सोमवार, 11 सितंबर 2017

👉 "फर्क"

🔴 मधू को घर से मां का फोन आया कि कब घर आ रही हे तेरे पापा रोज गली कोई मोड़ पर खडे तेरी राह देखते हे तूने ही कहा था दो तीन दिन मे आउंगी, तेरा भाई अपनी 4 महीने की बेटी का नाम नही रखने देता कहता हैं ये हक उसकी बुआ का हे जब आएगी वही रखेगी मेरी इस चूहिया का नाम।

🔵 आ जा मेरी बेटी तुझे देखे पूरा एक साल हो गया, जल्दी आउंगी कहते कहते पूरा साल निकाल दिया तूने, मधू आँखों मे आँसू लिए,- हाँ मां जल्दी आउंगी तभी सास कि आवाज आई तो बोली अच्छा मां बाद मे बात करती हूँ, फिर फोन रखकर सासू मां से बोली- मम्मी अभी मां का फोन आया था पूछ रही थी कब आ रही है चली जाऊँ 4 ,5 दिनो के लिए, सास - कोई जरूरत नही अब इस उम्र मे मुझसे चूल्हा चौका नही होता,कौन खिलाएगा तेरे आदमी को ओर हमें, घर का साफ सफाई कौन देखेगा, मेरी ओर इनकी दवाओं का खयाल कौन रखेगा, ना भैया मना कर दे इस बार कोई जरूरत नही जाने की।

🔴 रात को पति से मधू - सुनिए मां पापा भैया, ओर उस चूहिया को देखने का मन हे कुछ दिनो के लिए मायके हो आऊं, पति- क्यों अभी पिछले साल ही तो गई थी ओर यहाँ का काम कौन देखेगा सब वैसे भी शादी के बाद लडकी का घर पति का घर होता हे चुपचाप यही रहो, मगर मधू बोली, कोई बहस नहीं, पति बोला, रात भर अपने मम्मी पापा, भैया भाभी ओर अपनी भतीजी के ले सुबुकती रही, कुछ दिन बाद मधू की ननद आई सास ससुर को मानो खजाना मिल गया।

🔵 पति देव बच्चो से खेलते रहते, घर का सारा काम सिर्फ मधू पर आखिर ननद आई हे घर की बेटी, पूरे 15 दिनो बाद ननद के जाने पर, सास बोली- ऐसे ही आते रहा कर थोड़े थोड़े दिनो पे बोलती हे तो बोलने दिया कर बुढिया को मेरी फूल सी बेटी को नौकरानी बनाकर रखा है पति को काबू मे रखा कर नही तो मुझे बता मे तेरे पापा ओर भाई के साथ ठीक कर दूंगी ओर खाती पीती रहा कर, कितनी दुबली हो गई, कुछ काम बुढिया से भी करवाया कर मोटी भैंस बैठ बैठकर हुक्म चलाती है ननद के विदा हो जाने के बाद मधू सोच रही थी आखिर बेटी बेटी होती है ओर बहु, आखिर बहु,ऐसा क्यों?

🔴 समाज का एक चेहरा ऐसा भी है सचमुच कुछ लोग बहू को सिर्फ नौकरानी कि तरह एक मशीन की तरह घर मे रखना चाहते है मगर बात वही बेटी से जुडी हो तो खयालात बदल जाते है।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 11 Sep 2017


👉 आज का सद्चिंतन 11 Sep 2017


👉 दृष्टिकोण का अन्तर

🔵 बाहर की परिस्थितियों में अपने अपने दृष्टिकोण के कारण भिन्न भिन्न प्रकार की अनुभूतियाँ होती है। एक भिखारी को देखकर किसी के मन में दया उपजती है और उसकी यथाशक्ति सहायता करता है। किन्तु दूसरा उसे निकम्मा और आलसी मानकर घृणा करता है। सहायता करना उसके निकम्मेपन को बढ़ाने वाला मानकर अनुचित समझता है। कोई दूसरा उसे दे रहा हो तो उसे भी रोकता है। यह भिन्न प्रकार की अनुभूतियाँ भिन्न दृष्टिकोणों के कारण ही है। बुद्धि बेचारी तो खरीदे हुए गुलाम की तरह है, उसे भावनाओं की हाँ में हाँ मिलानी पड़ती है। भाग्य के सताये हुए भिक्षुक की सहायता करना सहृदय और मानवता की पुकार है, इस आदर्श के पक्ष में बुद्धि के द्वारा बहुत कुछ कहा जा सकता है।

