Book अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान:-भाग 1 लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
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सोमवार, 1 मार्च 2021

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (अंतिम भाग)

सारे नियंत्रणों पर नियंत्रण है—निर्बीज समाधि
इस सम्बन्ध में युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव एक गुरुभक्त के जीवन की सच्ची घटना सुनाते थे। इन महाभाग का नाम ‘रामलगन’ था। मध्य प्रदेश के छोटे से गाँव में छोटी सी दूकान और जमीन के छोटे से टुकड़े पर गुजर-बसर करने वाला यह रामलगन साधारण सा गरीब गृहस्थ था। किन्हीं शुभ संस्कारों के उदय होने से उसे ‘अखण्ड ज्योति’ पत्रिका मिली और वह परम पूज्य गुरुदेव के सम्पर्क में आ गया। रामलगन की पढ़ाई-लिखाई बस साधारण अक्षर ज्ञान तक सीमित थी। हाँ, उसमें इतनी योग्यता जरूर थी कि वह अखण्ड ज्योति पढ़ सकता था और अपने गुरुदेव को चिट्ठी लिख सकता था। गुरुदेव बताते थे कि अखण्ड ज्योति संस्थान के दिनों में रामलगन का पत्र रोज आता था। वह रोज रात सोने के पहले गुरुदेव को पत्र लिखता और सुबह जागने पर उसे पास के लेटर बॉक्स में डाल देता। यही उसकी आत्म-बोध और तत्त्वबोध की साधना थी।
जैसा नाम-वैसा गुण। रामलगन की लगन तो केवल अपने श्रीराम में थी। गुरुदेव बताते थे कि उसने अपने पत्रों में कभी भी अपने और अपने परिवार या किसी भी सगे-सम्बन्धी के किसी कष्ट-कठिनाई की चर्चा नहीं की। मथुरा आने पर भी उसने कभी कोई परेशानी नहीं बतायी। बहुत पूछने पर केवल इतना कह देता कि गुरुदेव मैं तो केवल माताजी के हाथ का बना प्रसाद पाने और आपका चरण स्पर्श करने आता हूँ। जैसी उसकी अपूर्व भक्ति थी-वैसी ही उसकी कर्मनिष्ठा थी। छोटी सी सामर्थ्य के बावजूद गुरुकृपा के बलबूते बड़े आयोजन करा लेता था। अंशदान-समयदान उसके जीवन में नियमित अंग थे।
एक दिन गुरुदेव अपने इस अद्भुत भक्त पर प्रसन्न होते हुए बोले-तुम क्या चाहते हो रामलगन? तुम जो भी चाहोगे, मैं वह सब दूँगा-बोलो! रामलगन अपने परम समर्थ गुरु की कृपा पर थोड़ी देर तक मौन रहा। फिर बोला-गुरुदेव! मेरी वैसी कोई सांसारिक चाहत तो नहीं है, बस एक जिज्ञासा है, निर्बीज समाधि को जानने की जिज्ञासा। जैसे समर्थ गुरु वैसा ही दृढ़निष्ठ जिज्ञासु शिष्य। गुरुदेव ने उत्तर में कहा-रामलगन क्या तुम अपने जीवन में भयानक कष्ट सहने के लिए तैयार हो? इस सवाल पर गहराई से सोच लो। यदि तुम्हारा जवाब हाँ में होगा, तो तुम्हारी जिज्ञासा पूरी हो जायेगी।
अपनी बात पूरी करते हुए गुरुदेव ने उसे बताया-निर्बीज समाधि के लिए चित्त के सभी संस्कारों का दहन-शोधन जरूरी है और यह प्रक्रिया कठिन एवं दीर्घ है। काम कई जन्मों का है। यदि इसे एक जन्म में पूरा करें, तो कठिन स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं। चित्त से संस्कार तीव्रतापूर्वक निकालने पर जीवन में बड़ी तीव्रता से परिवर्तन आते हैं। शरीर भी इसे तभी सहन कर पाता है, जबकि निरन्तर तपरत रहे। अन्यथा बीच में इसके छूट जाने की स्थिति बन जाती है। गुरुभक्त रामलगन को बात समझ में आयी। उसके हाँ कहते ही गुरुदेव के संकल्प के प्रभाव से उसके जीवन की परिस्थितियों में तीव्र परिवर्तन आने लगे। गायत्री साधना, चन्द्रायण व्रत, अलोना भोजन, गुरुदेव का ध्यान और नियमित काम-काज उसका जीवन बन गया।  धैर्य और मौन ही उसके साथी थे। गुरुभक्ति ही उसका सम्बल थी। इस प्रक्रिया में उसे कई दशक गुजरे और अंत में उसे गुरु भक्ति का प्रसाद निर्बीज समाधि के रूप में मिला। उसके जीवन की अंतिम मुस्कान में चेतना के सर्वोच्च शिखर का परम सौन्दर्य झलक रहा था। 

॥ ॐ तत्सत् इति प्रथमः समाधिपादः समाप्तः॥

.... समाप्त
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १९९
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ११६)

सारे नियंत्रणों पर नियंत्रण है—निर्बीज समाधि

नित नये अनुभव कराती अंतर्यात्रा के विज्ञान के प्रयोग चेतना के रहस्यमय शिखरों की झलक दिखाते हैं। इन चेतना शिखरों में हर एक शिखर सम्मोहक है। प्रत्येक का सौन्दर्य अद्वितीय है। चेतना के हर शिखर पर बोध की नयी अनुभूति है, योग की नयी शक्ति की प्राप्ति है। अंतर्यात्रा विज्ञान के इन प्रयोगों में प्रत्येक स्तर पर सर्वथा नयापन है। यह नयापन प्रयोग की प्रक्रिया में भी है और परिणाम की प्राप्ति में भी। जो पहले किया जा चुका है, अगली बार उससे कुछ अलग हटकर करना पड़ता है और इसकी परिणति भी कुछ अलग ही होती है। ज्यों-ज्यों यह सिलसिला चलता है, चित्त के विकार मिटते हैं। प्रत्येक विकार के मिटते ही एक नयी अनुभूति की किरण फूटती है। इन विकारों के मिटने के बाद विचारों के मिटने का क्रम आता है। साथ ही साधक की योग अनुभूति सघन होती है और सबसे अंत में मिटते हैं-संस्कार। सभी तरह के संस्कारों के मिटने के साथ ही योग साधक निर्विचार से निर्बीज की ओर छलांग लगाता है।
 
अनासक्ति स्वाभाविक होती है। अंतस् में न तो विकारों की कीचड़ जमती है और न विचारों का शोर होता है। ऐसे में संस्कारों की छाया और छाप भी स्वभावतः ही हटती-मिटती है। अंतश्चेतना निर्बीज में छलांग लगाने के लिए तैयार होती है।
इस तथ्य का खुलासा करते हुए महर्षि पतंजलि कहते हैं-
तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः॥ १/५१॥
शब्दार्थ- तस्य = उसका; अपि = भी; निरोधे = निरोध हो जाने पर; सर्वनिरोधात् = सबका निरोध हो जाने के कारण निर्बीजः = निर्बीज; समाधिः = समाधि (हो जाती है)।
भावार्थ- जब सारे नियंत्रणों पर का नियंत्रण पार कर लिया जाता है, तो निर्बीज समाधि फलित होती है और उसके साथ ही उपलब्धि होती है-जीवन-मरण से मुक्ति।

योगर्षि पतंजलि ने इस सूत्र में जिस अनुभूति का संकेत किया है, वह व्यक्तित्व की अद्भुत घटना है। यह है-सृष्टि और जीवन में होने वाले सभी चमत्कारों का सार। यह चेतना का अंतिम शिखर है, जहाँ कोई नियंत्रण और संयम न होने के बावजूद प्रकाश और ज्ञान अपनी सम्पूर्णता में फलित होते हैं। यह वही आलोक लोक है-जिसकी चर्चा करते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने गीता (१५.६) में कहा है-
‘न तद्भासयते सूर्यो शशांको न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥’

जहाँ सूर्य, चन्द्र और अग्नि का प्रकाश होने के बावजूद प्रकाश है। जहाँ पहुँचकर फिर से वापस नहीं आना पड़ता है, वही मेरा परम धाम है। यही शिव भक्तों का महाकैलाश है और विष्णु भक्तों का वैकुण्ठ। निर्गुण उपासकों को यही ब्रह्म सायुज्य मिलता है। परम योगियों का सत्यलोक यही है।
जीवन में भली-बुरी परिस्थितियाँ हमारे अपने ही किन्हीं भले-बुरे संस्कारों का परिणाम है। इन परिस्थितियों के प्रति हमारे मन में उठने वाले भली-बुरी भाव विचार की प्रतिक्रियाएँ अपनी प्रगाढ़ता में नये संस्कारों को जन्म देती है। इस तरह संस्कारों से परिस्थितियाँ और परिस्थितियों से संस्कार यह सिलसिला अनवरत चलता रहता है। आचार्य शंकर की भाषा में ‘पुनरपि जननं पुनरपि मरणं, पुनरपि जननी जठरे शयनम्’ यानि कि फिर से जन्म और फिर मरण और फिर दुबारा माँ की कोख में आगमन-शयन। इसका कोई अंत-विराम नहीं। जन्म-मरण का यह सिलसिला अनवरत-अविराम चलता रहता है। यदि इसे कहीं विराम देना है, तो स्वयं ही चेतना पड़ता है और योग साधक को अनासक्ति, सहनशीलता और ध्यान की त्रिवेणी में गोते लगाने पड़ते हैं। इस त्रिवेणी में स्नान करने वाला चित्त ही जन्म-मरण के कालव्यूह से बाहर आ पाता है।

