शुक्रवार, 13 अक्तूबर 2017

👉 कोयल और कौआ

🔴 संस्कृत साहित्य की यह चर्चित कथा है। एक बार वसंत ऋतु में एक कोयल वृक्ष पर बैठी कूक रही थी। आते-जाते लोग उसकी कूक को सुनते और उसकी सुरीली आवाज का आनंद लेते हुए उसकी तारीफ के पुल बांधते। कुछ देर बाद कोयल के सामने एक कौआ तेज गति से आया। कोयल ने उससे पूछा, ‘इतनी तेज गति से कहां जा रहे हो? कुछ देर बैठो, बातें करते हैं।’ कौए ने उत्तर दिया कि वह जरा जल्दी में है और देश को छोड़कर परदेस जा रहा है।

🔵 कोयल ने इसका कारण पूछा तो कौआ बोला, ‘यहां के लोग बहुत खराब हैं। सब तुम्हें ही चाहते हैं। सभी लोग सिर्फ तुम्हारा आदर करते हैं। वह यही चाहते हैं कि तुम हमेशा की तरह इसी प्रकार से उनके क्षेत्र में गाती रहो। वहीं जहां तक मेरी बात है तो मुझे कोई देखना तक नहीं चाहता। यहां तक कि मैं किसी की मुंडेर पर बैठता हूं तो मुझे कंकड़ मारकर वहां से भगा दिया जाता है। मेरी आवाज भी कोई नहीं सुनना चाहता। जहां मेरा अपमान हो, मैं ऐसे स्थान पर एक क्षण भी नहीं रहना चाहता। ज्ञानियों ने भी हमें यही शिक्षा दी है कि अपमान की जगह पर नहीं रहना चाहिए।’

🔴 यह सुनकर कोयल बोली, ‘परदेस जाना चाहते हो तो बड़े शौक से जाओ। यह पूरी तरह से तुम्हारी इच्छा पर निर्भर है। लेकिन एक बात का सदैव ध्यान रखना कि वहां जाने से पहले अपनी आवाज को बदल लेना। अपनी वाणी को मधुर बना लेना। यदि तुम्हारी वाणी ठीक वैसी ही कठोर रही, जैसी यहां पर है तो परदेस में भी लोग तुम्हारे साथ वही व्यवहार करेंगे जो अभी हो रहा है। संसार जो है, जैसा भी है, उसे बदला नहीं जा सकता। लेकिन हम अपनी दृष्टि और वाणी को बदल सकते हैं। इन दोनों के बदलने से जीवन की दिशा और दशा, दोनों बदल जाती है और यहीं से संसार में आनंद और सुख की प्राप्ति शुरू होती है।’

👉 अध्यात्म का उपदेश

🔴 प्रसन्नता, अप्रसन्नता, आत्मरक्षा, संघर्ष, जिज्ञासा, प्रेम, सामूहिकता, संग्रह, शरीर पोषण, क्रीड़ा, महत्व प्रदर्शन, भोगेच्छा यह मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्तियाँ है। शरीर और मन परिस्थितियों के अनुसार इन परिस्थितियों के क्षेत्र में विचरण करते रहते है। उसकी एक अध्यात्मिक विशेषता भी है जिसे महानता, धार्मिकता, आस्तिकता, दैवी सम्पदा आदि नामों से पुकारते है। उसके द्वारा मनुष्य दूसरों को सुखी बनाने के लिए अपने आपको कष्ट में डाल कर भी प्रसन्नता अनुभव करता है। दूसरों के सुख में अपना सुख और दूसरों के दुःख में अपना दुःख मानता है। जिस प्रकार अपने सुख को बढ़ाकर और दुःख को घटाकर प्रसन्नता का अनुभव होता है इसी प्रकार दूसरों में आत्मीयता का आरोपण करके उनके हित साधन में भी संतोष और सुख का अनुभव होता है।

