी अड़चन के की जा सकती है। जितने समय मौन रहा जाय, वह समय मनन, चिन्तन में लगाया जाय। मनन का अर्थ है—आत्मचिन्तन, अपनी वर्तमान स्थिति का आलोचक की दृष्टि से विवेचन।

🔴 इस विवेचन से अपने भीतर जो दोष, दुर्गुण दिखाई दें, जो आदतें अनुपयुक्त जान पड़े, उनके निराकरण की योजना बनाना तथा जिन सत्प्रवृत्तियों का अपने में अभाव है, उनके अभिवर्धन की योजना बनाना, इसी का नाम चिन्तन है। अपना आत्म-विवेचन मनन है और त्रुटियों के निराकरण तथा सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन की योजना बनाना चिन्तन कहा जा सकता है। इन्हीं दो कार्यों में चित्त को मौन की अवधि में व्यस्त रहना चाहिए। स्मरण रखा जाय कि मौन का अर्थ मात्र चुपचाप बैठे रहना नहीं है। इस अवधि को एकांत में बिताना चाहिए। मुंह से कुछ न बोलकर जबान बन्द रखकर भी इशारेबाजी की जाती है तो उससे मौन का प्रयोजन पूरा नहीं होता। यह आत्मश्लाघा तो मौन न रखने से भी बुरी है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 37) 28 Jan

🌹 अभियान साधना के नियम

🔴 कहा जा चुका है कि अभियान उन साधकों के लिए है जो अपने सामान्य उपासना क्रम का स्तर बढ़ाकर, उसे ऊंचा उठाकर और अधिक लाभ प्राप्त करना चाहते हों। एक-दो, तीन माला का जप और ध्यान आरम्भिक कक्षा है। यह उपासना आरम्भ करते समय साधक से कहा जाता है कि मन लगने न लगने पर भी ज्यों-त्यों इस अभ्यास को जारी रखा जाए, समय न मिले तो मानसिक जप किसी भी समय किया जा सकता है। लेकिन इतना ध्यान रखना चाहिए कि वह सब नियमित हो। यदि प्रयत्न किया जाय तो ऐसा समय आसानी से निश्चित किया जा सकता है कि उस समय अवकाश रहे और उपासना नियमित रूप से चल सके।

🔵 आरम्भिक कक्षा से आगे बढ़कर उच्च कक्षा में प्रवेश के लिए ही अभियान साधना का उपक्रम है। तितिक्षा, तप आदि नियमानुशासनों का नियमित रूप से पालन हो सके तो अच्छा ही है। पर जिन नियमों का अभ्यास ही नहीं है, उसके लिए आरम्भ छोटे रूप में किया जाना चाहिए और इसी के लिए सप्ताह में एक दिन इन व्रत-नियमों के पालन की बात कही गई है। पूरी दिनचर्या ही अनुशासित नियमबद्ध और तप परायण बन सके तो कहना ही क्या? लक्ष्य वही रखना चाहिए। गुरुवार को अनुष्ठान नियमों का पालन करना इसीलिए आवश्यक रखा गया है कि साधक ये नियमादि याद रखे तथा उनकी प्रेरणा, दिशा निरन्तर नियमित रूप से प्राप्त करता रहे। इन्हें सदैव पालन करना निषिद्ध नहीं है। सप्ताह में एक दिन इस चर्या का पालन न्यूनतम को आवश्यक समझते हुए निर्धारित किया है।

🔴 सर्वविदित है कि अनुष्ठानों में आहार-विहार के दोनों पक्षों पर नियन्त्रण, संयम करना पड़ता है। भोजन में पूरे या अधूरे उपवास की रीति-नीति का यथासम्भव समावेश, ब्रह्मचर्य का पालन, अपनी सेवाएं आप करने का प्राविधान है। तितिक्षा का अभ्यास करने के लिए भूमिशयन जैसी कठोरताएं अपनानी पड़ती हैं। इस तरह के और भी कितने ही तप-साधना, व्रत अनुशासन है जो जप-ध्यान जैसे सामान्य उपासनाक्रम को सशक्त एवं प्रभावोत्मक बनाने में समर्थ है। अभियान-साधना में भी इस प्रकार की कठोरताओं का यथासम्भव पालन करना चाहिए। इसी उद्देश्य से गुरुवार का दिन संयम साधना के लिए निर्धारित है ताकि साधक को अपनी जीवन-नीति का स्मरण ही नहीं अभ्यास भी बना रहे।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

