बुधवार, 19 अगस्त 2020

👉 संगठन का महत्व : -

एक क्षेत्र में भयंकर दुर्भिक्ष पड़ा। निर्धन परिवार ने कहीं सुविधा के अन्य क्षेत्र में जाने की तैयारी की आवश्यक सामान साथ में बाँध लिया।

रात में एक पेड़ के नीचे विश्राम किया। तीन लड़के थे। एक को आदेश मिला ईंधन ढूंढ़ कर लाओ। दूसरे को आग और तीसरे को पानी लाने का आदेश मिला तीनों ही तुरन्त चल पड़े और अपनी जिम्मे की वस्तुएँ ले आये। चूल्हा जलाया गया। पर प्रश्न था कि इसमें पकाया क्या जाय।

परिवार के स्वामी ने पेड़ की तरफ इशारा किया कि चढ़ जाओ और जो कुछ मिले उसे लाओ।

तीनों लड़के पेड़ पर चढ़ गये। उस पर एक देव रहता था। उसने समझा यह अनुशासित परिवार मिलजुल कर हर काम पूरे कर लेता है तो मुझे पकड़ेंगे और चूल्हे में पकायेंगे। उसने डर कर पेड़ की जड़ में गढ़ा हुआ अशर्फियों का एक घड़ा दे दिया और कहा मुझे मत पकड़ो। इस धन से अपना गुजारा करो।

दूसरे दिन परिवार अपने घर लौट आया और प्राप्त धन के सहारे आनन्दपूर्वक अपना गुजारा करने लगा।

यह बात पड़ोस वालों ने भी सुन ली। पड़ोसी ने भी यह तरकीब काम में लाने का प्रयत्न किया। वह भी अपने परिवार को लेकर उसी पेड़ के नीचे आ बैठा। उसके भी तीन लड़के थे। तीनों को काम सौंपे तो वे जाने को तैयार न हुए आपस में लड़ने झगड़ने लगे। चूल्हा जलाने की नौबत न आई।

परिवार का स्वामी पेड़ पर देव पकड़ने चढ़ा। देवता ने कहा तुम लोगों में आपस में एकता तो है नहीं। मुझे पकड़ने पकाने की व्यवस्था तो कर ही कैसे सकोगे। धन मिल गया तो उसके लिए ही लड़ मरोगे।

यह कहकर देव ने उस परिवार को भगा दिया। वे निराश घर वापस लौट आये।

📖 अखण्ड ज्योति, मई १९९३

👉 धर्म और श्रम की कमाई

ईमानदारी और मेहनत से जो धर्म की कमाई की जाती है उसी से आदमी फलता−फूलता है, यह बात यदि मन में बैठ जाय तो हम सादगी और किफायतशारी का जीवन व्यतीत करते हुए सन्तोषपूर्वक अपना निर्वाह क्यों न करने लगेंगे? और फिर धर्म उपार्जित कमाई का अनीति से अछूता अन्न हमारी नस−नाड़ियों में रक्त बनकर घूमेगा तो हमारा आत्मसम्मान और आत्मगौरव क्यों आकाश को न चूमने लगेगा? क्यों हम हिमालय जैसा ऊँचा मस्तक न रख सकेंगे? और क्यों हमें हमारी महानता का—श्रेष्ठता का—उत्कृष्टता का अनुभव होने से अन्तःकरण में सन्तोष एवं गर्व भरा न दीखेगा?

प्यार, आत्मीयता, ममता की आँखों से जब हम दूसरों की देखेंगे तो वे हमें अपने ही दिखाई पड़ेंगे। अपने छोटे से कुटुम्ब को देखकर हमें आनन्द होता है। फिर यदि हम दूसरों को बाहर वालों को भी उसी आँख से देखने लगें तो वे भी अपने ही प्रतीत होंगे। अपने कुटुम्बियों के जब अनेक दोष दुर्गुण हम बर्दाश्त करते हैं, उन्हें भूलते, छिपाते और क्षमा करते हैं तो बाहर वालों के प्रति वैसा क्यों नहीं किया जा सकता? उदारता, सेवा, सहयोग, स्नेह, नेकी और भलाई की प्रवृत्ति को यदि हम विकसित कर लें तो देवता की योनि प्राप्त होने का आनन्द हमें इसी मनुष्य जन्म में मिल सकता है। हो सकता है कि हमारी भलमनसाहत और सज्जनता का कोई थोड़ा दुरुपयोग कर ले, उससे अनुचित लाभ उठा ले, इतने पर भी उसके ठगने वाले के मन पर भी अपनी सज्जनता की छाप पड़ी रहेगी और वह कभी न कभी उसके लिए पश्चात्ताप करता हुआ सुधार की ओर चलेगा। अनेक सन्तों और सज्जनों के ऐसे उदाहरण हैं जिनने दुष्टता को अपनी सज्जनता से जीता है। फिर चालाक आदमी भी तो दूसरे अधिक चालाकों द्वारा ठग लिये जाते हैं, वे भी कहाँ सदा बिना ठगे रहते हैं। फिर यदि हमें अपनी भलमनसाहत के कारण कभी कुछ ठगा जाना पड़ा तो इसमें कौन बहुत बड़ी बात हो गई, जिसके लिए पछताया जाय। छोटा बच्चा जिसे हम अपना मानते हैं जन्म से लेकर वयस्क होने तक हमें ठगता ही तो रहता है। उस पर जब हम नहीं झुँझलाते तो प्रेम से परिपूर्ण हृदय हो जाने पर दूसरों पर भी क्यों झुँझलाहट आवेगी?

✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
📖 अखण्ड ज्योति जनवरी 1962

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ७)

मन मिटे तो मिले चित्तवृत्ति योग का सत्य

पतंजलि की इस बात को गुरुदेव एक नयी वैज्ञानिक अनुभूति देते हैं। वे कहते हैं सारा कुछ मन का जादू, इन्द्रजाल है। यह हटा कि समझो सारा भ्रम मिटा। उनके अनुसार यह शब्द ‘मन’ सब कुछ को अपने में समेट लेता है- अहंकार, इच्छाएँ, कामनाएँ, कल्पनाएँ, आशाएँ, तत्त्वज्ञान और शास्त्र। जहाँ कुछ जो भी सोचा जा सकता है, सोचा जा रहा है, वह मन है। जो भी जाना गया है, जो भी जाना जा सकता है, जो भी जानने लायक समझा जाता है, वह सब का सब मन के दायरे में है। मन की समाप्ति का मतलब है—जो जाना है, उसकी समाप्ति और जो जानना है उसकी समाप्ति। यह तो छलांग है-ज्ञानातीत में। जब मन न रहा, तो जो बचा वह ज्ञानातीत है।
  
मन के इसी सत्य को गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने अपनी रामायण में गाया है- ‘गो गोचर जहाँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई॥’ अर्थात् इन्द्रियाँ, इन्द्रियों की पहुँच और जहाँ-जहाँ तक मन जाता है, हे भाई, तुम उस सब को माया जानना, मिथ्या समझना। महर्षि पतंजलि के अनुसार इसी माया का मिटना, मिथ्या का हटना यानि कि मन का समाप्त होना योग है।
  
मन की परेशानी, मन से परेशानी, साधकों का सबसे अहम् सवाल है, सबसे जरूरी और महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। इस उलझन को सुलझाने के लिए सबसे पहले यह जान लें कि आखिर मन अपने आप में है क्या? यह हमारे भीतर बैठा हुआ क्या कर रहा है, क्या-क्या कर रहा है? आमतौर पर सब यही सोचते रहते हैं कि मन सिर में पड़ी या रखी हुई कोई भौतिक चीज है। पर परम पूज्य गुरुदेव इस बात को नहीं स्वीकारते। वह कहते हैं कि जिसने भी मन को अन्दर से पहचान लिया है, वह ऐसी बातें नहीं स्वीकारेगा। आज-कल का विज्ञान भी ऐसी बातों से इन्कार करता है। गुरुदेव कहते हैं मन एक वृत्ति, क्रियाशीलता है।
  
अब जैसे कि कोई चलता हुआ आदमी बैठ जाय, तो बैठने पर उसका चलना कहाँ भाग गया? तो बात इतनी सी है कि चलना कोई वस्तु या पदार्थ तो थी नहीं, वह तो एक क्रिया है। इसलिए कोई किसी के बैठने पर यह नहीं पूछा करता कि तुमने अपना चलना कहाँ छुपा कर रख दिया? यदि कोई किसी से ऐसा पूछने लगे, तो सामने वाला जोर से हँस पड़ेगा। वह यही कहेगा कि यह तो क्रिया है। मैं चाहूँ, तो फिर से चल सकता हूँ, बार-बार चल सकता हूँ। चाहने पर चलना रोक भी सकता हूँ। बस, कुछ इसी तरह मन भी एक तरह का क्रियाकलाप है। बस, मन या ‘माइण्ड’ शब्द से किसी तत्त्व या पदार्थ के होने का भ्रम होता है। यदि इस माइण्ड को माइण्डिंग कहा जाय, तो सत्य शायद ज्यादा साफ हो जाय। जैसे बोलना टाकिंग है, ठीक वैसे ही सोचना माइण्ंिडग। यह सक्रियता थमे, तो मन का अवसान हो और साधक योगी बने।
  
.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १८
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 Some Thoughts on Religion and Spirituality

Spirituality is the science of consciousness; and religion is the art of living.

Spirituality is the ‘knowledge’ aspect of creation; and religion is the ‘activity’ aspect of it.

Spirituality is idealism; and religion is the method of imbibing it in real life.

Spirituality leads to self-realization; and religion shows the way to attain it.

The focus of spirituality is the Supreme Spirit; and that of religion is the individual soul.

Religion is the sadhana (ritualistic modes / methods / traditions) of uplifting the human consciousness. The ultimate aim of all the methods of sadhana is same.

Religion is a sky which is open to all to fly in their own way irrespective of caste, color, creed, nationality, etc.
Those, who know the essence of spirituality and follow the righteous path of religion, are sure to achieve the boons of peace and prosperity at the individual level; and contribute to social harmony at large.

Pandit Shriram Sharma Acharya

👉 भक्तिगाथा (भाग ७७)

भक्तवत्सल भगवान के प्रिय भीष्म देवर्षि ने उन्हें सत्कारपूर्वक अपने पास बिठाया और इसी के साथ भक्तिसूत्र के अगले सत्य का उच्चारण किया- ‘तत्तु ...