.... कल के अंक में समाप्त
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १९७
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ११५)

जब मिलते हैं व्यक्ति और विराट्

संसार वस्तुओं एवं व्यक्तियों का भी है और ऊर्जाओं का भी और सम्भव है इनमें पारस्परिक परिवर्तन भी, परन्तु यह बात कोई वैज्ञानिक ही समझेगा। ठीक इसी भाँति दुनिया अहंता की भी है, जहाँ मैं-मेरे और तू-तेरे की दीवारें हैं और आत्म-व्यापकता, ब्रह्मनिष्ठता की भी, जहाँ ये काल्पनिक लकीरें ढहती नजर आती हैं, बल्कि ऐसा लगता है कि ये भेद कभी था हीं नहीं। पर ये बात कोई अध्यात्मतत्त्व का अनुभवी ही समझेगा और कोई नहीं।
कहते हैं कि एक बड़े धनपति को अपने धन का भारी अहं था। उसे गर्व था अपनी बड़ी फैक्ट्री का। ये धनाड्य महोदय राजस्थान के थे और परम पूज्य गुरुदेव से मिलने के लिए गायत्री तपोभूमि मथुरा पहुँचे थे। अपनी बातों के बीच-बीच में फैक्ट्री एवं हवेली की चर्चा जरूर कर देते, परन्तु गुरुदेव ने उनकी इन बातों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की। थोड़ी देर तक वार्तालाप यूँ चलता रहा। तभी गुरुदेव हँसते हुए उठे और एक बड़ा सा नक्शा सामने लाकर बिछा दिया। यह नक्शा विश्व का था। इसे दिखाते हुए वह उन सेठ जी से बोले-सेठ जी! जरा इसमें ढूँढ़िये तो सही कि अपना भारत देश कहाँ है। थोड़े से आश्चर्यचकित सेठ ने जैसे-तैसे एक जगह पर अंगुली रखकर भारत देश बताया।
अब गुरुदेव ने उनसे राजस्थान की बात पूछी, बड़ी मुश्किल से बेचारे राजस्थान बता पाये और अपना शहर जयपुर बताने में तो उन्हें पसीना आ गया। कहीं पर उन्हें जयपुर ढूँढे ही न मिला। जब गुरुदेव ने उनसे अपनी फैक्ट्री एवं हवेली बताने को कहा, तो वे चकरा गये और बोले-आचार्य जी! आप तो मजाक करते हैं, भला इसमें मेरी फैक्ट्री-हवेली कहाँ मिलेगी। उन्हें इस तरह परेशान होते देखकर गुरुदेव बोले-सेठ जी! कुछ ऐसे ही ब्रह्माण्ड के नक्शे में अपनी धरती नहीं ढूँढी जा सकती और जब बात भगवान् की हो, तो हमारा अपना अहं बड़ा होने पर भी कहीं नजर नहीं आता। इस प्रसंग को गुरुदेव ने अपनी चर्चाओं में एक बार बताते हुए कहा था-योग साधक का चित्त जैसे-जैसे शुद्ध होता है-वैसे ही उसके अहं का अस्तित्व विलीन होता है। कुछ वैसे ही जैसे कि बर्फ का टुकड़ा वाष्पीभूत हो जाता है।
और जब अहं ही नहीं, तब अहंता के संस्कार कैसे? वह तो विराट् में घटने वाली घटनाओं का साक्षी बन जाता है। उसे स्पष्ट अनुभव होता है कि सत्, रज एवं तम के त्रिगुणात्मक ऊर्जा प्रवाह वस्तु, व्यक्ति एवं परिस्थिति में एक आश्चर्यकारी उलटफेर कर रहे हैं। बस एक दिव्य क्रीड़ा चल रही है। एक दिव्यजननी माँ परम प्रकृति के इंगित से सारे परिवर्तन हो रहे हैं। ऐसे में क्रियाएँ तो होती दिखती हैं, पर कर्त्ता नहीं। उसे स्पष्ट अनुभव होता है कि वस्तु, व्यक्ति एवं परिस्थति इन क्रियाओं की घटने वाली घटनाओं का माध्यम है। यह मात्र कल्पना या विचार नहीं, एक अनुभव है, प्रगाढ़ एवं विस्तीर्ण। जो योग साधक में सम्पूर्ण बोध बनकर उतरता है। इस अवतरण के साथ ही उसके चित्त में क्रियाओं, भावों एवं विचारों के प्रतिबिम्ब तो पड़ते हैं, परन्तु उनका कोई निशान उस पर नहीं अंकित हो पाता।
बल्कि अंतश्चेतना की इस अनूठी भावदशा में जो भाव एवं विचार उपजते हैं, वे रहे-बचे संस्कारों का भी नाश करते हैं। इस अनुभव को पाने वाले के बोध में किसी भी वस्तु या व्यक्ति में विराट् घुलता नजर आता है। तभी तो अंग्रेजी भाषा के कवि वर्ड्सवर्थ ने यह बात कही कि यदि मैं एक फूल को जान लूँ, तो परमात्मा को जान लूँगा। लोगों ने उस महाकवि से सवाल किया भला यह कैसे? तो जवाब में वह हँसा और बोला कि इस एक के बिना परमात्मा का अस्तित्व जो नहीं है। सुनने वाला कोई पादरी था, उसने कहा-यह कैसे बात करते हो? तो उस कवि ने अपनी रहस्यमयी वाणी में कहा-तुम यह भी जान लो कि परमात्मा का अस्तित्व तो मेरे बिना भी नहीं है। पादरी को लगा कि यह कवि पागल हो गया है, पर सच्चाई यह थी कि वह महाकवि उस भावदशा को पा चुका था, जहाँ व्यक्ति एवं विराट् घुलते हुए अनुभव होते हैं। इस अनुभव की व्यापकता में देह के प्रति ममता नहीं रह पाती और न बचता है मन का कोई पृथक् अस्तित्व। अहंता यहाँ अस्तित्व को खो देती है। और चित्त के दर्पण में झाँकी होती है ब्रह्म की। ऐसे में किसी नये संस्कारों का उपजना सम्भव नहीं। यह ऐसी रहस्य कथा है, जिसे अनुभवी कहते हैं और अनुभवी ही समझते हैं। जो अनुभव पाने की डगर पर हैं, वे इस सूत्र को पकड़कर अपना नया अनुभव पा सकते हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १९४
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

सोमवार, 22 फ़रवरी 2021

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ११४)

जब मिलते हैं व्यक्ति और विराट्

अंतर्यात्रा विज्ञान के रहस्यमय प्रयोगों का प्रभाव चित्त पर स्पष्ट दिखाई देता है। इसका सूक्ष्म, सूक्ष्मतर एवं सूक्ष्मतम परिशोधन होने से कर्मबीज, संस्कार, आसक्ति एवं अहंता हटते-मिटते हैं। जहाँ पहले प्रत्येक कर्म एवं भाव व विचार अपनी प्रगाढ़ स्थिति में चित्त पर अपनी अमिट छाप छोड़ते थे, वहीं अब यह स्थिति बदल जाती है। अब तो केवल चित्त पर उनका प्रतिबिम्ब पड़ता है और वह भी क्षणिक। जब तक कर्म अथवा भव-विचार की प्रगाढ़ क्रियाशीलता रहती है, तब तक चित्त के दर्पण पर उसकी झाँकी दिखती है, परन्तु जैसे ही इनकी स्थिति बदली, वैसे ही यह झलक भी मिट जाती है। इस परिशोधन से न केवल चित्त की क्रियाविधि, बल्कि उसका स्वरूप भी बदलता है। इसमें पारदर्शिता के साथ व्यापकता भी आती है। इसके संवेदन योग साधक के अंतस् में अतीन्द्रिय संवेदन एवं ब्रह्माण्डीय अनुभूतियों के रूप में उभरते हैं।

अब ऋतम्भरा प्रज्ञा के एक अन्य विशिष्ट गुण की चर्चा करते हुए महर्षि पतंजलि अपने एक नये सूत्र को प्रकट करते हैं-
‘तज्जः संस्कारोऽन्यसंस्कारप्रतिबन्धी॥ १/५०॥’

शब्दार्थ- तज्जः = उससे उत्पन्न होने वाला; संस्कारः = संस्कार; अन्यसंस्कार प्रतिबन्धी = दूसरे संस्कारों का बाध करने वाला होता है।
भावार्थ- जो प्रत्यक्ष बोध निर्विचार समाधि में उपलब्ध होता है, वह सभी सामान्य बोध संवेदनाओं के पार होता है-प्रगाढ़ता मे भी, विस्तीर्णता में भी। यही वजह है कि इससे उत्पन्न संस्कार में अन्य सभी संस्कार विलीन हो जाते हैं।

यह भावदशा सामान्य अनुभव से परे है। यह बूझो तो जाने की स्थिति है, परन्तु साथ ही वैज्ञानिक भी है। संतों की उलटबासियाँ यहीं से शुरू होती है। अध्यात्मवेत्ताओं के कथन यहीं रहस्यमय हो जाते हैं, क्योंकि चेतना की इसी अवस्था में व्यक्ति एवं विराट् यहीं मिलते हैं, बल्कि यूँ कहें कि घुलते हैं। संक्षेप में यह मिलन बिन्दु है, घुलन बिन्दु है-व्यक्ति का विराट् में। जिसके साथ ऐसा हुआ अथवा हो रहा है वही इसे समझेगा। शेष को तो अविश्वास करना ही है। अब जैसे बर्फ के ठोस आकार को देखकर पारखी उसके पानी बनने की बात कह सकता है। उसके व्यापक होने की सम्भावनाएँ उसे उस बर्फ के टुकड़े में नजर आयेगी और साथ उससे आगे की अवस्था जबकि यह जल वाष्प बन जायेगा, उसके अपने मानसिक नेत्रों में झलकने लगेगी। लेकिन कोई गैर जानकार बर्फ के वाष्प होने की कहानी पर आश्चर्ययुक्त अविश्वास ही करेगा।
.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १९३
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ११३)