गुरुवार, 26 जनवरी 2017

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 36) 27 Jan

🌹 साधना का स्तर ऊंचा उठाएं

🔴 यों शुभ कार्य के लिए सभी दिन शुभ हैं। फिर भी किसी पर्व से यह साधना आरम्भ की जाय तो अधिक उत्तम है। बसन्त पंचमी, गुरुपूर्णिमा, गायत्री जयन्ती आदि पर्वों से अथवा तिथियों में पंचमी, एकादशी और पूर्णिमा या वारों में रविवार अथवा गुरुवार से अधिक उत्तम है। यों बुरा या निषिद्ध, कोई भी दिन नहीं है। सामान्य नियम यह है कि जब से आरम्भ किया जाय तभी एक वर्ष पूरा होने पर, समाप्त किया जाय। पर्व दिन कुछ आगे-पीछे हों तो उस अवसर पर भी पूर्णाहुति की जा सकती है और शेष जप संख्या को थोड़ी-बहुत घटा-बढ़ाकर सन्तुलन बिठाया जा सकता है।

🔵 वैसे पन्द्रह माला और 24 हजार के दो लघु अनुष्ठानों का नियम भी इस प्रकार बनाया गया है कि इस क्रम से उपासना करने में प्रायः 11 महीनों में ही यह संख्या पूरी हो जाती है। चांद वर्ष पूरे तीन सौ साठ दिन का होता भी नहीं है। तिथियों को घट-बढ़ प्रायः होती रहती है इसलिए पांच लाख की संख्या सरलता पूर्वक हो सकती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 25 जनवरी 2017

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 35) 26 Jan

🌹 साधना का स्तर ऊंचा उठाएं
🔴 अनुष्ठान समय विशेष पर नियत अवधि में पूरा करना पड़ता है। यों उसे कभी भी आरम्भ किया जा सकता है लेकिन अवधि का ध्यान तो रखना ही पड़ता है। उच्च स्तर के, बहुत ही ऊंची श्रेणी के साधक 24 लाख का महापुरश्चरण नित्य निरन्तर चलाते हैं पर यह पूरा समय साधना उपासना में लगा सकने वालों के लिए ही सम्भव है। सामान्य स्थिति में अपनी उपासना को अनुष्ठान स्तर का बनाना हो तो उसके लिए एक वर्षा में पांच लाख जप की संख्या पूर्ण करना सर्वश्रेष्ठ है। एक वर्ष में पूरा होने वाले इस उपासना अनुष्ठान को अभियान साधन कहते हैं।

🔵 इस साधना का विधि-विधान भी बहुत सरल है। 5 लाख की जप संख्या 15 माला प्रति दिन जप करने तथा चैत्र और आश्विन की दो नवरात्रियों में 24 हजार का लघु अनुष्ठान करने से पूरी हो जाती है। यों पन्द्रह माला प्रति दिन करने से भी 360 दिन में पांच लाख की संख्या पूरी हो जाती है किन्तु नवरात्रियों में लघु अनुष्ठान तो सभी उपासक करते हैं, सामान्य उपासना क्रम अपनाने वाले साधक भी प्रायः नवरात्रि अनुष्ठान करते हैं। अतएव अभियान साधना करने वाले साधकों को भी यह अनुष्ठान करना और भी आवश्यक है लाभप्रद है।

🔴 यह तो हुई संख्या पूरी करने की बात। अभियान साधना को अनुष्ठान स्तर की बनाने वाले नियम हैं गुरुवार के दिन संयम। संयम अर्थात् उपवास, मौन, ब्रह्मचर्य, तितिक्षा और उन सभी नियमों का पालन जो 24 हजार के, सवालक्ष के अथवा चौबीस लक्ष के, लघु-मध्यम तथा पूर्ण अनुष्ठान पुरश्चरण में करने पड़ते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

मंगलवार, 24 जनवरी 2017

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 34) 25 Jan

🌹 नित्य उपासना से अधिक लाभ

🔴 प्रति दिन प्रातः सायं नियमित रूप से गायत्री उपासना का विधान है। उस नियमितता में कोई व्यतिरेक नहीं आने देना चाहिए। तन्मयता और एकाग्रता तो उपासना को सर्वांगपूर्ण बनाने के लिए अनिवार्य है ही। पर इतने मात्र से ही आत्मकल्याण की आवश्यकता पूरी नहीं हो जाती है। स्वास्थ्य संरक्षण के लिए दिन में दो या तीन बार भोजन करते हैं। शरीर के पोषण और स्वास्थ्य संरक्षण के लिए यह आवश्यक है, पर इतने मात्र से यह उद्देश्य पूर्ण नहीं हो जाता। इसके साथ ही श्रमशील जीवन जीने, दिनचर्या में और भी कई नियमों का समावेश करना आवश्यक हो जाता है। यदि इन आवश्यक बातों का ध्यान न रखा गया तो कितना ही पोष्टिक भोजन किया जाय, उससे पोषण और स्वास्थ्य संरक्षण की आवश्यकता पूरी नहीं होती। गायत्री उपासना थोड़े समय तक की जाती है लेकिन उसका पूरा लाभ तभी मिलता है जब जीवन-पथ में उपासना के साथ-साथ साधना का भी समावेश किया जाय।

