रविवार, 4 फ़रवरी 2018

👉 बदलाव

🔶 मेरी ख़ामोश प्रवृत्ति के कारण मैं मायके से लेकर ससुराल तक कभी प्रशंसा, तो कभी व्यंगबाण झेलती रही. मैं चाहकर भी किसी बात का प्रत्युत्तर नहीं दे पाती थी. बस, हर स्थिति में सामंजस्य बिठाकर चुप्पी ओढ़ लेती. मेरी इसी प्रवृत्ति का फ़ायदा जीवनभर मेरे पति और उनके बाद मेरे पुत्र ने उठाया. इन सब बातों को सोचने के लिए मैं आज क्यों विवश हुई? आज लगता है कि उसकी शादी आशू से कराकर मैंने बड़ी भारी भूल की. उसने अपने पिता का स्वभाव पाया था. वही शक्की मिज़ाज, वही अहंकारपूर्ण व्यवहार, वही हृदय को भेद देनेवाले कटीले व्यंगबाण कहना. आज रह-रहकर पश्‍चाताप हो रहा है. मैं कैसे भूल गयी कि बबूल के पेड़ पर आम नहीं लगते. आशू के पिता शुरू से ही अक्खड़ क़िस्म के व्यक्ति थे. लोक-लाज और मेरी ख़ामोश प्रवृत्ति ने कभी मुझे उनसे विद्रोह नहीं करने दिया. आज वही भूल मेरे हृदय को शूल बनकर चुभ रही हैं. अपनी इस भूल का एहसास शायद जीवनभर मुझे न हो पाता, यदि मैं आशू की शादी रूपा से न कराती।

🔷 आशू आए दिन रूपा को किसी न किसी बात पर डांटता-फटकारता रहता. रूपा गृहकार्य में निपुण पढ़ी-लिखी लड़की थी. आशू उसके हर काम में दोष निकालता रहता. शायद इसके पीछे मुख्य कारण रूपा का सौंन्दर्य था. आशू अपने साधारण व्यक्तित्व की तुलना में रूपा का आकर्षक व्यक्तित्व देखकर अक्सर कुढ़ता रहता था. यही कारण था कि कभी रूपा उसे चरित्रहीन लगती, तो कभी फूहड़. उसे नीचा दिखाकर आशू के अहम् को संतुष्टि मिलती थी।

🔶 यह वही आशू है जिसने अपने दोस्त विनोद की शादी में रूपा को देखकर मुझसे कहा था कि मैं किसी भी तरह उसकी शादी रूपा से करा दूं. तब उसने स्वयं की तुलना उससे क्यों नहीं की थी? तब उसने क्यों अपने साधारण व्यक्तित्व को अनदेखा कर दिया था? आशू की सरकारी नौकरी और ऊंचे ओहदे ने उसकी सारी कमियों को ढंक लिया तथा रूपा के पिता ने रिश्ता स्वीकार कर लिया. इस तरह रूपा इस घर-आंगन में आ गयी. शुरुआती दिन हंसी-ख़ुशी से बीते, लेकिन धीरे-धीरे आशू के भीतर का ज़हर बाहर आने लगा और एक-एक करके उसके पिता की सारी विशेषताएं उसमें प्रकट होने लगीं।

🔷 यदि कोई मित्र या सम्बन्धी रूपा की प्रशंसाभर कर देता, उस समय तो वह हंस देता, लेकिन बाद में बेचारी को न जाने कितनी खरी-खोटी सुनाता था. वह बेचारी मुंह सिए निर्दोष होकर भी सब कुछ सुनती रहती. अचानक किसी पर नज़र पड़ जाती, तो उसके पीछे ही पड़ जाता कि वह जान-बूझकर उस व्यक्ति को देख रही है. मुझे वह जानता था कि मां तो गूंगी है. वो तो कुछ बोलेगी नहीं. मुझे इस बात का बेहद अफ़सोस था कि मैं तो मैं, मेरी बहू भी गूंगी आ गयी थी. आशू उसे जली-कटी सुनाता रहता और वह सुनती रहती. मेरी समझ में ये नहीं आया कि मेरे बेटे में मेरी प्रवृत्ति के बजाय अपने पिता की प्रवृत्ति ही क्यों मुखर हुई थी. न जाने कितनी बार उसने अपने पिता के सन्मुख मुझे नीची गरदन किए अपशब्द सुनते देखा था. लेकिन उसने कभी अपने पिता का विरोध नहीं किया. कभी मुझे नहीं कहा कि ‘मां तुम ये सब क्यों सहन करती हो. तोड़ दो अपना मौनव्रत, मैं तुम्हारे साथ हूं. मैं मां होकर भी पुत्र से वंचित थी।