🔴 इसी प्रकार निकम्मे लोगों की गति विधियों पर अंकुश लगाने के लिए उन्हें अपनी गतिविधियाँ छोड़ने के लिए बाध्य करने के पक्ष में भी बहुत कुछ मसाला बुद्धि के पास निकल आयेगा। अन्तिम निर्णय कैसे हो, दोनों से कौन सा पक्ष सही है, इसका निष्कर्ष निकालना सरल नहीं है। वह भिखारी वस्तुतः भीख माँगने के लिए मजबूर था या निकम्मा था? दूसरा निर्णय क्षण भर में उसकी शक्ल देखने मात्र से नहीं हो सकता। इसके लिए उनकी परिस्थितियों को समझने के लिए गहराई तक जाना होगा और बहुत खोज बीन करनी पड़ेगी। इतना अवकाश न होने पर वास्तविकता तक पहुँचना कठिन है।

🔵 वास्तविकता के समुचित जानकर न होते हुए भी एक भिखारी के सम्बन्ध में दो मनुष्यों ने दो अलग अलग प्रकार के जो निष्कर्ष निकाले और अलग अलग प्रकार के व्यवहार किये उसमें उनकी मान्यता और भावना ही प्रधान कारण थी। आमतौर से होता यही है कि अपने दृष्टिकोण के अनुसार ही संसार के पदार्थों की, परिस्थितियों की तथा व्यक्तियों की परख की जाती है और उसी के आधार पर उन्हें भला या बुरा माना जाता है। यों हर वस्तु में गुण और अवगुण, भलाई और बुराई, उपयोगिता और अनुपयोगिता को न्यूनाधिक मात्रा मौजूद है और उसका विश्लेषण तार्किक बुद्धि से हो भी सकता है, पर आम तौर से दूसरों के विषय में जो अभिमत प्रकट किए जाते है उनमें अपना दृष्टिकोण ही प्रधान कारण होता है। उसी के आधार पर हम दूसरों को भला या बुरा समझते है और तदनुसार ही घृणा, उपेक्षा, सहानुभूति या प्रेम का व्यवहार करते है।

🌹 अखण्ड ज्योति मई 1961
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1961/May/v1.24

👉 पितरों को श्रद्धा दें, वे शक्ति देंगे

🔵 मरने के बाद क्या होता है? इस प्रश्न के उत्तर में विभिन्न धर्मों में विभिन्न प्रकार की मान्यताएं हैं। हिन्दूधर्म शास्त्रों में भी कितने ही प्रकार से परलोक की स्थिति और वहां आत्माओं के निवास का वर्णन किया है। इन मत भिन्नताओं के कारण सामान्य मनुष्य का चित्त भ्रम में पड़ता है कि इन परस्पर विरोधी प्रतिपादनों में क्या सत्य है क्या असत्य?

🔴 इतने पर भी एक तथ्य नितान्त सत्य है कि मरने के बाद भी जीवात्मा का अस्तित्व समाप्त नहीं हो जाता वरन् वह किसी न किसी रूप में बना ही रहता है। मरने के बाद पुनर्जन्म के अनेकों प्रमाण इस आधार पर बने रहते हैं कि कितने ही बच्चे अपने पूर्व जन्म के स्थानों सम्बन्धियों और घटनाक्रमों का ऐसा परिचय देते हैं जिन्हें यथार्थता की कसौटी पर कसने में यह विवरण सत्य ही सिद्ध होता है। अपने पूर्व जन्म से बहुत दूर किसी स्थान पर जन्मे बच्चे का पूर्व जन्म के ऐसे विवरण बताने लगना, जो परीक्षा करने पर सही निकलें, इस बात का प्रमाण बताता है कि मरने के बाद पुनः जन्म भी होता है।

