शनिवार, 5 अक्तूबर 2019

जन्मदिन का महत्त्व | Janam Divas Ka Mahatv | Pt Shriram Sharma Acharya



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जन्मदिन का महत्त्व | Janam Divas Ka Mahatv | Pt Shriram Sharma Acharya



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👉 शुद्ध अन्न से शुद्ध बुद्धि

श्री गुरु गोविन्दसिंह जी महाराज के पास खूब अशर्फियाँ थीं, खजाना था फिर भी वह यवनों से युद्ध होते समय अपने लड़ाकू शिष्यों को मुट्ठी भर चने देते थे। एक दिन उन मनुष्यों में से एक मनुष्य ने श्री गुरु गोविन्दसिंह जी की माताजी से जाकर कहा कि माता जी-हमें यवनों से लड़ना पड़ता है और गुरु गोविन्दसिंहजी के पास अशर्फियाँ है खजाने हैं फिर भी वह हमें एक मुट्ठी चने ही देते हैं और लड़वाते हैं। माताजी ने श्री गुरुगोविन्दसिंह जी को अपनी गोद में बैठा कर कहा कि- पुत्र यह तेरे शिष्य तेरे पुत्र के समान हैं फिर भी तू इन्हें एक मुट्ठी चने ही देता है ऐसा क्यों करता हैं?

श्री गुरु गोविन्दसिंह जी ने माताजी को उत्तर दिया-माता क्या तू मुझे अपने पुत्र को कभी विष दे सकती है?
माता जी ने कहा - नहीं।

गुरुगोविन्दसिंह जी ने कहा-माता मेरे यहाँ पर जो अशर्फियाँ हैं, खजाने हैं, वह इतने पवित्र नहीं हैं उसके खाने से इनमें वह शक्ति नहीं रहेगी। जो मुट्ठी भर चने खाने से इनमें शक्ति है वह फिर न रहेगी और फिर यह लड़ भी नहीं सकेंगे।

बीस उँगलियों की कमाई का, धर्म उपार्जित, भरपूर बदला चुकाकर ईमानदारी से प्राप्त किया हुआ अन्न ही मनुष्य में, सद्बुद्धि उत्पन्न कर सकता है। जो लोग अनीति युक्त अन्न ग्रहण करते हैं उनकी बुद्धि असुरता की ओर ही प्रवृत्त होती है। चित्रकूट में हमने एक महात्मा को खेती करते देखा, एक महात्मा दरजी का काम करते थे। परिश्रम और ईमानदारी के साथ कमाये हुए अन्न से ही शुद्ध बुद्धि हो सकती है और तभी भगवद् भजन, कर्त्तव्य पालन, लोक सेवा आदि सात्विक कार्य हो सकते हैं।

📖 अखण्ड ज्योति, नवम्बर १९४४ पृष्ठ २१

👉 आज का सद्चिन्तन Today Thought 5 Oct 2019


👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prerak Prasang 5 Oct 2019



👉 सिद्धि-साधन और साधक

अनेक साधक सिद्धि जैसे गुरुतर कार्य के साधारण जान साधन-पथ पर अग्रसर होते हैं, किन्तु शिथिलता और चंचलता के कारण मनःशक्ति का पूर्ण विकास नहीं कर पाते। अनेक मुमुक्ष आरोग्य-रहित शरीर तथा अशुद्ध एवं अस्थिर मन से ही आध्यात्मिक साधनों के अनुष्ठान में प्रवृत्त होते हैं, परन्तु सफलता उन्हें भी प्राप्त नहीं होती। आध्यात्म विद्या का यह एक अनुभूत तत्व है कि इच्छित वस्तु या इष्ट परिस्थिति प्राप्त करने के लिए मानसिक चित्र कल्पना के समान अमोघ एवं सरल अन्य साधन नहीं है। किसी विशिष्ट दिशा में उन्मुख होने के निमित्त उसके साधन निर्दोष होने की अत्यंत आवश्यकता रहती है। बिना दृढ़ता के आत्मा अनन्त शक्तिमान होने पर भी अपनी कुछ भी शक्ति प्रकट नहीं कर सकता।