🔵 यह उदारता एवं सेवा की वृत्ति तभी प्रस्फुटित होती है जब मनुष्य अपने आपको संयमित करता है। अपने लिए सीमित लाभ में संतोष करने से ही दूसरों के प्रति कुछ उदारता प्रदर्शित करना संभव होता है। इसलिए इस सर्वतोमुखी संयम को नैतिकता या धर्म के नाम से पुकारा जाता है। इसी का अभ्यास करने के लिए नाना प्रकार के जप, तप, व्रत अनुष्ठान किये जाते है। शास्त्र श्रवण, स्वाध्याय और सत्संग का उद्देश्य भी इन्हीं प्रवृत्तियों को विकसित करना है। चरित्र निर्माण और नैतिकता भी इसी प्रक्रिया का नाम है। पुण्य, परमार्थ भी इसी को कहते है और स्वर्ग तथा मुक्ति इसके फल माने गये है। ईश्वर उपासना के महात्म्य से यह आत्म-निर्माण का कार्य अधिक सरलता से पूर्ण होता है।

🌹 अखण्ड ज्योति जून 1961

👉 हमारी वसीयत और विरासत (भाग 144)

🌹  इन दिनों हम यह करने में जुट रहे है
🔵 ऐसे उदाहरणों से इतिहास भरा पड़ा है, जिसमें कितनी ही प्रतिभाओं को किन्हीं मनस्वी आत्म वेत्ताओं ने बदलकर कुछ से कुछ बना दिया। उनकी अनुकम्पा न हुई होती तो वे जीवन भर अपने उसी पुराने ढर्रे पर लुढ़कते रहते जिस पर कि उनका परिवार चल रहा था।

🔴 हमारी अपनी बात भी ठीक ऐसी ही है। यदि गुरुदेव ने उलट न दिया होता तो हम अपने पारिवारिक जनों की तरह पौरोहित्य का धंधा कर रहे होते या किसी और काम में लगे होते। उस स्थान पर पहुँच ही न पाते, जिस पर कि हम अब पहुँच गए हैं।

🔵 इन दिनों युग परिवर्तन के लिए कई प्रकार की प्रतिभाएँ चाहिए। विद्वानों की आवश्यकता है, जो लोगों को अपने तर्क प्रमाणों की नई पद्धति प्रदान कर सकें। कलाकारों की आवश्यकता है, जो चैतन्य महाप्रभु, मीरा, सूर, कबीर की भावनाओं को इस प्रकार लहरा सकें, जैसे सँपेरा साँप को लहराता रहता है। धनवानों की जरूरत है, जो अपने पैसे को विलास में खर्च करने की अपेक्षा सम्राट अशोक की तरह अपना सर्वस्व समय की आवश्यकता पूरी करने के लिए लुटा सकें। राजनीतिज्ञों की जरूरत है जो गाँधी, रूसो और कार्लमार्क्स, लेनिन की तरह अपने सम्पर्क से प्रजाजनों को ऐसे मार्ग पर चला सकें, जिसकी पहले कभी भी आशा नहीं की गई थी।

🔴 भावनाशील का क्या कहना? संत सज्जनों ने न जाने कितनों को अपने सम्पर्क से लोहे जैसे लोगों को पारस की भूमिका निभाते हुए कुछ से कुछ बना दिया। हमारे वीरभद्र अब यही करेंगे। हमने भी यही किया है। लाखों लोगों की विचारणा और क्रिया पद्धति में आमूल-चूल परिवर्तन किया है और उन्हें गाँधी के सत्याग्रहियों की तरह, विनोबा के भूदानियों की तरह, बुद्ध के परिव्राजकों की तरह अपना सर्वस्व लुटा देने के लिए तैयार कर दिया। प्रज्ञा पुत्रों की इतनी बड़ी सेना हनुमान के अनुयायी वानरों की भूमिका निभाती है। इस छोटे से जीवन में अपनी प्रत्यक्ष क्रियाओं के द्वारा जहाँ भी रहे वहीं चमत्कार खड़े कर दिए तो कोई कारण नहीं कि हमारी ही आत्मा के टुकड़े जिसके पीछे लगें, उसे भूत−पलीत की तरह तोड़-मरोड़ कर न रख दें।

