मंगलवार, 30 अगस्त 2016

👉 समाधि के सोपान (भाग 28) (In The Hours Of Meditation)


और मेरी आत्मा में ये शब्द आये:-

🔴 मैं सर्वदा तुम्हारे पास हूँ। जब तुम्हारे पापों के जाल कसने लगें तथा गहन अंधकार में कष्ट पा रहे होओ तब यह जान रखो कि वहाँ मैं भी तुम्हारे साथ तुम्हारे महापराधों के कष्टों को भोगने में सहभागी हूँ। तुम्हारी अन्तरात्मा के कार्यों को भली भाँति जानने के कारण मैं तुम्हारी अन्तरात्मा के संबंध में सजग हूँ। मैं, जो सर्वव्यापी हूँ उससे तुम कुछ भी नहीं छिपा सकते, अपने गोपन विचारों का अत्यल्प अंश भी नहीं। मैं तुम में हूँ। मैं तुम्हें भली भाँति जानता हूँ। मेरे बिना न तो तुम हिल ही सकते हो, न ही साँस ले सकते हो। स्मरण रखो मैं तुम्हारी आत्मा हूँ। तुम जहाँ जाते हो वहाँ मैं जाता हूँ तुम जहाँ रुकते हो वहाँ मैं रुकता हूँ। आओ मेरे हृदय से अपना हृदय मिला लो, उसे अपना बना लो, तब सब ठीक हो जायेगा। हारी हृदय- गुहा की छाया और शांति में मेरा निवास है।

🔵 अब जाओ संसार में निकल पड़ो और मेरी वाणी का इतना व्यापक प्रचार करो जितना व्यापक कि आत्मा है, क्योंकि वही उसका जीवन है। मेरा सर्वसमन्वित प्रेम तथा आशीर्वाद सदैव तुम्हारे साथ है। तुम्हारे प्रति मेरा प्रेम माँ के प्रेम के समान है। जैसा एक कबूतरी का प्रेम अपने नवजात बच्वों के लिए होता है, वैसा ही प्रेम मेरा तुम्हारे प्रति है। जब कष्ट आते हैं या विपत्तियाँ तुम्हें भयभीत करती हैं तब स्मरण रखना कि मैं तुम्हारा सहायक हूँ। तुम्हारी आत्मा का प्रेमी हूँ।  

🔴 जब ये शब्द समाप्त हुए तब मैंने समझ लिया कि यह गुरुदेव की वाणी थी जिसने मेरे सभी पापों को धो दिया था और तब मैं कह उठा- मेरे प्रभु के सान्निध्य में, उनसे ऐक्यबोध में ध्यानानन्द की कितनी तीव्रता होती है यह मेरा हृदय जानता हैं। अहो! उन दिव्य ईश्वरीय विचारों का प्रवाह कितना मधुर है! और ऋषियों के साथ मैं भी स्वयं से कह उठा! सच्चिदानन्द - सागर में कूदपड़ो! ओ मूर्ख, ईश्वर- सागर में कूद पडो!

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 आत्मचिंतन के क्षण 31 AUG 2016


🔴 ‘खाली मस्तिष्क शैतान की दुकान’ की कहावत सोलह आने सच है। जो फालतू बैठा रहेगा, उसके मस्तिष्क में अनावश्यक और अवांछनीय बातें घूमती रहेंगी और कुछ न कुछ अनुचित, अनुपयुक्त करने तथा उद्विग्न, संत्रस्त रहने की विपत्तियाँ मोल लेगा। लेकिन जो व्यस्त है, उसे बेकार की बातें सोचने की फुरसत ही नहीं, गहरी नींद भी उसी को आती है, कुसंग और दुर्व्यसनों से भी वही बचा रहता है। जो मेहनत से कमाता है, उसे फिजूलखर्ची भी नहीं सूझती। इस प्रकार परिश्रमी व्यक्ति अनेक दोष-दुर्गुणों से बच जाता है।

🔵 विश्वास  रखिए दुःख का अपना कोई मूल अस्तित्व नहीं होता। इसका अस्तित्व मनुष्य का मानसिक स्तर ही होता है। यदि मानसिक स्तर योग्य और अनुकूल है तो दुःख की  अनुभूति या तो होगी ही नहीं और यदि होगी तो बहुत क्षीण। तथापि, यदि आपको दुःख की अनुभूति सत्य प्रतीत होती है, तब भी उसका अमोघ उपाय यह है कि उसके विरुद्ध अपनी आशा, साहस और उत्साह के प्रदीप जलाये रखे जायें। अंधकार के  तिरोधान और प्रकाश के अस्तित्व से बहुत से अकारण भय हो जाता है।

🔴 दूसरों के प्रति बैर भाव रखने से मानस क्षेत्र में उत्तेजना और असंतुलन उत्पन्न हो जाता है। हम जिन व्यक्तियों को शत्रु मानते हुए उनसे घृणा करते हैं, उन्हें याद कर अपने ऊपर हावी कर लेते हैं। गुप्त मन में उन वस्तुओं, व्यक्तियों या शत्रुओं के प्रति भय बना रहता है। मानसिक जगत् में निरन्तर बैर और शत्रुता का भाव बना रहने से हमारे स्वास्थ्य पर दूषित प्रभाव पड़ता है। शत्रु भाव हमारी भूख बंद कर देता है-नींद हराम कर देता है। फल यह होता है कि हमारा स्वास्थ्य और प्रसन्नता सदा के लिए नष्ट हो जाते हैं। हम जीवित रहकर भी दुर्भावनाओं के कारण नरक की यातनाएँ भोगते हैं।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 सच्चा धर्मात्मा कौन? 👉 Who is Religious?

🔴 सच्चे आध्यात्मिक व्यक्ति के हृदय में प्रेम, ईमानदारी, सत्यता, उदारता, दया श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के भाव उत्पन्न होते हैं। ये सब आत्मा के स्वाभाविक गुण हैं। ये ही मनुष्य की स्थायी शक्तियाँ हैं। इनको प्राप्त करने का उस समय तक प्रयत्न करते रहना चाहिए, जब तक कि समस्त जीवन पूरी तरह इनमें रॅग न जाए। जिस आदमी में ये सब गुण मौजूद हैं, वास्तव में वही आध्यात्मिक व्यक्ति है। इसी सत्य के आधार पर वह परमात्मा से मिल सकता है।
🔵 ईश्वर-भक्ति का मार्ग किसी धर्म विशेष या किसी कर्मकांड में सीमित नहीं है, यह तो आत्मा की गंभीरता में विद्यमान है।

🔴 केवल ईश्वर-ईश्वर रटने वाले धर्मात्मा नहीं होते, वरन् वे ही व्यक्ति धर्मात्मा होते हैं, जो परमात्मा के आदेशों पर अथवा उनके बताये हुए मार्ग पर चलते हैं। आत्मा की परमात्मा से एकता कर देना ही सब धर्मों का मूल है। धन्य हैं वे आदमी जो परमात्मा का उपदेश सुनते हैं और उसके अनुसार आचरण करते हैं
🔵 जो आत्मा इस सुंदर जीवन में पदार्पण कर चुकी, उसके लिए अंर्तज्ञान का दरवाजा खुला हुआ है। शुद्ध हृदय वाले आदमी धन्य हैं, क्योंकि वे ही परमात्मा का दर्शन करेंगे। इस दर्शन में जो आनंद है, उसका वर्णन कौन कर सकता है। परमेश्वर का अस्तित्व अपने आप में अनुभव करने से ही आपका काम बन जाएगा।

🌹 -अखण्ड ज्योति-जनवरी 1941

👉 Who is Religious?

🔵 Love, compassion, generosity, kindness, devotion, zeal, honesty, truthfulness, unflinching faith in divine values, etc – are the natural virtues of the soul. Their presence in a person is the sign of his/her spirituality. These alone are the source of spiritual elevation. These are also the perennial means of inner strength. Your endeavors for cultivating these qualities in your character must continue with greater intensity till your personality is fully imbibed with them. One who achieves this, he/she alone is truly spiritual and religious; he/she alone is worthy of meeting God – being beatified by thy grace.

🔴 Devotion of God is not confined to a specific religious cult or rituals. It lies in the deepest core of the inner emotions. Those who chant God’s name need not be religious; truly religious are those who follow the divine disciplines, adopt divine values in their conduct. Guiding the path to unification of the soul with God – inculcation of divinity in the human-self, is the foundational purpose of religion. Blessed are those who grasp this noble truth of religion and devotion.

🔵 Those who have reached this state of devotion would deserve attaining the eternal light of ultimate knowledge. They can realize God in their pure hearts and experience the absolute bliss forever…

🌹 -Akhand Jyoti, Jan. 1941

👉 समाधि के सोपान (भाग 27) (In The Hours Of Meditation)


ध्यान के क्षणों में पुन: यह कहते हुए गुरुदेव उपस्थित हुए-

🔴 सभी शब्दों के पार मौन में, शाश्वत शांति में तुम्हारी आत्मा का निवास है। इन्द्रियों के तुमुल कोलाहल से दूर, जीवन की यातना और दु:खों से दूर, पाप और संताप की भावना से दूर तथापि उन सभी के मध्य दिव्यता का निवास है जो कि अस्तिमात्र है। संसारस्वप्न के ताने बाने कितने आश्चर्यजनक है! किन्तु स्वप्नद्रष्टा उससे भी अधिक आश्चर्यजनक है। हे आत्मन! तुम अमर, मृत्यु की सीमा के पार, जघन्य कलुषों के मध्य भी निष्कलंक हो। तुम्हारी जड़ें दिव्यता में समायी हुई हैं। शुभ और अशुभ- ये विचारों के मापदण्ड हैं। तुम विचारों के परे सर्वोपरि ज्योति:स्वरूप हो। तुम्हारे स्वरूप का प्रताप सभी वस्तुओं के पार पहुँचा हुआ है। तुम अतुलनीय, शब्दातीत हो।

🔵  हे स्वर्गीय दिव्यज्योति! हे देव, ध्यान और अनुभूति के शीर्ष मुकुट! कौन तुम्हें पापी कहेगा! या महात्मा कहेगा। कौन तुम्हारा वर्णन कर सकेगा या तुम्हारे विषय में सोच भी सकेगा। सभी में एक, सभी में समान, तुम वही अमर आत्मा हो। मर्त्यजीवन के शब्दो में कौन तुम्हें व्यक्त कर सकता है ? तुम उन सभी के परे अमर्त्य हो। और यह जान रखो कि तूफानी विचारों के उपद्रवों के बीच भी उन सबको देखने वाला एक मौन द्रष्टा है। उसके प्रकाश को इन्द्रियों का तुच्छ कच्छ- प्रकाश कभी मंद नहीं कर सकता न ही उसकी शांति को जीवन के सभी कलह दबा सकते हैं। वह चन्द्र, सूर्य, तारों से परे कूटस्थ तथा विचारों की सीमा के बाहर है। वही आत्मा है! आत्मा वही है!! इन्द्रियों के युद्ध में विजयी वही है।

🔴 अज्ञान के पहाड़ कितने भी क्यों न दीख पड़ते हों, पाप और संताप की गहराइयों कितनी भी गहरी क्यों न हों, उसमें सभी ऊँचाई और गहराइयाँ समा जाती हैं। उन सभी विविधताओं को जानो और मुक्त हो जाओ।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

सोमवार, 29 अगस्त 2016

👉 आत्मचिंतन के क्षण 30 AUG 2016


🔴 आलस्य और दुर्भाग्य एक ही वस्तु के दो नाम हैं। जो आलसी है वह न श्रम का महत्त्व समझता है, न समय का मूल्य। ऐसे मनुष्य को कोई सफलता नहीं मिल सकती। सौभाग्य का पुरस्कार उनके लिए सुरक्षित है, जो उसका मूल्य चुकाने के लिए तत्पर हैं। यह मूल्य कठोर श्रम के रूप में चुकाया जाता है। समय ही भगवान् की दी हुई सम्पदा है। हमारी हर श्वास बड़ी मूल्यवान है। यदि प्रस्तुत क्षणों का ठीक तरह उपयोग करते रहा जाय, तो बूँद-बूँद से घट भरने की तरह अगणित सफलताएँ और समृद्धियाँ अनायास ही इकट्ठी होने लगेंगी।

🔵 आलसी का भविष्य अंधकारपूर्ण है। जिसे श्रम करने में रुचि नहीं, जो मेहनत से डरता है, आरामतलबी जिसे पसंद है, जो समय को ज्यों-त्यों करके अस्त-व्यस्त करता रहता है, समझना चाहिए दुर्भाग्य इसके पीछे लग गया। यह कुछ उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकना तो दूर, यदि संयोगवश उत्तराधिकार में कुछ मिल गया है तो उसे भी स्थिर न रख सकेगा। कहते हैं-लक्ष्मी आलसी के घर नहीं रहती। सुना जाता है कि दारिद्र्य वहाँ घोंसला बनाता है, जहाँ आलस्य की सघनता छाई रहती है।

🔴 आराम की जिन्दगी बिताना केवल निर्जीव, निरुद्देश्य और निकम्मे लोगों को रुचिकर हो सकता है। वे ही उसे सौभाग्य गिन सकते हैं। प्रगतिशील, महत्त्वाकांक्षी लोगों की दृष्टि में तो यह एक मानसिक रुग्णता है, जिसके कारण व्यक्ति का भाग्य, भविष्य, बल और वर्चस्व निरन्तर घटता ही जाता है। अपने देश का दुर्भाग्य श्रम के प्रति उपेक्षा करने की दुष्प्रवृत्ति के साथ आरंभ हुआ है और वह तब तक बना ही रहेगा, जब तक कि हम प्रगतिशील लोगों की तरह परिश्रम के प्रति प्रगाढ़ आस्था उत्पन्न न करेंगे।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

क्यों दे रहे हैं तलाक???*।


🔵 कल रात करीब 7 बजे शाम को  मोबाइल बजा। उठाया तो उधर से रोने की आवाज... मैंने शांत कराया और पूछा कि भाभीजी आखिर हुआ क्या?