बिन इन्द्रिय जब अनुभूत होता है सत्य
    
इस सूत्र में उलट बासी तो है, थोड़ा अटपटा सा भी है। पर है एक दम खरा। पर जो समझे उसके लिए। यहाँ तक कि वैज्ञानिकों के लिए भी यह काफी दिनों तक एक गणितीय पहेली बना रहा। हालाँकि इन दिनों उन्होंने फोटान की भाषा सीख ली है और कम्प्यूटर नेटवर्क के जरिए वे उसका इस्तेमाल करने लगे हैं। फिर भी एक पहेली तो उनके सामने बची हुई है ही कि एक साथ सब कुछ एक समय में कैसे जाना जा सकता है। फोटान की भाषा सीखने के बाद उनकी मानसिक चेतना तो सीमित ही है। यदि उनसे आत्मविकास की साधना हो सके, तो शायद जान पाएंगे कि आध्यात्मिक अनुभव में आत्मचेतना के विस्तार में सब कु छ एक साथ एक समय में जान लिया जाता है।
    
योगियों को ऐसे अनुभव होते रहे हैं। स्वामी विवेकानंद जी महाराज के जीवन का एक आध्यात्मिक प्रसंग है, उन दिनों वे अल्मोड़ा में रहकर साधना कर रहे थे। निपट एकाकी वन में एक वृक्ष के नीचे बैठे हुए थे। इन्द्रिय चेतना प्रत्याहार में विलीन हो गयी थी। निराकार सर्वव्यापी परम सत्ता क ी धारणा ध्यान की लय पा चुकी थी। यह ध्यान उत्तरोत्तर प्रगाढ़ होता हुआ कब समाधि के सोपान चढ़ने लगा यह काल को भी पता न चला। और उन्हें इसी मध्य एक अनुभव हुआ पिण्ड के ब्रह्माण्ड का। व्यक्ति चेतना में समष्टि चेतना का अनुभव और धीरे-धीरे यह अनुभव ब्रह्माण्ड बोध में बदल गया।
    
जब उच्चस्तरीय समाधि की भाव भूमि से दैहिक चेतना में लौटे तो उन्होंने अपने गुरूभाई स्वामी तुरीयानंद से इसकी चर्चा की। बोले-हरी भाई मैं जान लिया। मुझे हो गया अनुभव अस्तित्व व्यापी चैतन्यता का। इसी को तो योगेश्वर कृ ष्ण कहते है, कि क ोई इसे आश्चर्य से सुन कहता है और कोई इसे आश्चर्य से सुनता है और कोई विरला इस आश्चर्य को सम्पूर्ण रूप से जानता है। योगी के उल्लास में से ये सभी आश्चर्य एक साथ अंकुरित-पल्लवित होते है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १९१
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

बुधवार, 17 फ़रवरी 2021

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ११२)

बिन इन्द्रिय जब अनुभूत होता है सत्य 
सच की सम्पूर्णता तो तभी सम्भव है, जब वह सम्पूर्ण अस्तित्व की अनन्तत्व के कण-कण में समाया हो। मनीषी वैज्ञानिक आइन्सटीन के इस सिद्घांत का दूसरा पहलू क्वाण्टम् सिद्घांत में हैं। इसका प्रवर्तन मैक्सप्लैंक एवं हाइजेनबर्ग आदि वैज्ञानिकों ने किया था। उनका कहना था कि पदार्थ का सच ज्यादा टिकाऊ नहीं है। उन्होंने बताया- पदार्थ एवं ऊर्जा निरन्तर एक-दूसरे में बदलते रहते हैं और जिस तरह से पदार्थ का सबसे छोटा कण परमाणु है, उसी तरह से ऊर्जा का सबसे छोटा पैकेट क्वाण्टा है। इस क्वाण्टा की स्थिति अनिश्चित है। इसमें वस्तु जैसा कुछ भी नहीं है। ऊपर इनमें परस्पर गहरा जुड़ाव है। यह जुड़ाव इतना अधिक है कि अभिन्न भी कहा जा सकता है। 
विज्ञान के इन दोंनों सिद्घांतों ने ज्ञान- के खोजियों के सामने एक बात बड़ी साफ कर दी है कि अनुभव यदि पदार्थ के, वस्तु के , व्यक्ति के अथवा स्थिति के हैं और यदि इन्हें इन्द्रियों के झरोखों से पाया गया है, तो कभी सम्पूर्ण नहीं हो सकते। इतना ही नहीं, इन्हें सन्देह एवं भ्रम से परे भी नहीं कहा जा सकता। इस तरह के अनुभव में तो कई दीवारें है, अनेकों पर्दे हैं। एक दीवार इन्द्रियों की- एक पर्दा स्नायु जाल का। फिर एक दीवार मस्तिष्क की। फिर एक पर्दा विचार तंत्र का। हम ही सोच लें—कितनी अपूर्णता होगी इस अनुभव में। 
परम पूज्य गुरूदेव कहते थे कि अनुभव वह,जिसमें कोई दीवार या पर्दा न हो। अब यह क्या बात है कि आँख का देखा कुछ और, और यदि किसी सूक्ष्मदर्शी या दूरदर्शी यंत्र से देखा तो और। कानों ने एक खबर सुनायी और बुद्घि ने कुछ अनुमान सुझाए, पर अन्तःकरण अनुभव से रीता रहा। चेतना वैसी ही कोरी व सूनी बनी रही। लेकिन जिसकी प्र्रज्ञा ऋतम्भरा से संपूरित हो गयी उसके साथ ऐसी कोई समस्या नहीं। निर्विकार समाधि की भाव दशा में अस्तित्व व्यापी चेतना की अनन्तता में सत्य अपने सम्पूर्ण रूप से प्रकाशित होता है। इसी अनुभव को पाकर सन्त कबीर बोल उठे-कहत कबीर मैं पूरा पाया अर्थात् मैने पूरा पा लिया। पूर्णिमा की चाँदनी से उद्भासित हो गया अन्तःकरण।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १९०
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2021

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग १११

बिन इन्द्रिय जब अनुभूत होता है सत्य 

अन्तर्यात्रा विज्ञान के प्रयोग से अन्तस् में आध्यात्मिक अनुभव पल्लवित होते हैं। चित्त शुद्घि के स्तर के अनुरूप इन अनुभवों की प्रगाढ़़ता, परिपक्वता एवं पूर्णता बढ़ती जाती है। सामान्य जानकारियों वाले ज्ञान से इनकी स्थिति एकदम अलग होती है। सामान्य जानकारियाँ या तो सुनने से मिलती हैं अथवा फिर बौद्घिक अनुमान से। ये कितनी भी सही हो, पर अपने अस्तित्व के लिए परायी ही होती हैं। इनके बारे में कई तरह की शंकाएँ एवं सवाल भी उठते रहते हैं। इनके बारे में एक बात और भी है, वह यह कि आज का सब कल गलत भी साबित होता रहता है। पर आध्यात्मिक अनुभवों के साथ ऐसी बात नहीं है। ये अन्तश्चेतना की सम्पूर्णता में घटित होते हैं। इनका आगमन किन्हीं ज्ञानेन्द्रियों के द्वारों से नहीं होता और न ही किन्हीं पुस्तकों में लिखे अक्षरों से इनका कोई सम्बन्ध है। ये तो अन्तर में अंकुुरित होकर चेतना के कण-कण में व्याप्त हो जाते है।

सामान्य क्रम में बुद्घि अस्थिर, भ्रमित एवं सन्देहों से चंचल रहती है। इसमें होने वाले अनुभव भी इसी कारण से आधे-अधूरे और सच-झूठ का मिश्रण बने रहते हैं। ज्ञानेन्द्रियों का झरोखा भी धोखे से भरा है, जो कुछ दिख रहा है, वह सही हो यह आवश्यक तो नहीं है। जो अभी है कल नहीं भी हो सकता है। इस तरह कई अर्थों में आध्यात्मिक अनुभव अनूठे और पूरे होते हैं। 