सिद्धि के हेतु सदा सर्वदा अपनी इच्छित वस्तु का गहन चिन्तन कीजिए क्योंकि जिस प्रकार बीज में सम्पूर्ण वृक्ष सूक्ष्म रूप से रहता है, वैसे ही अन्तर जगत में यह सम्पूर्ण स्थूल जगत सूक्ष्म बीज रूप से रहा हुआ है और जब अन्तर जगत में उपस्थित किसी वस्तु के सूक्ष्म रूप संस्कारों का दृढ़ भावना से पोषण किया जाता है तब वह वस्तु बाह्य जगत में स्थूल रूप धारण किये बिना कभी नहीं रह सकती- यह आध्यात्म शास्त्र का अबाधित सिद्धाँत है।

📖 अखण्ड ज्योति, जनवरी १९४५ पृष्ठ १६

👉 आध्यात्मिक तेज का प्रज्वलित पुंज होता है चिकित्सक (भाग ७४)

👉 जीवनशैली आध्यात्मिक हो

व्यवहार चिकित्सा के आध्यात्मिक आयाम भी हैं, जो इसे सही अर्थों में सम्पूर्णता देते हैं। और यह आध्यात्मिक व्यवहार चिकित्सा का नया रूप लेती है। इस प्रक्रिया में आध्यात्मिक जीवनशैली की तकनीकों को अपना कर गहरे मन की गाँठें खोली जाती है। इन गाँठों के खुलते ही व्यक्ति की जीवन दृष्टि बदलती है और उसका व्यवहार सँवर जाता है। सैद्धान्तिक एवं प्रायोगिक रूप से यह व्यवहार तकनीकों के कारण कहीं अधिक प्रभावशाली है। इसमें भी मनोचिकित्सा की ही भाँति रोगी के असामान्य व्यवहार और उसके कारणों की गहरी पड़ताल करते हैं। यह पड़ताल सामान्य विश्लेषण द्वारा भी हो सकती है और आध्यात्मिक चिकित्सक की अन्तर्दृष्टि द्वारा भी।

बिगड़े हुए व्यवहार को सभी देखते हैं, पर यह आखिर बिगड़ा क्यों? इसका पता लगाने की जरूरत शायद कोई नहीं करता। जो उद्दण्ड है, उच्छृंखल है, किन्हीं बुरी आदतों का शिकार है और बुरे कामों में लिप्त है, उसे बस बुरा आदमी कहकर छुट्टी पा ली जाती है। यह बुराई उसमें आयी क्यों? इस सवाल का जवाब कोई नहीं तलाशता। बुरी संगत या बुरे कर्मों के अलावा व्यावहारिक गड़बड़ियों के और आयाम भी हैं। उदाहरण के लिए बेवजह भयातुर हो उठना, एकाएक अवसाद से घिर जाना अथवा फिर अचानक दर्द का दौरा पड़ जाना। रोगी जब इन समस्याओं के कारण बताता है, तो या तो उसे डरपोक समझा जाता है, अथवा फिर उसे सिरफिरा कहकर उसकी हँसी उड़ायी जाती है।

ये कारण होते भी अजीब हैं- जैसे कोई प्रौढ़ व्यक्ति कुत्ते की शकल देखकर घबरा जाता है। पूछने पर यही कहता है कि मुझे तो कुत्ते की फोटो भी डरावनी लगती है। सुनने वालो को लगता है कि बच्चे का डर तो समझ में आता है लेकिन यह प्रौढ़ व्यक्ति भला क्यों डरता है? इसी तरह किसी को अँधेरे से डर लगता है तो फिर कोई ऊँची इमारत देखते ही बेहोश हो जाता है। कई तो ऐसे होते हैं जिन्हें भीड़ देखते ही दर्द का दौरा पड़ जाता है। कई बेचारे तम्बाकू- सिगरेट, पान- गुटखा आदि बुरी आदतों के शिकार हैं। ऐसे लोग दुनियाँ में या तो हँसी के पात्र बनते हैं अथवा उनके पल्ले जमाने भर की घृणा, उपेक्षा, तिरस्कार, अवहेलना पड़ती है। कोई भी उनके दर्द को सुनने, बाँटने की कोशिश नहीं करता। जबकि यथार्थ यह है कि ऐसे लोग अपने सीने में अनगिनत गमों को छुपाये रहते हैं। उनके मन की परतों में भारी पीड़ा देने वाले गहरे घाव होते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या
📖 आध्यात्मिक चिकित्सा एक समग्र उपचार पद्धति पृष्ठ १०३