🔵 पहलवान लोग शारीरिक शक्ति का संवर्धन करने के लिए पौष्टिक भोजन तो करते ही हैं लेकिन उसका अधिकाधिक लाभ उठाने के लिए अधिकाधिक श्रम, व्यायाम, दण्ड, बैठक आदि भी करते हैं, तभी उसका समुचित लाभ मिलता है। जिन्हें गायत्री उपासना से अधिकाधिक लाभ उठाना है, उन्हें चाहिए कि वे उपासना के साथ साधनात्मक व्यायाम भी करें। यदि उपासना का स्तर अधिक ऊंचा कर दिया जाय, उसे साधना स्तर की बना दिया जाय तो उसका लाभ और भी अधिक मिलता है। साधना से आशय उपासना में निष्ठा का अधिकाधिक समावेश करना है। निष्ठा का समावेश संकल्प, दृढ़ता, अनुशासन और नियमितता के रूप में चरितार्थ होता है।

🔴 निष्ठा के समावेश से संकल्प बढ़ता है, संकल्प से मनोबल, आत्मिक बल ऊंचा उठता है। यह मनोबल, संकल्प, दृढ़ता, समन्वित-निष्ठा साधक को कठोर अनुशासन में रहने के लिए प्रेरित और बाध्य करती है। यह अनुशासन, नियमानुवर्ती ही तपश्चर्या कहलाती है। अनुष्ठान साधनाओं में इन्हीं बातों की विशेष रूप से आवश्यकता पड़ती है। और यदि नियमित साधना में भी इन विशेषताओं का समावेश कर लिया जाय तो वह सामान्य उपासना क्रम भी अनुष्ठान स्तर का बन जाता है। अस्तु गायत्री उपासना का अधिकाधिक लाभ उठाने के लिए उसमें नियम पालन, अनुशासन, निष्ठा, दृढ़ता और नियमितता का कड़ाई के साथ पालन करना चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 33) 24 Jan

🌹 जप-यज्ञ के समय के वस्त्र
🔴 ऐसे कपड़े जो शरीर पर चिपके रहते हैं—नित्य नहीं धुलते, उनको धार्मिक क्रिया-कृत्यों में धारण न किया जाय तो ही अच्छा है। मोजे हर हालत में उतार देने चाहिए, उनकी गन्दगी लगभग जूते के ही समतुल्य होती है।

🔵 जिन प्रदेशों में धोती कुर्ते का रिवाज नहीं है, बनाना भी कठिन है, वहां पाजामा के उपयोग की भी छूट मिल सकती है। पर वह भी धुला हुआ तो हो, यह ध्यान रखा जाय। जहां आसानी से धोती-कुर्ते का प्रबन्ध हो सकता है, वहां तो उसके लिए जोर दिया ही जाय। इस सन्दर्भ में आलस्य या उपेक्षा न बरतें। कंधे पर पीला दुपट्टा धर्मानुष्ठानों के लिए शास्त्रोक्त परिधान है। जहां तक सम्भव हो जप, साधना यज्ञ-प्रक्रिया आदि के अवसर पर कंधे पर पीला दुपट्टा रखा जाय। इसमें सांस्कृतिक एकता एवं भावनात्मक समस्वरता का समावेश है।

🔴 इसलिए यथासम्भव सभी धर्मकृत्यों में धोती, कुर्ता, पीला दुपट्टा धारण करने पर जोर दिया जाय। पर इसे इतना कड़ा प्रतिबन्ध माना जाय कि किसी श्रद्धालु को मात्र इसी कारण सम्मिलित होने से रोका जाय। अच्छा यह है कि सामूहिक आयोजनों में कुछ सैट इस प्रकार के रखे जायें जिन्हें वे लोग प्रयोग कर सकें जो इस प्रकार के वस्त्र घर से लेकर नहीं आये हैं। महिलाएं प्रायः साड़ियां ही पहनती हैं। वे धर्मकृत्यों में पीली रंगी रहें। शरीर पर धारण करने के वस्त्र चिपके रहने वाले नहीं ढीले होने चाहिए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

रविवार, 22 जनवरी 2017

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 32) 23 Jan

🌹 जप-यज्ञ के समय के वस्त्र

🔴 जप तथा यज्ञ में ऐसे वस्त्र धारण किये जाते हैं जो शरीर से अधिक चिपके नहीं। प्राण तत्व को भीतर खींचने और कल्मषों को बाहर निकालने की उस समय की प्रक्रिया में बाधा न पहुंचायें। प्राचीन काल में धोती और दुपट्टा—दो ही वस्त्र इन प्रयोजनों में काम आते थे। शरीर पर न्यूनतम वस्त्र रहें, जो रहें वे ढीले हों, वायु के आवागमन में बाधक न होते हों, वही उपासना के समय धारण करने योग्य माने गये हैं। यज्ञ में यह बात विशेष रूप से ध्यान रखने योग्य है, क्योंकि अग्निहोत्र की उपयोगी ऊर्जा रोम छिद्रों के द्वारा भीतर प्रवेश करती है, त्वचा पर प्रभाव डालती है। उस गर्मी के भीतर प्रवेश करने पर भीतर से भाप, पसीना और साथ ही अनेक प्रकार की अशुद्धियां बाहर निकलती हैं। यदि कपड़े भारी, मोटे या कसे हुए रहेंगे तो उपरोक्त दोनों ही उद्देश्यों की पूर्ति में कठिनाई पड़ेगी और साधक घाटे में रहेगा।