इसी सत्य को महर्षि ने अपने अगले सूत्र में कहा है-
श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात्॥ १/४९॥
शब्दार्थ-श्रु्रतानुमानप्रज्ञाभ्याम्= श्रवण और अनुमान से होने वाली बुद्घि की अपेक्षा; अन्यविषया= इस बुद्घि का विषय भिन्न है; विशेषार्थत्वात्= क्योंकि यह विशेष अर्थवाली है।
भावार्थ- निर्विचार समाधि की अवस्था में विषय वस्तु की अनुभूति होती है, उसकी पूरी सम्पूर्णता में। क्योंकि इस अवस्था में ज्ञान प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त होता है, इन्द्रियों को प्रयुक्त किए बिना ही।
महर्षि पतंजलि के इस सूत्र में एक अपूर्व दृष्टि है। इस दृष्टि में आध्यात्मिक संपूर्णता है। जिसमें आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी स्वतः समावेशित हो जाता है। जिनकी दार्शनिक रुचियाँ गम्भीर हैं, जो आध्यात्मिक तत्त्वचर्चा में रुचि रखते हैं उन्हें यह सच भी मालूम होगा कि आध्यात्मिकता का एक अर्थ अस्तित्व की सम्पूणर््ाता भी है। बाकी जहाँ-कहीं जो भी है, वह सापेक्ष एवं अपूर्ण है। विज्ञान ने बीते दशकों में सामान्य सापेक्षिता सिद्घांत एवं क्वाण्टम् सिद्घांत की खोज की है। ये खोजें आध्यात्मिक अनुभवों को समझने के लिए बड़ी महत्वपूर्ण हैं। सामान्य सापेक्षिता सिद्घांत का प्रवर्तन करने वाले आइन्सटीन का कहना है-वस्तु, व्यक्ति अथवा पदार्थ का सच उसकी देश- काल की सीमाओं से बँधा है। जो एक स्थल और एक समय सच है, वही दूसरे स्थल और समय में गलत भी हो सकता है। इस सृष्टि अथवा ब्रह्माण्ड के सभी सच इस सिद्घांत के अनुसार आधे अधूरे और काल सापेक्ष है। 

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १८९
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2021

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ११०)

निर्मल मन को प्राप्त होती है—ऋतम्भरा प्रज्ञा

यहाँ पहुँचते ही जीवन चेतना शिकायतों-सन्देहों, उलझनों, भ्रमों से मुक्त हो जाती है। सब कुछ समझ में आने लगता है, एकदम साफ-साफ और सुस्पष्ट। प्रत्येक तत्त्व की स्थिति ही नहीं, उसका औचित्य भी स्पष्ट हो जाता है। और तब पता चलता है कि यथार्थ में परेशान होने का कोई कारण ही नहीं है। यही विशेषता है—इस भावदशा का।

ऋतम्भरा में सर्वत्र सम्पूर्णता ही है। और इस सम्पूर्ण में सभी कुछ इतनी समस्वरता एवं संगीत लिए है कि बस माधुर्य के अलावा कुछ बचता ही नहीं। यहाँ केवल जीवन ही नहीं, मृत्यु का भी अपूर्व सौन्दर्य है। हर वस्तु नए प्रकाश में आलोकित होता है। पीड़ा भी, दुःख भी एक नए गुणवत्ता के साथ स्वयं को प्रकट करते हैं। यहाँ असुन्दर भी सुन्दर हो जाता है, क्योंकि तब पहली बार समझ में आता है कि विपरीतता, विषमता क्यों आवश्यक है। और तब ये सब और इनमें से कुछ भी असुविधाजनक नहीं रहता। सब का सब एक दूसरे के सम्पूरक हो जाता है। यह बड़ा ही स्पष्ट अनुभव होता है-ये सभी तत्त्व एक दूसरे की मदद के लिए हैं।

सामान्य बोलचाल में- जिसे हम सब कहते-सुनते हैं, भगवान् का प्रत्येक विधान मंगलमय है। उसकी सही समझ चेतना की इसी अवस्था में समझ आती है। प्रज्ञा के ऋतम्भरा होने पर ही भगवान् के मंगलमय विधान का बोध होता है। अभी वर्तमान में एक कोरा कथन है- जिसमें शब्द तो बोले जाते हैं, परन्तु उनमें कोई अर्थ नहीं होता। बस एक ध्वनि बनकर कानों में गूँज जाती है। इसमें अस्तित्व के प्राण नहीं बसते। परन्तु प्रज्ञा के ऋतम्भरा होने पर इस मंगलमयता की प्रतिपल प्रतिक्षण अनुभूति होती रहती है। और योगी बन जाता है—मीरा की तरह, सुकरात की भाँति। उसे प्राप्त होती है महात्मा ईसा की अवस्था, जिसमें विष का प्याला, सूली की चुभन भी मंगलमय नजर आती है; क्योंकि तब इसकी बहुमूल्यता अनुभूत होने लगती है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १८७
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2021

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग १०९)

निर्मल मन को प्राप्त होती है—ऋतम्भरा प्रज्ञा

अन्तर्यात्रा विज्ञान के प्रयोग- विशेष तौर पर ध्यान की प्रणालियाँ, बुद्धि के इस कल्मष को दूर करती है। इस कल्मष के दूर होने से इसमें सहज निर्मलता आती है। इसके विकार दूर होने से इसमें न केवल सत्य का आकलन करने की योग्यता विकसित होती है, बल्कि इसमें ऋत् दर्शन की दृष्टि भी पनपती है। युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव अपनी आध्यात्मिक चर्चाओं में सत्य के दो रूपों की चर्चा किया करते थे। एक वह जो सामान्य इन्द्रियों एवं साधारण बौद्धिक समझ से देखा व जाना जाता है। जिसके रूप काल एवं परिस्थिति के हिसाब से बदलते रहते हैं। उदाहरण के लिए टेबिल में पुस्तक रखी है। यह सत्य है, किन्तु यह सत्य एक सीमित स्थान एवं सीमित समय के लिए है। समय एवं स्थान के परिवर्तन के साथ ही यह सत्य- सत्य नहीं रह जाएगा।

सत्य के इस सामान्य रूप के अलावा एक अन्य रूप है, जो सर्वकालिकम एवं सार्वभौमिक है। यह अपरिवर्तनीय है। क्योंकि यह किसी एक स्थान से नहीं, बल्कि सम्पूर्ण अस्तित्व से जुड़ा है। यह सत्य अस्तित्व के नियमों का है। भौतिक ही नहीं, अभौतिक या पराभौतिक प्रकृति इस दायरे में आते हैं। यह न बदलता है और न मिटता है। इसे जानने वाला सृष्टि एवं स्रष्टा के नियमों से परिचित हो जाता है। इसकी प्राप्ति किसी तार्किक अवधारणा या फिर किसी विवेचन, विश्लेषण से नहीं होती। बल्कि इसके लिए सम्पूर्ण अस्तित्व से एक रस होना पड़ता है। और ऐसा तभी होता है, जब योग साधक के चित्त को निर्विकार की भावदशा प्राप्त हो।

ऋत् में सत्य की शाश्वतता के साथ परमात्मा की सरसता है। रसौ वैः सः की दिव्य अनुभूति इसमें जुड़ी है। यथार्थ में ऋत् है अन्तरतम अस्तित्व, जो हमारा अन्तरतम होने के साथ सभी का अन्तरतम है। जब योगी को निर्विचार समाधि की अवस्था प्राप्त होती है, तो उसकी प्रज्ञा ऋतम्भरा से आलोकित-आपूरित हो जाती है। उसमें ब्रह्माण्ड की समस्वरता स्पन्दित होने लगती है। यहाँ न कोई द्वन्द्व है और न किसी अव्यवस्था की उलझन। जहाँ कहीं जो भी न कारात्मक है, जो भी विषैला है, वह सबका सब विलीन, विसर्जित हो जाता है। ध्यान रहे कि यहाँ किसी को निकाल फेंकने की जरूरत नहीं रहती, क्योंकि सम्पूर्णता में सबको जीवन के सभी तत्त्वों को उनका अपना स्थान मिल जाता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १८६
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2021

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग १०८)

निर्मल मन को प्राप्त होती है—ऋतम्भरा प्रज्ञा

अन्तःस्थल को निर्मल कर देने वाले अन्तर्यात्रा विज्ञान के प्रयोग चित्त पर अपना प्रभाव डालते हैं। इन प्रयोगों से चित्त की अवस्थाओं में परिवर्तन आते हैं- एक रूपान्तरण की प्रक्रिया घटित होती है। इस प्रक्रिया की तीव्रता के अनुरूप ही परिवर्तित होता है जीवन। चित्त में संस्कार एवं कर्मबीजों की परतों के अनुसार ही जीवन का स्वरूप विकसित होता है। ये विविध संस्कार एवं कर्मबीज काल क्रम में अपनी परिपक्वता के अनुसार ही प्रकट होते हैं। इनके प्रकट होने की अवस्था के अनुरूप ही जीवन की दशा व दिशा बदल जाती है। शुभ संस्कार एवं पुण्य कर्म के प्रकट होने से जहाँ जीवन शुभ व प्रकाश से पूरित होता है, वहीं अशुभ संस्कार एवं पाप कर्म के प्रकट होने से जीवन अशुभ एवं अंधेरे से भर जाता है। योग की वैज्ञानिक प्रक्रियाएँ- ध्यान के प्रयोग चित्त को उत्तरोत्तर निर्मल बनाते हैं। इससे संस्कारों एवं कर्म बीजों का नाश होने से चित्त आध्यात्मिक ज्योति से ज्योतित होता है व जीवन में आध्यात्मिक वातावरण की सृष्टि होती है।

अन्तस् में आया बदलाव जीवन के समूचे कलेवर एवं परिवेश को बदल देता है। संत कवि गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है कि- 
जाको विधि दारुन दुःख देही, ताकी मति पहिले हर लेहीं। 

अर्थात् जिसको विधाता दारुण दुःख देना चाहते हैं, उसकी मति का हरण पहले ही कर लेते हैं। स्थिति उलटी भी है- 
जाको विधि पूरन सुख देहीं, ताकी मति निर्मल कर देहीं
अर्थात् जिसको विधाता पूर्ण सुख देना चाहते हैं, उसकी मति को निर्मल बना देते हैं।
इस निर्मलता के यौगिक महत्त्व को अगले सूत्र में बतलाते हुए महर्षि पतंजलि कहते हैं- 
ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा॥ १/४८॥
शब्दार्थ- तत्र= उस समय (योगी की); प्रज्ञा= बुद्धि; ऋतम्भरा= ऋतम्भरा होती है।
भावार्थ- निर्विचार समाधि में प्रज्ञा ऋतम्भरा से सम्पूरित होती है। 

