गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

👉 हम ईश्वर के होकर रहें

🔵 प्रतिमाओं में देखे जाने वाले मनुहार करने पर भी नहीं बोलते हैं, लेकिन अन्तःकरण वाले भगवान जब दर्शन देते हैं तो बोलने के लिए, बातें करने के लिए व्याकुल दिखते हैं। यदि हम अपने को तनिक-सा अन्तर्मुखी कर सकें, तो उनके स्वरों की झंकृति स्पष्ट सुनाई देने लगेगी। न जाने कब से वे हमसे कह रहे हैं-‘‘मेरे इस अनुपम उपहार मनुष्य जीवन को इस तरह न बिताया जाना चाहिए, जैसे कि बिताया जा रहा है। ऐसे न बरबाद करना चाहिए, जैसे कि बरबाद किया जा रहा है। ऐसे न गवाँना चाहिए, जैसे कि गवाँया जा रहा है। यह महत्त्वपूर्ण प्रयोजन के लिए है। ओछी रीति-नीति अपनाकर मेरे इस अनोखे-अनूठे अनुदान का उपहास न बनाया जाना चाहिए।

🔴 जब और भी बारीकी से उनकी भाव-भंगिमा और मुखाकृति को देखेंगे, तो प्रतीत होगा कि वे विचार-विनिमय करना चाहते हैं और कहना चाहते हैं कि बताओ तो सही-इस जीवन-सम्पदा का इससे अच्छा उपयोग क्या और कुछ नहीं हो सकता जैसा कि किया जा रहा है? वे उत्तर चाहते हैं और सम्भाषण को जारी रखना चाहते हैं।
  
🔵 लेकिन उत्तर तो हम तभी दे सकते हैं, जब अपने को बारीकी से जानने की कोशिश करें, अपनी गहरी छान-बीन करें। स्वयं की रुचियों-प्रवृत्तियों की जाँच-पड़ताल करें? विचारों को ही नहीं, संस्कारों को भी परखें। आखिर कहाँ और कौन-सा वह तत्त्व है, जो हमें भगवान् से सम्भाषण नहीं करने दे रहा है, आखिर किस वजह से हम उन्हें उत्तर देने से कतरा रहे हैं, किस कारण हमारी जीवन-सम्पदा नष्ट होती चली जा रही है?

🔴 कारण कुछ भी हो, अवांछित तत्त्व जहाँ कहीं भी हों, उसे अपने से निकाल फेकें। परिष्कृत होते ही अहसास होगा, अन्तरंग में अवस्थित भगवान् की झाँकी दर्शन, सम्भाषण, परामर्श और पथ-प्रदर्शन तक ही सीमित नहीं है। उसमें गाय, बछड़े जैसा विह्वल वात्सल्य भी है। परमात्मा हमें अपना दुग्ध अमृत-अजस्र अनुदान के रूप में पिलाना चाहते हैं। पति और पत्नी की तरह भिन्नता को अभिन्नता में बदलना चाहते हैं। हमारी क्षुद्रता को अपनी अनन्तता में बदलना चाहते हैं। हमें अपनाने की, अपने में आत्मसात  कर लेने की उनकी उत्कंठा अति प्रबल है।

🔵 फिर देरी क्यों? विलम्ब किसलिए? हम ईश्वर के बनें, उसके होकर रहें, उसके लिए जिएँ। अपने को इच्छाओं और कामनाओं से खाली कर दें। उसकी इच्छा और प्रेरणा के आधार पर चलने के लिए आत्मसमर्पण कर सकें, तो परमेश्वर को अपने कण-कण में लिपटा हुआ, अनन्त आनन्द की वर्षा करता हुआ पाएँगे। आनन्द की यह वर्षा हमारे रोम-रोम को पुलकन-प्रफुल्लता, उल्लास और शक्ति से भर देगी, जीवन कृतार्थ और कृतकृत्य हो जाएगा।३

🌹 डॉ प्रणव पंड्या
🌹 जीवन पथ के प्रदीप पृष्ठ 44

👉 ध्यानयोग का आधार और स्वरूप (अंतिम भाग 5) 27 April

🔴 सूर्य की बिखरी किरणें मात्र गर्मी और रोशनी उत्पन्न करती हैं। किन्तु जब उन्हें छोटे से आतिशी शीशे द्वारा एक बिन्दु पर केन्द्रित किया जाता है। तो देखते-देखते चिनगारियाँ उठती हैं और भयंकर अग्नि काण्ड कर सकने में समर्थ होती है। बिखरी हुई बारूद आग लगने पर भक् से जलकर समाप्त हो जाती है, किन्तु उसे बन्दूक की नली में सीमाबद्ध किया जाय तो भयंकर धमाका करती है और गोली से निशाना बेधती है। भाप ऐसे ही जहाँ-तहाँ से गर्मी पाकर उठती रहती है, पर केन्द्रित किया जा सके तो प्रेशर कुकर पकाने और रेलगाड़ी चलाने जैसे काम आती है। अर्जुन मत्स्य बेध करके द्रौपदी स्वयंवर इसीलिए जीत सका था कि उसने एकाग्रता की सिद्धि कर ली थी। इसी के बलबूते विद्यार्थी अच्छे नंबरों से उत्तीर्ण होते, निशानेबाज लक्ष्य बेधते और सरकस वाले एक से एक बढ़कर कौतूहल दिखाते हैं। संसार के सफल व्यक्तियों की, एक विशेषता अनिवार्य रूप से रही है, कि वे अपने मस्तिष्क पर काबू प्राप्त किये रहे हैं। जो निश्चय कर लिया उसी पर अविचल भाव से चलते रहे हैं, बीच में चित्त को डगमगाने नहीं दिया है। यदि उनका मन अस्त-व्यस्त डाँवाडोल रहा होता तो कदाचित ही किसी कार्य में सफल हो सके होते।

🔵 योगाभ्यास में मनोनिग्रह को आत्मिक प्रगति की प्रधान भूमिका बताया गया है। इन्द्रिय संयम वस्तुतः मनोनिग्रह ही है। इन्द्रियां तो उपकरण मात्र हैं। वे स्वामिभक्त सेवक की तरह सदा आज्ञा पालन के लिए प्रस्तुत रहती हैं। आदेश तो मन ही देता है। उसी के कहने पर ज्ञानेन्द्रियां, कर्मेन्द्रियां ही नहीं, समूची काया भले बुरे आदेश पालन करने के लिए तैयार रहती है। अस्तु संयम साधना के लिए मन को साधना पड़ता है। संयम से शक्तियों का बिखराव रुकता है और समग्र क्षमता एक केन्द्र बिन्दु पर एकत्रित होती है। फलतः उस मनःस्थिति में जो भी काम हाथ में लिया जाय, सफल होकर रहता है।

🔴 ध्यानयोग सांसारिक सफलताओं में भी आश्चर्यजनक योगदान प्रस्तुत करता है। उसके आधार पर अपना भी भला हो सकता है और दूसरों का भी किया जा सकता है।

🌹 ~समाप्त
🌹~अखण्ड ज्योति 1986 नवम्बर पृष्ठ 5......Read Full Please Click
👇👇👇👇👇👇👇 
http://literature.awgp.org/akhandjyoti/1986/November/v1.5

👉 आज का सद्चिंतन 27 April 2017


👉 प्रेरणादायक प्रसंग 27 April 2017



👉 अपना अपना भाग्‍य

एक राजा के तीन पुत्रियाँ थीं और तीनों बडी ही समझदार थी। वे तीनो राजमहल मे बडे आराम से रहती थी। एक दिन राजा अपनी तीनों पुत्रियों सहित भोज...