🔴 उधर से आवाज़ आई.. आप कहाँ हैं??? और कितनी देर में आ सकते हैं?

🔵 मैंने कहा:- "आप परेशानी बताइये"। और "भाई साहब कहाँ हैं...? माताजी किधर हैं..?" "आखिर हुआ क्या...?"
लेकिन

🔴 उधर से केवल एक रट कि "आप आ जाइए"*, मैंने आश्वाशन दिया कि *कम से कम एक घंटा पहुंचने में लगेगा*. जैसे तैसे पूरी घबड़ाहट में पहुँचा;

🔵 देखा तो भाई साहब [हमारे मित्र जो जज हैं] सामने बैठे हुए हैं;

🔴 भाभीजी रोना चीखना कर रही हैं* 12 साल का बेटा भी परेशान है; 9 साल की बेटी भी कुछ नहीं कह पा रही है।

🔵 मैंने भाई साहब से पूछा कि *""आखिर क्या बात है""*???

🔴 ""भाई साहब कोई जवाब नहीं दे रहे थे ""*.

🔵 फिर भाभी जी ने कहा ये देखिये *तलाक के पेपर, ये कोर्ट से तैयार करा के लाये हैं*, मुझे तलाक देना चाहते हैं, मैंने पूछा - *ये कैसे हो सकता है???. इतनी अच्छी फैमिली है. 2 बच्चे हैं. सब कुछ सेटल्ड है. ""प्रथम दृष्टि में मुझे लगा ये मजाक है""*.

🔴 लेकिन मैंने बच्चों से पूछा *दादी किधर है*,

🔵 बच्चों ने बताया पापा ने उन्हें 3 दिन पहले *नोएडा के वृद्धाश्रम में शिफ्ट* कर दिया है।

🔴 मैंने घर के नौकर से कहा। मुझे और भाई साहब को चाय पिलाओ; कुछ देर में चाय आई. भाई साहब को *बहुत कोशिशें कीं चाय पिलाने की*.

🔵 लेकिन उन्होंने नहीं पी और कुछ ही देर में वो एक *"मासूम बच्चे की तरह फूटफूट कर रोने लगे "*बोले मैंने 3 दिन से कुछ भी नहीं खाया है. मैं अपनी 61 साल की माँ को कुछ लोगों के हवाले करके आया हूँ.

🔴 पिछले साल से मेरे घर में उनके लिए इतनी मुसीबतें हो गईं कि पत्नी (भाभीजी) ने कसम खा ली*. कि *""मैं माँ जी का ध्यान नहीं रख सकती""*ना तो ये उनसे बात करती थी और ना ही मेरे बच्चे बात करते थे. *रोज़ मेरे कोर्ट से आने के बाद माँ खूब रोती थी*. नौकर तक भी *अपनी मनमानी से व्यवहार करते थे*

🔵 माँ ने 10 दिन पहले बोल दिया.. बेटा तू मुझे *ओल्ड ऐज होम* में शिफ्ट कर दे.

🔴 मैंने बहुत *कोशिशें कीं पूरी फैमिली को समझाने की*, लेकिन किसी ने माँ से सीधे मुँह बात नहीं की*.

🔵 जब मैं 2 साल का था तब पापा की मृत्यु हो गई थी दूसरों के घरों में काम करके *""मुझे पढ़ाया. मुझे इस काबिल बनाया कि आज मैं जज हूँ""*. लोग बताते हैं माँ कभी दूसरों के घरों में काम करते वक़्त भी मुझे अकेला नहीं छोड़ती थीं.

🔴 उस माँ को मैं ओल्ड ऐज होम में शिफ्ट करके आया हूँ*. पिछले 3 दिनों से मैं *अपनी माँ के एक-एक दुःख को याद करके तड़प रहा हूँ,*जो उसने केवल मेरे लिए उठाये।

🔵 मुझे आज भी याद है जब..
*""मैं 10th की परीक्षा में अपीयर होने वाला था. माँ मेरे साथ रात रात भर बैठी रहती""*.


🔴 एक बार *माँ को बहुत फीवर हुआ मैं तभी स्कूल से आया था*. उसका *शरीर गर्म था, तप रहा था*. मैंने कहा *माँ तुझे फीवर है हँसते हुए बोली अभी खाना बना रही थी इसलिए गर्म है*.

🔵 लोगों से *उधार माँग कर मुझे दिल्ली विश्वविद्यालय से एलएलबी तक पढ़ाया*. मुझे *ट्यूशन तक नहीं पढ़ाने देती थीं*कि कहीं मेरा टाइम ख़राब ना हो जाए.

🔴 कहते-कहते रोने लगे..और बोले--""जब ऐसी माँ के हम नहीं हो सके तो हम अपने बीबी और बच्चों के क्या होंगे""*.

🔵 हम जिनके *शरीर के टुकड़े हैं*,आज हम उनको *ऐसे लोगों के हवाले कर आये, ""जो उनकी आदत, उनकी बीमारी, उनके बारे में कुछ भी नहीं जानते""*, जब मैं ऐसी माँ के लिए कुछ नहीं कर सकता तो *"मैं किसी और के लिए भला क्या कर सकता हूँ".*

🔴 आज़ादी अगर इतनी प्यारी है और *माँ इतनी बोझ लग रही हैं, तो मैं पूरी आज़ादी देना चाहता हूँ*

🔵 जब *मैं बिना बाप के पल गया तो ये बच्चे भी पल जाएंगे*. इसीलिए मैं तलाक देना चाहता हूँ।

🔴 सारी प्रॉपर्टी इन लोगों के हवाले* करके उस *ओल्ड ऐज होम* में रहूँगा. कम से कम मैं माँ के साथ रह तो सकता हूँ।


🔵 और अगर *इतना सब कुछ कर के ""माँ आश्रम में रहने के लिए मजबूर है"", तो एक दिन मुझे भी आखिर जाना ही पड़ेगा*.

🔴 माँ के साथ रहते-रहते आदत भी हो जायेगी. *माँ की तरह तकलीफ* तो नहीं होगी.

🔵 जितना बोलते उससे भी ज्यादा रो रहे थे*.

🔴 बातें करते करते रात के 12:30 हो गए।

🔵 मैंने भाभीजी के चेहरे को देखा. उनके *भाव भी प्रायश्चित्त और ग्लानि* से भरे हुए थे; मैंने ड्राईवर से कहा अभी हम लोग नोएडा जाएंगे।

🔴 भाभीजी और बच्चे हम सारे लोग नोएडा पहुँचे.

🔵 बहुत ज़्यादा रिक्वेस्ट करने पर गेट खुला*. भाई साहब ने उस गेटकीपर के पैर पकड़ लिए*, बोले मेरी माँ है, मैं उसको लेने आया हूँ, चौकीदार ने कहा क्या करते हो साहब, भाई साहब ने कहा *मैं जज हूँ,*

उस चौकीदार ने कहा:-

🔴 ""जहाँ सारे सबूत सामने हैं तब तो आप अपनी माँ के साथ न्याय नहीं कर पाये, औरों के साथ क्या न्याय करते होंगे साहब"*।

🔵 इतना कहकर हम लोगों को वहीं रोककर वह अन्दर चला गया. अन्दर से एक महिला आई जो *वार्डन* थी. उसने *बड़े कातर शब्दों में कहा*:- "2 बजे रात को आप लोग ले जाके कहीं मार दें, तो *मैं अपने ईश्वर को क्या जबाब दूंगी..*?"

🔴 मैंने सिस्टर से कहा *आप विश्वास करिये*. ये लोग *बहुत बड़े पश्चाताप में जी रहे हैं*.

🔵 अंत में किसी तरह उनके कमरे में ले गईं. *कमरे में जो दृश्य था, उसको कहने की स्थिति में मैं नहीं हूँ.*

🔴 केवल एक फ़ोटो जिसमें *पूरी फैमिली* है और वो भी माँ जी के बगल में, जैसे किसी बच्चे को सुला रखा है. मुझे देखीं तो उनको लगा कि बात न खुल जाए लेकिन जब मैंने कहा *हम लोग आप को लेने आये हैं, तो पूरी फैमिली एक दूसरे को पकड़ कर रोने लगी*

🔵 आसपास के कमरों में और भी बुजुर्ग थे सब लोग जाग कर बाहर तक ही आ गए. *उनकी भी आँखें नम थीं*

🔴 कुछ समय के बाद चलने की तैयारी हुई. पूरे आश्रम के लोग बाहर तक आये. किसी तरह हम लोग आश्रम के लोगों को छोड़ पाये.

🔵 सब लोग इस आशा से देख रहे थे कि *शायद उनको भी कोई लेने आए, रास्ते भर बच्चे और भाभी जी तो शान्त रहे*.......

🔴 लेकिन भाई साहब और माताजी एक दूसरे की *भावनाओं को अपने पुराने रिश्ते पर बिठा रहे थे*.घर आते-आते करीब 3:45 हो गया.

🔵  💐 *भाभीजी भी अपनी ख़ुशी की चाबी कहाँ है; ये समझ गई थी मैं भी चल दिया. लेकिन *रास्ते भर वो सारी बातें और दृश्य घूमते रहे*.

🔴  💐*""माँ केवल माँ है""* 💐 उसको मरने से पहले ना मारें.*

🔵 माँ हमारी ताकत है उसे बेसहारा न होने दें, अगर वह कमज़ोर हो गई तो हमारी संस्कृति की ""रीढ़ कमज़ोर"" हो जाएगी*, बिना रीढ़ का समाज कैसा होता है किसी से छुपा नहीं

🔴 अगर आपकी परिचित परिवार में ऐसी कोई समस्या हो तो उसको ये जरूर पढ़ायें, *बात को प्रभावी ढंग से समझायें , कुछ भी करें लेकिन हमारी जननी को बेसहारा बेघर न होने दें*, अगर *माँ की आँख से आँसू गिर गए तो *"ये क़र्ज़ कई जन्मों तक रहेगा"*, यकीन मानना सब होगा तुम्हारे पास पर *""सुकून नहीं होगा""* , सुकून सिर्फ *माँ के आँचल* में होता है उस *आँचल को बिखरने मत देना*।

👉 समाधि के सोपान (भाग 26) (In The Hours Of Meditation)


🔴 तब मैंने सुना वाणी मानो प्रार्थना के स्वर में कह रही है- हे इन्द्रिय और विचारों के निर्माता! जिसका तुमने निर्माण किया है उसे नष्ट कर दो। भय-, काग, आहार, निद्रा तथा उससे उठने वाले किचारों के पिंजरे में बद्ध मानो तुमने इच्छापूर्वक स्वयं को अज्ञान के घनत्व से ढक लिया ह है और स्वप्न देखे जा रहे हो। तुम्हारे स्वयं का अज्ञान ही तुम्हारा अभिशाप है। सभी स्वप्नों को भंग कर दो। सुख तथा दुःख की धारणाओं को नष्ट कर दो और तब देहात्म- बुद्धि की यह लौह अर्गला छिटक कर एक ओर गिर जायेगी। इसलिये हमारे सामने जो कार्य है वह विलक्षण है। माया का जाल मकड़ी के जाले के समान पतला है किन्तु वह वज्र के समान कठोर भी है।