🔵 धोती सबसे ढीला वस्त्र है। उससे लज्जा आच्छादन ठीक प्रकार होता है। कटि प्रदेश और जंघाएं लज्जा के अवयव माने गये हैं। वे पैजामे में भी उतनी अच्छी तरह नहीं ढकते जितना कि भारतीय संस्कृति के अनुसार आवश्यक है। इसी प्रकार पैजामे का कमरबन्द—नीचे की मुहरी, शरीर के साथ उसका चिपका रहना, यज्ञ के लाभों में बाधा उत्पन्न करता है। अधिक खुली हवा के आवागमन के अधिक अनुकूल होने के कारण धोती ही अधिक उपयुक्त है। भारतीय संस्कृति का यही प्रतीक परिधान भी है। जिसका अन्य समय में न सही धार्मिक कृत्यों में तो स्थान बना ही रहना चाहिए।

🔴 शरीर पर धारण किये जाने वाले वस्त्रों में कुर्ता सीधा, सरल, सादगी का प्रतीक एवं सस्ता है। वायु का आगमन निर्वाध रूप से होता रहे ऐसी ही उसकी बनावट है। भारत की सांस्कृतिक पोशाक की दृष्टि से भी कुर्ता ऐसा परिधान है जिसे धार्मिकता एवं सांस्कृतिक एकता के प्रतीक रूप में मान्यता मिल सकती है। वह आसानी से नित्य धोया जा सकने योग्य है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 21 जनवरी 2017

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 31) 22 Jan

🌹 अखण्ड जप करें—अखण्ड यज्ञ नहीं

🔴 वस्तुतः तांत्रिक ‘मख’ रात्रि के सुनसान वातावरण में श्मशान, खण्डहर जैसे वीभत्स स्थानों में करने की विधि-व्यवस्था है। यज्ञ वैदिक होते हैं और ‘मख’ तांत्रिक। मख कृत्यों में अभक्ष और अस्पर्श्य जैसे पदार्थ भी होमे जाते हैं। उनका दृश्य कुरुचिपूर्ण होता है। इसलिए उन्हें अविज्ञात, एकान्त एवं निस्तब्ध वातावरण में सम्पन्न किया जाता है। निशाचरी कृत्य तमोगुणी प्रधान एवं अनैतिक होते हैं। उन्हें गुह्य ही रखा जाता है। प्रकट होने पर विरोध-विग्रह का ही डर रहता है। हिंसा-अहिंसा का भी उसमें ध्यान नहीं रखा जाता है। अतएव होलिका दहन, चिता प्रज्वलन जैसे मख-कृत्यों को छोड़कर रात्रि के समय देव-यज्ञ नहीं किये जाते। प्रचलन फैल जाने के कारण विवाह संस्कार ही इसका अपवाद है। यों उनमें भी गोधुलि बेला का मुहूर्त उत्तम माना गया है।

🔵 अखण्ड-जप रखना ही पर्याप्त है। अखण्ड यज्ञ का अत्युत्साह न दिखाया जाय। घृतदीप और अगरबत्ती जलाते रहने से हवन की संक्षिप्त प्रक्रिया पूरी होती रह सकती है। अखण्ड जप के साथ ही चौबीस घण्टे घृतदीप जलाने और धूपबत्ती प्रज्वलित करने की व्यवस्था बना दी जाय तो प्रकारान्तर से ही अखण्ड यज्ञ की विधि भी भाव दृष्टि से पूरी हो सकती है। यज्ञ दिन में ही किये जायें।

🔴 अखण्ड जप की एक पद्धति 24 घण्टा जप की है। दूसरी सूर्योदय से सूर्यास्त तक जप जारी रखने की भी है। उसे भी अखण्ड संज्ञा दी जानी चाहिए। सविता की उपस्थिति में वाचिक और व्यवस्थित जप ही यदि अभीष्ट हों तो 24 घण्टे के स्थान पर सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक भी सामूहिक जप किया जा सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 30) 21 Jan