🔵 मरण और पुनर्जन्म के बीच के समय में जो समय रहता है उसमें जीवात्मा क्या करता है? कहां रहता है? आदि प्रश्नों के सम्बन्ध में भी विभिन्न प्रकार के उत्तर हैं पर उनमें भी एक बात सही प्रतीत होती है कि उस अवधि में उसे अशरीरी किन्तु अपना मानवी अस्तित्व बनाये हुए रहना पड़ता है। जीवन मुक्त आत्माओं की बात दूसरी है। वे नाटक की तरह जीवन का खेल खेलती हैं और अभीष्ट उद्देश्य पूरा करने के उपरान्त पुनः अपने लोग को लौट जाती हैं।

🔴 इन्हें वस्तुओं, स्मृतियों, घटनाओं एवं व्यक्तिओं का न तो मोह होता है और न उनकी कोई छाप इन पर रहती है। किन्तु सामान्य आत्माओं के बारे में यह बात नहीं है। वे अपनी अतृप्त कामनाओं, विछोह, संवेदनाओं, राग-द्वेष की प्रतिक्रियाओं से उद्विग्न रहती हैं। फलतः मरने से पूर्व वाले जन्मकाल की स्मृति उन पर छाई रहती है और अपनी अतृप्त अभिलाषाओं को पूर्ण करने के लिए ताना-बाना बुनती रहती हैं। पूर्ण शरीर न होने से वे कुछ अधिक तो नहीं कर सकतीं, पर सूक्ष्म शरीर से भी वे जिस-तिस को अपना परिचय देती हैं। इस स्तर की आत्माएं भूत कहलाती हैं। वे दूसरों को डराती या दबाव देकर अपनी अतृप्त अभिलाषाएं पूरी करने को सहायता करने के लिए बाधित करती हैं।

🔵 भूतों के अनुभव प्रायः डरावने और हानिकारक ही होते हैं। पर जो आत्माएं भिन्न प्रकृति की होती हैं, वे डराने, उपद्रव करने से विरत ही रहती हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति भवन में समय-समय पर जिन पितरों के अस्तित्व अनुभव में आते रहते हैं उनके आधार पर यह मान्यता बन गई है कि वहां पिछले कई राष्ट्रपतियों की प्रेतात्माएं डेरा डाले पड़ी हैं। इनमें अधिक बार अपने अस्तित्व का परिचय देने वाली आत्मा अब्राहमलिंकन की है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/pitaron_ko_shraddha_den_ve_shakti_denge/v1.1

👉 आत्मचिंतन के क्षण 11 Sep 2017

🔵 शक्ति धारण करने का सिद्धान्त यह है कि एक ओर विविध साधनों से उसे प्राप्त करें और दूसरी ओर से अपव्यय को रोक दें। धन अर्जित करना हो तो किसी उद्यम रोजगार से उसे प्राप्त करते हैं और मितव्ययी बनते हैं। दोनों क्रियाओं के सम्मिश्रण से धनवान बनना सरल हो जाता है। किसी बड़े बर्तन में पानी भरना चाहते हों और उसके छिद्र बन्द न करें तो पानी देर तक टिका न रहेगा। यह सिद्धान्त जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में लागू होता है। एक क्रिया रचनात्मक होती है, दूसरी में निषेध का बर्ताव करना होता है, तभी कुछ सफलता प्राप्त की जा सकती है। समाज में प्रतिष्ठावान् बनने के लिए यह जरूरी है कि अधिक से अधिक सद्गुणों का विकास करें और दूसरों के साथ दुर्व्यवहार तथा असम्मान का आचरण न करें।

🔴 आत्मबुद्धि एवं आत्म विकास का कार्य नियमपूर्वक चलाने के लिए साथ-साथ संयमित जीवनचर्या भी परमावश्यक है। रेलगाड़ी के चलाने के लिए पहले भाप को एकत्रित करते हैं और सावधानी से उसे ‘पिस्टन’ तक पहुँचाते हैं। यह शक्ति यदि इधर-उधर विश्रृंखलित हो जाय, तो बेचारा इंजन रेलगाड़ी को खींचने की असमर्थता ही प्रकट करेगा। आत्मा की सान्निध्यता में पहुँच कर हम जिस शक्ति की कल्पना करते हैं, वह भी ठीक इसी प्रकार है। अपनी सम्पूर्ण चेष्टाओं को केन्द्रीभूत करना पड़ता है। इस सामूहिक शक्ति को जीवन के जिस क्षेत्र, जिस कार्य में लगा देते हैं, वहीं महत्वपूर्ण सफलता के दर्शन होने लगते हैं।