🔶 आज फिर वह न जाने किस बात पर बहू पर गरज-बरस रहा था. मैंने उनके कमरे का दरवाज़ा थोड़ा-सा खोला. आशू पलंग पर बैठा रूपा को लताड़ रहा था और वह बेचारी चुपचाप खड़ी उसकी जहरीली बातें सुन रही थी. मुझे ऐसा लगा जैसे रूपा के स्थान पर मैं खड़ी हूं और आशू के स्थान पर मुझे उसके पिता नज़र आने लगे. मैंने दरवाज़ा ज़ोर से धकेलकर खोल दिया, ‘‘ख़बरदार आशू, जो अब बहू को एक शब्द भी कहा. तुम यह न समझ लेना कि अगर बहू तुम्हारी बातें सहन कर रही है, तो उसमें कमी है या वह कमज़ोर है. सुन्दरता चरित्रहीनता का कारण नहीं होती. तुम ये बात अच्छी तरह जानते हो. जानते-बूझते भी तुम्हें अपनी पत्नी के चरित्र पर सन्देह करते शर्म नहीं आती. रूपा केवल तुम्हारी पत्नी नहीं है, बल्कि बहू के रूप में मेरी बेटी भी है. इस घर की मान-मर्यादा है. आज के बाद बहू पर किसी भी तरह की तोहमत लगाई, तो मुझसे बुरा कोई न होगा. आज से इसे अकेली न समझना।’’

🔷 आशू आश्‍चर्य से मेरी ओर देख रहा था. एक शब्द में उत्तर देनेवाली मां से इतने बड़े भाषण की उसे उम्मीद नहीं थी. रूपा मुझसे लिपटकर रो रही थी. मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे सिर से बड़ा भारी बोझ उतर गया हो।

🔶 ‘‘चल बहू, अपना सम्मान खोकर अगर किसी रिश्ते को जीवित रखा भी तो क्या रखा.’’ इतना कहकर मैं रूपा को लेकर अपने कमरे में आ गई. आज मैंने अपनी खोई हुई आवाज़ को पा लिया है. मैंने आज महसूस किया कि यदि लड़ाई अपने हक़ की है, तो आवाज़ उठाना ग़लत नहीं है. अगर हम सच्चे हैं, तो उस सच्चाई के आगे एक न एक दिन सबको झुकना ही होगा।

🔷 ‘‘आज के बाद मैं तुम्हारे चेहरे पर ये उदासी न देखूं.’’ मैं धीरे-धीरे रूपा को समझा रही थी. आज मेरी ज़िन्दगी ने करवट ली थी. सब कुछ बदला-बदला-सा लग रहा था और इस बदलाव को महसूस कर आशू ख़ुद क्षमा मांगकर रूपा को ले जाएगा, ऐसा मेरा विश्‍वास है. सोचते-सोचते मेरे होंठों पर गहरी मुस्कुराहट आ गई।

👉 प्रेरणादायक प्रसंग 5 Feb 2018


👉 आज का सद्चिंतन 5 Feb 2018

👉 जीवन के गरिमामय बोध तो हो

🔷 एक मजदूर बड़े परिश्रम से कुछ चावल कमाकर लाया था। उन्हें खुशी-खुशी सिर पर रखकर घर लिये जा रहा था। अचानक उस बोरी में छेद  हो गया और धीरे-धीरे उसकी गैर जानकारी में वे चावल पीछे की ओर गिरते गये । यहाँ तक कि कुछ आगे जाने पर उसकी बोरी  ही खाली हो गई। जब पीछे देखा तो उसे होश आया।   फर्लांगों से धीरे-धीरे वह चावल फैल रहे थे और धूल में मिलकर दृष्टिï से ओझल हो गए थे। उसने एक हसरतभरी निगाह उन दानों पर डाली और कहा- काश! मैं इन दानों को फिर  से पा सका होता। पर  वे तो पूरी तरह धूल में गढ़ चुके थे, वे मिल नहीं सकते थे। बेचारा खाली हाथ घर लौटा, दिन भर का परिश्रम, चावलों का बिखर जाना, पेट की जलती हुई ज्वाला इन तीनों की स्मृति उसे बेचैन बनाये दे रही थी।
    