🔵 हे जीव, स्वयं का उद्धार करो। इस घर को तुम्हीं ने बनाया है, तुम्हीं उसे तोड़ो और इस घर को तोड़ने की प्रक्रिया है आत्मसाक्षात्कार। यह एकत्व की दैवी चेतना से संबंधित है। क्या सूर्य, तारे, नहीं! आकाश स्वयं भी तुम्हारे स्वरूप को निगल सकेगा ? आत्मा का तुम्हारे साथ एकत्व है। अज्ञान से, अंधकार से, बाहर आ जाओ। हे जीव! यह अज्ञान तुम्हारा स्व- आवृत है। सुख से पीड़ा अच्छी है, आनंद से दु:ख अच्छा है, क्योंकि ये हमारे विचारों तथा बुद्धि को वह रूप देते हैं जो कि आत्म- साक्षात्कार का उपयुक्त साधन बन जाता है। भीषण के प्रेमी बनो। यद्यपि भीषण के दर्शन में तुम मृत्यु को देखोगे किन्तु तुम अमरत्व का भी दर्शन करोगे। जीवन अधिक से अधिक स्वप्न। परम तत्त्व तो जीवन के परे है। अन्त में सभी जगह एकत्व है! दिव्य सर्वव्यापी एकत्व ! रश्मियाँ भिन्न भिन्न हो सकती है किन्तु सूर्य वही एक है तथा सूर्य ही और रश्मि है रश्मि ही सूर्य है। तुम हो तथा अंधकार भी आलोक है।  

🔴 यह सुन कर मेरी आत्मा ध्यान और भी' गहन से गहनतर स्तर में पहुँच गई और मैं सचमुच जान गया कि किरण ही सूर्य है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 आत्मचिंतन के क्षण 29 AUG 2016


🔴 हँसना एक दैवी गुण है। हँसाना एक उत्कृष्ट स्तर का उपकार है। मुस्कराता हुआ चेहरा भले ही काला-कुरूप क्यों न हो, सदा अति सुंदर लगेगा। प्रसन्नता एक आदत है, जो कुछ समय के निरन्तर अभ्यास से अपने अंदर उत्पन्न की जा सकती है। अपनी सुविधाओं को देखें और प्रसन्न रहें। शुभ और प्रिय देखें। उज्ज्वल भविष्य की कल्पना करें, सद्भावना और सत्प्रवृत्तियों का चिंतन करें । यदि हम हँसता और हँसाता जीवन जी सकें, तो समझना चाहिए कि हमने सच्चे कलाकार  जैसी मंगलमयी सफलता एवं उल्लास भरी उपलब्धि प्राप्त कर ली।

🔵 योग का उद्देश्य मानसिक परिष्कार है। उसमें संग्रहीत कुसंस्कारों का शमन करना पड़ता है। स्वभाव का अंग बनी हुई दुष्प्रवृत्तियों के उन्मूलन में जुटना होता है। भौतिक लिप्साओं की ललक शान्त करनी पड़ती है। चिंतन को उत्कृष्टता में रस लेने के लिए सहमत किया जाता है। आत्मा और परमात्मा के बीच की खाई पाटनी होती है। यह सारे कार्य अंतःपरिशोधन और आत्म परिष्कार से संबंधित हैं। इसलिए योग साधना वस्तुतः मन को साधने की ही विद्या है।

🔴 बुराई को लेकर सक्रिय रहने वाले व्यक्ति के भी सुधरने की आशा की जा सकती है, किन्तु आदर्शों, सिद्धान्तों को बघारने वाले, उपदेश देने वाले अकर्मण्य-आलसी लोगों के सुधरने की कोई गुंजाइश नहीं।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शनिवार, 27 अगस्त 2016

👉 समाधि के सोपान (भाग 25) (In The Hours Of Meditation)



🔴 जब आत्मा अन्तरतम की शांति मे उठी तब उस वाणी ने कहा, अच्छाई, पाप तथा दोष से अधिक गहरी है। विश्व का ताना बाना, उसका सारतत्व उच्छाई ही है। असीम अतुलनीय अच्छाई। जहाँ ईश्वर है वहाँ अशुभ मिट जाता है। अशुभ आभास मात्र है, सत्यं नहीं। आत्मसमुद्र की गहराइयों में ज्ञान और सत्य की अटल चट्टानें हैं। इन चट्टानों के सामने सभी भूल, सभी अंधकार तथा सभी दोष निश्चय नष्ट हो जाते हैं। यह ठीक है कि सतह पर इच्छाओं की आँधी के तुमुल शब्द हो सकते हैं उत्तेजित वासनाओं के तूफान हो सकते है, दोष तथा अंधकार की घड़ियाँ हो सकती हैं, किन्तु अनुभूति!

🔵 अनुभूति का एक क्षण! सर्व शक्तिमान है। वह सभी प्रकार के दोषों को दूर कर देता है। वह सूर्य के प्रकाश के समान है। वह सभी अंधकार को छिन्न भिन्न कर देता है। अत: अंधकार के क्षणों में भी इस ज्योति का स्मरण करो। यहाँ तक कि दोष होने पर भी प्रभु का नाम स्मरण करो! प्रभु तुम्हारी प्रार्थना सुनेंगे । वे तुम्हारी सहायता के लिए दूत भेजेंगे। आत्मा की शक्ति से बड़ी और कोई शक्ति नहीं है। हमारे अन्तरतम में एकीभूत दिव्यता का अनंत प्रवाह है। उस दिव्यता की एक झलक से ही यह विविधताबोध जो दोषों तथा अज्ञान का निवास स्थान है तिरोहित हो जायेगा। मौलिक रूप में तुम मुक्त हो, शुद्ध हो, दिव्य हो। विश्व की सभी शक्तियाँ तुम्हारे अधीन हैं।

🔴 जब तुम मुक्त ही तो भी क्या तुम मुक्ति के लिए संघर्ष करोगे ? तुम्हारा लक्ष्य आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करना होना चाहिये। उस सौंदर्य शिखा की एक किरण मात्र का दर्शन दोष की सूक्ष्मतम रेखा को भी नष्ट कर देता है, मिटा देता है। जान लो कि शक्ति तथा शाश्वत ज्योति के ही बने हुए हो। तुम्हारा जीवन न इहलोक में है न परलोक में, वह तो अनंत में अवस्थित है। गहरे अर्थ में यह पाप की धारणा अज्ञान ही तो है। यह एक स्वप्न है। पाप का स्वभाव दुर्बलता है। तुम शक्तिशाली बनो। वह, जो तुम हो, उसकी एक झलक और तुम वही ज्योति: स्वरूप सर्वशक्तिमान हो।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 आत्मचिंतन के क्षण 28 AUG 2016


🔴 इस तथ्य को हमें हजार बार समझना चाहिए कि मनुष्य हाड़-मांस का पुतला नहीं है। वह एक चेतना है। भूख चेतना की भी होती है। विषाक्त आहार से शरीर मर जाता है और भ्रष्ट चिंतन से आत्मा की दुर्गति होती है। प्रकाश न होगा तो अंधकार का साम्राज्य ही होना है। सद्ज्ञान का आलोक बुझ जाएगा तो अनाचार की व्यापकता बढ़ेगी ही। भ्रष्ट चिंतन और दुष्ट कर्तृत्व का परिणाम व्यक्ति और समाज की भयानक दुर्दशा के रूप में सामने आ सकता है।

🔵 जो व्यक्ति कठिनाइयों या प्रतिकूलताओं से घबड़ाकर हिम्मत हार बैठा, वह हार गया और जिसने उनसे समझौता कर लिया, वह सफलता की मंजिल पर पहुँच गया। इस प्रकार हार बैठने, असफल होने या विजयश्री और सफलता का वरण करने के लिए और कोई नहीं, मनुष्य स्वयं ही उत्तरदायी है। चुनाव उसी के हाथ में है कि वह सफलता को चुने या विफलता को। वह चाहे तो कठिनाइयों को वरदान बना सकता है और चाहे तो अभिशाप भी।

🔴 विनोद वृत्ति जहाँ स्वस्थ चित्त की द्योतक है, वहीं बात-बात पर व्यंग्य करने की प्रवृत्ति हीन भावना एवं रुग्ण मनःस्थिति का परिणाम है। हास-परिहास स्वस्थ होता है, किन्तु दूसरों का उपहास सदा कलहकारी एवं हानिकर होता है। खिल्ली उड़ाना तथा विनोद करना दो सर्वथा भिन्न प्रवृत्तियाँ हैं। खिल्ली उड़ाने वाली प्रवृत्ति प्रारंभ में भले ही रोचक  प्रतीत हो, किन्तु उसका अंत सदा आपसी दरार, तनाव और कटुता में होता है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 समाधि के सोपान (भाग 24) (In The Hours Of Meditation)


🔴 उस वाणी ने और भी कहा-

🔵 आत्मा में जीवात्मा से भिन्न बोध नहीं है। वह असीम शाश्वत तथा पूर्ण मुक्त है। वह विविधता रहित ऐक्य है। आत्मा के राज्य में मैं, तुम, वह आदि भेद के लिए कोई स्थान नहीं है। वह तत् मात्र है। ओम् तत् सत्। अतुलनीय, अनिर्वचनीय। उस आत्मा को कौन जानता है! वास्तव में वही तुम्हें जानता है। असीम में समाहित हो जाने की आकांक्षा, मुक्ति की इच्छा ही वास्तविक प्रेम है। उस महत् शांति की इच्छा ही सच्चा प्रेम है।

🔴 यह विचलित नहीं होगा। यह शांति पूर्कक किन्तु समग्ररूप में बढ़ता है। यह अजेय है। यह लक्ष्य पर पहुँच कर ही रहता है। जिसमें सभी देवी देवता विलीन हो जाते हैं जहाँ ध्वनि समाप्त हो जाती है, जिसमें सभी रूप समा जाते हैं जहाँ विचार अविचा रहो जाते हैं जहाँ जन्म और मृत्यु का अस्तित्व नहीं रहता उसे ही आत्मा जानो। जहाँ सघर्ष समाप्त हो जाते हैं जहाँ अनुभूति है, जहाँ सभी सापेक्ष विचार मिट जाते हैं जहाँ सौंदर्य, पवित्रता, पाप, आतंक, शुभ, अशुभ सभी का भेद समाप्त हो जाता है, जहाँ ध्यान में मन सर्वज्ञ हो जाता है, उसे ही आत्मा जानो।

🔵 वत्स ! सभी ऊँचाइयों के परे एक ऊँचाई है, महान देवताओं के परे भी एक दिव्यता है। अविनाशी ही सब का आधार है। सभी तिरोहित हो जाते हैं। सभी मिट जाते हैं, केवल आत्मा ही सर्वदा रहता है।

🔴 और जब वह वाणी शांत हुई तब मुझे ऐसा अनुभव हुआ कि मेरी आत्मा विशालता में उठ गई। तब मैं नहीं था वहाँ केवल ज्योति थी! ज्योति!!