🌹 अखण्ड जप करें—अखण्ड यज्ञ नहीं

🔴 गायत्री जयन्ती, गुरु पूर्णिमा, बसन्त पंचमी आदि पर्वों पर अखण्ड गायत्री जप रखा जाता है। जिस समय से आरम्भ करते हैं उसी समय पर समाप्ति भी होती है। 24 घण्टे में प्रायः आधा समय दिन का और आधा रात्रि का होता है। दिन में मन्त्र उच्चारण सहित और रात्रि में मानसिक जप करने की परम्परा है। अखण्ड जप में एक ही विधि रखी जाती है। दिन में एक प्रकार और रात्रि में दूसरी प्रकार नहीं करते। इसलिए पूरा अखण्ड जप मानसिक ही होना उपयुक्त रहता है। इसमें एकरसता बनी रहती है। यों जहां कहीं दिन और रात्रि के अन्तर को ध्यान में रखते हुए वाचिक और मानसिक जप की भिन्नता रखी जा सके वहां वैसा भी हो सकता है। सरलता मानसिक जप में ही रहती है।

🔵 यज्ञ अखण्ड करने का विधान नहीं है। वह नियत समय में ही समाप्त होना चाहिए। यज्ञ का उपयुक्त समय दिन है। दिन में कीड़े-मकोड़े अग्नि में न जा पहुंचें, इसका ध्यान रखा जा सकता है। रात्रि में कृत्रिम प्रकाश उत्पन्न कर लेने पर भी ऐसी स्थिति नहीं बन पड़ती कि छोटे कीड़ों को पूरी तरह देख सकना या रोक सकना सम्भव हो सके। सर्व विदित है कि पतंगों से लेकर छोटे कृमि-कीटक दिन की अपेक्षा रात्रि में ही अपनी गति-विधियां अधिक विस्तृत करते हैं। इसलिए रात्रि में हिंसा की सम्भावना अधिक रहने, सतर्कता कम बन पड़ने की स्थिति को ध्यान में रखते हुए सूर्य की उपस्थिति में ही यज्ञ-कर्म करने की परम्परा है। ऐसे समय में रात्रि के समय भी यज्ञ जारी रखने का औचित्य नहीं है।

🔴 विवाह-शादियां प्रायः रात्रि के समय होने का ही प्रचलन है। उस समय अग्निहोत्र होता है, पर वह अपवाद है। यों विवाह विधि भी शास्त्र परम्परा के अनुसार दिन में ही होनी चाहिए और उसका अग्निहोत्र भाग भी दिन में ही निपटना चाहिए। पर लोगों ने सुविधा का ध्यान रखते हुए रात्रि को फुरसत में विवाह की धूमधाम करने का रास्ता निकाल लिया है। दिन में करने से दिन के अन्य कामों का हर्ज होता है। ऐसे ही कारणों से विवाह जैसे अवसरों पर अपवाद रूप से रात्रि में ही हवन होते हैं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

गुरुवार, 19 जनवरी 2017

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 29)

🌹 एक के द्वारा दूसरे के लिए जप-अनुष्ठान

🔴 जहां तक हो सके अपनी साधना स्वयं ही करनी चाहिए। विपत्ति के समय वह दूसरे से भी कराई जा सकती है। पर उसकी आन्तरिक भावना और बाह्य आचरण प्रक्रिया साधु ब्राह्मण स्तर की ही होनी चाहिए। प्राचीन काल में ऐसे कृत्यों के लिए ब्राह्मण वर्ग के लोगों को महत्व दिया जाता था। उन दिनों के ब्राह्मण—ब्रह्म-तत्व के ज्ञाता—उच्च चरित्र और आचरण-व्यवहार में देवोपम रीति-नीति अपनाने वाले थे। इसलिए उनकी श्रेष्ठता स्वीकार की जाती थी और उन्हें देव कर्मों का उत्तरदायित्व सौंपा जाता था।

🔵 आज वैसे ब्राह्मण मिलने कठिन हैं जो वंश से नहीं गुण-कर्म-स्वभाव की कसौटी पर अपने स्तर के अनुरूप खरे उतरते हों। विशिष्टता न रहने पर विशिष्ट स्तर एवं विशेष अधिकार भी नहीं रहता। आज की स्थिति में ब्राह्मण-अब्राह्मण का अन्तर कर सकना कठिन है। वंश और वेष की प्रभुता प्राचीन काल में भी अमान्य थी और आज भी अमान्य ही रहेगी।

🔴 जहां तक अनुष्ठान का—उससे सम्बन्धित यज्ञादि कर्मों का सम्बन्ध है, उसे स्वयं ही करना सर्वोत्तम है। यदि दूसरे से कराना हो तो वंश-वेष को महत्व न देकर किसी चरित्रवान, निर्लोभ, निष्ठावान, साधक प्रकृति के व्यक्ति से ही उसे कराना चाहिए। ऐसा व्यक्ति किस वंश या कुल का है इसका महत्व नहीं।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 28) 19 Jan