महर्षि पतंजलि अपने योग सूत्रों में योग साधना की जिन उपलब्धियों की चर्चा करते हैं, उनमें यह उपलब्धि विशेष है। प्रज्ञा या बौद्धिक चेतना हमारे जीवन रथ की संचालक है। इसकी अवस्था ही जीवन की दिशा का निर्धारण करती है। सामान्य क्रम में बुद्धि सन्देह, भ्रम की वजह से चंचल रहती है। इस चंचलता की वजह से ही इसकी निर्णय क्षमता एवं विश्लेषण क्षमता पर असर पड़ता है। बौद्धिक दिशाभ्रम के कारणों में पूर्वाग्रहों, स्वार्थपरता एवं हठधर्मिता का भारी हाथ रहता है। इनके कारण बुद्धि में वह समझदारी नहीं पनप पाती, जिसकी आवश्यकता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १८५
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2021

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग १०७)

परम शुद्घ को मिलता है अध्यात्म का प्रसाद
    
चित्त के संस्कार अदृश्य होने पर भी बड़े बलशाली होते हैं। यूँ समझो यदि इन संस्कारों का रूप शुभ नहीं है, यदि ये अशुभ है या अन्य शब्दों में कुसंस्कार है, तो इनकी प्रक्रिया व प्रतिक्रिया जीवन में बड़े दारुण दुष्परिणाम पैदा करती है। इस प्रक्रिया के तहत ये कुसंस्कार अपने पहले चरण में चित्त के गहरे से ऊपर आकर कुप्रवृत्तियों के रूप में समस्त मनोभूमि में छा जाते हैं। यह सब निश्चित समय अथवा जीवन का निश्चित मौसम आने पर ही होता है। मनोभूमि में उदय हुई इन कुप्रवृत्तियों की सघनता अपने अनुरूप कुपरिस्थितियों को रचती है। और तब एक सुनिश्चित घड़ी में होता है—कुप्रवृत्तियों एवं कुपरिस्थितियों का मेल।
    
और तब शुरू होता है—कुकर्मो का सिलसिला, जो एक बाढ़ की तरह पूरी जीवन चेतना को डूबा देता है। इसके बाद जीवन की कुगति का दण्ड विधान क्रियाशील होता है। इस प्रक्रिया की उलट स्थिति सुसंस्कारों की है। जो आन्तरिक रूप से सत्प्रवृत्तियों एवं बाहरी तौर पर सत्परिस्थितियों के रूप में प्रकट होती है। इसके बाद प्रारम्भ होते हैं—सत्कर्म और जीवन चल पड़ता है—सद्गति के राह पर। महर्षि पतंजलि कहते हैं कि आध्यात्मिक जीवन के लिए चित्त के संस्कारों से मुक्त होना ही चाहिए। इस शुद्धिकरण के लिए भी एक प्रक्रिया है और वह प्रक्रिया पवित्र भाव, पवित्र विचार, पवित्र दृश्य अथवा पवित्र व्यक्तित्व के ध्यान की।
    
अच्छा हो कि इसके लिए हम अपने सद्गुरु का चयन करें। गुरुदेव की छवि को अपने हृदय में प्रतिष्ठित कर उन्हें अपनी भावनाओं का, विचारों का अर्घ्य चढ़ाएँ। गुरुचरणों पर अर्पित करने के लिए आन्तरिक रूप से भाव-विचार एवं बाहरी तौर पर सभी कर्म- यही गुरुअर्चना एवं ध्यान निष्ठा का सर्वोत्तम रूप है। जब हमारे विचार का प्रत्येक स्पन्दन, भाव की प्रत्येक लहर गुरुदेव को अर्पित होगी, तो चित्त की वृत्तियाँ न केवल क्षीण होगी; बल्कि वे रूपान्तरित भी होंगी और शनैः शनैः चित्त निरुद्ध अवस्था की ओर आगे बढ़ता है। इस निरुद्ध अवस्था की अग्रगमन के क्रम में चित्त को निर्विचार अवस्था प्राप्त होती है, जबकि चित्त में किसी भी तरह की कोई लहर नहीं उठती। ऐसे में होती है, तो केवल शून्यता एवं स्वच्छता।
    
विचारों के सभी स्पन्दनों से रहित यह अवस्था परम निर्मल आध्यात्मिक ज्ञान को देने वाली है। इस अवस्था को पाने के लिए क्या साधना हो? इस सवाल के उत्तर में एक बड़ी मार्मिक अनुभूति हो रही है। आज से सोलह-सत्तरह साल पहले जबकि गुरुदेव अपनी स्थूल देह में थे। उनके तप एवं ज्ञान की आभा उनकी वाणी एवं कार्यों से विकरित होती रहती थी। उनसे मिलने, उनके पास रहने वाले शिष्यों-स्वजनों में बड़ा ही मधुर एवं प्रगाढ़ आकर्षण था उनके प्रति। उन्हें लेकर जब तब चित्त चिन्ताकुल भी होता था। गुरुदेव के स्थूल रूप में न रहने पर क्या होगा, कैसे होगा?
    
शिष्य के मन में उफनते ये प्रश्न उन अन्तर्यामी सद्गुरु से छुपे न रहे। एक दिवस मध्याह्न में उन्होंने शिष्य की इस चिन्ता को भाँप लिया और लगभग हँसते हुए बोले- पहली बात तो यह जान ले बेटा! कि मैं देह नहीं हूँ। यह सच है कि देह अभी है, अभी नहीं रहेगी। अभी तू देह की उपस्थिति के साथ जीता है, फिर तुम्हें देह की अनुपस्थिति के साथ जीना पड़ेगा। उक्त शिष्य ने बड़े सहमते मन से कहा- हे गुरुदेव आपकी यह उपस्थिति ही तो मेरे ध्यान का विषय है। गुरुदेव बोले, हाँ सो तो ठीक है। अभी मेरी उपस्थिति तुम्हारे ध्यान का विषय है। बाद में जब न रहूँ, तो मेरी अनुपस्थिति को अपने ध्यान का विषय बनाना। गुरुदेव का यह कथन सुनने वाले शिष्य की चेतना में व्याप गया। गुरुदेव का भाव नहीं, विचार नहीं, छवि नहीं, वरन् उनकी अनुपस्थित ही ध्यान का विषय। शिष्य के चिन्तन की इस कड़ियों को जोड़ते हुए वे कह रहे थे- मेरी अनुपस्थिति का ध्यान तुम्हें अध्यात्म का प्रसाद देगा। और सचमुच ही- अनुपस्थिति के इस ध्यान से निर्विकार की स्वाभाविक दशा मिलती है और तब अध्यात्म प्रसाद में कोई सन्देह नहीं रहता है। यह प्रसाद साधक में निर्मल बुद्धि का अवदान भरता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १८२
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

सोमवार, 1 फ़रवरी 2021

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग १०६)

परम शुद्घ को मिलता है अध्यात्म का प्रसाद

यही निर्बीजता योग साधक का अन्तिम लक्ष्य है। अन्तर्यात्रा विज्ञान अस्तित्व में क्रियाशील रहे, तो यह अध्यात्म प्रसाद मिले बिना नहीं रहता। व्यवहार में परिस्थितियों से गहरा सामञ्जस्य, शरीर की स्थिरता, प्राणों की समधुर लय अन्तर्यात्रा विज्ञान के प्रयोगों की पृष्ठभूमि तैयार करती है। मन की एकाग्र, स्थिर एवं शान्त स्थिति में पवित्र धारणाओं के पुष्प मुस्कराते हैं। और तब शुरू होता है— चित्त के संस्कारों का परिशोधन। गहरे में अनुभव करें, तो यही संस्कार बीज हमारे जीवन में प्रवृत्ति एवं परिस्थितियों की फसल रचते हैं। इसीलिए सभी अध्यात्मवेत्ता अपने मार्गों की भिन्नता के बावजूद चित्त के परिशोधन को साधना जीवन का मुख्य कर्त्तव्य बताते रहे हैं। चित्त को समझना एवं सँवारना ही तप है और इसकी आत्मतत्त्व में विलीनता ही योग।

अब भवचक्र की बेड़ियों को तोड़ने के विषय में महर्षि पतंजलि कहते हैं-
निर्विचारवैशारद्येऽध्यात्मप्रसादः॥ १/४७॥
शब्दार्थ-निर्विचारवैशारद्ये= निर्विचार समाधि में विशारद होने पर (योगी को) अध्यात्मप्रसादः= अध्यात्म प्रसाद प्राप्त होता है।
भावार्थ- समाधि की निर्विचार अवस्था की परमशुद्धता उपलब्ध होने पर प्रकट होता है—अध्यात्म प्रसाद।
    
महर्षि पतंजलि ने अपने सूत्रों में अध्यात्म विज्ञान के गहरे निष्कर्ष गूँथे हैं। यह निष्कर्ष भी बड़ा गहन है। इसमें निर्विचार समाधि के तत्त्व को उन्होंने प्रकट किया है। महर्षि अपने योगदर्शन में बड़ी स्पष्ट रीति से समझाते हैं कि योग की यथार्थता- सार्थकता ध्यान में फलित होती है। इसके पूर्व जो भी है- वह सब तैयारी है ध्यान की। यह ध्यान गाढ़ा हुआ तो समाधि फलती है। और समाधि को विविध अवस्थाओं में सबसे पहले आती है- संप्रज्ञात अवस्थाएँ। ये संप्रज्ञात समाधियाँ हालाँकि सबीज है, फिर भी इसमें निर्विचार का मोल है। इसमें विचारों की लहरों से चित्त मुक्त होता है। बुद्धि के भ्रम दूर होते हैं। कर्म-क्लेश भी शिथिल होते हैं। इसकी प्रगाढ़ता में चित्त स्वच्छ हो जाता है, दर्पण की भाँति। और तब इसमें झलक उठती है—आत्मा की छवि। यही तो अध्यात्म का प्रसाद है।
    