🔶 हमारे जीवन का अमूल्य हार कितना सुन्दर है; हम इसे कितना प्यार करते हैं। माता खुद भूखी रहकर अपने नन्हे से बालक को मिठाई खरीदकर खिलाती है, बालक के मल मूत्रों में खुद पड़ी रहकर उसे सूखे बिछौने पर सुलाती है। वह बड़े से बड़ा नुकसान कर दे, एक कहुआ शब्द तक नहीं कहती।
  
🔷 हमारी आत्मा हमारे जीवन से इतना ही नहीं, बल्कि इससे भी अधिक प्यार करती है। जीवन सुखी बीते, उसे आनन्द और प्रसन्नता प्राप्त हो, इसके लिए आत्मा पाप भी करती है। खुद नरकों की यातना सहती है- खुद मलमूत्रों में पड़ी रहकर उसे सूखे बिछौन पर सुलाती है। यह प्यार माता के प्यार से किसी प्रकार कम नहीं है। जीवन को वह जितना प्यार करती हैं, उतना क्या कोई किसी को कर सकता है?
  
🔶 पर हाय! इसकी एक-एक मणि चुपके-चुपके मजदूर के चावलों की तरह बिखरती जा रही है। और हम मदहोश होकर मस्ती के गीत गाते हुए झूम-झूमकर आगे बढ़ते जा रहे हैं। जीवन-लड़ी के अनमोल मोती घड़ी, घंटे, दिन, सप्ताह, पक्ष, मास और वर्षों के रूप में धीरे-धीरे व्यतीत होते जा रहे हैं। एक ओर माता कहती है कि मेरा पूत बड़ा हो रहा है, दूसरी ओर मौत कहती है कि मेरा ग्रास निकट आ रहा है। बूँद-बूँद करके जीवन रस टपक रहा है और घड़ा खाली होता जा रहा है। कौन जानता है कि हमारी थैली में थोड़ा-बहुत कुछ बचा भी है! फिर भी क्या हम इस समस्या पर विचार करते हैं? कभी सोचते हैं कि समय क्या वस्तु है? उसका क्या मूल्य है?  यदि हम नहीं सोचते और अपनी पीनक को ही स्वर्ग-सुख मानते हैं तो सचमुच बीते वर्ष को गँवाना और नवीन वर्ष का आना कोई विशेष महत्व नहीं रखता।
  
🔷 क्या आप कभी इस पर भी विचार करते हैं कि आपके जीवन का इतना बड़ा भाग, सर्वोत्तम अंश किस प्रकार बर्बाद हो गया? क्या इसे इसी प्रकार नष्टï करना चाहिए था? क्या आत्मा को इन्हीं कर्मों की पूर्ति के लिये ईश्वर ने भेजा था, जिन को अब तक तुमने पूरा किया है? याद रखना, वह दिन दूर नहीं है जब तुम्हें यही प्रश्र शूल की तरह दुख देंगे। जब जीवन रस की अन्तिम बूँद टपक जायेगी और तुम मृत्यु के कंधे पर लटक रहे होगे, तब तुम्हारी तेज निगाह बुढ़ापा, अधेड़ावस्था, यौवन, किशोरावस्था, बचपन और गर्भावस्था तक दौड़ेगी। अपने अमूल्य हार की एक-एक मणि धूलि में लोटती हुई दिखाई देगी। तब अपनी मदहोशी पर तिलमिला उठोगे।।  आज तो समय काटने के लिये ताश या फलाश खेलने की तरकीब सोचनी पड़ती है। पर परसों पछतायेगा इन अमूल्य क्षणों के लिए! और शिर धुन-धुनकर रोयेगा अपने इस पाजीपन पर।

✍🏻 पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 समर्थ और प्रसन्न जीवन की कुँजी (भाग 3)