🌹 एक के द्वारा दूसरे के लिए जप-अनुष्ठान

🔴 जिस प्रकार एक व्यक्ति अपने धन-साधनों का अनुदान दूसरे अभाव-ग्रस्तों को दे सकता है, उसी प्रकार उपासना द्वारा अर्जित तप भी दूसरों के निमित्त उदारतापूर्वक किया जाता है। इसी प्रकार तप देने वाला जो कोष खोले होता है वह बदले में मिलने वाले पुण्य से फिर भर जाता है। दानी को पुण्य मिलता है। इस प्रकार वह एक वस्तु देकर बदले में दूसरी प्राप्त कर लेता है और घाटे में नहीं रहता। कष्ट पीड़ितों की व्यथा हरने वाला कोई व्यक्ति सत्प्रयत्नों को सफल बनाने के लिए, अपने जप-तप का दान देता रहे तो उसकी यह परमार्थ परायणता आत्मोन्नति में बाधक नहीं, सहायक ही सिद्ध होगी। वरदान, आशीर्वाद देने की परम्परा यही है। इसमें इतना ही ध्यान रखा जाय कि मात्र औचित्य को ही सहयोग दिया जाय। अनाचार को परिपुष्ट करने के लिए अपनाई गई उदारता भी प्रकारान्तर से स्वयं अनाचार करने की तरह ही पाप कर्म बन जाती है। इसलिए किसी की सहायता करते समय यह ध्यान भी रखना चाहिए कि इस प्रकार की सहायता से अनीति का पक्ष पोषण तो नहीं होता।

🔵 पैसा देकर बदले में कल्याण के निमित्त कराये गये जप, अनुष्ठानों में सफलता तभी मिलती है जब कि फीस पारिश्रमिक के रूप में नहीं वरन् कर्ता ने अनिवार्य निर्वाह के लिए न्यूनतम मात्रा में ही उसे स्वीकार किया हो। व्यवहार या लूट-खसोट की दृष्टि से मनमाना पैसा वसूल करने वाले लालची अनुष्ठान कर्ताओं का प्रयत्न नगण्य परिणाम ही प्रस्तुत कर सकता है।

🔴 अनुष्ठान आदि की विशिष्ट साधनाएं, चाहे स्वयं की गई हों या दूसरे किसी से कराई गई हों, उनमें हर हालत में तपश्चर्या के नियमों का पालन करना आवश्यक है। आहार की सात्विकता—ब्रह्मचर्य पालन—अपनी सेवा आप करना जैसे नियम हर अनुष्ठान कर्ता के लिए आवश्यक हैं, भले ही वह अपने निमित्त किया गया हो या दूसरे के लिए। इन नियमों का पालन न करने पर, मात्र जप-संख्या पूरी करने पर से अनुष्ठान का लाभ नहीं मिलता।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

बुधवार, 18 जनवरी 2017

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 27) 18 Jan

🌹 अनुष्ठान के नियमोपनियम

🔴 अनुष्ठान के दिनों में पांच तप-संयम साधने पड़ते हैं— [1] उपवास [2] ब्रह्मचर्य [3] अपनी सेवा अपने हाथ से [4] भूमिशयन [5] चमड़े का प्रयोग त्याग। अनुष्ठान के दिनों चमड़े के जूते आदि का प्रयोग न किया जाय। प्लास्टिक, रबड़, कपड़ा आदि की बनी वस्तुएं आजकल चमड़े के बजाय हर स्थान पर प्रयुक्त होती हैं। वही किया जाय। भूमि शयन सर्वोत्तम है। सीलन, कीड़े आदि का भय हो तो तख्त पर सोया जा सकता है। हजामत, कपड़े धोना जैसी दैनिक जीवन की शारीरिक आवश्यकताएं नौकरों से न करायें, स्वयं करें। भोजन अपने हाथ से बना सकना सम्भव न हो तो स्त्री, माता, बहिन आदि उन्हीं अति निकटवर्ती स्वजनों के हाथ का बनाया स्वीकार करें, जिनके साथ आत्मीयता का आदान-प्रदान चलता है।

🔵 बाजार से पका हुआ तो नहीं ही खरीदें। ब्रह्मचर्य अनुष्ठान के दिनों में आवश्यक है। शारीरिक ही नहीं मानसिक भी पाला जाना चाहिए। कामुक कुदृष्टि पर नियन्त्रण रखा जाय। सम्पर्क में आने वाली नारियों को माता, बहिन या पुत्रीवत् पवित्र भाव से देखा जाय। यही बात पुरुषों के सम्बन्ध में नारियों पर लागू होती है। पांचवीं तपश्चर्या भोजन की है। यह उपवास काल है। उपवास कई स्तर के होते हैं— [1] छाछ, दूध आदि पेय पदार्थों पर रहना [2] शाक, फल के सहारे काम चलाना [3] नमक, शकर का त्याग अर्थात् अस्वाद [4] एक समय आहार [5] दो खाद्य पदार्थों पर अनुष्ठान की अवधि काटना।

🔴 अनुष्ठान के यही मोटे नियम हैं। इसके अतिरिक्त जो तरह-तरह की बातें कही जाती हैं और परस्पर विरोधी नियम बताये जाते हैं उन पर ध्यान न दिया जाय।

