शनिवार, 21 जुलाई 2018

👉 महात्मा बुद्ध और अनुयायी -

🔷 भगवान् बुद्ध के एक अनुयायी ने कहा, प्रभु ! मुझे आपसे एक निवेदन करना है।बुद्ध: बताओ क्या कहना है?

🔶 अनुयायी: मेरे वस्त्र पुराने हो चुके हैं. अब ये पहनने के लायक नहीं रहे. कृपया मुझे नए वस्त्र देने का कष्ट करें!

🔷 बुद्ध ने अनुयायी के वस्त्र देखे, वे सचमुच बिलकुल जीर्ण हो चुके थे और जगह जगह से घिस चुके थे… इसलिए उन्होंने एक अन्य अनुयायी को नए वस्त्र देने का आदेश दे दिए. कुछ दिनों बाद बुद्ध अनुयायी के घर पहुंचे.

🔶 बुद्ध: क्या तुम अपने नए वस्त्रों में आराम से हो? तुम्हे और कुछ तो नहीं चाहिए?

🔷 अनुयायी: धन्यवाद प्रभु मैं इन वस्त्रों में बिलकुल आराम से हूँ और मुझे और कुछ नहीं चाहिए।

🔶 बुद्ध: अब जबकि तुम्हारे पास नए वस्त्र हैं तो तुमने पुराने वस्त्रों का क्या किया?

🔷 अनुयायी: मैं अब उसे ओढने के लिए प्रयोग कर रहा हूँ?

🔶 बुद्ध: तो तुमने अपनी पुरानी ओढ़नी का क्या किया?

🔷 अनुयायी: जी मैंने उसे खिड़की पर परदे की जगह लगा दिया है।

🔶 बुद्ध: तो क्या तुमने पुराने परदे फ़ेंक दिए?

🔷 अनुयायी: जी नहीं, मैंने उसके चार टुकड़े किये और उनका प्रयोग रसोई में गरम पतीलों को आग से उतारने के लिए कर रहा हूँ।

🔶 बुद्ध: तो फिर रसॊइ के पुराने कपड़ों का क्या किया?

🔷 अनुयायी: अब मैं उन्हें पोछा लगाने के लिए प्रयोग करूँगा।

🔶 बुद्ध: तो तुम्हारा पुराना पोछा क्या हुआ?

🔷 अनुयायी: प्रभु वो अब इतना तार -तार हो चुका था कि उसका कुछ नहीं किया जा सकता था, इसलिए मैंने उसका एक -एक धागा अलग कर दिए की बातियाँ तैयार कर लीं…. उन्ही में से एक कल रात आपके कक्ष में प्रकाशित था।

🔶 बुद्ध अनुयायी से संतुष्ट हो गए वो प्रसन्न थे कि उनका शिष्य वस्तुओं को बर्वाद नहीं करता और उसमे समझ है कि उनका उपयोग किस तरह से किया जा सकता है।

🔷 दोस्तों, आज जब प्राकृतिक संसाधन दिन – प्रतिदिन कम होते जा रहे हैं ऐसे में हमें भी कोशिश करनी चाहिए कि चीजों को बर्वाद ना करें और अपने छोटे छोटे प्रयत्नों से इस धरा को सुरक्षित बना कर रखें।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 21 July 2018


👉 आज का सद्चिंतन 21 July 2018


👉 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार 1 (भाग 8)

👉 विशिष्टता का नए सिरे से उभार

🔷 दूध में मक्खन घुला होता है, पर उसे अलग निकालने के लिए उबालने, मथने जैसे कई कार्य संपन्न करने पड़ते हैं। प्राणवान प्रतिभाओं की इन दिनों अतिशय आवश्यकता पड़ रही है, ताकि इस समुद्र मंथन जैसे युगसंधि पर्व में अपनी महती भूमिका निभा सकें। अनिष्ट के अनर्थ से मानवीय गरिमा को विनष्ट होने से बचा सके। उज्ज्वल भविष्य की संरचना में ऐसा प्रचंड पुरुषार्थ प्रदर्शित कर सकें, जैसे-गंगा अवतरण के संदर्भ में मनस्वी भगीरथ द्वारा संपन्न किया गया था।
  
🔶 इन दिनों यह ढूँढ़-खोज ही बड़ा काम है। सीता को वापस लाने के लिए वानर समुदाय विशेष खोज में निकला था। समुद्र-मंथन भी ऐसी खोज का एक इतिहास है। गहरे समुद्र में उतरकर मणि-मुक्तक खोजे जाते हैं। कोयले की खदानों में से खोजने वाले हीरे ढूँढ़ निकालते हैं, धातुओं की खदान इसी प्रकार धरती को खोद-खोदकर ढूँढी जाती है। दिव्य औषधियों को सघन वन प्रदेशों में खोजना पड़ता है। वैज्ञानिक प्रकृति के रहस्यों को खोज लेने का काम करते हैं। हाड़-माँस की काया में से देवत्व का उदय, साधना द्वारा गहरी खोज करते हुए ही संभव किया जाता है।

🔷 महाप्राणों की इन दिनों इसी कारण भारी खोज हो रही है कि उनके बिना, युगसंधि का महाप्रयोजन पूरा भी तो नहीं हो सकेगा। आज तो व्यक्ति की सामयिक एवं क्षेत्रीय समस्याओं का निराकरण भी वातावरण बदले बिना संभव नहीं हो सकता। संसार में निकटता बढ़ जाने से, गुत्थियाँ भी वैयक्तिक न रहकर सामूहिक हो गई हैं। उनका निराकरण व्यक्ति को कुछ ले-देकर नहीं हो सकता। चेचक की फुंसियों पर पट्टी कहाँ बाँधते हैं? स्थायी उपचार तो रक्त-शोधन की प्रक्रिया से ही बन पड़ता है।
  