🔵 शक्ति के इस अपव्यय को रोकने का नाम ही ‘संयम’ है। किसी वस्तु को प्राप्त करना निस्संदेह कठिन व महत्वपूर्ण बात है, किन्तु संग्रहीत वस्तु को सुरक्षित बनाये रखना उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। संग्रह और त्याग की दोनों क्रियाएं साथ-साथ चलती रहें तो कहीं भी शक्ति एकत्रित न होगी। शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक दृष्टि से शक्तिवान बनने का एक ही तरीका है कि इनकी क्रिया शक्ति का दुरुपयोग न हो, तभी मनोवाँछित ध्येय सिद्धि या सफलता मिल सकती है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 हमारा युग निर्माण सत्संकल्प (भाग 64)

🌹  मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है, इस विश्वास के आधार पर हमारी मान्यता है कि हम उत्कृष्ट बनेंगे और दूसरों को श्रेष्ठ बनाएँगे, तो युग अवश्य बदलेगा

🔴 परिस्थितियों का हमारे ऊपर बड़ा प्रभाव पड़ता है। आस-पास का जैसा वातावरण होता है, वैसा बनने और करने के लिए मनोभूमि का रुझान होता है और साधारण स्थिति के लोग उन परिस्थितियों के साँचे में ढल जाते हैं। घटनाएँ हमें प्रभावित करती हैं, व्यक्ति का प्रभाव अपने ऊपर पड़ता है। इतना होते हुए भी यह मानना पड़ेगा कि सबसे अधिक प्रभाव अपने विश्वासों का ही अपने ऊपर पड़ता है। परिस्थितियाँ किसी को तभी प्रभावित कर सकती हैं, जब मनुष्य उनके आगे सिर झुका दे। यदि उनके दबाव को अस्वीकार कर दिया जाए तो फिर कोई परिस्थिति किसी मनुष्य को अपने दबाव में देर तक नहीं रख सकती। विश्वासों की तुलना में परिस्थितियों को प्रभाव निश्चय ही नगण्य है।
 
🔵 कहते हैं कि भाग्य की रचना ब्रह्मा जी करते हैं। सुना जाता है कि कर्म-रेखाएँ जन्म से पहले ही लिख दी जाती हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि तकदीर के आगे तदवीर की नहीं चलती। ये किंवदंतियाँ एक सीमा तक ही सच हो सकती हैं। जन्म से अंधा, अपंग उत्पन्न हुआ या अशक्त, अविकसित व्यक्ति ऐसी विपत्ति सामने आ खड़ी होती है, जिससे बच सकना या रोका जा सकना अपने वश में नहीं होता। अग्निकाण्ड, भूकम्प, युद्ध, महामारी, अकाल-मृत्यु दुर्भिक्ष, रेल, मोटर आदि का पलट जाना, चोरी, डकैती आदि के कई अवसर ऐसे आ जाते हैं और ऐसी विपत्ति सामने आ खड़ी होती है, जिससे बच सकना या रोका जा सकना अपने वश में नहीं होता।

🔴 ऐसी कुछ घटनाओं के बारे में भाग्य या होतव्यता की बात मानकर संतोष किया जाता है। पीड़ित मनुष्य के आंतरिक विक्षोभ को शांत करने के लिए भाग्यवाद की तड़पन दूर करने के लिए डॉक्टर लोग नींद की गोली खिला देते हैं , मर्फिया का इंजेक्शन लगा देते हैं, कोकीन आदि की फुरहरी लगाकर पीड़ित स्थान को सुन्न कर देते हैं। ये विशेष परिस्थितियों के विशेष उपचार हैं। यदा-कदा ही ऐसी बात होती है, इसलिए इन्हें अपवाद ही कहा जाएगा।
 
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v1.96

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.17

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 139)