🔷 ओछे आदमियों की एक और पहचान है कि अपनी राई रत्ती सफलता को दस जगह सुनाते और बढ़ चढ़ कर गीत गाते है। उनका मतलब रौब गाँठना और दूसरों के मुंह से अपनी प्रशंसा सुनना होता हैं अपने पौरुष पराक्रम को वे पर्याप्त नहीं मानते। सुनने वाले उसकी बड़ाई के गीत गाये तब उन्हें विश्वास होता है कि वे समर्थ है और सफल रहे हैं। इसी प्रकार अपनी कठिनाइयों को भी दस जगह कहते है ताकि उन्हें अधिक लोगों की सहानुभूति सुनने को मिले। इतने में ही कठिनाई का हल हो जाए तो बात दूसरी है अन्यथा यदि यह आशा लगाई गई हो कि सहानुभूति के साथ साथ सहायता भी बरसेगी, लोग हाथ बंटायेंगे तो यह मान्यता गलत है।

🔶 हारे हुए को अयोग्य और मूर्ख माना जाता है। अपनी ख्याति इसी रूप में करना अपेक्षित हो तो अपनी कठिनाइयों और असफलता को जगह जगह गाते फिरने में हर्ज नहीं सफल होने वालों की प्रशंसा करने तो कई लोग सुनते है और उन्हें समझदार भी मानते है पर कठिनाइयों में फंसे हुए लोगों से बचने की कोशिश करते है कि कहीं हमें भी उनकी सहायता के झंझट में न फंसना पड़े। फलता की शेखी बघारने वाले को शेखीखोर और अहंकारी कहा जाता है। इसलिए दोनों ही प्रकार की चर्चायें न केवल निरर्थक वरन हानिकारक भी है। गंभीर व्यक्ति की मेहनत जिम्मेदार और सूझबूझ ही उसका सम्मान बढ़ाने के लिए पर्याप्त है।

🔷 आवश्यक नहीं कि परिस्थितियाँ सदा आपके अनुकूल ही हो। आवश्यक नहीं कि दूसरे आपको सही समझ ही और न्याय करें ही। हो सकता है कि बिलकुल उलटी चल पड़। ऐसी दशा में क्रोध से भर जाना और आवेश में आना भी आपकी कठिनाई को हल नहीं कर सकता। दूसरों की गलती सुधारने के लिए क्रोध प्रकट करना और आवेश में आना ही कोई हल नहीं निकालता वरन बिगड़ी बात को और भी अधिक बिगाड़ सकता है। हो सकता है आपके क्रोध को दूसरा आदमी अपना अपमान समझ और बदले में दूना क्रोध प्रकट करें और अपमान पर उतर आये।

🔶 ऐसी दशा में गुत्थी और भी दूनी उलझ जाती है। समाधान के लिये, अब क्या करना चाहिए, दूसरा कोई सही रास्ता सूझता ही नहीं। प्रसंग एक ओर रखा रह जाता है। मानापमान, शत्रुता एवं प्रतिशोध का नया सिलसिला चल पड़ता है। बात को इतनी आगे बढ़ाने की अपेक्षा यही उचित था कि ठंडे दिमाग और मधुर शब्दों में अपना पक्ष प्रस्तुत करते रह जाता। चुप हो गा होता अथवा प्रसंग बदल कर कोई ऐसी दूसरी बात आरंभ की गई होती। एक बार बाजी हार जाने पर खिलाड़ी दूसरा दौरा शुरू करते है। यही रवैया हमें हर प्रसंग में अपनाना चाहिए, विशेषतया प्रतिकूल अवसर खड़ा होने पर।

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति मार्च 1988 पृष्ठ 57

👉 The Art of Sadhana

🔷 The essence of Sadhana is self-discipline. The deities we worship are in fact the symbolic representatives of our own divine attributes and virtues. So long as these attributes are dormant, we live in a miserable state, but when the divine self is awakened and activated, we realize that we are full of spiritual powers (riddhi and siddhi). The sole aim of Sadhana is to activate these dormant attributes through a dedicated process of self-refinement and self-transcendence.