🔵 अनुष्ठान में कोई भूल हो जाने पर, त्रुटि रहने पर भी किसी अनिष्ट की आशंका न करनी चाहिए फिर भी उन दिनों कोई विघ्न उत्पन्न न होने पाये इसके लिए संरक्षण और ज्ञात-अज्ञात में रही हुई त्रुटियों का परिमार्जन करने के लिए अनुष्ठान साधना के लिए कोई समर्थ संरक्षक नियुक्त कर लेना चाहिए। यह सेवा शांतिकुंज हरिद्वार से भी ली जाती है। अनुष्ठान करने वाले व्यक्ति का परिचय तथा समय लिख भेजने से संरक्षण, परिमार्जन सर्वथा निस्वार्थ भाव से होता रहता है। यह व्यवस्था करने पर साधना की सफलता और भी अधिक सुनिश्चित हो जाती है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

सोमवार, 16 जनवरी 2017

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 26) 17 Jan

🌹 अनुष्ठान के नियमोपनियम
🔴 पुरश्चरणों में तर्पण, मार्जन, न्यास, कवच, कीलक, अर्गल आदि के कितने ही विशिष्ट विधान हैं। अनुष्ठानों में इनमें से किसी की भी आवश्यकता नहीं है। जप, हवन के उपरांत ब्रह्मभोज ही पूर्णाहुति का अन्तिम चरण पूरा करने के लिए आवश्यक होता है। यह कार्य ब्राह्मणों या कन्याओं को भोजन कराने के साथ पूरा होता है। सच्चे ब्राह्मण ढूंढ़ पाना अति कठिन है। जो है वे परान्न खाने को तैयार नहीं होते। कन्याओं को मातृशक्ति का प्रतीक मानकर भाव-पवित्रता का संवर्धन करने के लिए भोजन कराया जा सकता है। पर उसमें भी यही व्यवधान आता है।

🔵 स्वाभिमानी अभिभावक इसके लिए तैयार नहीं होते। ढूंढ़ निकाली भी जायें तो दान की प्रतिक्रिया का अनुमान लगाने पर उसका परिणाम भी कुछ उत्साहवर्धक नहीं दीखता। इन परिस्थितियों में ब्रह्मभोज का सही स्वरूप ब्रह्मदान ही सकता है। ब्रह्मदान अर्थात् सद्ज्ञान का दान। यह युग निर्माण द्वारा पूरा हो सकता है। एक-एक आहुति पर एक नया पैसा ब्रह्मदान के लिए निकाला जाय। 240 आहुतियां 24 हजार के अनुष्ठान के लिए देनी है तो 240 पैसे का प्रसार साहित्य भी सत्पात्रों को वितरण करना चाहिए। इससे सद्ज्ञान का बीजारोपण अनेक अन्तःकरणों में होता है और उसका सत्परिणाम पढ़ने और पढ़ाने वाले दोनों को ही समान रूप से मिलता है।

🔴 अनुष्ठान में अधिक अनुशासन पालन करना पड़ता है। जप का समय, संख्या, दैनिक क्रम एक साथ बनाकर चलना पड़ता है। अनिवार्य कारण आ पड़े तो बात दूसरी है अन्यथा उपासना का निर्धारित क्रम आदि से अन्त तक एक रस ही चलते रहना चाहिए। उसमें उलट-पुलट अनिवार्य कारण होने पर ही करना चाहिए और वह भी न्यूनतम मात्रा में।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

रविवार, 15 जनवरी 2017

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 25) 16 Jan

🌹 अनुष्ठान के नियमोपनियम

🔴 साधारण स्तर का जीवनक्रम अपनाकर की गई उपासना नित्य नियम है। अनुष्ठान का स्तर विशेष है—उसके साथ अनेकों प्रतिबन्ध, नियम, विधान जुड़े रहते हैं। अतएव उसका प्रतिफल भी विशेष होता है। पुरश्चरण का विशेष विधि-विधान है। उसमें अनेक प्रयोजनों के लिए अनेक मन्त्रों एवं कृत्यों का प्रयोग करना पड़ता है। वह कर सकना उसे प्रयोजन के लिए, प्रशिक्षित संस्कृतज्ञों के लिए ही सम्भव है। साधारणतया अनुष्ठानों का ही प्रचलन है सर्वसाधारण के लिए वे ही सरल है।