🔵 अगले दिनों अनेक दुष्प्रवृत्तियों के उन्मूलन की आवश्यकता पड़ेगी। उसके लिए ऐसे गाण्डीव धारियों की, जो अर्जुन की तरह कौरवों की अक्षौहिणी सेनाओं को धराशायी कर दें, आवश्यकता पड़ेगी। ऐसे हनुमानों की जरूरत होगी, जो एक लाख पूत-सवा लाख नाती वाली लंका को पूँछ से जलाकर खाक कर दें। ऐसे परिवर्तन अंतराल बदलने भर से हो सकते हैं। अमेरिका के अब्राहम लिंकन और जार्ज वाशिंगटन बहुत गई गुजरी हैसियत के परिवारों में जन्मे थे, पर वे अपने जीवन प्रवाह को पलट कर अमेरिका के राष्ट्रपति बन गए।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v2.163

http://literature.awgp.org/book/My_Life_Its_Legacy_and_Message/v4.21

👉 देवत्व विकसित करें, कालनेमि न बनें (भाग 1)

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ,
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

🔴 देवियो! भाइयो!! बहुत पुराने समय की बात है, जब रावण सीताजी को चुराकर ले गया था और सबके सामने यह समस्या थी कि मुकाबला कैसे किया जाए? रावण से युद्ध कैसे किया जाए? बहुत सारे लोग थे, राजा-महाराजा भी थे, पर किसी की हिम्मत नहीं पड़ी कि रावण से लड़ने के लिए जाए, कौन अपनी जान गँवाए, कौन मुसीबत में फँसे? इसलिए कोई भी तैयार नहीं हुआ। रामचन्द्रजी कहने लगे कि क्या कोई भी लड़ने हमारे साथ नहीं जाएगा? तो फिर क्या हुआ? देवताओं ने विचार किया और कहा कि भगवान के काम में हमको सहायता करनी चाहिए और सुग्रीव की सेना में, हनुमान की सेना में सम्मिलित होकर रावण से लड़ने के लिए चलना चाहिए।
   
🔵 देवताओं ने बन्दर रूप बनाया, रीछ का रूप बनाया। कहाँ रावण और कहाँ बेचारे बन्दर, दोनों का कोई मुकाबला नहीं था, फिर भी वे लड़ने के लिए चल पड़े, क्यों? क्योंकि वे देवता थे। देवता न होते, अगर रीछ-बन्दर रहे होते तो पेड़ों पर फुदक रहे होते, फिर वे सीताजी को छुड़ाने के लिए रामराज्य की स्थापना के लिए, लंका को तहस-नहस करने के लिए भला इस तरह के कार्य कैसे कर सकते थे? लेकिन उन्होंने किया। आप लोगों को मैं रीछ और बन्दर के रूप में देवता मानता हूँ। आज फिर उसी ऐतिहासिक घटना की पुनरावृत्ति होने जा रही है। आप लोग पहले जन्म में देवता हैं।

🔴 अकेले में जब कभी आपको शान्ति का समय मिले, एकान्त का समय मिले, तब आप अपने अन्दर झाँककर देखना कि आप रीछ-बन्दर हैं या देवता हैं। वास्तव में आप देवता हैं। देवताओं के सिवाय आड़े वक्त में कोई और काम नहीं आ सकता, देवता ही काम आते हैं। आप लोगों में से हर एक को मुझे यही कहना है कि आपको जब कभी अपने आप में मौका मिले तो कहना कि गुरुपूर्णिमा के दिन गुरुजी ने कहा था कि हमारे भीतर देवता बैठा हुआ है, देवता विराजमान है। देवता जो काम किया करते हैं, वे जिस काम के लिए अपना जीवन लगाया करते हैं, जिसके लिए पुरुषार्थ किया करते हैं, वही पुरुषार्थ हमारे सुपुर्द किया गया है।

🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृतवाणी)

👉 Sowing and Reaping (Investment & its Returns) (Part 1)

🔵 Brothers! Almost 60 years have now passed. 60 years ago, came my GURUDEV to tell me so many things. I too was in fear initially but it all just evaporated when he showed me last three births in which he was with me and thereafter began our talks. He said, ‘‘you must execute 24 PURASHCHARAN of 2.4 million each in next 24 years in order to induce eligibility within you with condition that daily only one chapatti made of barely and buttermilk will be your means of survival all along.’’
 