🔶 प्रस्तुत चिंतन और प्रचलन में इतनी अधिक विकृतियों का समावेश हो गया है कि उन्हें औचित्य एवं विवेक से सर्वथा प्रतिकूल माना जा सकता है। अस्वस्थता, उद्विग्नता, आक्रामकता, निष्ठुरता, स्वार्थांधता, संकीर्णता, उद्दण्डता का बड़ों और छोटों में अपने-अपने ढंग का बाहुल्य है। लगता है मानवीय मर्यादाओं और वर्जनाओं की प्रतिबद्धता से इनकार कर दिया गया है। फलतः व्यक्ति को अनेकानेक संकटों और समाज को चित्र-विचित्र समस्याओं का सामना करना पड़ता है। न कोई सुखी दिखता है, न संतुष्ट। अभाव और जन बाहुल्य नयी-नयी विपत्तियाँ खड़ी कर रहे हैं। हर कोई आतंक और आशंका से विक्षुब्ध जैसा दिखता है।
  
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 युग की माँग प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ 10

👉 मनुष्य को मनुष्य बनाने वाला धर्म

🔷 “मेरे देशवासियों! विषम परिस्थितियों का अन्त आ गया। काफी रो चुके, अब रोने की आवश्यकता नहीं रही। अब हमें अपनी आत्म शक्ति को जगाने का अवसर आया है। उठो, अपने पैरों पर खड़े हो और मनुष्य बनो। हम मनुष्य बनाने वाला ही धर्म चाहते हैं। सुख, सफलता ही क्या सत्य भी यदि शरीर, बुद्धि और आत्मा को कमजोर बनाये तो उसे विष की भाँति त्याग देने की दृढ़ता आप में होनी चाहिए।”

🔶 “जीवन-शक्ति विहीन धर्म कभी धर्म नहीं हो सकता। उसका तो स्वरूप ही बड़ा पवित्र, बलप्रद, ज्ञानयुक्त है। जो शक्ति दे, ज्ञान दे हृदय के अन्धकार को दूर कर नव स्फूर्ति भर दे। आओ, हम उस सत्य की, धर्म की वन्दना करें। कामना करें और जन जीवन में प्रवाहित होने दें। तोता बोल बहुत सकता है। पर वह आबद्ध कुछ कर नहीं सकता। हम रागद्वेष, काम, क्रोध, मद, मत्सर, अज्ञान, कुत्सा, कुविचार, दुष्कर्म के पिंजरे में आबद्ध न हों। अच्छी बात मुँह से कहें और उसे जीवन में उतारें भी। हमारे मस्तिष्कों में जो दुर्बलता भर गई है उसे निकाल कर शक्तिशाली बनने के लिए कटिबद्ध हो जाना चाहिये।

✍🏻 ~स्वामी विवेकानन्द
📖 अखण्ड ज्योति 1967 सितम्बर पृष्ठ 1

http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1967/September/v1.2

👉 भगवान भगवान की कृपा या अकृपा

🔷 एक व्यक्ति नित्य हनुमान जी की मूर्ति के आगे दिया जलाने जाया करता था। एक दिन मैंने उससे इसका कारण पूछा तो उसने कहा-”मैंने हनुमान जी की मनौती मानी थी कि यदि मुकदमा जीत जाऊँ तो रोज उनके आगे दिया जलाया करूंगा। मैं जीत गया और तभी से यह दिया जलाने का कम चल रहा है।

🔶 मेरे पूछने पर मुकदमे का विवरण बताते हुए उसने कहा- एक गरीब आदमी की जमीन मैंने दबा रखी थी, उसने अपनी जमीन वापिस छुड़ाने के लिए अदालत में अर्जी दी, पर वह कानून जानता न था और मुकदमें का खर्च भी न जुटा पाया। मैंने अच्छे वकील किए खर्च किया और हनुमान जी मनौती मनाई। जीत मेरी हुई। हनुमान जी की इस कृपा के लिए मुझे दीपक जलाना ही चाहिए था, सो जलाता भी हूँ।

🔷 मैंने उससे कहा-भोले आदमी, यह तो हनुमान जी की कृपा नहीं अकृपा हुई। अनुचित कार्यों में सफलता मिलने से तो मनुष्य पाप और पतन के मार्ग पर अधिक तेजी से बढ़ता है, क्या तुझे इतना भी मालूम नहीं। मैंने उस व्यक्ति को एक घटना सुनाई-’एक व्यक्ति वेश्यागमन के लिए गया। सीढ़ी पर चढ़ते समय उसका पैर फिसला और हाथ की हड्डी टूट गई। अस्पताल में से उसने सन्देश भेजा कि मेरी हड्डी टूटी यह भगवान की बड़ी कृपा है। वेश्यागमन के पाप से बच गया।

🔶 मनुष्य सोचता है कि जो कुछ वह चाहे उसकी पूर्ति हो जाना ही भगवान ही कृपा है। यह भूल है। यदि उचित और न्याययुक्त सफलता मिले तो ही उसे भगवान की कृपा कहना चाहिए। पाप की सफलता तो प्रत्यक्ष अकृपा है। जिससे अपना पतन और नाश समीप आता है उसे अकृपा नहीं तो और क्या कहें?

✍🏻 बिनोवा
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1964 पृष्ठ 3

👉 स्वार्थ छोडिये

एक छोटे बच्चे के रूप में, मैं बहुत स्वार्थी था, हमेशा अपने लिए सर्वश्रेष्ठ चुनता था। धीरे-धीरे, सभी दोस्तों ने मुझे छोड़ दिया और अब मेरे...