🌹  स्थूल का सूक्ष्म शरीर में परिवर्तन सूक्ष्मीकरण

🔵 सूक्ष्म शरीर धारियों का वर्णन और विवरण पुरातन ग्रंथों में विस्तार पूर्वक मिलता है। यक्ष और युधिष्ठिर के मध्य विग्रह तथा विवाद का महाभारत में विस्तार पूर्वक वर्णन है। यक्ष, गंधर्व, ब्रह्मराक्षस जैसे कई वर्ग सूक्ष्म शरीर धारियों के थे। विक्रमादित्य के साथ पाँच ‘‘वीर’’ रहते थे। शिवजी के गण ‘‘वीरभद्र’’ कहलाते थे। भूत-प्रेत, जिंद, मसानों की अलग ही बिरादरी थी। ‘‘अल्लादीन का चिराग’’ जिनने पढ़ा है उन्हें इस समुदाय की गतिविधियों की जानकारी होगी। छाया पुरुष द्वारा साधना में अपने निज के शरीर से ही एक अतिरिक्त सत्ता गढ़ ली जाती है और वह एक समर्थ साथी सहयोगी जैसा काम करती है।

🔴 इन सूक्ष्म शरीर धारियों में अधिकांश का उल्लेख हानिकारक या नैतिक दृष्टि से हेय स्तर पर हुआ है। सम्भव है उन दिनों अतृप्त विक्षुब्ध स्तर के योद्धा रणभूमि में मरने के उपरांत ऐसे ही कुछ हो जाते रहे हों। उन दिनों युद्धों की मार-काट ही सर्वत्र संव्याप्त थी, साथ ही सूक्ष्म शरीरधारी देवर्षियों का भी कम उल्लेख नहीं है। राजर्षि और ब्रह्मर्षि तो स्थूल शरीरधारी ही होते थे, पर जिनकी गति सूक्ष्म शरीर में भी काम करती थी, वे देवर्षि कहलाते थे। वे वायुभूत होकर विचरण करते थे। लोक-लोकांतरों में जा सकते थे। जहाँ आवश्यकता अनुभव करते थे, वहाँ भक्तजनों का मार्गदर्शन करने के लिए अनायास ही जा पहुँचते थे।

🔵 ऋषियों में से अन्य कइयों के भी ऐसे उल्लेख मिलते हैं। वे समय-समय पर धैर्य देने, मार्गदर्शन करने या जहाँ आवश्यकता समझी है, वहाँ पहुँचे, प्रकट हुए हैं। पैरों से चलकर जाना नहीं पड़ा है। अभी भी हिमालय के कई यात्री ऐसा विवरण सुनाते हैं कि वह राह भटक जाने पर कोई उन्हें उपयुक्त स्थल तक छोड़कर चला गया। कइयों ने किन्हीं गुफाओं में, शिखरों पर अदृश्य योगियों को दृश्य तथा दृश्य को अदृश्य होते देखा है। तिब्बत के लामाओं की ऐसी कितनी ही कथा गाथाएँ सुनी गई हैं। थियोसोफिकल सोसायटी की मान्यता है कि अभी हिमालय के ध्रुव केंद्र पर एक ऐसी मण्डली है, जो विश्व शान्ति में योगदान करती है, इसे उन्होंने ‘‘अदृश्य सहायक’’ नाम दिया है।

🔴 यहाँ स्मरण रखने योग्य बात यह है कि यह देवर्षि समुदाय भी मनुष्यों का ही एक विकसित वर्ग है। योगियों, सिद्ध पुरुषों और महामानवों की तरह वह सेवा-सहायता में दूसरों की अपेक्षा अधिक समर्थ पाया जाता है, पर यह मान बैठना गलती होगी कि वे सर्व समर्थ हैं और किसी की भी मनोकामना को तत्काल पूरी कर सकते हैं, या अमोघ वरदान दे सकते हैं। कर्मफल की वरिष्ठता सर्वोपरि है, उसे भगवान् ही घटा या मिटा सकते हैं। मनुष्य की सामर्थ्य से वह बाहर है। जिस प्रकार बीमार की चिकित्सक, विपत्तिग्रस्त की धनी सहायता कर सकता है, ठीक उसी प्रकार सूक्ष्म शरीरधारी देवर्षि भी समय-समय पर सत्कर्मों के निमित्त बुलाने पर अथवा बिना बुलाए भी सहायता के लिए दौड़ते हैं। इससे बहुत लाभ भी मिलता है। इतने पर भी किसी को यह नहीं मान बैठना चाहिए कि पुरुषार्थ की आवश्यकता नहीं रही, या उनके आड़े आते ही निश्चित सफलता मिल गई। ऐसा रहा होता तो लोग उन्हीं का आसरा लेकर निश्चिंत हो जाते और फिर निजी पुरुषार्थ की आवश्यकता न समझते। निजी कर्मफल आड़े आने परिस्थितियों के बाधक होने की बात को ध्यान में ही न रखते।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.156