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 आत्मचिंतन के क्षण 27 AUG 2016


🔴 जो मितव्ययी हैं, उन्हें संसार की निरर्थक लिप्साएँ लोलुप बनाकर व्यग्र नहीं कर पातीं।  वे अपनी आर्थिक परिधि में पाँव पसारे निश्चिन्त सोया करते हैं। उन्हें केवल उतना ही चाहिए जितना उनके पास होता है। संसार की बाकी चीजों से न उन्हें कोई लगाव होता है और न वास्ता। ऐसे निश्चिन्त एवं निर्लिप्त मितव्ययी के सिवाय आज की अर्थप्रधान दुनिया में दूसरा सुखी नहीं रह सकता।

🔵 आज अनेकों ऐसी पुरानी परम्पराएँ  एवं विचारधाराएँ हैं, जिनको त्याग देने से अतुलनीय हानि हो सकती है। साथ हीे अनेकों ऐसी नवीनताएँ हैं, जिनको अपनाए बिना मनुष्य का एक कदम भी बढ़ सकना असंभव हो जायेगा। नवीनता एवं प्राचीनता के संग्रह एवं त्याग में कोई दुराग्रह नहीं करना चाहिए, बल्कि किसी बात को विवेक एवं अनुभव के आधार पर अपनाना अथवा छोड़ना चाहिए।

🔴 अपनी वर्तमान परिस्थितियों से आगे बढ़ना, आज से बढ़कर कल पर अधिकार करना, अच्छाई को सिर पर और बुराई को पैरों तले दबाकर चलने का नाम जीवन है। कुकर्म करने तथा बुराई को प्रश्रय देने वाला मनुष्य जीवित दीखता हुआ भी मृत ही है, क्योंकि कुकर्म और कुविचार मृत्यु के प्रतिनिधि हैं। इनको आश्रय देने वाला मृतक के सिवाय और कौन हो सकता है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

👉 आत्मचिंतन के क्षण 26 AUG 2016


🔴 यों तो भाग्य में लिखा हुआ नहीं मिटता, पर भाग्य के भरोसे बैठे रहने पर भाग्य सोया रहता है और हिम्मत बाँधकर खड़े होने पर भाग्य भी उठ खड़ा होता है। आलसियों का भाग्य असफल बना रहता है और कर्मवीरों का भाग्य उन्हें निरन्तर सफलता का पुरस्कार प्रदान किया करता है।

🔵 कोई व्यक्ति न तो पूर्णतया बुरा है और न अच्छा। हर किसी में कुछ दोष पाये जाते हैं और कुछ गुण रहते हैं। जागरूकता का तकाजा यह है कि दोषों से बचते हुए उसके गुणों से ही लाभ उठाया जाय। किसी व्यक्ति को न तो पूरा देवता मान लेना चाहिए और न असुर। दोनों स्थितियों के समन्वय से जो कुछ बनता है, उसी का नाम मनुष्य है। इसलिए उस पर न तो पूरी तरह अविश्वास किया जा सकता है और न विश्वास।

🔴 सुख-दुःख का क्रमिक आवागमन संसार का शाश्वत विधान है। ऐसी दशा में केवल अपने मनोनुकूल परिस्थितियों का आग्रह न केवल स्वार्थ अपितु ईश्वरीय विधान के प्रति अस्वीकृति है, जो एक प्रकार से नास्तिकता, ईश्वर द्रोह एवं भयंकर पाप है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 तुम ईश्वर को पूजते हो या शैतान को

🔴 मनुष्य, शरीर को `मैं’ समझता है। उसने एक जनश्रुति ऐसी अवश्य सुन रखी होती है कि आत्मा शरीर से भिन्न है, परंतु इस पर उसका विश्वास नहीं होता। हम सब शरीर को ही यदि आत्मा न मानते होते, तो यह भारतभूमि दुराचारों का केंद्र न बन गई होती। गीता में भगवान कृष्ण ने अपना उपदेश आरंभ करते हुए अर्जुन को यही दिव्य ज्ञान दिया है, ``तू देह नहीं है।’’ आत्मस्वरूप को जिस प्रकार विस्मण कर दिया गया है, उसी प्रकार ईश्वर को भी दृष्टि से ओझल कर दिया गया है।

🔵 हमारे चारों ओर जो घोर अज्ञाननांधकार छाया हुआ है, उसके तम में कुछ और ही वस्तुएँ हमारे हाथ लगी हैं और उन्हें ईश्वर मान लिया है। रस्सी को साँप मान लेने का उदाहरण प्रसिद्ध है। रस्सी का स्वरूप कुछ-कुछ सर्प से मिलता जुलता है। अंधेरे के कारण ज्ञान ठीक प्रकार काम नहीं करता, फलस्वरूप भ्रम सच्चा मालूम होता है। रस्सी सर्प का प्रतिनिधित्व भली प्रकार करती है। इस गड़बड़ी के समय में ईश्वर के स्थान पर शैतान विराजमान हो गया है और उसी को हम लोग पूजते हैं। आत्मा पंच तत्त्वों से सूक्ष्म है। पंच तत्त्व के रसों को इन्हीं तत्त्वों से बना हुआ शरीर भोग सकता है।

🔴 आत्मा तक कडुआ मीठा कुछ नहीं पहुँचता। यह तो केवल इंद्रियों की तृप्ति-अतृप्ति को अपनी तृप्ति मानना भर है।

🌹 अखण्ड ज्योति- मई 1940

👉 Who Do You Worship – The Divine or the Devil?

🔵 Man misidentifies himself as the physical body. Although he has herd something like ‘he has a soul that is different from the body’ but does not quite believe it or is not even able to imagine it. If most of us were not living under this illusion about unity of the self with the living body, this land (India) of great rishis would not have become home to vast spread corruption and confusion. It was this sacred land where Lord Krishna had preached Bhagvad Gita to Arjuna and reminded him that he is not the body. As we have totally forgotten this fact and never bother to know about our own “self”, how could we know the
Omnipresent Self, the God?

🔴  We are living in a state of utter ignorance and darkness. Whatever suits our deluded convictions or convinces our selfish intellect, that has become the definition of God for us. It is like considering a rope to be a snake because of lack of light. Indeed the rope resembles the shape of a snake and both would look
alike if kept at a dark place. But, as we all know they are not the same. It is only our illusion because of which we might confuse one with the other. It is a pity that this is what we the ‘intelligent beings’ have done today by regarding the devil as the divine.

🔵 Its time we awaken and ponder over our reality. We should attempt to realize that – the soul is sublime; it is not perceivable by the body or the materialistic means.

🌹 -Akhand Jyoti, May 1940

बुधवार, 24 अगस्त 2016

👉 समाधि के सोपान (भाग 23) (In The Hours Of Meditation)


🔴 वह वाणी जिसका निवास मौन में है, ध्यान के क्षणों में उसने मेरी आत्मा से कहा: -

🔵 वत्स! गंभीर! गहन गम्भीर शांति में आओ। व्यक्तित्व के कोलाहल के परे, उसके विविध अनुभवों के परे महान् शांति में आओ। वासनाओं या इच्छाओं की आँधी से सतह पर ही विक्षुब्ध न होओ! यद्यपि घने के बादल छा जाते हैं किन्तु उनके ऊपर सूर्य चमकता ही रहता है । शांति के क्षणों में ही हमारा हृदय दिव्यानन्द में सर्वोत्तम स्पन्दित होता है। सर्वव्यापी प्रेम के सम्मुख स्वयं को अनावृत कर दो। वह स्थिरता कितना संगीतमय है। वह कैसी शांति प्रदान करता है। ओ! वह अनन्त स्थिरता! अनन्त शांति!!

🔴 एक भी सत् विचार, आध्यात्मिक विचार, कभी नष्ट नहीं होता। इसलिए तुम समय की सीमा के बाहर चले जाओ। वहाँ महत् विचारों पर मनन करो तथा उसमें तुम्हारी आत्मा अनंत को पाने की इच्छा करे। तुम्हारे मन में ही तुम्हारे संसार का अस्तित्व है। तथा तुम समय के प्रवाह के भीतर भी अनन्त को प्रगट कर सकते हो । अपने विचारों के द्वारा तुम आकाश की सीमा को लांध सकते हो।

🔵 आत्मा मुक्त है उसे कोई बाँध नहीं सकता। तुम आओ या जाओ, तुम कुछ करो या न करो, यह सब क्या है? ये सब जीवन स्वप्न की घटनाएँ मात्र हैं । ये सब काल प्रवाह में बहती धारायें मात्र हैं जब कि आला शाश्वत है। ओह् ! इस ज्ञान के साथ कितनी शक्ति, कितनी उच्चता, कितनी अपरिमेय विशालता का बोध जागता है।

🔴 शांति गहरी है! अतल गहरी!! वह अपरिमेय है!! द्धन्द्रिय तथा विचारों की सभी कल्पनाओं को मिटा दो। वे प्रकाश के प्रत्यावर्तन मात्र हैं। तुम स्वयं प्रकाश में लीन हो जाओ।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 आत्मचिंतन के क्षण 25 AUG 2016


🔴 ओजस्वी ऐसे ही व्यक्ति कहे जाते हैं, जिन्हें पराक्रम प्रदर्शित करने में संतोष और गौरव अनुभव होता है, जिन्हें आलसी रहने में लज्जा का अनुभव होता है, जिन्हें अपाहिज, अकर्मण्यों की तरह सुस्ती में पड़े रहना अत्यन्त कष्टकारक लगता है, सक्रियता अपनाये रहने में, कर्मनिष्ष्ठा के प्रति तत्परता बनाये रहने में जिन्हें आनन्द आता है।

🔵 अनीति को देखते हुए भी चुप बैठे रहना, उपेक्षा करना, आँखों पर पर्दा डाल देना, जीवित मृतक का चिह्न है। जो उसका समर्थन करते हैं, वे प्रकारान्तर से स्वयं ही दुष्कर्मकर्त्ता हैं। स्वयं न करना, किन्तु दूसरों के दुष्ट कर्मों में सहायता, समर्थन, प्रोत्साहन, पथ-प्रदर्शन करना एक प्रकार से पाप करना ही है। इन दोनों ही तरीकों से दुष्टता का अभिवर्धन होता है।

🔴 घड़ी पास में होने पर भी जो समय के प्रति लापरवाही करते हैं, समयबद्ध जीवनक्रम नहीं अपनाते, उन्हें विकसित व्यक्तित्व का स्वामी नहीं कहा जा सकता। घड़ी कोई गहना नहीं है। उसे पहनकर भी जीवन में उसका कोई  प्रभाव  परिलक्षित नहीं होने दिया जाता तो यह गर्व की नहीं, शर्म की बात है। समय की अवज्ञा वैसे भी हेय है, फिर समय-निष्ठा का प्रतीक चिह्न (घड़ी) धारण करने के बाद यह अवज्ञा तो एक अपराध ही है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 समाधि के सोपान (भाग 22) (In The Hours Of Meditation)


🔴 मेरी आत्मा ने गुरुदेव से निवेदन किया- महाभाग, कितना अद्भुत है! वहाँ मृत्यु नहीं!

🔵
और तब गुरुदेव ने कहा-वत्स! वहाँ वासनासंभूत जीवन भी नहीं है। क्योंकि लोग जिसके भूखे हैं वह संसार कीच ही तो है। दूषित वासनाओं में आनंद लेने वाले लोग कीचड़ में सने शरीर में आनंद से लोटने वाले बैल के समान ही तौ हैं उनके लिए यह पथ बहुत लम्बा है क्योंकि इच्छाओं के ताने बाने से बनी माया उनके पथ में आड़े आती है। तुम उसके परे जाओ। तुम्हारा समय आयेगा। ऊपर की ओर देखो। वहाँ अनन्त ज्योति है। ऊपर देखो और वह ज्योति तुम्हारे मन की अपारदर्शिता को अवश्य भेद जायेगी।

🔴 इन शब्दों को सुनकर मुझे स्मरण हो आया कि चैतन्य ही आत्मा का स्वरूप है तथा मुक्ति ही लक्ष्य है। और वह लक्ष्य यहाँ और अभी है, मरणोपरान्त नहीं, तथा जीवात्मा का भाग्य निश्चित है और वह है आत्म- साक्षात्कार, जहाँ समय मिट जाता है। जहाँ भौतिक और मर्त्य चेतना विलुप्त हो जाती है। जहाँ ज्योति जो कि जीवन है, सत्य है, शांति है, वह प्रकाशित होती हैं। जहाँ सभी स्वप्न समाप्त हो जाते हैं वासनायें असीम अनुभूति में विलीन हो जाती हैं। जो कि महत् विस्तार का क्षेत्र है। उस अनन्त की अनुभूति के लिए, समय का अवसान कर देने के लिए इन्द्रिय प्रभूत कल्पनाओं की समाप्ति के लिए अनंत की मुक्ति के लिए ही यह अनुभूति है।

हरि ओम् तत् सत्

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 आत्मचिंतन के क्षण 23 AUG 2016

🔴 सच्ची लगन से काम करने वाले किसी बाह्य वातावरण अथवा परिस्थिति को काम में विघ्न डालने वाला बताकर कार्य से मुख मोड़ने का बहाना नहीं निकालते, बल्कि घोरतम विपरीत परिस्थितियों में भी अंगद के चरण की तरह अपने कर्त्तव्य पर अटल रहते हैं। उन्हें छोटी-मोटी परिस्थितियाँ काम से उखाड़ नहीं पातीं।

🔵 अनेक लोग पीठ पीछे बुराई करने और सम्मुख आवभगत दिखलाने में बड़ा आनंद लेते हैं। समझते हैं कि संसार इतना मूर्ख है कि उनकी इस द्विविध नीति को समझ नहीं सकता। वे इस दोहरे व्यवहार पर भी समाज में बड़े ही शिष्ट एवं सभ्य समझे जाते हैं। अपने को इस प्रकार बुद्धिमान् समझना बहुत बड़ी मूर्खता है। एक तो दूसरे को प्रवंचित करना स्वयं ही आत्म-प्रवंचना है, फिर बैर प्रीति की तरह वास्तविकता तथा कृत्रिमता छिपी नहीं रह सकती।

🔴 गंदगी मनुष्य की आत्मा का ही नहीं, व्यक्तित्व का भी पतन कर देती है। गंदगी से बचना, उसे छोड़ना और हर स्थान से उसे दूर करना, मनुष्य का सहज धर्म है। उसे अपने इस धर्म की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। क्या भौतिक और क्या आध्यात्मिक, किसी प्रकार का भी विकास करने के लिए जिन गुणों की आवश्यकता है, स्वच्छता उनमें सर्वोपरि है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