इस सूत्र का सार कहें या फिर योग के सभी सूत्रों का सार- महर्षि पतंजलि के प्रतिपादन की मुख्य विषय वस्तु चित्त है। चित्त की अवस्थाएँ, इसमें आने वाले उतार-चढ़ाव, इसमें जमा होने वाले कर्मबीज, इन्हीं की तो शुद्धि करनी है। व्यवहार के रूपान्तरण, परिवर्तन से करें या फिर ध्यान की तल्लीनता से कार्य एक ही है- चित्त का शोधन। इसकी अशुद्धि के यूँ तो कई रूप है, पर मूल रूप एक ही है- संस्कार बीज। इन्हीं को चित्त की गहराई में जाकर खोजना है, खोदना है, बाहर निकालना है, जलाना है और अन्ततोगत्वा इन्हें सम्पूर्णतया समाप्त करके चित्त को शुद्ध करना है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १८०
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

शनिवार, 30 जनवरी 2021

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग १०५)

ध्यान का अगला चरण है—समर्पण
    
इन सभी सबीज समाधियों में क्रमिक रूप से मानसिक विकास भी होता है और परिष्कार भी, परन्तु मन तो रहता है। चित्त में निर्मलता आती है, परिशोधन भी होता है, परन्तु चित्त का विलय बाकी बचा रहता है। जीव और शिव में भेद करने वाली अहं की अन्तिम गाँठ अभी भी नहीं खुल पाती। यौगिक शक्तियाँ एवं सिद्धियाँ तो इन सभी समाधियों में क्रमिक रूप से प्रस्फुरित होती हैं, परन्तु इन सिद्धियों एवं शक्तियों का प्रकृति लय अभी भी बचा रहता है। इन समाधियों में आत्मतत्त्व की झलकियाँ  तो मिलती हैं, पर आध्यात्मिक साम्राज्य की प्रतिष्ठा होनी अभी भी बाकी रहती है।
    
इस गूढ़ रहस्य को अपनी सहज अनुभूति के स्वरों में ढालते हुए युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव कहा करते थे कि ध्यान कितना भी और कैसा भी क्यों न हो पर वह मानसिक क्रिया के अलावा और क्या है? इस ध्यान की परिणति जिस समाधि में होती है, उससे चित्त का परिष्कार होता है, चक्रों को पार करते हुए आज्ञाचक्र में अवस्थित हो गयी।
    
उनके ध्यान में महिमामयी माँ काली की दिव्य लीलाएँ विहरने लगी। भाव विह्वल श्रीरामकृष्ण देव की समाधि प्रगाढ़ हो गयी। परन्तु साकार से निराकार, सबीज से निर्बीज तक पहुँचना अभी भी बाकी था। तोतापुरी ने निर्देश दिया- आगे बढ़ो। श्रीरामकृष्णदेव ने कहा- माँ को छोड़कर? तोतापुरी ने कहा- हाँ, ज्ञान की तलवार लेकर काली के शतखण्ड करो और अखण्ड निराकार के धाम में प्रवेश करो। अनेकों प्रयास के बावजूद श्रीरामकृष्ण यह न कर सके। उनका निर्मल चित्त भी ध्यान की उच्चस्तरीय सूक्ष्मता से मुक्ति न पा सका। मनोलय न सध सका। मन के आँगन में, चित्त के अन्तःप्रकोष्ठ में चित्शक्ति की लीलाएँ चलती रहीं।
    
और तोतापुरी ने अपने हाथों में एक नुकीले पत्थर का टुकड़ा लिया और उससे भ्रूमध्य में आज्ञाचक्र को तीव्रतापूर्वक दबाया- और साथ ही उन्हें निर्देश दिया- पार करो अन्तिम बाधा, उठाओ ज्ञान की तलवार और भेदन करो चित्शक्ति, खोलो ब्रह्म की अनन्तता के द्वार। इस बार का निर्देश श्रीरामकृष्ण के अस्तित्व में व्याप गया। और फिर पल भर में सब कुछ घटित हो गया, वे परमहंस हो गए। शुद्ध, बुद्ध, नित्य-निरंजन, महामाया ने अपनी माया समेट कर उन्हें निर्बीजता में प्रवेश दे दिया।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १७९
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

शुक्रवार, 29 जनवरी 2021

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग १०४)


ध्यान का अगला चरण है—समर्पण

जीवन को असल अर्थ देने वाली अन्तर्यात्रा विज्ञान के प्रयोग सूक्ष्म हैं। इनकी विधि, क्रिया एवं परिणाम योग साधक की अन्तर्चेतना में घटित होते हैं। इस सम्पूर्ण उपक्रम में स्थूल क्रियाओं की उपयोगिता होती भी है, तो केवल इसलिए ताकि साधक की भाव चेतना इन सूक्ष्म प्रयोगों के लिए तैयार हो सके। एक विशेष तरह की आंतरिक संरचना में ही अन्तर्यात्रा के प्रयोग सम्भव बन पड़ते हैं। बौद्धिक योग्यता, व्यवहार कुशलता अथवा सांसारिक सफलताएँ इसका मानदण्ड नहीं हैं। इन मानकों के आधार पर किसी को साधक अथवा योगी नहीं बनाया जा सकता। इसके लिए महत्त्वपूर्ण है—चित्त की अवस्था विशेष, जो अब निरुद्ध होने के लिए उन्मुख है। चित्त में साधना के सुसंस्कारों की सम्पदा से मनुष्य में न केवल मनुष्यत्व जन्म लेता है, बल्कि उसमें मुमुक्षा भी जगती है।
    
पवित्रता के प्रति उत्कट लगन ही व्यक्ति को अन्तर्यात्रा के लिए प्रेरित करती है। और इस अन्तर्यात्रा के लिए गतिशील व्यक्ति धीरे-धीरे स्वयं ही पात्रता के उच्चस्तरीय सोपानों पर चढ़ता जाता है। उसे अपने प्रयोगों में सफलता मिलती है। अन्तस् में निर्मलता, पवित्रता का एक विशेष स्तर हो, तभी प्रत्याहार की भावदशा पनपती है। इसके प्रगाढ़ होने पर ही धारणा परिपक्व होती है। और तब प्रारम्भ होता है ध्यान का प्रयोगात्मक सिलसिला। मानसिक एकाग्रता, चित्त के संस्कारों का परिष्कार, अन्तस् की ग्रन्थियों से मुक्ति के एक के बाद एक स्तरों को भेदते हुए अन्तिम ग्रन्थि भेदन की प्रक्रिया पूरी होती है। इसी बीच योग साधक की अन्तर्चेतना में ध्यान के कई चरणों व स्तरों का विकास होता है। सबीज समाधि की कई अवस्थाएँ फलित होती हैं। महर्षि पतंजलि के पिछले सूत्र में भी इसी की एक अवस्था का चिन्तन किया गया था। इस सूत्र में कहा गया था कि सवितर्क और निर्वितर्क समाधि का जो स्पष्टीकरण है, उसी से समाधि की उच्चतर स्थितियाँ भी स्पष्ट होती हैं। लेकिन सविचार एवं निर्विचार समाधि की इन उच्चतर अवस्थाओं में ध्यान के विषय अधिक सूक्ष्म होते जाते हैं। ध्यान की इस सूक्ष्मता के अनुसार ही ध्यान की प्रभा और प्रभाव दोनों ही बढ़ते जाते हैं। इसी के अनुसार साधक की मानसिक एवं परामानसिक शक्तियों का विकास भी होता है। परन्तु आध्यात्मिक प्रसाद अभी भी योग साधक से दूर रहता है। इसके लिए अभी भी अन्तर्चेतना की अन्तिम निर्मलता अनिवार्य बनी रहती है।
    
महर्षि पतंजलि ने अपने इस नए सूत्र में इन्हीं पूर्ववर्ती अवस्थाओं का समावेश करते हुए कहा है-
ता एव सबीजः समाधिः ॥ १/४६॥
शब्दार्थ- ता एव = वे सब की सब ही; सबीजः= सबीज; समाधिः = समाधि हैं।
भावार्थ- ये समाधियाँ जो फलित होती हैं, किसी विषय पर ध्यान करने से वे सबीज समाधियाँ होती हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १७८
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

सोमवार, 25 जनवरी 2021

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग १०३)

ध्यान की अनुभूतियों द्वारा ऊर्जा स्नान

अंतर्यात्रा के पथ पर चलने वाले योग साधक में सतत सूक्ष्म परिवर्तन घटित होते हैं। उसका अस्तित्व सूक्ष्म ऊर्जाओं के आरोह-अवरोह एवं अंतर-प्रत्यन्तर की प्रयोगशाला बन जाता है। योग साधक के लिए यह बड़ी विरल एवं रहस्यमय स्थिति है। ध्यान की प्रगाढ़ता में होने वाले इन सूक्ष्म ऊर्जाओं के परिवर्तन से जीवन की आंतरिक एवं बाह्य स्थिति परिवर्तित होती है। इन ऊर्जाओं में परिवर्तन साधक के अंदर एवं बाहर भारी उलट-पुलट करते हैं। साकार सहज ही निराकार की ओर बढ़ चलता है।
    