🔴 He added to it one more new thing- ‘‘SOWING & REAPING’’. He told me just to sow in the field of BHAGWAN whatever I had in order to receive back 100 times of what I had sown. This is how RIDDHI-SIDDHI is gained in life. There is nothing free from any quarter in this world. No such law exists in this world that someone is there to distribute RIDDHI, SIDDHI in free to all simply because he has gained it already from some quarter.
 
🔵 After all how a farmer can think of reaping when he had sown nothing. He reaps what he sows, is the simplest rule he follows to gain. You will have to start in same fashion and style to sow and reap your RIDDHIs-SIDDHIs. He said, ‘‘which things do you have?’’ I replied I do not know. He then said, ‘‘look, you have at least, if nothing else, the time and the capacity to work. It is enough. You just begin to sow these two elements of life in the field of BHAGWAN.’’ Which BHAGWAN when I asked he replied that the very society present around you is the form of VIRAT-BHAGWAN.

🌹 to be continue...
🌹 Pt Shriram Sharma Aachrya

👉 Couldn’t touch Paras to iron

🔴 A man got paras stone (which supposedly converts iron to gold on contact) for 7 days as blessing from a mahatma but then he started searching for cheap iron from city to city. He went to different places in search of it and lost all the time like this. At the end of 7 days he couldn’t make even small amount of gold from it and the Mahatma took the stone back from him.

🔵 This life is also like a paras stone. Those who want to convert it into spiritual wealth don’t miss the opportunity by wasting time in attractions. The wealth acquired by depending and believing on one’s soul is much more satisfying and rewarding than the all the material opulence of the world.

🌹 From Pragya Puran

👉 आत्मचिंतन के क्षण 13 Oct 2017

🔵 अपने से अधिक सुखी, अधिक साधन-सम्पन्न, अधिक ऊंची परिस्थिति के लोगों के साथ यदि अपनी तुलना की जाए तो प्रतीत होगा कि सारा अभाव और दारिद्र हमारे ही हिस्से में आया है। परन्तु यदि इन असंख्यों दीन-हीन, पीड़ित, परेशान लोगों के साथ अपनी तुलना करें तो अपने सौभाग्य की सराहना करने को जी चाहेगा। ऐसी दशा में यह स्पष्ट है कि अभाव या दारिद्र की कोई मुख्य समस्या अपने सामने नहीं है। समस्या केवल इतनी ही है कि हम अपने से गिरे लोगों से अपनी तुलना करते हैं या बढ़े हुए लोगों से। इस तुलना में हेर-फेर करने से हमारा असंतोष, संतोष में और संतोष, असंतोष में परिणित हो सकता है।

🔴 जिन स्वजन संबंधियों से, उनके छोटे-छोटे दुर्गुणों के कारण हमें झुँझलाहट आती है, जो हमें भार रूप और व्यर्थ मालूम पड़ते हैं, उनके द्वारा अपने ऊपर अब तक किये हुए अहसानों एवं उपकारों का स्मरण किया जाए तो लगेगा कि वह बड़े ही त्यागी, सेवा-भावी और उदार हैं। यदि उनकी अब तक की समस्त सेवा सहायताओं का स्मरण किया जाए तो लगेगा कि वे साक्षात उपकारों के देवता हैं। उनका कृतज्ञ होना चाहिए और भाग्य को सराहना चाहिये कि ऐसे उपकारी स्नेह मित्र स्वजन सम्बंधी हमें उपलब्ध हुए।