शनिवार, 20 अगस्त 2016

👉 आत्मचिंतन के क्षण 20 AUG 2016


🔴 सुख और दुःख किन्हीं परिस्थितियों का नाम नहीं, वरन् मन की दशाओं का नाम है। संतोष और असंतोष वस्तुओं में नहीं, वरन् भावनाओं और मान्यताओं से होता है। इसलिए उचित यही है कि सुख-शान्ति की परिस्थितियाँ ढूँढते-फिरते रहने की अपेक्षा अपने दृष्टिकोण को ही परिमार्जित करने का प्रयत्न करें। इस प्रयत्न में हम जितने ही सफल होंगे अंतःशक्ति के उतने ही निकट पहुँच जायेंगे।

🔵 अपने प्रति उच्च भावना रखिए। छोटे से छोटे काम को भी महान् भावना से करिये। बड़ी से बड़ी विपत्ति में भी निराश न होइए। आत्म विश्वास एवं आशा का प्रकाश लेकर आगे बढ़िए। जीवन के प्रति अखण्ड निष्ठा रखिए और फिर देखिए कि आप एक स्वस्थ, सुंदर, सफल एवं दीर्घजीवन के अधिकारी बनते हैं या नहीं।

🔴 आनंद के लिए किन्हीं वस्तुओं या परिस्थितियों को प्राप्त करना आवश्यक नहीं और न उसके लिए किन्हीं व्यक्तियों के अनुग्रह की आवश्यकता है। वह अपनी भीतरी उपज है। परिणाम में संतोष और कार्य में उत्कृष्टता का समावेश करके उसे कभी भी, कहीं भी और कितने ही बड़े परिमाण में  पाया जा सकता है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

प्रेरणादायक प्रसंग 20 Aug 2016





शुक्रवार, 19 अगस्त 2016

👉 समाधि के सोपान (भाग 21) (In The Hours Of Meditation)



🔴 गुरूदेव की वाणी कितनी आश्चर्य जनक है। मेरी आत्मा पुकार उठती है। हे महाभाग, आप स्वयं ईश्वर हैं। आप जिसका उपदेश देते हैं आप स्वयं वही हैं। आप विश्व की आत्मा है। आप सर्वस्व हैं। यद्यपि आपकी माया विविध रूप का आभास देती है तथापि आप स्वयं एकम् अद्वितीयम् हैं। आपके एकत्व की महिमा महान है, क्योंकि आत्मा एक है। आत्मा सारभूत है जिसमें अंश या विभाग नहीं है। आत्मा एक ही ज्योति है जो विभिन्न रंगों के काँचों से देखी जा रही है। हे गुरुदेव, मुझे कृप्या उस जीवन में ले चलिये जो आपका जीवन है। आप ब्रह्मा हैं! आपविष्णु हैं ! आप सदाशिव हैं! आप ब्रह्म हैं! परम ब्रह्म हैं!!

हर हर बम बम महादेव!

🔵 उसके पश्चात मेरी आत्मा मानो सातवें आसमान में पहुँच गई। और मैंने मनुष्य की दिव्यता के दर्शन किए। मनुष्य की दुर्बलता के महत्त्व को भी समझा। मैंने देखा वहाँ सभ कुछ दिव्य है। तथा इस दिव्य ज्योति के भीतर मैंने देखा कि इस अन्तर्जगत में अनुभूति के पर्वत पर गुरुदेव मानो दूसरे कृष्ण हो कर विराजमान हैं। गहन! समय से गहन! आकाश से भी अधिक -सर्वव्यापी हैं ध्यान राज्य का यह अन्तर्जगत। वहाँ अंधकार हो ही नहीं सकता। क्योंकि वहाँ केवल ज्योति है। वहाँ अज्ञान हो ही नहीं सकता क्योंकि वहाँ केवल ज्ञान है। वहाँ मृत्यु का वश नहीं चलता। अग्नि जला नहीं सकती, जल  भीगा नहीं सकता, वायु सुखा नहीं सकती। वह उस पुराण पुरुष का राज्य है। जीवन की सभी छलनाओं के पार असीम और कूटस्थ है।

🔴 और उस महिमा में अंतरतम से बोलते हुये गुरुकी वाणी ने कहा वत्स! यह तुम्हारी विरासत है। अनन्तशक्ति तुम्हारी है। जब सभी शक्ति तुम्हारी है कब क्या तुम दुर्बल हो सकते हो ? इन्द्रियों के दिखावे से तुम संतुष्ट नहीं रह सकते। इस बाह्य जगत् की तड़क भड़क के पीछे मृत्यु तथा विस्मृति ही है। जब मृत्यु आती है यह शरीर शव हो जाता है किन्तु आत्मा सदैव मुक्त है। वह अशरीरी है। साक्षी है, क्योंकि शरीरों का नाश हो सकता है किन्तु आत्मा अनश्वर है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 आत्मचिंतन के क्षण 19 AUG 2016


🔴 बुराइयों का दोष मन के मत्थे मढ़ना ठीक नहीं। मनुष्य स्वयं इसका अपराधी होता है और इसी में उसका कल्याण है कि वह अपना दोष स्वीकार कर ले और उसका परिमार्जन करने का प्रयत्न करे। जिस प्रकार मन को उसने बलात् पूर्वक अधोगामी बनाया है, उसी प्रकार उसे सन्मार्गगामी बनाने का भी प्रयत्न करें।

🔵 मनुष्य के साध्य, सुख और शान्ति का निवास कामनाओं, उपादानों अथवा भोग-विलास में नहीं है। वह कम से कम कामनाओं, अधिक से अधिक त्याग और विषय-वासनाओं के विष से बचने में ही पाया जा सकता है। जो निःस्वार्थी, निष्काम, पुरुषार्थी, परोपकारी, संतोषी तथा परमार्थी हैं, सच्ची सुख-शान्ति के अधिकारी वही हैं। सांसारिक स्वार्थों एवं लिप्साओं के बंदी मनुष्य को सुख-शान्ति की कामना नहीं करनी चाहिए।

🔴 महानता कोई सुख नहीं है जैसा कि लोग समझते हैं। यह मनुष्य की जीवनकालीन सेवाओं, लोकमंगल की कामनाओं, प्रयत्नों, कष्टों, बलिदानों और ध्येयधीरता का प्रमाण पत्र है, जो प्रायः उसके दिवंगत हो जाने के बाद संसार द्वारा घोषित किया जाता है। जीवनकाल में ही सफलता का हठ लेकर चलने वालों के लिए यही उपयुक्त है कि वे या तो अपना कदम पीछे हटा लें अथवा अपनी मनोवृत्ति में सुधार कर लें।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

👉 उठो! हिम्मत करो

 स्मरण रखिए, रुकावट और कठिनाइयाँ आपकी हितचिंतक हैं। वे आपकी शक्तियों का ठीक-ठीक उपयोग सिखाने के लिए हैं। वे मार्ग के कंटक हटाने के लिए हैं। वे आपके जीवन को आनंदमय बनाने के लिए हैं। जिनके रास्ते में रूकावटें नहीं पड़ीं, वे जीवन का आनंद ही नहीं जानते। उनको जिंदगी का स्वाद ही नहीं आया। जीवन का रस उन्होंने ही चखा है, जिनके रास्ते में बड़ी-बड़ी कठिनाइयाँ आई हैं। वे ही महान् आत्मा कहलाए हैं, उन्हीं का जीवन, जीवन कहला सकता है।
 

 उठो! उदासीनता त्यागो, प्रभु की ओर देखो। वे जीवन के पुंज हैं। उन्होंने आपको इस संसार में निरर्थक नहीं भेजा। उन्होंने जो श्रम आपके ऊपर किया है, उसको सार्थक करना आपका काम है। यह संसार तभी तक दु:खमय दीखता है, जब तक कि हम इसमें अपना जीवन होम नहीं करते। बलिदान हुए बीज पर ही वृक्ष का उद्भव होता है। फूल और फल उसके जीवन की सार्थकता सिद्ध करते हैं। सदा प्रसन्न रहो। मुसीबतों का खिले चेहरे से सामना करो। आत्मा सबसे बलवान है, इस सच्चाई पर दृढ़ विश्वास रखो। यह विश्वास ईश्वरीय विश्वास है। इस विश्वास द्वारा आप सब कठिनाइयों पर विजय पा सकते हैं। कोई कायरता आपके सामने ठहर नही सकती। इसी से आपके बल की वृद्धि होगी। यह आपकी आतंरिक शक्तियों का विकास करेगा। -

🌹 अखण्ड ज्योति-फरवरी 1940

👉 Rise! Have Courage

🔵 Please Note! Adversities and obstructions are there for your own good. They occur to activate your strength and trigger its constructive use. Hidden beneath them is the spring of joy. Those who have never faced any hindrances or struggled against hardships would not know the real taste of happiness and success in life.

🔴 Only those who have accepted these challenges with courage and stability and conquered over against struggles in their lives are worthy of being called achievers, distinguished heroes. It is only the lives of such great people that deserve to be dignified.

🔵 So don’t loose heart. Awaken! Rise! And look at the Almighty – the Divine Light of your Life-Force. God has not sent you in human form without any purpose. He has endowed you with immense potentials; it’s your duty to make use of them. Sufferings and sorrows surface in our world only until we don’t sacrifices our narrow self-interests for greater aims in life. A sapling sprouts and a tree grows from only that seed which dissolves self-existence in the soil; flowers and fruits illustrate its accomplishments and expand its glory.

🔴 So, Be Happy and face all testing moments with smile and courage. Have unflinching faith in the eternal truth that your soul is omnipotent. This is what corresponds to having faith in God. The force of this intrinsic faith would wane out all your fears and weaknesses. Its impetus will awaken your inner strength by which you can eliminate all hindrances and win all battles of life.

🌹 Akhand Jyoti, Feb. 1940

गुरुवार, 18 अगस्त 2016

👉 समाधि के सोपान (भाग 20) (In The Hours Of Meditation)


🔴 ध्यान के क्षणों में गुरुदेव की वाणी ने कहा- देखो, जैसा बाह्यजगत है वैसा ही -एक अन्तर्जगत भी है। एक आत्मा का संसार है, एक नाम-रूप का संसार है। और वत्स, यदि बाह्य जगत में आश्चर्य है, रहस्य है, विशालता है, सौंदर्य है, महान् गौरव है तो अन्तर्जगत में भी अमेय महानता और शक्ति, अवर्णनीय आनंद तथा शांति और सत्य का अचल आधार है । हे वत्स ! बाह्यजगत अन्तर्जगत का आभास मात्र है; और इस अन्तर्जगत में तुम्हारा सत्यस्वरूप स्थित है। वहाँ तुम शाश्वतता में जीते हो जब कि बाह्यजगत समय की सीमा में ही आबद्ध है। वहाँ अनन्त और अपरिमेय आनन्द है, जबकि बाह्यजगत में संवेदनायें, सुख तथा दु:ख से जुड़ी हुई हैं। वहाँ भी वेदना है किन्तु अहो, कितनी आनंददायी वेदना है। सत्य का पूर्णत: साक्षात्कार न कर पाने के विरह की अलौकिक वेदना! और ऐसी विपुल आनंद का पथ है।

🔵 आओ, अपनी वृत्ति को इस अन्तर्जगत की ओर प्रस्तुत करो। आओ, मेरे प्रति उत्कट प्रेम के पंखों से उड़कर आओ। गुरु और शिष्य के संबंध से अधिक घनिष्ठ और भी कोई संबंध है क्या? हे वत्स, मौन! अनिर्वचनीयता!! यही प्रेम का लक्षण है। तथा मौन की गहन गहराइयों में भगवान विराजमान हैं। सभी बाहरी झंझटों को छोड़ो। जहाँ भी मैं जाऊँ, तुम आओ। मैं जो बनूँ तुम भी वही बनो। भगवत् पवित्रता के लिए भक्तों के हूदय विभिन्न मदिर हैं, जहाँ सुगंधित धूप की तरह विचार ईश्वर की ओर उठते हैं। तुम जो कुछ भी करते हो उसका अध्यात्मीकरण करलो। रूप अरूप सभी में ब्रह्म का, देवत्व का दर्शन करो । ईश्वर से श्रेष्ठ और कुछ झुक भी नहीं है।