http://literature.awgp.org/book/ikkeesaveen_sadee_ka_sanvidhan/v2.17

👉 Could have done, but didn’t

🔴 Ravan and Vibhishan were real brothers born in the same family; both of them were wise and brave fighters. One chose his path different and the other chose to fight against lawlessness and the wrong. God has given humans the power to change the direction of the tide so that he can become his assistant.

🔵 God has also given the will of asking boons. Ravan was Shiva’s devotee. He asked that he become powerful but also that he would die from the hands of a man. To end his tyranny, God himself had to take birth in the form of Ram. Shiva worshiped Ram. If the master of unusual powers and a wise man such as Ravan did not want to take the right guidance from Shiva, then his end is imminent. God has given the free will to humans.

🔴 Living beings come on earth as pure water drops. On coming to earth, the water drop becomes mud; likewise the humans become disillusioned by Maya. It is up to the human to either lie in the mud or be in the ocean and expanding his consciousness become the clouds and showers his services over the society.

🔵 God wouldn’t have even thought that human will chose the wrong path due to his free will. As far as other living beings are concerned they just follow the discipline laid out by God and live a natural life style. They are just confined to activities of eating, sleeping and mating. But most people are seen to follow such lifestyles, exhibit short sightedness and ultimately suffer and repent. This can be compared to a fly jumping into sweet syrup.

🔴 A fly jumps into a bowl of sweet syrup to finish it off at once and gets trapped and kills itself. Whereas a wise fly sits at the corner, tastes it, fills its stomach and flies into the air. This restlessness causes man to go for quick results and doesn’t let him wait for the right duration, which if he had otherwise waited for, would have easily got the results.

🔵 A fish only sees the bait. It doesn’t have the patience to find out whether there is some danger in it. The allurement of getting the food without any effort is so strong that it can hardly resist. The result doesn’t take long to come. The pin sticks in its intestines and finally gets removed after taking its life.

🌹 From Pragya Puran

👉 Only Determination Leads Your Rise. (Last Part)

🔵 Strong, should be the determination of man. Very this after all is the life-line of spirituality. If no power of determination is there then, if no courage is there then the man becomes a rolling stone and keeps coloring spirituality to match his comfort, in absence of knowledge of the real colour of it. Determination or a determined mind leads a man to cover half the distance.
 
🔴 The power of determination is just like a cudgel that helps you do not fall but provides you needed courage to proceed ahead and rise in your life. You too must chart out some self-discipline in order to grow your will-power or power of determination. You must start with some such jobs in fields of celibacy, food-habits, time-donation and money-donation to reflect that you have done for what you had determined. It will boost your confidence level. This is how will-power can further be strengthened.
 
🔵 Nothing in the world is superior to force of determination that may lead a man to induce his personality, intellect and character. It makes it essential to grow your will-power that you start with small legs of it for short durations that you will not do that unless you do this. For example no sleep without having few pages of a particular book read, no breakfast without having the morning session of BHAJAN completed. What is this? This is a kind of outside discipline attached with a particular job just to accelerate the growth of your will power.

🔴 Vow and determination are the most precious elements in human life. Please, do like that. Finished, today’s session.

🌹 Finish
🌹 Pt Shriram Sharma Aachrya

👉 अपना अपना भाग्‍य

एक राजा के तीन पुत्रियाँ थीं और तीनों बडी ही समझदार थी। वे तीनो राजमहल मे बडे आराम से रहती थी। एक दिन राजा अपनी तीनों पुत्रियों सहित भोज...