🔵 तृष्णा का कोई अंत नहीं। एक से एक अच्छी और एक से एक सुन्दर चीजें इस दुनिया में मौजूद हैं। उस क्रम का अन्त नहीं आज जो कुछ हम चाहते हैं उसे मिलने पर कल और बढ़िया का मोह बढ़ेगा। बढ़ियापन का कहीं अन्त नहीं। इस कुचक्र में उलझने से सदा घोर असन्तोष ही बना रहेगा। इस लिए यदि चित्त का समाधान करना हो तो कहीं न कहीं पहुँच कर सन्तोष करना पड़ेगा। यदि उस सन्तोष को आज ही वर्तमान स्थिति में ही, कर लिया जाए तो तृप्ति, पूर्णता और संतोष के रसास्वादन का आनन्द आज ही उपलब्ध हो सकता है। इसके लिये एक क्षण की प्रतिक्षा न करनी पड़ेगी।

🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

👉 दाम्पत्य जीवन की सफलता का मार्ग (भाग 1)

🔴 अनेक परिवारों में स्त्री-पुरुषों के मध्य वैसे मधुर संबंध नहीं देखें जाते जैसे कि होने चाहिएं। अनेकों घरों में आये दिन संघर्ष, मनोमालिन्य और अविश्वास के चिन्ह परिलक्षित होते रहते हैं। कारण यह है कि पति-पत्नी में से एक या दोनों ही केवल अपनी-अपनी इच्छा, आवश्यकता और रुचि को प्रधानता देते हैं। दूसरे पक्ष की भावना और परिस्थितियों को न समझना ही प्रायः कलह का कारण होता है।

🔵 जब एक पक्ष दूसरे पक्ष की इच्छानुसार आचरण नहीं करता तो उसे यह बात अपना अपमान, उपेक्षा या तिरस्कार प्रतीत होती है, जिससे चिढ़कर दूसरे पक्ष पर कटु वाक्यों का प्रहार या दुर्भावनाओं का आरोपण करता है। उत्तर-प्रत्युत्तर, आक्रमण-प्रत्याक्रमण, आक्षेप-प्रत्याक्षेप का सिलसिला चल पड़ता है तो उससे कलह बढ़ता ही जाता है। दोनों में से कोई अपनी गलती नहीं मानता, वरन् दूसरे को अधिक दोषी, प्रधान दोषी, प्रथम दोषी सिद्ध करने के लिए अपनी जिद को बढ़ाते रहते हैं। इस रीति से कभी भी झगड़े का अन्त नहीं हो सकता। अग्नि में ईंधन डालते जाने से तो और भी अधिक प्रज्वलित होती है।

🔴 जो पति-पत्नि अपने संबंधों को मधु रखना चाहते हैं उन्हें चाहिए कि दूसरे पक्ष की, योग्यता, मनोभूमि, भावना, इच्छा, संस्कार, परिस्थिति एवं आवश्यकता को समझने का प्रयत्न करें और उस स्थिति में मनुष्य के लिए जो उपयुक्त हो सके ऐसा उदार व्यवहार करने की चेष्टा करें तो झगड़े के अनेकों अवसर उत्पन्न होने से पहले ही दूर हो जावेंगे। हमें भली प्रकार समझ रखना चाहिए कि सब मनुष्य एक समान नहीं हैं, सबकी रुचि एक समान नहीं है, सबकी बुद्धि, भावना और इच्छा एक जैसी नहीं होती। भिन्न वातावरण भिन्न परिस्थिति और भिन्न कारणों से लोगों की मनोभूमि में भिन्नता हो जाती है। यह भिन्नता पूर्णतया मिट कर दूसरे पक्ष के बिलकुल समान हो जावें यह हो नहीं सकता। कोई स्त्री-पुरुष आपस में कितने ही सच्चे क्यों न हों, उनके विचार और कार्यों में कुछ न कुछ भिन्नता रह ही जायेगी।

🌹 अखण्ड ज्योति- मार्च 1950 पृष्ठ 27
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1950/March/v1.27

👉 आज का सद्चिंतन 13 Oct 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 13 Oct 2017


👉 चरित्र : सर्व गुण आधार

🔴 किसी भी व्यक्ति में शरीर का बल तो आवश्यक है; पर उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण उसमें चरित्रबल अर्थात शील है। यदि यह न हो, तो अन्य सभी शक्तियाँ भी बेकार हो जाती हैं। प्राचीन भारतीय साहित्य में प्रह्लाद की कथा आती है, जो शील के महत्त्व बखुबी स्थापित करती है।