इस तत्त्व का प्रबोध करते हुए महर्षि कहते हैं-
सूक्ष्मविषयत्वं चालिंगपर्यवसानम्॥ १/४५॥
शब्दार्थ-च = तथा; सूक्ष्मविषयत्वम् = सूक्ष्म विषयता; अलिंगपर्यवसानम् = प्रकृति पर्यन्त है।
भावार्थ- इन सूक्ष्म विषयों से सम्बन्धित समाधि का प्रान्त सूक्ष्म ऊर्जाओं की निराकार अवस्था तक फैलता है।
    
महर्षि के इस सूत्र में ध्यान की प्रक्रिया की गहनता का संकेत है। कर्मकाण्ड की पूजा-प्रक्रिया में पदार्थ का ऊर्जा में परिवर्तन होता है। पदार्थों का इस विधि से समायोजन, संकलन एवं विघटन किया कि उनसे आध्यात्मिक ऊर्जा की प्राप्ति हो सके। इस पूजा-प्रक्रिया से पाठ एवं मंत्र के प्रयोग कहीं अधिक सूक्ष्म है। इनमें शब्दशक्ति का अनन्त आकाश में स्फोट होता है। इससे भी कहीं सूक्ष्म है ध्यान। इसमें विचार एवं भाव ऊर्जाओं में सघन परिवर्तन घटित होते हैं। ये परिवर्तन आत्यन्तिक आश्चर्य में होते हैं। इस सम्बन्ध में आध्यात्मिक तथ्य यह है कि साधक की एकाग्रता, आंतरिक दृढ़ता जितनी सघन है, उसमें आध्यात्मिक ऊर्जा का घनत्व जितना अधिक है, उसी के अनुपात में वह इन परिवर्तनों को सहन कर सकता है।
    
योग की इस साधनाभूमि में साधक को बहुत ही सक्रिय, सजग एवं समर्थ होना पड़ता है, क्योंकि ध्यान योग के प्रयोग में सूक्ष्म ऊर्जाएँ कुछ इस ढंग से परिवर्तित-प्रत्यावर्तित होती हैं कि इनसे साधक की समूची प्रकृति प्रभावित हुए बिना नहीं रहती। इन ऊर्जाओं से संस्कार बीज भी प्रेरित-प्रभावित होते हैं। ऐसे में योग साधक के पास इसके परिणामों को सम्हालने के लिए बड़े प्रभावकारी आध्यात्मिक बल की आवश्यकता है। इसके बिना कहीं भी-कुछ भी अघटित घट सकता है।
    
ये सूक्ष्म ऊर्जाएँ जब साधक के अस्तित्व को प्रभावित करती हैं, तो बड़ी जबरदस्त उथल-पुथल होती है। संस्कार बीजों के असमय कुरेदे जाने से जीवन में कई ऐसी घटनाएँ घटने लगती हैं, जो सहज क्रम में अभी असामयिक है। ये घटनाएँ शुभ भी हो सकती हैं और अशुभ भी। कई तरह की दुर्घटनाएँ व जीवन में विचित्र एवं संताप देने वाले अवसर आ सकते हैं। यह योग अवस्था भू-गर्भ में किये जाने वाले पारमाणविक बिस्फोट के समान हैं, जिसके सारे प्रभाव भू-गर्भ तक ही सीमित रखे जाने चाहिए। इसके थोड़े से भी अंश का बाहर आना साधक के अस्तित्व के लिए, उसके शरीर के लिए खतरा हो सकता है। इसके लिए साधक के पास उस बल का होना आवश्यक है, जो इसके प्रभावों का नियमन कर सके। हालाँकि ये घटनाएँ, ये परिवर्तन जिस अवस्था तक होती है, वह समाधि की सबीज अवस्था ही है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १७६
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

शुक्रवार, 22 जनवरी 2021

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग १०२)

ध्यान की अनुभूतियों द्वारा ऊर्जा स्नान

ध्यान साधना के इस क्रम में अगला क्रम भी है, जो अपेक्षाकृत अधिक सूक्ष्म है। सविता देव के भर्ग का ध्यान। ध्यान का यह विशिष्ट एवं अपेक्षाकृत सूक्ष्म अभ्यास है। सविता का यह भर्ग, प्रकाश पुञ्ज के रूप में सविता की महाशक्ति है। इसे धारण करना विशिष्ट साधकों के ही बस की बात है। माँ गायत्री यहाँ सृष्टि की आदि ऊर्जा के रूप में अनुभव होती है। जो इसे जानता है-वही जानता है। ध्यान के इस रूप में साधक की मनोवृत्तियों का लय एक विशिष्ट उपलब्धि है। इस अवस्था में होने वाली समाधि साधक को अलौकिक शक्तियों का अनुदान देती है।
    
इसके बाद ध्यान का एक नया रूप-नया भाव प्रकट होता है। यह ध्यान विधि अपेक्षाकृत अधिक सूक्ष्म है। यहाँ सविता देव के साकार रूप को प्रकट करने वाली महाशक्ति आदि ऊर्जा का साक्षात् होता है। यह अवस्था साधकों की न होकर सिद्धों की है। माँ गायत्री की सृष्टि की आदि ऊर्जा के रूप में ध्यानानुभूति। इसे वही कर सकते हैं, जिनके स्नायु वज्र में ढले हैं। जो अपने तन-मन एवं जीवन को रूपान्तरित कर चुके हैं। परम पूज्य गुरुदेव अपनी भाव चेतना में ध्यान एवं समाधि की इसी विशिष्ट अवस्था में जीते थे। इस ध्यान से उन्हें जो मिला था, उसे बताते हुए वह कहते थे कि मेरे रोम-रोम में शक्ति के महासागर लहराते हैं।
    
ध्यान एवं समाधि का यह स्तर पाना सहज नहीं है। यहाँ जो समाधि लगाते हैं, वे न केवल सृष्टि की महाऊर्जाओं में स्नान करते हैं, बल्कि स्वयं भी ऊर्जा रूप हो जाते हैं। उनकी देह भी रूपान्तरित हो जाती है। यहाँ विचार नहीं बचते, सभी तर्कों का यहाँ लोप होता है। यहाँ न तो रूप है, न आधार, न तर्क है, न विचार। बस  शेष रहता है, तो केवल अनुभव। इसे जो जीते हैं, वही जानते हैं। जो जानते हैं, वे भी पूरा का पूरा नहीं बता पाते। समझने वालों को संकेतों में ही समझना पड़ता है। देखने वालों को केवल इशारे दिखाये जा सकते हैं। और जो इन्हें देखकर सुन्दर इस डगर पर आगे बढ़ते हैं-वे न केवल उपलब्धियाँ पाते हैं, बल्कि उनका स्वयं का जीवन भी एक महाउपलब्धि बन जाता है, जिसमें जिंदगी का असल अर्थ छिपा है।
    
.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १७५
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

बुधवार, 20 जनवरी 2021

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग १०१)

ध्यान की अनुभूतियों द्वारा ऊर्जा स्नान

महर्षि के इस सूत्र में ध्यान के सूक्ष्म एवं गहन प्रयोगों का संकेत है। यह सच है कि ध्यान की प्रगाढ़ता, निरन्तरता एवं ध्येय में लय का नाम ही समाधि है। परन्तु ध्येय क्या एवं लय किस प्रकार? इसी सवाल के सार्थक उत्तर के रूप में समाधि की उच्चस्तरीय स्थितियाँ प्रकट होती हैं। इस सत्य को व्यावहारिक रूप में परम पूज्य गुरुदेव के अनुभवों के प्रकाश में अपेक्षाकृत साफ-साफ देखा जा सकता है। युगऋषि गुरुदेव ने नये एवं परिपक्व साधकों के लिए इसी क्रम में ध्यान के कई रूप एवं उनके स्तर निर्धारित किये थे।
ध्यान के साधकों के लिए उन्होंने पहली सीढ़ी के रूप में वेदमाता गायत्री के साकार रूप का ध्यान बतलाया था। सुन्दर, षोडशी युवती के रूप में हंसारूढ़ माता। गुरुदेव कहते थे कि जो सर्वांग सुन्दर नवयुवती में जगन्माता के दर्शन कर सकता है, वही साधक होने के योग्य है। छोटी बालिका में अथवा फिर वृद्धा में माँ की कल्पना कर लेना सहज है, क्योंकि ये छवियाँ सामान्यतया साधक के चित्त में वासनाओं को नहीं कुरेदती। परन्तु युवती स्त्री को जगदम्बा के रूप में अनुभव कर लेना सच्चे एवं परिपक्व साधकों का ही काम है। जो ऐसा कर पाते हैं, वही ध्यान साधना में प्रवेश के अधिकारी हैं। हालाँकि यह ध्यान का स्थूल रूप है, परन्तु इसमें प्रवेश करने पर ही क्रमशः सूक्ष्म परतें खुलती हैं।
इस ध्यान को सूक्ष्म बनाने के लिए ध्यान की दूसरी सीढ़ी है कि उन्हें उदय कालीन सूर्यमण्डल के मध्य में आसीन देखा जाय। और सविता की महाशक्ति के रूप में स्वयं के ध्यान अनुभव को प्रगाढ़ किया जाय। ऐसे ध्यान में मूर्ति अथवा चित्र की आवश्यकता नहीं रहती। बस विचारों एवं भावों की तद्विषयक  प्रगाढ़ता ही सविता मण्डल में मूर्ति बनकर झलकती है। जो इसे अपने ध्यान की प्रक्रिया में ढालते हैं, उन्हें अनुभव होता है कि सविता देव एवं माँ गायत्री एकाकार हो गये हैं। यहाँ ध्यान की सूक्ष्मता तो है, परन्तु स्थूल आधारों से प्रकट हुई सूक्ष्मता है। फिर भी इस सूक्ष्म स्थिति को पाने के बाद साधक की चेतना में विशिष्ट परिवर्तन अनुभव होने लगते हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १७४
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