🔵 अनुष्ठान तीन स्तर के हैं। लघु, चौबीस हजार जप का 9 दिन में सम्पन्न होने वाला। मध्यम, सवालक्ष जप का 40 दिन में होने वाला। उच्च, 24 लाख जप का—1 वर्ष में होने वाला। लघु में 27 माला, मध्यम में 33 और उच्च में 66 माला नित्य जपनी होती हैं। औसत एक घंटे में 10-11 माला जप होता है। इस हिसाब से लघु और मध्यम में प्रायः तीन घंटे और उच्च में छह घंटे नित्य लगते हैं। यह क्रम दो या तीन बार में भी थोड़ा-थोड़ा करके पूरा हो सकता है। यों प्रातःकाल का ही समय सर्वोत्तम है। शरीर, वस्त्र, तथा उपकरणों की शुद्धता, षट्कर्म, पंचोपचार, जप, ध्यान, सूर्यार्घदान—यही उपक्रम है। पूजा वेदी पर छोटा जलकलश और अगरबत्ती रखकर (जल, अग्नि की साक्षी मानी जाती है), चित्र, प्रतिमा का पूजन, जल, अक्षत, चन्दन, पुष्प, नैवेद्य से किया जाता है। आवाहन, विसर्जन के लिए आरम्भ और अन्त में गायत्री मंत्र सहित नमस्कार किया जाता है।

🔴 जप के साथ हवन जुड़ा हुआ है। प्राचीन काल में जब हर प्रकार की सुविधा थी तब जप का दशांश हवन किया जाता था। आज की स्थिति में शतांश पर्याप्त है। चौबीस हजार के लिए 240, सवा लक्ष के लिए 1250, चौबीस लक्ष के लिए 24 हजार आहुतियां देनी चाहिए, यह एक परम्परा है। स्थिति के अनुरूप आहुतियों की संख्या न्यूनाधिक भी हो सकती हैं। पर होनी अवश्य चाहिए। अनुष्ठान में जप और हवन दोनों का ही समन्वय है। गायत्री माता और यज्ञ पिता का अविच्छिन्न युग्म है। दो विशिष्ट साधनाओं में दोनों को साथ रखकर मिलाना होता है। हवन हर दिन भी हो सकता है और अन्तिम दिन भी। हर दिन न करना हो तो जितनी माला हों उतनी आहुतियां। अन्तिम दिन करना हो तो समूचे जप का शतांश। यज्ञवेदी पर कई व्यक्ति बैठते हैं तो सम्मिलित आहुतियों की गणना होती है। जैसे हवन पर 5 व्यक्ति बैठे हों तो उनके द्वारा दी गई 100 आहुतियां 500 मानी जायेंगी। 240 आहुतियों के लिए 6 व्यक्ति एक साथ बैठकर हवन करें तो 40 बार आहुतियां प्रदान से ही वह संख्या पूरी हो जायगी।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 14 जनवरी 2017

👉 गायत्री विषयक शंका समाधान (भाग 24) 15 Jan

🌹 अशौच में प्रतिबंध

🔴 तिल को ताड़ बनाने की आवश्यकता नहीं है। कारण और निवारण का बुद्धिसंगत ताल-मेल विवेकपूर्वक बिठाने में ही औचित्य है। शरीर के कतिपय अंग द्रवमल विसर्जन करते रहते हैं। पसीना, मूत्र, नाक, आंख आदि के छिद्रों से निकलने वाले द्रव भी प्रायः उसी स्तर के हैं जैसा कि ऋतुस्राव। चोट लगने पर भी रक्त निकलता रहता है। फोड़े फूटने आदि से भी प्रायः वैसी ही स्थिति होती है। इन अवसरों पर स्वच्छता के आवश्यक नियमों का ध्यान रखा जाना चाहिए। बात का बतंगड़ बना देना अनावश्यक है।

🔵 प्रथा-प्रचलनों में कई आवश्यक हैं कई अनावश्यक। कइयों को कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए और कइयों की उपेक्षा की जानी चाहिए। सूतक और अशुद्धि के प्रश्न को उसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए जिससे कि प्रचलन कर्ताओं ने उसे आरम्भ किया था। उनका उद्देश्य उपासना जैसे आध्यात्मिक नित्यकर्म से किसी को विरत, वंचित करना नहीं वरन् यह था कि अशुद्धता सीमित रहे, उसे फैलने का अवसर न मिले। आज भी जहां अशौच का वातावरण है वहीं सूतक माना जाय और शरीर से किये जाने वाले कृत्यों पर ही कोई रोकथाम की जाय। मन से उपासना करने पर तो कोई स्थिति बाधक नहीं हो सकती। इसलिए नित्य की उपासना मानसिक रूप से जारी रखी जा सकती है। पूजा-उपकरणों का स्पर्श न करना हो तो न भी करे।

🔴 यदि सूतक या अशौच के दिनों में अनुष्ठान चल रहा हो तो उसे उतने दिन के लिए बीच में बन्द करके, निवृत्ति के बाद, जिस गणना से छोड़ा था, वहीं से फिर आरम्भ किया जा सकता है। बिना माला का मानसिक जप-ध्यान किसी भी स्थिति में करते रहा जा सकता है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 परमार्थ की उपेक्षा न करें ( भाग 2)

पुण्य परमार्थ की इस आवश्यकता को प्रायः सज्जन व्यक्ति अनुभव करते हैं। किन्तु उसको कार्यान्वित करने में प्रमाद बरतते हैं। इस प्रमाद का व्यवहार...