🔶 A farmer understands the significance of Sadhana. While tending his crops, he remains thoroughly involved in farming day after day throughout the year. In this process, he is least concerned about his health or the severity of weather. He takes care of the fields like he would of his own body. He keeps an eye over each and every plant. According to the needs of the crop, he provides it with manure and performs several operations such as tilling, irrigating, weeding and the harrowing of the field, and finally harvesting. The wisdom for the preservation and maintenance of the fields, the bullocks, ploughs and the ancillary equipment comes to him intuitively from within. He does all this without feeling tired or bored, or showing any haste.

🔷 He does not insist on the immediate reward for his labour because he knows that the crop takes a specific time to ripen and so he has to wait patiently till then. He remains free from the anxiety of filling his cellar with the produce. He also understands the futility of anticipating a plentiful yield. His Sadhana of farming continues single-mindedly. It cannot be said that he does not encounter any obstacles. He overcomes them with his own expertise and with the help of available resources. He refuses to relax without fulfilling the needs of the field. When the crop ripens and is harvested, he takes home the produce with a sense of gratitude to Nature. This is s³dhan³ of a farmer, which he continues to perform from his childhood till death with unwavering faith. There is no rest, no tiredness, no boredom and no indifference. A sadhaka (devotee) should learn the art of Sadhana from the farmer.

✍🏻 Pt. Shriram Sharma Acharya

👉 गायत्री परिवार का उद्देश्य — पीड़ा और पतन का निवारण (भाग 13)

🔶 मित्रो! आप संन्यासी हो जायँ, आप वैरागी हो जायँ। आप गृहस्थ बने रहें, तो भी कोई हर्ज नहीं है। संतों, ऋषियों में से अधिकांश गृहस्थ थे। जितने भी देवी-देवता थे, सबके सब गृहस्थ थे, ऐसे मुझे मालूम पड़ता है। शंकर जी भी गृहस्थ थे। उनके दो बच्चे भी थे। दो बच्चों के अलावा उनके पास बैल था, शेर था, कबूतर था और उनके बेटों के पास चूहा था, मोर था। सारे का सारा सर्कस लेकर वे चलते थे। कौन? शंकर जी। बजाने के लिए डमरू, चलाने के लिए त्रिशूल और ढेर सारा सरंजाम लेकर शंकर जी और उनका खानदान चलता था। वे गृहस्थ थे। ऐसा नहीं है कि आप गृहस्थ रहते हैं, तो आप योग्य नहीं हो सकते और सुयोग्य व्यक्ति नहीं हो सकते, महामानव नहीं बन सकते। गार्हस्थ्य जीवन आपके मार्ग में बाधक नहीं बन सकता। मैं तो स्वयं गृहस्थ बनकर के रहा, ताकि मैं लोगों को यकीन दिला सकूँ, इस बात का विश्वास दिला सकूँ कि गृहस्थ रहने से किसी का कुछ बिगड़ने वाला नहीं है।

🔷 मित्रो! आदमी का नुकसान गृहस्थ होने से नहीं होता है। नुकसान आदमी का लोभी होने से होता है, मोहग्रस्त होने से होता है। आदमी का विनाश लोभी होने से होता है, गृहस्थ होने से नहीं होता है। संत-बाबा जी भी ऐसे हो सकते हैं, जिन्होंने ढेरों की ढेरों सम्पदा कमाई और मरने के समय तक धन का मोह, स्थान का मोह, आश्रम का मोह उन्हें बना रहा। उनको मैं गृहस्थ कहूँगा। उनको मैं संन्यासी नहीं कह सकता। मैं ऐसे असंख्य गृहस्थों को जानता हूँ जिन्होंने अपने बच्चों का तो पालन किया, जिन्होंने उसी तरीके से किया जिस तरीके से माली अपने बगीचे का पालन किया करता है। पालन करने के बाद वह समझ जाता है कि यह पौधा हमारा नहीं है, वरन् यह मालिक का है। हम मालिक के पौधे की देख−भाल इसलिए करते हैं क्योंकि वह हमें रोटी खिलाता है। इसलिए हमें उसके पौधों को सींचना चाहिए, पौधों को बड़ा बनाना चाहिए। यह संपदा हमारी कैसे हो सकती है?