सोमवार, 18 जनवरी 2021

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग १००)

ध्यान की अनुभूतियों द्वारा ऊर्जा स्नान

अन्तर्यात्रा के मार्ग पर चलने वाले सौभाग्यशाली होते हैं। यह मार्ग अपने प्रयोगों में निरन्तर सूक्ष्म होता जाता है। व्यवहार के प्रयोग विचारों की ओर और विचारों के प्रयोग संस्कारों की ओर सरकने लगते हैं। व्यवहार को रूपान्तरित, परिवर्तित करने वाले यम-नियम के अनुशासन, शरीर व प्राण को स्थिर करने वाली आसन एवं प्राणायाम की क्रियाओं की ओर गतिशील होते हैं। यह गतिशीलता प्रत्याहार व धारणा की आंतरिक गतियों की ओर बढ़ती हुई ध्यान की सूक्ष्मताओं में समाती है। इसके बाद शुरू होता है-ध्यान की सूक्ष्मताओं के विविध प्रयोगों का आयोजन। कहने को तो ध्यान की विधा एक ही है, परन्तु इसके सूक्ष्म अन्तर-प्रत्यन्तर अनेकों हैं। जो इन्हें जितना अधिक अनुभव करते हैं, उनकी योग साधना उतनी ही प्रगाढ़ परिपक्व एवं प्रखर मानी जाती है।

इस प्रगाढ़ता, परिपक्वता एवं प्रखरता के अनुरूप ही साधक को समाधि के समाधान मिलते हैं। ध्यान की सूक्ष्मता जितनी अधिक होती है, समाधि उतनी ही उच्चस्तरीय होती है। सवितर्क-निर्वितर्क, इसके बाद सविचार एवं निर्विचार। महर्षि पतंजलि के अनुसार समाधि के ये अलग-अलग स्तर साधक की साधना की अलग एवं विशिष्ट स्थितियों की व्याख्या करते हैं।

महर्षि अब सूक्ष्म ध्येय में होने वाली सम्प्रज्ञात समाधि के भेद बतलाते हैं-
एतयैव सविचारा निर्विचारा च सूक्ष्मविषया व्याख्याता॥ १/४४॥
शब्दार्थ- एतया एव = इसी से (पूर्वोक्त सवितर्क और निर्वितर्क के वर्णन से ही); सूक्ष्म विषया = सूक्ष्म पदार्थों में की जाने वाली; सविचारा =सविचार (और); निर्विचारा = निर्विचार समाधि का; च = भी; व्याख्याता = वर्णन किया गया।
भावार्थ - सवितर्क और निर्वितर्क समाधि का जो स्पष्टीकरण है, उसी से समाधि की उच्चतर स्थितियाँ भी स्पष्ट होती हैं। लेकिन सविचार और निर्विचार समाधि की इन उच्चतर अवस्थाओं में ध्यान के विषय अधिक सूक्ष्म होते हैं।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १७३
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

शनिवार, 16 जनवरी 2021

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ९९)

सत्य का साक्षात्कार है—निर्वितर्क समाधि
कैसे करें स्मृति परिशोधन अथवा चित्तशुद्धि? क्या विधान है इसका? यह प्रश्न सभी साधकों का है। युगऋषि गुरुदेव के शब्दों में इसका उत्तर है-अपार धैर्य के साथ निष्काम कर्म। इसी के साथ अनवरत निष्काम एवं सतत तप। यही मार्ग है। एक सम्ूपर्ण जीवन को लगाये-खपाये बगैर किसी के द्वारा यह साधना सम्भव नहीं। जो इसके विपरीत किसी अन्य विधि से निर्वितर्क की यात्रा करना चाहते हैं, वे केवल दिवास्वप्न देखते हैं। विश्व ब्रह्माण्ड में ऐसी कोई भी शक्ति नहीं, जो निष्काम कर्म एवं तप के बिना इस मंजिल तक पहुँचा दे।
यहाँ तक कि समर्थ गुरु एवं इष्ट-आराध्य भी अपने शिष्य-सेवक को इसी मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित-प्रवर्तित करते हैं। थकने पर उसे हिम्मत देते हैं, गिरने पर उसे उठाते हैं, हताश होने पर साहस देते हैं। इस सबके बावजूद चध्यान की अनुभूतियों द्वारा ऊर्जा स्नानलना तो स्वयं को ही पड़ता है। अपने सिवा और कोई नहीं चलता। यह ऐसी सच्चाई है, जिसे वही जानते हैं, जो जीते हैं। चित्त का एक-एक संस्कार, एक-एक कर्मबीज अपने भोग पूरे करवाने में कभी-कभी तो वर्षों ले लेता है। कई बार तो इस पथ पर बड़ी नारकीय यातनाएँ एवं दारुण परिस्थितियाँ सहन करनी पड़ती है। पर करें भी तो क्या? अन्य कोई चारा भी तो नहीं।
इस पूरी प्रक्रिया में जन्म-जन्मान्तर के कुसंस्कारों की कालिख रह-रह कर बाहर फूटती है। कठिन-कठोर तप से उसका प्रशमन होता है। गुरुकृपा के झूठे मद में फूले हुए लोग जो इस दौरान् तप से मुँह मोड़ते हैं, वे कुसंस्कारों की देन को सम्भालने में नाकाम रहते हैं। दूषित चरित्र ही ऐसों की नियति होती है। ये हतभागी जन अपने जन्मों से कमायी गयी प्राण ऊर्जा को वासनाओं के खेल में खर्च करते हैं। इसलिए निष्काम कर्म एवं तप ही सत्य की ओर बढ़ने का राजमार्ग है। जो इस सत्य को जीते हैं, वे अपने गुरु की कृपा एवं आराध्य के अनुदानों का सच्चा लाभ उठाते हैं। उन्हीं को समाधि की उच्चतर अवस्थाओं को पाने का सौभाग्य मिलता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १७२
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

शुक्रवार, 15 जनवरी 2021

👉 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान (भाग ९८)

सत्य का साक्षात्कार है—निर्वितर्क समाधि

युगऋषि परम पूज्य गुरुदेव कहते थे कि स्मृति के दोहरे अर्थ हैं। एक अर्थ-सामान्य, साधारण है और एक है— विशिष्ट, आध्यात्मिक। सामान्य साधारण अर्थ में स्मृति हमारा पिछला कल है, आज का वर्तमान है। लेकिन इसका दायरा हमारे वर्तमान जीवन तक सीमित है। आज के रिश्ते-नाते, इनकी खटास-मिठास, बीता हुआ बचपन, कहीं खो चुकी या खो रही किशोरवय, स्मृतियों के पिटारे में ही तो कैद है। अगर किसी तरह इसका लोप हो जाय, तो प्रकारान्तर से हम ही लुप्त हो जायेंगे।
स्मृति के इस सिलसिले से परे इनका एक आध्यात्मिक पहलू है। जिसमें हमारा सम्पूर्ण अतीत बँधा है। इसमें पिरोये हैं—हमारे अनगिनत जन्म, हमारे सभी कर्मबीज। हमारे आग्रह, हमारी मान्यताएँ, हमारी सोच, हमारा दृष्टिकोण। योग साधना में इसी का शोधन करना है। इस तथ्य को पतंजलि स्मृति शुद्धि कहते हैं। इसे ही आचार्य शंकर ने चित्तशुद्धि कहा है। स्मृति का यह जमावड़ा-जखीरा वस्तुतः हम पर बोझ है। इसे हल्का करने की जरूरत है। स्मृति की यह अशुद्धि ही प्रकारान्तर से हमारे जीवन की विकृति है। इसे धोये बिना, इसे जलाये-गलाये बिना आध्यात्मिक पथ प्रशस्त नहीं होता।
स्मृति परिशुद्धि या चित्तशुद्धि की यह यात्रा बड़ी दुःखदायी है। यह धधकती आग का वह दरिया है, जिसे प्रत्येक साधक को पार करना पड़ता है। यही यथार्थ साधना है, सच यह भी है कि इसी में सभी साधनाओं की सार्थकता है। इसके अभाव में सभी साधनाएँ निरर्थक हैं। इसे किये बिना जप, मंत्र, योग, तप किसी का कोई मूल्य नहीं है। योग और तंत्र में कई बार कई चमत्कारी संतों की कथाएँ कहीं सुनी जाती हैं। परन्तु इनमें से किसी भी चमत्कार से चित्तशुद्ध नहीं होता। यह ऐसा चमत्कार है, जिसे योग साधक को स्वयं करना पड़ता है।

.... क्रमशः जारी
📖 अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान पृष्ठ १७१
✍🏻 डॉ. प्रणव पण्ड्या

👉 छिद्रान्वेषण की दुष्प्रवृत्ति

छिद्रान्वेषण की वृत्ति अपने अन्दर हो तो संसार के सभी मनुष्य दुष्ट दुराचारी दिखाई देंगे। ढूँढ़ने पर दोष तो भगवान में भी मिल सकते है, न हों तो...