🔴 अन्तर्जगत् की अन्तरतम गुहा में जिसमें व्यक्ति उत्कट प्रेम या कातर प्रार्थना द्वारा प्रविष्ट होता है, वहाँ अनुभूति में आध्यात्मिक जगत के ब्रह्माण्ड के बाद ब्रह्माण्ड भरे हुये हैं तथा ईश्वर सर्वदा सन्निकट हैं। वह भौतिक अर्थ में निकट नहीं किन्तु आध्यात्मिक अर्थ में हमारी आत्मा के भी आत्मा के रूप में। वे हमारी आत्मा के सार तत्व हैं। वे हमारे सभी विचारों तथा अंतरतम में छिपे अति गोपन आकांक्षाओं के भी ज्ञाता हैं। स्वयं को समर्पित करदो। प्रेम के लिए प्रेम ! जितना अधिक तुम अन्तर में प्रविष्ट करते हो उतना ही तुम मेरे निकट आते हो क्योंकि मैं अन्तरतम का निवासी हूँ। क्योंकि मैं ही वह चुम्बक हूँ जो तुम्हारी अनुभूति तथा आत्मा की महिमा को प्रगट करता है। मैं आत्मा हूँ, विचार या रूप से अछूती आत्मा! मैं अभेद्य, अविनश्वर आत्मा हूँ। मैं परमात्मा हूँ। ब्रह्म हूँ।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 आत्मचिंतन के क्षण 18 AUG 2016


🔴 जीवन के आधार स्तम्भ सद्गुण है। अपने गुण, कर्म, स्वभाव को श्रेष्ठ बना लेना, अपनी आदतों को श्रेष्ठ सज्जनों की तरह ढाल लेना वस्तुतः ऐसी बड़ी सफलता है, जिसकी तुलना किसी भी अन्य सांसारिक लाभ से नहीं की जा सकती। इसलिए सबसे अधिक ध्यान हमें इस बात पर देना चाहिए कि हम गुणहीन ही न बने रहें। सद्गुणों की शक्ति और विशेषताओं से अपने को सुसज्जित करने का प्रयत्न करें।

🔵 इस संसार की रचना कल्पवृक्ष के समान नहीं है कि जो कुछ हम चाहें वह तुरन्त ही मिल जाया करे। यह कर्मभूमि है, जहाँ हर किसी को अपना रास्ता आप बनाना पड़ता है। अपनी योग्यता और विशेषता का प्रमाण प्रस्तुत किये बिना कोई किसी महत्त्वपूर्ण स्थान पर नहीं पहुँच सकता । यहाँ हर किसी को परीक्षा की अग्नि में तपाया जाता है और जो इस कसौटी पर खरा उतरता है, उसी को प्रामाणिक एवं विश्वस्त माना जाता है।

🔴 उन्नति कोई उपहार नहीं है, जो छत फाड़कर अनायास ही हमारे घर में बरस पड़े। उसके लिए मनुष्य को कठोर प्रयत्न करने पड़ते हैं और एक मार्ग अवरुद्ध हो जाय तो दूसरा सोचना पड़ता है। गुण, योग्यता और क्षमता ही सफलता का मूल्य है। जिसमें जितनी क्षमता होगी उसे उतना ही लाभ मिलेगा।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

बुधवार, 17 अगस्त 2016

👉 समाधि के सोपान (भाग 19) (In The Hours Of Meditation)


🔴 गहराई में जाओ और तुम पाओगे कि तुम शक्तिमान हो। अपने स्वभाव के अंतरतम में प्रवेश करो '' वहाँ तुम पाओगे कि तुम अपने आध्यात्मिक प्रयत्नों में खरे हो। कुछ असफलताओं से क्या होता है ? समझ लो भय और दुर्बलता भौतिक मात्र हैं। वे स्वप्न के नीड़ शरीर से ही उत्पन्न होते हैं। किन्तु तुम अपने सत्यस्वरूप में मुक्त और निर्भय हो। वत्स शक्ति के गीत गाओ! गाओ ! गाओ! तुम अमृत की संतान हो ! तुम्हारा गंतव्य सत्य है। दिन के क्षण- भंगुर अनुभव विशाल मृगतृष्णा में भ्रान्तियों के अतिरिक्त और क्या हैं ? या तो जीवन को तुच्छ समझो या उसे नकार दो। चाहे जैसे भी हो यह करो। आध्यात्मिकता का साक्षात्कार करो। उपाय चाहे विधेयात्मक हो या निषेधात्मक, सभी एक हैं।

🔵 और तब मेरी आत्मा में एक शांति का भाव उठा। एक महान शांति उदित तथा उस शांति में अक्रिय सर्वव्यापी सर्वज्ञ महाशक्ति ने हठात् स्वयं को प्रगट किया। वह एक शक्ति थी जिसने मेरी आत्मा को शक्ति दी। मन की इस चेतन अवस्था में गुरुदेव की वाणी सुनाई पड़ी और उसने कहा, समय के भीतर तथा समय के परे शाश्वत में मैं ही हूँ। शरीरी अशरीरी सभी कुछ आत्मा ही है। हृदय में सर्वदा एकत्व हैं। हृदय में सर्वदा शांति है। सतह पर के तूफान के नीचे, विविधता की लहरों के नीचे तथा इनसे उत्पन्न होने वाले सभी संघर्षों और संतापों के नीचे सत्य की अन्त: धारा प्रवाहित है।
तत् त्वम् असि !
तत् त्वम् असि !!

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 आत्मचिंतन के क्षण 17 AUG 2016


🔴 पुरुषार्थ ही हमारी स्वतंत्रता और सभ्यता की रक्षा करने के लिए दृढ़ दुर्ग है जिसे कोई भी बेध नहीं सकता। हमें अपनी शक्ति पर भरोसा रखकर, पुरुषार्थ के बल पर जीवन संघर्ष में आगे बढ़ना। यदि हमें कुछ करना है, स्वतंत्र रहना है, जीवित रहना है, तो एक ही रास्ता है-पुरुषार्थ की उपासना का। पुरुषार्थ ही हमारे जीवन का मूलमंत्र  है।

🔵 लेखों और भाषणों का युग अब बीत गया। गाल बजाकर लम्बी चौड़ी डींग हाँक कर या बड़े बड़े कागज काले करके संसार के सुधार की आशा करना व्यर्थ है। इन साधनों से थोड़ी मदद मिल सकती है, पर उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता। संसार को सुधारने का प्रधान साधन यही हो सकता है कि हम अपना मानसिक स्तर ऊँचा उठायें, चरित्र की दृष्टि से अपेक्षाकृत उत्कृष्ट बनें। अपने आचरण से ही दूसरों को प्रभावशाली शिक्षा दी जा सकती है।
🔴 सीखने की इच्छा रखने वाले के लिए पग-पग पर शिक्षक मौजूद हैं, पर आज सीखना कौन चाहता है? सभी तो अपनी अपूर्णता के अहंकार के मद में ऐंठे-ऐंठे से फिरते हैं। सीखने के लिए हृदय का द्वार खोल दिया जाय तो बहती हुई वायु की तरह शिक्षा, सच्ची शिक्षा स्वयमेव हमारे हृदय में प्रवेश करने लगे।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

मंगलवार, 16 अगस्त 2016

👉 एक सैल्यूट इन्हें भी


🔴 जहां यह तैनात रहते हैं वहां की हवा आदमखोर कहलाती है। पारा माइनस 70 डिग्री से कम रहता है और यह इस तापमान से जूझने वाले सुपरमैन कहलाते हैं। जी हां यही कहानी है सियाचिन ग्लेशियर पर तैनात रहने वाले भारतीय जवानों की। जवानों की पल्टन की तैनाती तीन-तीन माह के लिए की जाती है। 


🔵 इन तीन माह में यह नहाने से एकदम दूर रहते हैं। क्योंकि नहाने के लिए यदि बहादुरी दिखाने की कोशिश की तो शरीर का कोई ना कोई अंग गलकर वहीं गिर जाएगा। खाना भरपूर रहता है पर यह जानते हैं कि खाने के बाद उन्हें कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है। बर्फीले हवाएं इन्हें निगलने के लिए हर पल इनके सिर पर मंडराती रहती हैं। बर्फ के नीचे सैनिक दफन होते हैं और उनकी बर्फ में बनी कब्र के ऊपर मोर्चा लेने के दूसरी पौध खड़ी हो जाती है। 


🔴 इसके बाद भी यहां सैनिक मुस्तैदी से हर पल तैनात रहते हैं। मौसम से लड़ते हैं और पाकिस्तान से होनी वाली घुसपैठ पर भी नजर रखते हैं। बहुत कम पल्टन ऐसी होती हैं जिसमें उतने सैनिक ही वापस लौट आएं जितने सियाचिन पर मोर्चा संभालने पहुंचते हैं। यहां तैनात सैनिकों के सिर पर कोई ताज नहीं होता। इनके जान गंवाने की खबर भी सैनिकों परिजनों तक चिट्ठी से पहुंचती है। इसका मजमून हर भाषा में तैयार रहता है क्योंकि सैनिक के परिजनों की भाषा अलग-अलग होती है। बस सैनिक का नाम और नंबर खाली रहता है, जिसे सैनिक के जान गंवाने के बाद रिक्त स्थान में लिख दिया जाता है। 

🔵 यह पांच-पांच की संख्या में बर्फ पर कमर में रस्सी बांधकर गश्त करते हैं। ताकि कोई एक खाई में जाए तो बाकी उसे बचा सकें पर कई बार यह पांच के पांचों की बर्फ में समा जाते हैं और इनके बर्फ में समाने की जानकारी जब तक मिलती है, तब तक इनके ऊपर कई फुट मोटी बर्फ जम चुकी होती है।

फिऱ भी यह सब सहते हैं।
देश के लिए जीते और देश के लिए मरते हैं।
सलाम और सैल्यूट इन जवानों को।
इनकी जांबाजी को। इनके जज्बे को।

👉 समाधि के सोपान (भाग 18) (In The Hours Of Meditation)


🔴 और गुरु की वाणी ने मेरी आत्मा से कहा-तुम मनुष्य हो फिर तुम्हारा विश्वास कहाँ है ? क्या तुम पशु हो जो प्रत्येक खतरे के सामने काँपते हो! जब तक तुम देहबुद्धि को जीत नहीं लेते तब तक तुम सत्य की अनुभूति नहीं कर सकते। क्या तुम शव हो ? क्या तुम भौतिक धूल की कीचड़ में सदैव नाचते रहोगे ? अपनी क्षुद्रता से बाहर आओ। सामने आओ। मनुष्य बनो। यदि वह सदैव दबी रहे तो तुम्हारी दिव्यता कहाँ है ? तब क्या तुम इतने महत्त्वपूर्ण हो कि संसार तुम्हारे लिए रुका पड़ा रहे। आत्मा से आत्मा को जीतो। मुक्त हो जाओ। यदि तुम अविनश्वर की उपलब्धि की चेष्टा करो तो मृत्यु तुम्हारा स्पर्श नहीं कर सकेगी क्योंकि मृत्यु क्या है तुम यही भूल चुके होगे। अमरत्व तुम्हारा होगा।

🔵 समस्त संसार -सत्य के प्रगटीकरण के लिए रत है। किन्तु चरित्रगठन ही इस प्रयत्न की सफलता का प्रथम सोपान है। चरित्र ही सब कुछ है। चरित्र का निर्माण करो ! चरित्र का गठन करो !! प्रत्येक मुहूर्त अपने चरित्र का गठन करो। अपनी आत्मा में अमरत्व का चिन्तन करो और तुम अमर हो जाओगे। सत्य को अपना निवासस्थान बना लो और तब जन्म, मृत्यु तथा जीवन के विभिन्न अनुभव तुम्हें भयभीत न कर सकेंगे।

🔴 शरीर को जाने दो। इसके प्रति आसक्ति छोड़ो। स्वयं को मन में मुक्त कर लो। काम, भय, भोजन, तथा निद्रा में सीमित पशु- चेतना को जीतना ही धर्म तथा नैतिकता है। इसे त्यागो। शव के प्रति इस आसक्ति को त्यागो। इसे शव कह कर ही संबोधित करो। सदा इसके साथ शव के समान ही व्यवहार करो। इसके ऊपर सोने का आवरण न चढ़ाओ। यह गंदा है। आत्मा ही सत्य है। आत्मा की चेतना अमर है। अमरता के विचार तुम्हें शाश्वत में ले जाते हैं। वीर बनो! साहसी बनो! वज्र के समान शक्तिशाली बनो। वत्स! यदि तुम ईश्वर का साक्षात्कार करना चाहते हो तो शरीर की चिन्ता का समय नहीं है। अभी समय है, अभी अवसर है। तुम सत्य की सन्तान हो। सत्य तुम्हारा स्वभाव है। इसीलिए  आत्मा के चैतन्य में डूब जाओ। निर्भीक बनो। जीवन के सुख दु:ख के ऊपर उठना सीखो। स्मरण रखो तुम आत्मा हो।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 आत्मचिंतन के क्षण 16 AUG 2016