🔶 मित्रो! आप जहाँ कहीं भी रहें, जहाँ कहीं भी जायँ, मालिक बनकर नहीं, माली बनकर रहें। इससे आपका अहंकार गलता हुआ चला जायेगा और आपका प्रभाव बढ़ता हुआ चला जायेगा। अगर आपने ऐसी मनःस्थिति बना ली और इस बात पर ध्यान देना प्रारंभ कर दिया कि जो लोग आपके संपर्क में आये, उन पर आपने कैसी छाप डालने की कोशिश की और कैसा प्रभाव छोड़कर के आये। मैं इस बात की तलाश करूँगा कि जहाँ भी आप गये थे, वहाँ हिलने-मिलने का, व्यवहार करने का आपका क्रम क्या रहा? अगर आप यह छाप छोड़कर आये कि हम शान्तिकुञ्ज से आये हैं। वहाँ जो विचारधारा दी जाती है, जो प्रेरणाएँ दी जाती हैं, जो दिशायें दी जाती हैं, उन तीनों को लेकर आपने अपनी इज्जत को कैसे बढ़ाया और हमारी इज्जत को कैसे बढ़ाया और हमारे मिशन की इज्जत को कैसे बढ़ाया। हम यही देखना पसंद करेंगे। आपकी वाणी का व्यवहार कैसा रहा। लोगों के साथ में आपने अपनी वाणी की मिठास का किस तरह से इस्तेमाल किया। जहाँ आप गये थे, वहाँ बात-बात पर लड़ाई करके आये होंगे, बात-बात पर झगड़ा करके आये होंगे, तो हमको बुरा लगेगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

👉 गुरुगीता (भाग 32)

👉 शिवभाव से करें नित्य सद्गुरु का ध्यान

🔶 कुलदानन्द ब्रह्मचारी ने अपनी डायरी में कई रहस्यमय साधना प्रसंग की चर्चा की है। ऐसी एक चर्चा उनके जीवन के उस कालखण्ड की है, जब वह गहरे साधना संघर्ष से गुजर रहे थे। काम वासना का प्रबल वेग उनके अन्तःकरण में रह-रहकर उद्वेग करता था। समझ में नहीं आता क्या करें? कैसे निबटें इस काम रूपी महाअसुर से। हारकर उन्होंने अपनी विकलता गुरुदेव से निवेदित की। अपनी व्यथा कहते हुए वह बिलख-बिलख कर रो पड़े। उनके आँसुओं से महात्मा विजय कृष्ण गोस्वामी के चरण भीग गए। उनकी इस विह्वलता से द्रवित होकर गोस्वामी जी ने उठाकर ढाँढस बँधाया और कहा- पुत्र! तुम रोते क्यों हो? गुरु के रहते उसके शिष्य को असहाय अनुभव करने की कोई जरूरत नहीं है। अपने सद्गुरु के रहते हुए यदि कोई शिष्य विवशता अनुभव करता है, तो उसके दो ही कारण हो सकते हैं, या तो उसका शिष्यत्व सच्चा नहीं है अथवा उसके गुरु की चेतना अभी भगवान् से एकाकार नहीं हुई है।
  
🔷 अपनी बातों को कहते हुए विजयकृष्ण गोस्वामी उठकर खड़े हुए और दीवार पर लगी अलमारी से अपनी एक छोटी फोटो कुलदानन्द को थमाई। और बोले- बेटा! तुम शिव भाव से इस फोटो की नित्य पूजा करना। तुम्हें अपने जीवन की आन्तरिक व बाह्य आपदाओं से सुरक्षा मिलेगी। फोटो लेकर कुलदानन्द जी अपने निवास स्थान पर आ गए और नित्य प्रति गुरुदेव के चित्र का पूजन करते हुए अपनी साधना में विलीन हो गए। साधना काल में ध्यान के पलों में एक दिन उन्हें अन्तर्दर्शन हुआ कि सुषुम्ना नाड़ी में अपनी चेतना के एक अंश को प्रविष्ट कर गुरुदेव उनकी चेतना को ऊपर उठा रहे हैं। गुरु कृपा से उसी क्षण उनकी अन्तर्चेतना काम विकार से मुक्त हो गई। वह लिखते हैं कि फिर कभी उन्हें काम का प्रकोप नहीं हुआ।
  