👉 संगठित परिवार की विधि व्यवस्था-

नयी व्यवस्था के अनुसार जहाँ भी कम से कम 10 सदस्य सूत्रबद्ध हो सके वहाँ परिवार शाखा की स्थापना की जानी चाहिए तथा उसकी समुचित व्यवस्था बनाई जानी चाहिए-

अपनी श्रद्धा एवं तत्परता के आधार पर अंशदानी व्रतधारी परिजन, वरिष्ठ सदस्य कहे जावेंगे उन्हीं में से न्यूनतम पाँच एवं अधिकतम दस सदस्यों की एक कार्यकारिणी समिति बनायी जायेगी। उन्हीं में से एक को कार्यवाहक नियुक्त कर दिया जाय। सबसे योग्य व्यक्ति ही कार्यवाहक बने यह आवश्यक नहीं। जो पर्याप्त समय दे सके तथा सबसे संपर्क सूत्र बनाये रख सके, ऐसे ही किसी प्रामाणिक कर्मठ सदस्य को कार्यवाहक मान लिया जाय। अन्य वरिष्ठ सदस्य उसे सहयोग एवं मार्ग दर्शन देते रहे। बड़े स्थानों पर जहाँ एक ही व्यक्ति को संपर्क सूत्र बिठाने में कठिनाई होती हो, वहां एक से अधिक कार्यवाहक भी नियुक्त किए जा सकते हैं।

जहाँ परिवार शाखा में सदस्यों की संख्या अधिक हो वहाँ उन्हें कई टोलियों में बाट लेना चाहिए। टोलियाँ दस से बीस व्यक्तियों तक की रहे। हर टोली किसी सुनिश्चित क्षेत्र एवं सुनिश्चित कार्यों का उत्तरदायित्व सँभालें। महिला जागरण के लिए महिलाओं की टोलियाँ भी बनाई जाये। महिला जागरण भी युग निर्माण परिवार के कार्यों का ही एक अंग है, अतः हर परिवार शाखा का इसके लिए भी कटिबद्ध होना ही चाहिए। महिलाओं में महिलाएँ ही ठीक से कार्य कर सकती है। इसलिए महिला टोलियों का गठन तथा महिला कार्यवाहिका की नियुक्ति भी की जानी चाहिए।

कार्यवाहक-कार्यवाहिका की नियुक्ति मथुरा से कराई जाय। कभी परिवर्तन की आवश्यकता हो तो किसी केन्द्रीय प्रतिनिधि की उपस्थिति में यह कार्य सहज भाव से कर लिया जाय। अपने संगठनों को चुनाव के झंझट एवं पदलोलुपता के विष से बचाना आवश्यक है। सारे कार्य परिवार भाव से चलाये जाने चाहिए। परिवार शब्द हमें अत्यन्त प्रिय है। उसमें वे सभी विशेषताएँ जुड़ी हुई है जो इस धरती पर स्वर्ग के अवतरण के लिए आवश्यक है। हम सदैव से परिवार संस्था की गरिमा बखानते रहे हैं। आदर्श परिवार, व्यक्तित्व निर्माण की पाठशाला एवं नररत्नों की खदान सिद्ध हो सकते हैं। व्यक्ति ओर समाज को जोड़ने वाली शृंखला भी यही है। स्वस्थ पारिवारिक भावना जितनी व्यापक होती जाएगी, उसी अनुपात से मनुष्यों के बीच आत्मीयता एवं सहकारिता बढ़ेगी और उदार आदान प्रदान का पथ प्रशस्त होगा।