🔴 स्वतंत्र बुद्धि की कसौटी पर आप जिस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं उसे साहस के साथ प्रकट कीजिए, दूसरों को सिखाइए। चाहे आपको कितने ही विरोध-अवरोधों का सामना करना पड़े, आपकी बुद्धि जो निर्णय देती है, उसका गला न घोटें। आप देखेंगे कि इससे आपकी बौद्धिक तेजस्विता, विचारों की प्रखरता बढ़ेगी और आपकी बुद्धि अधिक कार्य कुशल और समर्थ बनेगी।

🔵 घिसने और टकराने से शक्ति उत्पन्न होती है। यह वैज्ञानिक नियम है। ईश्वर अपने प्रिय पुत्र मानव को शक्तिवान्, प्रगतिशील, विकासोन्मुख, चतुर, साहसी और पराक्रमी बनाना चाहता है। इसीलिए वह समस्याओं और कठिनाइयों का एक बड़ा अम्बार प्रत्येक मनुष्य के सामने खड़ा किया करता है।

🔴 भूलें वे हैं, जो अपराधों की श्रेणी में नहीं आतीं, पर व्यक्ति के विकास में बाधक हैं। चिड़चिड़ापन, ईर्ष्या, आलस्य, प्रमाद, कटुभाषण, अशिष्टता, निन्दा, चुगली, कुसंग, चिन्ता, परेशानी, व्यसन, वासनात्मक कुविचारों एवं दुर्भावनाओं में जो समय नष्ट होता है, उसे स्पष्टतः समय की बर्बादी कहा जायेगा। प्रगति के मार्ग में यह छोटे-छोटे दुर्गुण ही बहुत बड़ी बाधा बनकर प्रस्तुत होते हैं।  यह भूलें अपराधों के समान ही हानिकारक हैं।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

👉 कैसे भूलें अपनी गलतियों को : स्वयं को माफ़ करने के 5 तरीके।


🔴 कभी कभी हम कुछ ऐसा कर बैठते है या बोल देते हैं जिसके लिए हमें बाद में बेहद पश्चाताप होता है। खासकर तब जब आपने किसी अपने का दिल दुखाया हो।

रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय,
टूटे से फिर  ना जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाय।


अपने आप को और अपनी गलतियों को माफ़ करने में कुछ बातें बेहद सहायक होती हैं।

🔵 1. दूसरों को दोष देना बंद करें :

अपने आप को माफ़ करने से पहले ये जान लेना जरुरी है कि आखिर आपने किया क्या था। आपके साथ हुयी घटना को विस्तार से लिख लें और अपने उन बातों  को भी लिखें जिससे उस घटना के घटने में मदद मिली हो। किसी और व्यक्ति या परिस्थितियों को दोष देने से बचें और सिर्फ अपने आप पर ध्यान केंद्रित करें। हो सकता है ऐसे करते समय आप असहज महसूस करें।

🔴 2. माफ़ी मांगने में संकोच न करें :

कुछ इस तरह हमने अपनी जिंदगी आसान कर ली ,
कुछ को माफ़ कर दिया और कुछ से माफ़ी  मांग ली।


हालाँकि माफ़ी मांगना इतना आसान नहीं होता लेकिन अगर आप किसी से माफ़ी मांगने के लिए पहल करते हैं तो ये दर्शाता है कि आपसे गलती हुयी थी और आप उसके लिए शर्मिन्दा हैं, और इस तरह आप वैसी गलतियों को दोहराने से बच जाते हैं।

🔵 3. नाकारात्मक विचारों को उत्पन्न होते ही त्याग दें:

कभी कभी माफ़ किये जाने पर भी हम अपने आप को माफ़ नहीं कर पाते।  स्वयं को माफ़ करना एक बार में ही संभव नहीं है, यह धीरे-धीरे समय के साथ परिपक्व होता है। इसलिए जब भी आपके मन में नाकारात्मक विचार आये गहरी सांस लेकर उसे उसी समय निकल दें और अपना ध्यान कहीं और लगायें, या इस तरह की कोई प्रक्रिया जिसे आप पसंद करते हों अपनाएँ।

🔴 4. शर्म के मरे छुपने की वजाय सामने आईये :

अपनी किसी भयंकर गलती के बाद शर्म से छुप जाना बिलकुल भी अच्छा नहीं है। अपनी गलती के बाद हम अपने दोस्त से नजरें मिलाने में झिझकते है क्यूंकि हमें डर होता है की कहीं वह मुझे पिछली बात को याद न करा दे, लेकिन जैसे ही हम उनसे मिलने की हिम्मत जुटाते है  महसूस होगा कि हमारा डर गलत था।

🔵 5. अपनी गलतियों के लिए आभारी बने :

अपनी गलतियों के प्रति आभारी होना आपको बिलकुल विचित्र लगेगा खासकर वैसी गलतियां जिनसे आपको शर्मिंदगी महसूस हुयी हो या दुःख पहुंचा हो लेकिन अगर आप गौर से एनालाइज करेंगे तो पाएंगे कि ऐसी की गयी गलतियों ने आपको कितना मजबूत और सुदृढ़ किया है।  आप ये देख पाएंगे कि इन्ही गलतियों की वजह से ही आप अधिक बुद्धिमान, मजबूत और विचारशील हो पाये हैं।  

रविवार, 14 अगस्त 2016

छोटी उम्र में महान कार्य करने वाले भारतीय


🔴 विवेकानंद: 39 साल का पूरा जीवन और 32 साल की उम्र मे पूरे विश्व मे हिन्दुत्व का डंका बजाने वाले निर्विवाद भारतीय महापुरुष।

🔵 रानी लक्ष्मी बाई: 30 साल की उम्र मे अंग्रेज़ो के खिलाफ क्रांति का नेतृत्व करने वाली अमर बलिदानी झाँसी की रानी।

🔴 भगत सिंह: 23 वर्ष की अल्पायु मे बलिदान। भगत सिंह भारत के एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे। भगतसिंह ने देश की आज़ादी के लिए जिस साहस के साथ शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार का मुक़ाबला किया, वह आज के युवकों के लिए एक बहुत बड़ा आदर्श है। इन्होंने केन्द्रीय संसद (सेण्ट्रल असेम्बली) में बम फेंककर भी भागने से मना कर दिया। जिसके फलस्वरूप इन्हें 23 मार्च, 1931 को इनके दो अन्य साथियों, राजगुरु तथा सुखदेव के साथ फाँसी पर लटका दिया गया।


🔵 खुदीराम बोस: भारतीय स्वाधीनता के लिये मात्र 19 साल की उम्र में हिन्दुस्तान की आजादी के लिये फाँसी पर चढ़ गये। मुज़फ्फरपुर जेल में जिस मजिस्ट्रेट ने उन्हें फाँसी पर लटकाने का आदेश सुनाया था, उसने बाद में बताया कि खुदीराम बोस एक शेर के बच्चे की तरह निर्भीक होकर फाँसी के तख़्ते की ओर बढ़ा था। जब खुदीराम शहीद हुए थे तब उनकी आयु 19 वर्ष थी। शहादत के बाद खुदीराम इतने लोकप्रिय हो गए कि बंगाल के जुलाहे उनके नाम की एक ख़ास किस्म की धोती बुनने लगे।

🔴 करतार सिंह साराभा: 19 साल की उम्र मे लाहौर कांड के अग्रदूतों मे एक होने के कारण फांसी की सजा। देश के लिए दिया गया सर्वोच्च बलिदान।

🔵 अशफाक़ उल्ला खाँ: 27 साल की उम्र मे देश के लिए प्राणो की आहुती देने वाले वीर हुतात्मा।

🔴 उधम सिंह: 14 साल की उम्र से लिए अपने प्रण को उन्होने 39 साल की उम्र मे पूरा किया और देश के लिए फांसी चढ़े। उन्होने जालियाँवाला बाग हत्याकांड के उत्तरदायी जनरल डायर को लन्दन में जाकर गोली मारी और निर्दोष लोगों की हत्या का बदला लिया।

🔵 गणेश शंकर विद्यार्थी: 25 साल की उम्र से सक्रिय 40 साल की उम्र मे हिन्दुत्व की रक्षा के लिए बलिदान।

🔴 राजगुरु: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख क्रान्तिकारी थे । 23 साल की उम्र मे इन्हें भगत सिंह और सुखदेव के साथ 23 मार्च 1931 को फाँसी पर लटका दिया गया था ।

🔵 सुखदेव: 33 साल की अल्पायु मे 23 मार्च 1931 को इन्होंने भगत सिंह तथा सुखदेव के साथ लाहौर सेण्ट्रल जेल में फाँसी के तख्ते पर झूल कर अपने नाम को हिन्दुस्तान के अमर शहीदों की सूची में अहमियत के साथ दर्ज करा दिया।

🔴 चन्द्रशेखर आजाद : 25 साल की उम्र मे बलिदान : चन्द्रशेखर आज़ाद ने वीरता की नई परिभाषा लिखी थी। उनके बलिदान के बाद उनके द्वारा प्रारम्भ किया गया आन्दोलन और तेज हो गया, उनसे प्रेरणा लेकर हजारों युवक स्वरतन्त्रता आन्दोलन में कूद पड़े। आजाद की शहादत के सोलह वर्षों बाद 15 अगस्त सन् 1947 को हिन्दुस्तान की आजादी का उनका सपना पूरा तो हुआ किन्तु वे उसे जीते जी देख न सके। आजाद अपने दल के सभी क्रान्तिकारियों में बड़े आदर की दृष्टि से देखे जाते थे। सभी उन्हें पण्डितजी ही कहकर सम्बोधित किया करते थे। वे सच्चे अर्थों में पण्डित राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ के वास्तविक उत्तराधिकारी थे।

🔵 मंगल पांडे: सन् 1857 के प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के अग्रदूत थे। क्रांति के समय और फांसी दिये जाने के समय इनकी उम्र 30 साल थी।
🔴 राम प्रसाद ‘बिस्मिल’: काकोरी कांड के क्रांतिकारी । 28 साल की उम्र मे काकोरी कांड से अंग्रेज़ सत्ता हो हिला के रख दिया और 30 साल की उम्र मे बलिदान।

महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी


👉 अखिल विश्व गायत्री परिवार के संस्थापक महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य के इस पक्ष को भी जानिए।

🔵 परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य राष्ट्र के परावलम्बी होने की पीड़ा भी उन्हें उतनी ही सताती थी जितनी कि गुरुसत्ता के आदेशानुसार तपकर सिद्धियों के उपार्जन की ललक उनके मन में थी। उनके इस असमंजस को गुरुसत्ता ने ताड़कर परावाणी से उनका मार्गदर्शन किया  कि युगधर्म की महत्ता व समय की पुकार देख- सुनकर तुम्हें अन्य आवश्यक कार्यों को छोड़कर अग्निकाण्ड में पानी लेकर दौड़ पड़ने की तरह आवश्यक कार्य भी करने पड़ सकते हैं।

🔴 इसमें स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के नाते संघर्ष करने का भी संकेत था। १९२७ (1927) से १९३३ (1933) तक का समय उनका एक सक्रिय स्वयं सेवक-स्वतंत्रता सेनानी के रूप में बीता, जिसमें घरवालों के विरोध के बावजूद पैदल लम्बा रास्ता पार कर वे आगरा के उस शिविर में पहुँचे, जहाँ शिक्षण दिया जा रहा था, अनेकानेक मित्रों- सखाओं के साथ भूमिगत हो कार्य करते रहे तथा समय आने पर जेल भी गये ।। छह-छह माह की उन्हें कई बार जेल हुई ।।

🔵 जेल में भी जेल के निरक्षर साथियों को शिक्षण देकर व स्वयं अँग्रेजी सीखकर लौटै। आसनसोल जेल में वे श्रीमती स्वरूपरानी नेहरू, श्री रफी अहमद किदवई, महामना मदनमोहन मालवीय जी, देवदास गाँधी जैसी हस्तियों के साथ रहे व वहाँ से एक मूलमंत्र सीखा जो मालवीय जी ने दिया था कि जन- जन की साझेदारी बढ़ाने के लिए हर व्यक्ति के अंशदान से, मुट्ठी फण्ड से रचनात्मक प्रवृत्तियाँ चलाना।

🔴 यही मंत्र आगे चलकर एक घंटा समयदान, बीस पैसा नित्य या एक दिन की आय एक माह में तथा एक मुट्ठी अन्न रोज डालने के माध्यम से धर्म घट की स्थापना का स्वरूप लेकर लाखों- करोड़ों की भागीदारी वाला गायत्री परिवार बनता चला गया, जिसका आधार था - प्रत्येक व्यक्ति की यज्ञीय भावना का उसमें समावेश।

