शुक्रवार, 19 अगस्त 2016

👉 समाधि के सोपान (भाग 21) (In The Hours Of Meditation)



🔴 गुरूदेव की वाणी कितनी आश्चर्य जनक है। मेरी आत्मा पुकार उठती है। हे महाभाग, आप स्वयं ईश्वर हैं। आप जिसका उपदेश देते हैं आप स्वयं वही हैं। आप विश्व की आत्मा है। आप सर्वस्व हैं। यद्यपि आपकी माया विविध रूप का आभास देती है तथापि आप स्वयं एकम् अद्वितीयम् हैं। आपके एकत्व की महिमा महान है, क्योंकि आत्मा एक है। आत्मा सारभूत है जिसमें अंश या विभाग नहीं है। आत्मा एक ही ज्योति है जो विभिन्न रंगों के काँचों से देखी जा रही है। हे गुरुदेव, मुझे कृप्या उस जीवन में ले चलिये जो आपका जीवन है। आप ब्रह्मा हैं! आपविष्णु हैं ! आप सदाशिव हैं! आप ब्रह्म हैं! परम ब्रह्म हैं!!

हर हर बम बम महादेव!

🔵 उसके पश्चात मेरी आत्मा मानो सातवें आसमान में पहुँच गई। और मैंने मनुष्य की दिव्यता के दर्शन किए। मनुष्य की दुर्बलता के महत्त्व को भी समझा। मैंने देखा वहाँ सभ कुछ दिव्य है। तथा इस दिव्य ज्योति के भीतर मैंने देखा कि इस अन्तर्जगत में अनुभूति के पर्वत पर गुरुदेव मानो दूसरे कृष्ण हो कर विराजमान हैं। गहन! समय से गहन! आकाश से भी अधिक -सर्वव्यापी हैं ध्यान राज्य का यह अन्तर्जगत। वहाँ अंधकार हो ही नहीं सकता। क्योंकि वहाँ केवल ज्योति है। वहाँ अज्ञान हो ही नहीं सकता क्योंकि वहाँ केवल ज्ञान है। वहाँ मृत्यु का वश नहीं चलता। अग्नि जला नहीं सकती, जल  भीगा नहीं सकता, वायु सुखा नहीं सकती। वह उस पुराण पुरुष का राज्य है। जीवन की सभी छलनाओं के पार असीम और कूटस्थ है।

🔴 और उस महिमा में अंतरतम से बोलते हुये गुरुकी वाणी ने कहा वत्स! यह तुम्हारी विरासत है। अनन्तशक्ति तुम्हारी है। जब सभी शक्ति तुम्हारी है कब क्या तुम दुर्बल हो सकते हो ? इन्द्रियों के दिखावे से तुम संतुष्ट नहीं रह सकते। इस बाह्य जगत् की तड़क भड़क के पीछे मृत्यु तथा विस्मृति ही है। जब मृत्यु आती है यह शरीर शव हो जाता है किन्तु आत्मा सदैव मुक्त है। वह अशरीरी है। साक्षी है, क्योंकि शरीरों का नाश हो सकता है किन्तु आत्मा अनश्वर है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर

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