बुधवार, 17 जून 2020

👉 नारी सम्बन्धी अतिवाद को अब तो विराम दें (भाग ४)

इसी प्रकार अध्यात्मवाद के नाम पर नारी तिरस्कार और बहिष्कार की बेवक्त शहनाई बन्द कर देनी चाहिए। जिन भगवान की हम उपासना करते है और जिनसे स्वर्ग मुक्ति सिद्धि माँगते हैं वे स्वयं सपत्नीक हैं। एकाकी भगवान एक भी नहीं। राम, कृष्ण, शिव, विष्णु आदि किसी भी देवता को लें सभी विवाहित हैं। सरस्वती, लक्ष्मी, काली जैसी देवियों तक को दाम्पत्य जीवन स्वीकार रहा है। हर भगवान और हर देवता के साथ उनकी पत्नियाँ विराजमान है फिर उनके मनों को अपने इष्ट देवों से भी आगे निकल जाने की बात क्यों सोचनी चाहिए?
 
सप्त ऋषियों में सातों के सातों विवाहित थे और उनके साधना काल की तपश्चर्या अवधि में भी पत्नियाँ उनके साथ रही। इससे उनके कार्य में बाधा रत्ती भर नहीं पहुँची, वरन् सहायता ही मिली। प्राचीन काल में जब विवेकपूर्ण आध्यात्म जीवित था तब कोई सोच भी नहीं सकता था कि आत्मिक प्रगति में नारी के कारण कोई बाधा उत्पन्न होगी।
 
रामकृष्ण परमहंस को विवाह की आवश्यकता अनुभव हुई और उनने उस व्यवस्था को तब जुटाया जब वे आत्मिक प्रगति के ऊँचे स्तर पर पहुँच चुके थे। काम सेवन और नारी सान्निध्य एक बात नहीं है। इसके अन्तर को भली- भाँति समझा जाना चाहिए। योगी अरविन्द घोष की साधना का स्तर कितना ऊँचा था, उसमें सन्देह करने की कोई गुंजायश नहीं है। उनके एकाकी जीवन की पूरी- पूरी साज सँभाल माताजी करती रही। इस सम्पर्क से दोनों की आत्मिक महत्ता बढ़ी ही घटी नहीं। प्रातः स्मरणीय माताजी ने अरविन्द के सम्पर्क से भारी प्रकाश पाया और योगिराज को यह सान्निध्य गंगा के समान पुण्य फलदायक सिद्ध हुआ। प्राचीन काल का ऋषि इतिहास तो आदि से अन्त तक इस सरल स्वाभाविक की सिद्धि करता चला आया है। तपस्वी ऋषि सपत्नीक स्थिति में रहते थे। जब जरूरत पड़ती प्रजनन की व्यवस्था बनाते अन्यथा आजीवन ब्रह्मचारी रहकर भी नारी सान्निध्य की व्यवस्था बनाये रखते। यह उनके विवेक पर निर्भर रहता था, प्रतिबन्ध जैसा कुछ नहीं था। यह स्थिति आज भी उपयोगी रह सकती है। सन्त लोग अपना व्यक्तिगत जीवन विवाहित या अविवाहित जैसा भी चाहें बिताये पर कम से कम उन्हें इस अतिवाद का ढिंढोरा पीटना तो बन्द ही कर देना चाहिए, जिसके अनुसार नारी को नरक की खान कहा जाता है। यदि ऐसा वस्तुतः होता तो गाँधी जी जैसे सन्त नारी त्याग की बात सोचते। कोई अधिक सेवा सुविधा की दृष्टि से या उत्तरदायित्व हलके रखने की दृष्टि से अविवाहित रहे, तो यह उसका व्यक्तिगत निर्णय है। इससे यह सिद्ध नहीं होता कि ये भी कोई प्रतिबन्ध हो सकता है या होना चाहिए। सच तो यह है कि सन्त लोग यदि सपत्नीक सेवा कार्य में जुटें, तो वे अपना आदर्श लोगों के सामने प्रस्तुत करके उच्च स्तरीय गृहस्थ जीवन की सम्भावना प्रत्यक्ष प्रमाण की तरह प्रस्तुत कर सकते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य