🔵 स्वतंत्रता की लड़ाई के दौरान कुछ उग्र दौर भी आये, जिनमें शहीद भगतसिंह को फाँसी दिये जाने पर फैले जन आक्रोश के समय श्री अरविन्द के किशोर काल की क्रान्तिकारी स्थिति की तरह उनने भी वे कार्य किये, जिनसे आक्रान्ता शासकों प्रति असहयोग जाहिर होता था। नमक आन्दोलन के दौरान वे आततायी शासकों के समक्ष झुके नहीं, वे मारते रहे परन्तु, समाधि स्थिति को प्राप्त राष्ट्र देवता के पुजारी को बेहोश होना स्वीकृत था पर आन्दोलन के दौरान उनने झण्डा छोड़ा नहीं जबकि, फिरंगी उन्हें पीटते रहे, झण्डा छीनने का प्रयास करते रहे। उन्होंने मुँह से झण्डा पकड़ लिया, गिर पड़े, बेहोश हो गये पर झण्डे का टुकड़ा चिकित्सकों द्वारा दाँतों में भींचे गये टुकड़े के रूप में जब निकाला गया तक सब उनकी सहनशक्ति देखकर आश्चर्यचकित रह गये। उन्हें तब से ही आजादी के मतवाले उन्मत्त श्रीराम मत्त नाम मिला।

🔴 अभी भी भी आगरा में उनके साथ रहे या उनसे कुछ सीख लिए अगणित व्यक्ति उन्हें मत्त जी नाम से ही जानते हैं।

🔵 लगानबन्दी के आकड़े एकत्र करने के लिए उन्होंने पूरे आगरा जिले का दौरा किया व उनके द्वारा प्रस्तुत वे आँकड़े तत्कालीन संयुक्त प्रान्त के मुख्यमंत्री श्री गोविन्द वल्लभ पंत द्वार गाँधी जी के समक्ष पेश किये गये। बापू ने अपनी प्रशस्ति के साथ वे प्रामाणिक आँकड़े ब्रिटिश पार्लियामेन्ट भेजे, इसी आधार पर पूरे संयुक्त प्रान्त के लगान माफी के आदेश प्रसारित हुए।

🔴 कभी जिनने अपनी इस लड़ाई के बदले कुछ न चाहा, उन्हें सरकार ने अपने प्रतिनिधि के साथ सारी सुविधाएँ व पेंशन दिया, जिसे उनने प्रधानमंत्री राहत फण्ड के नाम समर्पित कर दी। वैरागी जीवन का, सच्चे राष्ट्र संत होने का इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है?
 

👉 समाधि के सोपान (भाग 17) (In The Hours Of Meditation)


🔴 अहो! एक जीवन है, जो प्रेम है, आनन्द है। मैं- वही जीवन हूँ। उस जीवन को कोई सीमित नहीं कर सकता, परिमित नहीं कर सकता तथा वही अनन्त जीवन है। वही शाश्वत जीवन है और वह जीवन मैं ही हूँ। उसका स्वभाव शांति है और मैं स्वयं शांति हूँ। उसकी समग्रता में कहीं कलह नहीं है। त्वरित आवागमन नहीं है। जीने की निर्दय चेष्टा नहीं है, प्रजनन की इच्छा नहीं है। वह अस्तिमात्र है। मैं वही जीवन हूँ। सूर्य और तारे इसे धारण नहीं कर सकते। इस ज्योति से अधिक प्रकाशमान और कोई ज्योति नहीं है। यह स्वयं- प्रभ है। इस जीवन की गहराइयों को नहीं नापा जा सकता। इसकी ऊँचाइयों को नहीं नापा जा सकता। मैं ही वह जीवन हूँ। तथा तुम मुझमें और मैं तुममें हूँ।

🔵 स्वयं निरालम्ब हो कर भी मैं सब का अवलम्बन हूँ। सभी रूपों में आत्मा मैं ही हूँ। जीवन की ध्वनि में मैं मौन हूँ। समय के ताने- बाने में बुना हुआ सब कुछ मैं ही हूँ। विचार और रूप के परे आत्मा मैं ही हूँ। मनरहित होकर भी मैं सर्वज्ञ हूँ। अरूप होकर भी मैं सर्वत्र हूँ। अधार्य होकर मैं सभी में विद्यमान हूँ। मैं शक्ति  हूँ ! मैं शांति हूँ। मैं अनंत हूँ।  मैं शाश्वत हूँ। सभी विविधताओं में ऐक्य स्थापन करने वाला सूत्र मैं ही हूँ। सभी जीवधारियों का सारतत्त्व मैं ही हूँ। सभी संघर्षरत अंशों का पूर्ण मैं ही हूँ। जन्म मृत्यु की सीमा के परे, अमर, अजन्मा, बंधनमुक्त में ही विद्यमान हूँ। जो मुझे पा लेता है वही मुक्त है।

🔴 सभी भ्रान्तियों के मध्य में मैं सत्य को देखता हूँ। वह दृश्य सत्य मैं ही हूँ। माया जो कि माँ का ही स्वरूप है, मैं उस मायिक शक्ति का शक्तिधर हूँ। काल के गर्भ से उत्पन्न होकर सभी रूपधारियों में मैं ही रूपधारण करता हूँ। मैं काल का भी जन्मस्थान हूँ। इसलिए शाश्वत हूँ। तथा जीव, तू वही है, जो मुझमें है, वही अन्तरात्मा ! इसलिए उठो, जागो और सभी बंधनों को छिन्न भिन्न कर दो। सभी स्वप्नों को भंग कर दो। भ्रांतियों को दूर कर दो। तुम्हीं आत्मा हो। आत्मा ही तुम हो। तुच्छता तुम्हारे स्वरूप के अनुभव में बाधा दे सकती है।  उठो ! उठो !! और जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाय न रुको। लक्ष्य जो आत्मा है, जीवन है, प्रेम है, है, जो कि मुक्त आत्मा का आनन्द, -ज्ञान है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 आत्मचिंतन के क्षण 14 AUG 2016


🔴 उतावले और जल्दबाज, असंतुष्ट और उद्विग्न व्यक्ति एक प्रकार के अधपगले कहे जा सकते हैं वे जो कुछ चाहते हैं उसके तुरन्त ही प्राप्त हो जाने की कल्पना किया करते हैं। यदि जरा भी देर लगती है तो अपना मानसिक संतुलन खो बैठते हैं और प्रगति के लिए अत्यन्त आवश्यक गुण मानसिक स्थिरता को खोकर असंतोष रूपी उस भारी विपत्ति को कंधे पर ओढ़ लेते हैं, जिसका भार लेकर उन्नति की दिशा में कोई आदमी देर तक नहीं चल सकता।
 
🔵 अपनी आलोचना कर सकना, आत्म-निरीक्षण करके अपनी बुराइयाँ ढूँढना और उन्हें सुधारने के लिए तत्पर होना सचमुच ही एक बड़ी बहादुरी और दूरदर्शिता का काम है। जिसमें इतना साहस आ गया, उसे सच्चे अर्थों में आध्यात्मिक व्यक्ति कहा जा सकता है।
 
 🔴 बड़प्पन की इच्छा सबको होती है, पर बहुत कम लोग यह जानते हैं कि उसे कैसे प्राप्त किया जाय। जो जानते हैं वे उस ज्ञान को आचरण में लाने का साहस नहीं करते। आमतौर से यह सोचा जाता है कि जिसका ठाटबाट जितना बड़ा है वह उसी अनुपात से बड़ा माना जाएगा। मोटर, बंगला, सोना, जायदाद, कारोबार, सत्ता, पद आदि के अनुसार किसी को बड़ा मानने का रिवाज चल पड़ा है। इससे प्रतीत होता है कि लोग मनुष्य के व्यक्तित्व को नहीं, उसकी दौलत को बड़ा मानते हैं- यह दृष्टिदोष ही है।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

👉 समाधि के सोपान (भाग 16) (In The Hours Of Meditation)


🔴 ईश्वर से प्रति ध्वनित हो कर आवाज आई। उसने कहा, अहो ! एक ऐसा प्रेम है जो किसी से नही डरता। जो जीवन से भी महान है। मृत्यु से भी महान है। मैं वही प्रेम हूँ। एक ऐसा प्रेम है जो सीमा नहीं जानता। जो सर्वत्र है, जो मृत्यु की उपस्थिति में तथा है तथा जो केवल कोमलता है। भीषण के मध्य भी जो केवल कोमलता है। मैं वही प्रेम हूँ। वह प्रेम जो अनिर्वचनीय मधुरता है, जो सभी वेदनाओं का, सभी भयों का, स्वागत करता ह, जो सभी प्रकार की उदासीनता को दूर कर देता है, जिसकी खोज तुम कहीं भी कर सकते हो, मैं वही प्रेम हूँ। अहो! मैं उसी प्रेम का सार हूँ। और हे आत्मन्  मैं वह प्रेम हूँ। मैं तुम्हारा आत्मस्वरूप हूँ।  प्रेम ही मेरा स्वभाव है। मैं स्वयं प्रेम हूँ।

 
🔵 ओह! यह एक सर्वग्राही सौंदर्य है। इसमें त्रुटियों और असौन्दर्य के लिए स्थान नहीं है। यह आकाश के समान विस्तृत और समुद्र के समान गंभीर है। यह सौंदर्य सुगंधित उषा तथा अरुणिम संध्या में प्रस्फुटित होता है। पक्षी के कलरव तथा बाघ की गर्जना में यह विद्यमान है। तूफान और शांति में यही सौंदर्य विद्यमान है किन्तु यह इन सबसे अतीत है। ये सब इसके पहलू हैं। मैं वह सौंदर्य हूँ। एक ऐसा सौंदर्य है जो सुख तथा दु:ख से अधिक गहन गभीर हैं। यह आत्मा का सौंदर्य है। मैं वह सोंदर्य हूँ। मैं ही वह सौंदर्य हूँ। सभी प्रकार के आकर्षणों का केन्द्र मैं ही हूँ। मैं चुम्बक हूँ। दूसरी सभी वस्तुएँ लोहे के छोटे-छोटे कण है। कोई इधर आकर्षित होता है तो कोई उधर।  किन्तु सभी आकर्षित होने को बाध्य हैं। मैं ही वह चुम्बक हूँ। मैं ही वह सौंदर्य हूँ। मैं ही वह आकर्षण हूँ तथा आनन्द ही मेरा स्वरूप है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

👉 आत्मचिंतन के क्षण 13 AUG 2016


🔴 भविष्य की कल्पना करते समय शुभ और अशुभ दोनों ही विकल्प सामने हैं। यह अपनी ही इच्छा पर निर्भर है कि शुभ सोचा जाय अथवा अशुभ। शुभ को छोड़कर कोई व्यक्ति अशुभ कल्पनाएँ करता है, तो इसमें किसी और का दोष नहीं है। दोषी है तो वह स्वयं ही, इसलिए कि उसने शुभ चिंतन का विकल्प सामने रहते हुए भी अशुभ चिंतन को ही अपनाया।

🔵 जैसे को तैसा-यह नीति अपना लेने पर तो बड़ा भी छोटा हो जाता है। गाली का जवाब गाली से और घूँसे का जवाब घूँसे से देने में कोई बड़ी बात नहीं है। ऐसा तो पशु भी आपस में लड़कर द्वंद्व युद्ध कर लेते हैं। क्षमा और सहनशीलता हर किसी का काम नहीं है। उसे बड़े आदमियों में ही देखा जा सकता है। वे नेकी कर कुएँ में डाल की नीति अपनाते हैं।

🔴 अपनी महत्त्वाकाँक्षाओं के बारे में हमें विवेकपूर्ण बुद्धि से सोचना चाहिए कि वे कितनी यथार्थ और कितनी उपयोगी है? कहीं उन्होंने हमें भुलावे में तो नहीं डाल रखा है? वे हमें जीवन के सही रास्ते पर ले जाती हैं या हमें पथ भ्रष्ट कर रही हैं। किन्हीं प्रलोभनों के पीछे तो हम नहीं दौड़ रहे हैं? हमारी आकाँक्षाओं के पीछे कोई स्वार्थ बुद्धि तो काम नहीं कर रही? महत्त्वाकाँक्षाएँ यदि निकृष्ट स्तर की हों तो उन्हें त्याग देना चाहिए।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

👉 अपना अपना भाग्‍य

एक राजा के तीन पुत्रियाँ थीं और तीनों बडी ही समझदार थी। वे तीनो राजमहल मे बडे आराम से रहती थी। एक दिन राजा अपनी तीनों पुत्रियों सहित भोज...