आदर्श परिवार वही है जिसके सदस्य एक दूसरे का हित साधन ही अपना सर्वोत्तम स्वार्थ समझते हो तथा अधिकार छोड़ने एवं कर्तव्य पालन के लिए तत्पर रहते हो। यह दिव्य वृत्तियाँ परिवारों में ही विकसित हो सकती है। आरम्भिक अभ्यास, व्यक्तिगत परिवार की छोटी व्यायामशाला में भी किया जा सकता है। किन्तु मात्र इतना ही पर्याप्त नहीं। वंश परिवार को विश्व परिवार के रूप में विकसित करना होगा। वसुधैव कुटुम्बकम् के आदर्श जब व्यवहार में उतरेंगे तभी सतयुग का पुनरागमन होगा। पारिवारिकता की भावना का उत्थान अभ्युदय ही समाज निर्माण का, विश्व शान्ति का, मानवी उज्ज्वल भविष्य का एकमात्र आधार है।

परिवार शब्द हमारी नस नस में उत्साह भर देता है। उसका निखरा हुआ स्वरूप कही भी बनता दिखे, तो आँखें चमकने लगती है। गायत्री परिवार, युग निर्माण परिवार, नामकरण हम इसी दृष्टि से करते रहे हैं। इस नामकरण के साथ ही हम वह भाव भी पिरो देना चाहते हैं, जो हमें पुलकित करता रहता है। हम अपने पीछे ऋषि परम्परा के अनुकूल एक आदर्श परिवार छोड़ जाना चाहते हैं। इसलिए उसके सदस्यों में ऐसे लोगों को ही सम्मिलित करना चाहते हैं, जिनमें उर्वरता के व उत्कृष्टता के, जीवन और जागृति के कुछ चिन्ह पहले से ही विद्यमान हो, इन मौलिक गुणों के चिन्ह जहाँ होगे, वहाँ अपने परिश्रम का भी कुछ परिणाम निकलेगा। इन दिनों, इस गुरु पूर्णिमा पर हम अपने परिवार का पुनर्जीवन इसी दृष्टि से कर रहे हैं। उनके विकास तथा पुष्टि के लिये कुछ सुगम किन्तु प्रभावशाली कार्यक्रम नियमित रूप से अपनाने का आग्रह भी किया गया है।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जुलाई १९७७ पृष्ठ ५४

👉 मंत्री की तरकीब

राजा कर्मवीर अपनी प्रजा के स्वभाव से दुखी रहता था। उसके राज्य के लोग बेहद आलसी थे। वे कोई काम नहीं करना चाहते थे। अपनी जिम्मेदारी वे दूसरों पर टाल दिया करते थे। वे सोचते थे कि सारा काम राज्य की ओर से ही किया जाएगा। राजा ने अनेक माध्यमों से उन्हें यह संदेश देने की कोशिश की कि किसी भी राज्य में नागरिकों की भी कुछ जिम्मेदारी होती है। राजा ने कई बार सख्त उपाय भी किए पर उनमें कोई सुधार नहीं हुआ।

एक दिन मंत्री ने राजा को एक तरकीब सुझाई। नगर के बीच चौराहे पर एक पत्थर डाल दिया गया, जिससे आधा रास्ता रुक गया। सुबह-सुबह एक व्यापारी घोड़ागाड़ी से वहां पहुंचा। जब कोचवान ने उसे पत्थर के बारे में बताया तो उसने गाड़ी मुड़वा ली और दूसरे रास्ते से चला गया। कई राहगीर इसी तरह लौट गए। तभी एक गरीब किसान आया। उसने आसपास खेल रहे लड़कों को बुलवाया और उनके साथ मिलकर पत्थर हटा दिया। पत्थर हटते ही वहां एक कागज नजर आया, जिस पर लिखा था-इसे राजा तक पहुंचाओ। किसी को कुछ समझ में नहीं आया। किसान कागज लेकर राजा के पास पहुंचा। राजा ने किसान को भरपूर इनाम दिया। यह बात राज्य भर में फैल गई। इनाम के लालच में अब लोग इस तरह के कई काम करने लग गए। धीरे-धीरे यह उनकी आदत में शामिल हो गया।