🔶 इन्हीं दिनों उन्हें एक अन्य अनुभव भी हुआ। एक दिन साधना करते समय उनके कमरे की छत गिर पड़ी। जिस ढंग से छत गिरी उस तरह उन्हें दबकर मर जाना चाहिए था; परन्तु आश्चर्यजनक ढंग से जिस स्थान पर वे बैठे थे, उस स्थान पर छत का मलबा अधर में ही लटका रह गया। गुरु कृपा को अनुभव करते हुए पहले वह उठे, फिर गुरुदेव के चित्र को उठाया, और बाहर आ गए। इसी के साथ पूरी छत भी गिर गयी। साथ ही ध्यान आया उन्हें गुरुदेव का कथन, जो उन्होंने फोटो देते हुए कहा था- पुत्र! मेरा यह चित्र तुम्हें आन्तरिक व बाह्य विपत्तियों से बचाएगा। और सचमुच ऐसा ही हुआ। गुरु कृपा से शिष्य को सब कुछ अनायास ही सुलभ हो जाता है।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 डॉ प्रणव पंड्या
📖 गुरुगीता पृष्ठ 55

👉 खाने तक में नासमझी की भरमार (भाग 4)

🔷 जो नमक शरीर में घुलते और पोषण प्रदान करते हैं वे अन्न, शाक, फल आदि खाद्य पदार्थों में प्रचुर परिमाण में विद्यमान हैं। वे ही पचते और खपते भी हैं। इस प्रकार शरीर की लवण आवश्यकता की पूत के लिए उसका समुचित अनुपात उन खाद्य पदार्थों में सँजोया हैं जो खाने के काम आते हैं। उनका अन्यान्य रासायनिक पदार्थों के साथ ऐसा समन्वय भी रहता है, जिससे उनके पचने में सुविधा रहे। आवश्यक नहीं कि उन उपयोगी लवणों का स्वाद खारा ही रहे। फ्रूट साल्ट खारे कहाँ होते हैं?

🔶 मनुष्य है जिसे खारी नमक के बिना एक ग्रास गले उतारना कठिन पड़ता है। दाल, शाक, चटनी, अचार कुछ क्यों न हो, हरेक में चटकीला नमक रहना चाहिए। इसके बिना जायका ही क्या? यह बुरी आदत जान-बूझकर डाली गई है। संसार के अनेक क्षेत्र इन दिनों भी ऐसे हैं जहाँ खारी नमक का उपयोग प्रायः नहीं ही होता है। देखा-देखी प्रचलन हुआ है तो उसकी मात्रा नगण्य जितनी रखी गई है। इसका प्रतिफल प्रत्यक्ष है। उन-उन क्षेत्रों में सभ्य जगत की प्राणप्रिय बीमारियाँ अभी भी पहुँच नहीं पाई हैं।

🔷 अन्य मसालों के सम्बन्ध में भी यही बात हैं। जीरा, धनिया, हल्दी जैसे मसालों को तो किसी प्रकार सहन भी किया जा सकता है किन्तु मिर्च, लौंग, हींग, तेजपात जैसे गरम मशालें तो ऐसे हैं, जिन्हें एक प्रकार का तेजाब ही कहना चाहिए। वे जलाने-गलाने के अतिरिक्त दूसरा कोई काम कर ही नहीं पाते। हंटर मार-मार कर दौड़ाने जैसी उत्तेजना देकर पेट के साथ अत्याचार ही करते रहते हैं। अधिक खाये को जल्दी पचाने की बात आमतौर से मसालों का लाभ बताते हुए कही जाती हैं। पर वस्तुतः वे निर्दय चाबुकमार की गतिविधियाँ ही अपनाते हैं और नशे की तरह आदत में सम्मिलित हो जाने के बाद यह विवशता उत्पन्न करते हैं कि उनके बिना गाड़ी धकेगी ही नहीं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
(गुरुदेव के बिना पानी पिए लिखे हुए फोल्डर-पत्रक से)

👉 संस्कारो पर नाज

बेटा अब खुद कमाने वाला हो गया था ... इसलिए बात-बात पर अपनी माँ से झगड़ पड़ता था ये वही माँ थी जो बेटे के लिए पति से भी लड़ जाती थी। मगर अब ...