🔵 राक्षसराज प्रह्लाद ने अपनी तपस्या एवं अच्छे कार्यों के बल पर देवताओं के राजा इन्द्र को गद्दी से हटा दिया और स्वयं राजा बन बैठा। इन्द्र परेशान होकर देवताओं के गुरु आचार्य वृहस्पति के पास गये और उन्हें अपनी समस्या बतायी। वृहस्पति ने कहा कि प्रह्लाद को ताकत के बल पर तो हराया नहीं जा सकता। इसके लिए कोई और उपाय करना पड़ेगा। वह यह है कि प्रह्लाद प्रतिदिन प्रात:काल दान देते हैं। उस समय वह किसी याचक को खाली हाथ नहीं लौटाते। उनके इस गुण का उपयोग कर ही उन्हें पराजित किया जा सकता है। इन्द्र द्वारा जिज्ञासा करने पर आचार्य वृहस्पति ने आगे बताया कि प्रात:काल दान-पुण्य के  समय में तुम एक भिक्षुक का रूप लेकर जाओ। जब तुम्हारा माँगने का क्रम आये, तो तुम उनसे उनका चरित्र माँग लेना। बस तुम्हारा काम हो जाएगा।

🔴 इन्द्र ने ऐसा ही किया। जब उन्होंने प्रह्लाद से उनका शील माँगा, तो प्रह्लाद चौंक गये। उन्होंने पूछा – क्या मेरे शील से तुम्हारा काम बन जाएगा? इन्द्र ने हाँ में सिर हिला दिया। प्रह्लाद ने अपने शील अर्थात् चरित्र को अपने शरीर से जाने को कह दिया। ऐसा कहते ही एक तेजस्वी आकृति प्रह्लाद के शरीर से निकली और भिक्षुक के शरीर में समा गयी। पूछने पर उसने कहा – मैं आपका चरित्र हूँ। आपके कहने पर ही आपको छोड़कर जा रहा हूँ। कुछ समय बाद प्रह्लाद के शरीर से पहले से भी अधिक तेजस्वी एक आकृति और निकली। प्रह्लाद के पूछने पर उसने बताया कि मैं आपका शौर्य हूँ। मैं सदा से शील वाले व्यक्ति के साथ ही रहता हूँ, चूँकि आपने शील को छोड़ दिया है, इसलिए अब मेरा भी यहाँ रहना संभव नहीं है। प्रह्लाद कुछ सोच ही रहे थे कि इतने में एक आकृति और उनके शरीर को छोड़कर जाने लगी। पूछने पर उसने स्वयं को वैभव बताया और कहा कि शील के बिना मेरा रहना संभव नहीं है। इसलिए मैं भी जा रहा हूँ। इसी प्रकार एक-एक कर प्रह्लाद के शरीर से अनेक ज्योतिपुंज निकलकर भिक्षुक के शरीर में समा गये।

🔵 प्रह्लाद निढाल होकर धरती पर गिर गये। सबसे अंत में एक बहुत ही प्रकाशमान पुंज निकला। प्रह्लाद ने चौंककर उसकी ओर देखा, तो वह बोला – मैं आपकी राज्यश्री हूँ। चँकि अब आपके पास न शील है न शौर्य; न वैभव है न तप; न प्रतिष्ठा है न सम्पदा। इसलिए अब मेरे यहां रहने का भी कोई लाभ नहीं है। अत: मैं भी आपको छोड़ रही हूँ। इस प्रकार इन्द्र ने केवल शील लेकर ही प्रह्लाद का सब कुछ ले लिया।

🔴 नि:संदेह चरित्रबल मनुष्य की सबसे बड़ी पूँजी है। चरित्र हो तो हम सब प्राप्त कर सकते हैं, जबकि चरित्र न होने पर हम प्राप्त वस्तुओं से भी हाथ धो बैठते हैं।

🌹 (श्रीमद्भागवत से)